जीवन यात्रा – डा संजीव कुमार – जिन पर माँ लक्ष्मी व सरस्वती दोनो का ही वरदहस्त है ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव
एक ही व्यक्ति में लेखक, कवि, संपादक, आलोचक तो मिल जाते हैं, किन्तु जब वही व्यक्ति अंतरराष्ट्रीय स्तर का प्रकाशक, स्थापित प्रशासक, स्तरीय कानूनविद अधिवक्ता, समाज सेवी, भारतीय वांग्मय का गहन अध्येता, वैश्विक पर्यटक, बाल मनोविज्ञान की समझ रखने वाला,अनुवादक, सरल व्यक्तित्व का भी हो तो वह डा संजीव कुमार ही हो सकते हैं. उन पर माँ लक्ष्मी व सरस्वती दोनो की ही बराबरी से कृपा है. किन्तु वे स्वभाव से निराभिमानी हैं. सुस्थापित है कि ऐसे बिरले भव्य किन्तु सहज चरित्र का विकास तभी हो पाता है जब मन में सब ओर से निश्चिंतता व शांति हो अतः मैं हिन्दी जगत की ओर से डा संजीव कुमार के परिवार विशेष रूप से उनकी श्रीमती जी को हार्दिक बधाई व धन्यवाद देना चहाता हूं. मैं डा लालित्य ललित जी का अनुग्रह मानता हूं कि उन्होने मेरा परिचय मेरे व्यंग्य संग्रह के प्रकाशन के सिलसिले में डा संजीव कुमार से करवाया. भोपाल में जब वे शांति गया सम्मान समारोह में विशिष्ट अतिथि के रुप में आये तो उनसे व श्रीमती कुमार से सहज भेंट का अवसर मिला, उनकी सरलता से मैं अंतरमन तक प्रभावित हुआ.
श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’
प्रतिष्ठित साहित्यकार एवं सेवानिवृत्त – मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी)
विभिन्न कानूनी विषयों पर डा संजीव कुमार की 36 से ज्यादा पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं. कोरोना के प्रतिकूल समय में जब ज्यादातर पत्रिकायें प्रिंट मीडिया से गायब होती जा रही हैं, डा संजीव कुमार ने विशुद्ध साहित्यिक पत्रिका अनुस्वार के प्रकाशन प्रारंभ का बीड़ा उठाने का दुस्साहस किया, वे पत्रिका के मुख्य संपादक हैं, अनुस्वार के अंको का विमोचन भौतिक आयोजन के अतिरिक्त ई प्लेटफार्म पर अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर संपन्न हुआ, जिस मेगा कार्यक्रम का मैं साक्षी व सहभागी भी रहा हूं. अनुस्वार स्तरीय साहित्यिक पत्रिका सिद्ध हो रही है.
हिन्दी साहित्य में डा संजीव कुमार की 75 से अधिक पुस्तकें पूर्व प्रकाशित हैं. वे हिन्दी वांग्मय के गहन अध्येता ही नहीं हैं उसे समय के चश्में से देख नये दृष्टिकोण से पुनर्प्रस्तुत करने का महति कार्य कर रहे हैं. हिन्दी व अंग्रेजी पर उनका पठन पाठन ही नही बराबरी से अभिव्यक्ति का आधार भी है. काविता उनकी सर्वाधिक प्रिय विधा है. वासवदत्ता, उर्वशी, गुंजन, अंजिता, आकांक्षा, मेरे हिस्से की धूप, इंदुलेखा, ऋतुमयी, कोणार्क, तिष्यरक्षिता, यक्षकथा, माधवी, अश्मा,जैसे चर्चित प्रबंध काव्य उन्होने हिन्दी जगत को दिये हैं. जब कवि संजीव कुमार तिष्यरक्षिता का वकील बनकर उसके कामातुर व्यवहार का वर्णन करते हैं तो उसमें इतिहास, मनोविज्ञान, साहित्यिक कल्पना सभी कुछ समाहित कर प्रबंध काव्य को पठनीय, विचारणीय, मनन करने योग्य बनाकर पाठक के सम्मुख कौतुहल जनित, नारी विमर्श के प्रश्नचिन्ह खड़े कर पाने में सफल सिद्ध होते हैं. ऐसे समीचीन विषयों पर वे अपनी स्वयं की वैचारिक उहापोह को अभिव्यक्त करने के लिये अकविता को विधा के रूप में चुनते हैं.तत्सम शब्दो का प्रवाहमान प्रयोग कर लम्बी भाव अकविताओ में मनोव्यथा की सारी कथा बड़ी कुशलता से कह लेते हैं.
ग्रामा, ऋतंभरा, ज्योत्स्ना, उच्छ्वास, नीहारिका, स्वप्नदीप, मधुलिका, मालविका, किरणवीणा, प्राजक्त, अणिमा, स्वर्णकिरण, युगान्तर, परिक्रमा, अंतरा, अपराजिता, क्षितिज, टूटते सपने मरता शहर, मुक्तिबोध, समय की बात, शब्दिका, वणिका, मनपाखी, अंतरगिणी, यकीन नहीं होता, रुही, सरगोशियां, थोड़ा सा सूर्योदय, समंदर का सूर्य, कादम्बरी, टीके और गिद्ध, मौन का अनुवाद, कल्पना से परे, कहीं अंधरे कहीं उजाले, शहर शहर सैलाब, मैं भी ( मी टू ), माँ, खामोशी की चीखें, लवंगलता एवं मेरे ही शून्य में जैसे शीर्षक से उनके काव्य संग्रह प्रकाशित व पाठको के बीच लोकप्रिय तथाविभिन्न संस्थाओ से समय समय पर सम्मानित हैं. दरअसल यह उनकी तत्सम शब्दशैली, पौराणिक आख्यानो की नये संदर्भ में पाठक के मनोकूल विवेचना का सम्मान है.
कवि मन सदा गंभीर क्लिष्ट ही नही बना रहता वह “बच्चों के रंग बच्चों के संग” जैसी कृतियां भी खेलखेल में कर डालता है. राजस्थानी, अंग्रेजी तथा डोगरी, छत्तीसगढ़ी, बांग्ला, तमिल आदि भाषाओ में अनुवाद कार्य भी उनकी कृतियों पर संपन्न हुआ है.
डा संजीव कुमार न केवल स्वयं निरंतर मौलिक सृजन कर रहे हैं, वे अमेरिका सहित विदेशो में हिन्दी पुस्तको को व्यावसायिक रूप से पहुंचाने के महत्वपूर्ण कार्य भी कर रहे हैं. देश विदेश के सुदूर अंचलो से लेखको को प्रकाशित कर वे हिन्दी जगत को लगातार समृद्ध कर रहे हैं. मैं अंतरमन से उनकी सक्रिय समृद्ध साहित्यिक यात्रा के शाश्वत होने की शुभकामना करता हूं.
(जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब) शिक्षा- एम ए हिंदी, बी एड, प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । ‘यादों की धरोहर’ हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह – ‘एक संवाददाता की डायरी’ को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से कथा संग्रह- महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता)
☆ जीवन यात्रा ☆ खोजी पत्रकारिता खत्म होती जा रही है : सुभाष चंद्रा ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆
खोजी पत्रकारिता खत्म होती जा रही है और इसे करने वालों की क्षमता भी कम हो रही है। और कहीं कम तो कभी ज्यादा सोशल मीडिया शोषण भी करने लगा है। यह कहना है मीडिया मुगल कहे जाने वाले जी न्यूज के सर्वेसर्वा और राज्यसभा सांसद सुभाष चंद्रा का। उन्हें सुभाष गोयनका के नाम से भी जाना जाता है। प्रसिद्ध समाजसेवी नंद किशोर गोयनका के बड़े बेटे सुभाष चंद्रा ने मीडिया के क्षेत्र में देश में सबसे पहले चौबीस घंटे का चैनल जी न्यूज चला कर मीडिया मुगल कहलवाने का गौरव पाया। हालांकि उनका कहना है कि जब यह बात पत्रकारों के बीच रखी तो सबने कहा कि यह मुश्किल होगा लेकिन रजत शर्मा जैसे नये पत्रकारों को अपने खर्च से इंग्लैंड यह प्रशिक्षण पाने भेजा और फिर जी न्यूज का चौबीस घंटे प्रसारण शुरू किया। नववर्ष पर सुभाष चंद्रा हमेशा की तरह अपने गृहनगर हिसार आए तो उनके साथ छोटी सी मुलाकात की गयी। सिरसा से आईटीआई तक शिक्षित सुभाष चंद्रा ने जी न्यूज शुरू करने से पहले मुम्बई में एस एल वर्ल्ड भी चलाया और इसके प्रचार के लिए जी न्यूज की शुरूआत की। फिर राजनीति में आने का सपना देखा और राज्यसभा सांसद बने। अब उनका कार्यकाल इस वर्ष अगस्त में पूरा होने वाला है।
-हरियाणा के वरिष्ठ नेता चौ वीरेंद्र सिंह ने एक बार कहा था कि राज्यसभा सदस्य बनने के लिए सौ करोड़ रुपये चाहिए तो आपने कितने लगाये थे ?
-मैंने कुछ नहीं लगाया। मेरी कम्पनी ने जरूर खर्च किये। वो भी बहुत कम रकम है।
-आपके बारे में चर्चा थी कि सक्रिय राजनीति यानी सीधे चुनाव लड़ेंगे लेकिन आप राज्यसभा में ही फिर जाना पसंद करेंगे या सीधे चुनाव लड़ेंगे ?
-जैसा समय और स्थितियां होंगीं।
-आपने अपनी सांसद निधि का पूरा सदुपयोग किया या सरकार के खाते में ही राशि छोड़ दी ?
-सिर्फ कोरोना काल में राशि का उपयोग नहीं हुआ बाकी तो कम से कम अठारह करोड़ निजी कोष से भी लगाये हैं।
-आपने जो पांच गांव गोद लिए थे उनकी क्या प्रगति है ?
-नि:संदेह वे अब काफी बदल चुके हैं। आपसे मिलने से पहले इन गांवों में जाकर आया हूं। आर्गेनिक खेती और किचन गार्डन को भी प्रोत्साहित किया गया है। बीस युवा भी इन गांवों के राष्ट्रीय स्तर पर पहुंच चुके हैं।
-आगे क्या आइडियाज हैं ?
-एक आइडिया सफल रहा एयरपोर्ट बनने का , रेलवे-स्टेशन पर वाशिंग गार्ड बनवाया और अब फूलों की खेती बढ़ाने का आइडिया है।
-आप मीडिया मुगल हैं आज की पत्रकारिता की स्थिति के बारे में क्या कहेंगे ?
-पहले तो पत्रकारों पर दबाब रहता है समय सीमा का और फिर व्यावसायीकरण बढ़ता जा रहा है। इसके बावजूद बड़ी चिंताजनक स्थिति यह है कि खोजी पत्रकारिता खत्म होती जा रही है जिससे शोषण के मामले उजागर हुआ करते थे। ऊपर से सोशल मीडिया में शोषण के समाचार भी आ रहे हैं जो चिंता का विषय हैं।
– पहले जी न्यूज हरियाणवी फिल्मों को प्रोत्साहन देता था। हरियाणवी फिल्मों के बारे में क्या कहेंगे ?
-हरियाणवी फिल्म ज्यादा आगे नहीं बढ़ीं और न ही प्रतिभाएं आगे आईं। ऐसी स्थिति मराठी फिल्मों की भी थी। तब महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री विलासराव देशमुख ने हमारे ही जी न्यूज के कार्यक्रम में मराठी फिल्मों के लिए सहयोग मांगा और हमने भरसक सहयोग दिया। अब एक साल में पच्चीस तीस मराठी फिल्में बनने लगी हैं। हरियाणा में अच्छी फिल्में बनें , सपोर्ट की कोई कमी नहीं रहेगी।
मी..वाचकांची अनेक पत्रे मी सांभाळून ठेवली आहेत.आता पत्रलेखन हा प्रकारच ऊरला नाही. फोनवर, ईमेलवर वाचकांशी संवाद होतो.
एकदा एकीने मला विचारले,”तुमची माझी काहीच ओळख नसताना, तुम्ही माझ्यावर इतकी जुळणारी कथा कशी काय लिहीलीत..?”
माझ्या मित्र परिवारातले लोकही गंमतीने म्हणतात,हिला काही सांगू नये.ही गोष्टच लिहील…आणि खरोखरच एकदा मी माझ्या मैत्रीणीच्या जीवनावरच कथा लिहीली होती.अर्थात् नावे बदलली होती.मैत्रीण म्हणाली,”कथा चांगली आहे ..पण तू हे लिहायला नको होतंस…”त्यानंतर कितीतरी दिवस तिने माझ्याशी अबोला धरला होता…असे काही अनुभव येतात ,पण म्हणून लिखाण थांबत नाही..
तो..तू नोकरी करत होतीस..नोकरी नसती तर तुझ्या हातून अधिक लेखन झालं असतं, असं नाही वाटत का?
मी…नाही.मी पस्तीस वर्ष बँकेत नोकरी केली.त्या निमीत्ताने मला अनेक माणसे भेटली.
मी विवीध मनोवृत्तीची माणसे पाहिली.त्यांच्याशी संवाद साधले…संवाद साधता साधता मी त्यांना टिपत गेले.माणसातला माणूस शोधण्याचा मला छंदच आहे.खरं म्हणजे मूळात वाईट कुणीच नसतं..
परिस्थिती माणसाला भाग पाडते… त्यातूनच माझ्या कथांमधली पात्रे घडत गेली…मी जेव्हां लिहीते तेव्हा ती पात्र मला दिसतात..त्यांना चेहरा असतो..ती माझ्याशी बोलतात…हे आभासी क्षण माझ्या लेखन प्रवासातले अत्यंत आनंदाचे क्षण.,.त्यावेळी मी आणि शब्द निराळे नसतात…एका अद्वैताचा अनुभव असतो तो..
तो…(मिस्कीलपणे) हो पण तरीही अजुन तू इतकी मोठी लेखिका नाही झालीस…
मी…बरोबर आहे तुझं..पण मी माझ्या आनंदासाठी लिहीते.मला काहीतरी सांगायचं असतं म्हणून लिहीते..पु.भा. भावे कथा स्पर्धेत माझ्या “रंग..” या कथेला पुरस्कार मिळाला होता..तसे अनेक छोटे मोठे पुरस्कार माझ्या कथांना मिळाले..कथाकथनांनाही बक्षीसे मिळाली..विश्वसाहित्य संमेलनातही माझे कथाकथन झाले…पण हे अलंकार मला मिरवावेसे नाही वाटत…माझे वडील नेहमी म्हणायचे,”यश नेहमी मागे ठेवायचं आणि पुढे जायचं..नवे संकल्प करायचे..आणि त्याच्या पूर्तीसाठी झटायचे…”
तो…तुझ्या लेखनाच्या माध्यमातूनच तू काय संदेश देशील..?
मी… बापरे!!संदेश देणारी मी कोण..?
मात्र एक सांगते..?माणसाला एक तरी छंद असावा..एक तरी आपल्या ठायी असलेली कला ओळखावी आणि जोपासावी..कीर्ती ,प्रसिद्धी,नाव ,पैसा यासाठी नव्हे..कलेत स्पर्धा ,ईर्षा नसावीच मुळी…ती मुक्त असावी…स्वानंदासाठी असावी..
।।साहित्य संगीत कला विहीन:
साक्षात् पशु पुच्छ विषाणहीन:।।
कला परांङमुख व्यक्ती ही शेपुट नसलेल्या पशुसारखीच असते..
कला म्हणजे भावनांची अभिव्यक्ती..आपल्या अंतरंगात उमटणार्या भाव ,भावना..,रेखा,रंग ,ध्वनी,शब्द यांतून जेव्हां व्यक्त होतात तेव्हा त्याला कलारुप प्राप्त होते..
अंतरंग जागृत होतं तेव्हां चैतन्याचा आनंद मिळतो…
हा आनंद हेच माझं सर्वोच्च पारितोषिक…
अरे!! कुठे गेलास…?
तो..कुठे नाही .इथेच तुझ्या अंतरंगात आहे..
मी…तुलाच धन्यवाद देते..आज तुझ्यामुळेच मी हा आत्मसंवाद साधू शकले.. पुन्हा भेटू..नव्या चौकटीत..नव्या कल्पना घेऊन…
तो..तू तुझ्या साहित्यातील गुरुंसंबंधी सांगत होतीस..
मी .हो. अरविंद ताटके नावाचे माझ्या वडीलांचे विद्यार्थी होते.ते स्वत:साहित्यिक होते.त्यांची काही पुस्तकेही प्रकाशित झाली होती.एकदा असेच त्यांच्या एका कादंबरीवर मी त्यांना पत्र लिहून अभिप्राय कळवला. पत्र वाचल्यावर दुसर्याच दिवशी ते आमच्या घरी आले.आणि मला म्हणाले,”तू पत्र इतकं छान लिहीलं आहेस !!खरोखरच तुझ्यात लेखनगुण आहेत.. लिहीत जा..मेहनत कर. वाचन कर.” अर्थात त्यावेळी मी काही फारसं लिहीत नव्हते. पण ताटके आमच्याकडे नेहमी येत ,आणि प्रत्येक वेळी “लिहीती रहा..कादंबरीच लिही..”वगैरे सांगत..कळत नकळत माझी लेखनवाट नक्कीच आखली जात होती..
तो..एक विचारु का? तू अनेक कथा लिहील्यास..तुझी पुस्तकंही प्रकाशित झाली..
मी.. हो मावळलेले सूर्य,पाऊल,गॅप्स ,अंंतर्बोल हे चार कथासंग्रह आणि नुकताच लव्हाळी हा ललीतलेख संग्रह प्रसिद्ध झाला आहे…एक कवितासंग्रहही प्रकाशनाच्या वाटेवर आहे..ः
तो..मात्र तू कादंबरी हा साहित्यप्रकार हाताळला नाहीस..
मी.. अजुनपर्यंत नाही.मात्र आहे विचार.तुझ्याच रुपाने कीडा आहे डोक्यात.
तो..तुझ्यातले माझे अस्तित्व म्हणजे विवीध विषयच म्हणूया नाही का…नेमकं लिहीताना तुझी मानसिक अवस्था काय असते…
मी…खरोखरच मी खूप अस्वस्थ असते.आतून काहीतरी जाणवत असतं..धक्के देत असतं.. मात्र एक सांगते माझी कुठलीच कथा ही संपूर्ण काल्पनिक नसते.कुठेतरी त्याचं सूत्र सत्यात असतं…कुठल्यातरी संवादातलं एखादं वाक्यही एखाद्या खिळ्यासारखं ठोकलं जातं..आणि त्यातूनच एक सूत्रबद्ध कथा आकार घेते…कधी पेपरात वाचलेली बातमी,भेटलेली माणसं… ओळखीची ..ओळख नसलेली…कुठेतरी त्यांच्याशीही आत्मसंवाद घडतो…त्यांच्या जीवनाशी मी कनेक्ट होते..आणि तिथे माझी कल्पना शक्ती फुलायला लागते…
तो..तुझा आणि तुझ्या वाचकांचा संवाद होतो की नाही….
मी..हो ,नेहमीच होतो. त्याविषयी आपण पुढच्या भागात बोलूया…
मी..एक नक्की की लिहीणं ही माझी पॅशन होत चालली..शाळेतले निबंध..मनातले काहीतरी म्हणून डायरी लिहीणे ..अगदी पत्रलेखन सुद्धा.. यातून एक प्रकारचा रियाज होत गेला..मुंबई आकाशवाणीवर ,वनिता मंडळ या कार्यक्रमात मी “स्मृतीसाठी..”हा आमच्या काळे सरांवरचा लेख प्रक्षेपित झाला होता…त्यानंतर सुप्रसिद्ध लेखिका लीलावती भागवत यांनी मला त्यांच्या कार्यक्रमात स्वरचित कथावाचनाची संधी दिली..भैरवी ही माझी कथा प्रचंड गाजली..
श्रोत्यांची असंख्य पत्रे आली. मुंबई आकाशवाणी ने ती पुन:प्रक्षेपितही केली. त्यानंतरही मी कितीतरी वर्ष सातत्याने मुंबई आकाश वाणीच्या वनिता मंडळ, गंमत जम्मत, युवावाणी वर कथावाचन केले…आकाशवाणीच्या एका कार्यक्रमात मी मान्यवर कवीयत्री शांता शेळके यांच्या सोबत होते.मला लीलावती भागवतांनी सदाफुली या विषयावर लिहायला सांगितले.
फक्त अर्धा तास वेळ होता..मी पूर्ण ब्लँक झाले.एकही शब्द सुचेना..तेव्हां शांताबाई मला म्हणाल्या,”डोळे मिटून घे..स्वत:त बघ.. सदाफुलीचं रुप तुझ्या मनानं बघ….”
माझ्यासाठी तो एक विलक्षण अनुभव होता.. माझं त्यादिवशी लाईव्ह ब्राॅडकास्टींग झालं.. आणि शांताबाईंसहित सर्वांनी खूप प्रशंसा केली….आजही मी जेव्हां पूर्ण रिकामी असते तेव्हां मला शांताबाईंचे हे अनमोल शब्द साथ देतात….
तो..वा!!खरोखरच भाग्याचा क्षण..तुझं मराठी मासिकातही लेखन चालू होतं ना त्या वेळी…
मी..हो.माझी पहिली कथा मी अनुराधा मासिकात पाठवली होती.कथेचं नाव होतं सोबत..एका विधवेच्या जीवनावरची ती गोष्ट होती.त्यावेळी अनुराधा मासिकाच्या सुप्रसिद्ध लेखिका गिरिजा कीर या संपादिका होत्या.
त्यांनी माझ्या लेखन शैलीचे खूप कौतुक केले.
आणि तितकेच मार्गदर्शनही केले.त्यांनी माझ्या कथांना भरपूर प्रसिद्धी दिली.मी त्यांना सदैव माझ्या गुरुस्थानी मानलं.माझ्या लेखनप्रवासातला गिरिजा कीर आणि अनुराधा हा एक अत्यंत महत्वाचा टप्पा आहे.त्यांनी मला लेखिका म्हणून ओळख दिली…आजही अनुराधाची लेखिका ही माझी पहिली ओळख आहे..
तो..रत्नाकर मतकरी हे सुद्धा तुझ्या लेखनप्रवासातलं एक महान व्यक्तीमत्व ..हो ना?
मी ..हो!मी बँक आॅफ इंडीयात असताना त्यांचा माझा परिचय झाला. वाचक लेखक
या स्तरांवरआमची मैत्री झाली.त्यांच्या गूढकथा,बालनाट्ये ,व्यावसायिक नाटके यांची
मी प्रचंड चाहती होते..मी त्यांच्याही पुस्तकांवर ,
नाटकांवर समीक्षा (यथाशक्ती) लिहिल्या.पुस्तक
परिचयही लिहीले .तेही माझ्या लेखनाला नेहमी दाद देत…सुधारणाही सांगत.त्रुटी दाखवत..
विषयाचा विस्तार करताना कुठे आणि कशी कमी पडले हे समजावून सांगत…या त्यांच्या मार्गदर्शनाचा मला खूप फायदा झाला.माझं लेखन विकसित होत गेलं…थोडी परिपक्वता यायला लागली…त्यांनी मला अनेक पुस्तके
वाचायला लावली..त्यात आयर्विन वाॅलेस,जेफ्री आर्चर,राॅबीन कुक,एरीच सेगल असेअनेक लेखक होते…या वाचनाने लेखनावर संस्कार होत गेले…अगदी आजपर्यंत त्यांनी मला लेखनाविषयी सतत प्रेरणा दिली…त्यांच्याशी केलेल्या गप्पा ,चर्चा यांनी माझ्या या प्रवासात शिदोरीची भूमिका केली…
तो…मी कीडा आहे.तुझ्यातच वळवळत असतो ना मी.तू बेचैन होतेस ..तुझ्या मनात काही झरत असतं..कधी पटकन् कागद लेखणी घेतेस..
आणि मग शब्द टपटप गळतात आणि रचनात्मक अशी शब्दकृती तयार होते….
मी..खरंच..तुझं हे डोक्यात वळवळणं माझ्यासाठी एक विषयच असतो..कधी त्रासदायक पण कृतीशीलही..
तो..आज मात्र मी तुला काही प्रश्न विचारणार आहे ..देशील ना उत्तरं..?मुलाखतच समज की…
मी..मुलाखत..??अरे बापरे!!मी काही इतकी महत्वाची व्यक्ती नाहीय् .की माझं या क्षेत्रांत खूप मोठं योगदानही नाही…मुलाखत वगैरे काय??
तो..अग् !मग आत्मसंवाद समज .कारण मला तरी वेगळं अस्तित्व कुठे आहे?मी तुझ्याच संवेदनांशी ,अस्तित्वाशी जुडलेला आहे ना…
मी..बरं विचार. तुला काय विचारायचे ते..
तो..मला एक सांग तुला मूळातच शब्दांशी दोस्ती का करावीशी वाटली..तू अगदी सर्वात प्रथम काय लिहीलस?
मी..सांगते .मी खूप लहान होते .चवथी पाचवीत असेन.माझ्यात थोडा न्युन गंड होता ..सावळ्या रंगाचा. सगळे गोरे आणि मी सावळी..आईचं माझ्यावर खूप प्रेम होतं..तिला मी छान दिसावं असं आतून वाटायचं..पण त्याच भरात एक दिवस, तिच्याचकडून मी नकळत दुखावले गेले…
आणि जगात आपलं कुणीच नाही अशी भावना निर्माण झाली..हातात खडु होता.समोर पाटी होती..आणि मला जेजे वाटत होतं ते सगळं लिहूनच काढलं…आणि तेव्हांच मला जाणवलं की हे खूपच छान आहे..आणि जशी मोठी होत गेले तशी या लेखणीशी माझी घट्ट दोस्ती व्हायला लागली…तेव्हांपासून मी लिहीतच राहिले…
तो..म्हणजे अशा रितीने तुझा लेखन प्रवास सुरु झाला म्हणायचा की तुला “तू लिहू शकतेस ..”असा साक्षात्कार झाला….”
मी..ते तू काही म्हण…पण तसा मला लेखनाचा वारसा माझे परमप्रिय वडील. कै.ज. ना. ढगे यांच्याकडून मिळाला.ते एक प्रतिथयश लेखक आणि साहित्यिक होते…
तो..हो आणि ते थिअॉसॉफीस्टही होते ना..
स्वप्नसृष्टी,मृतांचे ऋणानुबंध अंतर्जीवन अशी त्यांची पुस्तकेही प्रसिद्ध आहेत..खूप गाजलेली आहेत ही पुस्तके..
मी..हो!शिवाय मेंदुला खुराक ,जरा डोके चालवा अशी गणितावरचीही त्यांची पुस्तके आहेत…
माझे वडील ही माझी पहिली प्रेरणा होती हे नक्कीच..आमच्या घरात कपाटे भरुन पुस्तके होती…कवी कालीदासांच्या महाकाव्यापासून, ते वर्ड्सवर्थ,शेले तेनेसन,शेक्सपीअर ,साॉमरसेट माॅम,हँन्स अँन्डरसन..चेकाव,बर्नाड शाॉ…आणि अशा अनेक इंग्रजी मराठी हिंदी दिग्गजांच्या साहित्याबरोबर माझी जडणघडण झाली…
तो..चांगले वाचन हा लेखनाचा पहिला संस्कार असतो..बरोबर ना?
मी..हो अगदी बरोबर.आधी भरपूर वाचावं मग लिहावं ..हे जाणीवपूर्वक माझ्यावर वडीलांनी बिंबवलं…
तो..तुझं पहिलं छापील साहित्य कुठलं..त्याविषयी सांग ना..तेव्हां तुला काय वाटले..?
मी..त्यावेळी अमृत नावाचं एक मराठी डायजेस्ट होतं…(रीडर्स डायजेस्ट सारखं..)त्यातल्या” याला जीवन ऐसे नाव” यात मी एक किस्सा लिहून पाठवला होता…आता मला तो नीट आठवत नाहीय् ..पण मथुरेच्या सहलीतला ,चहावाल्याकडून आलेला एक खरा अनुभव होता तो…माझं पहिलं प्रसिद्ध झालेलं हे छोटसं लेखन…त्यावेळी बिंबा ढगे या माझ्या माहेरच्या नावाने प्रसिद्ध झालं होतं…आणि अर्थातच माझ्या आयुष्यातला तो अत्यंत आनंदाचा आणि आत्मविश्वास बळावणारा क्षण होता…
(हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी की अब तक शताधिक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। जिनमें 70 के आसपास बाल साहित्य की पुस्तकें हैं। कई कृतियां पंजाबी, उड़िया, तेलुगु, अंग्रेजी आदि भाषाओँ में अनूदित । कई सम्मान/पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत। इनमें प्रमुख हैं ‘बाल साहित्य श्री सम्मान 2018′ (भारत सरकार के दिल्ली पब्लिक लाइब्रेरी बोर्ड, संस्कृति मंत्रालय द्वारा डेढ़ लाख के पुरस्कार सहित ) एवं उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान द्वारा ‘अमृतलाल नागर बालकथा सम्मान 2019’। आप प्रत्येक गुरुवार को “साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र” के माध्यम से उनका साहित्य आत्मसात कर सकेंगे ।
☆ जीवन यात्रा ☆ साहित्यिक यात्रा – डॉ राकेश ‘चक्र’ ☆
(आज प्रस्तुत है ई-अभिव्यक्ति के सम्माननीय वरिष्ठ साहित्यकार डॉ राकेश ‘चक्र’ जी की सम्पूर्ण साहित्यिक यात्रा )
नाम- डॉ राकेश ‘चक्र’ ( अभिलेखों में नाम डॉ राकेश कुमार गुप्त )
जन्मतिथि – 20 जुलाई 1954
पिता का नाम – स्व.धीरज लाल जी
माता का नाम – स्व.द्रोपदी देवी जी
पत्नी का नाम – श्रीमती रेनू गुप्ता जी
जन्म स्थान- ग्राम – शाहजहांपुर, पोस्ट – जलाली, जिला अलीगढ़ ,उत्तर प्रदेश।
कार्यक्षेत्र- सेवानिवृत्त इंटेलीजेंस अधिकारी उत्तर प्रदेश पुलिस। वर्तमान में एक्यूप्रेशर और योग द्वारा निशुल्क चिकित्सा और समाज सेवा। विद्यालयों में निशुल्क मोटिवेशनल आख्यान।
सृजित विधाएँ – गद्य, पद्य, बाल साहित्य , प्रेरणाप्रद साहित्य, स्वास्थ्य , योग और एक्यूप्रेशर आदि।
कुल प्रकाशित मौलिक पुस्तकें–
नौ दर्जन से अधिक ( 116 ) तथा लगभग तीन दर्जन साझा – संग्रह। प्रकाशित प्रौढ़ मौलिक कृतियाँ तीन दर्जन से अधिक
1- श्रीमद्भागवत गीता दोहाभिव्यक्ति ( गीता का दोहों में अनुवाद) प्रकाशन वर्ष 2020 जीएस पब्लिशर, डिस्ट्रीब्यूटर दिल्ली।
गीत-नवगीत , मुक्तक – संग्रह
1. ( सम्मिलित गीत – मुक्तक ) – मुक्त – निर्झर ( मेरे प्रिय गीत और मुक्तक ) प्रकाशन वर्ष 2020 ,ओम पब्लिशिंग कंपनी दिल्ली।
गीत – नवगीत – संग्रह
1.चरवाहों का चक्रव्यूह प्रकाशन वर्ष 1098 शिल्पायन प्रकाशन दिल्ली।
2. एकता के साथ हम प्रकाशन वर्ष 2012 यतीन्द्र साहित्य प्रकाशन भीलवाड़ा राजस्थान।
3.धार अपनी खुद बनाना प्रकाशन 2016 साधना पब्लिकेशन दिल्ली तथा वर्ष 2018 लवकुश सिंह मऊ उत्तर प्रदेश।
4.उजाले के लिए प्रकाशन वर्ष 2019 देशराज एंड सन्स दिल्ली।
गजल – संग्रह
1. प्रेम की भाषा ही हिंदुस्तान है प्रकाशन वर्ष 2004 नवचेतन प्रकाशन दिल्ली।
2.मेरी गजलें मेरा प्यार प्रकाशन वर्ष 2015, इंडिया डिजिटल पब्लिशर्स दिल्ली।
3 . मेरी प्रिय गजलें प्रकाशन वर्ष 2020 ओम पब्लिशिंग कंपनी दिल्ली (पुरस्कार प्राप्त कृति)
मुक्तछंद कविता-संग्रह
1.मेरे देश की थाती- प्रकाशन वर्ष 2003,निर्मल पब्लिकेशन दिल्ली।
2.बुद्ध की तरह – प्रकाशन वर्ष 2020 , केशव बुक्स दिल्ली।
3 . क्योंकि तुम ईश्वर हो उपरोक्तानुसार।
लघुकथा – संग्रह
1.अमावस का अँधेरा – प्रकाशन वर्ष 2004, शब्द सेतु दिल्ली।
2.फर्ज- प्रकाशन वर्ष 2006 प्रियंका प्रकाशन दिल्ली।
3.राकेश चक्र की लघुकथाएँ – प्रकाशन वर्ष 2012 आरके पब्लिशर दिल्ली।
4. वृक्ष और बीज – प्रकाशन वर्ष 2013 सूर्यप्रभा प्रकाशन दिल्ली।
5 . मेरी समकालीन 121 लघुकथाएँ- प्रकाशन वर्ष 2019 विनोद बुक सेंटर दिल्ली।
कहानी – संग्रह
सफर – प्रकाशन वर्ष 2019, साधना एंड सन्स दिल्ली।
कुण्डलिया- संग्रह, दोहा – संग्रह और सूक्तियाँ
1.चाचा चक्र के सचगुल्ले- प्रकाशन वर्ष 2013 साधना पब्लिकेशन दिल्ली।
2. मेरी प्रिय कुण्डलियां प्रकाशन भाग – 1 वर्ष 2021, पुष्पांजलि प्रकाशन दिल्ली।
3. मेरे प्रिय दोहे उपरोक्तानुसार।
4. मेरी प्रिय कुंडलियाँ भाग – 2 उपरोक्तानुसार।
5. मनोहर सूक्तियाँ और जीवनमंत्र उपरोक्तानुसार।
निबंध – संग्रह
1.मेरे समकालीन निबंध – प्रकाशन वर्ष 2019 प्रियंका प्रकाशन दिल्ली।
2. पुलिस अपने आईने में- प्रकाशन वर्ष 2019 गोपाल प्रकाशन दिल्ली।
मोटिवेशनल साहित्य
1. योग शिक्षा और यौन शिक्षा- प्रकाशन वर्ष 2009 ,आर के पब्लिशर दिल्ली।
2.आपका जीवन – आपके हाथ – ( पुरुस्कृत) प्रकाशन वर्ष 2012 आत्माराम एंड सन्स दिल्ली।
3. सफलता ही सफलता कैसे – प्रकाशन वर्ष 2012 आत्माराम एंड सन्स दिल्ली।
4.जीत आपके हाथ में – प्रकाशन वर्ष 2014 निर्मल पब्लिकेशन दिल्ली।
5. सफलता के 17 सूत्र – प्रकाशन वर्ष 2015 पी एम पब्लिकेशन दिल्ली।
6. सफलता अपनी मुट्ठी में – प्रकाशन वर्ष 2016 सूर्यप्रभा प्रकाशन दिल्ली और ज्योति प्रकाशन सोनीपत।
7. सफलता आपके हाथ में – प्रकाशन वर्ष 2018 समाज शिक्षा संस्थान दिल्ली।
स्वास्थ्य योग और एक्युप्रेशर पुस्तकें
1. स्वास्थ्य का रहस्य, पर्यावरण और हम – प्रकाशन वर्ष 2009, आर के पब्लिशर्स दिल्ली।
2. आपका स्वास्थ्य आपके हाथ- 2015 स्वास्तिक प्रकाशन दिल्ली।
3. मस्त रहिए स्वस्थ रहिए- प्रकाशन वर्ष 2016 साधना पब्लिकेशन दिल्ली।
4. मस्त रहें , स्वस्थ रहें – प्रकाशन वर्ष 2015 आरती प्रकाशन लालकुआं उत्तराखंड।
1. राकेश चक्र की श्रेष्ठ कहानियाँ- प्रकाशन वर्ष 2003 अंगूर प्रकाशन दिल्ली।
2.आजादी के दीवाने – प्रकाशन वर्ष 2004 पीयूष प्रकाशन दिल्ली।
3. तीसरी माँ – प्रकाशन वर्ष 2012, आर्यन प्रकाशन दिल्ली।
4. दी एग्जामिनेशन ( अंग्रेजी ) 2012 अजय पब्लिकेशन दिल्ली।
5. उत्तरांचल की लोककथाएं, प्रकाशन वर्ष 2014 , प्रियंका प्रकाशन दिल्ली।
6. राकेश चक्र की चुनिंदा किशोर कहानियाँ – प्रकाशन वर्ष 2018 पंकज सिंह मऊ उत्तर प्रदेश।
7. लजीज पुलाव (प्रकाशन विभाग भारत सरकार से प्रकाशित दिल्ली) प्रकाशन वर्ष 2018 आदि।
किशोर काव्य साहित्य
1.तुम भारत के वीर हो – प्रकाशन वर्ष 2012, साहित्य चेतना प्रकाशन दिल्ली।
2. मातृभूमि है वीरों की – प्रकाशन वर्ष 2013 दृष्टि प्रकाशन ,दिल्ली।
3. देश के नौजवान – प्रकाशन वर्ष 2015 हरे कृष्ण प्रकाशन मुरादाबाद उत्तर प्रदेश।
4. मनभावन किशोर कविताएँ – प्रकाशन वर्ष 2021लवकुश सिंह मऊ उत्तर प्रदेश।आदि।
अन्य विधा में प्रकाशित किशोर साहित्य
1 सपनों को साकार करेंगे ( आलेख- संग्रह ) प्रकाशन वर्ष 2009 ,आर के पब्लिकेशन दिल्ली।
2. बाल सपने और हम ( आलेख और महापुरुषों की जीवनियाँ ) – प्रकाशन वर्ष 2019 , आविष्कार प्रकाशन दिल्ली आदि।
बाल साहित्य की प्रकाशित मौलिक पुस्तकें पांच दर्जन से अधिक –
बाल कहानियों की प्रमुख पुस्तकें :-
1. साक्षरता अनमोल रे – प्रकाशन वर्ष 2002 समीक्षा प्रकाशन दिल्ली।
2. अन्यायी को दंड – प्रकाशन वर्ष 2002 शब्द सृष्टि दिल्ली।
3. अहिंसावादी शेर – प्रकाशन वर्ष 2002 शब्द सृष्टि दिल्ली।
4. बिच्छूवाला दीवान- प्रकाशन वर्ष 2003 ,उपासना प्रकाशन दिल्ली।
5. बच्चों की मनोरंजक कहानियां – प्रकाशन वर्ष 2010, अग्नि प्रकाशन दिल्ली।
6 .चतुराई का पुरस्कार प्रकाशन वर्ष 2011 ( नेशनल बुक ट्रस्ट से प्रकाशित हिंदी, उड़िया,तेलगु,पंजाबी आदि में भाषाओं में अनुवाद भारत सरकार दिल्ली )।
7. गाँव का बेटा प्रकाशन वर्ष 2013 नेशनल बुक ट्रस्ट भारत सरकार दिल्ली।( हिंदी, कश्मीरी आदि भाषाओं में अनुवाद ) ।
8. रोबोट का आविष्कार – प्रकाशन वर्ष 2014 ,बैनियन ट्री प्रकाशन दिल्ली।
9. राकेश चक्र की चुनिंदा बाल – कहानियां – प्रकाशन वर्ष 2018, लवकुश सिंह मऊ उत्तर प्रदेश।
10 . प्रेरक बाल कहानियाँ – प्रकाशन वर्ष 2019, जनचेतना शिक्षण संस्थान दिल्ली।
आदि पुस्तकें।
बालविज्ञान की पुस्तकें
1.पुच्छल तारे – प्रकाशन वर्ष 2006 , कुणाल प्रकाशन दिल्ली।
2.क्यों गिरती है बिजली – प्रकाशन वर्ष 2006 ,आविष्कार प्रकाशन दिल्ली।
3. पैराशूट – उपरोक्त अनुसार।
4. विद्युत तरंगें – प्रकाशन वर्ष 2006, गुरुकुल प्रकाशन , दिल्ली।
बाल उपन्यास की पुस्तकें
1.कंजूस गोंतालू – प्रकाशन वर्ष 2005, अमर प्रकाशन गाज़ियाबाद।
2. मिस टी और डी टू – उपरोक्तानुसार।
3.पोस्टकार्ड लिफाफा और दादा जी- उपन्यास, प्रकाशन वर्ष 2020 , केशव बुक्स दिल्ली।
4. चिट्ठी वाले दिन, उपन्यास प्रकाशन वर्ष 2021पुष्पांजलि प्रकाशन दिल्ली।
बालगीत और कविताओं की प्रमुख पुस्तकें
1.एक सौ इक्यावन बाल कविताएं – प्रकाशन वर्ष 2006, कुणाल प्रकाशन दिल्ली।
2.लट्टू-सी ये धरती घूमे – प्रकाशन वर्ष 2010 आत्माराम एंड संन्स, दिल्ली।
3. मातृभूमि है वीरों की – प्रकाशन वर्ष 2011 आत्माराम एंड संन्स दिल्ली।
4. माटी हिंदुस्तान की- प्रकाशन वर्ष 2011 , बुक क्राफ्ट पब्लिशर दिल्ली।
5. सूरज, बालक और संसार – प्रकाशन वर्ष 2012 एवरेस्ट पब्लिशिंग कम्पनी दिल्ली।
6. पशु- पक्षियों के मनोरंजक बाल गीत – प्रकाशन वर्ष 2012 ,ग्लोबल ऐक्सचेंज पब्लिशर, दिल्ली।
7. मीठी कर लें अपनी बोली- प्रकाशन वर्ष 2014 , एक्सप्रेस बुक्स दिल्ली।
8. साफ हवा कर देते पेड़- प्रकाशन वर्ष 2015 , हरे कृष्ण प्रकाशन मुरादाबाद।
9. ऊँचा देश उठाएंगे- उपरोक्तानुसार।
10. ता – ता थैया गाएँगे उपरोक्तानुसार।
11. वीर शिवाजी – उपरोक्तानुसार।
12. देश बने सोने की चिड़िया- उपरोक्तानुसार।
13. रिमोट का खेल – प्रकाशन वर्ष 2016, हरे कृष्ण प्रकाशन, मुरादाबाद।
14.कम्प्यूटर ने खेल दिखाया- उपरोक्तानुसार।
15. बंदर, बिल्ली और कौवा – उपरोक्तानुसार।
16. धीरे – धीरे गाना बादल- उपरोक्तानुसार।
17. प्राणों से है प्यारा झण्डा – आरती प्रकाशन लालकुआं , उत्तराखंड।
18. दयानंद ऋषिवर अति प्यारे – प्रकाशन वर्ष 2016 उपरोक्तानुसार।
19. प्रेम के दीप जलाओ रे – उपरोक्तानुसार।
20. प्राणों से है प्यारा झंडा – उपरोक्तानुसार।
21. पूरे हिंदुस्तान से- उपरोक्तानुसार।
22. बाल गुलदस्ता, प्रकाशन वर्ष 2016, हरे कृष्ण प्रकाशन , मुरादाबाद।
23.हम विश्वास जगाएंगे – प्रकाशन वर्ष 2018, समाज शिक्षा संस्थान, दिल्ली।
24 .हम आजादी के बच्चे हैं – प्रकाशन वर्ष 2018, लवकुश सिंह मऊ, उत्तर प्रदेश।
25. राकेश चक्र की मनोरंजक शिशु कविताएँ – प्रकाशन वर्ष 2019, पंकज सिंह मऊ,उत्तर प्रदेश।
26. मेरे प्रिय शिशु गीत – प्रकाशन वर्ष 2019 , लवकुश सिंह मऊ , उत्तर प्रदेश।
27 . गाते अक्षर खुशियों के स्वर – प्रकाशन वर्ष 2020 ज्ञान गीता प्रकाशन, दिल्ली।
28. मेरी प्रिय बाल कविताएं- प्रकाशन वर्ष 2020, लवकुश सिंह मऊ उत्तर प्रदेश।
29. प्रेरक बाल कविताएं – प्रकाशन वर्ष 2020, उपरोक्तानुसार।
30. मेरी चुनिंदा बाल कविताएं – प्रकाशन वर्ष 2021, उपरोक्तानुसार।
31. मनोरंजक बाल कविताएं – प्रकाशन वर्ष 2021 उपरोक्तानुसार।
32. नटखट गिलहरी – प्रकाशन वर्ष 2021, प्रकाशन विभाग भारत सरकार , दिल्ली।
33. मनभावन पहेलियाँ, लोरियाँ और प्रभातियाँ, 2021ज्ञान गीता प्रकाशन दिल्ली।
रूम टू इंडिया से प्रकाशित पोस्टर गीत
1. सप्ताह के दिन
2 . कोयल
विशेष उपलब्धियां
1.दूरदर्शन व आकाशवाणी से निरंतर प्रसारण, भारत की विभिन्न पत्र – पत्रिकाओं में हजारों से अधिक आलेख, कविताएं, गीत, गजल, कहानियां तथा बाल साहित्य की सभी विधाओं में निरंतर प्रकाशन। कई रचनाएँ पुरस्कृत।
2. कई संदर्भ ग्रंथों एवं शोध पत्रों में उल्लेख।
शोध कार्य
1. लखनऊ विश्वविद्यालय से समग्र साहित्य पर शोध कार्य।
2. महात्मा ज्योतिबा फूले रुहेलखंड विश्वविद्यालय द्वारा बाल काव्य पर तीन बार शोध कार्य ।
संपादित – संग्रहों में रचनाओं का योगदान – लगभग तीन दर्जन से साझा – संग्रह
प्रकाशनाधीन पुस्तकें – पाँच
सम्मान और पुरस्कार
राजकीय तथा अनेकानेक साहित्यिक एवं गैर साहित्यिक संस्थाओं से सम्मानित एवं पुरुस्कृत।
प्रमुख पुरुस्कार एवं सम्मान
1. राज्य कर्मचारी साहित्य संस्थान उत्तर प्रदेश द्वारा ‘सुमित्रानंदन पंत पुरस्कार’ 2007, उत्तर प्रदेश।
2. उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान द्वारा ‘बाबू श्याम सुन्दर सर्जना पुरुस्कार’ 2012।
3 . दिल्ली पब्लिक लाइब्रेरी, संस्कृति मंत्रालय भारत सरकार द्वारा ‘बाल साहित्य श्री सम्मान’ 2017 (डेढ़ लाख की धनराशि सहित) आदि।
4 . साहित्य मण्डल श्रीनाथ द्वारा ‘ कंचनबाई राठी सम्मान ‘ वर्ष 2018।
5 . ‘बाल साहित्य श्री सम्मान’ , उड़ीसा वर्ष 2018।
6 . उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान द्वारा अमृत लाल नागर बाल कथा सम्मान वर्ष 2018।
7. बाल साहित्य भारती सम्मान उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान लखनऊ 2020, ढाई लाख की धनराशि सहित।
8. उत्तर प्रदेश रत्न सम्मान , मैं भारत हूँ संस्था मुम्बई 2021।
सम्प्रति :- उत्तर प्रदेश पुलिस के इंटेलीजेंस विभाग ) से सेवानिवृत्त अधिकारी, वर्ष 2014।
(मागील भगत आपण पहिले – शब्द – तुला पुरस्कारही बरेच मिळाले आहेत. आता इथून पुढे)
मी – महाराष्ट्र साहित्य सभेचा शंकर खंडू पाटील पुरस्कार, श्री. दा. पानवलकर पुरस्कार, अग्रणी पुरस्कार इ. पुरस्कार मला मिळाले आहेत.
शब्द – तू विनोदी कथाही लिहिल्या आहेस. त्या कथांमध्ये शिरताना आम्हाला खूप गंमत वाटली होती.
मी – गंभीर कथा लिहिण्याकडे माझा कल असला तरी मी विनोदी कथाही लिहिल्या आहेत. ‘हलकंफुलकं’ नावाचा माझा कथासंग्रह प्रसिद्धीच्या मार्गावर आहे. आणखी एक सांगायचं म्हणजे मी एक विज्ञान कथाही लिहिली होती.
शब्द – अठवतय आम्हाला. मराठी विज्ञान परिषदेतर्फे कथास्पर्धा जाहीर झाली होती, तेव्हा तू ती कथा लिहीली होतीस. इतकंच नव्हे, तर तुझ्या त्या कथेला पहिल्या नंबरचं
बक्षीसही मिळालं होतं…..आजपर्यंत तू आम्हाला बालसाहित्यात खेळवलंस, प्रौढवाङ्मयात बसवलंस. आकाशवाणीकडे घेऊन गेलीस. आम्हाला हाताशी धरून तू वेगवेगळ्या वर्तमानपत्रांच्या रविवारच्या पुरवण्यांमधे विविध लेखनातून घेऊन गेलीस. नभोनाट्याच्या वेगळ्याच वाटेवर घेऊन गेलीस.
मी – हो. पण त्याचं श्रेय आकाशवाणीत असलेले, नाट्याविभागाचे अधिकारी श्री. शशी
पटवर्धन यांना आहे. एरवी असं काही लिहिण्याची कल्पनाही मला सुचली नसती. माझे वडील श्री. ज. जोशी यांची ‘रघुनाथाची बखर’ ही कादंबरी खूप लोकप्रिय झाली होती. मला श्री. शशी पटवर्धन यांनी या कादंबरीचे १३ भागात नाट्यरूपांतर करायला सांगितले. मला हे काम कितपत जमेल, याबाद्दल मी साशंक होते. पण जसजसी करत गेले, तसतशी मजा आली. हे १३ भागांचे नभोनाट्य रूपांतर श्री.शशी पटवर्धन यांना खूप आवडलेच पण नभोनाट्य – मालिका सादर झाल्यानंतर श्रोत्यांनाही खूप आवडल्याची पत्रे आकाशवाणीकडे आली. काहींचे फोनही आले. माझ्यासाठी हा वेगळा आणि आनंददायी अनुभव होता.
शब्द – आम्ही वेगळंच म्हणतोय……
मी – काय म्हणताय तुम्ही?
शब्द – तू आम्हाला आता, मगाशी म्हंटल्याप्रमाणे तुझ्या कादंबरीत बसंव. तुझ्या कादंबरीत बसण्याची आमची खूप खूप इच्छा आहे.
मी – तो प्रयत्न मी नक्कीच करेन. तुम्ही मात्र एक केलं पाहिजे.
शब्द – काय केलं पाहिजे आम्ही?
मी – आजपर्यंत तुम्ही मला जशी साथ दिलीत, तशी साथ पुढेही मला दिली पाहिजे. देणार ना!
शब्द – देणार ना! म्हणजे काय? नक्कीच देणार! तू हाक मारलीस की आम्ही हजर.
( मागील भगत आपण पहिलं – शब्द – ए, जरा तुझ्या प्रौढ साहित्याबद्दलही बोलू या का?
मी – हो.sss बोलूया की….आता इथून पुढे –
मी – माझ्या लग्नांनंतरही माझं कथालेखन चालू राहिलं. म्हणजे नेटाने ते चालू ठेवलं. सासरी आल्यावर माझं अनुभव विश्व जास्त समृद्ध झालं, असा मला तरी वाटतं. तसे आपल्या अवती – भवती बारे-वाईट प्रसंग नेहमीच घडतात. सगळ्यांच्याच मनावर त्या प्रसंगांचा परिणाम होत असतो. पण त्यातला एखादा हृदयस्पर्शी प्रसंग लेखकाच्या मनात आतपर्यंत जाऊन पोचतो. तिथेच तो रुजतो. मग या प्रसंगाच्या आधी काय घडलं असेल? नंतर काय घडेल, हे लेखक त्याच्या कल्पनाशक्तीच्या आधारे ठरवतो. आणि कथा तयार होते.
शब्द – हे पण आम्हाला माहीतच आहे. तू एकदा तुझ्या कथाकथनाच्या कार्यक्रमात तू, ‘कथा कशी सुचते’, हे सांगितलं होतस. आम्हीच तर तुझ्या तोंडून बोलत होतो. बरं! तू
तुझ्या प्रौढ वङ्मायाबद्दल बोलत होतीस ना!
मी – हो. लग्नांनंतरही मी माझं लेखन नेटाने चालू ठेवलं, पण लेखनासाठी सासरी फारसा वेळ मिळायचा नाही. सारखं कुठलं ना कुठलं तरी काम असेच.
शब्द – ए, पण काम करतानाही तुला एखादं कथाबीज तुला साद घालतच असायचं. नाही का?
मी – हो अगदी बरोबर! माझ्या एका कथेची सुरुवात तर मला केर काढताना सुचली.
शब्द – आणि केर काढणं थांबवून तू आम्हाला साद घातलीस आणि घाईघाईने आम्हाला कागदावर उतरवलंस आणि ‘बाळ चालणार आहे’, ही कथा आकाराला आली.
मी – हो आणि या कथेला चक्क ‘इंदू साक्रीकर पुरस्कार मिळाला. शब्दमित्रांनो तुम्हाला सगळं स्पष्ट आठवतय बर का, इतक्या वर्षापूर्वीचं. नंतर माझ्या कथा वेगवेगळ्या मासिकातून , दिवाळी अंकातून प्रसिद्ध होऊ लागल्या. सत्यकथेत कथा प्रसिद्धा झाल्यावर मला विशेष आनंद व्हायचा. कारण सत्यकथा या मासिकाची गणना दर्जेदार मासिकात व्हायची ना! माझ्या ३ कथांचे हिन्दी गुजराती आणि कानडी भाषातून अनुवाद झाले आहेत. झुळूक, वर्तमान, आणि माणूस या त्या तीन कथा.
शब्द – तुझ्या एका कथासंग्रहालाही तू ‘माणूस नाव दिलं आहेस.
मी – हो. आणि त्या कथासंग्रहावर माझी मैत्रीण उज्ज्वला केळकर हिने अतिशय सुरेख असे आस्वादात्मक लेखन केले होते. आपण लिहिलेलं वाचकांना आवडतं, याची पावती होती ती!
शब्द- मला वाटतं हा तुझा पहिला कथासंग्रह.
मी – नाही… नाही…’चित्रांगण’ हा माझा पहिला कथासंग्रह. ‘माणूस’ हा दुसरा. …’चित्रांगण’ प्रकाशित झालं तेव्हा मी अगदी भारावून गेले होते.
शब्द – स्वाभाविक आहे. पहिल्या वहिल्या गोष्टीचा प्रत्येकाला अप्रूप असतं.
मी – आणि बरं का, प्रसिद्ध कवी-गीतकार अशोक जी परांजपे ह्यांनी त्यावर चांगला अभिप्राय मला लिहून दिला होता. शब्दांनो, तुम्हाला सांगते, माझ्या दृष्टीने तो मला मिळालेला पुरस्कारच होता. माझी मैत्रीण उज्ज्वला हिने या पुस्तकावरही केलेले आस्वादात्मक लेखन वर्तमानपत्रात प्रसिद्ध झाले होते. शिवाय काही वाचकांनी फोन करूनही कथा आवडल्याचे संगितले. वाचकांचे आलेले असे अभिप्राय लेखकांना पुरस्काराप्रमाणेच वाटतात.
शब्द – तुझ्या इतर पुस्तकांबद्दल सांग ना! किती झाली असतील ग तुझी पुस्तकंआत्तापर्यंत?
मी – बालवाङ्मय , प्रौढ वाङ्मय मिळून माझी आत्तापर्यंत ५० पुस्तके झालीत.
शब्द – बहुतेक सगळे कथासंग्रहच आहेत नाही का?
मी – हो. पण ललित लेख, विनोदी लेख, कथा असे सगळ्या प्रकारचे लेखन मी केलेले आहे.
शब्द – ए ss शुक… शुक… अग शुभदा…. शुभदा साने…जरा इकडे बघ ना! ऐक तरी आम्ही काय म्हणतोय ते….
मी – कोण तुम्ही ? आणि असे घोळक्याने का उभे आहात? सांगा ना!
शब्द – ओळखलं नाहीस? तुझ्यातच तर असतो आम्ही. तुझ्या मनात…. तू जेव्हा आपल्या भावना व्यक्त करतेस, तेव्हा आमचीच तर मदत घेतेस. आम्ही म्हणजे शब्द,
मी – खरच की रे, तुम्ही माझे सवंगडी आहात. अगदी बालपणापासूनचे. तुम्हाला शब्दमित्र म्हंटलं तर, चालेल का?
शब्द – आता कसं बोललीस? तुला आवडतं आमच्याशी खेळायला. तू लहान होतीस, अगदी तेव्हापासूनच….. आठवतय का?
मी – आठवतय ना! मी चौथीत किंवा पाचवीत असेन, तेव्हाची गोष्ट…. एके दिवशी संध्याकाळी मला खूप कंटाळा आला होता. त्याचं काय झालं, शाळेतून घरी आले, तेव्हा आई नि दादा दोघेही घरात नव्हते. दादा म्हणजे माझे वडील.
शब्द – दादा म्हणजेच सुप्रसिद्ध साहित्यिक श्री. ज. जोशी….
मी – हं ! आगदीबरोबर! तर काय सांगत होते, आई नि दादा दोघेही तेव्हा घरात नव्हते. आणि नेहमी खेळायला येणारी माझी मैत्रीणही तेव्हा बाहेर गेली होती. थोडी हिरमुसून मी अंगणात आले. अगदी कंटाळा आला होता मला आणि अचानक काही ओळी माझ्याकडे धावत आल्या.
शब्द – अग, त्या ओळीमधे आम्हीच होतो. म्हणजे तू आम्हाला बसवलं होतस. आम्हाला आठवतय ना! ‘झाला कंटाळवाणा वेळ सख्यांशी जमेना मेळ ….’ आम्हाला एकत्र करून गुंफलेल्या त्या ओळी होत्या. नंतरच्या आठ-दहा ओळीतही तू आम्हाला असेच बसवून टाकले होतेस. तुझ्या त्यावेळच्या मन:स्थितीचे अगदी योग्य वर्णन होते.
मी – अगदी बरोबर! ती माझी पहिली कविता आणि त्यानंतर काय झालं माहीत आहे?
शब्द – काय झालं ?
मी – मला जाणवलं, अरे, हे आपल्याला जमतय बरं का? मग मला कविता करायचा नादच लागला. कुठला तरी विषय घ्यायचा आणि त्यावर कविता करून टाकायची. मग ती कविता मी वहीत लिहून ठेवायची. अशी दोन – तीन वर्षे गेली. आणि मग एकदा – –
शब्द – एकदा काय झालं?
मी – मे महिन्याच्या सुट्टीत आम्ही मुंबईला मामाकडे गेलो होतो. तेव्हा दादा मला चक्क शांताबाई शेळके यांच्याकडे घेऊन गेले. कारण तोपर्यंत मी कविता करते, हे दादांना कळलं होतं॰ जेष्ठ आणि श्रेष्ठ कवियत्री शांताबाई यांच्याशी माझी तेव्हा ओळख झाली. त्यांनी माझ्या कविता आपुलकीने वाचल्या. काही कवितांचं कौतुक केलं. काही कवितांमधल्या चुका दाखवल्या. शांताबाईंच्या शाबासकीनं मला प्रोत्साहन मिळालं.
शब्द – मग तुझ्या कविता मासिकातून छापून येऊ लागल्या. नाही का?
मी – हो. आणि त्यानंतर पुढच्याच वर्षी माझ्या ‘सावल्या’ या कवितेला ‘साधनाच्या काव्यस्पर्धेत कुमार गटातलं पहिलं बक्षीस मिळालं.
शब्द – केव्हा मिळाला ग हा पुरस्कार तुला?
मी – मला वाटतं १९६२ साल असेल. त्यानंतर मी बालसाहित्यात गुरफटत गेले. नंतर मला शाळेत बालकवीयत्री म्हणून सगळे ओळखू लागले. लहान मुलांच्या मासिकांसाठी मी कथा-कविता पाठवाव्या, म्हणून मला पत्रे येऊ लागली. नंतरच्या… शब्द – नंतरच्या काळात तुझे, बालकवितासंग्रह, बालकथासंग्रहप्रकाशित झाले. तुझ्या काही बालकवितासंग्रह, बालकथासंग्रह यांना पुरस्कारही मिळाले. हो ना?
मी – हो. ‘मजेचा तास’ ह्या कथासंग्रहाला वा. गो. आपटे पुरस्कार आणि आशीर्वाद पुरस्कार आणि ललितसाहित्य पुरस्कार असे तीन पुरस्कार मिळाले. ’गोष्टीचं झाड’ या कथासंग्रहाला पुण्याच्या साहित्यप्रेमी भगिनी मंडळाचा पुरस्कार मिळाला.
शब्द – ए, हे सगळं झालं, पण तू ‘आनंदयात्री पुरस्काराबद्दल विसरलीस वाटतं?
मी – छे:! तो कसं विसरेन? छावाच्या दिवाळी अंकात प्रसिद्ध झालेल्या माझ्या ‘निसर्गाची भाषा’ या कथेला तो आनंदयात्री पुरस्कार मिळाला होता. आता आणखी एका पुरस्काराबद्दल सांगते.
शब्द – उत्कृष्ट बालकवितेबद्दल मिळालेल्या पुरस्काराबद्दल संगतीयस ना?
मी – हो. आता सांगायला लागले आहे, तर सगळंच सांगते. गंमतजंमतच्या दिवाळी अंकात प्रसिद्ध झालेल्या माझ्या ‘मंजर बघतय टी.व्ही.’ ह्या कवितेची निवड उत्कृष्ट बालकविता म्हणून परीक्षकांनी केली.
शब्द- याशिवाय तुला नागपूरच्या पद्मगंधा प्रकाशनचाही पुरस्कार मिळाला होता.
मी – हो. माझ्या एकूण सगळ्याच साहित्याबद्दल तो मिळाला होता. म्हणजे बालसाहित्य आणी प्रौढांसाठी लिहिलेलं साहित्य या दोन्हीचा विचार त्यांनी केला होता.
शब्द – ए, जरा तुझ्या प्रौढ साहित्याबद्दलही बोलू या का?