श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ३८५ ☆
आलेख – राजस्थान में हिंदी : एक सांस्कृतिक और भाषाई अध्ययन
श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆
राजस्थान, जिसे ‘राजाओं की भूमि’ के नाम से जाना जाता है, न केवल अपने वैभवशाली इतिहास, दुर्गों और सांस्कृतिक विरासत के लिए प्रसिद्ध है, बल्कि यह एक समृद्ध भाषाई परंपरा का भी क्षेत्र रहा है। यहाँ की हिंदी भाषा ने सदियों से विभिन्न सांस्कृतिक प्रभावों को आत्मसात करते हुए एक विशिष्ट पहचान बनाई है। राजस्थान में हिंदी के विविध स्वरूप, बोलचाल में क्षेत्रीय अपभ्रंश, साहित्यिक हिंदी का विकास और सरकारी प्रयासों ने मिलकर एक ऐसी विविधता से भरी भाषाई संस्कृति को जन्म दिया है जो अतीत और वर्तमान के बीच सशक्त सेतु का कार्य करती है।
ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य …
राजस्थान में हिंदी का सतत विकास एक जटिल ऐतिहासिक प्रक्रिया का परिणाम है। अरावली पर्वतमाला के भौगोलिक विभाजन ने यहाँ की भाषा को दो प्रमुख भागों , उत्तर-पश्चिमी राजस्थान (मारवाड़ या मरूदेश) और दक्षिणी-पूर्वी राजस्थान (मेरवाड़ा) में विभाजित किया। यहाँ की आदिभाषा ‘मरूभाषा’ या ‘मरुवाणी’ रही है, जो समूचे राज्य की साहित्यिक भाषा भी बनी। भाषाविदों के अनुसार, राजस्थानी भाषा का विकास शौरसेनी अपभ्रंश से हुआ, जिसके साहित्यिक रूप को ‘डिंगळ’ के नाम से जाना गया।
राजस्थान के इतिहास पर दृष्टिपात करें तो पाएंगे कि यह क्षेत्र सदैव से विदेशी आक्रमणों का केन्द्र रहा है, परंतु इन आक्रमणों ने यहाँ की भाषा और संस्कृति को समृद्ध ही किया। विभिन्न आक्रांताओं के साथ आए सांस्कृतिक प्रभावों ने स्थानीय बोलचाल की भाषा में नए शब्द, मुहावरे और अभिव्यक्तियाँ जोड़ीं, जिससे हिंदी के स्थानीय स्वरूप में निरंतर परिवर्तन और विकास होता रहा।
राजस्थान में हिंदी के विभिन्न स्वरूप और क्षेत्रीय अपभ्रंश …
राजस्थान में हिंदी ने अनेक क्षेत्रीय रूप धारण किए हैं, जो स्थानीय बोलियों और भाषाई परंपराओं से गहराई से प्रभावित हैं। भाषा वैज्ञानिक दृष्टि से राजस्थानी भाषा हिंदी की एक महत्वपूर्ण बोली मानी जाती है, जिसमें डिंगल और पिंगल जैसी साहित्यिक परंपराएँ विकसित हुई हैं। राजस्थानी भाषा में डिंगल के सरस दोहे, नाथों की बानियों के गूढ़ साक्षात्कार, ढोला-मरवण की विरहोक्तियाँ और वीरदर्पोचित चैतावणी शामिल हैं।
बोलचाल की हिंदी में राजस्थानी के प्रभाव स्पष्ट घुल मिल चुके हैं। स्थानीय बोलियों जैसे मारवाड़ी, मेवाड़ी, ढूँढाड़ी आदि ने हिंदी के स्थानीय स्वरूप को आकार दिया है। इन बोलियों में प्रयुक्त होने वाले शब्द, मुहावरे और वाक्य संरचनाएँ हिंदी में समाहित होकर उसे एक विशिष्ट राजस्थानी अंदाज़ प्रदान करते हैं। उदाहरण के लिए, ‘छानो’ (अच्छा), ‘बिगो’ (जल्दी करो) जैसे शब्द स्थानीय हिंदी का हिस्सा बन गए हैं।
साहित्यिक हिंदी और राजस्थानी लेखक…
हिंदी साहित्य के विकास में राजस्थानी लेखकों का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण रहा है। राजस्थानी साहित्य अपनी समृद्धता, व्यापकता एवं लोकप्रियता के कारण हिन्दी साहित्य की धरोहर है तथा विवेचनीय है। हिंदी साहित्य के ‘आदिकाल’ के परिसीमन में आने वाली ‘पुरानी हिन्दी’ की बहुत सी रचनाएँ राजस्थानी भाषा में ही मिलती हैं।
राजस्थानी साहित्य मुख्यतः वीर-रस प्रधान है, जिसमें युद्ध, बलिदान तथा स्वधर्म के लिए सर्वस्व का उत्सर्ग कर देने की भावना प्रमुखता से व्यक्त हुई है। चारण साहित्य में वीरस्तुति काव्य (प्रशस्ति) की समृद्ध परंपरा रही है, जिसमें शौर्य और बलिदान की गाथाएँ वर्णित हैं। विरह में भी शौर्य भरे भावना प्रधान वृत्तांत राजस्थानी हिंदी साहित्य को विशिष्ट बनाते हैं।
हिंदी साहित्य में राजस्थान के योगदान की बात करें तो कबीर की साखियों की भाषा खड़ी बोली राजस्थानी मिश्रित सामान्य ‘सधुक्कड़ी’ भाषा है। इससे स्पष्ट होता है कि हिंदी के विकास में राजस्थानी भाषा का महत्वपूर्ण योगदान रहा है।
हिंदी के लिए राजस्थान सरकार के प्रयास..
साहित्य सदैव राजश्रायी रहा है, और राजस्थान तो अनेकानेक राज्यों , राजाओं का समुच्चय बना रहा है, जहां पुरस्कारों , राज दरबारो में साहित्य पनपता रहा है। इन दिनों राजस्थान सरकार ने हिंदी के विकास और प्रसार के लिए अनेक महत्वपूर्ण पहल की हैं। डिजिटल युग में हिंदी को और अधिक बढ़ावा देने तथा इसे डिजिटल प्लेटफॉर्मों से एकीकृत करने की आवश्यकता भी समझी गई है।
राजस्थान में प्रशासनिक कार्यों में हिंदी के उपयोग को बढ़ाने के लिए भी महत्वपूर्ण कदम उठाए गए हैं, जिससे सरकारी विभागों में हिंदी के मानकीकृत उपयोग को सुनिश्चित किया जा रहा है । राज्य सरकार ने शिक्षा के क्षेत्र में भी हिंदी को महत्व दिया है। अंग्रेजी माध्यम स्कूलों में अब अंग्रेजी के साथ-साथ हिंदी माध्यम में भी पढ़ाई का विकल्प दिया गया है। यह निर्णय उन गाँवों के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है , जहाँ हिंदी माध्यम के उच्च माध्यमिक स्तर के सरकारी विद्यालय उपलब्ध नहीं है।
भाषाई विवाद और राजस्थानी को मान्यता ..
राजस्थान में भाषाई विवाद लंबे समय से चला आ रहा है। राजस्थानी भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने की मांग वर्ष 1944 से चल रही है, ठाकुर राम सिंह तंवर के नेतृत्व में दिनाजपुर में राजस्थानी भाषा का पहला अधिवेशन हुआ था। 25 अगस्त 2003 को राजस्थान विधानसभा ने सर्वसम्मति से राजस्थानी भाषा को संवैधानिक मान्यता देने का प्रस्ताव पारित कर केंद्र को भेजा था, लेकिन यह विधेयक अभी भी लंबित है। क्षेत्रीय भाषाओं के पोषण से राष्ट्रभाषा हिन्दी का स्वतः पोषण , यह दृष्टिकोण हिंदी और राजस्थानी के पारस्परिक संबंध को प्रतिबिंबित करता है।
राजस्थानी भाषा को सरकारी मान्यता देने का मुद्दा रोजगार से भी जुड़ा हुआ है, क्योंकि संवैधानिक मान्यता मिलने पर राजस्थान लोक सेवा आयोग और संघ लोक सेवा आयोग की परीक्षाएं स्थानीय भाषा में भी आयोजित हो सकेंगी ।
राजस्थान में हिंदी का उज्ज्वल भविष्य …
राजस्थान में हिंदी का भविष्य उज्ज्वल प्रतीत होता है, लेकिन इसके लिए कुछ चुनौतियों का समाधान करना भी आवश्यक है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति , 2020 ने शिक्षा में मातृभाषा और क्षेत्रीय भाषाओं के उपयोग पर जोर दिया है. इस नीति के तहत प्राथमिक कक्षाओं में मातृभाषा या क्षेत्रीय भाषा में पढ़ाई पर जोर दिया जाएगा, जिससे बच्चों की भाषाई नींव मजबूत हो सकेगी और वे अपने आसपास के समाज और संस्कृति से बेहतर तरीके से जुड़ सकेंगे।
भविष्य में हिंदी और राजस्थानी के समन्वित विकास की आवश्यकता है। “राजस्थानी की मान्यता से हिन्दी कमजोर नहीं होगी वरन उसे बल मिलेगा”। इस सत्य को समझना चाहिए।
राजस्थान के भाषा संस्थान, सम्मान और विश्वविद्यालय …
राजस्थान में हिंदी शिक्षण, शोध और प्रचार-प्रसार के लिए अनेक संस्थान सक्रिय हैं। राजस्थान में हिंदी सेवा के लिए अनेक शासकीय एवं निजी संस्थाओं द्वारा पुरस्कार और सम्मान भी प्रदान किए जाते हैं। हिंदी और राजस्थानी साहित्य के विकास में विभिन्न साहित्यिक और सांस्कृतिक संस्थानों की पत्रिकाएं छपती हैं। हिंदी के प्रचार-प्रसार और इसके उत्थान के लिए कार्यक्रमों के निरंतर आयोजन होते हैं । कवि सम्मेलनों में जन भागीदारी साहित्य के प्रति लोगों की अभिरुचि बताती है।
राजस्थान में हिंदी का इतिहास और विकास एक गतिशील और बहुआयामी प्रक्रिया रही है। विभिन्न सांस्कृतिक प्रभावों , पर्यटन और स्थानीय भाषाई परंपराओं ने मिलकर हिंदी के एक ऐसे स्वरूप को जन्म दिया है जो राष्ट्रीय एकता और क्षेत्रीय विविधता के बीच सामंजस्य स्थापित करता है। राजस्थानी भाषा और हिंदी का पारस्परिक संबंध इस बात का उदाहरण है कि कैसे क्षेत्रीय भाषाएँ राष्ट्रभाषा को समृद्ध कर सकती हैं। भविष्य में शिक्षा नीतियों, तकनीकी एकीकरण और सांस्कृतिक जागरूकता के माध्यम से राजस्थान में हिंदी का विकास जारी रहेगा। आवश्यकता इस बात की है कि हिंदी और राजस्थानी के बीच सहअस्तित्व और पारस्परिक समृद्धि के मार्ग को और अधिक सशक्त बनाया जाए, ताकि राजस्थान की भाषाई विरासत भावी पीढ़ियों तक संरक्षित रह सके। डिजिटल युग ने प्रकाशन , त्वरित वैश्विक पहुंच के नए मार्ग बनाए हैं, जिनका उपयोग हिंदी के विस्तार को बहुआयामी आकाश दे रहा है।
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© श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’
म प्र साहित्य अकादमी से सम्मानित वरिष्ठ व्यंग्यकार
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≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈










