हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक साहित्य # ४१२ ☆ विश्व पृथ्वी दिवस के अवसर पर ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ४१२ ☆

?  आलेख – विश्व पृथ्वी दिवस के अवसर पर ? श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

🌳माटी से मानुष तक इस हरियाली की रक्षा करें। विश्व पृथ्वी दिवस की एक दिन देर से शुभकामनाएँ।🌳

धरती हमारी चेतना का व्यापक विस्तार है और इसी चेतना को झकझोरने का एक वैश्विक अनुष्ठान है विश्व पृथ्वी दिवस।  उन्नीस सौ सत्तर की वह सुहानी मगर धरती के लिए हमारी फिक्रमंद सुबह में वर्ल्ड अर्थ डे सेलिब्रेशन का इतिहास है, जब अमेरिकी सीनेटर गेलॉर्ड नेल्सन के एक आह्वान पर लाखों लोग सड़कों पर उतर आए थे। वह सब महज एक प्रदर्शन नहीं था । आधुनिक मनुष्य का अपनी जड़ों को संभालने  का पहला सामूहिक संकल्प था जिसे आज पूरी दुनिया २२ अप्रैल के कैलेंडर में पृथ्वी दिवस के रूप में सहेज कर मनाती है। आज इस महाभियान की कमान अर्थ डे नेटवर्क नामक संस्था के हाथों में है जो दुनिया के कोने-कोने में पर्यावरण संरक्षण की अलख जगा रही है।

प्रकृति के साथ मनुष्य का रिश्ता वैसा ही है जैसा एक नन्हे शिशु का अपनी मां के आंचल से होता है पर विडंबना देखिए कि विकास की अंधी दौड़ में हमने उसी आंचल को तार-तार करना शुरू कर दिया है।  संवेनदनशील दृष्टि से देखें तो पाएंगे कि पृथ्वी दिवस मनाना किसी त्यौहार की रस्म अदायगी नहीं बल्कि अपनी उस मां से माफी मांगना है जिसके धैर्य की परीक्षा हम सदियों से ले रहे हैं। विकास के नाम पर, युद्धों के नाम पर , हम पृथ्वी के प्रति अप्राकृतिक बर्ताव करते आ रहे हैं। जब हम कंक्रीट के जंगलों को विस्तार देते हैं और हरियाली को हाशिए पर धकेलते हैं तब हम दरअसल अपने और अपनी आने वाली नस्लों के  फेफड़ों के लिए हवा कम कर रहे होते हैं।

 यह दिन हमें ठिठक कर सोचने का मौका देता है कि क्या हम अपनी आने वाली पीढ़ी को विरासत में सिर्फ कभी समाप्त न किए जा सकने वाले प्लास्टिक के पहाड़ और जहरीली प्रदूषित नदियां ही सौंप कर जाएंगे।

भारतीय संस्कृति में तो भूमि को माता मानकर उसके वंदन की परंपरा रही है जहां सुबह उठकर पैर जमीन पर रखने से पहले भी क्षमा मांगी जाती है। इसी सांस्कृतिक बोध को आज के वैज्ञानिक यथार्थ से जोड़ना ही इस दिवस की सार्थकता है।

हमें समझना होगा कि जब हम एक पौधा रोपते हैं तो हम केवल मिट्टी में एक बीज नहीं डाल रहे होते बल्कि भविष्य के लिए एक उम्मीद की सांस बो रहे होते हैं। जल की एक बूंद को बचाना सागर की मर्यादा को बचाना है और बिजली की व्यर्थ खपत को रोकना सूरज की तपिश के प्रति अपनी संवेदनशीलता दिखाना है।

आज जब ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन जैसी भारी-भरकम शब्दावलियां हमारे ड्राइंग रूम तक पहुंच चुकी हैं तब समाधान किसी प्रयोगशाला में नहीं बल्कि हमारी अपनी जीवनशैली के बदलाव में छिपा है।आवश्यक है कि हम अपने दैनिक आचरण को इतना सात्विक और प्रकृति अनुकूल बनाएं कि हर दिन पृथ्वी दिवस बन जाए। कूड़े का सही प्रबंधन और एकल उपयोग वाले प्लास्टिक का त्याग करना वह छोटी सी आहुति है जो इस महायज्ञ में प्रत्येक नागरिक को देनी चाहिए। अंततः हमारी सफलता इस बात में नहीं है कि हमने कितनी ऊंची इमारतें खड़ी कीं बल्कि इस बात में है कि हम अपनी धरती की हरियाली और उसकी धड़कन को कितना सुरक्षित रख पाए।

हम सब मिलकर एक ऐसी सुबह का सपना देखें जहां हवाओं में सुगंध हो और नदियों में जीवन का संगीत बहता रहे।

सोलर पैनल से विद्युत उत्पादन को बढ़ावा दिया जा रहा है, पर अब समय आ गया है कि हम हवा से बिजली बनाने वाले संयंत्र हर छत पर लगाएं। समुद्र की लहरों से बिजली बनाने को प्रोत्साहित किया जाए, बिजली से चलने वाली कारों को और बढ़ावा दिया जाए, यही विकल्प है जो पृथ्वी की नैसर्गिक रक्षा कर सकेंगे ।

© श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव

समीक्षक, लेखक, व्यंगयकार

लंदन प्रवास पर

ए २३३, ओल्ड मीनाल रेसीडेंसी, भोपाल, ४६२०२३, मो ७०००३७५७९८

readerswriteback@gmail.कॉम, apniabhivyakti@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # २८६ ☆ वैसाख के संस्कार: जब परंपरा ने विज्ञान बनकर समाज को ठंडक दी ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ ☆

श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की  प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं  में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना वैसाख के संस्कार: जब परंपरा ने विज्ञान बनकर समाज को ठंडक दी। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – आलेख # २८६ ☆

वैसाख के संस्कार: जब परंपरा ने विज्ञान बनकर समाज को ठंडक दी ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

भीषण गर्मी जब अपने चरम पर होती है, तब केवल शरीर ही नहीं, मन और समाज भी तपने लगते हैं। आज हम एयर कंडीशनर और कूलर की ओर भागते हैं, लेकिन कभी ठहरकर सोचें—हमारे पूर्वजों ने इस तपती ऋतु के लिए क्या उपाय बनाए थे?

वैसाख मास की परंपराएँ इसी प्रश्न का सजीव उत्तर हैं। जलदान, सत्तू का दान और मौसमी फलों का वितरण—ये केवल धार्मिक कर्मकांड नहीं थे, बल्कि एक सुविचारित सामाजिक और वैज्ञानिक व्यवस्था थी। गाँव-गाँव में मटके रखना, राहगीरों के लिए पानी की व्यवस्था करना—यह समाज को निर्जलीकरण और लू से बचाने का सामूहिक उपाय था।

सत्तू ( चने का चूर्ण) वास्तव में गर्मी के विरुद्ध शरीर का प्राकृतिक कवच है। यह ठंडक देता है, ऊर्जा बनाए रखता है और शरीर के संतुलन को बनाए रखता है। मौसमी फल—तरबूज, खीरा, आम—ये शरीर को जल और पोषण दोनों देते हैं। जब इन्हें दान के रूप में बाँटा जाता है, तो यह संदेश भी जाता है कि जो हमारे लिए उपयोगी है, वही समाज के लिए भी आवश्यक है।

इसी परंपरा का एक अत्यंत संवेदनशील और व्यापक रूप हमें जीव-जंतुओं के प्रति हमारे व्यवहार में दिखाई देता है। गाँवों, कस्बों और शहरों में बड़े-बड़े पात्र, नाद और टंकियाँ रखी जाती हैं, जिनमें पानी भरा जाता है ताकि पशु-पक्षी भी अपनी प्यास बुझा सकें। साल भर जिन पात्रों पर शायद ध्यान नहीं जाता, वे इस समय साफ किए जाते हैं, उनमें ताज़ा पानी भरा जाता है। यह केवल एक कार्य नहीं, बल्कि करुणा का विस्तार है।

दरअसल, जब इन कार्यों को धर्म और पुण्य से जोड़ा गया, तभी वे व्यापक रूप से समाज में स्वीकार्य हो पाए। यही कारण है कि हम न केवल स्वयं इनका पालन करते हैं, बल्कि दूसरों को भी प्रेरित करते हैं। बचपन में जो दृश्य हमने सहज रूप से देखे—आज उन्हें करते हुए समझ में आता है कि यह केवल परंपरा नहीं, बल्कि जीवन जीने की एक वैज्ञानिक और संवेदनशील व्यवस्था थी।

वैसाख हमें सिखाता है कि प्रकृति, समाज और समस्त जीवों के साथ संतुलन बनाकर ही हम इस भीषण गर्मी से लड़ सकते हैं। यही हमारे संस्कारों की सच्ची ठंडक है।

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©  श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

माँ नर्मदे नगर, म.न. -12, फेज- 1, बिलहरी, जबलपुर ( म. प्र.) 482020

मो. 7024285788, chhayasaxena2508@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ पथ, पाथेय और पथिक – डा. हर्ष कुमार तिवारी ☆ श्री यशोवर्धन पाठक ☆

श्री यशोवर्धन पाठक

 

?  पथ, पाथेय और पथिक – डा. हर्ष कुमार तिवारी ? श्री यशोवर्धन पाठक

(जन्म दिवस पर आत्मीय बधाई)

आगे बढ़ते चलो, सफलता पीछे आयेगी,

कर्म करो वह आकर तुम्हें स्वयं रिझायेगी।

हिन्दी के सुप्रसिद्ध कवि स्व. श्री श्रीकृष्ण सरल की उपरोक्त काव्य पंक्तियों की सार्थकता सिद्ध की है जबलपुर के ऐसे बहुमुखी प्रतिभा के धनी डा. हर्ष कुमार तिवारी ने ‌जिन्हें संस्कार, संस्कृति, साहित्य और पत्रकारिता की विशेषताएं विरासत में मिलीं।

सुप्रसिद्ध साहित्यकार और आध्यात्मविद परम आदरणीय ‌पं. दीनानाथ जी तिवारी के प्रपौत्र, सम्माननीय पं . ब्रह्मदत्त जी तिवारी के पौत्र एवं स्वनामधन्य साहित्यकार, पत्रकार और शिक्षाविद श्रद्धेय डा. राजकुमार सुमित्र जी के यशस्वी पुत्र डा. हर्ष कुमार तिवारी ने प्रतिष्ठित विरासत और उच्च स्तरीय संबंधों पर सदा गर्व जरूर महसूस किया है लेकिन आगे बढ़ने के लिए कभी उनका उपयोग नहीं किया। श्रद्धेय सुमित्र जी की प्रेरणा और आशीर्वाद से डा. हर्ष कुमार तिवारी ने अपने जीवन की विकास यात्रा में अपनी जमीन खुद तैयार की। शिक्षा, लेखन और पत्रकारिता में उन्होंने पूरी सक्रियता एवं दक्षता के साथ सराहनीय सफलताएं अर्जित की है। जबलपुर के दैनिक समाचार पत्रों में महत्वपूर्ण विषयों पर उनके सोचनीय लेख अत्यंत पठनीय और प्रशंसनीय होते हैं। दैनिक जयलोक में प्रकाशित मन‌ की बात और सुनो एक बात शीर्षक से उनका कालम काफी चर्चा में रहा। पत्रकारिता में अपनी उल्लेखनीय गतिविधियों को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने अनेक पत्र-पत्रिकाओं में संपादन कार्य भी किया और बाद में डायमीनिक संवाद टी.. वी… का संचालन करते हुए असरदार समाचारों की प्रस्तुति के साथ ही साहित्यकारों की श्रेष्ठ रचनाओं के‌ प्रसारण का महत्वपूर्ण कार्य कर रहे हैंजो कि काफी चर्चित हो रहा है। श्रद्धेय डा. राजकुमार सुमित्र जी द्वारा साहित्यिक गतिविधियों और प्रकाशन को प्रोत्साहित करने के लिए डा. हर्ष कुमार तिवारी और श्री राजेश पाठक प्रवीण के सक्रिय सहयोग से पाथेय प्रकाशन सहित पाथेय समूह की जो स्थापना की थी, वह आज भी प्रगति के सोपान की कहानी लिखते हुए सुमित्र जी के स्वर्गवास के बाद भी संस्कारधानी को राष्ट्रीय स्तर पर गौरवान्वित कर रही है।

ऐसे व्यक्ति अत्यंत सौभाग्यशाली होते हैं जो अपने गरिमामय व्यक्तित्व और कृतित्व से अपने परिवार की विरासत को गौरवान्वित करते हैं। डा हर्ष कुमार तिवारी भी ऐसे ही सौभाग्यशाली व्यक्ति हैं जिन्होंने अपने पिता सहित अपने पूर्वजों की प्रेरणा दायक विरासत के अनुरूप सराहनीय कीर्तिमान स्थापित किया है यहां तक कि अपनी बिटिया प्रियम को भी ऐसे संस्कार और मार्गदर्शन दिये ‌कि‌वह भी बाल्यावस्था में ही बाल पत्रकार के रूप में पत्रकारिता क्षेत्र में प्रतिष्ठित हो‌ चुकी है और संस्कारधानी आज उसकी प्रतिभा से गौरवान्वित है।

आज 23 अप्रैल को डा . हर्ष कुमार तिवारी जी का जन्म दिवस है और हमारी मंगलकामना है कि मीडिया पत्रकारिता के क्षेत्र में उनकी सक्रिय गतिविधियों से हम सभी सदा गौरवान्वित होते रहें।

 © श्री यशोवर्धन पाठक

पूर्व प्राचार्य, राज्य सहकारी प्रशिक्षण संस्थान,  जबलपुर

💐 ई-अभिव्यक्ति परिवार की ओर से डॉ हर्ष कुमार तिवारी जी को उनके जन्मदिवस के अवसर पर अशेष हार्दिक शुभकामनाएं 💐

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ९८० ⇒ गाढव ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “गाढव।)

?अभी अभी # ९८० ⇒ आलेख – गाढव ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

हर भाषा में कुछ शब्द बड़े प्यारे होते हैं, और अगर प्यार से बोले जाएं तो और भी प्यारे लगते हैं। शेक्सपीयर ने गुलाब का उदाहरण दिया। लेकिन अगर वे गुलाब की जगह किसी गधे का उदाहरण देते तो शायद बात नहीं बनती। हम जिसे चाहें उसे गधे की उपाधि दे सकते हैं, लेकिन गधे को हम किसी और अच्छे नाम से संबोधित नहीं कर सकते। हो सकता हो, यह कॉपीराइट का मामला हो।

कृष्ण चंदर ने एक गधे की आत्मकथा ही नहीं लिखी, वह उसे संसद तक ले भी गए और उसकी वापसी भी की। हमारे हिंदी के आचार्य हमें प्यार से कालिदास कहते थे। कालिदास कभी इतने विद्वान थे कि, जिस डाल पर बैठे होते थे, उसे ही काटते थे। सभी दासों के अपने अपने दासबोध हैं। रत्नावली के भी तुलसीदास थे। अगर रत्नावली उनके ज्ञान चक्षु नहीं खोलती, तो क्या संसार उन्हें मर्यादा पुरुषोत्तम के तुलसी के रूप में जान पाता।।

ज्ञान की वर्षा गुरुकुल में होती है, कोई कृष्ण बन जाता है तो कोई सुदामा रह जाता है। बचपन के मित्र जब बरसों बाद मिलते हैं तो वही बचपन लौट आता है जहां जीवन में सहजता थी, सरलता थी, आपस में प्यारे प्यारे संबोधन थे। हमारे एक आचार्य हरिहर लहरी अपने विशेष प्रिय शिष्यों को बजरबट्टू कहते थे। हम भी अपने किसी मित्र को आपस में सिंधी कहते थे तो किसी को सरदार। बम्मन और कढ़ी तो बड़ा आम था। तब क्या हम मूर्ख अथवा गधे थे, जो हमें ना तो बुरा लगता था और ना ही हमारी धार्मिक भावना आहत होती थी। आज सोचते हैं तो आश्चर्य होता है। ये कहां आ गए हम।

आज वाणी पर संयम रखना पड़ता है। आज की पीढ़ी बाप शब्द तक से भड़क जाती है। बाप तक कैसे पहुंच गए, आपकी सातों पुश्तें याद करा देंगे। गांव में जिस तरह आज भी वृद्धजनों के लिए डोकरा और डोकरी शब्द प्रचलित है, गुजराती में बच्चों को डीकरा और डीकरी कहकर पुकारा जाता है। हमारे बनारस के छोरा छोरी महाराष्ट्र में मुलगा मुलगी हो जाते हैं। कहीं पोरा पोरी तो हैदराबाद में पोट्टा पोट्टी। आजकल के छोटे बच्चे पोट्टी का कुछ और ही अर्थ समझते हैं।।

अब देखिए, कितना प्यारा है आज का शब्द गाढव।

ध्वनि में माधव से मिलता जुलता। अन्यथा ना लें, हमारे यहां मिट्टी के माधो भी होते हैं और गोबर गणेश भी। आज आप इतना तनकर चल रहे हैं, कभी जीवन में आपने भी बेवकूफी की होगी। किसी ने आपको प्यार में ही सही, गधा अथवा बेईमान भी अवश्य ही कहा होगा। छुपा लें हमसे, क्या क्या छुपाएंगे। कभी तो आपको वे पुराने दिन याद आएंगे।

बहुत लाद लिया अपने आप पर परिवार और जिम्मेदारियों का बोझ। कर ली बहुत गधा हम्माली। बस अब नहीं होता। आता है कभी कभी ऐसा खयाल। फिर भी दिल है कि मानता नहीं। थोड़ा किसी ने फुसलाया, गधे को बाप बनाया, अपुन खुश।

अपनों के बिना भी क्या जीना ! तेरे बिना भी क्या जीना ?

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ९७९ ⇒ घराना ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “घराना।)

?अभी अभी # ९७९ ⇒ आलेख – घराना ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

मेरा नाम राजू, घराना अनाम, बहती है गंगा,

जहां मेरा धाम …

लेकिन सभी जानते हैं, कपूर खानदान के इस चिराग का भी एक सेमी क्लासिकल फिल्म संगीत का घराना था, जिसमें शंकर जयकिशन, शैलेंद्र हसरत और मुकेश ने मिलकर जो गीतों की बरसात शुरू की थी, उसने मेरा नाम जोकर तक थकने का नाम नहीं लिया था। और जहां तक नाम का सवाल है, तो पृथ्वी थिएटर से शुरू इस कपूर परिवार के अभिनय का करिश्मा आज भी कायम है।

घराना गर्व और गौरव का विषय है, अच्छे घराने की बहू के लिए ही गृह लक्ष्मी जैसे विशेषणों का प्रयोग किया जाता था। राजघरानों में आज हम भले ही केवल होलकर और सिंधिया राजघरानों तक ही सिमटकर रह गए हों, लेकिन शास्त्रीय संगीत के घरानों की बात तो कुछ और ही है।।

नृत्य और संगीत हमें स्वर्ग की नहीं, गंधर्व लोक की देन हैं, सवाई गंधर्व और कुमार गंधर्व इनके प्रत्यक्ष प्रमाण हैं। आप मानें या ना मानें, संगीत के घरानों और राजघरानों का आपसी संबंध बहुत पुराना है। आइए कुछ संगीत घरानों की चर्चा करें।

भारतीय शास्त्रीय संगीत और नृत्य की वह परंपरा है जो एक ही श्रेणी की कला को कुछ विशेषताओं के कारण दो या अनेक उप श्रेणियों में बाँटती है।।

घराना (परिवार, कुटुंब), हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत की विशिष्ट शैली है, क्योंकि हिंदुस्तानी संगीत बहुत विशाल भौगोलिक क्षेत्र में विस्तृत है, कालांतर में इसमें अनेक भाषाई तथा शैलीगत बदलाव आए हैं। घराना शब्द हिंदी शब्द ‘घर’ से आया है जिसका अर्थ है ‘घर’। यह आमतौर पर उस स्थान को संदर्भित करता है जहां संगीत विचारधारा की उत्पत्ति हुई; उदाहरण के लिए, ख्याल गायन के लिए प्रसिद्ध कुछ घराने हैं: दिल्ली, आगरा, ग्वालियर, इंदौर, अतरौली-जयपुर, किराना और पटियाला।

इसके अलावा शास्त्रीय संगीत की गुरु-शिष्य परंपरा में प्रत्येक गुरु व उस्ताद अपने हाव-भाव अपने शिष्यों की जमात को देता जाता है। घराना किसी क्षेत्र विशेष का प्रतीक होने के अलावा, व्यक्तिगत आदतों की पहचान बन गया है, यह परंपरा ज़्यादातर संगीत शिक्षा के पारंपरिक तरीके तथा संचार सुविधाओं के अभाव के कारण फली-फूली, क्योंकि इन परिस्थितियों में शिष्यों की पहुँच संगीत की अन्य शैलियों तक बन नहीं पाती थी।

हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत के गायन के लिये प्रसिद्ध घरानों में से निम्न घराने शामिल होते हैं: आगरा, ग्वालियर, इंदौर, जयपुर, किराना, और पटियाला।

सबसे पुराना ग्वालियर घराना है। तानसेन भी ग्वालियर से ही आए थे। हस्सू हद्दू खाँ के दादा नत्थन पीरबख्श को इस घराने का जन्मदाता कहा जाता है। दिल्ली के राजा ने इनको अपने पास बुला लिया था।।

जरा इन गायकों और उनके घरानों पर भी गौर कर लिया जाए ;

१. मेवाती घराना : पंडित जसराज

२.पटियाला घराना : उस्ताद बड़े गुलाम अली खां, बेगम अख्तर, निर्मला देवी और परवीन सुल्ताना

३. जयपुर अंतरौली घराना मल्लिकार्जुन मंसूर, किशोरी अमोनकर और अश्विनी भिड़े।

४. किराना घराना: भीमसेन जोशी  

५. आगरा घराना : जितेंद्र अभिषेकी

इन घरानों की शुद्धता, मर्यादा और अनुशासन का पालन शिष्यों को भी करना पड़ता है। गुरु शिष्य परम्परा यूं ही फलीभूत नहीं होती।

ना मिलावट ना खोट यही शास्त्रीय संगीत की पहचान है। एक भी सुर गलत नहीं।

धारवाड़, कर्नाटक से आए, घराने की बंदिश से अपने को मुक्त रखते हुए, लोक संगीत को शास्त्रीय संगीत की ऊंचाईयों तक पहुंचाने वाले कुमार गंधर्व स्वयं अपने आपमें एक घराना हैं।।

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ९७८ ⇒ अंतिम चौराहा ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “अंतिम चौराहा।)

?अभी अभी # ९७८ ⇒ आलेख –  अंतिम चौराहा ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

चार दिल चार राहें जहां मिले उसे चौराहा कहते हैं।

मैं तो चला, जिधर चले रस्ता! मैं चलूं, वहां तक तो ठीक, लेकिन क्या कहीं रास्ता भी चलता है। कबीर के अनुसार, अगर चलती को गाड़ी कहा जा सकता है, तो रास्ता भी चल सकता है और जब रास्ता चलेगा तो वह भी घिस घिसकर रास्ते से, रस्ता हो जाएगा।

चौराहे को चौरस्ता भी कहते हैं। कहीं कहीं तो इसे चौमुहानी भी कहते हैं। रास्तों की तरह, गलियां भी होती हैं, ठाकुर शिवप्रसाद सिंह की गली, आगे मुड़ती है, और वहीं कहीं बंद गली का आखरी मकान धर्मवीर भारती का है।।

इंसान का क्या है, जिंदगी में कभी दोराहे पर खड़ा है तो कभी चौराहे पर। होने को तो खैर तिराहा भी होता है, लेकिन न जाने मेरे शहर के गांधी स्टेच्यू को लोग रीगल चौराहा क्यूं कहते हैं, जब कि यहां तो तीन ही रास्ते हैं। हां, यह भी सही है कि एक रास्ता स्वयं रीगल थिएटर भी था, लेकिन समय ने वह रास्ता भी बंद कर दिया।

थिएटर तो सारे बंद हुए, मैं अब फिल्म देखने कहां जाऊं।

जिस चौराहे से चार राहें निकलती हैं, उन्हें आप चौराहे की भुजा भी कह सकते हैं। हम तो जब भी श्रीनाथ जी के दर्शन के लिए नाथद्वारा जाते हैं, काकरौली, चारभुजा जी और एकलिंग जी होते हुए झीलों की नगरी उदयपुर अवश्य जाते हैं। जहां सहेलियों की बाड़ी हो, वहां तो भूल भुलैया होगी ही।

यह अंक चार हमें एक चौराहे पर लाकर खड़ा कर देता है जहां हमें जयपुर की बड़ी चौपड़ और छोटी चौपड़ याद आ जाती है। बही खाते वाले चोपड़ा जी कब फिल्मों में आ गए, और यश कमा गए कुछ पता ही नहीं चला।।

अगर आपसे पूछा जाए, आपके शहर में कितने चौराहे हैं, तो शायद आप गिन नहीं पाएं। इसीलिए इन चौराहों का नाम दे दिया जाता है। कहीं चौक तो कहीं चौराहा। हमने अगर एक चौराहे का नाम जेलरोड रख दिया तो दूसरे का चिमनबाग चौराहा। चिमनबाग तो आज चमन हो गया, लेकिन हमारे भाइयों ने उस चौराहे का नाम ही बदलकर चिकमंगलूर चौराहा कर दिया। वैसे भी किसी विकलांग को दिव्यांग बनने में कहां ज्यादा वक्त लगता है।

हमारे शहर के प्रमुख चौराहों में अगर पलासिया चौराहा है तो गिटार चौराहा भी। जहां रोबोट लगा है, वह रोबोट चौराहा और जहां आज लेंटर्न होटल नहीं है, वहां भी लैंटर्न चौराहा है। सांवेर रोड पर अगर मरी माता चौराहा है तो रेडिसन होटल पर रेडिसन चौराहा। कुछ चौराहों पर भुजाएं जरा जरूरत से ज्यादा ही फड़फड़ाती हैं, रीजनल पार्क के आसपास तो इतनी राहें हैं कि राही, राह भी भटक जाए।।

इन सब चौराहों के बीच, पंचकुइया रोड पर एक अंतिम चौराहा भी है, क्योंकि वहां से आखरी रास्ता मुक्ति धाम की ओर ही जाता है। लेकिन यह जीव माया में नहीं उलझता ! वह जानता है, कोई ना संग मरे। बस थोड़ा श्मशान वैराग्य, शोक सभा और उठावने के बाद शाम को छप्पन दुकान।

क्या भरोसा कब जिंदगी की शाम आ जाए, कौन सा चौराहा हमारा अंतिम चौराहा हो जाए ! लेकिन हमने तो चौराहों को पार करना सीख लिया है। ट्रैफिक का सिपाही भले ही सीटी बजाता रहे, सिग्नल लाल लाल आंखें दिखलाता रहे, कोई मार्ग अवरोधक हमारी जिंदगी की गाड़ी को इतनी आसानी से नहीं रोक सकता।।

ऊपर भले ही चित्रगुप्त गणेश चोपड़ा भंडार खोले हमारे खाते बही की जांच करते रहें, हम स्वयंसेवक अपनी लाठी स्वयं साथ लेकर आएंगे। चित्रगुप्त के खातों की भी सरकार जांच करवा रही है। सब डिजिटल, ऑनलाइन और पारदर्शी हो रहा है। ईश्वर की मर्जी जैसा डायलॉग अब नहीं चलेगा।

जिसकी लाठी उसकी भैंस। यमराज को दूसरा वाहन तलाशना पड़ेगा। चित्रगुप्त को आईटी सेक्टर के लिए शिक्षित लोगों को ऊपर भी जॉब देने होंगे, और वह भी फाइव डे वीक और आकर्षक पैकेज के साथ। उसके बाद ही हमारी अंतिम चौराहे से रवानगी होगी। स्वर्ग में बर्थ नहीं, एक नया जॉब, एक नया चैलेंज।।

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # १७४ – देश-परदेश – एल पी जी गैस: नई मुसीबत – भाग – २ ☆ श्री राकेश कुमार ☆

श्री राकेश कुमार

(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ  की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” ज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)

☆ आलेख # १७४ ☆ देश-परदेश – एल पी जी गैस: नई मुसीबत – भाग – २ ☆ श्री राकेश कुमार ☆

मित्र के गैस संबंधित कार्य  के लिए सब बाधाएं पार कर डीलर के हॉल में प्रवेश कर राहत की सांस ली। संबंधित व्यक्ति तक पहुंचने की लिए ज़िग जैग व्यवस्था थी। इसको “क्राउड मैनेजमेंट” भी कहा जाता है।

समय बहुत लग जाएगा, ये विचार आते ही दिमाग के घोड़े चलाए। कहीं पढ़ा था, पानी अपना रास्ता स्वयं बनाता है। उसी तर्ज पर हम भी चल पड़े, अधिकतर लोग मोबाइल में वीडियो देख रहे थे, उनकी नजरों के सामने से उनसे आगे निकल गए।

अधिकतर लोग तो झगड़ा कर रहे थे, पेट खाली हो तो गुस्सा भी बहुत आता है। यहां तो घर के चूल्हे ही नहीं जल पा रहें हैं। हम जैसे ही बुकिंग कर्मचारी के सामने पहुंचे और अपना काम बताया, वो बोला आप गलत जगह में आए हैं। आपको तो एजेंसी के कंप्यूटर विभाग में जाना पड़ेगा। हम तो भेड़ चाल के कारण भीड़ के साथ चले आए थे।

कंप्यूटर विभाग वाले सज्जन फुर्सत में थे। उन्होंने मित्र के आधार कार्ड को सिस्टम से हटा दिया। मित्र को इस बावत सूचित कर राहत की सांस ली। हमें डर लग रहा था, कहीं मित्र परिवार सहित हमारे यहां ना आ जाए, कुकिंग गैस की किल्लत का समय जो चल रहा हैं।

© श्री राकेश कुमार

संपर्क – B 508 शिवज्ञान एनक्लेव, निर्माण नगर AB ब्लॉक, जयपुर-302 019 (राजस्थान)

मोबाईल 9920832096

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ९७७ ⇒ नेकी कर, यूट्यूब पर डाल ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “नेकी कर, यूट्यूब पर डाल।)

?अभी अभी # ९७७ ⇒ आलेख – नेकी कर, यूट्यूब पर डाल? श्री प्रदीप शर्मा  ?

होते हैं इस संसार में चंद ऐसे नेकचंद, जो नेकी तो करते हैं, लेकिन नेकी की कद्र ना करते हुए उसे दरिया में बहा देते हैं। दरिया के भाग तो देखें, नेकी की गंगा तो दरिया में बह रही है और राम, तेरी गंगा मैली हो रही है, पापियों के पाप धोते धोते। फिर भी देखिए, एक संत का चित्त कितना शुद्ध है, चलो मन, गंगा जमना तीर। हम कब नेकी की कद्र करना जानेंगे।

जिस तरह जल ही जीवन है, उसी तरह अच्छाई, जिसे हम नेकी कहते हैं, वह भी एक लुप्तप्राय सद्गुण हो चला है, इसे सुरक्षित और संरक्षित रखना ही समय की मांग है, इसे यूं ही दरिया में बहाना समझदारी नहीं।।

अच्छाई का जितना प्रचार प्रसार हो, उतना बेहतर। किताबों के ज्ञान की तुलना में व्यवहारिक ज्ञान अधिक श्रेष्ठ है। कहां हैं आजकल ऐसे लोग ;

भला करने वाले,

भलाई किए जा।

बुराई के बदले,

दुआएं दिए जा।।

हमारा आज का सिद्धांत, जैसे को तैसा हो गया है। कोई अगर आपके एक गाल पर चांटा मारे, तो बदले में उसका मुंह तोड़ दो। नेकी गई भाड़ में। देख तेरे नेकी के दरिये की, क्या हालत हो गई भगवान, कितना बदल गया इंसान।

कहते हैं, आज की इस दुनिया में बुराई और पाप बहुत बढ़ गया है। पाप का घड़ा तो कब का भर जाता। कुछ नेकी और कुछ नेकचंद, यानी कुछ अच्छाई और कुछ अच्छे लोग आज भी हमारे बीच हैं, जिनके पुण्य प्रताप से हम अभी तक रसातल में नहीं समाए। लोग भी थोड़े समझदार और जिम्मेदार हो चले हैं। नेकी की कद्र करने लगे हैं। कुछ लोग नेकी को आजकल दरिया में नहीं व्हाट्सएप पर अथवा फेसबुक पर भी डालने लगे हैं।।

व्हाट्सएप पर तो मानो फिर से नेकी का ही दरिया बह निकला है। व्हाट्सएप भी हैरान, परेशान, बार बार संकेत भी देने लगता है, forwarded many times, लेकिन नेकी है, जो बहती चली आ रही है। किसी ने नेकी को व्हाट्सपप से उठाकर फेसबुक पर डाल दिया। खूब लाइक, कमेंट और शेयर करने वाले मिल रहे हैं नेकी को। नेकी की इतनी पूछ परख पहले कभी नहीं हुई, जितनी आज सोशल मीडिया में हो रही है। हाल ही में एक मित्र ने व्हाट्सएप पर एक ग्रुप बनाया, एक बनेंगे, नेक बनेंगे और मुझे बिना मेरी जानकारी के उसमें शामिल भी कर लिया। जब मैंने पूछा, तो यही जवाब मिला,  नेकी और पूछ पूछ।

टीवी पर दर्जनों धार्मिक चैनल इस नेक काम में लगे हुए हैं, कितने सामाजिक, धार्मिक और पारमार्थिक संगठन और एन.जी. ओ. नेकी की मशाल से जन जागृति फैला रहे हैं। लोग तो आजकल अपनी प्रकाशित पुस्तकें भी अमेजान पर डालने लगे हैं। हमारे मुकेश भाई अंबानी ने भी जिओ नेटवर्क की ऐसी नेकी की मिसाल पेश की है कि हमारा भी मन करता है, हम भी कुछ नेकी यू ट्यूब पर डाल ही दें। आपसे उम्मीद है आप हमारे चैनल को लाइक, शेयर और सब्सक्राइब अवश्य करेंगे।

आप भी आगे से ध्यान रखें, व्यर्थ दरिया में डालने के बजाए, नेकी करें और यूट्यूब पर बहाएं और दो पैसे भी कमाएं।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संजय उवाच # ३३२ – असार का सार ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के  लेखक  श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है। साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ  हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको  पाठकों का  आशातीत  प्रतिसाद मिला है।”

हम  प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है  इस शृंखला की अगली कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों  के माध्यम से  हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)

☆  संजय उवाच # ३३२

☆ असार का सार… ? श्री संजय भारद्वाज ☆

मनुष्य के मानस में कभी न कभी यह प्रश्न अवश्य उठता है कि उसका जन्म क्यों हुआ है? क्या केवल जन्म लेने, जन्म को भोगने और जन्म को मरण तक ले जाने का माध्यम भर है मनुष्य?

वस्तुत: जीवन समय का साक्षी बनने के लिए नहीं है अपितु समय के पार जाने की यात्रा है।   अपार सृष्टि के पार जाने का, मानव देह एकमात्र अवसर है, एक मात्र माध्यम है। यह सत्य है कि एक जीवन में कोई बिरला ही पार जा पाता है, तथापि एक जीवन में प्रयास कर अगले तिरासी लाख, निन्यानवे हजार, नौ सौ निन्यानवे जन्मों के फेरे से बचना संभव है। मानव देह में मिले समय का उपयोग न हुआ तो कितना लम्बा फेरा लगाकर लौटना पड़ेगा!

जीवन को क्षणभंगुर कहना सामान्य बात है। क्षणभंगुरता में जीवन निहारना, असामान्य दर्शन है। लघु से विराट की यात्रा, अपनी एक कविता के माध्यम से स्मरण हो आती है-

जीवन क्षणभंगुर है,

सिक्का बताता रहा,

समय का चलन बदल दिया,

उसने सिक्का उलट दिया,

क्षणभंगुरता में ही जीवन है,

अब सिक्के ने कहा,

शब्द और अर्थ के बीच,

अलख दृष्टि होती है,

लघु से विराट की यात्रा

ऐसे ही होती है.. !

ज्ञान मार्ग का जीव मनुष्येतर जन्मों को अपवाद कर देता है, एक छलांग में इन्हें पार कर लौट आता है फिर मनुज देह को धारण करने, फिर पार जाने के लिए।

मनुष्य जाति का आध्यात्मिक इतिहास बताता है कि ज्ञानशलाका के स्पर्श से शनै:-शनै: अंतस का ज्ञानचक्षु खुलने लगता हैं। अपने उत्कर्ष पर ज्ञानचक्षु समग्र दृष्टिवान हो जाता है महादेव-सा। यह दर्शन सम्यक होता है। सम्यक दृष्टि से जो दिखता है, अद्वैत होता है विष्णु-सा। अद्वैत में सृजन का एक चक्र अंतर्निहित होता है ब्रह्मा-सा। ज्ञान मनुष्य को ब्रह्मा, विष्णु, महेश-सा कर सकता है। सर्जक, सम्यक, जागृत होना, मनुष्य को त्रिदेव कर सकता है।

जिसकी कल्पना मात्र से शब्द रोमांचित हो जाते हैं, देह के रोम उठ खड़े होते हैं, वह ‘त्रिदेव अवस्था’ कैसी होगी! भीतर बसे त्रिदेव का साक्षात्कार, द्योतक है सृष्टि के पार का।

असार है संसार। असार का सार है मनुष्य होना। सार का स्वयं से साक्षात्कार कहलाता है चमत्कार। यह चमत्कार दही में अंतर्निहित माखन-सा है। माखन पाने के लिए बिलोना तो पड़ेगा। माँ यशोदा ने बिलोया तो साक्षात श्याम को पाया।

संभावनाओं की अवधि, हर साँस के साथ घट रही है। अपनी संभावनाओं पर काम आरंभ करो आज और अभी। असार से केवल ‘अ’ ही तो हटाना है। साधक जानता है कि से ‘आरंभ’ होता है। आरंभ करो, सार तुम्हारी प्रतीक्षा में है।

© संजय भारद्वाज 

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ 2 अप्रैल से  एक माह की हनुमान साधना वैशाख पूर्णिमा तदनुसार 1 मई 2026 को संपन्न होगी। 🕉️

💥 इसमें हनुमान चालीसा एवं संकटमोचन हनुमानाष्टक के पाठ किए जाएँगे। हनुमान चालीसा के 21 या अधिक पाठ करने वाले विशेष साधक तथा 51 या अधिक पाठ करने वाले महा साधक कहलाएँगे। 101 या अधिक पाठ करने वाले परम साधक कहलाएँगे। आत्म परिष्कार और मौन साधना साथ चलेंगे।💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सलिल प्रवाह # २७७ – आलेख – छंद शाला ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆

आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

(आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ जी संस्कारधानी जबलपुर के सुप्रसिद्ध साहित्यकार हैं। आपको आपकी बुआ श्री महीयसी महादेवी वर्मा जी से साहित्यिक विधा विरासत में प्राप्त हुई है । आपके द्वारा रचित साहित्य में प्रमुख हैं पुस्तकें- कलम के देव, लोकतंत्र का मकबरा, मीत मेरे, भूकंप के साथ जीना सीखें, समय्जयी साहित्यकार भगवत प्रसाद मिश्रा ‘नियाज़’, काल है संक्रांति का, सड़क पर आदि।  संपादन -८ पुस्तकें ६ पत्रिकाएँ अनेक संकलन। आप प्रत्येक सप्ताह रविवार को  “साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह” के अंतर्गत आपकी रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका ज्ञानवर्धक आलेख – छंद शाला)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह # २७७ ☆

☆ आलेख – छंद शाला ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆

छंद वाचिक होते हैं। वेदों की रचना कह-सुन-याद रखकर ही हुई। इसलिए वैदिक ज्ञान/ ऋचाएँ सदियों तक श्रुति-स्मृति पर आधारित रहीं।

कंठ से निकलनेवाली ध्वनि को उच्चार कहते हैं।

उच्चार दो तरह के होते हैं।

कम समय में बोले जानेवाले उच्चार को लघु तथा उससे दो गुने समय में बोले जानेवाले उच्चार को दीर्घ/गुरु कहते हैं। छंद रचना के लिए लघु उच्चार को इकाई या १ तथा गुरु उच्चार को २ गिना जाता है।

अपवाद स्वरूप कुछ ध्वनियाँ जैसे ॐ का उच्चार काल ३ होता है।

वैदिक ज्ञान बढ़ जाने पर उसे मौखिक रूप से याद रखना संभव न रहा। तब हर ध्वनि के लिए एक संकेत बनाया गया, इसे अक्षर (जिसका क्षरण न हो) कहा गया।

एकाधिक अक्षर मिलाकर विशिष्ट अर्थ अभिव्यक्त करनेवाले शब्द बने। अक्षर और शब्द आरंभ में वाचिक थे। शब्दों के सम्मिलन से वाक्य बने। अक्षरों व शब्दों के लयबद्ध वाचन से छंद और छंदों के प्रयोग से पद्य/काव्य (पहेली,छंद, गीत आदि) रचना हुई। वाक्यों के संयोजन से गद्य (कहावतों, मुहावरों,वार्ता, कथा, कहानी आदि) का सृजन हुआ। लोक गीत व लोक कथाओं का विकास इसी तरह हुआ। इस काल तक तुरंत रचना करनेवाले आशु कवि/आशु कथाकार ही भाषा और साहित्य का विकास कर रहे थे। लोक गायकों ने लोकगीत तथा लोक कथाकारों ने लोककथा विधाओं का विकास किया।

वनवासी/आदिवासी समूहों की भाषाएँ और साहित्य इसी काल में विकसित हुआ। लोक साहित्य के विकास में महिलाओं तथा पुरुषों की भागीदारी आरंभ से ही बराबर रही। इस दौर में घर, पनघट, खलिहान, चौपाल आदि तथा जन्म-मरण, दैनिक जीवन, ऋतु परिवर्तन। पर्व-त्योहार, मिलना-बिछुड़ना, सुख-दुख,  आदि ऐसे स्थल व कारण थे जहाँ स्वानुभूति सृजन का रूप धारण कर लेती थी।

कालांतर में मानव ने खेती करना सीखा और खेतों के निकट झोपड़ी बनाकर रहने पर ग्राम्य सभ्यता का विकास हुआ। खेतों में फसलों की रक्षा करने के लिए बनाए गए मचानों पर खड़े कृषक बहुधा सवेरे अथवा शाम को प्रकृति दर्शन करते हुए या अपने एकांत को मिटाने के लिए कुछ ध्वनियों का लयबद्ध उच्चारण कर जोर से गाते थे, कहीं दूर कोई दूसरा कृषक उस पंक्ति को सुनकर बार-बार दोहरा कर उसी लय में अपने शब्द रखकर दूसरी पंक्ति गा देता था, फिर कोई तीसरा और चौथा व्यक्ति अपनी पंक्ति जोड़ देता था। ऐसी पंक्तियों में उच्चार क्रम, उच्चार काल तथा पंक्ति के अंत में समान ध्वनियाँ हुआ करती थीं। ऐसी दो पंक्ति की रचना को दोपदी, तीन पंक्ति की रचना को त्रिपदी”, चार पंक्ति की रचना को *चौपदी इत्यादि नाम दिए गए। इस समय तक रचनाकार समझदार किंतु निरक्षर (अक्षर लिखने की कला से अपरिचित) थे, अशिक्षित नहीं। यह परंपरा कबीर, रैदास, घाघ, भड्डरी, मीराबाई आदि तक देखी जा सकती है। भाषा और साहित्य के विकास में योगदान करनेवाले अनेक रचनाकार सीखने-सिखाने में सक्षम अर्थात सुशिक्षित किंतु निरक्षर थे।

मानव द्वारा रेत पर अँगुलियों से बिंदु, रेखा, वृत्त आदि अंकित करने पर लिपि का विकास आरंभ हुआ। रेत पर बनाई आकृति मिटने का समाधान पेड़ों की पत्तियों के रह को टहनियों के माध्यम से पत्थरों पर अंकित करने की विधि से किया गया जिसका परिणाम शैल चित्रों/शिलालेखों के रूप में आज भी उपलब्ध है। अक्षरों तथा अक्षरों के अर्थ युक्त सम्मिलन से बने शब्दों को पत्थरों पर अंकित करना लिपि के विकास का महत्वपूर्ण चरण है। कालांतर में शब्दों को लंबे समय तक न सड़नेवाले पत्तों पर भी लिखा गया। हमें प्राचीन ग्रंथ ताड़ पत्रों तथा भोज पत्रों पर लिखे हुए मिलते हैं।

स्मरण रहे कि लिपि के विकास के बहुत पहले वाचिक (बोल-चाल की) भाषा तथा छंद लोक में प्रचलित हो चुके थे।

©  आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

१९.११.२०२५

संपर्क: विश्ववाणी हिंदी संस्थान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१,

चलभाष: ९४२५१८३२४४  ईमेल: salil.sanjiv@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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