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हिन्दी साहित्य- कथा-कहानी – * “मैंने उस दर्द को सीने में छुपा रक्खा है” * – श्री जय प्रकाश पाण्डेय

श्री जय प्रकाश पाण्डेय "मैंने उस दर्द को सीने में छुपा रक्खा है" (प्रस्तुत है श्री जय प्रकाश पाण्डेय जी  की  एक सार्थक एवं मार्मिक -प्रेरणास्पद कथा।)  तुमने मुझसे पूछा है कि जब मैं 26 साल में विधवा हो गई थी तो फिर से प्रेम करके पुनर्विवाह क्यों नहीं कर लिया। संतान पैदा कर लेतीं, बुढ़ापे का सहारा हो जाता। चैन सुख से जीवन गुजर जाता। ये देशभक्ति, देश सेवा, समाजसेवा के चक्कर में क्यूं पड़ गईं ? तुम्हारे सवाल का जबाब देना थोड़ा मुश्किल सा है क्योंकि तुम नहीं समझ पाओगे, न्यायालय नहीं समझ पाया, जो अपने आपको देशभक्त कहते हैं ऐसे बड़े नेता नहीं समझ पाए। दरअसल 25 साल में मेरी शादी बीएसएफ के एक बड़े अधिकारी से हुई, शादी के बाद हम पति पत्नी ने तय किया था कि बच्चा दो साल बाद पैदा करेंगे, होने वाली संतान को ऐसे संस्कार देंगे कि वह बेईमानी, भ्रष्टाचार, लफ्फाजी का विरोध करे और उसके अंदर देशसेवा के लिए जुनून पैदा हो। शादी के बाद उनकी पोस्टिंग कुछ...
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हिन्दी साहित्य- लघुकथा – * “गम” ले * – डॉ . प्रदीप शशांक

डॉ . प्रदीप शशांक  "गम" ले  सिर पर रखी बड़ी टोकरी में तीन -चार गमले लिये एक  वृद्ध महिला कालोनी में " ले गमले .... ले गमले " की आवाज लगाती  हुई  आ रही थी । श्रीमती जी ने उसे आवाज देकर बुलाया ,उसके सर पर रखी टोकरी को अपने हाथों का सहारा देकर नीचे उतरवाया और उससे पूछा - "कितने के दिये ये गमले ?" उसने कहा- "ले लो बहन जी , 100 रुपये में एक गमला है ।" श्रीमतीजी ने महिला सुलभ स्वभाव वश मोलभाव करते हुए एक गमला 60 रुपये में मांगा । "बहिन जी , नही पड़ेगा । हम बहुत दूर से सिर पर ढोकर ला रहे हैं , धूप भी तेज हो रही है । जितनी जल्दी ये गमले बिक जाते तो हम घर चले जाते । आदमी बीमार पड़ा है घर पर ,उसके लिए दवाई भी लेकर जाना है । ऐसा करो बहिनजी ये तीनों गमले 250 रुपये में रख लो ।" श्रीमती जी ने कहा --"3 गमले रखकर क्या...
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हिन्दी साहित्य- लघुकथा – कपूत / कुमाता ? – डॉ . प्रदीप शशांक 

डॉ . प्रदीप शशांक  कपूत / कुमाता ? (e-abhivyakti में डॉ प्रदीप शशांक जी का स्वागत है।) उत्कर्ष की  अवांछनीय हरकतें दिन प्रतिदिन बढ़ती जा रही थीं । गलत दोस्तों की संगत में रहकर वह पूरी तरह बिगड़ चुका था । उत्कर्ष की हरकतों से वह बहुत परेशान रहती थी । वह उसे बहुत समझाने की कोशिश करती किन्तु उत्कर्ष के कानों में जूं तक  न रेंगती । उत्कर्ष के पिता की  मृत्यु के पश्चात उसने यह सोचकर अपने आप को संभाला था कि अब उसका 24 वर्षीय पुत्र ही उसके बुढ़ापे का सहारा बनेगा , किन्तु वह सहारा बनने की जगह उसके शेष जीवन में दुखों का पहाड़ खड़ा करता जा रहा था । जुआ ,सट्टा एवं शराब की बढ़ती लत के कारण आये दिन घर पर उधार वसूलने आने वालों से वह बेहद परेशान हो गई थी । आखिर उसने उत्कर्ष के व्यवहार से परेशान होकर अपने ह्रदय को कड़ा करते हुए  एक कठोर निर्णय लिया । कुछ दिन बाद समाचार पत्रों में आम...
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हिन्दी साहित्य- लघुकथा – भविष्य से खिलवाड़ – सुश्री ऋतु गुप्ता

सुश्री ऋतु गुप्ता भविष्य से खिलवाड़ (प्रस्तुत है सुश्री ऋतु गुप्ता जी की  एक विचारणीय लघुकथा। आपके लेख ,कहानी व कविताएँ विभिन्न समाचार पत्रों व पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहे हैं।दैनिक ट्रिब्यून में जनसंसद में आपको लेख लिखने के लिए कई बार प्रथम पुरस्कार मिला है। आपका एक काव्य संग्रह ‘आईना’ प्रकाशित हो चुका है। ) टॉल टैक्स पर जैसे ही ट्रेफिक रूका अनगिनत बच्चे कोई  टिश्यू पेपरस,कोई गाड़ी विंडोज के लिए ब्लेक जालियां, कुछ गुलाब के फूल बेचने वाले आ खड़े हुए ,उनमें कुछ बच्चे ऐसे ही भीख मांग रहे थे ;लेकिन इक बच्चा ऐसा भी था जो मिट्टी के तवे बेच रहा था। चुपचाप हर गाड़ी के पास जाकर तवे लेकर चुपचाप खड़े हो जाता। कुछ लोग उन सबको भगा रहे थे।कछ भाव ही नहीं दे रहे थे। ज्यादातर बच्चे जिद करके समान बेचने की कोशिश कर रहे थे। भीख मांगने वाले बच्चों ने तो परेशान करके रख दिया था।लेकिन तवा बेचने वाला बच्चा चुपचाप हर गाड़ी के पास एक क्षण तवा खरीदने को कहता ,नहीं...
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हिन्दी साहित्य- लघुकथा – कार की वधू-परीक्षा – श्री सदानंद आंबेकर

श्री सदानंद आंबेकर  कार की वधू-परीक्षा इस वर्ष  दीपावली के अवसर पर घर के द्वार पर कार खड़ी होगी, जिससे मेरी शान बढ़ेगी, इसलिये अब कार लेना ही होगी, ऐसा संकल्प हमारे मित्र रामबाबू ने कर ही लिया। उनकी इस प्रतिज्ञा में ऐसी ध्वनि सुनाई दी मानो वे कह रहे हों- 'बस, इस सहालग में घर में बहू लानी ही है'। रामबाबू और हम तीन मित्र, दीपावली पूर्व के उजास से चमचमाते बाजार में एक कार के शोरूम  में प्रवेश  कर गये। द्वार पर ही एक  षोडशी ने चमकते दांत दिखा कर हमारा स्वागत किया जिसे देखकर मुझे लगा कि अब तो कार खरीद कर ही जाना पड़ेगा। शोरूम के अन्दर का वातावरण एकदम स्वयंवर जैसा दिख रहा था जहां एक वधू का वरण करने कई-कई राजा उपस्थित थे। देखकर भ्रम होता था मानो भारत से गरीबी हट गई है। हम एक ओर खड़े होकर यहां-वहां देख ही रहे थे कि अचानक एक और मेकअप-रंजित बाला हमारे सामने प्रकट हुई और पूछा- कौन सा मॉडेल...
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हिन्दी साहित्य- लघुकथा – अनूठी बोहनी – डॉ सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’

डॉ  सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ अनूठी बोहनी -----   साँझ होने को आई किन्तु आज एक पैसे की बोहनी तक नहीं हुई। बांस एवं उसकी खपच्चियों से बने फर्मे के टंग्गन में गुब्बारे, बांसुरियाँ, और फिरकी, चश्मे आदि करीने से टाँग कर रामदीन रोज सबेरे घर से निकल पड़ता है। गली, बाजार, चौराहे व घरों के सामने कभी बाँसुरी बजाते, कभी फिरकी घुमाते और कभी फुग्गों को हथेली से रगड़ कर आवाज निकालते ग्राहकों/ बच्चों का ध्यान अपनी ऒर आकर्षित करता है रामदीन । बच्चों के साथ छुट्टे पैसों की समस्या के हल के लिए वह अपनी  बाईं जेब में घर से निकलते समय ही कुछ चिल्लर रख लेता है। दाहिनी जेब आज की बिक्री के पैसों के लिए होती खिन्न मन से रामदीन अँधेरा होने से पहले घर लौटते हुए रास्ते में एक पुलिया पर कुछ देर थकान मिटाने के लिए बैठकर बीड़ी पीने लगा। उसी समय सिर पर एक तसले में कुछ जलाऊ उपले और लकड़ी के टुकड़े रखे मजदुर सी दिखने वाली एक महिला एक...
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हिन्दी साहित्य- कहानी – आखिरी इम्तिहान – सुश्री मालती मिश्रा

सुश्री मालती मिश्रा             आखिरी इम्तिहान आज आखिरी पेपर है सुधि की खुशी का कोई ठिकाना न था, वह जल्दी-जल्दी विद्यालय की ओर कदम बढ़ा रही थी। बस भगवान मेरे बाकी सभी विषयों की तरह आज का पेपर भी अच्छा हो जाए तो मैं इस नरक से मुक्ति पा जाऊँगी, मैं फिर कभी इधर पलट कर भी नहीं देखूँगी, सोचती हुई सुधि तेज-तेज कदमों से चली जा रही थी उसे इतना भी ध्यान न रहा कि वह अपनी सबसे प्यारी सहेली रागिनी को उसके कमरे के पीछे की खिड़की से आवाज देना भी भूल गई और उसका कमरा पार करते हुए घर के आगे की ओर आकर भी बेसुध सी पगडंडी पर बढ़ती जा रही थी तभी पीछे से भागती हुई रागिनी ने आकर उसका हाथ पकड़ लिया..."बहरी हो गई है क्या? कब से पीछे से आवाज दिए जा रही हूँ पर सुनती ही नहीं, और आज बुलाया भी नहीं, वो तो अच्छा हुआ कि मामी ने देख लिया और मुझे बता दिया...
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हिन्दी साहित्य- लघुकथा – संवादहीन भ्रम….. – डॉ सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’

डॉ  सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ संवादहीन भ्रम..... हृदय की बायपास सर्जरी करवा कर रामदीन कुछ दिन भोपाल में विश्राम के बाद बहु-बेटे के साथ आ गया। ऑपरेशन के बाद सारे परिचित , शुभचिंतक वहां घर पर मिलने आते रहे। इन सब के बीच  कालोनी में ही रहने वाले अपने अंतरंग मित्र शेखर की अनुपस्थिति रह-रह कर कचोटती रही। अपने मित्रों की सूची में जब भी शेखर की बात आती, रामदीन विषाद व रोष से भर जाता। एक वर्ष बीतने को आया किन्तु इस अवधि में न तो शेखर की ओर से  और न, ही रामदीन की ओर से परस्पर एक दूसरे से सम्पर्क कर वस्तुस्थिति जानने का प्रयास हुआ। इतने अनन्य मित्र की इस बेरुखी से स्वाभाविक ही शेखर के प्रति रामदीन के मन में खीझ भरी इर्ष्या ने घर कर लिया था। समय बेसमय जब भी मित्र की याद आते ही मुंह कसैला सा होने लगता था। वर्षोपरान्त रामदीन का पुनः मेडिकल चेकअप के लिए भोपाल जाना हुआ। वहां अस्पताल में अनायास ही शेखर से सामना...
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हिन्दी साहित्य- कहानी – इंतजार का सिलसिला – सुश्री मालती मिश्रा 

सुश्री मालती मिश्रा             इंतजार का सिलसिला..... (यह कहानी सुश्री मालती मिश्रा जी के कथा-संग्रह  'इंतजार ' की शीर्ष कहानियों में से एक है। हमने कल इस पुस्तक की समीक्षा प्रकाशित की थी। हमें पूर्ण विश्वास है आपको निश्चित ही यह कहानी पसंद आएगी। ग्रामीण परिवेश , प्रतीक्षारत पिता, असहाय दिवंगत पुत्र की भावनाएं एवं दिवंगत पुत्र के मित्र की भावनाओं का अत्यंत सजीव चित्रण इस कहानी की विशेषता है। ) दोपहर की चिलचिलाती धूप मानों शरीर के भीतर के खून को भी उबाल रही थी, ऐसी तपती दुपहरी में रामधनी काका न जाने कहाँ से लाठी टेकते हुए चले आ रहे थे.....कमर इतनी झुकी हुई कि लाठी के सहारे अर्धवृत्ताकार आकार बन गए थे, काया इतनी शुष्क कि ऐसा प्रतीत हो रहा था कि हड्डियों के ढाँचे के ऊपर एक पतली सी खाल चढ़ा दी गई हो लाठी पकड़े हुए चलते हुए शरीर इस प्रकार काँप उठता कि मानों अभी लड़खड़ा कर गिर पड़ेंगे, फिर भी इस दुपहरी में वो न जाने किस...
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हिन्दी साहित्य- लघुकथा – दिखावटी मजबूरी  – श्री कुलदीप सांखला

श्री कुलदीप सांखला दिखावटी मजबूरी  क्लास खत्म होते ही सीढ़ियों से जैसे ही नीचे उतरा तो देखा कि बारिश बहुत तेज है। क्लास के अंदर पता ही नहीं चला कि कब बारिश शुरू हो गयी और वैसे भी चंडीगढ़ में बारिश कब शुरू हो जाये पता ही नहीं चलता, खासकर अगस्त सितम्बर के महीनों में। खैर बारिश को देख कर सुखद अहसास होता है। एक पल में जैसे बचपन की बारिश की यादें ताजा हो जाती हैं। वो दोस्तों के साथ गलियों में भाग कर निकलना, बहते पानी में कागज की कश्तियों की दौड़ लगाना, ठहरे पानी मे गोते लगाना, जिद्द करके पकौड़े बनवाना। सच में तब इंतज़ार था कि बारिश कब आये। वो सब यादें कि जैसे खड़े खड़े ताजा हो रहीं थीं और बारिश बढ़ती ही जा रही थी। आज बारिश को देख कर खुशी नहीं हो रही थी। रात के 8:30 बज रहे थे और घर जाने की भी जल्दी थी। अब तो जैसे कि नाराजगी सी थी इस...
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