हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ८३० ⇒ तत्व प्रेम ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “तत्व प्रेम।)

?अभी अभी # ८३० ⇒ आलेख – तत्व प्रेम ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

मरहूम किशोर कुमार गांगुली अपनी फिल्म हम सब उस्ताद हैं, में, कह गए हैं, प्यार बांटते चलो ! अब प्यार कोई सुबह का अखबार तो है नहीं, कि घर घर बांटते चलो। ना ही प्रेम कोई रेवड़ी है, जो आंख मूंदकर अपने अपनों में निपटा दी जाए।

एक गीत में रफी साहब शर्तिया प्यार सिखाने की बात करते हैं !

आओ तुम्हें मैं प्यार सिखा दूँ !

गोया प्यार नहीं, कार चलाना सिखा रहे हों। और सीखने वाली भी झट से हां कर देती है, सिखला दो ना। काश, वाकई ऐसा हो जाता, तो जगह जगह इश्तहार पढ़ने को मिलते, 30 दिनों में प्यार करना सीखिए। प्यार का भी लाइसेंस होता, पहले लर्निंग, बाद में परमानेंट। शायद सगाई लर्निंग और शादी पक्का लाइसेंस ही हो।।

कितना अच्छा हो, लोग प्यार में पी एच डी करें। संत महात्मा प्यार में डॉक्टरेट बांटें। प्यार का भी परीक्षा में एक प्रश्न-पत्र हो। प्यार कितने प्रकार के होते हैं ? प्यार के बुखार का कैसे इलाज किया जाता है। और एक अनिवार्य प्रश्न 20 अंक का प्रेम-पत्र। फिर कहाँ नफ़रत, द्वेष, ईर्ष्या के लिए जगह। लोग दुश्मनी ही भूल जाएँ।

प्रेम कहीं सिखाया नहीं जाता, प्रेम की कोई पाठशाला नहीं, कोई विश्वविद्यलय नहीं, फिर भी पशु-पक्षी तक प्रेम करना जानते हैं।

इंसानों में कितना प्रेम व्याप्त है, आप नहीं समझ सकते। कोई किताबों से प्रेम कर रहा है, तो कोई लिखने से। किसी को कविता से प्रेम है तो किसी को शायरी से। लोगों में प्रकृति प्रेमी भी हैं, और पशु-प्रेमी भी। अब गुटका और चाय से प्रेम की बात पर सुबह-सुबह मेरा मुँह मत खुलवाएं।।

आइए, आज हम भी प्रेम की बातें करें ! एक होता है व्यावहारिक प्रेम, जिससे हम whatsapp और फेसबुक वालों से रोज वास्ता पड़ता है। नमस्ते, सुप्रभात, वाला अभिवादन। दफ्तर में, स्कूल कॉलेज में, गुड मॉर्निंग का रिवाज़ है। आप चाहें तो इसे औपचारिक प्रेम भी कह सकते हैं।

परिवारों में भी प्रेम होता है ! मां बेटे का, भाई बहन का, दोस्तों का, प्रेमी-प्रेमिकाओं का, रिश्तेदारों का, और above all पति पत्नी का। यह सब भावनात्मक प्रेम है। आप इसे दिल का मामला भी कह सकते हैं। इसमें दिक्कत यह है कि

” अब जी के क्या करेंगे,

जब दिल ही टूट गया। “

प्रेम गाय से भी हो सकता है और अपने पालतू कुत्ते से भी। वसुधैव कुटुंबकम् कहने वाले अपने विरोधियों और दुश्मनों को इस प्रेम के दायरे में नहीं आने देते।।

एक प्रेम स्थूल नहीं, सूक्ष्म होता है, यह दिल का मामला नहीं, मन के अधिकार क्षेत्र का मामला है। मीरा और कृष्ण का प्रेम सांसारिक नहीं, स्थूल नहीं, तात्विक प्रेम था। जिस रास का जिक्र होता है, वहां स्थूल सूक्ष्म में समा जाता है। कृष्ण भक्त राधे राधे का जाप करते हैं, और राम भक्त सीताराम सीताराम का।

ईश्वर तत्व, गुरु तत्व और प्रेम तत्व एक ही हैं, इन्हें आप अलग नहीं कर सकते। जिस प्रेम की कोई परिभाषा नहीं होती, वही तत्व प्रेम है। ज़र्रे ज़र्रे में बस रहा है वो, जैसे मुरली में तान होती है। चैतन्य महाप्रभु को वह तत्व प्रेम सारे जगत में व्याप्त दिखता था। नारद भक्ति सूत्र इसी तत्व प्रेम की बात करता है।।

प्रेम गली अति सांकरी ! विराट प्रेम के लिए गोकुल और वृंदावन की गलियों में भटकना क्या ज़रूरी है। जो लोग नर्मदा की परिक्रमा करते हैं, वे शायद भक्ति और तत्व प्रेम के अधिक करीब हों, क्योंकि वे प्रकृति के साथ हैं, बहती नदी की तरह उनका प्रेम कहीं ठहरता नहीं, बहता रहता है। जो जहां है, चाहे तो वहीं, उसी स्थान पर इस तत्व प्रेम के सरोवर में स्नान कर सकता है। धारा सतगुरु, लेत नहाय क्यों न।।

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ८२९ ⇒ ॥ चपरासी ॥ ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “॥ चपरासी ॥।)

?अभी अभी # ८२९ ⇒ आलेख – ॥ चपरासी ॥ ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

जो कभी अंग्रेजों का अर्दली था, वह आज हमारा चपरासी बन गया। अर्दली चाहे तो कह सकता है, साला मैं तो peon प्यून बन गया। अंग्रेजों के जमाने में, साहब के दफ्तर आने के पहले हर चीज व्यवस्थित हो जाए, यह काम एक अर्दली का होता था। आप अर्दली को अंग्रेजी शब्द orderly ऑर्डरली का अपभ्रंश भी कह सकते हैं, क्योंकि orderly शब्द का अर्थ ही व्यवस्थित होता है। जो चीज़ों को व्यवस्थित रखे, वह ऑर्डरली अर्थात् अर्दली। हमारे भाषाविदों को चपरासी शब्द में भी बू आने लगी और उन्होंने राजभाषा अधिकारियों के कहने पर उसे भृत्य बना दिया। शब्दों को नृत्य करवाने से कुछ हासिल नहीं होता। चपरासी, चपरासी ही रहता है, भृत्य कहने से कृतकृत्य नहीं हो जाता।

रूतबे में चपरासी चौकीदार से कम होता है लेकिन वह किसका चपरासी है, यह उस पर निर्भर करता है। वैसे एक चपरासी और चौकीदार की कभी आपस में तुलना नहीं की जा सकती ठीक उसी तरह जैसे एक राजा और एक विद्वान की। विद्वत्वं च नृपत्वं, च नैव तुल्यं कदाचन !

लेकिन क्यों। इसलिए, क्योंकि एक चपरासी और चौकीदार में रात दिन का अंतर है। चौकीदार रात भर डंडा और सीटी बजाता है, जब कि एक चपरासी सिर्फ सुबह १० से ५ साहब का हुक्म बजाता है।।

अगर अधिकार और रुतबे की बात करें, तो चौकीदार एक चपरासी पर भारी पड़ता है। जिम्मेदारी और जवाबदारी में भी चौकीदार, चपरासी पर भारी। अधिकार भी चौकीदार के अधिक। चौकीदार एक तरह का वॉच डॉग है। अगर गोरखा हुआ, तो शाब जी, ईमानदारी की जीती जागती मूरत। आजकल यह काम सिक्योरिटी एजेंसीज करने लगी है जिससे आर्मी के एक्स – सर्विसमेन भी आसानी से उपलब्ध हो जाते हैं। एक स्वयंभू चौकीदार के भरोसे इस देश के १३० करोड़ वासी आज भी चैन की नींद सो रहे हैं।

चपरासी अधिकतर शासकीय होता है। सरकारी दफ्तर और शासकीय अथवा प्राइवेट स्कूल और कॉलेज बिना चपरासी के नहीं चल सकते। स्कूल और कॉलेज का चपरासी क्लास के पीरियड और छुट्टी की सूचना अगर घंटी बजाकर दिया करता है तो एक चपरासी को साहब की घंटी सुनकर साहब के ऑफिस में प्रवेश करना पड़ता है।।

चौकीदार सलाम बजाता है जब कि सरकारी चपरासी को लोग सलाम बजाते हैं। साहब तो आते जाते रहते हैं, पक्की नौकरी तो चपरासी ही करता है। कुछ चपरासी तो साहब के इतने मुंह लगे होते हैं कि जब साहब लदते है तो चपरासी भी दहेज की तरह साथ जाता है। यह रिश्ता नमक के रिश्ते से ज़्यादा मज़बूत होता है।

साहब का मिज़ाज, कमजोरी, खासियत, मूड और पसंद नापसंद की पूरी जानकारी एक चपरासी को रहती है। साहब की अटैची का वज़न तक चपरासी उठाता है। कहीं कहीं तो ऐसा लगता है, दफ्तर का सारा बोझ ही चपरासी पर है। जिस रोज चपरासी छुट्टी पर रहता है, साहब का मूड भी ऑफ रहता है।।

अष्ट छाप के कवि भक्त सूरदास काग के भाग की सराहना करते हैं, जो उनके इष्ट हरि अर्थात बाल गोपाल श्रीकृष्ण के हाथ से माखन रोटी छीनकर ले जाता है। लेकिन एक साहब के चपरासी का भाग्य देखिए, वह कुछ छीनता नहीं, उसे सब कुछ अपने भाग्य और साहब के पुरुषार्थ से मिलता जाता है। मंदिर के भगवान से अगर मिलना है तो दान दक्षिणा का अधिकार पुजारी का होता है। साहब तक सीधा तो भगवान भी नहीं पहुंच पाता। पहले चपरासी से अपोइंटमेंट लेना पड़ता है। चपरासी, अपने भाग्य को सराहता है ! मेरा साहब की कृपा से, सब काम हो रहा है।

साहब और चपरासी का साथ सुख और दुख दोनों का होता है। जब साहब के यहां छापा पड़ता है तो चपरासी की भी बांंयी आंख फड़कने लगती है। साले सालियों के साथ बेचारे चपरासी के नाम भी दो चार मकान निकल आते हैं। वह बेचारा दार्शनिक अंदाज में, इतना ही कह पाता है, क्या करें साहब, गेहूं के साथ कभी कभी घुन भी पिस ही जाता है।।

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ८२८ ⇒ खूंटी और ताक ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “खूंटी और ताक।)

?अभी अभी # ८२८ ⇒ आलेख – खूंटी और ताक ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

एक समय था, जब हर चीज के लिए एक स्थान नियत होता था, और आदमी रात को निश्चिंत हो, चैन की नींद सोता था। लोग क्या कहते हैं, उसकी उसे कोई परवाह नहीं होती थी, कई बार तो वह फिक्र को खूंटी पर टांग और अक्ल को ताक में रखकर आराम से घोड़े बेचकर सो जाता था। सुबह जब उठता तो कहता, अभी दो मिनिट में आया। फिक्र को खूंटी से उठाया, और अक्ल को वापस भेजे में पहुंचाया। कितनी सहज, सरल और पारदर्शी सुरक्षित अभिरक्षा (सेफ कस्टडी )।

जितनी सुविधा, उतनी सुरक्षा !

तब कहां सीमेंट कांक्रीट और लोहे के मकान होते थे। अक्ल की तरह दीवारें भी गारे मिट्टी की और मोटी होती थी। एक घर में कई घर होते थे। बड़े घरों में तो रसोईघर, भंडार घर, पूजा घर, स्नानागार, और शौचालय भी होते थे। महिलाओं के लिए अगर कोठरी होती थी तो पुरुषों के लिए बैठक भी होती थी। घरों में महंगे पर्दों में पैसा बर्बाद करने के बजाय महिलाएं ही परदा कर लिया करती थी।।

मोटी मोटी दीवारों में आराम से लकड़ी की खूंटियां भी ठुक जाती थी, और गोदरेज की स्टील की अलमारी की जगह दीवारों में ही बड़ी छोटी ताक बनवाई जाती थी। छोटी ताक को आला कहते थे, जहां कभी जलता हुआ दीया अथवा गोरी की कान का बाला भी रख दिया जाता था। घरों में सिर्फ दीया बाती, और चिमनी लालटेन का ही प्रकाश होता था। दिमाग की बत्ती का तो पता नहीं, लेकिन हां तब घरों में बिजली के बल्बों का प्रवेश नहीं हुआ था और ऐसी ही परिस्थिति में शायर ऐसे गीत लिखने को मजबूर हो जाता था ;

ढूँढो, ढूँढो रे साजना

मोरे कान का बाला।

ताक और अलमारी और खूंटी और खूंटे में थोड़ा फर्क होता है। ताक और अलमारी तो घर के अंदर होती है लेकिन जहां खूंटी का दायरा कोठरी और बैठक तक ही सीमित होता है, खूंटा तो चौगान से लेकर मैदान तक कहीं भी गाड़ दिया जाता है। कुछ बुजुर्ग तो चौगान में ही खटिया पर खूंटा डालकर ही पड़े रहते थे,

जो आया, उसकी खाट खड़ी की। घरों में उनकी खांसी ही वॉच डॉग का काम करती थी। आनंद बख्शी के गीत का जिक्र, ना बाबा ना। हम बुजुर्गों का सम्मान करते हैं।।

बाबू जी का कुर्ता हो, टोपी हो, छड़ी हो अथवा छाता, बच्चे का बस्ता हो या कमीज, सबकी जगह खूंटी ही तो होती थी। दीवारों में इनबिल्ट फर्शी की अलमारी के खाने हमें अलॉट किए जाते थे। पूरी पारदर्शी व्यवस्था थी, इसलिए खुल जा सिम सिम जैसा कुछ था ही नहीं। वही हमारा वॉर्डरोब और वही बुक शेल्फ।

आज चार इंच की दीवार में एक कील नहीं ठुकती, उसे भी ड्रिल करना पड़ता है। ताक और अलमारी की जगह वार्डरोब ने ले ली है। नये नये हैंगर्स और हुक्स आ गए हैं, घर बड़ा साफ सुथरा और सजाधजा रहने लगा है। बुजुर्गो के भी बेडरूम होने लग गए हैं, और वे भी कमोड के मोड पर चले गए हैं। ताक और खूंटी एंटीक हो गए हैं।।

आज घरों में भंडार घर नहीं, गेहूं की कोठियां नहीं, लेकिन हां महंगे सोफे, कालीन, वॉल पेंटिंग्स जरूर हैं। घरों में चटाई भले ही नहीं हो, डाइनिंग टेबल और डबल बेड, प्राथमिक आवश्यकता है। कौन आजकल रसोई में पटे पर बैठकर भोजन करने से पहले अपना कुर्ता खूंटी पर टांगता है और रात को ताक में रखा अपना चश्मा तलाशता है। ए .सी. और रिमोट के जमाने में भी कहीं कोई हाथ से पंखा झलता है ..!!

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # १५२ – देश-परदेश – हमारे ट्रेन यात्रा के सहायक: कुली ☆ श्री राकेश कुमार ☆

श्री राकेश कुमार

(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ  की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” ज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)

☆ आलेख # १५२ ☆ देश-परदेश – हमारे ट्रेन यात्रा के सहायक: कुली ☆ श्री राकेश कुमार ☆

हम सब ने ट्रेन यात्रा के समय कुली की सहायता अवश्य ली हैं। लाल रंग की कमीज पहने कुली-कुली की आवाज आज भी याद हैं। इन के पास पीतल का एक “बिल्ला”(बैच) जिस पर नंबर अंकित रहता था। हमारे पिताश्री कुली पर सामान रखने से पूर्व उसका बिल्ला नंबर अवश्य पूछते थे।

रेलवे समय समय पर इनकी दरें निर्धारित करती हैं, जोकि बहुत कम रहती हैं। इसलिए जब भी कुली की सेवाएं प्राप्त की जाती हैं, तो पहले सौदा तय किया जाता हैं। कुली भी मौके पर चौका लगाने से नहीं चूकते हैं। गर्मी का सीज़न हो या वृद्धजनों से अधिक राशि की मांग करते ही हैं।

कुली की सेवाओं की कमर तोड़ने में विगत पांच दशकों में यात्रा के समय उपयोग किए जाने वाले सूटकेस द्वारा ही हुई हैं। भारी भरकम लोहे के ट्रंक के स्थान पर पहले चमड़े के सूटकेस का चलन आरंभ हुआ था। जिस प्रकार से चमड़े के सिक्के बहुत कम समय तक ही मुद्रा बाज़ार में टिक पाए थे, उसी प्रकार से यात्रा में चलने वाले सूटकेस को प्लास्टिक, कपड़े जैसे मैटेरियल के बने सूटकेस अधिक उपयोगी साबित हुए।

डिजाइन विज्ञान ने यात्रा को सुविधा जनक बनानें में महत्वपूर्ण योगदान दिया। सूटकेस के पैरों के नीचे आठ आठ पहिए लगा कर स्टेशन पर घसीटना सुविधाजनक बना दिया।

कुली भी अपनी सेवाएं सीट पर कब्जा दिलवाने में लग गए हैं। मेहनत भी कम और कमाई भी ज्यादा होती हैं। हालांकि ये काम गैरकानूनी है, कानून की जब बड़े बड़े लोग परवाह नहीं करते तो फिर कुली क्यों करते ?

कंप्यूटर सुविधा से रेल यात्रा के समय स्थान उपलब्धता में पारदर्शिता बढ़ जाने से कुलियों के लिए अब ये कार्य भी नहीं बचा था।

इन परिस्थितियों में अब कुली का कार्य करने वालों की प्रजाति भी विलुप्तता की कगार पर पहुंच चुकी हैं। सदी के महानायक अभिताभ बच्चन ने वर्षों पूर्व कुली जैसे विषय पर फिल्म बना कर बहुत शौहरत हासिल प्राप्त की थी। हमने भी इसी बात को मद्दे नज़र रखते हुए आज कुली पर अपनी ये रचना समर्पित की हैं।

© श्री राकेश कुमार

संपर्क – B 508 शिवज्ञान एनक्लेव, निर्माण नगर AB ब्लॉक, जयपुर-302 019 (राजस्थान)

मोबाईल 9920832096

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ८२७ ⇒ मटर के दाने ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “मटर के दाने ।)

?अभी अभी # ८२७ ⇒ आलेख – मटर के दाने ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

~~ PEAS ~~

पौष माह के शुरू होते ही सर्दियां शुरू हो जाती हैं, और ठंड बजने लगती है। जमकर भूख लगती है और बाज़ार में फल फ्रूट और सब्जी भाजी की बहार आ जाती है। स्वदेशी और ऑर्गेनिक क्या बला है, हम नहीं जानते, बस कहीं देसी टमाटर और हरे भरे मटर नज़र आ जाएं, तो हमारी नजर से बच नहीं पाएँ। मटर हमारी कमज़ोरी है और बटले की कचौरी इंदौर वालों की खासियत।

हम मटर को स्थानीय भाषा में बटला भी बोलते हैं लेकिन अंग्रेजी जैसा मामला यहां नहीं, जहां pea के आगे अगर nut लगा दो, तो मटर मूंगफली बन जाए। सभी दालें हम बीनकर खाते हैं, लेकिन हमने कभी ना तो beans ही खाई और ना ही इसके बारे में ज्यादा छानबीन की।।

मेरी ड्यूटी कभी जनगणना कार्य में नहीं लगी और मेरा गणित भी कोई खास नहीं है, लेकिन मुझे मटर के दानों को छीलने और उन्हें गिनने का विशेष शौक है।

यह दायित्व मुझे सौंपा नहीं जाता, लेकिन मैं स्वतः ही इसका संज्ञान लेता हूं और यह मेरी एक स्वांतः सुखाय गतिविधि है, जिसमें सिर्फ एक से दस तक की ही गिनती काफी है क्योंकि एक मटर के दस से अधिक दाने होते ही नहीं।

मैं एक साबुत मटर की फली उठाता हूं, मन ही मन एक पारखी की तरह उसे नाप तौलकर अंदाज़ लगाता हूं, इसमें कितने दाने होंगे। यह संख्या तीन से तेरह, कोई सी भी हो सकती है। अगर मेरा अंदाज सही निकल गया तो फुल मार्क्स, वर्ना अगले मटर की बारी। एक हरे मटर में औसत पांच से आठ दाने तो निकल ही आते हैं। उनकी सेहत देखकर उनके परिवार की संख्या का आसानी से अंदाज लगाया जा सकता है। यहां एक छोटा परिवार, दुखी परिवार माना जाता है। एक स्वस्थ खाते पीते मटर के परिवार में आठ से दस दाने बड़ी आसानी से निकल आते हैं। कुछ परिवार हम दो, हमारे दो वाले भी होते हैं, तो कुछ में सिर्फ हवा भरी होती है। उन्हें पोचा मटर कहा जाता है।।

ओस और पाला पड़ने पर मटर के परिवार पर भी गाज गिरने लगती है। मटर में इल्लियाँ प्रवेश कर जाती हैं। अच्छा भला मटर का परिवार तहस नहस हो जाता है। किसी मटर के छीलने पर जैसे ही कोई इल्ली दिखाई देती है, उस मटर को बेरहमी से, सपरिवार, गीले कचरे के हवाले कर दिया जाता है।

मटर छीलना सबसे आसान काम है, लेकिन यह दायित्व परिवार के बच्चों को कभी नहीं दिया जाता। होता यह है कि छीलते छीलते मटर के दाने तो बच्चों द्वारा उदरस्थ हो जाते हैं और छिलके धन्यवाद सहित वापस सौंप दिए जाते हैं।।

इसी कारण जहां जिम्मेदार लोगों द्वारा मटर छीले जाते हैं, उनके आसपास अक्सर बच्चे मटरगश्ती करते पाये जाते हैं। मटर के आसपास गश्त करते हुए, उनकी चौकन्नी निगाहें एक बाज की तरह, मटर के दानों पर पड़ती है, और एक मुट्ठी में दाने भरकर, यह जा, वह जा। जाने दो, बच्चे हैं, कहीं से आवाज आती है। फिर भी हिदायत का डोज तो मिल ही जाता है, कम खाओ, ज्यादा कच्चे मटर हजम नहीं होते। अरे कुछ नहीं होता, इस उम्र में पत्थर कंकर सब हजम हो जाता है, हमने भी बहुत खाए हैं अपने जमाने में, एक अनुभवी आवाज पुनः फरमाती है।

आलू, टमाटर और मटर अपने आप में सब्जी तो हैं ही, सभी सब्जियों के साथ इनका गठजोड़ भी बेजोड़ है। पोहे से लेकर मटर पनीर तक, मटर का ही साम्राज्य है। आलू टमाटर भी आपको सभी सब्जियों के आसपास मटकते देखे जा सकते हैं। लालू भले ही राजनीति से गायब हो गए हों, समोसे में मटर के साथ आज भी आलू ससम्मान विराजमान है।।

जिस आदमी को रोटी, कपड़ा और मकान आसानी से उपलब्ध है, उसे इस मौसम में आलू, टमाटर और मटर भी सस्ते दामों पर उपलब्ध हों। आपके घरों में कभी आलू मैथी की सब्जी बने तो कभी मैथी, मटर मलाई। महंगाई से थोड़ी राहत हो, इसमें सभी की भलाई। आपके हर मटर में भरपूर दाने हों, क्योंकि दाने दाने पर खाने वाले का नाम जो लिखा रहता है।

वनस्पति विज्ञान भले ही मटर और मूंगफली को एक ही तराजू में तौले, मटर को तरकारी नहीं, एक फल साबित करने की कोशिश करे, हमारा पुलाव बिना मटर के नहीं बनेगा और आलू और मूंगफली बिना साबुदाने की खिचड़ी नहीं।।

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संजय उवाच # ३१० – पड़ाव के बाद का मौन ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के  लेखक  श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है। साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ  हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको  पाठकों का  आशातीत  प्रतिसाद मिला है।”

हम  प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है  इस शृंखला की अगली कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों  के माध्यम से  हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)

☆  संजय उवाच # ३१० ☆ पड़ाव के बाद का मौन… ?

एक परिचित के घर बैठा हूँ। उनकी नन्ही पोती रो रही है। उसे भूख लगी है, पेटदर्द है, घर से बाहर जाना चाहती है या कुछ और कहना चाह रही है, इसे समझने के प्रयास चल रहे हैं।

अद्भुत है मनुष्य का जीवन। गर्भ से निकलते ही रोना सीख जाता है। बोलना, डेढ़ से दो वर्ष में आरंभ होता है। शब्द से परिचित होने और तुतलाने से आरंभ कर सही उच्चारण तक पहुँचने में कई बार जीवन ही कम पड़ जाता है।

महत्वपूर्ण है अवस्था का चक्र, महत्वपूर्ण है अवस्था का मौन..। मौन से संकेत, संकेतों से कुछ शब्द, शब्दों के माध्यम से भाषा से परिचित होते जाना और आगे की यात्रा।

मौन से आरंभ जीवन, मौन की पूर्णाहुति तक पहुँचता है। नवजात की भाँति ही बुज़ुर्ग भी मौन रहना अधिक पसंद करता है। दिखने में दोनों समान पर दर्शन में जमीन-आसमान।

शिशु अवस्था के मौन को समझने के लिए माता-पिता, दादी-दादा, नानी,-नाना, चाचा-चाची, मौसी, बुआ, मामा-मामी, तमाम रिश्तेदार, परिचित और अपरिचित भी प्रयास करते हैं। वृद्धावस्था के मौन को कोई समझना नहीं चाहता। कुछ थोड़ा-बहुत समझते भी हैं तो सुनी-अनसुनी कर देते हैं।

एक तार्किक पक्ष यह भी है कि जो मौन, एक निश्चित पड़ाव के बाद जीवन के अनुभव से उपजा है, उसे सुनने के लिए लगभग उतने ही पड़ाव तय करने पड़ते हैं। क्या अच्छा हो कि अपने-अपने सामर्थ्य में उस मौन को सुनने का प्रयास समाज का हर घटक करने लगे। यदि ऐसा हो सका तो ख़ासतौर पर बुज़ुर्गों के जीवन में आनंद का उजियारा फैल सकेगा।

इस संभावित उजियारे की एक किरण आपके हाथ में है। इस रश्मि के आलोक में चलिए आज सुनें और पढ़ें किसी बुज़ुर्ग का मौन।

© संजय भारद्वाज 

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ 6 नवम्बर से मार्गशीर्ष साधना आरम्भ होगी। इसका साधना मंत्र होगा – ॐ नमो भगवते वासुदेवाय 🕉️ 

🕉️ इसके साथ ही हम श्रीमद्भगवद्गीता का पारायण करेंगे। इसमें 700 श्लोक हैं। औसत 24 श्लोक या उनके अर्थ का यदि दैनिक रूप से पाठ करेंगे 💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं।

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रेयस साहित्य # ३० – आलेख ☆ ~ सतुआ पिसान के लबरी, चलो लइकवो ददरी ~ ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆

श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्रेयस साहित्य # ३० ☆

☆ आलेख ☆ ~ सतुआ पिसान के लबरी, चलो लइकवो ददरी ~ ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆ 

(बलिया का ददरी मेला हमारी सांस्कृतिक विरासत)

विशाल गंगा का पाट, एक तरफ उत्तर प्रदेश, दूसरी तरफ बिहार। इस बीच रेत पर बसा हुआ एक नगर सिर्फ आज ही नहीं बल्कि सैकड़ो वर्ष पुराने अतीत को अपने दामन में सजोये, अपनी पुरानी पहचान के साथ जस का तस खड़ा है।

महर्षि भृगु के शिष्य दर-दर मुनि के नाम से लगने वाले प्रख्यात कार्तिक पूर्णिमा से प्रारम्भ होने वाला ददरी मेला भारत में ही नहीं बल्कि विश्व मैं भी अपनी पहचान कायब रखा है। हमारे धर्म संस्कृति में कार्तिक पूर्णिमा को पवित्र में नदी और सरोवर में स्नान करने का विधान है। इसी क्रम में एक ऐतिहासिक स्नान महर्षि भृगु की नगरी बलिया में गंगा स्नान करने का बड़ा महत्व है।

यदि हम आज से तीन दशक पीछे जाए तो हमारे गांव संवरा की सड़कों पर मेले के लिए पैदल जाती हुई भीड़, जिसके भीतर श्रद्धा और आस्था कूट-कूट कर भरी होती थी, लगातार पूरी रात चलती थी। लोग सड़क के किनारे खड़े होकर पूरी रात, टैक्सी, बस का इंतजार करते थे। सब की इच्छा या होती थी कि कब गंगा जी के तीर पहुचें और गंगा जी में पवित्र डुबकी गं लगावें।

मुझे याद है, एक बार भईया ( सबसे बड़े भाई साहब -स्व. डॉ शमशेर सिंह, ) मुझे कार्तिक पूर्णिमा ददरी स्नान के लिए गाँव सायकिल से ले गये। वे साइकिल चला रहे थे। पीछे की सीट पर एक बढ़िया सा कपड़ा बांध दिए और उस पर मुझे बैठा दिया। मैं दोनों हाथ पकड़ कर उनके पीछे बैठकर बलिया पहुंचा था। मेरे गांव से बलिया करीब 26 किलोमीटर दूर और बलिया से कम से कम 3-4 किलोमीटर गंगा की थी। हम रात के 10:00 बजे घर से चले थे और लगभग 1:30 के आसपास सामने स्नान कर लिये था। गंगा स्नान करने का क्रेज इतना जबरदस्त था कि लोग कहां-कहां से दूर-दूर से पैदल, गाड़ी से बैलगाड़ियों से ट्रेन से, बस से स्नान करने बलिया आते थे।

मैंने अपने शुरू के पंक्ति में लिखा है ‘सतुवा पिसान के लबरी’ इसका मतलब भी आता है कि लोग इस यात्रा पर निकलते थे तो अपने साथ बलिया का खास रेडीमेड व्यंजन सतुआ अवश्य ही ले आते थे। यानी यदि कोई 15 -20 -25 किलोमीटर पैदल यात्रा करके गंगा स्नान करने जा रहा है, तो वह रास्ते में रुककर सतुवा घोल कर या सुतुआ को सानकर कर खा लेता था।

इस प्रकार अपनी इस आस्था यात्रा को पूरा करते हुए गंगा जी में डुबकी लगाकर वापस लौटता था। वापस लौटने के पहले प्रत्येक दर्शनार्थी या स्नानार्थी की इच्छा यह होती थी कि वह भारतीय भृगु के जरूर दर्शन करें। तत् पश्चात् बालेश्वर बाबा के दर्शन करें।

ये वही महर्षि बाबा है जिनके शिष्य दर-दर ऋषि के नाम पर ददरी मेला लगता है। ददरी मेला भारत के बड़े मेलों में से एक है। ऐसे बड़े मेलों में एक मेला बिहार के सोनपुर में लगता है। जिसे लोग हरिहरनाथ का मेला कहते हैं। लोगों मानता है कि बलिया मेला जब समाप्त होता है तो हरिहर क्षेत्र का सोनपुर का मेला शुरू हो जाता है। ये ही सारी दुकान वहां जाकर शिफ्ट हो जाती थी। इस मेले की विशेषता यह थी कि इस मेले में बड़ी-बड़ी दुकानों के अलावा पशुओं का बाजार विशेष रूप से हाथी घोड़ा भी बिकते हैं। न जाने अब हाथी दिखाते हैं या नहीं नहीं मैं बता सकता। पहले लोग हाथी पालने के शौकीन होते थे जो रइस जाते या समृद्ध परिवार के लोग होते थे उन्हें हाथी पालने का शौक था। वे अपने दरवाजे पर हाथी रखते थे। हाथी को शुभ मानते थे। लक्ष्मी का स्वरूप मानते थे। हाथी को खरीदने से ज्यादा हाथी को पालने का महत्व होता था। हर किसी कूबत नहीं होती थी कि वह हाथी पाल सके क्योंकि हाथी ऐसा जानवर है जिसको भरपूर चारा चाहिए। उसका पूरा-पूरा देख-रेख होना चाहिए। उसके ड्राइवर यानी महावत का पूरा खर्च देना होता है। यानी एक ऐसा वाहन जिसका आउटपुट जीरो हो लेकिन उसमें लागत बड़ी तगड़ी हो।

शायद अबके जमाने में कोई ऐसा वाहन को नहीं खरीदना चाहेगा। मेरे बड़ी बुआ के घर हाथी हुआ करता था उसे हाथी के लिए अलग से दो चार बीघा गन्ने बोए जाते थे। वह हाथी कभी-कभार मेरे गांव भी आता था और एक दिन नहीं हफ्तों रुक जाता था अब तो उसे तक उसके चेहरे की सारी व्यवस्था हम सबको करनी पड़ती थी। लेकिन एक शोहरत तो थी ही कि हमारे बुआ के पास हाथी है।

इस समय ददरी मेले हाथी बिक रहा है या नहीं बिक रहा है लेकिन नहीं कह सकता।

मेले में का ऐतिहासिक सांस्कृतिक स्वरूप जिसे लोग बहुत याद करते हैं वह स्वयं में विशिष्ट हुआ करता था। इसमें सांस्कृतिक कार्यक्रम साहित्यिक गोष्ठीयाँ एवं कवि सम्मेलन आदि भी होते थे, आज भी होते हैं। अपने ईंटर के हिंदी पुस्तक में “भारतवर्षोन्नति कैसे हो “शीर्षक से एक लेख हुआ करता था। यह लेख भारतेंदु हरिश्चंद्र द्वारा 1884 में बलिया के ददरी मेले में दिए गये भाषण पर आधारित था। अब आप स्वयं समझ सकते हैं कि यह मेला कितना प्राचीन मेला रहा है। यदि आप बलिया के निवासी हैं तो आपको बलिया भृगुजी, ददरी मेला, रसड़ा की रामलीला, बलिया का महावीरी झंडा, बलिया बलिदान दिवस, आदि ऐतिहासिक तिथि एवं अवसरों का ज्ञान या जानकारी अवश्य होगी।

 फिर मैं ददरी मेंले की ओर लौटता हूं। इस ददरी मेले में जब महिलाएं गीत गाते हुए सड़कों पर निकलती थी तो हमारे पिताजी, उन महिलाओं का गया हुआ एक गीत गुनगुनाया करते थे, मैं उस गीत की कुछ पंक्तियों को आपके सामने प्रस्तुत करता हूं।

” योगवहूँ निशि वासर जोगजती,

जैसे रे सोनरा सोनवा के जोगवे ला,

घटे न पावे एको रत्ती,

योगवहूँ निशि वासर जोगजती,

जइसे रे पन्हेंरिया पनावा के जोगवेला,

सड़े न पावे एको पती,

योगव हूँ निशि वासर जोगजती,

वैसे हो रामजी सीता जी के जोगवे ले,

घटे न पावे मान मती

योगवहूँ निशि वासर जोगजती,

ऐसे अनेक भक्ति गीतों गाते हुए महिलाएं सिर पर गठरी रखे हुए मेले की तरफ निकलती थी और अपनी यात्रा को बड़े ही आनंद के भाव से पूरा करतीं थीं।

वैसे जो प्रसिद्ध गंगा स्नान के मेले लगते थे उनमें बलिया का ददरी मेला, बटेश्वर का मेला, गढ़मुक्तेश्वर का स्नान पर्व, रायबरेली में लगने वाला गंगा स्नान मेला, लखनऊ में गोमती के किनारे कतकी मेला। न जाने यह मेल अब कितने प्रभावी हैं और किस स्तर पर लग रहे हैं, नहीं कह सकता। लेकिन बलिया का ददरी मेला आज भी अपने धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत को, सजोते हुए, अपनी पहचान बनाए हुए है

कार्तिक पूर्णिमा पर लगने वाले इस ददरी मेले की आपको हृदय से बधाई देता हूं।

भृगु बाबा की जय।

♥♥♥♥

© श्री राजेश कुमार सिंह “श्रेयस”

लखनऊ, उप्र, (भारत )

दिनांक 22-02-2025

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ८२६ ⇒ ताला-चाबी ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “ताला-चाबी।)

?अभी अभी # ८२६ ⇒ आलेख – ताला-चाबी ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

इस पृथ्वी पर आदमी ही एक ऐसा प्राणी है जो सबसे अधिक समझदार भी है और स्वार्थी भी ! यह जानते हुए भी कि सिगरेट से फेफड़े खराब होते हैं, वह सिगरेट पीता है और खत्म हो जाने के बाद उसे ज़मीन पर फेंक, निर्ममता से जूते से मसल देता है। पेड़ से आम तोड़ता है और चूसकर गुठली और छिलका फेंक देता है। खुद घर में रहता है, और दूसरों के घर में आग लगाने की जुगाड़ में रहता है।

वह बहादुर भी है, और सुरक्षा-प्रेमी भी ! अपनी मूल्यवान चीजों को तिजोरी और लॉकर में रखता है। अपनी पत्नी-बच्चों के लिए घर बनाता है, उनकी सुरक्षा के लिए दरवाज़े लगवाता है और चाबी-ताले का भी इंतजाम करता है।।

ताले-चाबी का भी चोली-दामन का साथ है। लोग ताले को नहीं, चाबी को सम्भालकर रखते हैं। ताले के साथ चाबी दहेज में आती है, एक नहीं दो-दो आती है। गलत चाबी से ताला नहीं खुलता ! चोर के लिए कोई ताला ताला नहीं होता। चाबी खो जाने पर चाबी बनवाई जा सकती है, ताला खो जाने पर बेचारी चाबी एक ऐसी बेवा हो जाती है जिसे कोई ताला स्वीकार नहीं करता।

केवल ज़ुबान को छोड़कर सब पर ताला लगाया जा सकता है। जब किसी फैक्ट्री में तालाबंदी होती है तो कई कर्मचारी-मज़दूर बेरोजगार हो जाते हैं। जब किसी बंद घर के ताले टूटते हैं, तो बहुत कुछ सामान चोरी चला जाता है। ताला सुरक्षित लगे होने पर भी अगर चाबी खो जाए, तो ताले को बदल डालने में ही समझदारी होती है।।

लॉकर की चाबियाँ संभालकर रखनी पड़ती हैं, गुम जाने पर डुप्लीकेट नहीं बनती, लॉकर ड्रिल ओपन होता है। जब इनकम टैक्स का छापा पड़ता है, तब कोई चाबी काम नहीं आती। ऐसे वक्त अक्सर चाबियाँ नहीं मिलती और ताले तोड़ दिए जाते हैं।

अपराधी लॉकअप में बंद होते हैं तो सज़ायाफ्ता जेल की हवा खा रहे होते हैं। खुली जेल में भी बाहर से ताला लगा रहता है। मोटे-मोटे ताले, और मोटी-मोटी चाबियाँ आजकल म्यूजियम की शोभा बढ़ा रहे हैं।।

समय के साथ ताला-चाबी का साथ भी अब छूटने लग गया है। दोनों के मिलने का समय बाँध दिया गया है ! सभी ताले इन-बिल्ट लॉक हो गए हैं। कोई डोअर-लॉक हो गया है तो कोई हैंडल लॉक। जब रिमोट ही सब काम करने लगे तो कैसा ताला और कैसी चाबी।

लोग आज भी ट्रेन में सफर करते हैं तो सामान की सुरक्षा के लिए जब तक ताला-चाबी और चेन नहीं रख लेते, उन्हें चैन नहीं मिलता। एक समय वह भी था जब एक दकियानूस शंकालु आदमी चेस्टिटी- बेल्ट लगाकर ही परदेस जाता था और आज अक्षयकुमार पैड-मैन बन एक नए उन्मुक्त खुले दिमाग वाले समाज की रचना कर रहा है।।

बहुत ताले में रख लिया पुरानी पीढ़ी ने नई पीढ़ी को। आज तो नए एंड्राइड फ़ोन का लॉक खोलने के लिए दादाजी सात साल के पोते को ही आवाज़ देते हैं। बेटा ! ये फोन फिर लॉक हो गया है। एक पुरानी कहावत है, सफलता की कुँजी हमारे हाथ में ही है। लगता है वह चाबी हमें मिल गई है। बस लगाने की देर है। खुल जा सिम सिम।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य #२९९ ☆ अहं, क्रोध, काम व लोभ… ☆ डॉ. मुक्ता ☆

डॉ. मुक्ता

(डा. मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य” के माध्यम से  हम  आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी की मानवीय जीवन पर आधारित एक विचारणीय आलेख अहं, क्रोध, काम व लोभ। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की  लेखनी को  इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें।) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य  # २९९ ☆

☆ अहं, क्रोध, काम व लोभ… ☆

‘अहं त्याग देने से मनुष्य सबका प्रिय हो जाता है; क्रोध छोड़ देने पर वह शोक रहित हो जाता है; काम का त्याग कर देने पर धनवान हो जाता है और लोभ छोड़ देने पर सुखी हो जाता है’– युधिष्ठिर की यह उक्ति विचारणीय है। अहं मानव का सबसे बड़ा शत्रु है क्योंकि जब तक उसमें ‘मैं’ अथवा कर्त्ता का भाव रहेगा, तब तक उसके लिए उन्नति के सभी मार्ग बंद हो जाते हैं। जब तक उसमें यह भाव रहेगा कि मैंने ऐसा किया और इतने पुण्य कर्म किए हैं, तभी यह सब संभव हो सका है। ‘जब ‘मैं’ यानि अहंकार जाएगा, मानव स्वर्ग का अधिकारी बन पाएगा और उसे इच्छित लक्ष्य की प्राप्ति हो सकेगी’– प्रख्यात देवाचार्य महेंद्रनाथ का यह कथन अत्यंत सार्थक है। अहंनिष्ठ व्यक्ति किसी का प्रिय नहीं हो सकता और कोई भी उससे बात तक करना पसंद नहीं करता। वह अपने द्वीप में कैद होकर रह जाता है, क्योंकि सर्वश्रेष्ठता का भाव उसे सबसे दूर रहने पर विवश कर देता है।

वैसे तो किसी से उम्मीद रखना कारग़र नहीं है। ‘परंतु यदि आप किसी से उम्मीद रखते हैं, तो एक न एक दिन आपको दर्द ज़रूर होगा, क्योंकि उम्मीद एक न एक दिन अवश्य टूटेगी और जब यह टूटती है, तो बहुत दर्द होता है’– विलियम शेक्सपियर यह कथन अनुकरणीय है। जब मानव की इच्छाएं पूर्ण होती है, तो वह दूसरों से सहयोग की उम्मीद करता है, क्योंकि सीमित साधनों द्वारा असीमित इच्छाओं की पूर्ति संभव नहीं होती। उस स्थिति में जब हमें दूसरों से अपेक्षित सहयोग प्राप्त नहीं होता, तो मानव हैरान-परेशान हो जाता है और जब उम्मीद टूटती है तो बहुत दर्द होता है। सो! मानव को उम्मीद दूसरों से नहीं, ख़ुद से करनी चाहिए और अपने परिश्रम पर भरोसा रखना चाहिए… उसे सफलता अवश्य प्राप्त होती है। इसलिए मानव तो खुली आंखों से सपने देखने का संदेश दिया गया है और उसे तब तक चैन से नहीं बैठना चाहिए; जब तक वे साकार न हो जाएं–अब्दुल कलाम की यह सोच अत्यंत सार्थक है। यदि मानव दृढ़-प्रतिज्ञ व आत्म-विश्वासी है; कठिन परिश्रम करने में विश्वास करता है, तो वह भीषण पर्वतों से भी टकरा सकता है और अपनी मंज़िल पर पहुंच सकता है।

‘यदि तुम ख़ुद को कमज़ोर समझते हो, तो तुम कमज़ोर हो जाओगे; अगर ख़ुद को ताकतवर सोचते हो, तो तुम ताकतवर हो जाओगे’– विवेकानंद की यह उक्ति इस तथ्य पर प्रकाश डालती है कि मन में अलौकिक शक्तियाँ विद्यमान है। वह जैसा सोचता है, वैसा बन जाता है और वह सब कर सकता है, जिसकी कल्पना भी उसने कभी नहीं की होती। ‘मन के हारे हार है, मन के जीते जीत।’ दूसरे शब्दों में मानव स्वयं अपने भाग्य का निर्माता है। इसलिए कहा जाता है कि असंभव शब्द मूर्खों की शब्दकोश में होता है और बुद्धिमानों से उसका दूर का नाता भी नहीं होता। इसी संदर्भ में मैं इस तथ्य पर प्रकाश डालना चाहूंगी कि प्रतिभा जन्मजात होती है उसका जात-पात, धर्म आदि से कोई संबंध नहीं होता। वास्तव में प्रतिभा बहुत दुर्लभ होती है और प्रभु-प्रदत्त होती है। दूसरी और शास्त्र ज्ञान व अभ्यास इसके पूरक हो सकते हैं। ‘करत- करत अभ्यास के, जड़मति होत सुजान’ अर्थात् अभ्यास करने पर मूर्ख व्यक्ति भी बुद्धिमान हो सकता है। जिस प्रकार पत्थर पर अत्यधिक पानी पड़ने से वे अपना रूपाकार खो देते हैं, उसी प्रकार शास्त्राध्ययन द्वारा मर्ख अर्थात् अल्पज्ञ व्यक्ति भी बुद्धिमान हो सकता है। स्वामी रामतीर्थ जी के मतानुसार ‘जब चित्त में दुविधा नहीं होती, तब समस्त पदार्थ ज्ञान विश्राम पाता है और दिव्य ज्ञान की प्राप्ति होती है।’ सो! संशय की स्थिति मानव के लिए घातक होती है और ऐसा व्यक्ति सदैव ऊहापोह की स्थिति में रहने के कारण अपने मनचाहे लक्ष्य की प्राप्ति नहीं कर सकता।

इसी संदर्भ में मुझे स्मरण हो रहा है हज़रत इब्राहिम का प्रसंग, जिन्होंने एक गुलाम खरीदा तथा उससे उसका नाम पूछा। गुलाम ने उत्तर दिया – ‘आप जिस नाम से पुकारें, वही मेरा नाम होगा मालिक।’ उन्होंने खाने व कपड़ों की पसंद पूछी, तो भी उसने उत्तर दिया ‘जो आप चाहें।’ राजा के उसके कार्य व इच्छा पूछने पर उसने उत्तर दिया–’गुलाम की कोई इच्छा नहीं होती।’ यह सुनते ही राजा ने अपने तख्त से उठ खड़ा हुआ और उसने कहा–’आज से तुम मेरे उस्ताद हो। तुमने मुझे सिखा दिया कि सेवक को कैसा होना चाहिए।’ सो! जो मनुष्य स्वयं को प्रभु के चरणों में समर्पित कर देता है, उसे ही दिव्य ज्ञान की प्राप्ति होती है।

क्रोध छोड़ देने पर मनुष्य शोक रहित हो जाता है। क्रोध वह अग्नि है, जो कर्त्ता को जलाती है, उसके सुख-चैन में सेंध लगाती है और प्रतिपक्ष उससे तनिक भी प्रभावित नहीं होता। वैसे ही तुरंत प्रतिक्रिया देने से भी क्रोध द्विगुणित हो जाता है। इसलिए मानव को तुरंत प्रतिक्रिया नहीं देनी चाहिए, क्योंकि क्रोध एक अंतराल के पश्चात् शांत हो जाता है। यह तो दूध के उफ़ान की भांति होता है; जो पल भर में शांत हो जाता है। परंतु यह मानव के सुख, शांति व सुक़ून को मगर की भांति लील  जाता है। क्रोध का त्याग करने वाला व्यक्ति शांत रहता है और उसे कभी भी शोक अथवा दु:ख का सामना नहीं करना पड़ता। काम सभी बुराइयों की जड़ है। कामी व्यक्ति में सभी बुराइयां शराब, ड्रग्स, परस्त्री- गमन आदि बुराइयां स्वत: आ जाती हैं। उसका सारा धन परिवार के इतर इनमें नष्ट हो जाता है और वह अक्सर उपहास का पात्र बनता है। परंतु इन दुष्प्रवृत्तियों से मुक्त होने पर वह शरीर से हृष्ट-पुष्ट, मन से बलवान् व धनी हो जाता है। सब उससे प्रेम करने लगते हैं और वह सबकी श्रद्धा का पात्र बन जाता है।

आइए! हम चिन्तन करें– क्या लोभ का त्याग कर देने के पश्चात् मानव सुखी हो जाता है? वैसे तो प्रेम की भांति सुख बाज़ार से खरीदा ही नहीं  जा सकता। लोभी व्यक्ति आत्म-केंद्रित होता है और अपने इतर किसी के बारे में नहीं सोचता। वह हर इच्छित वस्तु को संचित कर लेना चाहता है, क्योंकि वह केवल लेने में विश्वास रखता है; देने में नहीं। उसकी आकांक्षाएं सुरसा के मुख की भांति बढ़ती चली जाती हैं, जिनका खरपतवार की भांति कोई अंत नहीं होता। वैसे भी आवश्यकताएं तो पूरी की जा सकती हैं, इच्छाएं नहीं। इसलिए उन पर अंकुश लगाना आवश्यक  है। लोभ व संचय की प्रवृत्ति का त्याग कर देने पर वह आत्म-संतोषी जीव हो जाता है। दूसरे शब्दों में वह प्रभु द्वारा प्रदत्त वस्तुओं से संतुष्ट रहता है।

अंत में मैं कहना चाहूंगी कि जो मनुष्य अहं, काम, क्रोध व लोभ पर विजय प्राप्त कर लेता है; वह सदैव सुखी रहता है। ज़माने भर की आपदाएं उसका रास्ता नहीं रोक सकतीं। वह सदैव प्रसन्न-चित्त रहता है। दु:ख, तनाव, चिंता, अवसाद आदि उसके निकट आने का साहस भी नहीं जुटा पाते। ख़लील ज़िब्रान के शब्दों में ‘प्यार के बिना जीवन फूल या फल के बिना पेड़ की तरह है।’ ‘प्यार बांटते चलो’ गीत भी इसी भाव को पुष्ट करता है। इसलिए जो कार्य- व्यवहार स्वयं को अच्छा न लगे; वैसा दूसरों के साथ न करना ही सर्वप्रिय मार्ग है–यह सिद्धांत चोर व सज्जन दोनों पर लागू होता है। महात्मा बुद्ध की भी यही सोच है। स्नेह, प्यार त्याग, समर्पण वे गुण हैं, जो मानव को सब का प्रिय बनाने की क्षमता रखते हैं।

●●●●

© डा. मुक्ता

माननीय राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत, पूर्व निदेशक, हरियाणा साहित्य अकादमी

संपर्क – #239,सेक्टर-45, गुरुग्राम-122003 ईमेल: drmukta51@gmail.com, मो• न•…8588801878

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ८२५ ⇒ गाड़ी और लाइसेंस ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “गाड़ी और लाइसेंस।)

?अभी अभी # ८२५ ⇒ आलेख – गाड़ी और लाइसेंस ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

जो चलती रहे, उसे कबीर गाड़ी कहते हैं। हमारे लिए आज वह वाहन है, और अगर इसमें पहिये और इंजिन भी है, तो लाइसेंस भी ज़रूरी है। आदमी की तरह आजकल गाड़ियों के भी कागजात बनते हैं, उन्हें भी नाम और पहचान दी जाती है। इंसानों की तरह उनका भी बीमा होता है, दुर्घटना होने पर उन्हें भी क्लेम मिलता है। हमारी तरह इनके भी अवयव होते हैं, जिन्हें, हॉर्न, लाइट, क्लच, ब्रेक और एक्सीलेटर कहते हैं। इनके डॉक्टर्स को मैकेनिक और इनके अस्पताल को गैरेज कहते हैं।

कुछ गाड़ियों का तो गैरेज ही ब्यूटी पार्लर होता है। जब सजधज कर वापस मालिक के पास आती है, तो मालिक ही नहीं पहचान पाता।

गाडियां नई भी होती हैं और सेकंड हैंड भी ! इन गाड़ियों का कोई चरित्र नहीं होता, कोई भी नौसिखिया, अपना ड्राइविंग लाइसेंस दिखा, इन्हें उड़ा ले जाता है। गाड़ियों का सिर्फ फिटनेस सर्टिफिकेट होता है, कोई चरित्र प्रमाण पत्र नहीं। अक्सर पैसे वाले रईस लोग एक से अधिक गाड़ियां रखते हैं, जिन्हें उनके ड्राइवर चलाते हैं। नये नये कपड़ों की तरह कुछ लोगों को गाड़ियां बदलने का भी शौक होता है तो कुछ लोग किसी विशेष गाड़ी के प्रति अति भावुक हो जाते हैं, मानो उसमें उनकी जान बसती हो।।

गाड़ी में दो पहिए जरूरी होते हैं। एक पहिये की साइकिल सिर्फ सर्कस में चलती है। एक गाड़ी गृहस्थी की भी होती है, जिसमें शुरू में दो पहिये ही होते हैं।

आवश्यकता और भार अनुसार गाड़ी के पहिये और स्वरूप भी बदलता रहता है। आज वही एक आदर्श गृहस्थी है, जिसके पास एक चार पहिये की गाड़ी है। आप चाहें तो इस गाड़ी को, हम दो, हमारे दो, भी कह सकते हैं।

अगर एक स्टेपनी साथ में हो, तो अधिक बेहतर।

जिंदगी की सड़क पर अगर गृहस्थी की गाड़ी चलेगी, तो वह भी पहिये पर ही चलेगी। दोनों पहियों का साथ ही जिंदगी का साथ है। एक पहिये की जिंदगी किसी अपाहिज की जिंदगी से कम नहीं होती, लेकिन लोग जी लेते हैं। जहां जीवन में आदर्श होता है, उत्साह और उमंग होती है, उद्देश्य होता है, लक्ष्य होता है, जीवन चक्र रुकता नहीं, आत्म विश्वास के पहिये ही काफी होते हैं, जीवन रथ के लिए।।

यूं तो ये जनम जनम के फेरे हैं, लेकिन गृहस्थी की गाड़ी भी कहां सात फेरे और लाइसेंस के बिना चल पाती है। पति का लाइसेंस कोई चेक नहीं करता, यहां पत्नी के कागजात चेक होते हैं। उसे पहले पत्नी बनना होता है, तब ही वह मां बन सकती है। दंड कोई भी भुगते, चालान तो गाड़ी का ही बनता है।

काश गृहस्थी की भी ऐसी कोई गाड़ी बन जाए, जो बिना पहिये के, बिना लाइसेंस के, सिर्फ प्रेम, आदर्श और मर्यादा के कागजात पर चले। किसी गाड़ी के चरित्र पर कभी उंगली ना उठे। कोई यूं ही मुंह उठाकर, पैसे और शोहरत के बल पर शोरूम से नई चमचमाती गाड़ी उठा लाए, और पुरानी गाड़ी गैरेज में, मन मसोसती रह जाए। इंसान अगर गाड़ियों को भी रिश्तों की तरह सहेजना सीख जाए, तो शायद केवल घर गृहस्थी ही नहीं, यह दुनिया भी स्वर्ग हो जाए।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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