हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # १४६ – देश-परदेश – ग से गधा ☆ श्री राकेश कुमार ☆

श्री राकेश कुमार

(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ  की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” ज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)

☆ आलेख # १४६ ☆ देश-परदेश – ग से गधा ☆ श्री राकेश कुमार ☆

जीवन में सबसे अपमानित किए जाने वाली संज्ञा “गधा” सुन सुन कर ही पूरा जीवन निकल गया हैं। बचपन से घर पर मिल रहा ये सम्मान बाद में महाविद्यालय तक साथ चला। नौकरी में भी इसी नाम से वरिष्ठ जनों द्वारा संबोधित किया जाता था।

मुहावरों तक में इनकी मेहनत और निष्ठा का कोई स्थान नहीं मिला है। गधे को बाप बनाना, गधे पर किताबें लादना, गधे से हल चलवाना जैसे कटाक्ष भरी जली कटी बातें मानव जाति करता रहता है।

शहरों की पतली/संकरी गलियों में इनके बिना सप्लाई लाइन तक पूरी नहीं होती है।

बहुत कम उच्चाइयों वाली खदानों के अंदर में कोयले से  अपनी पीठ पर ढोना हो या कुम्हार के बड़े बड़े मटको को बाज़ार तक पहुंचाना हो, ये गधे ही है, जो कुशलता पूर्वक कर पाते हैं।

दुनिया भर में आपको डॉग, बर्ड, कैट लवर्स आदि मिल जाएंगे। कोई भी संस्था गधों के अत्याचारों के लिए लड़ने को तैयार नहीं हैं। कोई भी एन जी ओ इनके सम्मान से जीने की वकालत नहीं करता है।

साठ के दशक की एक फिल्म मेहरबान में अवश्य एक गीत गधों पर आधारित हैं, “मेरा गधा, गधों का लीडर”। सूखी घास खाकर जीने वाले प्राणी के लिए कह दिया जाता है” गधे पंजीरी खा रहे हैं”, जबकि बेचारा गधा कभी पान का हरा पत्ता तक नहीं खाता है।

गधा कभी कुछ अच्छा करता है, तो उसको ये कह कर हतोत्साहित कर दिया जाता है, “गधे हो गधे ही रहो घोड़ा बनने की जरूरत नहीं हैं।”

अब तो उच्चतम न्यायालय से ही उम्मीद है, वो स्वतः संज्ञान लेते हुए, कोई बड़ा निर्णय गधों के पक्ष में ले कर, सदियों से दर्द और बेज़्जती भरे जीवन में कुत्तों जैसी बाहर आएगी।

© श्री राकेश कुमार

संपर्क – B 508 शिवज्ञान एनक्लेव, निर्माण नगर AB ब्लॉक, जयपुर-302 019 (राजस्थान)

मोबाईल 9920832096

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ७७८ ⇒ माड़ साब ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “माड़ साब ।)

?अभी अभी # ७७८⇒ आलेख – माड़ साब ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

जिस तरह सरकारी दफ्तरों में एक किस्म बड़े बाबू की होती है, ठीक उसी तरह सरकारी स्कूलों में शिक्षक की एक किस्म होती है, जिसे माड़ साब कहते हैं। बड़े बाबू, नौकरशाही का एक सौ टका शुद्ध, टंच रूप है, जिसमें रत्ती भर भी मिलावट नहीं, जब कि शिक्षा विभाग में माड़ साब जैसा कोई शब्द ही नहीं, कोई पद ही नहीं।

माड़ साब, एक शासकीय प्राथमिक अथवा माध्यमिक विद्यालय के अध्यापक यानी शिक्षक महोदय, जिन्हें कभी मास्टर साहब भी कहा जाता था, का अपभ्रंश यानी, बिगड़ा स्वरूप है।।

हमें आज भी याद है, हमारी प्राथमिक स्कूल की नर्सरी राइम, ए, बी, सी, डी, ई, एफ, जी, क्लास में बैठे पंडित जी ….( रिक्त स्थानों की पूर्ति आप ही कर लीजिए ) होती थी। यह तब की बात है, जब छम छम छड़ी की मार से, विद्या धम धम आती थी। बेचारे पंडित जी, कब मास्टर जी हो गए, और जब अधेड़ होते होते, माड़ साब हो गए, उन्हें ही पता नहीं चला।

इस प्राणी में यह खूबी है, कि यह केवल सरकारी स्कूलों में ही नजर आता है। हायर सेकंडरी के कुछ वरिष्ठ शिक्षक लेक्चरर अथवा व्याख्याता कहलाना अधिक पसंद करते हैं। आजकल प्राइवेट स्कूल, पब्लिक स्कूल कहलाए जाने लगे हैं, वहां सर अथवा टीचर किस्म के शिक्षक उपलब्ध होते हैं, जिनकी तनख्वाह माड़ साहब जितनी तो नहीं होती, लेकिन जिम्मेदारी धड़ी भर होती है।।

वैसे यहां सरकारी स्कूलों में शिक्षिका भी होती हैं, जिन्हें कभी सम्मान से बहन जी कहा जाता था। लेकिन जब बहन जी भी घिस घिस कर भैन जी कहलाने लगी, तो उन्हें सम्मान से मैडम अथवा टीचर जी कहकर संबोधित किया जाने लगा।

मैडम शब्द के बारे में भी हमारे कार्यालयों में बड़ी भ्रांति है। शिक्षा के क्षेत्र से प्रचलित यह शब्द किसी विवाहित महिला के लिए प्रयुक्त किया जाना चाहिए, लेकिन माड़ साब की तरह और मिस्टर की तरह मैडम शब्द हर कामकाजी महिला, और एक आम शिक्षिका के लिए प्रयुक्त होने लग गया।।

एक बार स्थिति बड़ी विचित्र पैदा हो गई, जब किसी बैंक में एक रिटायर्ड फौजी पेंशनर ने किसी महिला कर्मचारी से पूछ लिया, are you married ? उस बेचारी कुछ दिन पहले ही लगी लड़की ने कह दिया, no Sir, I am still a bachelor ! इस पर उस पेंशनर ने आश्चर्य व्यक्त किया, why then, these people call you Madam, I dont understand. आपके साथी आपको मैडम क्यों कहते हैं, मुझे समझ में नहीं आता।

वैसे मास्टर शब्द को हल्के में नहीं लिया जाना चाहिए ! जो किसी भी विधा में, अपने इल्म में दक्ष हो, उसे मास्टर कहा जाता है। मास्टर्स की डिग्री वैसे भी बैचलर्स की डिग्री से बड़ी होती है।।

संगीत और नृत्य में मास्टर जी, किसी उस्ताद अथवा गुरु से उन्नीस नहीं होते।

अध्यात्म के क्षेत्र में जो अदृश्य शक्तियां अमृत काल में, साधकों की सहायता करती हैं, उन्हें भी मास्टर ही कहते हैं। महावतार बाबा, युक्तेश्वर गिरी और लाहिड़ी महाशय की गिनती ऐसे ही मास्टर्स में होती है।

माड़ साब के साथ ऐसा कोई धर्मसंकट नहीं। उन्हें माड़ साब सुनने की वैसे ही आदत है, जैसे एक बड़े बाबू आजीवन घर और बाहर बड़े बाबू ही कहलाते चले आ रहे हैं। मेरे कई पारिवारिक और घनिष्ठ मित्रों को मुझे भी मजबूरन माड़ साब ही कहना पड़ता है। अगर कभी गलती से उनका नाम लेने में भी आ गया, तो सामने वाला सुधार कर देता है, अच्छा वही माड़ साब ना।।

रिश्तों पर आजकल घनघोर संकट चल रहा है। प्रेम के संबंध और रिश्ते गायब होते जा रहे हैं, रिटायर्ड अकाउंटेंट और शिक्षाकर्मी और शिक्षाविद् जैसे भारी भरकम शब्द अधिक प्रचलन में है। कल ही मैने अपने एक प्रिय माड़ साब को खोया है, ईश्वर इन रिश्तों की रक्षा करे ..!!

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संजय उवाच # ३०५ – अगले बरस तू जल्दी आ… ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆ —

श्री संजय भारद्वाज

(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के  लेखक  श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है। साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ  हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको  पाठकों का  आशातीत  प्रतिसाद मिला है।”

हम  प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है  इस शृंखला की अगली कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों  के माध्यम से  हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)

☆  संजय उवाच # ३०५ ☆ अगले बरस तू जल्दी आ… ?

कल अनंत चतुर्दशी थी। गणेश चतुर्थी के दिन गणेश जी के विग्रह की प्रतिष्ठा से आरम्भ गणेशोत्सव विसर्जन के साथ ही कल समाप्त हो गया। यूँ देखें तो सृजन, प्रतिष्ठा और विसर्जन के माध्यम से जीवन की सम्पूर्ण यात्रा हमारे अनेक त्योहारों में अंतर्निहित है। आगमन से गमन तक का पर्व है, गणेशोत्सव।

घर में अतिथि का आगमन एक सामान्य घटना है। अतिथि के आने का दूसरा पहलू है कि वह लौट जाएगा। भूलोक भी प्रकृति का घर है। हम सब अतिथि हैं। मर्त्यलोक में देह धारण करके जो आया, उसका लौटना अवश्यंभावी है। कीर्ति तो अक्षुण्ण रह सकती है, अमर हो सकती है पर देह का नष्ट होना  अनिवार्य है।

नश्वर जगत में प्रदत्त समय का सदुपयोग करना, अपनी भूमिका का समुचित निर्वहन करना मनुष्य से अपेक्षित है। समय बीतने के बाद पश्चाताप के अलावा कुछ शेष नहीं रह जाता।

किसी राज्य में राजा द्वारा आयोजित संगीतोत्सव में भाग लेने के लिए एक युवा सितारवादक को आमंत्रित किया गया। सितारवादक के लिए अपनी प्रतिभा के प्रदर्शन का यह स्वर्णिम अवसर था। उसने विचार किया कि वह ऐसा सितार बजाएगा जिससे श्रोता मंत्रमुग्ध हो जाएँगे और राजा उससे प्रसन्न होकर बहुत सारा धन देगा।

संगीतोत्सव आरम्भ हुआ। हर कलाकार की प्रस्तुति के लिए समय निर्धारित था। समय पूरा होने पर पर्दा गिर जाता और फिर नया कलाकार आता। सितारवादक की प्रस्तुति का समय आया। वह मंच पर पहुँचा। वादन आरम्भ करने से पहले सितार की ट्यूनिंग के लिए उसकी खूँटियाँ मरोड़ कर सुर मिलाने लगा। इस प्रक्रिया में ऐसा खोया कि उसे प्रदत्त समय समाप्त हो गया और पर्दा गिरा दिया गया। सितारवादक को वादन के बिना ही लौटना पड़ा। अवसर तो मिला था पर प्रस्तुति नहीं दे पाया, तैयारी में ही रह गया। डॉ. हरिवंशराय बच्चन के शब्दों में लिखूँ तो ‘जीवन सब बीत गया, जीने की तैयारी में।’

समय रहते वह सितार बजा लेता तो संभव था कि उसकी सितार के सुर वर्षों तक याद किए जाते और देहातीत होकर भी अपनी प्रतिभा के बल पर वह चिरंजीवी हो जाता।

अष्ट चिरंजीवी व्यक्तित्वों में से एक हैं महर्षि वेदव्यास। उन्हें ज्ञान का मूर्तिमान स्वरूप माना गया है। मान्यता है कि महर्षि ने भगवान गणेश को दस दिन तक निरंतर महाभारत की कथा सुनाई और श्री गणेश उसे लिपिबद्ध करते गए। तत्पश्चात महर्षि ने पाया कि श्री गणेश के शरीर का तापमान बहुत अधिक बढ़ गया है। महर्षि ने गणेश जी को समीप के एक सरोवर में स्नान कराया ताकि उनके शरीर का तापमान सामान्य हो सके। यह काल गणेशोत्सव के रूप में मनाया जाता है और उत्कर्ष के रूप में विग्रह का जल में विसर्जन होता है।

श्री गणेश बुद्धि के देवता हैं। स्वाभाविक है कि उनके लिए मनाया जानेवाला उत्सव ज्ञान की प्रतीति कराने वाला हो। महर्षि वेदव्यास इसी शाश्वत ज्ञान के अविनाशी प्रसारक हैं। ज्ञान के प्रचार-प्रसार में लगे साधकों में महर्षि का यही जाग्रत अंश देखने को मिलता है।

सृजन, प्रतिष्ठा और विसर्जन के माध्यम से गणेशोत्सव, जीवनचक्र की प्रतिकृति बनकर सामने आता है। स्मरण रहे, ‘अगले बरस तू जल्दी आ’ आगमन से गमन की सतत और अखंड यात्रा का घोष है। काया धारण करने वाला हर जीव इसी अटल यात्रा का पथिक है। ..इति।

© संजय भारद्वाज 

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️  श्री गणेश साधना संपन्न हुई. अगली साधना की सूचना आपको शीघ्र ही दी जावेगी। 🕉️💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं।

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ शिक्षक दिवस विशेष… नमस्ते के नंबर… ☆ श्री अजीत सिंह ☆

श्री अजीत सिंह

(हमारे आग्रह पर श्री अजीत सिंह जी (पूर्व समाचार निदेशक, दूरदर्शन) हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए विचारणीय आलेख, वार्ताएं, संस्मरण साझा करते रहते हैं।  इसके लिए हम उनके हृदय से आभारी हैं। आज प्रस्तुत है आपका शिक्षक दिवस पर एक संस्मरणीय आलेख नमस्ते के नंबर।)

☆ आलेख – नमस्ते के नंबर…  ☆ श्री अजीत सिंह ☆

जम्मू यूनिवर्सिटी में एम कॉम की पढ़ाई कर रहा मेरा बेटा एक दिन अपने एक सेमेस्टर की परीक्षा का रिपोर्ट कार्ड लेकर आया। मैंने कार्ड देखा और पूछा कि एक सब्जेक्ट में उसके मार्क्स कम क्यूं थे। उसने कहा कि वह प्रो वर्मा का सब्जेक्ट था जो ढंग से नहीं पढ़ाते और अक्सर कंप्यूटर पर शेयर मार्केट में बिजी रहते थे। वह पहले भी प्रो वर्मा के बारे में शिकायत करता रहता था।

फिर मैने पूछा कि एक दूसरे सब्जेक्ट में उसके काफ़ी अच्छे नंबर हैं तो उसने कहा, डैडी ये तो नमस्ते के नंबर हैं।

मैने कहा कि वह प्रो वर्मा को नमस्ते कर अच्छे नंबर क्यूं नहीं प्राप्त कर लेता।

बेटा बोला कि उनसे तो सभी विद्यार्थी कन्नी काटते हैं। उनके पास कोई नहीं जाता, बस कहीं यूं ही मिल जाएं तो गुड मॉर्निंग वगैरा कह कर निकल जाते हैं।

मैने समझाने की कोशिश करते हुए कहा कि आदरपूर्ण नमस्ते या गुडमॉर्निंग कहने का अर्थ है कि आप उस प्रोफेसर का सम्मान करते हैं और इसका सीधा प्रभाव आपके अंकों पर पड़ता है। आप टीचर का सम्मान करेंगे तो उसके विषय का सम्मान भी हो जाएगा।

इसका सीधा सा अर्थ यह है कि पढ़ाई में अच्छे स्कोर के लिए अध्यापक का सम्मान पहली शर्त है। सम्मान के अभाव में आपका स्कोर भी अच्छा नहीं होगा।

यह मामला सिर्फ स्कोर तक सीमित नहीं रहा। जब एम कॉम फाइनल एग्जाम का वाइवा हुआ तो इसे लेने गुरु नानकदेव यूनिवर्सिटी के एक प्रोफेसर जम्मू यूनिवर्सिटी आए थे। उन्होंने आते ही प्रो शर्मा से कहा कि कुछ दिन पहले उनके यहां इंडियन एक्सप्रेस चंडीगढ़ की टीम आई थी और उसने उनके एम बी ए के पांच विद्यार्थियों को मार्केटिंग एग्जीक्यूटिव की पोस्ट के लिए चुना था। उन में से चार ने जॉब ज्वाइन कर ली और एक ने नहीं की। उन्होंने प्रो शर्मा से कहा कि क्या वे उन्हें अपने किसी एक विद्यार्थी का नाम बता सकते हैं जिसका वे गहन इंटरव्यू करने के बाद उसका नाम चंडीगढ़ इंडियन एक्सप्रेस को भेज देंगे।

प्रो शर्मा ने नमस्ते करने वाले मेरे बेटे का नाम सुझाया। अमृतसर से आए प्रोफेसर ने गहन परीक्षा ली और उसे योग्य पाए जाने के बाद आखिर में पूछा कि क्या वो नौकरी करना चाहता है। बेटे ने फट से हां कह दी। प्रोफेसर साहिब ने परीक्षा के बाद उसे एक चिट्ठी इंडियन एक्सप्रेस के एच आर हेड के नाम दे दी और इस तरह मेरे बेटे को उसकी पहली नौकरी मिल गई ।

कहानी का निष्कर्ष यह है कि अध्यापक का सम्मान आपको न केवल पढ़ाई में अच्छे मार्क्स दिला सकता है बल्कि आपके रोज़गार का रास्ता भी साफ कर सकता है। हर विद्यार्थी को अपने अध्यापक का सम्मान करना चाहिए। माता पिता को भी अपने बच्चों के अध्यापकों का सम्मान करना चाहिए और बच्चों में ऐसे संस्कार पैदा करने चाहिएं कि वे अध्यापकों का सम्मान करें।

सभी को अध्यापक दिवस की बधाई।

☆ ☆ ☆ 

 © श्री अजीत सिंह

05.09.25

पूर्व समाचार निदेशक, दूरदर्शन हिसार।

मो : 9466647037

26.07.2025

(लेखक श्री अजीत सिंह हिसार से स्वतंत्र पत्रकार हैं । वे 2006 में दूरदर्शन केंद्र हिसार के समाचार निदेशक के पद से सेवानिवृत्त हुए।)

ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ७७७ ⇒ विचारक और प्रचारक ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “विचारक और प्रचारक।)

?अभी अभी # ७७७ ⇒ आलेख – विचारक और प्रचारक ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

विचारक और प्रचारक का रिश्ता भी कुछ कुछ लेखक और पाठक जैसा ही होता है, बस अंतर यह है कि हर पाठक लेखक का प्रशंसक नहीं होता, जब कि हर प्रचारक, विचारक का प्रशंसक भी होता है।

पहले विचार आया, फिर विचार का प्रचार आया। आप चाहें तो विचारक को चिंतक भी कह सकते हैं, लेकिन चिंतक इतना अंतर्मुखी होता है कि उसे अपने विचार से ही फुर्सत नहीं मिलती। हमारी श्रुति, स्मृति और पुराण उसी विचार, गूढ़ चिंतन मनन का प्रकटीकरण ही तो है। जिस तरह वायु, गंध और महक को अपने साथ साथ ले जाकर वातावरण को सुगंधित करती है, ज्ञान का भी प्रचार प्रसार विभिन्न माध्यमों से होता चला आया है।।

चिंतन सामाजिक मूल्यों का भी हो सकता है और मानवीय मूल्यों का भी। विचारक जहां सामाजिक व्यवस्था से जुड़ा होता है, एक दार्शनिक जीवन के मानवीय और भावनात्मक पहलुओं पर अपनी निगाह रखता है। विचार और दर्शन हमेशा साथ साथ चले हैं। विचार ने ही क्रांतियां की हैं, और विचारों के प्रदूषण ने ही इस दुनिया को नर्क बनाया है। ऐसा क्या है बुद्ध, महावीर, राम और कृष्ण में कि वे आज भी किसी के आदर्श हैं, पथ प्रदर्शक हैं, कोई उन्हें पूजता है तो कोई उन्हें अवतार समझता है। मार्क्स, लेनिन आज क्यों दुनिया की आंख में खटक रहे हैं। विचार ही हमें देव बना रहा है, और विचार ही हमें असुर। देवासुर संग्राम अभी थमा नहीं।

एक अनार सौ बीमार तो ठीक, पर एक विचारक और इतने प्रचारक ! अगर सुविचार हुआ तो सबका कल्याण और अगर मति भ्रष्ट हुई तो दुनिया तबाह। देश, दुनिया, सभ्यता, संस्कृति विचारों से ही बनती, बिगड़ती चली आ रही है। मेरा विचार, मेरी सभ्यता, मेरी संस्कृति सर्वश्रेष्ठ, हमारा नेता कैसा हो, इसके आगे हम कभी बढ़ ही नहीं पाए। जो विचार भारी, जनता उसकी आभारी।।

आज सबके अपने अपने फॉलोअर हैं, प्रशंसक हैं, आदर्श हैं। सोशल मीडिया और प्रचार तंत्र जन मानस पर इतना हावी है कि आम आदमी की विचारों की मौलिकता को ग्रहण लग गया है। एक भेड़ चाल है, जिससे अलग वह चाहकर भी नहीं चल सकता।

हमारी विचारों की बैलगाड़ी दो बैलों की जोड़ी से शुरू हुई और गाय बछड़े पर आकर रुक गई। विकास ट्रैक्टर पर चढ़कर आया और कीचड़ में कमल खिल गया। हमने बछड़े को हटा दिया, गाय को माता बनाकर गौशाला में भेज दिया। अब यह गऊ माता ही हमें इस भव सागर से पार लगाएगी। आज हमारे पास अच्छे विचारक भले ही नहीं हों, अच्छे प्रचारक जरूर हैं।।

आज का युग विचार का नहीं, प्रचार का युग है। अच्छाई एक ब्रांड है, जो बिना अच्छे पैकिंग, विज्ञापन और ब्रांड एंबेसेडर के नहीं बेची जा सकती। धर्म, राजनीति, आदर्श, नैतिकता और समाज सेवा बिना प्रचार और प्रचारक के संभव ही नहीं। कोई सेवक है, कोई स्वयंसेवक, कोई गुरु है कोई चेला, कोई स्वामी है कोई शिष्य, कोई भगवान बना बैठा है तो कोई शैतान। सबकी दुकान खुली हुई है, मंडी में बोलियां लगवा रही हैं समाजवाद, पूंजीवाद, वंशवाद और राष्ट्रवाद की। सबके आदर्श, सबके अपने अपने विचारक, प्रचारक और डंडे झंडे। मंडे टू संडे। जिसका ज्यादा गल्ला, उसका बहुमत। लोकतंत्र जिंदाबाद।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ७७६ ⇒ फुटपाथ ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “फुटपाथ।)

?अभी अभी # ७७६ ⇒ आलेख – फुटपाथ ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

पैदल चलने वालों के लिए सड़क के दोनों ओर जो रास्ता बनाया जाता है, उसे फुटपाथ कहते हैं। गांवों में लोगों के पांवों के निशानों से ही पगडंडियां बनती जाती थी। कच्ची पक्की सड़कें तो बहुत बाद में बनती थी।

हमारे देश में पहली फुटपाथ (फिल्म) १९५३ में बनी और आखरी फुटपाथ(फिल्म) सन् २००३ में। आजकल सड़कें तो बनती हैं, लेकिन फुटपाथ के लिए जगह नहीं होती।

फुटपाथ मूलतः पैदल चलने वालों के लिए सड़क के दोनों ओर, वहीं बनाया जाता है, जहां बाजार होता है, दुकानें होती हैं, लोगों की आवाजाही होती है। इस तरह अनौपचारिक रूप से फुटपाथ पर दुकानदारों का कब्जा हो जाता है। पहले थोड़ा, फिर अति, इस तरह धीरे धीरे फुटपाथ पर दुकानदारों का अतिक्रमण हो जाता है और राहगीर सड़क पर आ जाता है। ।

एक समय था, जब शहर की आबादी कम थी, लोग सुबह शाम पैदल घूमने निकलते थे। सड़कों पर भी अधिकतर साइकिल और इक्के दुक्के ही वाहन देखे जा सकते थे। आदमी निश्चिंत होकर फुटपाथ पर चल सकता था। हर दुकान को निहारता हुआ, जरूरत की दुकान पर रुकता, सुस्ताता, कुछ खरीदता हुआ, अपनी राह पर चलता रहता था।

जहां फुटपाथ खत्म होता था, वहां कोई मोची बैठा मिलता था, तो कहीं हर शनिवार को कोई महिला सुबह से ही शनि महाराज को विराजमान कर देती थी।

शनिवार ही वह दिन होता था, जब सड़कों और फुटपाथों की नगर निगम द्वारा पानी से धुलाई होती थी। ऐसा प्रतीत होता था, मानो शहर सज रहा हो। ।

बढ़ते यातायात और बढ़ते वाहनों के कारण रास्ते एकांगी होते चले गए और इंसान व्यस्त। दुकानों की साज सज्जा बढ़ती गई, साख घटती गई। पुराने व्यवसाय खत्म से हो गए, हर मार्केट नावेल्टी मार्केट में तब्दील हो गया। रेडियो, टीवी, और फ्रिज की दुकानें कम होती गई, हर तरफ मोबाइल ही मोबाइल। बाबूजी तुम कौन सा खरीदोगे, सैमसंग, appo या vivo ?

आज का आदमी न सड़क का रहा न फुटपाथ का, वह बस भीड़ बनकर रह गया है। शहर में विकास भी हो रहा है और सौंदर्यीकरण भी। अतिक्रमण भी हट रहे हैं और स्मार्ट सिटी की अवधारणा मूर्त रूप ले रही है। और इधर आदमी है जो आदमी नहीं मशीन बनता चला जा रहा है। उसे अब फुटपाथ पर चलना नहीं, मेट्रो में दौड़ना है।

वैसे भी सड़क पर पैदल चलना तो अब घट गया है और दुर्घटनाएं बढ़ती जा रही हैं। सुरक्षित रहने के लिए ऑनलाइन शॉपिंग हो रही है, Zomato पहले महाकाल की थाली भिजवाता है, फिर माफी मांगता है। अब हमारे पांव नहीं चलते, सिर्फ रास्ता चलता है। ।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य #२९१ ☆ कोरोना और भूख… ☆ डॉ. मुक्ता ☆

डॉ. मुक्ता

(डा. मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य” के माध्यम से  हम  आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी की मानवीय जीवन पर आधारित एक विचारणीय आलेख कोरोना और भूख। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की  लेखनी को  इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें।) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य  # २९१ ☆

☆ कोरोना और भूख… ☆ 

कोरोना बाहर नहीं जाने देता और भूख भीतर नहीं रहने देती। आजकल हर इंसान दहशत के साये में जी रहा है। उसे कल क्या, अगले पल की भी खबर नहीं। अब तो कोरोना भी इतना शातिर हो गया है कि वह इंसान को अपनी उपस्थिति की खबर ही नहीं लगने देता। वह दबे पांव दस्तक देता है और मानव शरीर पर कब्ज़ा कर बैठ जाता है। उस स्थिति में मानव की दशा उस मृग के समान होती है, जो रेगिस्तान में सूर्य की चमकती किरणों को जल समझ कर दौड़ता चला जाता है और वह बावरा मानव परमात्मा की तलाश में इत-उत भटकता रहता है। अंत में उसके हाथ निराशा ही लगती है, क्योंकि परमात्मा तो आत्मा के भीतर बसता है। वह अजर, अमर, अविनाशी है। उसी प्रकार कोरोना भी शहंशाह की भांति हमारे शरीर में बसता है, जिससे सब अनभिज्ञ होते हैं। वह चुपचाप वार करता है और जब तक मानव को उक्त रोग की खबर मिलती है; वह लाइलाज घोषित कर दिया जाता है। घर से बाहर अस्पताल में क्वारेंटाइन कर दिया जाता है और आइसोलेशन में परिवारजनों को भी उससे मिलने भी नहीं दिया जाता। तक़दीर से यदि वह ठीक हो जाता है, तो उसकी घर-वापसी हो जाती है, अन्यथा उसका दाह-संस्कार करने का दारोमदार भी सरकार पर होता है। आपको उसके अंतिम दर्शन भी प्राप्त नहीं हो सकते। वास्तव में यही है– जीते जी मुक्ति। कोरोना आपको इस मायावी संसार ले दूर जाता है। उसके बाद कोई नहीं जानता कि क्या हो रहा है आपके साथ… कितनी आपदाओं का सामना करना पड़ रहा है आपको… और अंत में किसी से मोह-ममता व लगाव नहीं; उसी परमात्मा का ख्याल … है न यह उस सृष्टि- नियंता तक पहुंचने का सुगम साधन व कारग़र उपाय। यदि कोई आपके प्रति प्रेम जताना भी चाहता है, तो वह भी संभव नहीं, क्योंकि आप उन सबसे दूर जा चुके होते हो।

परंतु भूख दो प्रकार की होती है… शारीरिक व मानसिक। जहां तक शारीरिक भूख का संबंध है, भ्रूण रूप से मानव उससे जुड़ जाता है और अंतिम सांस तक उसका पेट कभी नहीं भरता। मानव उदर-पूर्ति हेतु आजीवन ग़लत काम करता रहता है और चोरी-डकैती, फ़िरौती, लूटपाट, हत्या आदि करने से भी ग़ुरेज़ नहीं करता। बड़े-बड़े महल बनाता है सुरक्षित रहने के लिए, परंतु मृत्यु उसे बड़े-बड़े किलों की ऊंची-ऊंची दीवारों के पीछे से भी ढूंढ निकालती है। सो! कोरोना भी काल के समान है, कहीं भी, किसी भी पल किसी को भी दबोच लेता है। फिर उससे घबराना व डरना कैसा? जिस अपरिहार्य परिस्थिति पर आपका अंकुश नहीं है; उसके सम्मुख नतमस्तक होना ही बेहतर है। सो! आत्मनिर्भर हो जाइए; डर-डर कर जीना भी कोई ज़िंदगी है। शत्रु को ललकारिए–परंतु सावधानीपूर्वक। इसलिए एक-दूसरे से दो गज़ की दूरी बनाए रखिए, परंतु मन से दूरियां मत बनाइए। इसमें कठिनाई क्या है? वैसे भी तो आजकल सब अपने-अपने द्वीप में कैद रहते हैं… एक छत के नीचे रहते हुए अजनबीपन का एहसास लिए…संबंध-सरोकारों से बहुत ऊपर। सो! कोरोना तो आपके लिए वरदान है। ख़ुद में ख़ुद को तलाशने व मुलाकात करने का स्वर्णिम अवसर है, जो आपको राग-द्वेष व स्व-पर के बंधनों से ऊपर उठाता है। इसलिए स्वयं को पहचानें व उत्सव मनाएं। कोरोना ने आपको अवसर प्रदान किया है, निस्पृह भाव से जीने का; अपने-पराये को समान समझने का… फिर देर किस बात की है। अपने परिवार के साथ प्रसन्नता से रहिए। मोबाइल व फोन के नियंत्रण से मुक्त रहिए, क्योंकि जब आप किसी के लिए कुछ कर नहीं सकते, तो चिन्ता किस बात की और तनाव क्यों? घर ही अब आपका मंदिर है, उसे स्वर्ग मान कर प्रसन्न रहिए। इसी में आप सबका हित है। यही है ‘सर्वेभवंतु सुखिनः’ का मूल, जिसमें आप भरपूर योगदान दे सकते हैं। सो! अपने घर की लक्ष्मण-रेखा न पार कर के, अपने घर में ही अलौकिक सुख पाने का प्रयास कीजिए। लौट आइए! अपनी प्राचीन संस्कृति की ओर। तनिक चिंतन कीजिए–कैसे ऋषि-मुनि वर्षों तक जप-तप करते थे। उन्हें न भूख सताती थी; न ही प्यास। आप भी तो ऋषियों की संतान हैं। ध्यान-समाधि लगाइए– शारीरिक भूख-प्यास आप के निकट आने का साहस भी नहीं जुटा पाएगी और आप मानसिक भूख पर स्वतः विजय प्राप्त करने में समर्थ हो सकेंगे।

आधुनिक युग में आपके बुज़ुर्ग माता-पिता तो वैसे भी परिवार की धुरी में नहीं आते। बच्चों के साथ खुश रहिए। एक-दूसरे पर दोषारोपण कर घर की सुख-शांति में सेंध मत लगाइए। पत्नी और बच्चों पर क़हर मत बरसाइए, क्योंकि इस दशा के लिए दोषी वे नहीं हैं। कोरोना तो विश्वव्यापी समस्या है। उसका डटकर मुकाबला कीजिए। अपनी इच्छाओं को सीमित कर ‘दाल रोटी खाओ, प्रभु के गुण गाओ’ में मस्त रहिए। वैसे भी पत्नी तो सदैव बुद्धिहीन अथवा दोयम दर्जे की प्राणी समझी जाती है। सो! उस निर्बल व मूर्ख पर अकारण क्रोध व प्रहार क्यों? बच्चे तो निश्छल व मासूम होते हैं। उन पर क्रोध करने से क्या लाभ? उनके साथ हंस-बोल कर अपने बचपन में लौट जाइए, क्योंकि यह सुहाना समय है…खुश रहने व आनंदोत्सव मनाने का। ज़रा! देखो तो सदियों बाद कोरोना ने सबकी साध पूरी की है… ‘कितना अच्छा हो, घर बैठे तनख्वाह मिल जाए… रोज़ की भीड़ के धक्के खाने से  मुक्ति प्राप्त हो जाए…बॉस की डांट-फटकार का भी डर न हो और हम अपने घर में आनंद से रहें।’ लो! सदियों बाद आप सबको मनचाहा प्राप्त हो गया…परंतु बावरा मन कहां संतुष्ट रह पाता है, एक स्थिति में…वह तो चंचल है। परिवर्तनशीलता सृष्टि का नियम है। मानव अब तथाकथित स्थिति में छटपटाने लगा है और उस से तुरंत मुक्ति पाना चाहता है। परंतु आधुनिक परिस्थितियां मानव के नियंत्रण में नहीं हैं। अब तो समझौता करने में ही उसका हित है। सो! मोबाइल फोन को अपना साथी बनाइए और भावनाओं पर नियंत्रण रखिए, क्योंकि तुम असहाय हो और तुम्हारी पुकार सुनने वाला कोई नहीं। तुम्हारी आवाज़ तो  दीवारों से टकराकर लौट आएगी।

औरत की भांति हर विषम परिस्थिति में ओंठ सी कर व मौन रह कर खुश रहना सीखिए और सर्वस्व समर्पण कर सुक़ून की ज़िंदगी गुज़ारिए। यहां तुम्हारी पुकार सुनने वाला कोई नहीं। अब सृष्टि-नियंता की कारगुज़ारियों को साक्षी भाव से देखिए, क्योंकि तुमने मनमानी कर धन की लालसा में प्रकृति से खिलवाड़ कर पर्यावरण को प्रदूषित कर दिया है– यहां तक कि अब तो हवा भी सांस लेने योग्य नहीं रह गयी है। पोखर, तालाब नदी-नालों पर कब्ज़ा कर उस भूमि पर कंकरीट की इमारतें बना दी हैं। इसलिए मानव को बाढ़, तूफ़ान, सुनामी, भूकंप, भू-स्खलन आदि का प्रकोप झेलना पड़ रहा है। जब इस पर भी मानव सचेत नहीं हुआ, तो प्रकृति ने कोरोना के रूप में दस्तक दी है।

इसलिए कोरोना, अब काहे का रोना। इसमें दोष तुम्हारा है। अब भी संभल जाओ, अन्यथा वह दिन दूर नहीं, जब सृष्टि में पुनः प्रलय आ जाएगी और विनाश ही विनाश चहुंओर प्रतिभासित होगा। इसलिए गीता के संदेश को अपना कर निष्काम कर्म करें। मानव इस संसार में खाली हाथ आया है और खाली हाथ उसे जाना है। इस नश्वर संसार में अपना कुछ नहीं है। इसलिए प्रेम व नि:स्वार्थ भाव से सबकी सेवा करो। न जाने! कौन-सी सांस आखिरी सांस हो जाए।

●●●●

© डा. मुक्ता

माननीय राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत, पूर्व निदेशक, हरियाणा साहित्य अकादमी

संपर्क – #239,सेक्टर-45, गुरुग्राम-122003 ईमेल: drmukta51@gmail.com, मो• न•…8588801878

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ७७५ ⇒ फुटपाथ ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “फुटपाथ।)

?अभी अभी # ७७५ ⇒ आलेख – फुटपाथ ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

पैदल चलने वालों के लिए सड़क के दोनों ओर जो रास्ता बनाया जाता है, उसे फुटपाथ कहते हैं। गांवों में लोगों के पांवों के निशानों से ही पगडंडियां बनती जाती थी। कच्ची पक्की सड़कें तो बहुत बाद में बनती थी।

हमारे देश में पहली फुटपाथ (फिल्म) १९५३ में बनी और आखरी फुटपाथ(फिल्म) सन् २००३ में। आजकल सड़कें तो बनती हैं, लेकिन फुटपाथ के लिए जगह नहीं होती।

फुटपाथ मूलतः पैदल चलने वालों के लिए सड़क के दोनों ओर, वहीं बनाया जाता है, जहां बाजार होता है, दुकानें होती हैं, लोगों की आवाजाही होती है। इस तरह अनौपचारिक रूप से फुटपाथ पर दुकानदारों का कब्जा हो जाता है। पहले थोड़ा, फिर अति, इस तरह धीरे धीरे फुटपाथ पर दुकानदारों का अतिक्रमण हो जाता है और राहगीर सड़क पर आ जाता है। ।

एक समय था, जब शहर की आबादी कम थी, लोग सुबह शाम पैदल घूमने निकलते थे। सड़कों पर भी अधिकतर साइकिल और इक्के दुक्के ही वाहन देखे जा सकते थे। आदमी निश्चिंत होकर फुटपाथ पर चल सकता था। हर दुकान को निहारता हुआ, जरूरत की दुकान पर रुकता, सुस्ताता, कुछ खरीदता हुआ, अपनी राह पर चलता रहता था।

जहां फुटपाथ खत्म होता था, वहां कोई मोची बैठा मिलता था, तो कहीं हर शनिवार को कोई महिला सुबह से ही शनि महाराज को विराजमान कर देती थी।

शनिवार ही वह दिन होता था, जब सड़कों और फुटपाथों की नगर निगम द्वारा पानी से धुलाई होती थी। ऐसा प्रतीत होता था, मानो शहर सज रहा हो। ।

बढ़ते यातायात और बढ़ते वाहनों के कारण रास्ते एकांगी होते चले गए और इंसान व्यस्त। दुकानों की साज सज्जा बढ़ती गई, साख घटती गई। पुराने व्यवसाय खत्म से हो गए, हर मार्केट नावेल्टी मार्केट में तब्दील हो गया। रेडियो, टीवी, और फ्रिज की दुकानें कम होती गई, हर तरफ मोबाइल ही मोबाइल। बाबूजी तुम कौन सा खरीदोगे, सैमसंग, appo या vivo ?

आज का आदमी न सड़क का रहा न फुटपाथ का, वह बस भीड़ बनकर रह गया है। शहर में विकास भी हो रहा है और सौंदर्यीकरण भी। अतिक्रमण भी हट रहे हैं और स्मार्ट सिटी की अवधारणा मूर्त रूप ले रही है। और इधर आदमी है जो आदमी नहीं मशीन बनता चला जा रहा है। उसे अब फुटपाथ पर चलना नहीं, मेट्रो में दौड़ना है।

वैसे भी सड़क पर पैदल चलना तो अब घट गया है और दुर्घटनाएं बढ़ती जा रही हैं। सुरक्षित रहने के लिए ऑनलाइन शॉपिंग हो रही है, Zomato पहले महाकाल की थाली भिजवाता है, फिर माफी मांगता है। अब हमारे पांव नहीं चलते, सिर्फ रास्ता चलता है।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # २५६ ☆ अपनी माटी से जुड़ाव का पर्व… ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ ☆

श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की  प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं  में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना अपनी माटी से जुड़ाव का पर्व। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  – आलेख  # २५६  ☆ अपनी माटी से जुड़ाव का पर्व

लंबोदर अर्थात बड़े पेट वाला, भारतीय संस्कृति में गणेश जी के लिए यह शब्द प्रयुक्त होता है। इस वर्ष 27 अगस्त 2025 को गणेश चतुर्थी का उत्सव मनाया गया। घर- घर में मिट्टी से बनें गणेश जी की मूर्ति स्थापित हुयी। इसी के साथ दस दिवसीय पर्व शुरू हुआ। नित्य सुबह शाम आरती, चंदन, वंदन साथ ही मोदक मिष्ठान का भोग लगाना। दूब घास, गुड़हल पुष्प की माला आपको प्रिय है। रिद्धि- सिद्धि, शुभ- लाभ सहित गजानन हमारे घर विराजित हैं। 06 सितंबर 2025, अनन्त चौदस के दिन पूजा, आरती, भोग, हवन पश्चात जल के कुंड में विसर्जन किया जाता है। पर्यावरण की सुरक्षा हेतु हम घर में विसर्जन करें, उसके पश्चात जो मिट्टी व जल बचेगा उसे गमले में रखकर उसमें पौधा लगाएँ जिससे पूरे वर्ष भर हमें बप्पा का साथ मिलता रहे। अगले बरस तू जल्दी आ इसी उद्घोष के साथ विघ्नहर्ता, गजानन, एकदन्त, दयावंत, प्रथमेश, प्रथम पूज्य, गणराज, मंगलमूर्ति, गौरीसुत आपकी कृपा दृष्टि सभी भक्तों पर सदैव बनीं रहे।

*

मास भादो की चतुर्थी, शुक्ल का चंदा सजा।

मातु गौरी के गजानन, राग मंगलमय बजा।।

नाम लंबोदर कहाया, तात शिव शंकर कहे।

नाथ पूजा आपकी हो, लाभ संगत शुभ रहे।।

**

©  श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

माँ नर्मदे नगर, म.न. -12, फेज- 1, बिलहरी, जबलपुर ( म. प्र.) 482020

मो. 7024285788, chhayasaxena2508@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ मित्रता: एक अनमोल अनुभूति ☆ डाॅ. मीना श्रीवास्तव ☆

डाॅ. मीना श्रीवास्तव

☆ आलेख ☆ मित्रता: एक अनमोल अनुभूति ☆ डाॅ. मीना श्रीवास्तव

मित्रता दो या दो से अधिक व्यक्तियों के बीच का एक स्नेहपूर्ण बंधन है|  यह एक ऐसा अक्षय पात्र है, जिसमें प्रेम, विश्वास और अपनेपन की भावनाएं भरी हैं| यह शक्ति आपकी संकटमोचक बनकर हर आपत्ति में आपकी रक्षा करती है| प्रकृति का दान यज्ञ आदिकाल से शुरू है| सूर्य जिस प्रकार अपनी ऊर्जा और प्रकाश देता है, पेड़ जिस तरह धूप से त्रस्त पथिक को शीतल छाया देते हैं, या नदी जिस तरह प्यासे को जल प्रदान करती है, ठीक उसी प्रकार मित्रता भी निरपेक्ष भाव से की जाती है| यहाँ किसी शर्त या स्वार्थ के लिए स्थान नहीं होता|

“जौ चाहत, चटकन घटे, मैलो होई न मित्त।

राज राजसु न छुवाइ तौ, नेह चीकन चित्त।।“

अर्थ- इस दोहे में कवि बिहारी जी कहते हैं कि,यदि आप चाहते हैं कि मित्रता की चटक / चमक ना घटे और मित्रता मैली ना हो, तो अपने मन में अभिमान, अहंकार और दिखावे की धूल मत जमने दो| जिस प्रकार तेल लगी हुई वस्तु की सतह चिकनी हो जाती है और उसपर धूल के स्पर्श मात्र से भी उसकी चमक घट कर वह मैली हो जाती है, उसी प्रकार अभिमान और दिखावे से मित्रता में दरार आ जाती है। आप अपने

रिश्तेदारों का चयन नहीं कर सकते| परन्तु समाजप्रिय इंसान मित्र का चयन अपने आप करता है| एक बार मित्रता का बीज तो बोया, परन्तु उसे परम विश्वास के जल, श्रद्धा की खाद और प्रेम का सूर्यप्रकाश न मिले तो वह अंकुरित नहीं होगा| धन-दौलत, जाति, धर्म, शिक्षा, लिंग जैसे अंतर मित्रता के अंतर्मन को छू नहीं पाते| आखिर माता पिता, भाई बहन पत्नी, पुत्र पुत्री और अन्य कई सम्बन्धी जनों से हम घिरे होकर और उनका प्रेम पाकर भी हम सच्चे मितवा की खोज में क्यों कर निकल पड़ते हैं? वह इसलिए कि मन की गहराई में छुपे हर विचार और भावनाओं को हम अपने सम्बन्धियों से बंधन में उलझने के कारण प्रकट नहीं कर पाते| हमें समझने वाला एक मित्र ही होता है| इसलिए अगर एक भी सच्चा मित्र जीवन में में प्राप्त हो तो हमें मानसिक संतुष्टि प्राप्त होती है| मित्र हमारी कमियों को नजरअंदाज करके हमें हमारी त्रुटियों सहित गले लगाता है| उसे पता है कि सुन्दर गुलाब के साथ उसे एकाध बार कांटे भी चुभेंगे|

फ्रेंडशिप डे (मित्रता दिवस)

इसकी उत्पत्ति का सबसे प्रचलित कारण प्रथम विश्व युद्ध के बाद की निराशाजनक स्थिति से उबरने हेतु और मित्रता के माध्यम से वैश्विक एकता, मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध  और शांति को प्रोत्साहित करने की इच्छा के साथ जोड़ा जाता रहा है। हॉलमार्क कार्ड्स के संस्थापक  जॉयस हॉल ने १९१९ में अगस्त माह के पहले रविवार को फ्रेंडशिप डे (मित्रता दिवस) मनाने का विचार दिया था, ताकि लोग एक-दूसरे को धन्यवाद कह सकें और दोस्ती का जश्न मना सकें|१९३५ में अमेरिकी कांग्रेस ने इस दिन को ‘राष्ट्रीय फ्रेंडशिप डे’ घोषित किया था| वैसे भी सप्ताह का अंतिम दिन जश्न मनाने के लिए एकदम उपयुक्त ही है, जो समय के साथ एक लोकप्रिय संस्कृति बन गई है| हमारे देश में भी यह दिन मित्रों के प्रति आत्मीयता प्रकट करने के लिए बड़े उत्साह से मनाया जाता है| 

आज की तारीख में हम भले ही वर्ष के एक दिन मित्रता दिवस मनाते हैं, परन्तु मित्रता मानव की सामाजिक प्रवृत्ति एवं संस्कृति रही है| सच्ची मित्रता में कई सिद्धांत लागू होते हैं, लेकिन सबसे महत्वपूर्ण हैं, पारस्परिक विश्वास और निष्ठा, आपसी समझ, सम्मान, सही दिशा का समर्थन और सहानुभूति! प्राचीन यूनानी दार्शनिक अरस्तु (३८४- ३२२ ईसा पूर्व) के अनुसार, मित्रता तीन प्रकार की होती है: उपयोगिता, आनंद और सद्गुण। उपयोगिता पर आधारित मित्रता लाभ और फायदे पर आधारित होती है, जैसे स्कूल के सहपाठी या कार्यस्थल के सहकर्मी की मित्रता| आनंद पर आधारित मित्रता एक-दूसरे की संगति का आनंद लेने पर आधारित होती है, जैसे कि साथ में पिकनिक मनाना और सैर सपाटा में मौज-मस्ती करना! सद्गुण पर आधारित मित्रता सर्वोत्कृष्ट एवं स्थायी होती है, क्योंकि यह एक-दूसरे के चरित्र के प्रति पारस्परिक सम्मान और प्रशंसा पर आधारित होती है। यह सबसे उत्कृष्ट प्रकार की मित्रता मानी जाती है क्योंकि इसमें दोनों मित्र एक-दूसरे के व्यक्तित्व को और अधिक निखारने में मदद करते हैं। अरस्तू का मानना था कि सद्गुण मित्रता दुर्लभ है, क्योंकि इसके लिए उच्च कोटि के चरित्र और सद्गुणों की आवश्यकता होती है।

हमारे प्राचीन ग्रंथों में सच्ची मित्रता के कई अनुकरणीय उदाहरण हैं| चिरंतन महाकाव्य रामायण को ही लें तो पुरुषोत्तम राम की मित्रता किसी जाति विशेष या कुल की मर्यादा से परे है| राम के वनवास के काल में उनके प्रिय मित्र ऋंगवेरपुर के राजा निषाद राज आदिवासी समाज के थे| वे अपना समूचा राज्य राम को अर्पण करना चाहते थे| पंचवटी में रावण ने जब सीता का अपहरण किया तब सर्वप्रथम रावण से युद्ध करने वाले गिद्ध पक्षीराज जटायु महाराज दशरथ के परममित्र थे| इस संघर्ष में जटायु ने अपने प्राण तक न्योछावर कर दिए| किष्किंधा के युवराज वानर सुग्रीव ने सीता की खोज में निकले श्रीराम से मित्रता की| इसके बदले में राम ने अपनी मित्रता का मोल चुकाने के लिए बाली और सुग्रीव के द्वंदयुद्ध में सुग्रीव को पिछड़ता देख वृक्ष की ओट से तीर मारा| अपनी मित्रता को निभाने हेतु अपने निष्कलंक चरित्र पर इस लांछन का कलंक उन्होंने बड़े ही आनंद से स्वीकार किया| दयानिधान राम ने रावण के अनुज विभीषण से मित्रता की और ‘यह घर का भेदी लंका को ढह गया’| स्वर्णिम लंका के सिंहासन पर श्रीराम को बिठाने के लिए आतुर विभीषण को श्रीराम ने ऐसा करने से मना किया|

महाभारत में मित्रता के कई पहलू हैं| कृष्ण चरित्र में कृष्ण और उनके गुरु बंधु सुदामा की मित्रता बहुत प्रचलित है| दरिद्री ब्राह्मण सुदामा के मुट्ठीभर चावल के एवज में द्वारकाधीश कृष्ण अपने बालसखा को राजमहल एवं समस्त ऐश्वर्य प्रदान करते हैं| कृष्ण और अर्जुन समवयस्क हैं, बंधु कम और सखा अधिक! श्रीकृष्ण अपने सखा की बात मान कर कुरुक्षेत्र के युद्ध में अर्जुन के सारथी बन जाते हैं| भावनाओं के उद्रेक में में बह कर जब अर्जुन कुरुक्षेत्र में अपने सगे सम्बन्धियों को समक्ष देख अपने शस्त्र डाल देता है, तब उसके परम मित्र कृष्ण उन्हें ‘गीता’ का अमर उपदेश कर युद्ध करने के लिए प्रेरित करते हैं| पितामह भीष्म को अर्जुन से अधिक प्रभावशाली होते देख अपनी प्रतिज्ञा तोड़ रथ का चक्का उठाकर वे भीष्म को मारने दौड़ते हैं| वे अर्जुन द्वारा कुशलतापूर्वक जयद्रथ का वध करवाते है, एवं निःशस्त्र भीष्म और कर्ण का वध करने को प्रेरित करते हैं| यह दिव्य मित्रता वे आजीवन निभाते हैं| कृष्णसखी कृष्णा यानि श्यामला द्रौपदी का कृष्ण के साथ रिश्ता स्त्री और पुरुष के उत्कट भावनात्मक अशरीरी और अपार स्नेहिल के नाते का अनुपम उदाहरण है| द्रौपदी वस्त्रहरण के प्रसंग पर श्रीकृष्ण ने ही उस पर आये संकट का निवारण किया| जब बाद में द्रौपदी ने श्रीकृष्ण से पूछा कि उसने आने में इतनी देर क्यों लगा दी, तो श्रीकृष्ण ने उससे कहा, “तुमने जैसे ही बुलाया, वैसे ही मैं आया”| लज्जा से बोझिल द्रौपदी को याद आया कि, उसे अपने पतियों, हस्तिनापुर दरबार में बैठे महाराज धृतराष्ट्र, गुरुजन एवं समस्त योद्धाओं से की प्रार्थना विफल होने के पश्चात् ही सबसे अंत में सखा कृष्ण का स्मरण हुआ| महाभारत में घनिष्ट स्वार्थी मित्रता का एक अन्य उदाहरण हमें अलग ही सीख देता है| दुर्योधन अपने स्वार्थ के लिए सूतपुत्र का लांछन लगे हुए कर्ण को अंगदेश का राजमुकुट पहना देता है| इसी उपकार के तले दबकर अच्छा स्वभाव और सद्गुणों के होते हुए भी दानवीर कर्ण दुर्योधन के गलत पक्ष का हर बार समर्थन करता है| वह दुर्योधन की मित्रता में अँधा होकर दुर्योधन की हर कुटिल योजना, यहाँ तक कि द्रौपदी वस्त्रहरण के घृणास्पद प्रसंग में भी सहभागी होता है| श्रीकृष्ण एवं कर्ण की माता कुंती कुरुक्षेत्र के युद्ध के पहले कर्ण को उसके जन्म का रहस्य बताते हैं कि, वह जेष्ठ पांडव है और उसे पांडवों के पक्ष में आना चाहिए| लेकिन उसके लिए दुर्योधन से मित्रता सर्वोपरि है| इसी कुसंगति के कारण अंत में वह जेष्ठ पांडव होकर भी अपने ही अनुज अर्जुन के हाथों मारा जाता है|      

इन दो महाकाव्यों के अतिरिक्त मुझे दो ग्रन्थ याद आते हैं, ईसप नीति और पंचतंत्र! उनमें पशु पक्षियों की अनोखी मित्रता की कई नैतिक कहानियां हैं| ईसप नीति की एक शेर और मानव की मित्रता की कहानी मुझे बहुत ही अच्छी लगती है| एक गुलाम एंड्रोक्लीज़ अपने मालिक से भागकर जंगल में छिप जाता है। वहां उसे एक घायल शेर मिलता है। एंड्रोक्लीज़ शेर के पैर से कांटा निकालता है। बाद में एंड्रोक्लीज़ पकड़ा जाता है और उसे एक शेर के सामने मरने के लिए अखाड़े में फेंक दिया जाता है। सभी को आश्चर्यचकित करते हुए शेर एंड्रोक्लीज़ को पहचान लेता है, कि यह वही इंसान है, जिसने उसकी मदद की थी और उससे प्रेम से लिपट जाता है| सम्राट यह अनोखी मित्रता देखकर द्रवित हो जाता है और एंड्रोक्लीज़ और शेर दोनों को मुक्त कर देता है|  

प्रिय पाठकगण, हमें अपने मित्र के स्नेह को एक हीरे जवाहरात से भरी संदूक की भांति सहेजकर रखना चाहिए| हीरे जवाहरात चोरी हो गए तो शायद वापस मिल जाएंगे, लेकिन एक बार किसी भी कारणवश आपका मित्र आपसे दूर चला जाए तो वापस नहीं आएगा|

“रहिमन धागा प्रेम का, मत तोड़ो चटकाय।

टूटे से फिर ना जुड़े, जुड़े गाँठ परी जाय।”

अर्थ- प्रेम का धागा महीन होता है, उसे झटका देकर नहीं तोड़ना चाहिए। यदि वह टूट गया तो फिर जुड़ता नहीं और जुड़ भी जाए तो गांठ पड़ जाती है।”

आप सबको मित्रता दिवस की अनेक शुभकामनाएं!  

© डॉक्टर मीना श्रीवास्तव

ठाणे

मोबाईल क्रमांक ९९२०१६७२११, ई-मेल – drmeenashrivastava21@gmail.com

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

Please share your Post !

Shares