हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # १४४ – देश-परदेश – ऑनलाइन गेमिंग पर प्रतिबन्ध : एक चर्चा ☆ श्री राकेश कुमार ☆

श्री राकेश कुमार

(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ  की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” ज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)

☆ आलेख # १४४ ☆ देश-परदेश – ऑनलाइन गेमिंग पर प्रतिबन्ध : एक चर्चा ☆ श्री राकेश कुमार ☆

“हर क्रिया की प्रतिक्रिया होती है” विज्ञान कहता हैं। हमारे देश में ऑनलाइन गेमिंग पर रोक लगा दी गई हैं। जब से समाचार आया है, हमारे कुछ क्रिकेट के खिलाड़ी, टीवी आर्टिस्ट, फिल्मी हीरो इस के विरुद्ध सर्वोच्च न्यायालय जाने की सोच रहें हैं। उनकी तो रोज़ी रोटी की बात बन आई हैं। कपिल सिब्बल जैसे नामी वकील बिना फीस के उनका केस लड़ने की तैयार हैं। उनको सिर्फ ऑनलाइन गेम्स के मुफ्त वाले पॉइंट्स मिलने चाहिए, ताकि वो भी इस प्रकार के खेलों में भाग ले सकें।

खाद्यदूत स्विगी, जोमैटो आदि के कार्यों में लगे हुए लोगों का काम भी बहुत कम हो जाएगा। ऑनलाइन खेलने वाले गेम में इतने व्यस्त रहते है, कि बेचारे खाना बना ही नहीं पाते हैं। अब ऐसे लोग खुद ही खाना बना कर खा लेंगे। देश की आर्थिक प्रगति तक रुक जाएगी।

टीवी चैनल्स के ऑनलाइन विज्ञापन कम हो जाने से चैनल वालों की आय में गिरावट आना तय हैं। इसकी पूर्ति वो दर्शकों से लिए जाने वाले शुल्क में वृद्धि कर सकते हैं। मोबाइल की बिक्री में बहुत बड़ी गिरावट से इनकार नहीं किया जा सकता हैं।

हमारे एक मित्र ने एक मकान में एयर बी एन बी ( किराए पर कमरा सुविधा) बनाई थी। पूर्व में कुछ लोग उसके कमरे में जुआ खेलते थे, जब से ऑनलाइन खेलों ने गति पकड़ी थी, उसकी किराए की आय बहुत कम हो गई थी, अब वो बहुत खुश है, लोग वापिस उसके कमरों में आकर जुआ खेलेंगे।

शहर के कुछ होटल आसानी से जुआ खेलने के लिए सस्ते कमरे उपलब्ध करवा देते थे, वो लोग भी अब बहुत खुश हैं। पुलिस वालों की परेशानी अवश्य बढ़ जाएगी, क्योंकि इन जुआ खेलने वालों को पकड़ना पड़ेगा, ऑनलाइन खेलने वालों से उनको कोई परेशानी नहीं थी। सरकारी कार्यालयों की वर्किंग में भी जबरदस्त सुधार होने की पूरी संभावना बन रही हैं।

बैंकों को भी अब अधिक नगद राशि हमेशा तैयार रखनी पड़ेगी, ताकि जुआरियों को सप्लाई बनाई रखी जाय। बैंक स्टाफ भी अब फ्रॉड कम कर देगा, क्योंकि उनका स्टाफ भी तो अब ऑनलाइन गेम से वंचित हो जाएगा।

ऑनलाइन गेम में बैंक खाते से ही राशि निकलती थी, जिससे एक नंबर की पूंजी भी कम हो रही थी। जुआ तो दो नंबर की राशि से ही खेला जा सकता है।

उपयोग किया हुआ, घरेलू सामान अब सस्ते में बिका करेगा। जूए में जब पैसे खत्म हो जाते है तो सबसे पहले घर का सामान ही तो बिकता हैं।

मोहल्ले के सुने या आधे बने हुए मकानों में फिर रौनक लौट आएगी। छोटे जुआरी वही बैठ कर जुआ खेल सकेंगे।

आप सबके मन में भी बहुत सारे विचार इस बाबत आ रहें होंगे। यदि उचित समझें तो सांझा कर देवें, इंतजार रहेगा।

© श्री राकेश कुमार

संपर्क – B 508 शिवज्ञान एनक्लेव, निर्माण नगर AB ब्लॉक, जयपुर-302 019 (राजस्थान)

मोबाईल 9920832096

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संजय उवाच # ३०३ – शिवोऽहम्… (6) ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के  लेखक  श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है। साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ  हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको  पाठकों का  आशातीत  प्रतिसाद मिला है।”

हम  प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है  इस शृंखला की अगली कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों  के माध्यम से  हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)

☆  संजय उवाच # ३०३ ☆ शिवोऽहम्… (6) ?

आत्मषटकम् के छठे और अंतिम श्लोक में आदिगुरु शंकराचार्य महाराज आत्मपरिचय को पराकाष्ठा पर ले जाते हैं।

अहं निर्विकल्पो निराकाररूपो

विभुत्वाच्च सर्वत्र सर्वेन्द्रियाणाम् ।

न चासङ्गतं नैव मुक्तिर्न मेयः

चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम् ॥

मैं किसी भिन्नता के बिना, किसी रूप अथवा आकार के बिना, हर वस्तु के अंतर्निहित आधार के रूप में हर स्थान पर उपस्थित हूँ। सभी इंद्रियों की पृष्ठभूमि में मैं ही हूँ। न मैं किसी वस्तु से जुड़ा हूँ, न किसी से मुक्त हूँ। मैं चैतन्य रूप हूँ, आनंद हूँ, शिव हूँ, शिव हूँ।

विचार करें, विवेचन करें तो इन चार पंक्तियों में अनेक विलक्षण आयाम दृष्टिगोचर होते हैं। आत्मरूप स्वयं को समस्त संदेहों से परे घोषित करता है। आत्मरूप एक जैसा और एक समान है। वह निश्चल है, हर स्थिति में अविचल है।

आत्मरूप निराकार है अर्थात  जिसका कोई आकार नहीं है। सिक्के का दूसरा पहलू है कि आत्मरूप किसी भी आकार में ढल सकता है। आत्मरूप सभी इन्द्रियों को व्याप्त करके स्थित है, सर्वव्यापी है। आत्मरूप में न  मुक्ति है, न ही बंधन। वह सदा समता में स्थित है। आत्मरूप किसी वस्तु से जुड़ा नहीं है, साथ ही किसी वस्तु से परे भी नहीं है। वह कहीं नहीं है पर वह है तभी सबकुछ यहीं है।

वस्तुतः मनुष्य स्वयं के आत्मरूप को नहीं जानता और परमात्म को ढूँढ़ने का प्रयास करता है। जगत की इकाई है आत्म। इकाई के बिना दहाई का अस्तित्व नहीं हो सकता। अतः जगत के नियंता से परिचय करने से पूर्व स्वयं से परिचय करना आवश्यक और अनिवार्य है।

मार्ग पर जाते एक साधु ने अपनी परछाई से खेलता बालक देखा। बालक हिलता तो उसकी परछाई हिलती। बालक दौड़ता तो परछाई दौड़ती। बालक उठता-बैठता, जैसा करता स्वाभाविक था कि परछाई की प्रतिक्रिया भी वैसी होती। बालक को आनंद तो आया पर अब वह परछाई को प्राप्त करना का प्रयास करने लगा। वह बार-बार परछाई को पकड़ने का प्रयास करता पर परछाई पकड़ में नहीं आती। हताश बालक रोने लगा। फिर एकाएक जाने क्या हुआ कि बालक ने अपना हाथ अपने सिर पर रख दिया। परछाई का सिर पकड़ में आ गया। बालक तो हँसने लगा पर साधु महाराज रोने लगे।

जाकर बालक के चरणों में अपना माथा टेक दिया। कहा, “गुरुवर, आज तक मैं परमात्म को बाहर खोजता रहा पर आज आत्मरूप का दर्शन करा अपने मुझे मार्ग दिखा दिया।”

आत्मषटकम् मनुष्य को संभ्रम के पार ले जाता है, भीतर के अपरंपार से मिलाता है। अपने प्रकाश का, अपनी ज्योति की साक्षी में दर्शन कराता है।

इसी दर्शन द्वारा आत्मषटकम् से निर्वाणषटकम् की यात्रा पूरी होती है। निर्वाण का अर्थ है, शून्य, निश्चल, शांत, समापन। हरेक स्थान पर स्वयं को पाना पर स्वयं कहीं न होना। मृत्यु तो हरेक की होती है, निर्वाण बिरले ही पाते हैं।

षटकम् के शब्दों को पढ़ना सरल है। इसके शाब्दिक अर्थ को जानना तुलनात्मक रूप से   कठिन। भावार्थ को जानना इससे आगे की यात्रा है,  मीमांसा कर पाने का साहस उससे आगे की कठिन सीढ़ी है पर इन सब से बहुत आगे है आत्मषट्कम् को निर्वाणषटकम् के रूप में अपना लेना। अपना निर्वाण प्राप्त कर लेना। यदि निर्वाण तक पहुँच गए तो शेष जीवन में अशेष क्या रह जाएगा? ब्रह्मांड के अशेष तक पहुँचने का एक ही माध्यम है, दृष्टि में शिव को उतारना, सृष्टि में शिव को निहारना और कह उठना, शिवोऽहम्…!

© संजय भारद्वाज 

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️  गोविन्द साधना संपन्न हुई. अगली साधना की सूचना आपको शीघ्र ही दी जावेगी। 🕉️💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं।

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ७६५ ⇒ अंगड़ाई ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “अंगड़ाई।)

?अभी अभी # ७६५ ⇒ आलेख – अंगड़ाई ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

°°π Pandiculation π°°°

करवट बदली,

अंगड़ाई ली

सोया हिंदुस्तान उठा ….

हिंदुस्तान तो कब का उठकर और जागकर विकास के रास्ते विश्व गुरु बनने की राह पर अग्रसर है, और इधर हम एक सूर्यवंशी हैं, जो सूरज से आँखें मिलाने के बजाय बिस्तर पर पड़े पड़े अंगड़ाई ले रहे हैं। वैसे देखा जाए तो हम इतने आलसी हैं कि अंगड़ाई लेने में भी हमें जोर आता हैं। काश, हमारी अंगड़ाई भी कोई और ले लेता, तो हम तो हाथ पाँव भी नहीं हिलाते।

लेकिन वह कहावत है न, “न हि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगाः”, इसलिए उबासी लेने से अंगड़ाई लेने तक का काम भी हमें खुद ही करना पड़ता है। वह भी अगर पत्नी गर्मागर्म चाय का प्याला लेकर, सर पर खड़ी नहीं हो जाती, तो हमारे अंग का कोई भी भाग अंगड़ाई में भाग नहीं लेता। ।

हमारी पत्नी की आंख हम पर गड़ी हुई है और हमारी आँखें उनके कोमल हाथों में मौजूद चाय के प्याले पर टिकी हुई है। सुबह सुबह जो चाय के लिए नटे, उसका पुण्य घटे। हमने भी आखिर प्याला उनके हाथों से लेकर मुंह को लगा ही लिया। चाय की चुस्की में ऐसा क्या है, कि बदन की सुस्ती तुरंत हवा हो जाती है। रात भर के अलसाए अंग का एकाएक कायाकल्प हो जाता है।

शरीर की एक स्वाभाविक क्रिया है अंगड़ाई जो आलस्य या थकावट के कारण होती है और जिसके फलस्वरूप सारा शरीर कुछ पलों के लिए ऐंठ, तन या फैल जाता है।

अंग्रेजी में इसके लिए सही शब्द “पैंडिक्यूलेशन” है। इसके साथ जम्हाई भी आ सकती है और नहीं भी। इसे “विशेष रूप से धड़ और हाथ-पैरों में खिंचाव और अकड़न (जैसे थकान और नींद आने पर या नींद से जागने के बाद)” के रूप में परिभाषित किया गया है। ।

शरीर सबका टूटता है, अंगड़ाई सब लेते हैं।

हमने तो कुत्ते बिल्लियों तक को अंगड़ाई लेते देखा है। बच्चे जब तक पूरी तरह खेलकर थकते नहीं, सोते नहीं और एक बार सो गए, तो पूरी नींद लेने के बाद ही उठते हैं।

वे इतनी जल्दी बिस्तर नहीं छोड़ सकते।

वैसे शायर लोग अंगड़ाई को हुस्न और जवानी से जोड़ देते हैं। बिना अंगड़ाई के कोई हसीना जवान नहीं होती। उम्र की एक दहलीज पर अंगड़ाई ली जाती है, और जवानी की ओर कदम उठ जाता है। अंगड़ाई, शायरों की जुबानी ;

अंगड़ाई पर अंगड़ाई लेती है रात जुदाई की

तुम क्या समझो,

तुम क्या जानो

बात मेरी तन्हाई की

– क़तील शिफ़ाई

अंगड़ाई भी वो लेने न पाए उठा के हाथ

देखा जो मुझ को छोड़ दिए मुस्कुरा के हाथ

-निज़ाम रामपुरी

सितारे सो गए अंगड़ाई लेकर

कि अफ़्साने का अंजाम आ रहा था

– अब्दुल हमीद ‘अदम’

कौन अंगड़ाई ले रहा है ‘अदम’

दो जहाँ लड़खड़ाए जाते हैं

-अब्दुल हमीद ‘अदम’

सुना गईं थीं जिन्हें तेरी मुल्तफ़ित नज़रें

वो दर्द जाग उठे फिर से

ले के अंगड़ाई

-साहिर लुधियानवी

सुबह का वक्त है,

हमने अपने अलसाए

बदन पर आँख गड़ाई

देखा, वह भी ले रहा है

पहले जम्हाई

और फिर अंगड़ाई। ।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ७६४ ⇒ पेट पालना ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “पेट पालना।)

?अभी अभी # ७६४  ⇒ आलेख – पेट पालना ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

°°° •• Pet Parenting •• °°°

एक आम आदमी केवल अपना ही पेट पाल सकता है और अपने परिवार का ही भरण पोषण कर सकता है। हम चार भाई, चार बहन और माता पिता समेत कुल १० प्राणी थे, यानी इलेवन में सिर्फ एक कम। लेकिन वह हमारा जमाना था। हम दो हमारे दो, से जो परिवार कल्याण शुरू हुआ है, वह आज लिव इन रिलेशन पर भी जाकर शायद ही रुके।

हमने तो अपने आपको सिंगल चाइल्ड तक ही सीमित कर लिया, लेकिन फिर भी हमारे आम और खास परिचित इतने उदारवादी निकले कि उनका आंकड़ा तीन चार तक तो पहुंच ही गया।

दो लगातार कन्याओं के जन्म के पश्चात् एक वंश चलाने वाले तीसरे पुत्र की चाह किसे नहीं होती, लेकिन ईश्वर की इच्छा के आगे क्या किया जा सकता है, जब तीसरी बार भी उनके घर जुड़वा कन्या रत्न ही किलकारी मार रहे हों।।

जो पैदा करता है, वही दाने पानी की भी व्यवस्था करता है। हम अपने पेट को पापी नहीं कहते, फिर भी यह भी कड़वा सच है कि आज की इस दुनिया में पेट पालना इतना आसान भी नहीं। होते हैं कुछ विरले, जो अपने साथ अन्य लोगों के भी पेट का ख्याल रखते हैं। जिन्हें अपना पेट पालने में कठिनाई होती है, उनके लिए सरकार मुफ्त राशन, मुफ्त चिकित्सा और मुफ्त रसोई गैस की भी व्यवस्था कर रही है। हद होती है इंसानियत की। अब क्या आप भगवान से मिलोगे।

एक समय वह भी था, जब लोग अपने सदस्य साथ अन्य पशु पक्षियों को भी पाल लेते थे। भारत कृषि प्रधान देश रहा है। जहां खेती बाड़ी होगी, वहां गाय ढोर भी होंगे ही। खेती के लिए बैल और घर के दूध घी के लिए गाय भैंस भी पाले जाते थे, जिनके रहने के लिए घर के पास ही मवेशियों के लिए बाड़े बनाए जाते थे जहां कटी फसल और कृषि संबंधित उपकरण भी सुरक्षित रखे जाते थे।।

वैसे तो इस पेट को पापी पेट भी कहा गया है, क्योंकि यह कभी तृप्त होता ही नहीं। रोज भरो और रोज खाली, आखिर पापी ही हुआ ना। हम तो सिर्फ अपना ही पेट पालते हैं, होते हैं कुछ लोग ऐसे भी सज्जन जो अपने साथ अन्य मूक प्राणियों का पेट भी पालते हैं।

इन प्राणियों में जलचर, थलचर और नभचर भी हो सकते हैं।

एक शब्द पेट (pet) अंग्रेजी का भी होता है, जिसका भी अर्थ पालतू ही होता है। यह पेट, पालतू कुत्ता, बिल्ली, भी हो सकता है और तोता मैना, कबूतर अथवा लव बर्ड्स भी। वैसे पालने वाले तो घोड़ा, हाथी और आस्तीन में सांप भी पाल सकते हैं। आप इन सबको पशु प्रेमी कह सकते हैं। ये अपने पेट पालने के साथ पेट्स (pets) का भी पालन पोषण करते हैं।।

वैसे तो मेरी बिल्ली कभी मुझसे म्याऊँ नहीं करती, फिर भी इंसान के टुकड़ों पर पलने वाले कुछ कुत्ते भौंकने के साथ साथ काटने भी लगते हैं। शायद या तो उन्हें अंग्रेजी नहीं आती, अथवा उन्होंने अंग्रेजी की यह कहावत नहीं सुनी;

“Barking dogs soldem bite.” अजी solden छोड़िए, ये जंगली कुत्ते तो इतना सॉलिड काटते हैं, कि खुद तो इधर पहले पागल हो जाते हैं, और उधर जिसे काटा, वह पानी भी नहीं मांगता।

दिल्ली के कुत्तों की दहशत की आवाज तो सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गई, और अब प्रशासन कुत्तों के पीछे पड़ा है, और जन आक्रोश पशु प्रेमियों के खिलाफ। मैने कभी किसी मूक प्राणी को नहीं पाला। होते हैं कुछ लोग, जो बकरी को तो पाल लेते हैं, और बकरे की बली चढ़ा देते हैं। मुर्गी पालते हैं और उसका अंडा ही नहीं, मुर्गा भी खा जाते हैं।

मछली पालन तो किसी का व्यवसाय है, रोजी रोटी है। वाह रे इंसान, तू कितना महान। वाकई, तू pet भी पालता है, और इस पापी पेट को भी।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य #२८९ ☆ ख्वाहिशें–जीने का सलीका… ☆ डॉ. मुक्ता ☆

डॉ. मुक्ता

(डा. मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य” के माध्यम से  हम  आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी की मानवीय जीवन पर आधारित एक विचारणीय आलेख ख्वाहिशें–जीने का सलीका। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की  लेखनी को  इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें।) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य  # २८९ ☆

☆ ख्वाहिशें–जीने का सलीका.. ☆

‘एक अजीब सा रिश्ता है, मेरे और मेरी ख़्वाहिशों के दरमियां/ वो मुझे जीने नहीं देतीं और मैं उन्हें मरने नहीं देता’… ख़्वाहिशें ज़िंदगी जीने का सलीका हैं, मक़सद हैं, जो प्रेरणा देती हैं… हमें अपनी मंज़िल तक पहुंचने की राह दर्शाती हैं। ख़्वाहिशें वह संजीवनी हैं, जो मानव को ऊर्जा प्रदान करती हैं और मानव उन्हें पूरा करने के निमित्त बड़े से बड़ा करिश्मा कर गुज़रता है। अपनी शक्ति व सामर्थ्य से बढ़ कर कार्य करने को आप करिश्मा या प्रभु-कृपा ही कहेंगे न… यह सर्व-स्वीकार्य तथ्य है कि यह ऊर्जा हमें प्रभु-कृपा से ही प्राप्त होती है, क्योंकि उसकी रज़ा के बिना तो एक पत्ता भी नहीं हिल सकता। दूसरी ओर उसकी कृपा से पंगु भी पर्वत लांघ सकता है; नेत्रहीन देखने लगता है; लंगड़ा चलने लगता है और परमात्म-सत्ता ही मानव को फ़र्श से अर्श पर ला सकती है… राजा को रंक व रंक को राजा के शीर्षस्थ स्थान पर ले जाकर बैठा सकती है। इसे आप चमत्कार व प्रभु-कृपा कहेंगे या अपनी शक्ति व सामर्थ्य से अर्जित लक्ष्य। वास्तव में इन दोनों तथ्यों में विरोधाभास है। एक ओर तो हम प्रभु-अनुकंपा में पूर्ण विश्वास रखते हैं; उसी के प्रति समर्पित हो जाते हैं और उसका सारा श्रेय सृष्टि-नियंता को देते हैं। दूसरी ओर हम इसे करिश्मा कहते हैं अर्थात् इसका श्रेय अपनी लग्न, परिश्रम व मेहनत को देकर फ़ख्र महसूस करते हैं, क्योंकि परिश्रम व संघर्ष हमारी ख़्वाहिशों की वह संजीवनी है; जो हमें ऊर्जा प्रदान करती है।

उपरोक्त दोनों तथ्य सत्य प्रतीत होते हैं। मानव और ख़्वाहिशों के बीच विचित्र-सा रिश्ता है। ख़्वाहिशों को आप जीवन-रेखा से भी अभिहित कर सकते हैं। मुझे याद आ रही हैं अब्दुल कलाम जी की पंक्तियां… ‘मानव को सपने बंद आंखों से नहीं, खुली आंखों से देखने चाहिएं, क्योंकि वे सपने आपको सोने नहीं देते..आपकी प्रेरणा होते हैं। आपके जीवन को उमंग व आनंदोल्लास से भरते हैं और उन्हें साकार करने की राह दर्शाते हैं। सो! सपने मानव को आकाश की बुलंदियों तक पहुंचाते हैं और उन परिस्थितियों में वह सब कर गुज़रता है; जिसके वह योग्य ही नहीं होता है। ‘ख़्वाहिशें मुझे जीने नहीं देतीं और मैं उन्हें मरने नहीं  देता’…दोनों एक सिक्के के दो पहलू हैं; अन्योन्याश्रित हैं। कलाम जी का यह संदेश कि खुली आंखों से देखे हुए सपने मानव को सोने नहीं देते और वह उन्हें मरने नहीं देता विचारणीय है कि आखिर वह स्थिति कब उत्पन्न होती है?

यह सत्य है कि जब हमारा लक्ष्य उत्तम होता है और उसे प्राप्त करने के लिए हम अपना तन, मन, धन ही नहीं, समस्त ऊर्जा लगा देते हैं अर्थात् सर्वस्व समर्पण कर देते हैं। प्रश्न उठता है…प्रभु के प्रति समर्पण हमें मुक्ति, निर्वाण व मोक्ष की ओर ले जाता है और उन सपनों व ख़्वाहिशों को पूरा करने का सारा श्रेय हम ‘मैं अर्थात् स्वयं’ को प्रदान करते हैं, जो सर्वथा अनुचित है। ‘मैं’ ख़्वाहिशों को मरने नहीं देता अहं भाव को दर्शाता है, क्योंकि ‘मैं’ में निहित हैं…दिव्य व अलौकिक शक्तियां; जो हमारे अंतर्मन की सुप्त शक्तियों को जाग्रत करती हैं और हम यह सोचने पर विवश हो जाते हैं कि जब अन्य व्यक्ति उस मुक़ाम पर पहुंच चुका है; तो मैं क्यों नहीं… जबकि उस परमात्मा ने तो सबको समान बनाया है। यह भाव हमें प्रेरित करता है और उसके बल पर हमारा मन में अदम्य साहस हिलोरें लेने लगता है। हम अपने अंतर्मन में अलौकिक ऊर्जा अनुभव करते हैं… उस स्थिति में हम वह सब कुछ कर गुज़रते हैं;  जिसकी हमने कभी कल्पना भी नहीं की थी। परंतु यह तभी सम्भव है, जब हममें आत्मविश्वास होगा और हम अपनी आंतरिक शक्तियों को पहचान कर अंतिम सांस तक संघर्षरत रहेंगे। इतना ही नहीं, हम स्वयं को परिश्रम रूपी अग्नि में झोंक देंगे, तो यही पराकाष्ठा हमें मंज़िल तक पहुंचाने का माध्यम बनेगी।

मानव इन तीन माध्यमों के द्वारा अपनी मंज़िल को प्राप्त कर सकता है…प्रतिभा, व्युत्पत्ति व अभ्यास। प्रतिभा जन्मजात होती है; व्युत्पत्ति के अंतर्गत वेद-शास्त्रों के अध्ययन से ज्ञान प्राप्त कर मानव उस दिशा की ओर अग्रसर होता है। तीसरी शक्ति है अभ्यास अर्थात् ‘करत-करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान।’ सो! अभ्यास हमें उस कग़ार तक पहुंचाने की सामर्थ्य रखता है, जो अकल्पनीय होती है। अभ्यास हमें लक्ष्य प्राप्ति होने तक धैर्यपूर्वक परिश्रम करने की प्रेरणा देता है।

सो! ख़्वाहिशों को पूर्ण करने में यह तीनों शक्तियां कारग़र सिद्ध होती हैं। यह इस तथ्य की पुष्टि करती हैं कि ‘तुम कर सकते हो।’ परंतु जब मानव इसे चुनौती के रूप में स्वीकार कर लेता है, तो राह में आने वाली बाधाएं अपनी दिशा बदल लेती हैं। अल्बर्ट आइंस्टीन का उदाहरण सबके समक्ष है। वे गणित विषय में कमज़ोर थे और बच्चों का उसके कोट के पीछे बुद्धू की पर्ची लगाना; टीचर का सात जन्मों तक गणित विषय में पारंगत न होने के बारे में व्यंग्य करना उसके हृदय को बेध जाता है और उसका सोते-जागते, खाते-पीते, उठते-बैठते गणित सीखने का उपक्रम करना– उन्हें एक दिन प्रसिद्ध गणितज्ञ व वैज्ञानिक बना देता है।

क्रैग का रूबेन को दर्पण के सामने जाकर अपने लक्ष्य को दोहराने और स्वयं को ल्यूज़ खेल में झोंक देने की प्रेरणा देना–उसमें अदम्य साहस संचरित करता है; जो कल्पनातीत है। वह कहता है कि ‘मुझे परवाह नहीं, मैं जीत कर रहूंगा। भले ही मेरे दोनों पैर टूट जाएं; हड्डियां चरमरा जाएं; चोट लग जाए… परंतु मैं ‘ओलंपिक मैन बन कर ही रहूंगा’ ने उन्हें विश्व-प्रसिद्धि प्रदान की। सो! समस्याएं व चुनौतियां सबके जीवन में आती हैं और जो इनका सामना सीना तान करते हैं; विपरीत प्रकृति भी अपनी राह बदल लेती है। स्वामी दयानंद सरस्स्वती की यह उक्ति ‘जिसमें धैर्य है और जो मेहनत से नहीं घबराता; कामयाबी उसकी दासी बन जाती है’ उक्त भाव को पुष्ट करती है अर्थात् दृढ़-संकल्प, धैर्यपूर्वक किया गया परिश्रम व लक्ष्य के प्रति एकाग्रता हमें मंज़िल तक पहुंचाने का मादा रखती है, जिसका प्रत्यक्ष प्रमाण हमारे सम्मुख हैं। अर्जुन का मछली की आंख पर निशाना साधना उसे सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर की संज्ञा प्रदान करता है।

ख़्वाहिशें मानव को ऊर्जस्वित करती हैं; अदम्य साहस से आप्लावित करती हैं, परंतु सकारात्मक सोच के साहसी व आत्मविश्वासी व्यक्ति का ‘मैं-

‘मैं’ उसे मरने नहीं देता। यह मानव का जुनून है, जो उसे लक्ष्य प्राप्त करने से पहले बीच राह थककर नहीं बैठने देता। दोनों स्थितियां मानव के लिए हितकारी हैं, श्रेयस्कर हैं। यदि हम सपने नहीं देखेंगे, तो उन्हें साकार करने की ख़्वाहिश कहां से उत्पन्न होगी? सो! सपने हमारे पथ- प्रदर्शक हैं, जो हमें उस मुक़ाम पर पहुंचाने की राह दर्शाते हैं; हममें ऊर्जा संचरित करते हैं… परंतु इसके लिए प्रभु-कृपा व अनुकंपा अपेक्षित है। जैसा कि सर्वविदित है ‘ईश्वर उनकी सहायता करता है; जो अपनी सहायता ख़ुद करते हैं’  तथा ‘परिश्रम ही सफलता की कुंजी है।’ सो! संघर्ष हमें उस मुक़ाम तक पहुंचाने का सामर्थ्य रखता है, जो कल्पनातीत है। सो! परमात्म-सत्ता में विश्वास रखते हुए लक्ष्य के प्रति समर्पित भाव से निरंतर परिश्रम व संघर्ष ही हमें अपनी मंज़िल तक पहुंचाने की सामर्थ्य रखता है। इसके लिए सपनों व ख़्वाहिशों को ज़िंदा रखने की आवश्यकता है, जिससे सफलता-प्राप्ति के सभी द्वार स्वत: खुल जाते हैं और उन राहों पर चलकर मानव विश्व में मील के पत्थर स्थापित कर सकता है।

●●●●

© डा. मुक्ता

माननीय राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत, पूर्व निदेशक, हरियाणा साहित्य अकादमी

संपर्क – #239,सेक्टर-45, गुरुग्राम-122003 ईमेल: drmukta51@gmail.com, मो• न•…8588801878

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ जन्मदिवस विशेष – “मेरी नजर में हरिशंकर परसाई” ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

?  आलेख – मेरी नजर में हरिशंकर परसाई ? श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

(परसाई जी के 101वे जन्मदिन पर विशेष)

मेरी नजर में भारतीय व्यंग्य का वह नाम , जो किसी परिभाषा या आकलन में बंधता ही नहीं, हरिशंकर परसाई है। उन्हें पढ़ो तो वे व्यंग्यकार कम और समाज के इतिहासकार ज्यादा लगते हैं। इतिहास तो तारीखों और घटनाओं का ब्यौरा भर देता है, पर परसाई उन तारीखों और घटनाओं के बीच छिपे मनुष्य के मनोभाव, उसकी दोहरी सोच और उसके छलावे को पकड़ते हैं। वे ऐसी टार्च वाले हैं, जो समाज के अंधेरे कोनों में प्रकाश डाल कर वहां की गंध, वहां की सड़ांध, वहां की विडंबना को पाठक के सामने सजीव कर देती है।

उन को पढ़ते हुए लगता है जैसे हमारे ही घर के आंगन में कोई आईना रख दिया गया है। हम अक्सर समाज की आलोचना बड़े आराम से करते हैं लेकिन जब वही समाज हमारे भीतर की कमज़ोरियों को उजागर कर देता है, तब हम बरबस चौंकते हैं। परसाई की यही ताकत है। वे हंसाते हैं, और उसी हंसी में हमें हमारा कुरूप प्रतिबिंब दिखा देते हैं।

वो व्यक्तिगत कटाक्ष नहीं करता, बल्कि पूरी व्यवस्था की पोल खोलता है। नेता, अफसर, बाबू, पंडित, साधु सब उनकी दृष्टि में समान रूप से कटघरे में खड़े होते हैं।  ऐसा बिलकुल नहीं कि वे स्वयं बहुत आदर्श के पुतले ही थे लेकिन वे सिर्फ दूसरों पर नहीं, अपने ही वर्ग और अपने ही जीवन पर भी तंज कसने से पीछे नहीं हटे। यही उनकी ईमानदारी है, यही उनकी प्रामाणिकता है।

हरिशंकर परसाई हिंदी के पहले लेखक थे, जिन्होंने नए स्वरूप में व्यंग्य को साहित्य की मुख्यधारा में स्थापित किया। उन्होंने व्यंग्य को अखबारी स्तंभ से उठाकर साहित्यिक गरिमा दी। उन्होंने साबित किया कि व्यंग्य केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि चिंतन है। उनकी लेखनी किसी तलवार से कम नहीं थी, पर यह तलवार लहू नहीं बहाती थी, बल्कि पाठक की आंखें खोल देती थी।

मेरी नजर में परसाई सिर्फ व्यंग्यकार नहीं, बल्कि एक सामाजिक पर्यवेक्षक तथा दार्शनिक थे। उन्होंने यह दिखाया कि हास्य और व्यंग्य सिर्फ हंसाने की कला नहीं है, बल्कि समाज को बदलने का सबसे सशक्त उपकरण है। परसाई को पढ़ते हुए लगता है कि जैसे वे हमारे सामने बैठे हों और हमारी ही भाषा में हमारी कमियों को हमें सुना रहे हों।

हर दौर में परसाई प्रासंगिक हैं, क्योंकि उनकी व्यंग्य दृष्टि किसी समय विशेष तक सीमित नहीं है। वे आदमी की उस आदत पर चोट करते हैं, जो हर युग में वही रहती है, पाखंड, लालच, ढोंग, सत्ता का दुरुपयोग शाश्वत प्रवृत्ति है। यही कारण है कि आज भी जब हम उन्हें पढ़ते हैं तो लगता है कि वे हमारे आज पर लिख रहे हैं, जबकि वे दशकों पहले चले गए।

मेरे लिए परसाई की लेखनी वह चेतावनी है कि यदि समाज अपनी कमजोरियों को पहचान कर सुधार नहीं करेगा तो उसका पतन निश्चित है। वे हंसते-हंसते हमें रुला जाते हैं और यही उनका सबसे बड़ा साहित्यिक अवदान है।

© श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

म प्र साहित्य अकादमी से सम्मानित वरिष्ठ व्यंग्यकार

संपर्क – ए 233, ओल्ड मिनाल रेजीडेंसी भोपाल 462023

मोब 7000375798, ईमेल apniabhivyakti@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – संस्मरण ☆ दस्तावेज़ # ३६ – 🇮🇳 स्वतंत्रता दिवस : अतीत से वर्तमान तक 🇮🇳 India’s Journey of Independence and Nation Building – ☆ श्री जगत सिंह बिष्ट ☆

श्री जगत सिंह बिष्ट

(Master Teacher: Happiness & Well-Being, Laughter Yoga Master Trainer, Author, Blogger, Educator, and Speaker.)

(ई-अभिव्यक्ति के “दस्तावेज़” श्रृंखला के माध्यम से पुरानी अमूल्य और ऐतिहासिक यादें सहेजने का प्रयास है। श्री जगत सिंह बिष्ट जी (Master Teacher: Happiness & Well-Being, Laughter Yoga Master Trainer, Author, Blogger, Educator, and Speaker) के शब्दों में  “वर्तमान तो किसी न किसी रूप में इंटरनेट पर दर्ज हो रहा है। लेकिन कुछ पहले की बातें, माता पिता, दादा दादी, नाना नानी, उनके जीवनकाल से जुड़ी बातें धीमे धीमे लुप्त और विस्मृत होती जा रही हैं। इनका दस्तावेज़ समय रहते तैयार करने का दायित्व हमारा है। हमारी पीढ़ी यह कर सकती है। फिर किसी को कुछ पता नहीं होगा। सब कुछ भूल जाएंगे।”

दस्तावेज़ में ऐसी ऐतिहासिक दास्तानों को स्थान देने में आप सभी का सहयोग अपेक्षित है। इस शृंखला की अगली कड़ी में प्रस्तुत है श्री जगत सिंह बिष्ट जी का एक ऐतिहासिक दस्तावेज़ “🇮🇳स्वतंत्रता दिवस : अतीत से वर्तमान तक🇮🇳”।) 

☆  दस्तावेज़ # ३६ – 🇮🇳स्वतंत्रता दिवस : अतीत से वर्तमान तक🇮🇳 ☆ श्री जगत सिंह बिष्ट ☆ 

🔸हमारी विरासत और गौरव🔸

भारत कोई साधारण भूमि नहीं है। यह सभ्यता के प्रारम्भ से ही ज्ञान, संस्कृति और आध्यात्मिकता की जन्मभूमि रहा है। इसकी नदियाँ, पर्वत और खेत केवल भौगोलिक विस्तार नहीं, बल्कि हमारी पहचान और हमारी चेतना का हिस्सा हैं। भारत ने कभी किसी पर आक्रमण नहीं किया, बल्कि हमेशा शांति और सौहार्द का मार्ग अपनाया। किंतु इसकी समृद्धि और धरोहर ने समय-समय पर बाहरी आक्रांताओं को आकर्षित किया। फारस, यूनान, तुर्क और मंगोल—सब यहाँ आए और अपनी छाप छोड़ गए।

🔸परतंत्रता के अंधकारमय वर्ष🔸

हाल के चार सौ वर्षों में, मुग़लों और अंग्रेज़ों की दासता ने हमारी आत्मा को गहरी चोट पहुँचाई। अत्याचार, अपमान और संसाधनों की लूट—यही उस कालखंड की पहचान थी। विशेषकर अंग्रेज़ों ने भारत की संपदा को बेशर्मी से लूटा। इतिहासकार बताते हैं कि लगभग 45 ट्रिलियन डॉलर से अधिक मूल्य का धन हमारे देश से निकालकर ले जाया गया। जब 15 अगस्त 1947 को हमने स्वतंत्रता प्राप्त की, तो भारत निर्धन और टूटे हुए हालात में खड़ा था।

🔸हमारे अमर बलिदानी🔸

स्वतंत्रता कोई उपहार नहीं थी, यह हमारे पूर्वजों के बलिदान से अर्जित हुई। छत्रपति शिवाजी महाराज, महाराणा प्रताप, गुरु गोविंद सिंह, मंगल पांडे, रानी लक्ष्मीबाई, रानी दुर्गावती, गोपालकृष्ण गोखले, लोकमान्य तिलक, महात्मा गांधी, नेताजी सुभाषचंद्र बोस, भगत सिंह, चंद्रशेखर आज़ाद—ऐसे असंख्य नाम हैं जिनकी गाथाएँ हमें गर्व से भर देती हैं। आज का दिन उनके चरणों में श्रद्धांजलि अर्पित करने का है।

🔸आध्यात्मिक जागरण🔸

स्वतंत्रता की चेतना केवल क्रांतिकारियों से ही नहीं, बल्कि हमारे संतों और मनीषियों से भी मिली। स्वामी विवेकानंद, श्रीअरविंद, सुब्रमण्य भारती, आर्य समाज और ब्रह्म समाज जैसे आंदोलनों ने हमें आत्मविश्वास और आत्मगौरव लौटाया। उन्होंने हमें यह याद दिलाया कि हमारी संस्कृति और विरासत अपार है।

🔸स्वतंत्र भारत की उपलब्धियाँ🔸

आज़ादी के बाद, हमने शून्य से निर्माण का कार्य प्रारम्भ किया। हरित क्रांति और श्वेत क्रांति ने हमें अन्न और दूध में आत्मनिर्भर बनाया। विज्ञान, अंतरिक्ष और सूचना प्रौद्योगिकी में भारत ने अद्वितीय प्रगति की। आज हम रक्षा उत्पादन में आत्मनिर्भर हैं और विश्व की पाँचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था के रूप में उभर चुके हैं। चंद्रयान, मंगलयान, कोविड के दौरान मुफ्त राशन और वैक्सीन—ये सब हमारे सामर्थ्य और संवेदनशीलता के उदाहरण हैं।

🔸नई चुनौतियाँ🔸

किन्तु स्वतंत्रता के साथ ही नई चुनौतियाँ भी हैं। हमारे पड़ोसी देश समय-समय पर शत्रुतापूर्ण रवैया अपनाते हैं। इसके साथ ही कुछ विकसित देशों की “डीप स्टेट” ताक़तें अपने एजेंटों के माध्यम से हमारे भीतर भ्रम और अस्थिरता फैलाने का षड्यंत्र करती रहती हैं। इनसे हमें सावधान रहना होगा।

🔸नागरिक का कर्तव्य🔸

सच्ची स्वतंत्रता तभी सुरक्षित रह सकती है, जब हर नागरिक अपनी ज़िम्मेदारी समझे। केवल सरकार से अपेक्षा करना उचित नहीं, बल्कि हमें स्वयं आगे आना होगा। लोकतांत्रिक संस्थाओं पर विश्वास बनाए रखना, अनुशासन का पालन करना, छोटी-छोटी सुविधाओं का त्याग कर बड़ी तस्वीर में योगदान देना—यही राष्ट्रभक्ति है। हमें झूठे प्रचार, भड़कावे और विध्वंसकारी आंदोलनों से बचना होगा। स्वतंत्रता और सम्मान की रक्षा हमें वैसे ही करनी है जैसे हम अपनी एकमात्र संतान की रक्षा करते हैं।

🔸निष्कर्ष : एक आह्वान🔸

आज जब हम स्वतंत्रता दिवस मना रहे हैं, तो यह केवल झंडा फहराने या राष्ट्रीय गान गाने का अवसर नहीं है। यह अपने भीतर यह संकल्प जगाने का दिन है कि हम सब मिलकर—बच्चे, युवा, महिलाएँ और वरिष्ठजन—अपने राष्ट्र को और ऊँचाई तक ले जाएंगे। यही सच्चा राष्ट्रधर्म है।

आप सभी को 79वें स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ! 🇮🇳

(सुनिकेत अपार्टमेंट्स, इंदौर, 15 अगस्त, 2025)

♥♥♥♥

🇮🇳 India’s Journey of Independence and Nation Building 🇮🇳

🌿An Ancient Land of Rich Heritage🌿

India is one of the world’s most ancient civilisations, blessed with a rich heritage, diverse traditions, and immense natural wealth. For millennia, our culture has been guided by the principles of peace and harmony. India has never invaded any other nation; instead, it has always shared knowledge, spirituality, and values with the world.

🌿Foreign Invasions and Long Periods of Rule🌿

Despite being peace-loving, India was subjected to repeated invasions from faraway lands—Persia, Greece, Turkey, and Mongolia. The more recent Mughal and British periods of rule together spanned nearly four centuries. These rulers brutally assaulted the people of this land, humiliating them, suppressing their freedoms, and plundering their resources. The British alone are estimated to have drained wealth worth more than 45 trillion dollars from India.

🌺A Hard-Won Freedom🌺

On 15th August 1947, after centuries of struggle, India finally achieved independence from British rule. Yet, at that time, we were in a pitiable and helpless state—our economy broken, our people impoverished, and our dignity trampled. This freedom came at the cost of immense sacrifice.

🌺Remembering Our Freedom Fighters🌺

On this Independence Day, we pay homage to our great heroes who fought bravely for our motherland. From Chhatrapati Shivaji Maharaj, Maharana Pratap, and Guru Gobind Singh to Mangal Pandey, Rani Lakshmi Bai, Rani Durgavati, Gopal Krishna Gokhale, Lokmanya Tilak, Mahatma Gandhi, Netaji Subhash Chandra Bose, Bhagat Singh, and Chandra Shekhar Azad—each one played a vital role in our struggle for freedom. Their courage and sacrifice continue to inspire generations.

🍀Contributions of Our Spiritual Leaders🍀

Equally, we must not forget the role of our saints and reformers. Swami Vivekananda, Sri Aurobindo, Subramania Bharati, and movements such as the Arya Samaj and Brahmo Samaj reignited our self-confidence and pride. They reminded us that we belong to a civilisation with unmatched culture, wisdom, and heritage.

🍀🌺The Journey of Nation Building🌺🍀

Independence was not the end of struggle, but the beginning of a new one—nation building. Through discipline, hard work, and unity, India marched ahead. The Green Revolution made us self-reliant in food. The White Revolution made India the largest producer of milk. Scientific advancements, excellence in space technology, IT leadership, and progress in defence production lifted India into the ranks of the world’s top economies. Today, India stands as one of the fastest-growing nations with a strong GDP and military power.

🍁The Challenges of Today🍁

Yet, the challenges have not ended. We continue to face hostile neighbours, and sometimes the “Deep State” of advanced and envious countries works through hidden agents to weaken us from within. Equally dangerous are the internal elements who, often provoked by such forces, attempt to spread fake narratives, disruptions, and divisions.

✅Duties of Responsible Citizens✅

It is, therefore, the duty of every Indian to remain vigilant, aware, and responsible. We should not expect only the government to shoulder every burden. Each of us must contribute to the nation’s progress, be willing to sacrifice small comforts for the larger cause, and work sincerely for our country’s development. We must safeguard our democracy, respect democratic institutions and leaders, and stand firm against forces that seek to weaken our unity.

🌻Preserving Our Independence and Pride🌻

Our independence is as precious as a beloved child—we must nurture and protect it with care and devotion. With unity, sincerity, and hard work, we can take our nation to even greater heights.

🇮🇳Greetings on Independence Day🇮🇳

As we celebrate the 79th Independence Day, let us rededicate ourselves to the ideals of freedom, pride, and progress. Together, let us build a stronger, self-reliant, and vibrant India.

Jai Hind!🇮🇳🇮🇳

♥♥♥♥

© जगत सिंह बिष्ट

Laughter Yoga Master Trainer

LifeSkills

A Pathway to Authentic Happiness, Well-Being & A Fulfilling Life! We teach skills to lead a healthy, happy and meaningful life.

The Science of Happiness (Positive Psychology), Meditation, Yoga, Spirituality and Laughter Yoga. We conduct talks, seminars, workshops, retreats and training.

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – धुंध ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – धुंध ? ?

परिचितों की फेहरिस्त जहाँ तक आँख जाती है, अपनों की तलाश में पर नज़र धुंधला जाती है।

?

© संजय भारद्वाज  

प्रातः 11:21बजे,  12 नवंबर 2019

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️  गोविन्द साधना संपन्न हुई. अगली साधना की सूचना आपको शीघ्र ही दी जावेगी। 🕉️💥  

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ७६२ ⇒ एक और अश्वत्थामा ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “एक और अश्वत्थामा।)

?अभी अभी # ७६२  ⇒ आलेख – एक और अश्वत्थामा ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

आज मुझे दर्द है,फिर भी लिख रहा हूं। दर्द नहीं होता,तब भी लिखना तो था ही। कहीं पढ़ा है,दर्द का अहसास हो,तो लेखन अच्छा होता है। अब सुबह सुबह दर्द ढूंढने कहां जाऊँ,जब घर बैठे कमर में दर्द उठा,सोचा क्यों न गंगा नहाऊं।

दर्द जिस्मानी भी होता है,और रूमानी भी ! यूं तो दर्द रूहानी भी होता है,लेकिन उसका कॉपीराइट मीरा और सूर जैसे भक्तों के पास होता है। जिस्मानी दर्द लिखने से नहीं,उपचार से ठीक होता है। उसके लिए दर्द को छुपाना नहीं पड़ता,किसी हमदर्द को बताना पड़ता है। बात दवा दारू तक पहुंच जाती है। ।

मैंने मांडू देखा,कई बार देखा ! लेकिन वह मांडू नहीं देखा,जिसका जिक्र स्वदेश दीपक ने “मैंने मांडू नहीं देखा” में किया है। साफ साफ शब्दों में कहूं तो मैंने अभी खंडित जीवन का कोलाज नहीं देखा। क्या जीवन में सुख ही सुख है,दुख नहीं, अथवा दुख ही दुख है,सुख नहीं ! सृजन स्वांतः सुखाय किया जाता है तो क्या यही सृजन सुख कभी कभी स्वांतः दुखाय भी हो सकता है।

एक लेखक खयाली घोड़े दौड़ाता है,लेकिन वे घोड़े खयाली नहीं होते,कभी कभी असली भी होते हैं। यथार्थ और कल्पनाशीलता का मिश्रण गल्प कहलाता है,फिर आप चाहे आप इसे कथा कहें या कहानी। लेखक यथार्थ से पात्र उठाता है,उसे अपना नाम और रूप देकर भूल जाता है। जब ये ही पात्र सजीव बनकर कथा कहानियों में उतर जाते हैं,तो एक कहानी अथवा उपन्यास बन जाता है।।

बस यहीं से ये काल्पनिक पात्र,जिन्हें लेखक ने मूर्त रूप दिया है,उसके पीछे पड़ जाते हैं। परमात्मा को जिस तरह यह जीव घेरे रहता है,उसके पात्र रात दिन उसके पीछे पड़े रहते हैं। क्या तुमने मेरे साथ न्याय किया। क्या तुम मुझे एक कठपुतली की तरह नहीं नचाते रहे। जब कोई लेखक, लेखन में डूब जाता है,तब ऐसा ही होता है।

एक कवि की कल्पना को ही ले लीजिए,जहां न पहुंचे रवि ! यानी जहां तक रवि का प्रकाश न पहुंचे,कवि पहुंच जाता है। तो फिर वहां तो अंधकार ही हुआ न ! तो कहीं सूर,सूर्य बन जाते हैं,और तुलसी शशि, केशव अगर तारे हैं तो शेष जुगनू। कहने को आचार्य रामचंद्र शुक्ल कह गए, लेकिन फिर भी एक लेखक तमस, संत्रास, कुंठा और अवसाद के अंध कूप में जब जा बैठता है, तब उस स्वदेश का दीपक भी बुझ जाता है। ।

बिना डूबे भी कोई लेखक बना है,कवि बना है। कलम तो स्याही में डूबकर अपनी प्यास बुझा लेती है,कवि को अपनी कविता के लिए किसी प्रेरणा की जरूरत होती है तो लेखक को डूबने के लिए शराब का सहारा लेना पड़ता है। बहुत दुखी करते हैं,उसके ही बनाए हुए पात्र उसे। वह क्या करे। होते हैं कुछ नील कंठी,जो अपने पात्रों का गरल ,

कंठ में ही धारण कर लेते हैं,लेकिन शेष को तो उसमें डूबना ही पड़ता है।

दुख का अहसास इतना ही काफी है मेरे लिए। मैं अपने पात्रों का दुख दर्द सहन नहीं कर सकता। मैं स्वदेश दीपक नहीं बन सकता। मैंने मांडू नहीं देखा। मैने मांडू नहीं देखा। मैं एक और अश्वत्थामा नहीं बनना चाहता जो सृजन के संसार में तो अमर है, लेकिन उसका शरीर कहीं तो आत्मा कहीं। हे सुदर्शन चक्रधारी,उसे तार दे। उसका दर्द मेरा है। हर लेखक का है, जो लेखन का दर्द जानता है। ।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # २५५ ☆ वैचारिक सुदृढ़ता… ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ ☆

श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की  प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं  में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना वैचारिक सुदृढ़ता। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  – आलेख  # २५५ ☆ वैचारिक सुदृढ़ता

जीवन में बाधाएँ आपको मजबूत बनाने हेतु आती हैं । जो होता है; अच्छे के लिए होता है , यही स जीवन का मूल मंत्र है ।

किसी ने कह दिया आप से कुछ नहीं बनता और आपने मान लिया ये कहाँ तक उचित है ? किसी को इतना हक देना कि वो आपके कार्यों का मूल्यांकन करे बिल्कुल उचित नहीं, ईश्वर ने हर व्यक्ति को विशिष्ट बनाया है , एक के जैसा दूसरा हो ही नहीं सकता, जब हमारे हाथ की उँगलियाँ , एक ही माता- पिता की सन्ताने , एक गुरु के शिष्य, एक वृक्ष के फल , एक डाल के फूल ,ये सब परस्पर भिन्न हैं तो हम आपस में ये उम्मीद क्यों करते हैं, कि सब कुछ हमारे अनुरूप हो ।

कभी आपने गौर किया कि किस तरह छोटे- छोटे कीड़े, मकड़ी न सिर्फ़ फूल वरन पत्तियों को भी खाते हैं , जिसका उपचार तो कीट नाशकों द्वारा कर दिया जायेगा पर हमारे जीवन में जो घुन रूपी कीड़ें हैं उनका इलाज़ कैसे हो इसका चिन्तन अवश्य करना चाहिए ।

केवल उदास होने से कोई हल नहीं मिलता, दृढ़ इच्छा शक्ति व मजबूत हृदय से ही आप जीवन में आने वाले बाधा रूपी कीटों का उन्मूलन कर सकते हैं । जीवन में खर पतवारों को गाजर घास की तरह न पनपने दें, सही समय पर जागें अन्यथा मानसिक अवसाद से कोई नहीं बचा पायेगा ।

एक बार पुनः सोचें कि धरती के अलग- अलग हिस्सों में मौसम एक सा नहीं रहता, खान- पान, संस्कृतियाँ सब कुछ भिन्न , ऐसी स्थिति में समझदारी से निर्णय लेना चाहिए, केवल अंतरात्मा की आवाज के आधार पर निर्णय कर सही गलत का भेद करें क्योंकि परम आत्मा ही अन्तरात्मा है ।

©  श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

माँ नर्मदे नगर, म.न. -12, फेज- 1, बिलहरी, जबलपुर ( म. प्र.) 482020

मो. 7024285788, chhayasaxena2508@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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