(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “सिया तो से नैना लागे रे…“।)
अभी अभी # 750 ⇒ आलेख – सिया तो से नैना लागे रे श्री प्रदीप शर्मा
प्यार करने की, और ईश्वर स्मरण की कोई उम्र नहीं होती। प्यार तो हमने खूब किया होगा, नाम जपन क्यूं भूल गया। हम तो खैर अब प्यार करना भी भूल गए होते, अगर हमारे जीवन के ७५ वें वसंत में सिया के बाल स्वरूप का प्रवेश नहीं होता।
किसी भी भाव में और किसी भी स्थिति में अगर सियाराम से नेह लग जाए, तो समझो आपका बेड़ा पार। लोग कहते हैं, राधे राधे बोलो, चले आयेंगे बिहारी, तो हम अगर सिया सिया कहेंगे तो क्या सिया के साथ प्रभु श्रीराम नहीं चले आएंगे। हमारा तो मानना है, राम जी तो आएंगे ही, साथ ही साथ हनुमान जी भी चले आएंगे। हमने कहीं पढ़ा है ;
एकै साधे सब सधे।
सब साधे, सब जाय।।
ईश्वर का बाल स्वरूप भी होता है, और हर बाल शिशु ईश्वर स्वरूप ही होता है।
बच्चों की बाल लीला और ईश्वर की लीला में कोई भेद नहीं होता। सूरदास ने अगर प्रज्ञाचक्षु होते हुए श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं का सजीव चित्रण किया तो रामचरितमानस में तुलसीदास जी ने भी मर्यादा पुरुषोत्तम प्रभु श्रीराम की बाल लीलाओं का अलौकिक वर्णन किया ;
ठुमक चलत
ठुमक चलत रामचंद्र
ठुमक चलत रामचंद्र, बाजत पैंजनियां ….।।
सीताजी की बाल लीलाओं के बारे में हमने बहुत कम पढ़ा अथवा जाना है। हां लेकिन लोकगीतों में सीताजी की भी बाल लीलाओं का वर्णन भक्तों और कवियों ने अवश्य किया होगा।।
हम ना तो मैथिलीशरण हैं और ना ही सियारामशरण, लेकिन फिर भी आज से दो वर्ष पूर्व हमारे जीवन में एक तीन माह की बालिका का प्रवेश हुआ, जिसके पालकों ने उस बच्ची का नाम सिया रख दिया। कहते रहें शेक्सपीयर, नाम में क्या रखा है, लेकिन अगर इस बच्ची का नाम सिया नहीं होता, हो शायद यह अभी अभी भी यहां नहीं होता।
हम तो नाम की महिमा से भलीभांति परिचित हैं, और इसी सिया को हमारा आज का यह अभी अभी समर्पित है।
पास के ही तो फ्लैट में सिया का जन्म हुआ था। गोद में थी, तब से उसके दादा दादी के साथ हमारे घर आती थी। वैसे सिया से नैन तो हमारे तब से ही मिल गए थे, लेकिन आज हम आपस में बहुत घुल मिल गए हैं।।
व्यावहारिक जगत में हमारे संगी साथी भी होते हैं और इष्ट मित्र भी। क्या आपका इष्ट भी आपका मित्र हो सकता है ? श्रीकृष्ण अर्जुन के सारथी भी थे और सखा भी। जब कि श्रीकृष्ण सुदामा के मित्र भी थे और इष्ट भी। इसी तरह सिया हमारी इष्ट भी है और मित्र भी। जहां मित्रवत व्यवहार होता है, वहां उम्र बीच में नहीं आती।
सिया को देखकर हमें बिहारी का यह दोहा याद आ गया ;
कहत नटत रीझत खिझत मिलत खिलत लजियात।
भरे भोन में करत है
नैननु हि सब बात।।
शब्द वही हैं लेकिन यहां हमारी सिया की, कृष्ण की तरह यह बाल लीला है। चितवन शब्द हमने सिर्फ सुना ही था, लेकिन सिया हमें साक्षात् हमें उस चित्त के वन में ले गई, जिसे आप चाहें तो भुवन भी कह सकते हैं। हमारी सिया नजरें मिलाते ही नज़र फेर लेती है, क्योंकि उसकी निगाहें तो पूरी सृष्टि पर ही टिकी हुई है। बाल स्वरूप में सिया पूरे ब्रह्माण्ड को निहार रही है, और उसी बीच उसकी हम पर भी कृपा हो गई।।
आसक्ति और भक्ति का अगर मिला जुला विराट स्वरूप देखना हो तो बस किसी बाल गोपाल अथवा कन्या से एक बार आँखें चार कर लो। प्रज्ञाचक्षु सूरदास जी ने जो बंद आंखों से पाया, क्या हम आंख रहते नहीं महसूस कर सकते।
बच्चे ईश्वर का ही रूप होते हैं, यह जानते हुए भी हम यह सुअवसर खो देते हैं।
हम इतने नादान नहीं, हमारे पास अखिल ब्रह्माण्ड आज बाल रूप में, सिया बनकर उपस्थित है। यह स्वर्ण अवसर हम हाथ से कैसे जाने दे सकते हैं।
हनुमान जी के लिए सीता जी माता थी, हमारे लिए सीताजी का यह बाल रूप सिया बनकर प्रकट हुआ है। हमारे तो भाग जाग गए तो फिर हम क्यों ना कहें,
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “जीरावन…“।)
अभी अभी # 749⇒ आलेख – जीरावन श्री प्रदीप शर्मा
जीवन है मधुवन ! मैं कभी मधुवन गया नहीं। बचपन में मेरी अधिकतर जानकारी सोच पर ही आधारित होती थी। बालमन सोचता था, जहां अधिक मधु होगा, उसे मधुवन कहते होंगे। जहां आग होती है, वहां धुआं होता है, जहां मधु होता है, वहां मधुमक्खी भी होती ही होगी।
जब मैं मधुवन में राधिका नाचे रे, वाला गीत सुनता था, तब मुझे चिंता हो जाती थी कि कहीं राधिका के नाचने से अथवा गिरधर की मुरलिया के बजने से कोई मधुमक्खी मगन होने के बजाय विचलित ना हो जाए। समय के साथ मेरा ढाई आखर का ज्ञान विकसित होता चला गया और मैं मधुवन का सही अर्थ भी जान गया। फूल, पराग और खुशबू वाला भी मधुवन ही होता है। अब यह गीत मैं आराम से रस लेकर सुनता हूं। मेरे पास मधुमक्खी तो क्या, कोई मक्खी भी नहीं फटकती।।
बचपन से हम नमक और मिर्ची का नाम तो सुनते आ रहे थे, बोर, जाम, जामुन में नमक मिर्ची लगाते भी आ रहे थे। मां की मसालदानी में जीरा भी होता था, जो बघार में भी डाला जाता था, लेकिन जीरे की उत्पत्ति के बारे में इतना ज्ञान नहीं था। चने के खेत जैसा कोई गीत जीरे के बारे में हमने नहीं सुना।
जब मधुवन की तरह ही जब हमने जीरावन शब्द सुना तो हमें यही लगा, जीरे के वन की ही शायद जीरावन कहते हों। आप चाहें तो कह सकते हैं, बंदर क्या जाने जीरावन का स्वाद। लेकिन जब एक बार जीरावन का स्वाद मुंह को क्या लगा, हमें इस शब्द का वास्तविक अर्थ भी पता चल गया। जीरा क्या जी, सभी स्वादिष्ट चटपटे मसालों का वन है जीरावन।।
घर में अचार नहीं हो, नींबू नहीं हो, सब्जी नहीं हो, कोई चिंता नहीं। बस अगर घर में जीरावन हो तो काम बन जाता है। वैसे पसंद अपनी अपनी। हमें ना तो कोई गरम मसाला रास आता, और ना ही कोई चाट मसाला। जीरावन में गुण भी बहुत है, और स्वाद भी।
भले ही हींग और फिटकरी में कोई सांठगांठ हो, लेकिन रसोई में तो हींग जीरे का ही राज होता है। जीरे की खेती मुख्य रूप से गुजरात के ऊंझा क्षेत्र में और राजस्थान में ही अधिक होती है। और जहां तक जीरावन का सवाल है, आपको आश्चर्य होगा, राजस्थान का प्रतापगढ़ जीरावन का गढ़ है।।
जीरावन में वैसे कोई हीरे मोती तो जड़े नहीं होते। बस जीरा, सूखा धनिया, काला नमक, लाल मिर्ची, हींग और अमचूर ही तो होता है। आप चाहें तो घर में भी बना लें। वैसे जैनियों की दादावाड़ी में कहीं कहीं आपको केसर के साथ जीरावन भी नज़र आ जाएगा।
सात्विक आहार के भी अपने ठाठ हैं। उसे भी राजसी और तामसी बनाने के तरीके हमें आते हैं।
वैसे भी प्याज लहसुन नहीं होने के बावजूद यह स्वादिष्ट है। हमारा तो घर में ही, जीवन है मधुवन, क्योंकि हमारे पास है, नंबर वन जीरावन।।
(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” आज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)
☆ आलेख # 141 ☆ देश-परदेश – जंग, मोहब्बत और तिजारत में सब जायज़ है ☆ श्री राकेश कुमार ☆
पुरानी कहावत हुआ करती थी, कि प्यार और युद्ध में सब चलता हैं। इसमें कुछ समय से व्यापार भी जुड़ गया हैं। वो समय और था, जब व्यापार में नैतिकता पर ज़ोर रहता था।
बचपन में एक कहानी सुनी थी, कि एक व्यक्ति दस रुपए में तोता बेच रहा था, जबकि अन्य लोग बीस रुपए में तोता बेच रहे थे। दस रुपए में तोता बेचने वाला पक्षी का पिंजरा बहुत महंगा बेच रहा था। बिना पिंजरे के तोता तो खरीदा नहीं जा सकता हैं। कुल मिला कर सस्ते तोता बेचने वाला अधिक लाभ कमा रहा हैं।
सत्तर के दशक में सरकारी राशन की दुकान पर सस्ती चीनी की बिक्री होती थी। राशन विक्रेता चीनी की बिक्री के साथ गेहूं भी जबरदस्ती बेचता था।
आज भी हमारे मोहल्ले में सरकारी डेयरी का दूध विक्रेता इस बात से नाराज़ रहता है, कि ब्रेड, मक्खन आदि दूसरी दुकान से क्यों खरीदते हो? जबकि दूध कियोस्क से अन्य सामान बेचना अनधिकृत हैं।
उपभोक्ता हमेशा किसी ना किसी रूप में दबाया जाता रहा हैं। कस्टमर हमेशा कष्ट से ही मरता हैं। देश में उपभोक्ता सरंक्षण के लिए बहुत सारी संस्थाएं कार्य कर रही हैं। इसके बावजूद भी ग्राहक कहीं ना कहीं मात खाता हैं।
विश्व व्यापार में भी बहुत सारी संस्थाएं हैं। मुक्त व्यापार से लेकर भुगतान के लिए अनेक देशों ने नए नए समूह भी बनाएं गए हैं। MRTP नियम भी बनाया गया हैं।इन सब के होते हुए आज भी तीसरी दुनिया देशों के हित सुरक्षित नहीं हैं।
बड़े देश बस हथियार, और विमान बनाकर अपना साम्राज्य चलाते हैं। छोटे देशों से कपड़े, घरेलू सामान आदि खरीदते हैं। विश्व व्यापार में कुछ देश स्वयंभू नेतागिरी भी करते है, अपने निजी हितों को साधते हुए अन्य देशों को अपने प्रभाव से तंग करने में लगें रहते हैं।
टीप : इस आलेख का वर्तमान में “पूंजीपति देशों के सिरमौर” द्वारा नए टैरिफ नियम लागू करने से कोई दूर दूर तक सम्बन्ध नहीं हैं।
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “कान, नाक, और गला…“।)
अभी अभी # 748⇒ आलेख – कान, नाक, और गला श्री प्रदीप शर्मा
(EAR, NOSE & THROAT)
हमारे शरीर के जितने भाग हैं, चिकित्सा की दुनिया में उसके उतने ही विभाग हैं। हर परिवार का एक चेहरा होता है, हमारे चेहरे का भी एक परिवार है, जहां निगरानी के लिए अगर आँखें हैं, तो सुनने, साँस लेने और गले मिलने के लिए कान, नाक और एक गला है। आँख के लिए अगर अलग से आई स्पेशलिस्ट है तो नाक, कान और गले, तीनों का भार, बेचारे अकेले ENT विशेषज्ञ पर है। अजीब सरकार है हमारी एनाटॉमी और फिजियोलॉजी की ! शरीर में ही पूरा मेडिकल कॉलेज खोल रखा है। नाक के नीचे मुंह है, जिसमें बत्तीस दांत हैं, अगर दांत में दर्द है तो यह मामला दंत विभाग का है, E N T का नहीं ! दंत विशेषज्ञ की सेवाएं लीजिए। सॉरी आंटी।
पर्दा आँख में भी होता है, और कान में भी। आँख के पर्दे को रेटीना और कान के पर्दे को ear drum कहते हैं। वैसे पर्दे घरों में, खिड़की दरवाजों में भी होते हैं। कोई पर्दे के पीछे से देखता है, तो कोई पर्दे के पीछे से सुनता है। दीवारों के भी जब कान हो सकते हैं, तो क्या कान के पर्दे नहीं हो सकते। जितना महत्व आंख के परदे का है, उतना ही महत्व कान के परदे का है। अधिक आवाज से कान के पर्दे फटने का अंदेशा रहता है।।
कान सुनने के लिए बने हैं और नाक सूंघने और साँस लेने के लिए। गला हमें धड़ से जोड़ता है। E N T यानी कान, नाक और गले को आप शरीर का 3BHK अपार्टमेंट भी कह सकते हैं, क्योंकि अंदर से ये तीनों अंग आपस में मिले हुए हैं। सर्दी जुकाम हुआ, तो गला भी खराब होना ही है। कान का दर्द भी किसी सरदर्द से कम नहीं। सरदर्द की तो कई गोलियाँ हैं, झंडू बाम है, कान के दर्द का इलाज या तो दादी मां के पास है या फिर किसी E N T के पास।
इस बार हमने कोरोना को मुंह नहीं लगाया। बार बार हाथ धोए, सैनिटाइज किया, गले का विशेष खयाल रखा। हल्दी, नमक और गिलोय हमारी संजीवनी बूटी रहे। मुंह पर मास्क रहा, हम जब भी घर से बाहर रहे। सोचिए, अगर हमारी नाक और कान नहीं होते तो कितनी परेशानी होती। नाक पर मक्खी ही नहीं, मास्क भी टिकता है और चश्मा भी। चश्मा चढ़ता तो आँख पर है, लेकिन उसको सहारा नाक और कान ही देते हैं। कुछ लोग आज भी कान पर जनेऊ चढ़ाते हैं।
श्रृंगार के क्षेत्र में भी महिलाओं का प्रिय विभाग कान, नाक और गला ही है।
दांत के दर्द में अगर लौंग रामबाण नुस्खा है, तो महिलाओं की नाक पर भी लौंग विराजमान होती है। कहीं कहीं इसे नथ भी कहा जाता है। कान नहीं होते तो कर्ण श्रृंगार कैसे होता। झुमका बरैली वाला हो या कान के टॉप्स अथवा इयररिंग, कान, सुनसान अच्छा नहीं लगता। श्रृंगार में क्या कभी गला पीछे रहा है।
हीरे मोतियों की माला हो, मंगलसूत्र हो अथवा नौलखा हार, नारियों की पसंद का उपहार, हार ही तो होता है। प्रेयसी हो या पत्नी, दिल जीतने के लिए गले के हार से बेहतर कोई विकल्प नहीं।
हम कभी कान के कच्चे ना हों, कभी हमारी नाक नीची ना हो, गला सुरीला हो, नाक, कान और गले की बीमारियों से अपना बचाव करते हुए, अच्छा संगीत सुनें, अपने आसपास के वातावरण को शुद्ध और सुगंधित बनाए रखें। गला काट स्पर्धा से दूर रहें। सबका हो भला, हमेशा निरोग रहे, कान, नाक गला।।
गोरखपुर, उत्तर प्रदेश की निवासी लेखका व कवयित्री अभिलाषा श्रीवास्तव जी एक प्रेरणादायक महिला हैं। साहित्य की सेवा में निरंतर रत | आपको 2024 में अंतरराष्ट्रीय महिला सम्मान पत्र से नवाजा गया। विशेष सम्मान : एक्सीलेंट कवयित्री अवार्ड से सम्मानित तथा पुरस्कृत |उनके द्वारा संवाद टीवी पर फाग प्रसारण में प्रस्तुत किया गया और विभिन्न राज्यों के प्रमुख अखबारों व पत्रिकाओं में उनकी कविता, कहानी और आलेख प्रकाशित हो चुके हैं। उनकी लेखनी में समाज के प्रति संवेदनशीलता और सृजनात्मकता का सुंदर संगम देखने को मिलता है।
☆ आलेख ☆ सुसज्जित फूल ☆ श्रीमति अभिलाषा श्रीवास्तव ☆
स्त्रियों की वजूद बिलकुल गेदें के फूल के हिसाब जैसा है, वक़्त पड़े तो औषधि बन जाती हैं तो कभी साज्ज सज्जा में लिप्त नज़र आती है। बड़ा मोहक है यह गेंदें का फूल!
‘तोरण बन दरवाजे पर लटक के लक्ष्मी आगमन की सुगंध बन बिखर जाती हैं तो कभी शिव के थाली में सुज्जित होकर मंदिरों में चढ़ जाती हैं।
अक्सर आसानी से खिल जाता यह गेंदें का फूल। मिट्टी ही तो चाहिए इसे पनपने के लिए और थोडी सी देखभाल फिर आंगन में खडी़ खुद ही सबकों मोहित कर देता है यह गेंदें का फूल।
भींगी भींगी खुशबु से परिपूर्ण पीले रंग की अत्यंत मनभावन किंतु भावनाओं से परिपूर्ण होती है ।
कहते हैं, गेंदें का फूल जहाँ खिलाता हैं वहां खुशियाँ इक़ट्ठा करती तभी तो तस्वीर या दरवाजे पे बैठीं पुरनिया स्त्री नज़र कवच सा बन लिपटी मोह माया के धागों से पिरोने के बाद अथाह अपनत्व के पीड़ा में डूबीं केवल संवेदना को छुपाई मौन नज़र आती है लेकिन कमब्खत उफ्फ्फ तक नहीं करतीं ।
गेंदें के इस फूल को आंगन में लाने के बाद पुरुषों ने मन के हिसाब से उपयोग किया क्योंकि गुलाब की तरह उसनें मुहब्बत की मांग जो नहीं रखीं बस ताउम्र मौन उपलब्धि दर्ज करातीं अपने भाग्य के भरोसे बैठीं थोड़ी सी मिट्टीसे परिपूर्णता दर्शाती रही।
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “घराना…“।)
अभी अभी # 747 ⇒ आलेख – ∆ घराना ∆ श्री प्रदीप शर्मा
मेरा नाम राजू, घराना अनाम,
बहतीहै गंगा, जहां मेरा धाम …
लेकिन सभी जानते हैं, कपूर खानदान के इस चिराग का भी एक सेमी क्लासिकल फिल्म संगीत का घराना था, जिसमें शंकर जयकिशन, शैलेंद्र हसरत और मुकेश ने मिलकर जो गीतों की बरसात शुरू की थी, उसने मेरा नाम जोकर तक थकने का नाम नहीं लिया था। और जहां तक नाम का सवाल है, तो पृथ्वी थिएटर से शुरू इस कपूर परिवार के अभिनय का करिश्मा आज भी कायम है।
घराना गर्व और गौरव का विषय है, अच्छे घराने की बहू के लिए ही गृह लक्ष्मी जैसे विशेषणों का प्रयोग किया जाता था। राजघरानों में आज हम भले ही केवल होलकर और सिंधिया राजघरानों तक ही सिमटकर रह गए हों, लेकिन शास्त्रीय संगीत के घरानों की बात तो कुछ और ही है।।
नृत्य और संगीत हमें स्वर्ग की नहीं, गंधर्व लोक की देन हैं, सवाई गंधर्व और कुमार गंधर्व इनके प्रत्यक्ष प्रमाण हैं। आप मानें या ना मानें, संगीत के घरानों और राजघरानों का आपसी संबंध बहुत पुराना है। आइए कुछ संगीत घरानों की चर्चा करें।
भारतीय शास्त्रीय संगीत और नृत्य की वह परंपरा है जो एक ही श्रेणी की कला को कुछ विशेषताओं के कारण दो या अनेक उप श्रेणियों में बाँटती है।।
घराना (परिवार, कुटुंब), हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत की विशिष्ट शैली है, क्योंकि हिंदुस्तानी संगीत बहुत विशाल भौगोलिक क्षेत्र में विस्तृत है, कालांतर में इसमें अनेक भाषाई तथा शैलीगत बदलाव आए हैं। घराना शब्द हिंदी शब्द ‘घर’ से आया है जिसका अर्थ है ‘घर’। यह आमतौर पर उस स्थान को संदर्भित करता है जहां संगीत विचारधारा की उत्पत्ति हुई; उदाहरण के लिए, ख्याल गायन के लिए प्रसिद्ध कुछ घराने हैं: दिल्ली, आगरा, ग्वालियर, इंदौर, अतरौली-जयपुर, किराना और पटियाला।
इसके अलावा शास्त्रीय संगीत की गुरु-शिष्य परंपरा में प्रत्येक गुरु व उस्ताद अपने हाव-भाव अपने शिष्यों की जमात को देता जाता है। घराना किसी क्षेत्र विशेष का प्रतीक होने के अलावा, व्यक्तिगत आदतों की पहचान बन गया है, यह परंपरा ज़्यादातर संगीत शिक्षा के पारंपरिक तरीके तथा संचार सुविधाओं के अभाव के कारण फली-फूली, क्योंकि इन परिस्थितियों में शिष्यों की पहुँच संगीत की अन्य शैलियों तक बन नहीं पाती थी।
हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत के गायन के लिये प्रसिद्ध घरानों में से निम्न घराने शामिल होते हैं: आगरा, ग्वालियर, इंदौर, जयपुर, किराना, और पटियाला।
सबसे पुराना ग्वालियर घराना है। तानसेन भी ग्वालियर से ही आए थे। हस्सू हद्दू खाँ के दादा नत्थन पीरबख्श को इस घराने का जन्मदाता कहा जाता है। दिल्ली के राजा ने इनको अपने पास बुला लिया था।।
जरा इन गायकों और उनके घरानों पर भी गौर कर लिया जाए ;
१. मेवाती घराना पंडित जसराज
२.पटियाला घराना; उस्ताद बड़े गुलाम अली खां, बेगम अख्तर, निर्मला देवी और परवीन सुल्ताना
३. जयपुर अंतरौली घराना ; मल्लिकार्जुन मंसूर, किशोरी अमोनकर और अश्विनी भिड़े।
४. भीमसेन जोशी किराना घराना,
५. आगरा घराना जितेंद्र अभिषेकी
इन घरानों की शुद्धता, मर्यादा और अनुशासन का पालन शिष्यों को भी करना पड़ता है। गुरु शिष्य परम्परा यूं ही फलीभूत नहीं होती। ना मिलावट ना खोट यही शास्त्रीय संगीत की पहचान है। एक भी सुर गलत नहीं।
धारवाड़, कर्नाटक से आए, घराने की बंदिश से अपने को मुक्त रखते हुए, लोक संगीत को शास्त्रीय संगीत की ऊंचाईयों तक पहुंचाने वाले कुमार गंधर्व स्वयं अपने आपमें एक घराना हैं।।
(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के लेखक श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही गंभीर लेखन। शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है। साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको पाठकों का आशातीत प्रतिसाद मिला है।”
हम प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है इस शृंखला की अगली कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों के माध्यम से हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)
☆ संजय उवाच # 300 ☆ शिवोऽहम्…(3)
निर्वाण षटकम् का हर शब्द मनुष्य के अस्तित्व पर हुए सारे अनुसंधानों से आगे की यात्रा कराता है। इसका सार मनुष्य को स्थूल और सूक्ष्म की अवधारणा के परे ले जाकर ऐसे स्थान पर खड़ा कर देता है जहाँ ओर से छोर तक केवल शुद्ध चैतन्य है। वस्तुत: लौकिक अनुभूति की सीमाएँ जहाँ समाप्त होती हैं, वहाँ से निर्वाण षटकम् जन्म लेता है।
तृतीय श्लोक के रूप में जगद्गुरु आदि शंकराचार्य का परिचय और विस्तृत होता है-
न मे द्वेषरागौ न मे लोभमोहौ
मदो नैव मे नैव मात्सर्यभाव:
न धर्मो न चार्थो न कामो न मोक्ष:
चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम्।।3।।
अर्थात न मुझे द्वेष है, न ही अनुराग। न मुझे लोभ है, न ही मोह। न मुझे अहंकार है, न ही मत्सर या ईर्ष्या की भावना। मैं धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष से परे हूँ। मैं सदा शुद्ध आनंदमय चेतन हूँ, मैं शिव हूँ , मैं शिव हूँ।
राग मनुष्य को बाँधता है जबकि द्वेष दूरियाँ उत्पन्न करता है। राग-द्वेष चुंबक के दो विपरीत ध्रुव हैं। चुंबक का अपना चुंबकीय क्षेत्र है। अनेक लोग, समान और विपरीत ध्रुवों के निकट आने से उपजने वाले क्रमश: विकर्षण और आकर्षण तक ही अपना जीवन सीमित कर लेते हैं। यह मनुष्य की क्षमताओं की शोकांतिका है।
इसी तरह मोह ऐसा खूँटा होता है जिससे मनुष्य पहले स्वयं को बाँधता है और फिर मोह मनुष्य को बाँध लेता है। लोभ मनुष्य को सीढ़ी दर सीढ़ी मनुष्यता से नीचे उतारता जाता है। इनसे मुक्त हो पाना लौकिक से अलौकिक होने, तमो गुण से वाया रजो गुण, वाया सतो गुण, गुणातीत होने की यात्रा है।
एक दृष्टांत स्मरण हो आ रहा है। संन्यासी गुरुजी का एक नया-नया शिष्य बना। गुरुजी दैनिक भ्रमण पर निकलते तो उसे भी साथ रखते। कोई न कोई शिक्षा भी देते। आज भी मार्ग में गुरुजी शिष्य को अपरिग्रह की शिक्षा देते चल रहे थे। संन्यास और संचय का विरोधाभास समझा रहे थे। तभी शिष्य ने देखा कि गुरुजी एक छोटे-से गड्ढे के पास रुक गये, मानो गड्ढे में कुछ देख लिया हो। अब गुरुजी ने हाथ से मिट्टी उठा-उठाकर उस गड्ढे को भरना शुरू कर दिया। शिष्य ने झाँककर देखा तो पाया कि गड्ढे में कुछ स्वर्णमुद्राएँ पड़ी हैं और गुरुजी उन्हें मिट्टी से दबा रहे हैं। शिष्य के मन में विचार उठा कि अपरिग्रह की शिक्षा देनेवाले गुरुजी के मन में स्वर्णमुद्राओं को सुरक्षित रखने का विचार क्यों उठा? शिष्य का प्रश्न गुरुजी पढ़ चुके थे। हँसकर बोले, “पीछे आनेवाले किसी पथिक का मन न डोल जाए, इसलिए मैं मिट्टी पर मिट्टी डाल रहा हूँ।”
मिट्टी पर मिट्टी डालने की लौकिक गतिविधि में निहितार्थ गुणातीत होने की अलौकिकता है।
गतिविधि के संदर्भ में देखें तो धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष जीवन के चार पुरुषार्थ हैं। इनमें से हर पुरुषार्थ की विवेचना अनेक खंडों के कम से कम एक ग्रंथ की मांग करती है। यदि इनके प्रचलित सामान्य अर्थ तक ही सीमित रहकर भी विचार करें तो धर्म, अर्थ, काम या मोक्ष की लालसा न करना याने इन सब से ऊपर उठकर भीतर विशुद्ध भाव जगना। ‘विशुद्ध’, शब्द लिखना क्षण भर का काम है, विशुद्ध होना जन्म-जन्मांतर की तपस्या का परिणाम है।
परिणाम कहता है कि तुम अनादि हो पर आदि होकर रह जाते हो। तुम अनंत हो पर अपने अंत का साधन स्वयं जुटाते हो। तुम असीम हो पर तन और मन की सीमाओं में बँधे रहना चाहते हो। तुम असंतोष और क्षोभ ओढ़ते हो जबकि तुम परम आनंद हो।
राग, द्वेष, लोभ, मोह, मद, मत्सर, धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष इन सब से हटकर अपने अस्तित्व पर ध्यान केंद्रित करो। तुम अनुभव करोगे अपना अनादि रूप, अनुभूति होगी अंतर्निहित ईश्वरीय अंश की, अपने भीतर के चेतन तत्व की। तब शव होने की आशंका समाप्त होने लगेगी, बचेगी केवल संभावना, जो प्रति पल कहेगी ‘शिवोऽहम्।’
अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆
मोबाइल– 9890122603
संजयउवाच@डाटामेल.भारत
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☆ आपदां अपहर्तारं ☆
श्रावण साधना रविवार ११ जुलाई 2025 से रक्षाबंधन तदनुसार शनिवार 9 अगस्त तक चलेगी।
इस साधना में ॐ नमः शिवाय का मालाजप होगासाथ ही गोस्वामी तुलसीदास रचित रुद्राष्टकम् का पाठ भी करेंगे।
101 से अधिक मालाजप करने वाले महासाधक कहलाएंगे
संभव हो तो परिवार के अन्य सदस्यों को भी इससे जोड़ें
अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं।
≈ संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “नि गु रा…“।)
अभी अभी # 746 ⇒ आलेख – नि गु रा श्री प्रदीप शर्मा
गुरु बिन कौन करे भव पारा !
जय हनुमान ज्ञान गुण सागर ..
हमारे देश में आदमी अनपढ़, अशिक्षित रह सकता है, लेकिन बिना गुरु के नहीं रह सकता। इतने जगतगुरु, साधु संत, महात्मा, शिक्षक, प्रोफेसर,
विद्वान, आचार्य, ज्योतिष, योग, आर्युवेद, महंत, और महामंडलेश्वर के रहते, भला कोई निगुरा कैसे रह सकता है। जिस देश में लोगों का तकिया कलाम ही गुरु हो, कोई महागुरु और कोई गुरु घंटाल हो, वहां गुरुओं की क्या कमी। गुरु, इसी बात पर ठोको ताली।
गुरु से बचना इतना आसान भी नहीं ! पहले गुरु तो माता पिता ही होते हैं। अब आप अजन्मे तो नहीं रह सकते। आप पालने में पड़े हो और किसी ज्योतिष गुरु ने आपका नामकरण भी कर दिया। घर में भवानीप्रसाद, और ज्वालाप्रसाद तो पहले से ही मौजूद थे, आप हो गए गुरुप्रसाद। लाड़ प्यार में नाम बनता बिगड़ता रहता है, किसी के लिए गुड्डू, तो किसी के लिए गुल्लू। गुरु कृपा से अच्छे पढ़ लिख लिए, तो बड़े होकर कॉलेज में आप प्रोफेसर जी.पी.दुबे कहलाने लगे। यथा नाम तथा गुण।।
गुरु बिन ज्ञान कहां से पाऊँ ! द्रोणाचार्य और शुक्राचार्य। मैं इधर जाऊँ या उधर जाऊँ, या फिर निगुरा ही रह जाऊँ। जो आपको जीवन के गुर सिखलाए, वह गुरु। वैसे भी गुरु को तो गुड़ ही रहना है, शक्कर तो चेले ही बनते हैं। जीवन में मिठास जरूरी है। या तो गुड़ बन जाएं, या फिर शक्कर। वैसे आप गुरु करें ना करें, आपकी मर्जी। लेकिन किसी ज्योतिष गुरु के कहने पर गुरुवार करने में क्या हर्ज है। जिन लोगों का गुरु कमज़ोर होता है, वे किसी उस्ताद की शरण में जाते हैं। गुरुवार तो वैसे भी हर हफ्ते आता ही रहेगा।
एक समय था, जब शहर में हर गुरुवार को सिनेमा घरों में नई पिक्चर लगती थी। व्यापारी अपनी दुकानें बंद रखते थे। गुरुवार अब भी आता है, लेकिन क्या करें, सिनेमागृहों की गृह दशा ही खराब चल रही है। व्यापारी भी गुरुवार की जगह संडे मनाने लग गए।।
संत कबीर बड़े ज्ञानी थे, गुरु ग्रंथ साहब तक में उनका जिक्र है, फिर भी वे निगुरे नहीं रह सके। उन्हें भी गुरु रामानंद की शरण में जाना ही पड़ा। दत्तात्रय तो भगवान थे, लेकिन उनके भी एक दो नहीं चौबीस गुरु थे। उन्हें सृष्टि के जिस जीव में गुण नजर आते, वे उसे गुरु रूप में स्वीकार कर लेते। जो हमें सीख दे, वही गुरु, वही शिक्षक और वही सदगुरु। अगर हम अपना सबक ठीक से याद नहीं करें, तो इसमें गुरु का क्या दोष।
आखिर गुरु को बाहर क्यूं ढूंढा जाए जब हमारे अंदर ही ब्रह्मांड समाया हुआ है। और लोग अंतर्गुरु तलाशने पहले ओशो, कृष्णमूर्ति और महर्षि रमण की शरण में गए लेकिन जब बात नहीं बनी तो जग्गी वासुदेव का दामन थाम लिया। श्री श्रीरविशंकर और योगगुरु बाबा रामदेव अपने अपने सुदर्शन चक्र चला ही रहे हैं, बचकर कहां जाओगे।।
एक तरफ कुआं, एक तरफ खाई ! इन निगुरों के बीच यह वामपंथी कहां से आ टपका भाई ? ब्रिटिश चैनल से बड़ी हमारे देश में आस्था और संस्कार की चैनल है। यहां 24 x 7 संत महात्माओं, साधुओं और परम हंसों का जमघट लगा रहता है। चित्रकूट के घाट से कम नहीं यह सत्संग और स्वाध्याय की चौपाटी। रामकथा, भागवत और शिव पुराण। कभी मोरारी बापू तो कभी रमेश भाई ओझा। दान पुण्य और गऊ सेवा का पुण्य अलग।
जो भी भक्त है, उसका अपना भगवान है। शिष्य का अपना गुरु है। बाकी सब स्वयं ही गुरु हैं। अहं ब्रह्मास्मि ! बस इस देश में वामपंथी ही निगुरे हैं। निगुरे नहीं, विश्व गुरु हैं हम।।
☆ स्मृति शेष प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव विदग्ध.. गीता को जीते हुये, बिदा हुए साहित्यकार☆ प्रो. (डॉ.) शरद नारायण खरे ☆
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(गुरुवर स्मृति शेष प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव विदग्ध जी द्वारा ई–अभिव्यक्ति में सतत ‘काव्य धारा’ साप्ताहिक स्तम्भ के माध्यम से अब तक २३२ रचनाएँ प्रकाशित की जा चुकी हैं. उनके सुपुत्र श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव, सम्पादक ई-अभिव्यक्ति (हिंदी) के सहयोग से इस स्तम्भ को अगले सप्ताह से पुनः प्रारम्भ करने का मानस है.)
भगवत गीता के उनके द्वारा किये गये हिन्दी काव्य अनुवाद का पांचवा संस्करण प्रकाशित हुआ है. महाकवि कालिदास के रघुवंश, मेघदूत का भी उन्होने हिन्दी में श्लोकशः अनुवाद कर इन अप्रतिम ग्रंथो को संस्कृत न जानने वाले पाठको के लिये भी काव्य के उसी सौंदर्य के संग सुलभ कर दिया है. वे एक सिद्धांतो के पक्के, अपनी धुन में रमें हुये सहज सरल व्यक्ति थे.
जन्म… मण्डला में गौड़ राजाओ के दीवानी कार्यो हेतु मूलतः मुगलसराय के पास सिकंदरसराय से मण्डला आये हुये कायस्थ परिवार में प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव “विदग्ध” का जन्म सन १९२७ में हुआ था. उन्होंने विकास के बड़े लम्बे आयाम देखे हैं, मण्डला में ही नेरो गेज से ब्राड गेज रेल्वे के वे साक्षी हैं. आज वे दुबई, श्रीलंका, आदि हवाई विदेश यात्रायें कर रहे हैं और कहां उन्होने लालटेन की रोशनी में पढ़ा, पढ़ाया है. स्वतंत्रता के आंदोलन में छात्र जीवन में सहभागिता की है. मण्डला के अमर शहीद उदय चंद जैन उनकी ही डेस्क पर बैठने वाले उनके सहपाठी थे..
व्यवसाय… वे केंद्रीय विद्यालय क्रमांक १ जबलपुर के संस्थापक प्राचार्य रहे. शिक्षा विभाग में दीर्घ कालीन सेवाये देते हुये प्रांतीय शासकीय शिक्षण महाविद्यालय जबलपुर से प्राध्यापक के रूप में सेवानिवृत हुये. उस पुराने जमाने में उनका विवाह लखनऊ में हुआ था. इतनी दूर शादी, मण्डला जैसे पिछड़े क्षेत्र में सहज बात नही थी. फिर पत्नी ने नौकरी भी की. यह तो मुहल्ले के लिये अजूबा ही रहा होगा.
साहित्य सेवा… १९४८ में सरस्वती पत्रिका में उन की पहली रचना प्रकाशित हुई. निरंतर पत्र पत्रिकाओ में कविताये, लेख, छपते रहे हैं. आकाशवाणी व दूरदर्शन से अनेक प्रसारण होते रहे हैं. दूरदर्शन भोपाल ने “एक व्यक्तित्व ऐसा ” नाम से उन पर फ़िल्म बनाई है । दिल्ली से ट्रू मीडिया ने उन पर केंद्रित विशेषांक प्रकाशित किया।
पुस्तकें… ईशाराधन, वतन को नमन, अनुगुंजन, नैतिक कथाये, आदर्श भाषण कला, कर्म भूमि के लिये बलिदान, जनसेवा, अंधा और लंगड़ा, मुक्तक संग्रह, अंतर्ध्वनि, समाजोपयोगी उत्पादक कार्य, शिक्षण में नवाचार मानस के मोती, अनुभूति, रघुवंश हिंदी भावानुवाद, भगवत गीता हिंदी काव्य अनुवाद, मेघदूतम, शब्दधारा आदि साहित्यिक व शैक्षिक ४० से ज्यादा किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं.
वे संस्कृत से हिन्दी भावानुवाद के मर्मज्ञ थे. महाकवि कालिदास के अमर प्रेम काव्य मेघदूत के सारे श्लोक उन्होने यथा भाव छंद बद्ध हिन्दी कविता में रचे जो पुस्तक रूप में प्रकाशित हैं. इसी तरह कालिदास कृत रघुवंशम के समस्त १९०० श्लोको का श्रमसाध्य छंद बद्ध हिन्दी अनुवाद भी उन्होने किया है यह भी पुस्तक रूप में सुलभ है. देशबन्धु समाचार पत्र ने इसे तथा उनके द्वारा अनुवादित भगवत गीता को धारावाहिक रूप से प्रकाशित भी किया है.
वे बाल साहित्य व राष्ट्रीय भावधारा की कविताओ के साथ ही भक्ति गीतों, समसामयिक घटनाओ पर त्वरित कविताओ और हिन्दी गजलो के लिये भी पहचाने जाते थे.
उनकी अनेकानेक कविताओ में से दो एक यहाँ उधृत हैं….
बाल साहित्य…
*
भारत हमें है प्यारा यह देश है हमारा
हम इसकी करें सेवा इसका हमें सहारा
इसकी जमीन मां की गोदी सी है सुहानी
फल अन्न इसके मीठे अमृत सा इसका पानी
इस भूमि पर ही कभी राम कृष्ण आए
गुणगान जिनके अब तक जाते सदा सुनाएं
यहां देवगिरी हिमालय सरिता पुनीत गंगा
इनकी यशों की गाथा गाता है नित तिरंगा
या
राष्ट्रीय भाव धारा की रचना…
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हिमगिरि शोभित सागर सेवित
सुखदा गुणमय गरिमा वाली
सस्य श्यामला शांति दायिनी
परम विशाला वैभवशाली ॥
*
प्राकृत पावन पुण्य पुरातन
सतत नीती नय नेह प्रकाशिनि
सत्य बन्धुता समता करुणा
स्वतंत्रता शुचिता अभिलाषिणि ॥
*
ज्ञानमयी युग बोध दायिनी
बहु भाषा भाषिणि सन्मानी
हम सबकी माँ भारत माता
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भक्ति रचनायें…
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दर्शन के लिये, पूजन के लिये, जगदम्बा के दरबार चलो
मन में श्रद्धा विश्वास लिये, मां का करते जयकार चलो !!
जय जगदम्बे, जयजगदम्बे !!
है डगर कठिन देवालय की, माँ पथ मेरा आसान करो
मैं द्वार दिवाले तक पहुँचू, इतना मुझ पर एहसान करो !!
जय जगदम्बे, जयजगदम्बे !!
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उँचे पर्वत पर है मंदिर, अनुपम है छटा, छबि न्यारी है
नयनो से बरसती है करुणा, कहता हर एक पुजारी है !!
जय जगदम्बे, जयजगदम्बे !!
*
मां ज्योति तुम्हारे कलशों की, जीवन में जगाती उजियाला
हरयारी हरे जवारों की, करती शीतल दुख की ज्वाला !!
जय जगदम्बे, जयजगदम्बे !!
*
जगजननि माँ शेरावाली ! महिमा अनमोल तुम्हारी है
जिस पर करती तुम कृपा वही, जग में सुख का अधिकारी है !!
जय जगदम्बे, जयजगदम्बे !!
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तुम सबको देती हो खुशियाँ, सब भक्त यही बतलाते हैं
जो निर्मल मन से जाते हैं वे झोली भर वापस आते है !!
जय जगदम्बे, जयजगदम्बे !!
या
शुभवस्त्रे हंस वाहिनी वीण वादिनी शारदे,
डूबते संसार को अवलंब दे आधार दे !
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हो रही घर घर निरंतर आज धन की साधना,
स्वार्थ के चंदन अगरु से अर्चना आराधना
आत्म वंचित मन सशंकित विश्व बहुत उदास है,
चेतना जग की जगा मां वीण की झंकार दे !
*
सुविकसित विज्ञान ने तो की सुखों की सर्जना
बंद हो पाई न अब भी पर बमों की गर्जना
रक्त रंजित धरा पर फैला धुआं और और ध्वंस है
बचा मृग मारिचिका से, मनुज को माँ प्यार दे
थक गया चल विश्व, झुलसाती तपन की धूप में
हृदय को माँ ! पूर्णिमा सा, मधु भरा संसार दे
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उनके हिन्दी गीत देखें…
*
शारदी चांदनी सा धुला मन, जब पपीहा सा तुमको पुकारे
सावनी घन घटा से उमड़ते, स्वप्न से तुम यहां चले आना
प्राण के तार खुद झनझना के, याद की वीथिका खोल देंगे
नैन मन की मिली योजना से, चित्र सब कुछ स्वतः बोल देंगे
बात करते स्वतः बावरे से, प्रेम रंग में रंगे सांवरे से
वीण से गीत गुनगुनाते, स्वप्न से तुम यहां चले आना
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हिन्दी गजल…
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तुम्हारे संग जिये जो दिन भुलाये जा नहीं सकते
मगर मुश्किल तो ये है फिर से पाये जा नहीं सकते
कदम हर एक चलके साथ तुमने जो निभाया था
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दुखी मन से किसी को वे बताये जा नहीं सकते
चले हम राह में जब धूप थी तपती दोपहरी थी
सहे लू के थपेडे जो गिनाये जा नही सकते
लगाये ध्यान पढते पुस्तकें रातें बिताई गई
दुखद किस्से परिश्रम के सुनाये जा नहीं सकते
तुम्हारे नेह के व्यवहार फिर फिर याद आते है
दुखाकुल मन से जो सबको बताये जा नही सकते
बसी हैं कई प्रंसगो की सजल यादें नयन मन में
चटक हैं चित्र ऐसे जो मिटाये जा नही सकते
पर्यावरण, साफ सफाई अभियान, शिक्षा, रानी दुर्गावती, महाराणा प्रताप, सरदार पटेल, माँ नर्मदा, लगभग हर विषय पर उन्होने बड़ी प्रभावी गीत रचनायें की है.
गद्य पर भी उनका समान अधिकार है. उन्होने विविध विषयों पर ललित निबंध, चिंतन, मानस विषयक, स्त्री विमर्श व शैक्षिक शोध आलेख खूब लिखे हैं.
उनके दो एक आलेखों के उधृत अंश देखिये…
“धन सदा सुखदायी ही नहीं होता. अनुचित साधनों से धन की प्राप्ति नये संकट ले आती है. सुख सचमुच में धन प्राप्ति के लिए अंधी दौड़ में नहीं, प्रेम के निश्छल आदान-प्रदान में है. सहयोग और ईमानदारी में सुख के बीज छिपे होते हैं। परन्तु इस सचाई को भुलाकर नवीनता की चका-चौंध में जो गलत प्रयत्न धन पाने के लिए अपनाएँ जा रहे हैं उन्होंने जीवन की कठिनाइयाँ बढ़ा दी है। भारतीय संस्कृति में तप और त्याग का धार्मिक महत्व रहा है। इसी पवित्र भावना ने समाज को बाँधे रखा है और मन को बेलगाम होकर दौडऩे से रोके रखा है। किन्तु आज अन्य सभ्यताओं की देखा देखी भारतीय संस्कारों को तिलांजलि देकर लोगों ने बाह्य आकर्षणों में सुख की साध पाल ली है इससे ही समाज का नैतिक पतन हो रहा है. यदि हमें अपने देश को फिर से नैतिक रूप से स्वस्थ और समृद्ध बनाना है तो भारत भूमि की ही जलवायु की उपासना करनी होगी और युग की नवीनता को अपने कार्यक्रमों में उचित रूप से समायोजित करना होगा । बिना सदाचरण, निष्ठा और नैतिकता को अपनायें जीवन में वास्तविक सुख-शांति और समृद्धि असंभव है।”
या
जिसमें आत्मविश्वास प्रबल है उसकी विजय प्राय: सुनिश्चित होती है। कोई भी कार्य छोटा हो या बड़ा, सरल हो या कठिन काम करने वाले के मन में सफलता पाने का आत्मविश्वास होना बहुत जरूरी है। विश्व इतिहास के पन्ने, आत्मविश्वासी की विजयों से भरे पड़े हैं। क्षेत्र राजनीति का हो या विज्ञान का, व्यक्ति के आत्मविश्वास ने समस्याओं का सदा समाधान कराया है। चन्द्रगुप्त के आत्मविश्वास ने भारत में मौर्य साम्राज्य की स्थापना की। यूरोप में नेपोलियन बोनापार्ट की हर जीत का रहस्य उस का आत्मविश्वास ही था। विज्ञान के क्षेत्र में किसी भी नये आविष्कार के लिये वैज्ञानिकों की लगन, परिश्रम और सूझबूझ के साथ ही उनके आत्मविश्वास और धैर्य के बल पर ही सफलता प्राप्त होती है। आत्मविश्वासी वीरों ने ही हिमालय की सर्वोच्च ऊंची चोटी गौरीशंकर जिसे एवरेस्ट भी कहा जाता है तक पहुंचकर अपने अदम्य साहस का परिचय दिया है। आत्मविश्वास व्यक्ति को निडर, उत्साही और धैर्यवान बनाता है।
या
“नैतिक, चरित्रवान, कर्मनिष्ठ समाज तैयार करने के लिये सही शिक्षा की आवश्यकता है. शालाओं और परिवार दोनो की बच्चो में सही गुणो के विकास की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी होती है. वर्तमान में जो आर्थिक तथा सामाजिक परिस्थितियां हैं वे इस दिशा में परिवर्तन चाहती हैं. सबके सही व्यक्तित्व के निर्माण की आवश्यकता है. राष्ट्रीय चरित्र में इसी से स्थाई सुधार संभव होगा. आत्म अनुशासन ही समाज में स्थाई सुख और शांति का श्रोत है. समाज में नैतिकता का सम्मान अतिआवश्यक है, और यह सब ऐसे बाल साहित्य की जरूरत प्रतिपादित करता है जो शिशु शिक्षा से प्रारंभ व्यक्तित्व निर्माण, किशोर, युवा, व इस तरह एक आत्म अनुशासित पीढ़ी का विकास कर सके.”
वे अपने परिवेश में सदैव साहित्यिक वातावरण सृजित करते रहे, जिस भी संस्थान में रहे वहां शैक्षणिक पत्रिका प्रकाशन, संपादन व साहित्यिक आयोजन करवाते रहे. उन्होने संस्कृत के व हिन्दी के प्रचार प्रसार के लिये राष्ट्र भाषा प्रचार समिति वर्धा, तथा बुल्ढ़ाना संस्कृत साहित्य मण्डल के साथ बहुत कार्य किये. अनेक पुस्तकालयो में लाखो की किताबें उन्होंने दान में दिया था.
गुप्त दान की अभिरुचि… प्रधानमंत्री सहायता कोष, उदयपुर के नारायण सेवा, तारांशु व अन्य संस्थानो में घर के किसी सदस्य की किसी उपलब्धि, जन्मदिन आदि मौको पर नियमित चुपचाप दान राशि भेजने में उन्हें अच्छा लगता है. वे आडम्बर से दूर सरस्वती के मौन साधक कर्मवीर हैं. वे गीता को जीते थे.
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “आलेख – मोहर और गुलमोहर…“।)
अभी अभी # 745 ⇒ आलेख – मोहर और गुलमोहर श्री प्रदीप शर्मा
खूबसूरती की कोई कीमत नहीं होती। फिर भी जब हम किसी गुलमोहर के पेड़ को देखते हैं तो लगता है इसकी सुन्दरता प्रकृति पर अपनी मोहर लगा रही है।
इंसान जब लाल पीला होता है, तब उसकी प्रकृति बड़ी विचित्र हो जाती है और जब प्रकृति लाल पीली होती है तो कभी गुलमोहर में, तो कभी अमलतास में बहार आ जाती है।
गुलशन अगर गुलमोहर और अमलतास से गुलजार है तो हमारी दुनिया में भी अशर्फी, मोहर और स्वर्ण मुद्रा की बहार है। कहते हैं ज्ञानी, दुनिया है फानी। लेकिन जितने रंग इंसान बदलता है, उतने कुदरत नहीं बदलती। पतझड़, सावन, वसंत बहार से जब इंसान का मन नहीं भरा तो उसने एक मौसम प्यार का भी ढूंढ लिया। और उसकी नीयत और नियति देखिए, वह पैसे से ही प्यार करने लगा।।
आज जिसे हम पैसा कहते हैं, वही कभी स्वर्ण मुद्रा कहलाता था तो कभी अशर्फी। हमने तो मोहरें भी नहीं देखी, सोने के सिक्के तो छोड़िए, चांदी के चंद सिक्कों के लिए हमने अपना ईमान तक बेच दिया। गुलमोहर आज भी शान से खड़ा है, अशर्फी और मोहर ने घुटने टेक दिए।
स्वर्ण मुद्रा छूट जाए, अशर्फी मोहर भले ही छूट जाए, लेकिन इंसान का मोह कभी नहीं छूटे।
जो कभी मोहर थी, समय के साथ वह रबर की मोहर बन गई। कानूनी कागजातों पर हस्ताक्षर के साथ रबर की मोहर भी लगने लगी। जहां कभी टकसाल में सोने चांदी के सिक्के ढले जाते थे, उसकी जगह, अब जगह जगह रबर की मोहरों का कारखाना खुलने लगा। रबर स्टांप को वह अधिकार प्राप्त हो गया, जो कभी सोने की मोहरों को था। एक कागज के टुकड़े पर लगी मोहर, लाखों करोड़ों की अफरा तफरी करने लगी। जब जागीर ही चली गई तो कहां सोना चांदी, मोहर अशर्फी और जेवरात। वक्त वक्त की बात।।
मोहर, यानी पद और पैसे के लालच में इंसान को रबर स्टांप अथवा किसी का मोहरा बनने से कोई परहेज नहीं होता। आज हमारे आसपास मोहरे ही मोहरे हैं। कुछ रबर स्टांप तो कुछ जीते जागते शतरंज के मोहरे। राजनीति कहें अथवा सियासत यहां जितना रबर स्टांप जरूरी होता है उतना ही अपने हिसाब से चाल चलने वाला मोहरा।
एक सोने की मोहर कब पहले रबर की मोहर बनी और इंसान कब किसी का मोहरा, पता ही नहीं चला। प्रकृति नहीं बदली, अमलतास गुलमोहर नहीं बदला, लेकिन लाल, हरे, पीले, नीले नोटों ने इंसान को बदल डाला।
मोहर से किसी का मोहरा बना इंसान आगे, कब क्या बन जाए, कहना मुश्किल है।।