हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक साहित्य # ३८२ ☆ आलेख – “कालजयी व्यंग्य उपन्यास लेखक डॉ ज्ञान चतुर्वेदी” ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ३८२ ☆

?  आलेख – कालजयी व्यंग्य उपन्यास लेखक डॉ ज्ञान चतुर्वेदी  ? श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

(डॉ पदमश्री ज्ञान चतुर्वेदी जी प्रबुद्ध व्यंग्यकार विवेक रंजन श्रीवास्तव जी की पुस्तक व्यंग्य कल आज और कल के साथ)

ज्ञान चतुर्वेदी समकालीन हिंदी व्यंग्य लेखन के शिखर पुरुषों में गिने जाते हैं। उनके उपन्यासों में व्यंग्य केवल हास्य की उत्पत्ति का साधन नहीं है, बल्कि सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक विसंगतियों पर तीव्र, चुटीला और गहरे स्तर तक प्रहार करने का औजार भी है। उन्होंने अपने व्यंग्य उपन्यासों के माध्यम से जिस यथार्थ को प्रस्तुत किया है, वह हमारे समय का आईना है।एक ऐसा आईना जिसमें समाज की कुरूपता, राजनीतिक चरित्रों की चालाकियाँ, आम आदमी की विवशता और व्यवस्था की विफलताएं स्पष्ट रूप से प्रतिबिंबित होती हैं।

ज्ञान चतुर्वेदी की लेखनी के सम्मान में ही उन्हें पद्मश्री का सम्मान दिया गया । यद्यपि किसी व्यंग्यकार को सत्ता से सम्मानित होने पर खा जाता है कि वे किसी विशेष दलगत सोच का लेखन करते हैं,पर ज्ञान जी के लेखन ने इस अवधारणा को समूल झुठला दिया है ।उन की सबसे बड़ी विशेषता उनकी पैनी दृष्टि और गहरी समझ है। वे उन विषयों को चुनते हैं जो आम जीवन से जुड़े होते हैं, जिन्हें पाठक रोजमर्रा में झेलता है, पर समझ नहीं पाता कि उसमें हास्य या व्यंग्य भी छिपा हो सकता है। यही वह दृष्टिकोण है, जिससे उनकी रचनाएँ महज मनोरंजन नहीं रहतीं, बल्कि पाठक को सोचने और झकझोरने पर विवश करती हैं। अपने उपन्यासों में उन्होंने न केवल हास्य का अद्भुत संयोजन किया है, बल्कि भारतीय समाज की परतों को उधेड़कर उसमें मौजूद विकृतियों को  उजागर किया है।

भारतीय राजनीति का एक करुण-क्रूर चित्रण , व्यवस्था की नौटंकी को उन्होंने इस तरह चित्रित किया गया है कि पाठक हँसते-हँसते रोने लगता है। पात्रों के नामों, उनके व्यवहार और संवादों में वह जीवंतता है जो केवल अनुभव-संपन्न लेखक ही दे सकता है। उनके उपन्यास एक बड़े कैनवास पर फैली राजनीतिक रंगमंच की कहानी हैं, जिसमें चरित्र विशुद्ध भारतीय पृष्ठभूमि से होते हैं, लेकिन उनके कृत्य किसी भी वैश्विक सत्ता की विद्रूपताओं से मेल खाते हैं। ज्ञान जी सत्ता की नौटंकी, जनतंत्र की विडंबनाओं और मीडिया की भूमिका को लेकर जितनी व्यंग्यात्मक तीव्रता से लिखते हैं, उतनी ही संवेदनशीलता से भी।

‘बारामासी’ उनकी एक और उत्कृष्ट कृति है, जिसमें एक छोटे कस्बे के जीवन को उन्होंने महीनों के माध्यम से उकेरा है। यहाँ व्यंग्य की धार इतनी तीव्र है कि वह पात्रों के व्यवहार, उनकी मानसिकता और सामाजिक तानेबाने में पैठकर व्यवस्था की नब्ज पकड़ती है।   कस्बाई जीवन केवल घटनाओं का क्रम नहीं, बल्कि एक सामाजिक दस्तावेज बन जाता है, जिसमें भारतीय मध्यवर्ग की इच्छाएं, निराशाएं, चालाकियाँ और लाचारियाँ एक साथ सामने आती हैं। यह उपन्यास बताता है कि ज्ञान चतुर्वेदी केवल राजनीतिक व्यंग्य तक सीमित नहीं हैं, बल्कि उनका दृष्टिकोण सामाजिक सांस्कृतिक जीवन की बारीकियों तक फैला हुआ है।

उनकी भाषा शैली का वैविध्य भी विशेष उल्लेखनीय है। वह ठेठ देशज शब्दों का प्रयोग करते हैं, जो न केवल हास्य की गुणवत्ता को बढ़ाते हैं, बल्कि पात्रों को यथार्थ के करीब ले आते हैं। व्यंग्य तब अधिक प्रभावी होता है जब वह कृत्रिमता से दूर होकर अपने मूल स्वरूप में बोले। ज्ञान चतुर्वेदी की भाषा यही काम करती है। उनकी भाषा में संवादों की ताकत है, और संवादों में छिपी विडंबनाओं की पकड़। उन्होंने पात्रों के ज़रिये जिन बातों को उजागर किया है, वे लाउड होकर भी स्थूल नहीं हैं, और चुप रहकर भी मुखर हैं। यह विशेषता उन्हें अन्य व्यंग्यकारों से अलग पहचान देती है।

उनके भीतर के अंतर्विरोधों, संघर्षों और सामाजिक राजनीतिक झुंझलाहटों का परिणाम उनकी कलम से अभिव्यक्ति पाता है ।  व्यंग्य अपनी चरम सीमा पर पहुँचता है।  पेशे से वे चिकित्सा जगत में हैं, इसलिए कही जिस डॉक्टर पात्र को वे केंद्र में रखते है, वह केवल चिकित्सा व्यवस्था की नहीं, बल्कि सम्पूर्ण समाज की बीमारी का प्रतीक बन जाता है। उन के लिए व्यंग्य केवल एक  उपकरण नहीं, बल्कि विचारधारा का विस्तार बन जाता है।  आम आदमी की असहायता, अपने ही पेशे के प्रति विरोधाभास, और व्यवस्था की अराजकता को इतनी खूबी से चित्रित कर पाना उनकी खासियत है ।

ज्ञान चतुर्वेदी के व्यंग्य उपन्यासों में पात्रों की बहुलता भी एक महत्त्वपूर्ण विशेषता है। ये पात्र न तो केवल प्रतीकात्मक हैं और न ही केवल कार्टूननुमा। वे हमारे आसपास के लोग हैं, अधूरी आकांक्षाओं से ग्रसित, कभी विद्रोही तो कभी समझौतावादी, और अधिकतर बार हास्यास्पद। इन पात्रों के माध्यम से लेखक समाज की परतें उधेड़ता है और उन्हें पुनः सिलने की कोई कोशिश नहीं करता। वह पाठक को अकेला छोड़ देता है, जिससे वह खुद सवाल करे कि इस बेतुकेपन का समाधान क्या हो सकता है।

ज्ञान चतुर्वेदी की एक अन्य उल्लेखनीय विशेषता उनकी कथा कहने की शैली है। उनका उपन्यास कभी रेखीय नहीं चलता। वह बार-बार विषयांतर करते हैं, पर यह विषयांतर बिखराव नहीं, बल्कि कथा की नई परत खोलता है। जैसे किसी कस्बे की गलियों में भटकते हुए अचानक हम किसी नए मोहल्ले में पहुँच जाएँ, जहाँ हर घर की अपनी कहानियाँ हैं, और हर कहानी किसी बड़ी कथा का हिस्सा बन जाती है। यह शैली पाठक को बाँधती भी है और थकाती भी, परन्तु अंततः एक समृद्ध अनुभव देती है। उन्होंने व्यंग्य को फूहड़ता से बचाया है, वह सतही चुटकुलों तक सीमित नहीं रहते, बल्कि गहरे सामाजिक-राजनीतिक सन्दर्भों को सहज रूप से जोड़ते हैं।

ज्ञान चतुर्वेदी के उपन्यासों में एक प्रकार का ‘विवेकपूर्ण पागलपन’ दिखाई देता है। वे व्यवस्था के इस हद तक विश्लेषक बन जाते हैं कि स्वयं को उससे अलग कर एक पैरोडी खडी कर देते हैं। ‘पागलखाना’ उपन्यास इसी दृष्टिकोण की चरम परिणति है, जहाँ समाज की हर विसंगति एक मानसिक विकार की तरह प्रस्तुत होती है। यह पागलपन केवल पात्रों का नहीं, व्यवस्था का भी है, जो पागल को समझदार और समझदार को पागल बना देती है। ज्ञान चतुर्वेदी ने इस उपन्यास के माध्यम से पाठक को यह सोचने पर विवश किया है कि पागलपन की परिभाषा आखिर तय कौन करता है?

एक और उल्लेखनीय बात यह है कि ज्ञान चतुर्वेदी अपने उपन्यासों में समय का बहुत सूक्ष्मता से चित्रण करते हैं। वे घटनाओं को केवल वर्तमान में सीमित नहीं रखते, बल्कि अतीत और भविष्य के संकेत भी देते हैं। उनका व्यंग्य एक कालखंड विशेष तक सीमित न रहकर एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया बन जाता है। वे घटनाओं को उनकी जड़ों से जोड़ते हैं और भविष्य की संभावनाओं की ओर संकेत करते हैं। यह दृष्टिकोण उनके उपन्यासों को कालजयी बनाता है।

कुल मिलाकर ज्ञान चतुर्वेदी के व्यंग्य उपन्यासों की विशेषताएँ उन्हें समकालीन हिंदी साहित्य में एक विशिष्ट स्थान देती हैं। उनकी रचनाओं में हास्य, व्यंग्य, गूढ़ आलोचना, पात्रों की विविधता, भाषा की जीवंतता और सामाजिक चेतना का अद्भुत संगम दिखाई देता है। उन्होंने यह सिद्ध किया है कि व्यंग्य केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि सशक्त सामाजिक हस्तक्षेप का माध्यम हो सकता है। उनके उपन्यास इस बात का प्रमाण हैं कि साहित्य का कार्य केवल सौंदर्य बोध कराना नहीं, बल्कि समय की नब्ज पर उंगली रखना भी है। ज्ञान चतुर्वेदी ने अपने उपन्यासों के माध्यम से यही किया है। समाज की नब्ज टटोली है, और उसके अस्वस्थ हिस्सों पर कलम की शल्यक्रिया की है। यही उनकी सबसे बड़ी विशेषता है।

© श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

म प्र साहित्य अकादमी से सम्मानित वरिष्ठ व्यंग्यकार

संपर्क – ए 233, ओल्ड मिनाल रेजीडेंसी भोपाल 462023

मोब 7000375798, ईमेल apniabhivyakti@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – आचार्य डॉ.आनंदप्रकाश दीक्षित को याद करते हुए ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

पुनर्पाठ –

? संजय दृष्टि – आचार्य डॉ.आनंदप्रकाश दीक्षित को याद करते हुए  ? ?

5 नवंबर 2019 को हिंदी आलोचना के शिखर पुरुष और रस सिद्धांत के पुरोधा आचार्य डॉ. आनंदप्रकाश दीक्षित का निधन हो गया। पुणे विश्वविद्यालय में लंबे समय तक अध्यापन करने वाले डॉक्टर दीक्षित 1985 में हिंदी विभाग के प्रमुख के रूप में सेवानिवृत्त हुए थे। तत्पश्चात वर्ष 2010 तक वे प्राध्यापक के रूप में सक्रिय रहे।

डॉक्टर दीक्षित का जन्म माघ शुक्ल द्वितीया विक्रम संवत 1980 (अंग्रेजी वर्ष 1923/24) को हुआ था। माता-पिता के अलावा घर में तीन भाई और थे, दो उनसे बड़े और एक छोटा। पिता संस्कृत के अध्यापक थे। दोनों बड़े भाई भी हिंदी साहित्य से जुड़े हुए थे। फलत: साहित्य का संस्कार उन्हें बचपन से मिला। नवीं में पढ़ते थे तब मासिक ‘दीपक’ में ‘मातृस्नेह’ शीर्षक से उनका एक लेख प्रकाशित हुआ था। आरंभिक दिनों में वे ‘सर्वजीत’ उपनाम से लिखा करते थे। उन दिनों बच्चन जी की ‘सप्तरंगिणी’ प्रकाशित हुई थी। इस पर दीक्षित जी का  आलोचनात्मक लेख लाहौर से प्रकाशित होने वाली वाले ‘विश्वबंधु’ ने पूरे पृष्ठ पर प्रकाशित किया था। पंडित विजयशंकर भट्ट ने एस लेख की प्रशंसा की थी। यहीं से कविता की आलोचना के क्षेत्र में उनकी रुचि, उनका जीवन बन गई।

वर्ष 2016 में हिंदी आंदोलन परिवार की वार्षिक पत्रिका ‘हम लोग’ के लिए मैंने उनका साक्षात्कार किया था। इस साक्षात्कार में कविता पर भाष्य करते हुए उन्होंने कहा था “कविता में अर्थ की जो गहनता हम पाते हैं, वह किसी दूसरी विधा में नहीं मिलती। पहली बार तो कविता का केवल ऊपरी अर्थ समझ में आता है, उसके प्रति आसक्ति जागृत होती है। यदि आप विचारक हैं तो उसका अर्थ समझने के लिए आगे बढ़ेंगे। उसके लिए बार-बार कविता पढ़नी पड़ेगी। बार- बार पढ़ने से कविता ऐसी रच जाएगी कि अर्थ पर अर्थ निकलने लगेंगे। तब कविता चमत्कारी चीज़ हो जाती है।”

समकालीन कविताओं को लेकर उनका मानना था कि आज जो कविताएँ लिखी जा रही हैं, उनके छंद और उक्ति में परिवर्तन है। पुरानी कविता में कोई सूक्ति रहती थी, कोई ना कोई उपमान रहता था जिससे सौंदर्य आता था। उसकी विशेषताएं आकर्षित करती थीं। अब कविता पत्रकारिता की तरह हो गई है। वर्तमान का वर्णन करके वे चुप हो जाती हैं। जब आप घटित के बारे में लिखने लगते हैं तो इससे एकरूपता आ जाती है। इनसे इतिहास तो हमें मिल जाएगा लेकिन भविष्य में इनसे जीवन का दृश्य क्या मिलेगा?

अलबत्ता कविता की प्रयोजनीयता सर्वदा बनी रहेगी। कविता अच्छी नहीं है तो निष्प्रयोजन हो जाएगी लेकिन इससे सारी कविताएँ  निष्प्रयोजन नहीं हो जातीं। आदमी सदैव कविता पढ़ना चाहेगा।

आलोचना की मीमांसा करते हुए उन्होंने टिप्पणी दी, “आलोचना दो प्रकार की होती है। पहला प्रकार अध्ययन करके गहनता से आलोचनात्मक लेख लिखना है तो दूसरा प्रकार समीक्षाएँ लिखना है। समीक्षा ऊपरी तल पर रह जाती है। विवेकपूर्ण लंबी आलोचना जो समझदारी से लिखी जाती है, उसका महत्व होते हुए भी मैं यह मानता हूँ कि आलोचक दूसरे दर्जे का नागरिक बनता है। आलोचक तब लिखेगा जब उसके सामने सर्जन होगा। सर्जनात्मकता पहली चीज़ है। सर्जनात्मकता में भावुकता है, आलोचना में विवेक को संभालना पड़ता है। तर्क-वितर्क संभालना पड़ता है, शास्त्र का ध्यान रखना होता है। आलोचना बहुत कठिन कर्म है।”

कवि की अनुभूति और आलोचक द्वारा ग्रहण किये गए भाव के अंतर्सम्बंध पर उनका कहना था कि कई बार आलोचक वहाँ तक नहीं पहुँच पाता। लेकिन यह भी है कि कई बार कवि का सोचा हुआ भी नहीं होता।

उनसे बातचीत में अनेक पहलू खुलते गए। आज का लेखक अपनी कमजोरी को बर्दाश्त नहीं कर पा रहा। उस पर चर्चा नहीं करना चाहता। अपना अनुभव साझा करते हुए उन्होंने कहा कि  जिन भी कवियों को उन्होंने उनकी कविता की कमजोरियों के बारे में बताया, उनमें से अधिकांश बुरा मान गए।

आचार्य जी भाषा के क्रियोलीकरण के विरुद्ध थे। उनका विचार था कि इसके पक्षधर विशेषकर समाचारपत्र यह दिखाना चाहते हैं कि व्यवहार में इस तरह की भाषा चलती है। अख़बारवालों को लगता है कि ऐसी मिली-जुली भाषा के उपयोग से युवा वर्ग तक पहुँचा जा सकता है। वस्तुतः हमें इस बात का अभ्यास नहीं है कि हम शुद्ध भाषा का उपयोग कर सकें।  हम कभी शब्दकोश देखने या सोचने का भी प्रयत्न नहीं करते। सत्य तो यह है कि दुभाषिया भी शब्दश: अनुवाद न करके सार अपनी भाषा में कहता है।

हिंदी विषय लेकर उच्च शिक्षा प्राप्त करने वाले विद्यार्थियों की तुलनात्मक रूप से घटती संख्या का सबसे बड़ा कारण उन्हें इस विषय को  पढ़कर विद्यार्थियों को रास्ते खुलते हुए नहीं दिखाई देना लगता था। विडंबना है कि ज्ञान के लिए जो हिंदी पढ़ना चाहता है उसे केवल साहित्य पढ़ाया जाता है। साहित्य तो बिना पाठशाला या कॉलेज में पढ़े अलग से पढ़ा जा सकता है। लोगों को इंजीनियर या टेक्नीशियन बनना है तो केवल साहित्य पर निर्भर नहीं रहा जा सकता। हिंदी को समुचित स्थान दिलाने के लिए जो किया जाना चाहिए था, अब तक नहीं किया जा सका है।

हिंदी वालों से एक शिकायत उन्हें सदा रही कि हिंदीक्षेत्र में काम करने वाले लेखक को ही वे लेखक मानते हैं लेकिन जो बाहर निकल आए हैं या अहिंदीभाषी प्रदेशों के रहनेवाले हैं, उन्हें वे लेखक नहीं मानते। जब आप हिंदी को राष्ट्रभाषा कहते हैं तो सभी प्रदेशों के लोगों का सहयोग चाहिए। हिंदी के विस्तार को हमने खुद ही रोक दिया है। एक बात और, जो मराठीभाषी हिंदी पढ़ कर हिंदी में लिख रहा है, मराठी मंच उसे स्वीकार नहीं करता। यहाँ बस गए हिंदी के लेखकों को हिंदी प्रदेशों के मंच अब याद नहीं करते। ऐसे लेखक दोनों ओर से तिरस्कृत हैं।

सांप्रतिक जीवन में संवाद के अभाव को लेकर वे चिंतित थे। “आजकल संवाद नहीं हो रहा है।  बिना संवाद के बुद्धि विकसित नहीं होती। संवाद से तर्क-वितर्क सामने आते हैं। मालूम होता है कि आप जो सोच रहे हैं, उसके प्रतिपक्ष में कोई सोच सकता है। शास्त्र में दो पक्ष होते हैं। एक ही व्यक्ति जब शास्त्र लिखता है तो दोनों पक्षों को लिखता है। इसका अर्थ है कि विवेक जागृत करने के लिए दूसरे पक्ष को भी सामने रखना आवश्यक है।”

“लोग कहते हैं कि मैं रसवादी हूँ। मैं रस में विश्वास नहीं करता। यदि वादी हूँ तो मैं विवेकवादी हूँ। रामचरितमानस में तुलसीदास जी ने ‘विवेक’ शब्द का प्रचुर प्रयोग किया है। विवेक क्या है? भले बुरे को समझना, क्या करणीय है, क्या अकरणीय है, इन दोनों के बीच से सही रास्ते को ढूँढ़ना, निरंतर शोध करना ही विवेक है। विवेक मंथन करने के बाद आता है। ज्ञानप्राप्ति के लिए आत्ममंथन आवश्यक होता है।”

भविष्य को लेकर वे सदा आशावादी रहे। “जीवन में बहुत कुछ करना अभी बाकी है। हमारी संस्कृति को मिली-जुली कहा जाता है। इसकी पूरी जानकारी के लिए मैं संस्कृत ग्रंथों का पारायण करना चाहता हूँ। अपने संस्कारों से हमें कितना जुड़ाव है, कितना होना चाहिए, कितना हम उन से हटे हैं, इसका विवेक पैदा करना ज़रूरी है। मैं इस्लाम की मूल पुस्तकें पढ़ना चाहता हूँ। इस्लाम की पूरी जानकारी करना चाहता हूँ। मेरे मन में बार-बार यह प्रश्न उठता है कि अगर यह मिली-जुली संस्कृति है तो हम आपस में इतना लड़ते क्यों हैं? आपसी लड़ाई से बचाव के लिए मैं इस तरह का अध्ययन आवश्यक मानता हूँ।”

भाषाविज्ञान, संपादन, अध्यापन, अनुवाद, लेखन, पत्रकारिता के क्षेत्र में आचार्य दीक्षित का योगदान बहुमूल्य रहा। उनके अनेक विद्यार्थी विभिन्न विश्वविद्यालयों में प्राध्यापक और विभागाध्यक्ष हुए। हिंदी साहित्य का शायद ही कोई अध्येता हो जिसने डॉ. दीक्षित की कोई पुस्तक संदर्भ के लिए न पढ़ी हो। ‘आलोचना-रस सिद्धांत : स्वरूप विश्लेषण’,   ‘साहित्य : सिद्धांत और शोध’  त्रेता : एक अंतर्यात्रा’,  ‘हिंदी रीति परंपरा : विस्मृत संदर्भ’, ‘रसचिंतन के विविध आयाम’ (मराठी के 15 लेखकों के साहित्य का अनुवाद),

‘हरिचरणदास ग्रंथावली’ (काव्यखंड), ‘प्रताप पचीसी’, ‘दौलत कवि ग्रंथावली’, ‘आज के लोकप्रिय कवि शिवमंगल सिंह सुमन’, ‘कबीर ग्रंथावली’ ‘मैथिलीशरण गुप्त’  ‘सुमित्रानंदन पंत : आलोचना, प्रक्रिया और स्वरूप’,  ‘कबीरदास : सृजन और चिंतन’, ‘मराठी संतों की हिंदीवाणी’ जैसे अन्यान्य ग्रंथों का लेखन, संपादन और अनुवाद हिंदी साहित्य को उनकी महती देन है।

सरकारी और गैरसरकारी अनेक संस्थाओं और संस्थानों ने उन्हें सम्मानित कर स्वयं को गौरवान्वित अनुभव किया। उन्हें प्राप्त प्रमुख अलंकरणों में साहित्य अकादमी द्वारा ‘भाषा सम्मान’, उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान द्वारा ‘भारत भारती सम्मान’, हिंदी साहित्य समिति इंदौर द्वारा ‘अखिल भारतीय साहित्य पुरस्कार’, महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी द्वारा ‘अखिल भारतीय हिंदी सेवा पुरस्कार’,  साहित्य सम्मेलन इलाहाबाद द्वारा ‘साहित्य वाचस्पति’  हिंदी साहित्य समिति कानपुर द्वारा ‘साहित्य भारती’ आदि सम्मिलित हैं।

हिंदी आंदोलन परिवार के एक आयोजन में उन्होंने कहा था कि लिखने के लिए वे दो सौ वर्ष जीना चाहते हैं। अपनी बहुआयामी प्रतिभा के साथ वे जीवन के अंत तक सक्रिय रहे। सजब मैंने उनसे जानना चाहा कि अपने बहुआयामी व्यक्तित्व की चर्चा सुनकर खुद डॉ. दीक्षित के मन में किस तरह का चित्र उभरता है तो उनका उत्तर था, ” मुझे अच्छा लगता है लेकिन ऐसा कोई भाव पैदा नहीं होता जिसे मैं अहंकार कह सकूँ। हाँ, लगता है कि मैं जीवित हूँ।”

अपने सृजन के रूप में आचार्य डॉ. आनंदप्रकाश दीक्षित सदा जीवित रहेंगे।

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© संजय भारद्वाज  

सोमवार दि. 30 .05 .2016, संध्या  7:15  बजे

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️  नवरात्र साधना संपन्न हुई. अगली साधना की जानकारी आपको शीघ्र दी जावेगी. 🕉️ 💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # २६४ ☆ अक्षय दान पुण्य का पर्व: आँवला नवमी… ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ ☆

श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की  प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं  में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना अक्षय दान पुण्य का पर्व: आँवला नवमी। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  – आलेख  # २६४ ☆ अक्षय दान पुण्य का पर्व: आँवला नवमी

*

कीजे सदा कुछ पुण्य ऐसे,जो हमें अक्षय करें।

डोरी थामें प्रीत संग तो, धर्म पालन से रहें।।

पूजा करते दोनों हाथों, दान देते आँवला।

राधा रानी सारी सखियाँ,ढूंढ़ती प्रिय साँवला।।

*

पर्यावरण की रक्षा का संकल्प सनातन संस्कृति का मूल मंत्र है। वसुधैव कुटुम्बकम की भावना को समेटे हुए आँवला नवमी जो कार्तिक शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को मनाई जाती है। इस दिन विष्णु भगवान के स्वरूप कृष्ण जी की पूजा अर्चना करके आँवले का दान किया जाता है। क्योंकि इस दिन का पुण्य अक्षय (कभी नहीं नष्ट होने वाला) माना जाता है, इसलिए इसे अक्षय नवमी भी कहते हैं।

महिलाएँ और पुरुष इस दिन आँवला वृक्ष की पूजा करते हैं, व्रत रखते हैं और दान-पुण्य करते हैं।

मान्यता है कि इस दिन आँवला वृक्ष पूजन करने से दीर्घायु, स्वास्थ्य और समृद्धि मिलती है।

आइए सपरिवार इस दिन वनभोज करें, अपने संग संस्कृति और संस्कारों को जोड़ना हम सबका दायित्व है।

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©  श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

माँ नर्मदे नगर, म.न. -12, फेज- 1, बिलहरी, जबलपुर ( म. प्र.) 482020

मो. 7024285788, chhayasaxena2508@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ८२४ ⇒ मेरी आवाज सुनो ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “मेरी आवाज सुनो।)

?अभी अभी # ८२४ ⇒ आलेख – मेरी आवाज सुनो ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

कुछ आवाज़ें हम कई वर्षों से सुनते चले आ रहे हैं, वे आवाज़ें रेकॉर्ड की हुई हैं, वे लोग आज मौजूद नहीं हैं, सिर्फ उनकी आवाज आज मौजूद हैं। कभी उन्हें his master’s voice नाम दिया गया था और आज भी उन आवाजों को हम, नियमित रेडियो पर और अन्य अवसरों पर, विभिन्न माध्यमों द्वारा सुना करते हैं।

मेरी आवाज ही पहचान है ! जी हां, आज आप किसी भी आवाज को रेकाॅर्ड कर सकते हो, बार बार, हजार बार सुन सकते हो। जब कोई हमें आग्रह करता है, कुछ गा ना ! और जब हम कुछ गाते हैं, तो वह गाना कहलाता है। जो गाना हमें भाता है, उसे हम बार बार सुनते हैं, बार बार गाते हैं।।

बोलती फिल्मों के साथ ही, फिल्मों में गीत और संगीत का जो सिलसिला शुरू हुआ, वह आज तक थमने का नाम नहीं ले रहा। पहले अभिनय के साथ अभिनेता को गाना भी पड़ता था, इसलिए कुंदनलाल सहगल और मुकेश अभिनेता बनते बनते गायक भी बन बैठे। बाद में अभिनेता आवाज उधार लेने लगे। और नूरजहां, सुरैया, खुर्शीद, शमशाद बेगम, लता, आशा, तलत,रफी, मुकेश और किशोर कुमार जैसी कई आवाजों ने अपनी पहचान बनाई।

क्या कोई गायक किसी की पहचान बन सकता है। मुकेश, आवारा हूं, गाकर राजकपूर की पहचान बन गए तो किशोर कुमार रूप तेरा मस्ताना गाकर, राजेश खन्ना की पहचान बन गए।

बड़ा विचित्र है, यह आवाज का सफर। पहले गीत जन्म लेता है, फिर संगीतकार पहले उसकी धुन बनाता है और बाद में एक गायक उसको अपना स्वर देता है। जब वह गीत किसी फिल्म का हिस्सा बन जाता है, तो नायक सिर्फ होंठ हिलाने का अभिनय करता है, और वह गीत एक फिल्म का हिस्सा भी बन जाता है। फिल्म में अभिनय किसी और का, और आवाज किसी और की। एक श्रोता के पास सिर्फ गायक की आवाज पहुंचती है। जब कि, एक दर्शक गायक को नहीं देख पाता, उस तक, पर्दे पर होंठ हिलाते, हाथों में हाथ डाले, राजेश खन्ना और फरीदा जलाल, बागों में बहार है, कलियों पे निखार है, गीत गाते, नजर आते हैं।।

सहगल के बाद ही गायकों का सिलसिला शुरू हुआ।

पहले तलत और लता अधिकांश नायक नायिकाओं की आवाज बने, लेकिन बाद में मोहम्मद रफी और मुकेश के साथ साथ किशोर कुमार, मन्ना डे, महेंद्र कपूर, ही मुख्य गायक रहे। मुकेश सन् १९७६ में हम तो जाते अपने गाम कहकर चले गए तो १९८० में रफी साहब भी, अब तुम्हारे हवाले वतन साथियों, कहकर गंधर्व लोक पहुंच गए। एकमात्र लता और आशा का साम्राज्य आदि से अंत तक आवाज की दुनिया में कायम रहा। जब तक सुर है साज है, गीत है आवाज है। सुमन कल्याणपुर, हेमलता, से होती हुई आज श्रेया घोषाल तक कई नारी कंठ की आवाजें और शैलेंद्र सिंह, येसुदास, सुरेश वाडकर तथा उदित नारायण तक कई पुरुष स्वर श्रोताओं पर अपना प्रभाव छोड़ चुके हैं, लेकिन किसी की आवाज बनना इतना आसान नहीं होता।

राजकपूर के अलावा देवानंद के लिए पहले तलत और बाद में किशोर और रफी दोनों ने अपनी आवाजें दीं। गाता रहे मेरा दिल किशोर गा रहे हैं लेकिन प्रशंसकों के बीच देव साहब छा रहे हैं। दिन ढल जाए में श्रोता एक ओर रफी साहब की आवाज में डूब रहा है और दूसरी ओर तेरे मेरे सपने अब एक रंग हैं, में दर्शक देव साहब की अदा पर फिदा हो रहे हैं। क्या आपको नहीं लगता कि जब रफी साहब शम्मी कपूर के लिए गाते थे, तो उनकी काया में प्रवेश कर जाते थे और जब दिलीप साहब के लिए गाते थे, तो दोनों की रुह एक हो जाती थी।

एक दिलचस्प उदाहरण देखिए जहां अभिनेता और पार्श्व गायक एक साथ पर्दे पर मौजूद हैं। जी हां, मेरे सामने वाली खिड़की में, सुनील दत्त बैठे हैं, और उनके पीछे किशोर कुमार छुपकर एक चतुर नार से मुकाबला कर रहे हैं। कौन अच्छा अभिनेता, सुनील दत्त अथवा गायक किशोर कुमार, हम चुप रहेंगे।

आप सिर्फ इनकी आवाज सुनो और फैसला दो।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ८२३ ⇒ गर्दिश के दिन ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “अंतिम साँसें।)

?अभी अभी # ८२३ ⇒ आलेख – गर्दिश के दिन ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

गर्दिश के दिन अक्सर तब ही याद आते हैं, जब हमारे अच्छे दिन आ जाते हैं। सुख के क्षणों में दुःख के दिनों की दास्तान कितनी अच्छी लगती है न ! दुख भरे दिन बीते रे भैया, अब सुख आयो।

जिनके सितारे हमेशा ही गर्दिश में रहते हैं उनके लिए गर्दिश स्थायी भाव हो जाता है और वे हनुमान चालीसा की जगह रोजाना मुकेश का, फिल्म रेशमी रुमाल का यह गीत गाना अधिक पसंद करते हैं ;

गर्दिश में हो तारे,

ना घबराना प्यारे

गर तू हिम्मत ना हारे

तो होंगे वारे न्यारे

विरले ही होते हैं, जिनके वारे न्यारे होते हैं, और जो प्रसिद्धि और शोहरत पाने के बाद अपने गर्दिश के दिनों को आत्म दया, आत्म प्रशंसा और आत्म विश्वास के साथ पाठकों के समक्ष प्रस्तुत करते हैं। उनके गर्दिश के दिन धन्य हो जाते हैं, वे पुनः पुरस्कृत हो जाते हैं।।

जो इंसान गर्दिश में जीता है, वह गर्दिश का महत्व ही नहीं समझता ! अगर किस्मत से उसके अच्छे दिन आ भी गए, तो ईश्वर को धन्यवाद दे, दाल रोटी खा, प्रभु के गुण गाता रहता है। संतोषी सदा सुखी। लेकिन समझदार, सफल और व्यवहारकुशल लोग आपदा में अवसर ढूंढ लेते हैं। सर्व साधन संपन्न होने के बाद, सफलता के कदम चूमने के बाद, गर्दिश के दिनों का ऐसा तड़का लगाकर मार्मिक चित्रण प्रस्तुत करते हैं कि पढ़ने वाले की आँखें भर आती हैं, वह मन में सोचता है, काश मेरे जीवन में भी ऐसा संघर्ष होता। अगर मेरे भी ऐसे ही गर्दिश के दिन होते, तो मैं भी आज एक महान व्यक्ति होता। मेरा जीवन कोरा कागज, कोरा ही रह गया।

गर्दिश के दिनों में दोस्तों और दुश्मनों दोनों को याद किया जाता है। जो पात्र आज नहीं हैं, उनके बारे में अतिशयोक्ति से भी काम चलाया जा सकता है। किसने आपका मुसीबत में साथ दिया और कौन मुंह फेरकर निकल गया, हिसाब चूकता किया जा सकता है। तीक्ष्ण बुद्धि, अच्छी याददाश्त और थोड़ी कल्पनाशीलता का पुट गर्दिश के दिनों को और अधिक आकर्षित बना सकता है।।

बेहतर तो यह हो, कि कुछ महान चिंतक, विचारकों और साहित्यकारों के गर्दिश के दिनों का अध्ययन किया जाए, उन पर चिंतन मनन किया जाए, अपनी गर्दिशों में रोचकता ढूंढी जाए, उसके बाद ही गर्दिश के दिनों पर कुछ लिखा जाए। हर महान व्यक्ति अपने गर्दिश के दिन नहीं भूलता। अगर भूल जाए, तो वह महान बन ही नहीं सकता।

लोकप्रिय कथा मासिक सारिका में कुछ वरिष्ठ साहित्यकारों के गर्दिश के दिनों की एक धारावाहिक श्रृंखला प्रकाशित हुई थी, स्वयं कमलेश्वर जी की पुस्तक “गर्दिश के दिन” तीन खंडों में प्रकाशित हुई है। परसाई जी के अनुसार गर्दिश उनकी नियति है। कुछ ऐसे ही भाव इस गीत के भी हैं ;

रहा गर्दिशों में हरदम

मेरे इश्क का सितारा।

कभी डगमगाई कश्ती

कभी खो गया किनारा।।

अगर आप एक महान व्यक्ति बन चुके हैं, अथवा बनना चाहते हैं, तो सबसे पहले अपने जीवन में गर्दिश के दिनों को तलाशें, उन्हें तराशें, धो पोंछकर साफ करें और करीने से दुनिया के सामने पेश करें। अगर आपके जीवन में गर्दिश के दिन नहीं, तो आप इंसान नहीं। ऐसा आदमी क्या खाक महान बनेगा। पड़े रहिए गर्दिश के दिनों की तलाश में। क्योंकि गर्दिश के दिनों के बाद ही इंसान के जीवन में अच्छे दिन आते हैं। गर्दिश के दिन भुला ना देना।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी / अंग्रेजी साहित्य – आलेख/Articles ☆ गर्दिश के दिन: Days of Despair ☆ Shri Jagat Singh Bisht ☆


Shri Jagat Singh Bisht

(Master Teacher: Happiness & Well-Being, Laughter Yoga Master Trainer, Author, Blogger, Educator, and Speaker.)

Authored six books on happiness: Cultivating Happiness, Nirvana – The Highest Happiness, Meditate Like the Buddha, Mission Happiness, A Flourishing Life, and The Little Book of HappinessHe served in a bank for thirty-five years and has been propagating happiness and well-being among people for the past twenty years. He is on a mission – Mission Happiness!

😎 गर्दिश के दिन: Days of Despair 🥸

(हिंदी और अंग्रेजी में एक मिश्रित / A bilingual experiment in Hindi and English)

काफी समय पूर्व, एक प्रतिष्ठित पत्रिका में, कई लेखकों ने अपने गर्दिश के दिनों पर लिखा था। उन्होंने सफल और महान होने के बाद, संपादक के आग्रह पर, ऐसा किया था। मैं सफल और महान हुए बिना, ऐसा अपनी मर्जी से कर रहा हूं।

उम्र के अनेक मोड़ पार कर चुका हूं। अब तक न सफल हुआ हूं और न ही महान बन पाया हूं। मेरे देखते-देखते, मुझसे कम योग्य लोग मुझसे अधिक सफल हो चुके हैं और मुझसे घटिया लोग महान बन गए हैं। यही मेरे दुख का कारण है।

A long time ago—long enough for nostalgia to acquire a few grey hairs of its own—a reputed Hindi magazine brought out a remarkable series. It was dedicated to the days of despair of celebrated writers: tales of their hollow pockets, hollow kitchens, and occasionally hollow souls. The contributors were friendly luminaries who had, by then, climbed to heights from where despair looked like a poetic childhood disease—painful at the time, but now excellent material for charming anecdotes at literary gatherings.

They wrote of wretched rooms where even hope hesitated to enter; they narrated the evenings when the lamp had more soot than light, and the mornings when fortune seemed to have overslept on purpose. Their stories reminded us that greatness, like good compost, must sprout from organic suffering.

They were invited by the Editor because they were great, famous, and suitably wrinkled by experience.

I, however, attempt the same task without possessing greatness, fame, or even the sort of wrinkles that literary editors find aesthetically inspiring. If anything, mine are plain domestic creases, the ordinary lines produced by old age and electric bills.

I have grown old—old enough to avoid mentioning numbers, lest someone mistakes my age for a historical period—but alas, greatness has not arrived. Nor has fame. Nor has even that modest rumour that “someone in our locality is doing something interesting.” I have waited politely. Greatness, it seems, has not reciprocated the courtesy.

What adds flavour to this mild tragedy is that, as the years have trotted past, I have seen—quite helplessly—the rise of men lesser, meaner, and, in some extreme cases, louder than me. They flourished with the ease of mildew in monsoon. Every time a new one rose, I experienced an unhappiness so refined and aristocratic that Oscar Wilde himself might have complimented it.

My friends, naturally, have prospered beyond belief. Their bungalows are so large that one needs Google Maps to locate the guest bathroom. Their chauffeur-driven luxury cars glide through town like well-bred crocodiles. Their wives, robust in both health and wealth, supervise homes where everything—including the dogs of foreign breed—has a higher market value than my bank balance. They possess vast fortunes in Swiss banks, majestic collections of fat, cholesterol, high blood pressure, diabetes, and heart disease. I possess none of these. Not even the cholesterol.

I am a tortoise. They are hares—and some, on festive days, hunt with the hounds too. But before you assume I lack talent or refinement, let me clarify with the humility of a saint and the accuracy of a government form: I am physically, mentally, and spiritually sound; honest to a degree that makes honesty awkward; and financially and intellectually cleaner than freshly laundered linen.

My achievements—scattered across reading, writing, sports, games, love, sex, and friendship—are enough to fill a respectable diary, if not a library. But I cannot bring myself to practise sycophancy. I cannot flatter a man merely because he has a necktie and a position. Had I embraced hypocrisy with the enthusiasm of my peers, I, too, might have gathered a following of disoriented devotees. But shame is a stubborn thing.

Over time, I have read the autobiographies of the great. They describe how they saw poverty, hunger, disease, famine, and other educational experiences; how they struggled bravely, laboured endlessly, and rose steeply; how they eventually reached the mountaintop, from where everything below looked small—especially other people’s problems.

And then, feeling generous, they shared the stories of their struggles for the benefit of lesser mortals.

I, unfortunately, do not believe in shortcuts. As I read and write and wander into the dense forest of spirituality, I realise that a vast world remains unconquered. And I, firmly stationed at the starting point, can only wave at potential as it passes by.

So here I am—no one, nowhere—trudging along with my despair and gloom walking faithfully beside me, like two old companions who have tired of trying to cheer me up and now simply keep pace out of habit.

Greatness may yet arrive. Fame may yet stumble upon me. But until then, I shall continue writing pre-fame memoirs of despair, hoping they will someday become post-fame classics.

After all, even a tortoise deserves a footnote in literary history.

लोगों ने गरीबी देखी, भूख देखी, अकाल देखा, बीमारी देखी, संघर्ष किया, साधना की, और महान हो गए। महानता के शिखर पर पहुंचने के बाद, वो पीछे मुड़कर अपने गर्दिश के दिनों पर विहंगम दृष्टि डाल सकते हैं। यह उनका सौभाग्य है।

सफलता के टीले पर, शॉल ओढ़े बैठकर, गर्दिश के दिनों को याद करने की रूमानियत मेरे नसीब में नहीं है। जितना पड़ता जाता हूं, उतना ही पाता हूं कि अभी तो अनंत आयाम बाकी हैं जानने को। जितना लिखता जाता हूं, उतना ही पाता हूं कि कलम बहुत छोटी है और स्याही बहुत कम। मेरी गर्दिश और गहराती जाती है।

झूठमूठ की सफलता और महानता के शॉर्टकट मैं नहीं पकड़ पाता। मेरी गर्दिश मेरे संग-संग चलती है!

(इस रचना के हिंदी अंश तीस बरस पहले लिखे गए थे और अंग्रेज़ी वाला हिस्सा अब लिखा है।

The Hindi portion of this article was written thirty years ago and the English portion has been blended now.)

♥ ♥ ♥ ♥

© Jagat Singh Bisht

Master Teacher: Happiness & Well-Being, Laughter Yoga Master Trainer, Author, Blogger, Educator, and Speaker

FounderLifeSkills

A Pathway to Authentic Happiness, Well-Being & A Fulfilling Life! We teach skills to lead a healthy, happy and meaningful life.

The Science of Happiness (Positive Psychology), Meditation, Yoga, Spirituality and Laughter Yoga. We conduct talks, seminars, workshops, retreats and training.

≈ Editor – Shri Hemant Bawankar/Editor (English) – Captain Pravin Raghuvanshi, NM

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक साहित्य # ३८१ ☆ आलेख – “भारतीय अभियांत्रिकी परंपरा से वर्तमान” ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ३८१ ☆

?  आलेख – भारतीय अभियांत्रिकी परंपरा से वर्तमान ? श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

“योगः कर्मसु कौशलम्”

अर्थात कर्म में कौशल ही योग है

कभी कभी इतिहास स्वयं को रचने के लिए मनुष्य का सहारा नहीं लेता, बल्कि मनुष्य को अपने साधन के रूप में प्रयोग करता है। भारत की सभ्यता ने यही किया है। जब मानव ने मिट्टी को आकार देना सीखा, तो भारत ने उससे मंदिर गढ़े। जब जल को नियंत्रित करने की आवश्यकता हुई, तो भारत ने नदियों के तट पर सिंचाई की व्यवस्था बनाई। जब पत्थरों से दीवारें बनीं, तो भारत ने उन दीवारों में नक्काशी से कविता लिख दी। यह वह भूमि है जहाँ अभियंत्रण केवल तकनीकी कौशल नहीं, बल्कि जीवन-दर्शन था। यहाँ अभियंता केवल निर्माता नहीं, भगवान विश्वकर्मा के स्वरूप में सृष्टा माने गए। 

मोहनजोदड़ो और हड़प्पा की विकसित सभ्यता आज भी हमें यह सिखाती हैं कि स्वच्छता और जल-प्रबंधन केवल शहरी सुविधा नहीं, बल्कि सभ्यता की रीढ़ हैं। सिंधु घाटी का नगर नियोजन, समकोणीय गलियाँ, कुएँ, स्नानागार , ये सब हमारे पूर्वज अभियंताओं की प्रतिभा का जीवंत प्रमाण हैं। प्राचीन ग्रंथों में भगवान विश्वकर्मा का उल्लेख उसी गौरव के साथ हुआ है जिस गौरव से कवि वाल्मीकि और ऋषि व्यास का। हर वर्ष हमारी संस्कृति में हम इंजीनियरिंग संस्थानों में विश्वकर्मा पूजन के आयोजन करते आए हैं।भारतीय अभियंत्रण सदैव कला, विज्ञान और आध्यात्म के संगम पर खड़ा रहा है। हमारे मंदिरों की स्थापत्य कला, लोहे के खंभे जो सदियों से जंगरहित खड़े हैं, या फिर अजन्ता की गुफाओं में शिल्प-सौंदर्य ,  सब यह बताते हैं कि हमारे अभियंता केवल साधन बनाने वाले नहीं, जन आत्मा में बसने वाले कलाकार थे।

समय बदला, औपनिवेशिक युग आया। इंजीनियरिंग का अर्थ केवल गणितीय संरचना तक सीमित कर दिया गया। भारत में अभियंत्रण को अंग्रेज़ी पाठशालाओं के माध्यम से नए रूप में ढाला गया। किंतु भारतीय मस्तिष्क अपनी जड़ों से कट नहीं सका। स्वतंत्रता संग्राम के साथ ही एक नए अभियंत्रण युग का आरंभ हुआ , जो आत्मनिर्भरता का प्रतीक था। रेलवे, सिंचाई परियोजनाएँ, बांध, इस्पात संयंत्र, औद्योगिक नगर , ये सब नवभारत की नींव थे। पंचवर्षीय योजनाओं में अभियंताओं का स्थान उतना ही महत्वपूर्ण था जितना किसी कवि का संस्कृति के निर्माण में होता है। नेहरूजी ने कहा था ,  बड़े बांध आधुनिक भारत के मंदिर हैं। यह कथन भारतीय अभियंताओं के लिए एक आदरांजलि था।

आज भारतीय अभियंता दुनियां के प्रायः प्रत्येक देश में कही न कही महत्वपूर्ण भूमिकाओं में सक्रिय हैं।

पहले  भारत गुलाम था, फिर भी तकनीकी विचार स्वतंत्र थे। पर आज राजनीति इंजीनियरिंग के विविध क्षेत्रों सिविल, मैकेनिकल, इलेक्ट्रिकल, केमिकल, इलेक्ट्रॉनिक्स, कंप्यूटर, माइनिंग, एयरोनॉटिकल, और अनेक शाखाओं में क्षेत्रीय  विकास के नाम पर हावी दिखती है।

भारत में हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं में तकनीकी लेखन का बड़ा संकट रहा है। ज्ञान यदि भाषा की दीवारों में कैद हो जाए, तो वह सीमित हो जाता है।

हिंदी तथा क्षेत्रीय भाषाओं में तकनीक का लेखन, महत्वपूर्ण है।  यह उस भारत का प्रतीक है जो बहुभाषिक होते हुए भी एक विचार में बंधा हुआ है  ‘ज्ञान सभी के लिए’।

भारत आज चंद्रयान, अदित्य, जीआईएस, और स्वदेशी ड्रोन तकनीक के साथ अंतरिक्ष से लेकर पृथ्वी की गहराइयों तक अपनी उपस्थिति दर्ज करा चुका है। यह केवल तकनीकी वैज्ञानिक उपलब्धियाँ नहीं हैं, यह अभियंत्रण की आत्मा का उत्कर्ष है। ‘मेक इन इंडिया’ और ‘वोकल फॉर लोकल’ जैसे अभियानों में अभियंता अग्रिम पंक्ति के योद्धा हैं।

आज आवश्यकता है कि नई पीढ़ी में अभियंता केवल उपकरणों तक सीमित न रहें, बल्कि समाज की नब्ज को पहचानें। जल, ऊर्जा और कचरे का प्रबंधन केवल योजनाओं का विषय नहीं, जीवन की आवश्यकता है। अभियंत्रण यदि संवेदना से जुड़ जाए तो वह चमत्कार कर सकता है।

आज जब विश्व कृत्रिम बुद्धिमत्ता और स्वचालन के युग में प्रवेश कर रहा है

हम आशा करते हैं कि भारत का अभियंता केवल तकनीक का ज्ञाता नहीं, सृजन का साक्षी है और सृजन की गाथा है।

© श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

म प्र साहित्य अकादमी से सम्मानित वरिष्ठ व्यंग्यकार

संपर्क – ए 233, ओल्ड मिनाल रेजीडेंसी भोपाल 462023

मोब 7000375798, ईमेल apniabhivyakti@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # १५१ – देश-परदेश – Don’t put all your Eggs in one बास्केट ☆ श्री राकेश कुमार ☆

श्री राकेश कुमार

(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ  की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” ज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)

☆ आलेख # १५१ ☆ देश-परदेश – Don’t put all your Eggs in one basket ☆ श्री राकेश कुमार ☆

अंग्रेज़ी भाषा के इस फ्रेस को मिडिल स्कूल में पढ़ाया गया था, तो गुरुजी ने इस का तात्पर्य पूछा था ? हम शाकाहारी हैं, हमने भी कह दिया था, हमारे घर में अंडे नहीं आते हैं, इस लिए हमको इस के बारे में कुछ भी पता नहीं हैं।पूरी कक्षा खिलखिला कर खूब हंसने लगी थी।

घर आकर पिताश्री से हमने पूरी बात बताई, तब उन्होंने हमें याद दिलाया कि जब भी रेल यात्रा में जाते है, तो नगद राशि को पेंट की दोनों जेब और शर्ट के नीचे पहनने वाली बंडे की चोर पॉकेट में अलग अलग रख कर यात्रा पर जाते हैं।ये ही नियम अंडों पर भी लागू होता हैं।

विगत दिन जबलपुर स्टेशन पर एक यात्री ने प्लेटफार्म के एक वेंडर से समोसा खरीदा, मोबाइल से भुगतान पूरा ना होने पर विक्रेता ने यात्री की हाथ घड़ी निकाल ली थी।किसी सज्जन ने पूरी वारदात का वीडियो सोशल मीडिया पर प्रसारित कर दिया हैं।

मीडिया को एक काम मिल गया, विक्रेता का लाइसेंस निरस्त हो गया हैं।रेलवे पुलिस उस यात्री को खोज रही हैं, ताकि आगे की कार्यवाही की जा सकें।ये भी हो सकता है, यात्री बिना टिकट यात्रा कर रहा होगा, फिर वो क्यों सामने आएगा ? विक्रेता ने पुलिस को बताया की घड़ी को उसने ट्रेन में ही फेंक दिया था।ये सलाह उसके वकील ने दी होगी, ताकि वो निर्दोष साबित हो जाए।

यदि यात्री का मोबाइल भुगतान करने में फेल हो गया था, तो उसको कुछ धन राशि नगद भी अलग अलग जेबों में रखनी चाहिए थी, और उसकी तस्वीर भी वायरल नहीं होती।

जबलपुर शहर इस घटना से अलग बदनाम हो गया हैं।लोग नेहरू को याद कर रहें है, जिन्होंने जबलपुर को गुंडों का शहर तक कह दिया था, वो तो बाद में स्वर्गीय विनोबा भावे, भूदान आंदोलन के जनक ने जबलपुर को संस्कारधानी बताया था।

इस घटना से दो बातें सामने आई एक तो मोबाइल या बैंक कार्ड के रहते हुए भी कुछ राशि नगद में अवश्य रखें। दूसरी बात “ऊपर वाला सब देख रह है” एक दम सही है।सी सी टीवी कैमरे, मोबाइल आपकी हर हरकत पकड़ ही लेते हैं।

© श्री राकेश कुमार

संपर्क – B 508 शिवज्ञान एनक्लेव, निर्माण नगर AB ब्लॉक, जयपुर-302 019 (राजस्थान)

मोबाईल 9920832096

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ८२१ ⇒ लोकतंत्र चौराहे पर ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “लोकतंत्र चौराहे पर।)

?अभी अभी # ८२१ ⇒ आलेख – लोकतंत्र चौराहे पर ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

दिल के दर्द का कुछ यूं इंतजाम हुआ,पहले चाके ज़िगर हुआ,फिर जश्ने आम हुआ। इस दिल के टुकड़े जरूर हुए,लेकिन आज सुकून है,यह क्या कम है। हम आजाद भी हैं,और लोकतंत्र भी जिंदा है,बस यही हमारी सबसे बड़ी कामयाबी है।

इस लोकतंत्र पर भी कभी आपातकाल का काला साया पड़ा था, लेकिन गम के बादल छंट गए, फिर रोशनी का इज़हार हुआ।

कुछ अतीत के पन्ने पलटें,तो कभी अंग्रेजी में एक शंकर्स वीकली नाम की पत्रिका प्रकाशित होती थी,जिसकी तुलना विदेशी पत्रिका punch से आसानी से की जा सकती है। प्रसिद्ध कार्टूनिस्ट के.शंकर पिल्लई द्वारा संपादित यह देश की पहली कार्टून पत्रिका थी।

शंकर्स वीकली, शंकर का सपना था जो सन् १९४८ में साकार हुआ था। ।

बहुत कम लोग जानते होंगे, इसी पत्रिका की तर्ज पर, शंकर्स वीकली का हिंदी में भी प्रकाशन हुआ था। लेकिन, खेद है, इसके कुछ ही अंक प्रकाशित हो पाए। इसी पत्रिका के एक अंक में श्रीलाल शुक्ल का एक व्यंग्य प्रकाशित हुआ था, जिसका शीर्षक था, चौराहे पर। यह अंक और यह व्यंग्य शायद आज कहीं उपलब्ध न हो,लेकिन उसकी एक पंक्ति, आज ४५ वर्ष के बाद भी मुझे अच्छी तरह से याद है।

चारों ओर जनसंघ फैला हुआ था“।

तब और अब में कितना अंतर है। आज की भारतीय जनता पार्टी, तब जनसंघ ही तो थी। जनसंघ का साधारण अर्थ जन समूह भी होता है। अर्थ तो राग दरबारी का भी कुछ और ही होता है। बस यही खूबी है, शब्दों की और व्यंग्य के जादूगर श्रीलाल शुक्ल की ।

अब आइए,व्यंग्य के शीर्षक “चौराहे पर” की ओर मुखातिब होते हैं। तब लोकतंत्र चौराहे पर नहीं,खतरे में था। हिंदी की कई अच्छी पत्रिकाएं बंद हो गई थी, जिनमें दोनों हिंदी अंग्रेजी शंकर्स वीकली शामिल थी। धर्मयुग, दिनमान, पुराना ज्ञानोदय और सारिका का भी यही हश्र हुआ। आज सिर्फ राजनीति जिंदा है, अच्छी तरह फल फूल रही है, लोकतंत्र फिर भी चौराहे पर ही है।

जो लोग आजादी के बाद पैदा हुए हैं, वे आजादी का सपना नहीं देख सकते लेकिन मजबूत लोकतंत्र और एक साधन संपन्न व सशक्त राष्ट्र का सपना तो देख ही सकते हैं। जन्म किसी राष्ट्र का हो अथवा किसी बालक का, पीड़ा और संघर्ष तो मां को ही झेलना पड़ता है। जिसे नौ महीने अपने पेट में पाला पोसा, उस जिगर के टुकड़े को अपने से अलग करना पड़ता है,और तब ही वह एक मां कहलाती है। मां का त्याग एक बालक नहीं जान सकता। ।

आज हमारा लोकतंत्र सुरक्षित है और मजबूत है और यही हमारी सबसे बड़ी उपलब्धि है। आज लोकतंत्र चौराहे पर है।

चहुंमुखी विकास के रास्ते खुले हुए हैं। स्वदेशी जागरण और स्मार्ट सिटी की जुगलबंदी चल रही है। हमने मन्नू भंडारी का महाभोज भी देखा अब तो बस छप्पन भोग की तैयारी है। ।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संजय उवाच # ३०९ – संभावना के बीज ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के  लेखक  श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है। साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ  हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको  पाठकों का  आशातीत  प्रतिसाद मिला है।”

हम  प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है  इस शृंखला की अगली कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों  के माध्यम से  हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)

☆  संजय उवाच # ३०९ संभावना के बीज… ?

सीताफल की पिछले कुछ दिनों से बाज़ार में भारी आवक है। सोसायटी की सीढ़ियाँ उतरते हुए देखता हूँ  कि बच्चे सीताफल खा रहे हैं। फल के बीज निकालकर करीने से एक तरफ़ रख रहे हैं। फिर सारे बीज एक साथ उठाकर डस्टबिन में डाल दिए। स्वच्छता और सामाजिक अनुशासन की दृष्टि से यह उचित भी है।

यहीं से चिंतन जन्मा। सोचने लगा, हर बीज के पेट में एक पौधा  है, पौधे का बीज फेंका जा रहा है। फ्लैट में रहने की विवशता कितना कुछ नष्ट कराती है।

सर्वाधिक दुखद होता है संभावनाओं का नष्ट होना। वस्तुत: संभावना की हत्या महा पाप है। हर संभावना को अवसर मिलना चाहिए। पनपना, न पनपना उसके प्रारब्ध और प्रयास पर निर्भर करता है।

चिंतन बीज से मनुष्य तक पहुँचा। सही ज़मीन न मिलने पर जैसे बीज विकसित नहीं हो पाता, कुछ उसी तरह अपने क्षेत्र में काम करने का अवसर न पाना, संभावना का नष्ट होना है। साँस लेने और जीने में अंतर है। अपनी लघुकथा ‘निश्चय’ के संदर्भ से बात आगे बढ़ाता हूँ। कथा कुछ यूँ है,

“उसे ऊँची कूद में भाग लेना था पर परिस्थितियों ने लम्बी छलांग की कतार में लगा दिया। लम्बी छलांग का इच्छुक भाला फेंक रहा था। भालाफेंक को जीवन माननेवाला सौ मीटर की दौड़ में हिस्सा ले रहा था। सौ मीटर का धावक, तीरंदाजी में हाथ आजमा रहा था। आँखों में तीरंदाजी के स्वप्न संजोने वाला तैराकी में उतरा हुआ था। तैरने में मछली-सा निपुण मैराथन दौड़ रहा था।

जीवन के ओलिम्पिक में खिलाड़ियों की भरमार है पर उत्कर्ष तक पहुँचने वालों की संख्या नगण्य है। मैदान यहीं, खेल यहीं, खिलाड़ी यहीं  दर्शक यहीं, पर मैदान मानो निष्प्राण है।

एकाएक मैराथन वाला सारे बंधन तोड़कर तैरने लगा। तैराक की आँंख में अर्जुन उतर आया, तीर साधने लगा। तीरंदाज के पैर हवा से बातें करने लगे। धावक अब तक जितना दौड़ा नहीं था उससे अधिक दूरी तक भाला फेंकने‌ लगा। भालाफेंक का मारा भाला को पटक कर लम्बी छलांग लगाने लगा। लम्बी छलांग‌ वाला बुलंद हौसले से ऊँचा और ऊँचा, बहुत ऊँचा कूदने लगा।

दर्शकों के उत्साह से मैदान गुंजायमान हो उठा। उदासीनता की जगह उत्साह का सागर उमड़ने लगा। वही मैदान, वही खेल, वे ही दर्शक पर खिलाड़ी क्या बदले, मैदान में प्राण लौट आए।”

अँग्रेज़ी की एक कहावत है, ‘यू गेट लाइफ वन्स। लिव इट राइट। वन्स इज़ इनफ़।’ जीवन को सही जीना अर्थात अपनी संभावना को समझना, सहेजना और श्रमपूर्वक उस पर काम करना।

स्मरण रहे, आप जीवन के जिस भी मोड़ पर हों, जीने की संभावना हमेशा बनी रहती है।

© संजय भारद्वाज 

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

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संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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