हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ रचना संसार # ९९ – गीत – शारदे प्यार दो… ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ☆

सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’

(संस्कारधानी जबलपुर की सुप्रसिद्ध साहित्यकार सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ ‘जी सेवा निवृत्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश, डिविजनल विजिलेंस कमेटी जबलपुर की पूर्व चेअर पर्सन हैं। आपकी प्रकाशित पुस्तकों में पंचतंत्र में नारी, पंख पसारे पंछी, निहिरा (गीत संग्रह) एहसास के मोती, ख़याल -ए-मीना (ग़ज़ल संग्रह), मीना के सवैया (सवैया संग्रह) नैनिका (कुण्डलिया संग्रह) हैं। आप कई साहित्यिक संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत एवं सम्मानित हैं। आप प्रत्येक शुक्रवार सुश्री मीना भट्ट सिद्धार्थ जी की अप्रतिम रचनाओं को उनके साप्ताहिक स्तम्भ – रचना संसार के अंतर्गत आत्मसात कर सकेंगे। आज इस कड़ी में प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम गीत – शारदे प्यार दो

? रचना संसार # ९९ ?

? गीत – शारदे प्यार दो…  ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ? ?

है विनय,आपसे,भक्त को तार दो।

द्वार हम,हैं खड़े,शारदे प्यार दो।।

*

ज्ञान हो,ध्यान हो,वेद की साधना।

हम करें,नित्य ही,मातु आराधना।।

तेज हो,सूर्य सा,कर कृपा हैं शरण।

नंदिता,पूजिता,हैं गिरे हम चरण।।

मीत हो,जीत का,आप उपहार दो।

द्वार हम,हैं खड़े,शारदे प्यार दो।।

*

राह हम,जो चलें,सत्य का पाथ हो।

द्वेष मन,में न हो, श्रेष्ठ का साथ हो।।

हो हृदय,भी विमल,मातु भयहारिणी।

मंत्र हो,प्रेम का,हो जगततारिणी।।

कंठ पे,नाम हो,माँ अमिय धार दो।

द्वार हम,हैं खड़े,शारदे प्यार दो।।

*

यह धरा,देश की,मातु है पावनी।

ताज हो,सिर सदा,शांति की आसनी।।

हम सदा,हों सफल,पूर्ण हर काम हो।

ओम ही,ओम हो,माँ अमर नाम हो।।।

पाप का,नाश हो,हाथ तलवार दो।

द्वार हम,हैं खड़े,शारदे प्यार दो।।

*

पाठ हम,तो पढ़े,मातु बस प्रीति का।

हो सृजन,आप ही,छंद हो गीतिका।।

बुद्धि दो,शुद्धि दो,हाथ माँ थामना।

सब सुखद, हो सरस,बस यही कामना।।

लेखनी,को सदा,आप विस्तार दो।

द्वार हम,हैं खड़े,शारदे प्यार दो।।

© सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’

(सेवा निवृत्त जिला न्यायाधीश)

संपर्क –1308 कृष्णा हाइट्स, ग्वारीघाट रोड़, जबलपुर (म:प्र:) पिन – 482008 मो नं – 9424669722, वाट्सएप – 7974160268

ई मेल नं- meenabhatt18547@gmail.com, mbhatt.judge@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – चुप्पियाँ – (२०) ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – चुप्पियाँ – (२०) ? ?

तुम्हारी चुप्पी में

शब्दों की

गूँज होती है,

मैं निर्निमेष

देख रहा हूँ

बिलोने की ध्वनि में

अंतर्भूत

माखन की अनुगूँज!

?

© संजय भारद्वाज   

(2.9.2018,  प्रातः 9:39 बजे)

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

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अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ साहित्य निकुज #३२६ ☆ पानी की आस ☆ डॉ. भावना शुक्ल ☆

डॉ भावना शुक्ल

(डॉ भावना शुक्ल जी  (सह संपादक ‘प्राची‘) को जो कुछ साहित्यिक विरासत में मिला है उसे उन्होने मात्र सँजोया ही नहीं अपितु , उस विरासत को गति प्रदान  किया है। हम ईश्वर से  प्रार्थना करते हैं कि माँ सरस्वती का वरद हस्त उन पर ऐसा ही बना रहे। आज प्रस्तुत हैं  आपकी भावप्रवण रचना  पानी की आस)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  # ३२६ – साहित्य निकुंज ☆

☆ पानी की आस ☆ डॉ भावना शुक्ल ☆

गगरी बाला भर रही, बीच नदी की धार।

देख उसे मन डर रहा, गिरे नहीं वो  पार।।

सूख स्रोत सारे गए, हमको होती  पीर।

चट्टानों से जल दिखा, बहता नदिया नीर।

 *

लड़की प्यासी हो रही, कूप नीर की आस।

मटके में पानी भरे, उसे लगी जब प्यास।।

 *

संकट के इस दौर में, आई तेरे पास।

जोखिम कितना है बड़ा, बस पानी की आस।।

© डॉ भावना शुक्ल

सहसंपादक… प्राची

प्रतीक लॉरेल, J-1504, नोएडा सेक्टर – 120,  नोएडा (यू.पी )- 201307

मोब. 9278720311 ईमेल : bhavanasharma30@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ इंद्रधनुष # ३०८ ☆ कविता – माँ… ☆ श्री संतोष नेमा “संतोष” ☆

श्री संतोष नेमा “संतोष”

(आदरणीय श्री संतोष नेमा जी  कवितायें, व्यंग्य, गजल, दोहे, मुक्तक आदि विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं. धार्मिक एवं सामाजिक संस्कार आपको विरासत में मिले हैं. आपके पिताजी स्वर्गीय देवी चरण नेमा जी ने कई भजन और आरतियाँ लिखीं थीं, जिनका प्रकाशन भी हुआ है. आप डाक विभाग से सेवानिवृत्त हैं. आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होती रहती हैं। आप  कई सम्मानों / पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत हैं. “साप्ताहिक स्तम्भ – इंद्रधनुष” की अगली कड़ी में आज प्रस्तुत है आपकी एक  विचारणीय कविता  – माँ आप  श्री संतोष नेमा जी  की रचनाएँ प्रत्येक शुक्रवार आत्मसात कर सकते हैं।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ – इंद्रधनुष # ३०८ ☆

कविता – माँ☆ श्री संतोष नेमा ☆

जिसने मुझको खुद लिखा, उसे लिखूं क्या आज |

मेरी हर इक सांस में, करती माँ ही राज ||

*

पोथी पोथी पढ़ गए, मिला एक यह ज्ञान।

इस सारे संसार से, माँ है बड़ी महान।।

*

नैनन में है जल भरा, आँचल में बस प्यार |

तुमसा दूजा कौन माँ, रखता प्रेम दुलार ||

© संतोष  कुमार नेमा “संतोष”

वरिष्ठ लेखक एवं साहित्यकार

आलोकनगर, जबलपुर (म. प्र.) मो 70003619839300101799

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ मंजिरी साहित्य # १३ ☆ नभ से ओझल होते खग ☆ सुश्री मंजिरी “निधि” ☆

सुश्री  मंजिरी “निधि”

(बड़ोदा से सुश्री  मंजिरी “निधि” जी की गद्य एवं छंद विधा में  विशेष अभिरुचि है और वे साथ ही एक सफल  महिला उद्यमी भी हैं। आज प्रस्तुत है आपकी कविता  नभ से ओझल होते खग।)

☆ मंजिरी साहित्य # १३ ☆

? कविता – नभ से ओझल होते खग ☆ सुश्री  मंजिरी “निधि” ? ?

?

आज फिर लगा कि वे दिन जल्द लौटेंगे

जब नभ रंग बिरंगे खगों से परिपूर्ण होगा l

कि फिर खिड़की पर टुकटुक करती चिड़िया दिखेगी l

मुड मुड, उड़ उड़ जोर जोर से

शीशे से लड़ती दिखेगी l

खो चुकी हैं चहचहाटें जिंदगी की रफ़्तार में l

जहाँ तहाँ मोबाईल टॉवर, पेड़ कट रहे अंधाधुंध l

खामोश हो गये सारे खग संघर्ष के तूफान में ll

एक समय ऐसा भी था जब लौट आते थे पंछी घरोंदो में अपने l

पर आज फिर शाम होते ही वहाँ भी बंजर वसुधा मिली l

सूरज की लाली उषा से मिलकर प्रातः बातें आज भी करती हैं l

पुष्कर की झिलमिल बूंदे पुष्प कमल की पंखुड़ियों पर मोती आज भी जड़ती है l

मंद मंद इठलाती शीतल हवा कानों में आज भी कुछ कहती है l

 

पर प्रातः काल के नील गगन से खग ओझल हो रहे हैं l

ये देख मन उद्विग्न हुआ और फिर अंतर्मन से आवाज आई कि वे दिन जल्द ही लौटेंगे जब नभ रंग बिरंगे खगों से परिपूर्ण होगा l

© सुश्री  मंजिरी “निधि”
बड़ोदा, गुजरात

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ शशि साहित्य # २७ – कविता – सपनों को तुम ना सोने देना… ☆ श्रीमती शशि सराफ ☆

श्रीमती शशि सराफ

(श्रीमती शशि सुरेश सराफ जी सागर विश्वविद्यालय से हिंदी एवं दर्शन शास्त्र से स्नातक हैं. आपने लायंस क्लब और स्वर्णकार समाज की अध्यक्षा पद का भी निर्वहन किया. आपका “लेबल शशि” नाम से बुटीक है और कई फैशन शोज में पुरस्कार प्राप्त किये हैं. आपका साहित्य और दर्शन से अत्यधिक लगाव है. आप प्रत्येक शुक्रवार श्रीमती शशि सराफ जी की रचनाएँ आत्मसात कर सेंगे. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता सपनों को तुम ना सोने देना…।)

☆ शशि साहित्य # २७ ☆

? कविता – सपनों को तुम ना सोने देना… ☆ श्रीमती शशि सुरेश सराफ  ? ?

चाहे हों बोझिल नींद से पलकें…

सपनों को तुम ना सोने देना…

 

लंबी दूरी तय करना है,

कदमों को ना थकने देना…

 

श्रम को अपना हथियार बना लो,

सफलता… सन्मुख शीश नवाने देना…

 

कल उसको पुनः उदय होना है,

तो सूरज को ढल जाने देना…

 

नयी है आभा, नई बहारें,

राह के कांटे, बिसरा देना…

 

चाहे तूफानों से हो जाए सामना,

डोर आशा की थामें रहना…

 

विपरीत हो जाए सब राहें…

दीपक लगन का, जलाए रखना…

© श्रीमती शशि सराफ

जबलपुर, मध्यप्रदेश 

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – चुप्पियाँ – (१९) ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – चुप्पियाँ – (१९) ? ?

उतरता रहा

दुनिया का चुप

मेरे भीतर

चुपचाप..,

मेरी कलम

लिखती रही

चुप्पी,

चुपचाप..!

?

© संजय भारद्वाज   

(2.9.2018, प्रातः 9:26 बजे)

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

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🕉️ नारायण साधना संपन्न हो चुकी। नई साधना की सूचना यथासमय देंगे। 🕉️

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कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ समय चक्र # २९९ ☆ प्रेरक गीत – मानव जीवन व्यर्थ गया… ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’ ☆

डॉ राकेश ‘चक्र

(हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी  की अब तक लगभग तेरह दर्जन से अधिक मौलिक पुस्तकें ( बाल साहित्य व प्रौढ़ साहित्य ) तथा लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन।लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन। कई कृतियां पंजाबी, उड़िया, तेलुगु, अंग्रेजी आदि भाषाओँ में अनूदित । कई सम्मान/पुरस्कारों  से  सम्मानित/अलंकृत।  भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय द्वारा बाल साहित्य के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य श्री सम्मान’ और उत्तर प्रदेश सरकार के हिंदी संस्थान द्वारा बाल साहित्य की दीर्घकालीन सेवाओं के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य भारती’ सम्मान, अमृत लाल नागर सम्मानबाबू श्याम सुंदर दास सम्मान तथा उत्तर प्रदेश राज्य कर्मचारी संस्थान  के सर्वोच्च सम्मान सुमित्रानंदन पंतउत्तर प्रदेश रत्न सम्मान सहित बारह दर्जन से अधिक राजकीय प्रतिष्ठित साहित्यिक एवं गैर साहित्यिक संस्थाओं से सम्मानित एवं पुरुस्कृत। 

आदरणीय डॉ राकेश चक्र जी के बारे में विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 संक्षिप्त परिचय – डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी।

आप  “साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र” के माध्यम से  उनका साहित्य प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र – # २९९ ☆ 

☆ प्रेरक गीत – मानव जीवन व्यर्थ गया ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’ 

जिसने अपने को समझ लिया,

उस पर ईश्वर की कृपा रही।

जो भूला-भटका है अब तक,

उसकी नैया तो डूब चली।

 *

जो योग, ध्यान भी ना करता,

वह कितना आज अभागा है।

मानव जीवन भी व्यर्थ गया,

उस पर माया का साया है।

 *

अगला जीवन भी नरक बना,

लाख योनियां आन खड़ी।

 *

जो मरा स्वाद के ही खातिर,

उसने जिह्वा को बेच दिया।

फिर रोग सताए जीवन भर,

औषधि ने उन्हें दबोच लिया।

 *

धन,रुपया काम नहीं आया,

यह चक्र भी कहता खरी-खरी।

 *

मोबाइल टीवी देख-देख

भोजन अनदेखाकर खाते।

समय व्यर्थ हो जाता यों हीं,

बच्चे घर में उत्पात मचाते।

 *

युवक युवतियां बच्चों की भी,

आशा हो रही मरी-मरी।

© डॉ राकेश चक्र

(एमडी,एक्यूप्रेशर एवं योग विशेषज्ञ)

90 बी, शिवपुरी, मुरादाबाद 244001 उ.प्र.  मो.  9456201857

Rakeshchakra00@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ जय प्रकाश के नवगीत # १४८ ☆ अंदेशा बाढ़ का ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव ☆

श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

(संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं अग्रज साहित्यकार श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव जी  के गीत, नवगीत एवं अनुगीत अपनी मौलिकता के लिए सुप्रसिद्ध हैं। आप प्रत्येक बुधवार को साप्ताहिक स्तम्भ  “जय  प्रकाश के नवगीत ”  के अंतर्गत नवगीत आत्मसात कर सकते हैं।  आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण एवं विचारणीय नवगीत “इंतज़ार” ।)

✍ जय प्रकाश के नवगीत # १४८ ☆

अंदेशा बाढ़ का ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

जेठ सी दोपहरी

अंदेशा बाढ़ का

शायद लौट आया है

मौसम असाढ़ का।

 

छप्पर से छानी तक

एक सुगबुगाहट

आँखों में तैर रही

कोई अकुलाहट

इधर आँधियों से सब

पट गई धरा है

उधर नभ के आँगन में

बूँदों की आहट

 

टूट गया भ्रम सारा

बर्फ़ के पहाड़ का

शायद लौट आया है

मौसम असाढ़ का।

 

खेतों के प्राणों में

सोंधापन महके

वन-उपवन डाल-डाल

पत्ते-पत्ते चहके

नदी ताल पोखर घट

पनघट वंशीवट

सबके मन पावस के

रंगों से दहके

 

उग आया सपना फिर

बंजर में झाड़ का

शायद लौट आया है

मौसम असाढ़ का।

***

© श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

सम्पर्क : आई.सी. 5, सैनिक सोसायटी शक्ति नगर, जबलपुर, (म.प्र.)

मो.07869193927,

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ नफरत के बीज बोए…! ☆ डॉ. रामेश्वरम तिवारी ☆

डॉ. रामेश्वरम तिवारी

संक्षिप्त परिचय

  • हिंदी-प्राध्यापक(सेवानिवृत्त) महारानी लक्ष्मीबाई शासकीय कन्या स्नातकोत्तर महाविद्यालय, भोपाल  (म.प्र).
  • नई दुनिया, दैनिक भास्कर, वीणा, हंस, धर्मयुग, कादम्बिनी आदि पत्र-पत्रिकाओं में कविता और लघुकथाएँ प्रकाशित। पुस्तकः कविता के ज़रिए,  मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी के सौजन्य से प्रकाशित।

आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण कविता – नफरत के बीज बोए…!

☆ ॥ कविता॥ नफरत के बीज बोए…! ☆ डॉ. रामेश्वरम तिवारी

इंसान इतना बेबस, लाचार कभी न था,

आज से पहले स्वार्थी प्यार कभी न था।

*

गाड़ी-घोड़ा,महल-मढ़ैया,सुख-सुविधा,

सबकुछ होते हुए भी बेज़ार कभी न था।

*

तालीमों की कारगुज़ारी देखकर लगता,

ऐसा अनपढ़,जाहिल,गँवार कभी न था।

*

बाहर दिखावटी हँसी, भीतर से खोखला,

ज़िंदगी का इतना तिरस्कार कभी न था।

*

जिन बेटों को पढ़ा-लिखाकर बड़ा किए,

पर सम्बन्धों का टूटा सितार कभी न था।

*

बेशक; अभावों में जीते थे, आँसू पीते थे,

पर वातावरण ऐसा नागवार कभी न था।

*

धर्मियों द्वारा नफरत के बीज बोए जा रहे,

मानवता का ऐसा बहिष्कार कभी न था।

© डॉ. रामेश्वरम तिवारी

सम्पर्क – सागर रॉयल होम्स, होशंगाबाद रोड, भोपाल-462026

मोबाईल – 8085014478

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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