आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’
(आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ जी संस्कारधानी जबलपुर के सुप्रसिद्ध साहित्यकार हैं। आपको आपकी बुआ श्री महीयसी महादेवी वर्मा जी से साहित्यिक विधा विरासत में प्राप्त हुई है । आपके द्वारा रचित साहित्य में प्रमुख हैं पुस्तकें- कलम के देव, लोकतंत्र का मकबरा, मीत मेरे, भूकंप के साथ जीना सीखें, समय्जयी साहित्यकार भगवत प्रसाद मिश्रा ‘नियाज़’, काल है संक्रांति का, सड़क पर आदि। संपादन -८ पुस्तकें ६ पत्रिकाएँ अनेक संकलन। आप प्रत्येक सप्ताह रविवार को “साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह” के अंतर्गत आपकी रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है – कहमुकरी।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह # २७८ ☆
☆ कहमुकरी ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆
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उसकी संगत शीतल छाँव
भेद-भाव बिन मिलती ठाँव
उसकी यादें जैसे सौध
क्या सखि पौध?
नहिं हरिऔध।
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क्यों मुँह पर है नहीं उजास?
मन में क्यों है नहीं हुलास?
क्या कारण मन हुआ उदास?
ग्रहण खग्रास?
नहिं, प्रिय प्रवास।
०
तन्हाई में साथ निभाते
हो उदास तो तुरत हँसाते
चोट करें फिर भी मन भाते
बच्चे पीठ लदे?
ना, चुभते चौपदे।
०
भू पर उतर स्वर्ग से आए
‘पहले मैं‘ का द्वंद मचाए
सिय रघुवर लछमन हनुमान
हुआ अवध का नया विकास
ना गुइयाँ! वैदेही वनवास।
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© आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’
१९.११.२०२५
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