हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # 731 ⇒ अंतर्ज्ञान ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “अंतर्ज्ञान।)

?अभी अभी # 731 ⇒ आलेख – अंतर्ज्ञान ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

= INTUITION =

जानने की प्रक्रिया को ज्ञान कहते हैं। इसके लिए ईश्वर ने हमें एक नहीं पांच पांच ज्ञानेंद्रियां प्रदान की हैं। पांच ही कर्मेंद्रियों से मिल जुलकर इस मनुष्य का यह विलक्षण व्यक्तित्व बना है। चेतन शक्ति, आप जिसे चाहें तो प्राण भी कह सकते हैं, हमारे पंच तत्वों से निर्मित शरीर में सतत प्रवाहित होती रहती है। हमारा उठना, बैठना, सोना, जागना, ऊंघना, हंसना, रोना, देखना, सुनना, बोलना, चखना, छूना जैसी सभी नियमित क्रियाएं मन मस्तिष्क द्वारा संचालित होती है। हमें लगता है, हम ही सब कुछ कर रहे हैं। जब कि सब कुछ अपने आप ही ही रहा है।

अगर आप ही कर्ता हैं, सब कुछ कर रहे हैं, तो रोक दीजिए सब कुछ। आँखें खुली रखिए और कुछ मत देखिए, मत सुनिए कुछ भी इन दोनों कानों से, सांस तो आप ही ले रहे हैं न। मत लिजिए एक दो दिन सांस, क्या बिगड़ जाएगा।

भूख प्यास का क्या है, रह लेंगे कुछ दिन भूखे प्यासे।

आते जाते विचारों पर भी पहरा बिठा दीजिए। अगर विचार अतिक्रमण करते हैं, तो उन पर बुलडोजर चला दीजिए।।

मन, बुद्धि और अहंकार भी आपका नहीं है। इसलिए अब मान भी जाइए, आपका अपना कुछ भी नहीं है। आपको इस पावन धरा पर उतारा गया है और आप अपने आप में एक सर्वगुण संपन्न, एक मानव हैं। A perfect human being creation of God, The Almighty!

मनुष्य जब पैदा होता है तो एक अबोध बालक होता है। शारीरिक विकास के साथ साथ ही उसका मानसिक विकास भी होता चला जाता है। सीखने की प्रवृत्ति उसकी जन्मजात ही होती है। परिवार और परिवेश के अलावा स्कूल वह स्थान होता है, जहां से वह सीखता है, ज्ञान अर्जित करता है। अनुशासित ज्ञान को अध्ययन कहते हैं। ज्ञान के स्तर को डिग्री में विभाजित किया गया है। आप पढ़ते रहें, डिग्रियां हासिल करते रहें।

अध्ययन के लिए हमें ट्यूशन भी लेनी पड़ती है जो आज की भाषा में कोचिंग कहलाती है। सीखना एक सतत प्रक्रिया है जो अनुशासित डिग्रियां हासिल करने के पश्चात भी कभी खत्म नहीं होती। बाहरी ज्ञान की कोई सीमा नहीं। नौकरी धंधे और कामकाज में लग जाने के बाद कौन इंसान बाल भारती भाग १ और फिजिक्स केमिस्ट्री, मैथ्स और बायोलॉजी पढ़ता है। अब काहे की पढ़ाई, काहे की ट्यूशन और काहे की परीक्षा। अब तो गाड़ी चल निकली।।

ट्यूशन अगर बाहरी ज्ञान है, तो इन्ट्यूशन अंतर्ज्ञान ! एक ज्ञान का भंडार हमारे अंदर भी है जिसका बाहरी ज्ञान से कोई संबंध नहीं होता। हम सोचते, समझते ही नहीं, चिंतन मनन भी करते हैं। हमारी कुछ आंतरिक प्रतिभाएं समय और परिस्थिति के साथ उभरकर बाहर आती हैं।

साहित्य, संगीत और अन्य ललित कलाओं को बस एक बार अवसर मिला और टूटे बांध की तरह वह प्रवाहित होने लगती है।

धुन, ध्यान और अंतर्ज्ञान को आप अलग नहीं कर सकते। बाहरी प्रकृति और हमारे अंदर की सृजन की प्रवृत्ति का जब मेल होता है तो एक महाकाव्य की रचना होती है। संगीत की कोई धुन किसी किताब अथवा साज से नहीं निकाली जाती, वह धुन अंदर से प्रकट होती है बाहर तो सिर्फ उसका स्वरूप ही दिखाई देता है।

टैगोर की गीतांजलि किसी शब्दकोश अथवा थिसारस या इनसाइक्लोपीडिया की उपज नहीं, यह कवि का अंतर्ज्ञान है जो सरिता की तरह सतत प्रवाहित होता रहता है।।

विश्व के अधिकांश वैज्ञानिक प्रयोग, खोज हों या अविष्कार, धुन, ध्यान और अंतर्ज्ञान का ही परिणाम हैं। कितनी विचित्र विधा है यह अंतर्ज्ञान ! ज्ञान पहले अंदर गया और बाद में कोई सिद्धांत बनकर बाहर निकला। एक चेतन मन तो है ही, एक अवचेतन मन

भी है, जिसकी स्मृति के बारे में कुछ भी नहीं कहा जा सकता। चेतना के ऊपर पराचेतना का भी अस्तित्व है। अंतर्दृष्टि और अंतर्ज्ञान असीमित है।

एक गीत है, एक आवाज है, एक धुन है। हमें सिर्फ सुनाई देती है लेकिन उसका प्रभाव देखिए, आंख खोलकर नहीं, आंख बंद कर कर, कान खोलकर ;

मेरी आंखों में बस गया कोई रे,

मैं क्या करूं …

क्या यह अतिक्रमण नहीं। रोक सकें तो रोकिए इसे। चलाइए बुलडोजर। यह धुन है, ध्यान है, अंतर्ज्ञान है। नमन उन अनंत विलक्षण

प्रतिभाओं को जिनका प्रकाश सूर्य की तरह सदा, सर्वत्र दैदीप्यमान है।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # 251 ☆ सफलता का मूलमंत्र… ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ ☆

श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की  प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं  में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना विस्तार है गगन में। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  – आलेख  # 251 ☆ सफलता का मूलमंत्र…

गुरु चरणों में धारिए, सहज सरल मनप्रीत।

आशिषमय सब काज हो, छोड़ हार अरु जीत।।

*

बिन गुरु पूरण हो नहीं, सकल काज ये जान।

गुरुवर से यह सृष्टि है,  उनसे सकल जहान।।

*

गुरु चरणों में बस रहा, जीवन का  विज्ञान।

गुणा भाग सब छोड़ दे, नेहिल सरस सुजान।।

आत्म मंथन- चिंतन छोड़कर पूर्ण मनोयोग से गुरु आज्ञा को जो शिरोधार्य करता है वो जल्दी ही सफलता  वरण करता जाता है।

खुशी चाहिए- आर्थिक स्वतंत्रता से मिलेगी या सपनों के पूरा होने से ये तो आपके दृष्टिकोण पर निर्भर करता है। उद्देश्य जो भी हो कार्य करते रहना चाहिए। वास्तव में मुझे क्या चाहिए इस पर गुरुवर का मार्गदर्शन मिले तो राह आसान होने लगती है। आलस, टालामटोली व श्रेष्ठ करने की जिद कार्य को अधूरा रखता है। हर मनुष्य में ये ताकत होती है कि वो अपने दिमाग़ पर राज कर सकता है बस सही दिशा की ओर बढ़ने की देर है। चरैवेति – चरैवेति के संकल्प के साथ मंजिल को चल पड़ें उम्मीद से अधिक सहजता से मिलने लगेगा।

©  श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

माँ नर्मदे नगर, म.न. -12, फेज- 1, बिलहरी, जबलपुर ( म. प्र.) 482020

मो. 7024285788, chhayasaxena2508@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – आदर्श ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – आदर्श ? ?

संघर्ष निरंतर जारी है। हर वर्ग का हुजूम मिलकर उस एक शब्द को शब्दकोश से बहिष्कृत करने में जुटा है। मुट्ठी भर हाथ हैं जो प्रतिकूल स्थितियों में भी अपना सर्वस्व दांव पर लगाकर हुजूम से लोहा ले रहे हैं। इन मुट्ठी भर लोगों की अडिगता से ही शब्दकोश में ‘आदर्श’ अब भी साँसे भर रहा है।

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© संजय भारद्वाज  

 अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ श्रावण साधना रविवार ११ जुलाई 2025 से रक्षाबंधन तदनुसार शनिवार 9 अगस्त तक चलेगी। 🕉️

💥 इस साधना में ॐ नमः शिवाय का मालाजप होगासाथ ही गोस्वामी तुलसीदास रचित रुद्राष्टकम् का पाठ भी करेंगे। 💥 

💥 101 से अधिक मालाजप करने वाले महासाधक कहलाएंगे 💥

💥 संभव हो तो परिवार के अन्य सदस्यों को भी इससे जोड़ें💥  

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # 730 ⇒ फेंकने और झेलने की कला ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “फेंकने और झेलने की कला।)

?अभी अभी # 730 ⇒ आलेख – फेंकने और झेलने की कला ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

 ©CATCH & THROW©

हम छोटे थे तब से ही कैचम कैच की प्रैक्टिस किया करते थे। दो व्यक्ति और एक वस्तु, जो जरूरी नहीं कि गेंद ही हो। फिर चाहे वह बिस्तर का तकिया ही क्यों न हो। फेंकना और झेलना !

शायद ही कोई व्यक्ति ऐसा होगा जिसने जीवन में कोई वस्तु फेंकी ना हो, अथवा झेली ना हो। यह एक ऐसी सहज क्रिया है, जिस पर उतनी ही सहज प्रतिक्रिया भी होती है। श्रीमान जी जल्दी में गाड़ी की चाबी भूल गए और पचास सीडियां नीचे उतर गए। अब वे वहीं से श्रीमती जी को आवाज लगाते है, जरा गाड़ी की चाबी फेंक देना, ऊपर ही रह गई है।

कौन सा भाला फेंकना है, श्रीमती जी साधकर ऊपर से चाबी फेंकती है और श्रीमान जी झट से उसे झेल लेते हैं। बहुत वर्षों से बहुत कुछ झेल रहे हैं।

क्रिकेट हो, सामाजिक जीवन हो, अथवा राजनीति फेंकना और झेलना कहां नहीं चलता। अगर कोई झेलने वाला ना हो और कोई फेंकता ही रहे, तो लोग उसे पागल कहते हैं।

हमने गुस्से में लोगों को बहुत कुछ फेंकते देखा है।।

अंग्रेजी में एक कहावत है, two is a company, three is a crowd! लेकिन क्रिकेट और राजनीति में ऐसा नहीं है। क्रिकेट के मैदान में सिर्फ गेंद ही फेंकी जाती है और झेली जाती है। एक गेंदबाज होता है जो लगातार गेंद फेंकता ही रहता है और एक बेचारा विकेट कीपर होता है, जिसे हर गेंद झेलनी पड़ती है। गेंदबाज और विकेट कीपर के बीच एक बल्लेबाज भी होता है जो बल्ले से धुलाई तो गेंद की करता है, लेकिन वह कहलाती गेंदबाज की धुलाई ही है। अगर गेंदबाज की फेंकी गई गेंद बल्लेबाज और विकेट कीपर दोनों से छूटकर बाउंड्री पार कर जाती है तो बल्लेबाज को चार रन एक्स्ट्रा बाय के मिल जाते हैं। चेतन शर्मा की फेंकी आखरी गेंद पर अगर कोई मियां दाद छक्का जड़ दे, तो जो क्रिकेट नहीं समझता, वह भी अपना सर पकड़ ले। आज अगर ऐसा होता तो हम मियां दाद की कॉलर पकड़ लेते।

झेलने में हमारे धोनी जी का जवाब नहीं। एक विकेट कीपर को केवल गेंद झेलनी ही नहीं पड़ती, हाथों हाथ फुर्ती से गेंदबाज को स्टंप भी करना पड़ता है। गेंदबाज की भी एक लक्ष्मण रेखा है, जिसे क्रीज़ (कमीज़ की नहीं) कहते हैं, खेलते वक्त थोड़ी भी रेखा पार की, और धोनी ने अपना कमाल बताया।।

जो तेज फेंकते हैं उन्हें तेज गेंदबाज कहते हैं, और जो घुमावदार गेंदबाजी करते हैं उन्हें स्पिन गेंदबाज कहते हैं। मुरली की गुगली में बल्लेबाज किस गली में धरा जाए, कुछ कहा नहीं जा सकता। अजीब खेल है क्रिकेट ! मैदान में चारों तरफ क्षेत्ररक्षक खड़े हुए हैं, जिनका काम रन को रोकना ही नहीं, गेंद को वापस फेंकना भी है। बल्लेबाज के शॉट को झेलकर उसे पेवेलियन भी पहुंचाना है।

राजनीति भी एक खेल ही तो है। झूठे सच्चे वादे, आश्वासन, और नेताओं की बड़ी बड़ी बातें, जनता को झेलनी ही पड़ती है। जिस भाषण पर राशन नहीं, उसे तो झेलना ही है। एक फेंकनेवाला गेंदबाज और १४० करोड़ झेलने वाले क्षेत्ररक्षक और फिर भी गेंद सीमा रेखा के पार।।

एक इंसान जीवन में क्या क्या नहीं झेलता। बचपन में घर में बड़े बूढ़े और स्कूल में मास्टर जी की रोज रोज की डांट ! कब तक झेले बेचारा। कभी गुस्से में बस्ता फेंकता है तो कभी जूते। बड़ा होकर भी उसे बहुत कुछ झेलना है।

गृहस्थी का बोझ, महंगाई की मार। उस बेचारे के पास फेंकने के लिए कुछ नहीं। उसे तो बस झेलते ही जाना है।

पहले घरों में रोशनदान होते थे, जिससे घर में रोशनी और हवा की आवाजाही बनी रहती थी, तथा कमरों में घुटन नहीं रहती थी। आजकल हवा फेंकने का काम पंखे, कूलर और ए.सी. करते हैं। रसोईघर और प्रसाधन कक्ष में प्रदूषित हवा बाहर फेंकने के लिए एग्जास्ट फैन लगाए जाते हैं।।

इंसान भी कब तक सब कुछ झेलता ही रहे। उसे अंदर का तनाव और कुंठा बाहर फेंकना ही चाहिए।

हमारी घर की महिलाएं भी क्या क्या नहीं झेलती। इसका विरेचन आवश्यक हो जाता है। हमारी आधी बीमारियों की जड़ सीमा से अधिक सहन करना और चुप रहना है। हमें क्यों तनाव और नेता क्यों मस्त। बस यही कारण, कोई फेंक रहा है, और कोई झेल रहा है। कहीं कोई आपके साथ खेल तो नहीं रहा है ?

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # 139 – देश-परदेश – वही बनेगी तरकारी! जो आदेश होगा सरकारी!! ☆ श्री राकेश कुमार ☆

श्री राकेश कुमार

(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ  की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” ज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)

☆ आलेख # 139 ☆ देश-परदेश – वही बनेगी तरकारी! जो आदेश होगा सरकारी!! ☆ श्री राकेश कुमार ☆

हमारे देश में तो उपरोक्त कहावत हास्य विनोद के लिए प्रयोग की जाती हैं। हम सब लोग तो अपनी मर्जी के मालिक होते है, अधिकतर नियम तो किताबों तक ही सीमित रह जाते हैं। नियम तो तोड़ने के लिए बनाए जाते हैं, ऐसा कहकर हम नियम का पालन नहीं करने वाले को प्रोत्साहित करते हैं।

 

उपरोक्त साइन बोर्ड, अमेरिका के एक सार्वजनिक स्थल पर लगा हुआ था। जिस देश में कुत्ते जैसा प्राणी भी नियमों से बंधा हुआ हो, तो मानव जाति कहना ही क्या ?

कुत्ते की रस्सी/चैन की अधिकतम लंबाई छह फुट से अधिक नहीं रख सकते हैं। यहां तो कुत्ते चैन में बंधे हुए ही पाए जाते हैं। गली के कुत्ते जिसको सभ्य लोग स्ट्रीट डॉग कहते है, यहां ये नस्ल नहीं पाई जाती हैं। यहां के कुत्ते कभी भी स्वच्छंद रूप से विचरण नहीं कर सकते। कभी किसी वाहन के पीछे भी कुत्ते दौड़ते हुए नहीं मिलते। इसलिए यहां के लोग कुत्तों को एक्सरसाइ करने के लिए उनके जिम लेकर जाते हैं। बहुत अमीर लोगों के कुत्ते के लिए उनका निजी ट्रेनर घर पर ही आता है।

इसके अलावा यहां के कुत्ते भौंकते हुए भी नहीं दिखते। हमारे देश में तो कुत्ते और मानव आवश्यकता से अधिक ही भौंकते हैं। मोबाइल पर भी सार्वजनिक स्थानों पर स्पीकर के माध्यम से वार्तालाप करने का चलन बढ़ रहा है।

हमारे देश में अमरीकी राष्ट्रपति आदि के आगमन के समय वहां के सुरक्षा कुत्ते भी साथ ही आते हैं। उनके रहने के लिए भी ए सी कमरे की व्यवस्था की जाती है। हमारे देश के स्ट्रीट डॉग तो किसी गरीब व्यक्ति के साथ ही अपना जीवन यापन कर लेते हैं। दुनिया के सबसे अमीर देश के कुत्ते भी “अमीर कुत्ते” ही कहलाते हैं।

© श्री राकेश कुमार

@ बोस्टन (यू एस ए) 

संपर्क – B 508 शिवज्ञान एनक्लेव, निर्माण नगर AB ब्लॉक, जयपुर-302 019 (राजस्थान)

मोबाईल 9920832096

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # 729 ⇒ सफ़ेद बाल ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “सफ़ेद बाल।)

?अभी अभी # 730 ⇒ सफ़ेद बाल ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

बाल उगाना तो बच्चों का खेल है, लेकिन उन्हें हमेशा काले बनाए रखना बड़े-बूढ़ों का खेल है। सभी बच्चे अमूमन बाल लेकर पैदा होते हैं, कुछ ज़्यादा तो कुछ कम। बिना बाल के बच्चे कम ही पैदा होते हैं। इसीलिए उन्हें बाल बच्चे कहते हैं।

बच्चों के साथ बाल भी बढ़ते हैं। लड़कों के बाल कटते रहते हैं, लड़कियों के बाल बढ़ते रहते हैं। बाल और नाखून साथ साथ बढ़ते हैं, दोनों में खून नहीं होता। लेकिन जब कोई उखाड़ता है तो दर्द होता है। नाखून घर में काटे जाते हैं, केश, आपले केश कर्तनालय में।।

बहुत से घरों में छुट्टी के दिन बाल दिवस मनाया जाता है। एक समय था जब शिकाकाई और मुल्तानी मिट्टी से महिलाएँ बाल-सेवा में व्यस्त रहा करती थी। रेडियो सीलोन पर लोमा हेयर आयल का विज्ञापन आता था। तब तक शैम्पू का तो जन्म भी नहीं हुआ था। केवल दादियों के बाल सफ़ेद हुआ करते थे। बालों में जुओं और घरों में खटमलों का राज हुआ करता था।

बालों की सुरक्षा शरीर की सुरक्षा का एक प्रमुख अंग है। किसी के सर में एक भी सफेद बाल बुढापे की निशानी समझा जाता था। इसी कारण हाथों में लगने वाली मेंहदी सर पर चढ़ गई। बाज़ार में बालों की सुरक्षा के लिए शैम्पू, कंडीशनर और मॉइस्चराइजर आ गए। इंदौर में एक मॉडर्न लांड्री थी, जो अपनी दुकान के नाम के नीचे डायर्स और ड्राइकलीनर्स भी लिखती थी।।

जब से वॉशिंग मशीन घरों में आ गई कपड़े घरों में ही ड्राई-क्लीन होने लगे और गोदरेज डाई से बाल भी काले होने लगे। बाल डाई करने के बाद किसी भद्र महिला-पुरुष की उम्र का पता ही नहीं चलता। महिलाओं के चेहरे और बालों की सुंदरता के लिए ब्यूटी पार्लर की सेवाएँ ली जाने लगी तो पुरुषों ने भी जेंट्स पार्लर की ओर रुख कर लिया।

जॉनीवाकर का एक मशहूर गीत है -तेल मालिश चम्पी ! सर की मालिश और शरीर की मालिश अब फेशियल और बॉडी मसाज हो गई है। ए के हंगल भी जब मेन्स पार्लर से बाहर आता है तो अपने आप को देवानंद समझता है। बाल काले करने से दुनिया उजली नज़र आने लगती है।।

कुछ ही भाग्यशाली पुरुष ऐसे होते हैं जिन्हें बालों की चिंता नहीं होती। लोग उन्हें मुफ्त ही बदनाम करते हैं कि चिंता से बाल उड़ जाते हैं। महिलाओं के बाल कम उड़ते हैं, जब कि उन पर जिम्मेदारियों का बोझ अधिक होता है।

एक ऐसी मान्यता है कि धूप में बाल सफेद होते हैं। जिनके बाल सफेद होने लगते हैं, वे सफाई देते हैं कि हमने बाल धूप में सफेद नहीं किये। कहाँ किये, कभी नहीं बताते। उन्हें इतना नहीं समझता कि सफेद बाल काले करना तो आसान है लेकिन काले बाल सफेद करना इतना आसान नहीं।।

जिन्हें हम सफ़ेद बाल कहते हैं, उन्हें अंग्रेज़ी में grey hair कहते हैं। सफेद बाल सम्मान का प्रतीक है। लोग सम्मान की आशा तो रखते हैं, लेकिन बूढ़ा नहीं दिखना चाहते। बुढापा विचारों से तो आता ही है, बार बार आईना देखने, और सफ़ेद बाल गिनने से भी आता है।

बाल काले हों, सफेद हों, कोई फ़र्क नहीं पड़ता ! बस दिल काला न हो। सुंदर दिखना और लगना आपका जन्मसिद्ध अधिकार है। अच्छे दिखें, अच्छे लगें, साथ साथ अच्छे बनें भी। जो देखे, बस यही कहे,

अहा ! आप मुझे अच्छे लगने लगे। कितना पुराना गीत है, लेकिन हमेशा जवां ;

अभी तो मैं जवान हूँ,

अभी तो मैं जवान हूँ,

अभी तो मैं जवान हूँ …

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # 729 ⇒ बापू की कुटिया ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपकी गद्य क्षणिका – “बापू की कुटिया।)

?अभी अभी # 729 ⇒ बापू की कुटिया ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

(BAPU KI KUTIYA)

बापू का कॉपीराइट वैसे तो गांधीजी के पास ही है, लेकिन घर के किसी भी बुजुर्ग को आप निश्चिंत हो, बापू कह सकते हैं। अपने बाप की उम्र के काका, बाबा तो ठीक, कुछ परिवारों में तो बच्चों को भी बाबू, बाबा और बापू कहकर संबोधित किया जाता था।

पहले हमें नाम से लगा, सेवाग्राम और साबरमती आश्रम की तरह, शायद यह कुटिया भी कभी बापू का निवास स्थान रही होगी, लेकिन आज से ५० वर्ष पूर्व, भोपाल प्रवास में, जब मैं टीटी नगर के आसपास, देर रात ९ बजे, कोई भोजनालय तलाश रहा था, अचानक मेरी निगाह इस बापू की कुटिया पर पड़ी, जहां कुछ लोग भोजन कर रहे थे।।

नाम में सादगी झलक रही थी, अतः मैं निश्चिंत हो गया, यहां जरूर मुझे शुद्ध, सात्विक, शाकाहारी भोजन अवश्य उपलब्ध होगा, और यकीन मानिए, बापू की कुटिया ने मुझे निराश नहीं किया।

कम कीमत पर मुझे घर जैसा भोजन नसीब हुआ।

उसके बाद जब भी भोपाल जाता, एक नजर बापू की कुटिया पर अवश्य डालता।

मेरे आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा, जब मेरे शहर इंदौर में भी अचानक एक जगह मेरी नजर “बापू की कुटिया” पर पड़ी। बापू की तो खैर गुडविल ही इतनी है कि हर छोटे बड़े शहर में आपको एम जी रोड, महात्मा गांधी मार्ग, गांधी हॉल, गांधी नगर और गांधी प्रतिमाएं मिल जाएंगी। उनके नाम से कई मेडिकल कॉलेज होंगे। गांधी आदर्श ना सही, लेकिन ब्रांड बनकर तो रह ही गए हैं। उन्होंने भले ही पैसे से मोह ना पाला हो, लेकिन भारतीय मुद्रा अभी तक उनकी तस्वीर के मोह को छोड़ नहीं पा रही है। बोलचाल की भाषा में बड़े नोटों को लोग गांधी छाप नोट भी कहने लगे हैं।।

आखिर एक दिन वह भी आ गया, जब मुझे मेरे शहर की बापू की कुटिया के स्वादिष्ट भोजन का स्वाद लेने का सुअवसर मिला।

कुटिया जैसा यहां कुछ भी नहीं था। हां, भोजन शाकाहारी ही था।

अगर आप सात्विक भोजन चाहते हैं तो जैन फूड हाजिर है। संक्षेप में अगर कहें तो बापू की कुटिया ने मुझे यहां भी निराश नहीं किया।

वैसे भी आजकल सादगी का नहीं, तड़क भड़क का जमाना है, इसलिए बापू की कुटिया पर भी रात में चकाचौंध रोशनी जगमगाती रहती है। यहां सत्संग अथवा सर्व धर्म की प्रार्थना नहीं होती, बस सशुल्क पेट पूजा होती है।

भाषा विवाद से दूर, इसका हिन्दी में नियॉन साइनबोर्ड (नामपट्ट), “बापू की कुटिया”, भी दूर से ही अपनी छटा बिखेरता है। अगर यही साइनबोर्ड अंग्रेजी में लिखा होता तो

शायद कुछ इस प्रकार होता, “BAPU KI KUTIYA”.

आजकल सभी आश्रम वातानुकूलित हो चले हैं, और कुटिया, कॉटेज।

हर अमीर अपने महल को दौलतखाना और गरीबखाना ही कहता है।

जब से रामराज्य में किसी गरीब की झोपड़ी के भाग खुले हैं, हर भक्त अपने कॉटेज को झोपड़ी ही मानने लगा है, और वहां भी राम जी की कृपा से आराम ही आराम है।

बापू की कुटिया में आपको विदुर का साग मिले ना मिले, दुर्योधन का मेवा मिलने से तो रहा।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ परिहार जी का साहित्यिक संसार # 296 ☆ चिंतन – सूली पर टंगा आदमी ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆

डॉ कुंदन सिंह परिहार

(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय  डॉ  कुन्दन सिंह परिहार जी  का साहित्य विशेषकर व्यंग्य  एवं  लघुकथाएं  ई-अभिव्यक्ति  के माध्यम से काफी  पढ़ी  एवं  सराही जाती रही हैं।   हम  प्रति रविवार  उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते  रहते हैं।  डॉ कुंदन सिंह परिहार जी  की रचनाओं के पात्र  हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं।  उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल  की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय चिंतन – ‘सूली पर टंगा आदमी‘। इस विचारणीय रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार  # 296 ☆

☆ चिंतन ☆ सूली पर टंगा आदमी

 12 जून को अहमदाबाद में हुई वायुयान दुर्घटना ने पूरी दुनिया को हिला दिया। 270 आदमियों का जीवन पल भर में बुझ गया। कल्पनातीत अन्त। इनमें से कितने ही बच्चे थे जिनका जीवन शुरू होने से पहले ही ख़त्म हो गया। एक परिवार में पति-पत्नी के अलावा तीन बच्चे थे, सात आठ साल के जुड़वां बेटे और उनसे एक दो साल बड़ी उनकी प्यारी सी दीदी। बेटियों का मोह मुझे ज़्यादा होता है, इसलिए उस नन्हीं बेटी का फोटो देखकर मुझे रोना आया।

इस घटना के दो-तीन दिन बाद ही एक हेलीकॉप्टर केदारनाथ से लौटते में दुर्घटनाग्रस्त हुआ। इसमें पायलट समेत सात व्यक्तियों की मौत हुई। सवारियों में एक नाबालिग बच्ची भी थी। फिर एक बार आदमी की असहायता शिद्दत से महसूस हुई।

ये सब स्थितियां आदमी के वश से बाहर हैं। आदमी आज टेक्नोलॉजी का गुलाम है। टेक्नोलॉजी जिस तरफ घुमाती है, उसी तरफ घूमने के लिए मजबूर है। आदमी बैलगाड़ी से चलकर तांगे, इक्के, फिटन, मोटर, रेल से बढ़कर वायुयान तक पहुंचा। ट्रेन के पंद्रह सोलह घंटे के सफर को वायुयान से तीन-चार घंटे में तय कर लेने का लोभ बढ़ा, भले ही उसके लिए जेब कुछ ज़्यादा हल्की करनी पड़े। जो आदमी मोटर पर चलने का आदी हो, उसके लिए साइकिल-रिक्शे की धीमी सवारी असहनीय हो जाती है। लेकिन वायुयान में बैठकर पूरे समय ‘राम-राम’ जपना पड़े तो यात्रा कैसी होगी? ‘न निगलते बने, न उगलते’ वाली स्थिति है।

परसों के अखबार की खबर के अनुसार पिछले एक वर्ष में हवाई यात्रा करने वाले यात्रियों की संख्या में 32 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। ये सब 35 वर्ष से कम आयु के युवा हैं जो मंझोले शहरों से महज़ घूमने और मनोरंजन के लिए विदेश गये।

बैलगाड़ी-युग में बारातें भी बैलगाड़ी में जाती थीं। बैलगाड़ी की बारात में लड़की वाले को आदमियों के अलावा बैलों की खूराक का भी इन्तज़ाम करना पड़ता था। तब की बारातें दो-तीन दिन रुकती थीं, इसलिए लड़की वालों की फजीहत का अन्दाज़ लगाया जा सकता है। मेरे एक रिश्तेदार बताते थे कि जब उनके घर की शादी होती थी तब जिनको निमंत्रण नहीं मिलता था वे भी पता चलने पर बैलगाड़ी सजाकर इष्ट-मित्रों सहित चल पड़ते थे। नतीजतन बारातियों की संख्या हज़ारों में पहुंचती थी।

एक ज़माना वह भी था जब आम आदमी को कोई सवारी मयस्सर नहीं थी। तब अपनी पांवगाड़ी ही काम आती थी। आठ दस मील की यात्रा आराम से पैदल हो जाती थी। बहुत से तीर्थयात्री पैदल ही लंबी यात्राएं करते थे। तब तीर्थयात्रियों को घर से अन्तिम विदाई दी जाती थी क्योंकि सयाने लोगों के जीवित लौट कर आने की उम्मीद कम ही रहती थी। अभी भी कांवड़िये कांवड़ों के साथ सैकड़ो मील की यात्राएं पैदल कर रहे हैं।

वायु-यात्रा के अलावा दूसरी फिक्र महानगरों में गगनचुम्बी इमारतों को देखकर होती है। तीस चालीस फ्लोर की इमारतों के माचिस जैसे फ्लैटों को देखकर रीढ़ में फुरफुरी या झुरझुरी दौड़ती है। कुछ दिन पहले दुबई में एक 67 मंज़िली इमारत में आग लगने से बड़ी मुश्किल से करीब 3500 लोगों को निकाला जा सका। सवाल यह उठता है कि जब आदमी का सुरक्षित निकलना मुश्किल हो जाए तो उसकी गृहस्थी के माल- असबाब का क्या होगा? अमेरिका के ट्रेड टावरों को हम अभी भूले नहीं हैं।

दिल्ली के एक इलाके में पांचवीं या छठवीं मंज़िल पर आग लगने से एक सज्जन ऐसे घबराये कि अपने पुत्र और भतीजी को ऊपर से कूदने के लिए कह दिया और उनके पीछे खुद भी कूद गये। नतीजतन तीनों की ही मृत्यु हो गयी।

कुछ दिन पहले टीवी पर एक बिल्डर का इंटरव्यू देखा था। उनका कहना था कि ज़मीन की कमी और उसकी आसमान-छूती कीमतों के कारण ‘होरिज़ोंटल’ निर्माण के बजाय ‘वर्टिकल’ निर्माण ज़रूरी है। उन्होंने बताया कि उनका ख़्वाब एक किलोमीटर ऊंची टावर बनाने का है। सुनकर मेरी हालत खराब हो गयी। लगता है आदमी जीते जी स्वर्ग का सफर तय कर लेगा। ‘गगन मंडल पर सेज पिया की, किस विधि मिलना होय।’

मकान की ऊंचाई बढ़ने के साथ आदमी पूरी तरह ‘लिफ्ट’ पर निर्भर हो रहा है। लिफ्ट काम न करे तो आदमी पिंजरे में बन्द चूहा हो जाए। हाल में लिफ्ट का दरवाज़ा न खुलने और आदमी के फंस जाने की घटनाएं सामने आयीं। एक घटना में लिफ्ट का दरवाज़ा न खुलने के कारण एक आठ दस साल का बालक उसमें फंस गया था। यह दिक्कत कुछ मिनट ही रही, लेकिन लिफ्ट के बाहर प्रतीक्षारत बालक के पिता ऐसे बदहवास हुए कि उन्हें ‘हार्ट अटैक’ आ गया और उनकी मृत्यु हो गयी। ऐसी घटनाओं से आदमी की बढ़ती लाचारी सामने आती है।

कुछ दिन पहले गुड़गांव या गुरुग्राम में एक संबंधी के घर में रुकने का मौका मिला था। फ्लैट बारहवीं मंज़िल पर था। शाम को मुझे सलाह दी गयी कि नीचे जाने के बजाय थोड़ी देर बालकनी में ही टहल लूं। सलाह मान कर बालकनी के दो-तीन चक्कर लगाये, लेकिन नीचे झांकने पर मुझे चक्कर आने लगे। परिणामत: टहलना मुल्तवी करके कमरे में आ गया।

मजबूरी में आज लोग स्थितियों से संगत बैठाने की जद्दोजहद में लगे हैं। आज के महानगरों के हालात को देखकर सब की ख़ैर ही मनायी जा सकती है।

© डॉ कुंदन सिंह परिहार

जबलपुर, मध्य प्रदेश

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संजय उवाच # 297 – प्रकृति…विकृति ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के  लेखक  श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है। साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ  हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको  पाठकों का  आशातीत  प्रतिसाद मिला है।”

हम  प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है  इस शृंखला की अगली कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों  के माध्यम से  हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)

☆  संजय उवाच # 297 ☆ प्रकृति…विकृति… ?

वर्तमान जीवन शैली में चलना, दौड़ना, व्यायाम  आदि शारीरिक स्वास्थ्य के लिए अनिवार्य  हो चले हैं। मुझे भ्रमण प्रिय है। सामान्यतः प्रातः समय भ्रमण कर लेता हूँ तथापि अनेक बार ऐसी अपरिहार्यताएँ  होती हैं कि सुबह से रात तक काम के अलावा दूसरा कुछ करने की स्थिति नहीं बन पाती।

आज भी ऐसा ही एक दिन था। रात के लगभग 10:30 बज रहे थे। विचार किया कि भ्रमण का कोटा पूरा कर लूँ। तुलनात्मक रूप से कम भीड़-भाड़ और चौड़े फुटपाथ वाली एक सड़क पर निकल पड़ा। देखता हूँ कि जो लोग भ्रमण कर रहे हैं, उनमें भोजन कर पान खाने निकले कुछ दुकानदारों की टोली है, कुछ युगल हैं। एकाध परिवार हैं, शेष एकल पुरुष हैं। पूरे मार्ग पर भी एक भी अकेली स्त्री नहीं है।

चिंतन का चक्र आरंभ हुआ। स्त्रियों के साथ यह भेदभाव क्यों? जैसे देर रात भ्रमण की मेरी इच्छा हुई, अनेक स्त्रियों की भी होती होगी पर उनके कदम बँधे हैं।  भीतर से तर्क आया कि यह तो प्रकृतिगत है कि देर रात सुनसान रास्ते पर कोई महिला अकेली नहीं निकलेगी। भीतर ने ही तर्क से तर्क की काट भी तलाशी।

सत्य तो यह है कि शेर के डर से खरगोश दुबका रहे, यह तो प्रकृति है पर शेर के डर से शेरनी बाहर ना निकल सके, यह विकृति है। पृथ्वी पर अन्य किसी भी सजीव की एक ही प्रजाति में यह डर देखने को नहीं मिलता। स्त्री-पुरुष पूरक हैं। एक घटक को भय होगा तो पूरक मिलकर संपूर्णता कैसे प्राप्त करेंगे? दुखद यथार्थ है कि सामान्यतः हर स्त्री को अपने जीवन में अपनी कुछ इच्छाओं का गला घोंटना पड़ता है। इच्छाओं को आत्महत्या के लिए उकसाने का आरोप पुरुष पर है और उसे ईमानदारी से इस आरोप को स्वीकार करना भी चाहिए।

मनुष्य ने अरण्य से निकल कर नगर बसाए। नगर के अपने नियम-कानून बनाए। तथ्य बताते हैं कि ये कानून स्त्रियों को संरक्षण देने में विफल रहे। लैंगिक समानता के विषय पर अरण्य, नागरी सभ्यता से बहुत आगे खड़े हैं। नीति कहती है कि जब मनुष्य के नियम प्रभावहीन होने लगें तो उसे अपौरुषेय की शरण में जाना चाहिए।

वेद अपौरुषेय हैं। अथर्ववेद का उद्घोष है कि  स्त्रियाँ शुद्ध स्वभाव वाली, पवित्र आचरण वाली, पूजनीय, सेवा योग्य, शुभ चरित्र वाली और विदुषी हैं। यजुर्वेद स्त्री, पुरुष दोनों में से किसी को भी शासक होने का समान अवसर प्रदान करते हुए अपेक्षा व्यक्त करता है कि राजा की भाँति रानी भी न्याय करनेवाली होनी चाहिए।

न्याय का अधिकार रखनेवाली के साथ होता  अन्याय समर्थनीय नहीं है। वेदों के दिशा-निर्देश और आचरण तत्व स्त्री-पुरुष दोनों पर लागू होते हैं। स्त्री को समानता और निर्भय वातावरण उपलब्ध कराना प्रत्येक पुरुष का कर्तव्य है। इस कर्तव्य को चर्चा तक सीमित न रखकर व्यवहार में उतारना ही बुद्धिमान मनुष्य प्रजाति से अपेक्षित है।…इति।

© संजय भारद्वाज 

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ श्रावण साधना रविवार ११ जुलाई 2025 से रक्षाबंधन तदनुसार शनिवार 9 अगस्त तक चलेगी। 🕉️

💥 इस साधना में ॐ नमः शिवाय का मालाजप होगासाथ ही गोस्वामी तुलसीदास रचित रुद्राष्टकम् का पाठ भी करेंगे। 💥 

💥 101 से अधिक मालाजप करने वाले महासाधक कहलाएंगे 💥

💥 संभव हो तो परिवार के अन्य सदस्यों को भी इससे जोड़ें💥  

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं।

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # 728 ⇒ || रबड़ी प्लेट || ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – || रबड़ी प्लेट ||।)

?अभी अभी # 728 ⇒ || रबड़ी प्लेट || ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

आप भले ही लड्डू को मिठाइयों का राजा मान लें, लेकिन जलेबी, इमरती और रबड़ी का नाम सुनकर ज़रूर आपके मन में लड्डू फूट पड़े होंगे। जिन्हें गुलाब जामुन पसंद है, उन्हें मावा बाटी की भी उपेक्षा नहीं करनी चाहिए। होते हैं कुछ लोग, जो चाशनी से परहेज करते हैं, लेकिन रसगुल्ला देख, उनके मुंह से भी पानी टपकने लगता है।

हम तो शुगर को शक्कर ही समझते थे, लेकिन जब से सुना है, शुगर एक बीमारी भी है, हमने भी मीठे से परहेज करना शुरू कर दिया है। लेकिन चोर चोरी से जाए, हेरा फेरी से ना जाए, रबड़ी तब भी हमारी कमजोरी थी, और आज भी है।।

कुछ समय के लिए शुगर को भूल जाइए, आइए रबड़ी की बात करें। ठंडी रातों में दूध के कढ़ाव और केसरिया, मलाईदार दूध, रबड़ी मार के, मानो चाय मलाई मार के। गर्मी में मस्तानी दही की लस्सी और वह भी रबड़ी मलाई मार के। खाने वाले खाते होंगे दही के साथ गर्मागर्म जलेबी, हम तो जलेबी भी रबड़ी के साथ ही खाते हैं।

आज हम जिस रबड़ी प्लेट का जिक्र कर रहे हैं, उसके लिए हमें थोड़ा अतीत में जाना पड़ेगा। नालंदा जितना अतीत नहीं, फिर भी कम से कम पचास बरस। हमारे होल्करों के शहर इंदौर के बीचों बीच एक श्रीकृष्ण टाकीज था, जहां गर्मियों में सुबह साढ़े आठ बजे एक ठेला नजर आता था, जो हीरा लस्सी के नाम से प्रसिद्ध था। यह लस्सी केवल गर्मियों में ही नसीब होती थी। एक बारिश हुई, और वहां से ठेला नदारद।

एक श्रृंगारित ठेला, जिसमें कई शरबत की बोतलें सजी हुई, ठेले के नीचे के स्टैण्ड पर कई ताजे दही के कुंडे, ठेले के बीच टाट पर विराजमान एक बर्फ की शिला, एक विशाल तपेले में, लबालब रबड़ी और इन सबके बीच कार्यरत एकमात्र व्यक्ति हीरा और उनका चीनी मिट्टी का बड़ा पात्र और एक लकड़ी की विशाल रवई, दही को मथने के लिए। (सब कुछ हाथ से ही)

हीरा लस्सी ही उस लस्सी का ब्रांड था, जो किसी जमाने में आठ आने से शुरू होकर दस रुपए तक पहुंच गई थी। पहले कुंडे से दही निकालकर तबीयत से मथना, फिर कांच के ग्लासों में बर्फ छील छीलकर डालना, लस्सी और बोतलों में रखे शकर के केसरिया शरबत को मिलाना, और ग्लासों को लस्सी से भरना, फिर थोड़ी रबड़ी और उसके बाद लबालब लस्सी पर दही की मलाई की एक मोटी परत। लीजिए, हीरा लस्सी तैयार।।

हमारा विषयांतर में विश्वास नहीं। वहां रबड़ी प्लेट भी उपलब्ध होती थी, जो मेरी पहली और आखरी पसंद होती थी। भाव लस्सी से उन्नीस बीस, लेकिन एक कांच की बड़ी प्लेट में लच्छेदार रबड़ी, उस पर थोड़ा बर्फ का चूरा और ऊपर से गुलाब का शर्बत। एक लोहे की डब्बी में काजू, बादाम, पिस्ते का चूरा लस्सी और रबड़ी प्लेट दोनों पर कायदे से बुरकाया जाता था। तब जाकर हमारी रबड़ी प्लेट तैयार होती थी।

हाइजीन वाले हमें माफ करें, क्योंकि हम रबड़ी प्लेट खाने के बाद हाथ नहीं धोते थे, रबड़ी और गुलाब के शरबत की खुशबू हमारे हाथों में हमारे साथ ही जाती थी और साथ ही जबान पर रबड़ी प्लेट का स्वाद भी।।

आज न तो वहां श्रीकृष्ण टाकीज है और ना ही वह हीरा लस्सी वाला। पास में बोलिया टॉवर के नीचे, उसके वंशज जरूर फ्रिज में रखी लस्सी, हीरा लस्सी के नाम से, साल भर बेच रहे हैं, लेकिन वह बात कहां।

जिस तरह शौकीन लोग, अपना शौक घर बैठे भी पूरा कर लेते हैं, हमारी रबड़ी प्लेट भी आजकल घर पर ही तैयार हो जाती है। तैयार केसरिया रबड़ी मांगीलाल दूधवाले अथवा रणजीत हनुमान के सामने विकास रबड़ी वाले के यहां आसानी से उपलब्ध हो ही जाती है, बस एक प्लेट में रबड़ी पर थोड़ा सा, मौसम के अनुकूल बर्फ और गुलाब का शर्बत ही तो डालना है, लीजिए, रबड़ी प्लेट तैयार। शौकीन हमें ज्वाइन कर सकते हैं।।

विशेष : शुगर फ्री वालों से क्षमायाचना सहित …!!

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

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≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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