हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ८५५ ⇒ हार और उपहार ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “हार और उपहार…“।)

?अभी अभी # ८५५ ⇒ आलेख – हार और उपहार ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

इस बार शादी की सालगिरह पर पत्नी ने मुझसे उपहार स्वरूप सोने का हार मांगा है। मेरी गिरह में इतना पैसा नहीं है, वह भी जानती है, लेकिन सोना एक ऐसी चीज है, जिससे किसी का पेट नहीं भरता। जितना सोना, उतनी अधिक भूख।

देव उठ गए हैं ! शादियों का मौसम है। ज्वैलर्स की चांदी है। जितनी कभी शहर में पान की दुकानें होती थीं, उतनी आज ज्वैलर्स की दुकानें हो गई हैं।।

मेरा शहर भी अजीब है ! लोग यहां सराफा आभूषण खरीदने नहीं, चाट और पकवान खाने जाते हैं। सही भी है ! सोना चांदी भूख बढ़ा भी देते हैं। जो भला आदमी, आभूषण नहीं खरीद सकता, वह सराफा की चाट तो खा ही सकता है।

मंदी और तेजी दो विरोधाभासी शब्द है। मंदी में कीमतें कम नहीं होती, व्यापारी की ग्राहकी कम हो जाती है। जैसे जैसे बाज़ार में मंदी बढ़ती जाती है, भावों में तेजी और ग्राहकी एक साथ बढ़ने लगती है। जितनी भीड़ कभी पान की दुकान पर लगती थी, उतनी आज एक ज्वैलर की दुकान पर देखी जा सकती है।।

उपहार में पत्नी को हार देने की समस्या का समाधान भी पत्नी ने ही कर दिया। उसके एक कान का भारी भरकम बाला कहीं गुम गया। मैं उस वक्त शहर में नहीं था, इसलिए ढूंढो ढूंढो रे साजना, मेरे कान का बाला, जैसी परिस्थिति से बच गया।

महिलाओं के बारे में एक भ्रम है कि उनके पेट में कोई बात नहीं पचती। मैं इससे असहमत हूं। कई बार ऐसे मौके आए हैं, जब अप्रिय प्रसंगों को पत्नी ने मुझसे छुपाया है। आप इसके दो अर्थ लगा सकते हैं ! एक, वह मुझे दुखी नहीं देखना चाहती। दो, वह मुझसे डरती है। मुझे कान के बाले के गुमने की कानों कान खबर भी नहीं होती, अगर मैं उसे यह नहीं कहता, वे कान के बालेे कहां हैं, जो मैंने आपको 25वीं सालगिरह पर दिलवाए थे।।

कुछ बहाने बनाए गए, काम की अधिकता का बखान किया गया, लेकिन जब बात न बनी, तब राज़ खुला, कि अब दो नहीं, एक ही कान का बाला अस्तित्व में है। उन्हें लगा, अब सर पर पहाड़ टूटने वाला है। लेकिन मुझे उल्टे खुश देखकर उनके आश्चर्य का ठिकाना ना रहा। क्यों न, इस एक बाले के बदले में एक गले का हार ले लिया जाए इस सालगिरह पर, मैंने सुझाव दिया।

नेकी और पूछ पूछ ! उनके चेहरे के भावों को मैंने पढ़ लिया। तुरंत ज्वेलर से संपर्क साधा गया। बीस प्रतिशत के नुक़सान पर वह बाला बेचा गया, और एक अच्छी रकम और मिलाने पर उपहार-स्वरूप एक हार क्रय कर लिया गया।।

उपहार में दिए हार को हम गले में धारण कर सकते हैं, जीवन में मिली हार को हम गले लगाने से कतराते हैं। हमें हमेशा जीत ही उपहार में चाहिए, हार नहीं। ऐसा क्यों है, जीत को सम्मान, हारे को हरि नाम।

सुख दुख, सफलता असफलता को गले लगाना ही हारे को हरि नाम है। शादी की सालगिरह पर उपहार का हार भी एक सकारात्मक संदेश दे सकता है, कभी सोचा न था।।

(प्रसंगवश : शादी की ५२वीं सालगिरह, ४ दिसंबर १९७३)

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # २३१ – बाल साहित्य – जानलुई का सपना – टेलीविज़न ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ ☆

श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

(सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” जी का  हिन्दी बाल -साहित्य  एवं  हिन्दी साहित्य  की अन्य विधाओं में विशिष्ट योगदान हैं। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में रचना सहित 145 बालकहानियाँ 8 भाषाओं में 1160 अंकों में प्रकाशित। प्रकाशित पुस्तकेँ-1- रोचक विज्ञान कथाएँ, 2-संयम की जीत, 3- कुएं को बुखार, 4- कसक, 5- हाइकु संयुक्ता, 6- चाबी वाला भूत, 7- बच्चों! सुनो कहानी, इन्द्रधनुष (बालकहानी माला-7) सहित 4 मराठी पुस्तकें प्रकाशित। मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी का श्री हरिकृष्ण देवसरे बाल साहित्य पुरस्कार-2018 ₹51000 सहित अनेक संस्थाओं द्वारा सम्मानित व पुरस्कृत। साप्ताहिक स्तम्भ “श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य”  के अंतर्गत साहित्य आप प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकते हैं। आज प्रस्तुत है बाल साहित्य – “जानलुई का सपना – टेलीविज़न ”।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # २३१ ☆

☆ बाल साहित्य – जानलुई का सपना – टेलीविज़न ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ ☆

जानलुई एक होटल में बैठा था। वह नाश्ता करने आया था। पास रेडियो पर गाना आ रहा था।

जानलुई गाना सुन रहा था। तभी उसके ध्यान में आया कि जब रेडियो में गाना दूसरे स्टेशन से आ सकता है तो इसी तरह चित्र भी हवा में क्यों नहीं आ सकते? यह सोचकर जानलुई वहाँ से उठा और पर चल दिया।

पर आ कर उसने रेडियो की कार्यविधि का अध्ययन किया। कही से कांच, घूमने वाला चक्का, वायर, बैटरी आदि सामान एकत्र कर के प्रयोग करने लगा।

चुंकि जानलुई को बचपन से फोटोग्राफी का शौक था। इसलिये यह फोटो और आवाज को एक साध यंत्र में लाना चाहता था।

इसी कोशिश में वह दिन-रात मेहनत करता रहा। एक कमरे में कैमरा लगा दिया। उसमें कुछ परिवर्तन किया। जिस तरह रेडियो की आवाज को विद्युत तरंग में बदलने की कोशिश की जाती है।

कुछ दिनों तक लगातार कोशिश करने के बाद वह इस कार्य में सफल हो गया। तब उसने दूसरे कमरे में चमकीले शीशे लगा कर उसके पीछे एक चक्का लगाया, जो एक मोटर से घूमता था। इसे कई यंत्रों से जोड़ कर तैयार किया गया था।

जानलुई ने कैमरे के सामने रंगीन गुड़िया रख दी। जिस के ऊपर फोकस से प्रकाश डाला गया। तब दूसरे कमरे में जा कर शीशे पर चित्र प्राप्त करने का प्रयत्न किया गया।

बहुत कोशिश के बाद जानलुई चित्र को विद्युत तरंग से वापस चित्र प्राप्त करने में सफल हो गया। उसने यह चित्र एक सामान्य सिद्धांत को कार्य में बदल कर प्राप्त किया, जिस के अनुसार पहले चित्र को कैमरे में प्राप्त कर के विद्युत तरंग में बदला जाता है। फिर विद्युत तरंग को वापस चित्र में बदल दिया जाता है।

जानलुई द्वारा प्राप्त किए गए चित्र साफ नहीं आ रहे थे। इसलिये यह उन्हें साफ प्राप्त करने की कोशिश करने लगा।

उसके कमरे में तारों का जाल फैला हुआ था। वह उन्हें सावधानी से पार करता  था।मगर,  एक तार से उलझ गया, जिससे कमरे की खिड़की खुल गई।

एक हजार बैटरियों का प्रकाश सड़क पर फैल गया। लोग इकट्ठे हो गए। कोलाहल सुनकर मकान मालिक आ गया। उसने जानलुई को घर से निकाल दिया। तब जानलुई अपना सामान लेकर लंदन आ गया। जहाँ उसने अपना प्रयोग वापस दोहराया।

इस हेतु वह एक लड़के को ले कर आया। जिसे कमरे के सामने खड़ा किया। पर वह लड़का तेज प्रकाश देखकर घबरा गया और प्रकाश से दूर हट गया।

उधर जानलुई को कोई चित्र प्राप्त नहीं हो रहा था। वह पुनः कमरे में आया। देखा, लड़का प्रकाश से अलग खड़ा था।

“अरे भाई, डरो मत!” जानलुई ने जेब से कुछ रुपये निकाल कर लड़के को दिये.” तुम्हें कुछ नहीं होगा।”

फिर वह दूसरे कमरे में आ कर प्रयोग करने लगा। उसका प्रयोग सफल रहा। वह स्पष्ट चित्र प्राप्त करने में कामयाब हो चुका था।

इस तरह कई साल तक प्रयोग करने के बाद जानलुई बेयर्ड टेलीविजन का आविष्कार करने में सफल हुआ। यह आविष्कार उसकी अथक मेहनत का परिणाम है।

© श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

16-07-2024

संपर्क – 14/198, नई आबादी, गार्डन के सामने, सामुदायिक भवन के पीछे, रतनगढ़, जिला- नीमच (मध्य प्रदेश) पिनकोड-458226

ईमेल  – opkshatriya@gmail.com मोबाइल – 9424079675 /8827985775

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ८५४ ⇒ ज़हर उगलना ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “ज़हर उगलना…“।)

?अभी अभी # ८५४ ⇒ आलेख – ज़हर उगलना ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

क्या यह विचित्र किन्तु सत्य नहीं कि जिस देश की मिट्टी सोना और हीरे मोती उगले, वहां उसी मिट्टी से बना इंसान अचानक ज़हर उगलने लगे। हमें अपनी धरती से सहन करने की शक्ति और प्रेरणा लेने को कहा जाता है। धरती भी आखिर हमारी मां है, उसका भी सब्र का कोई बांध होगा। जब इस धरती पर पाप बढ़ेंगे तो उस पर भी जरूर इसका असर पड़ेगा। ज्वालामुखी यूं ही नहीं फूट उठता। अरे कोई कारण होगा।

क्यों आते हैं भूकंप और जलजले और क्यूं फूटते हैं ज्वालामुखी। इंतहां हो गई बर्दाश्त की। बस कुछ कुछ यही फितरत इंसान की भी है। जब तक आदर और मान सम्मान मिलता है, वह भी मुंह में मिश्री घोलता है। दावत में अचानक रबड़ी खाते खाते अंधेरा हो जाए और रोशनी होते ही अगर पता चले कि रबड़ी में कुछ चलता फिरता काला था, तो निवाले का एकदम घर निकाला हो जाता है। प्रथमा ग्रासे मक्षिकापात: प्रथम ही ग्रास में हे सखी, मक्खी।।

हमारे भोजन को अमृत कहा गया है। सुगंधम् पुष्टि वर्धनम ! लेकिन अपमानजनक कड़वे बोलों के साथ भोजन नहीं पचाया जा सकता। कोई अगर एक तरफ कानों में ज़हर घोले और दूसरी ओर रबड़ी में केसर, तो जबान भी मुंह का स्वाद भूल जाती है। स्वादिष्ट केसरिया रबड़ी ज़हर हो जाती है।

कभी कभी खाने में असावधानीवश कुछ जहरीला पदार्थ मिल जाने से मेहमान फूड पॉइजनिंग के शिकार हो जाते हैं। उल्टी दस्त की शिकायत आम हो जाती है। इसी प्रकार अगर, किसी व्यक्ति को, अंधेरे में कोई जहरीला सांप काट खाए तो पूरे शरीर में जहर फैल जाता है। जितनी जल्दी जहर को शरीर से बाहर निकाला जाए, उतनी ही जल्दी स्वस्थ होने की संभावना बढ़ जाती है।।

करेला और नीम दोनों कड़वे होते हैं, लेकिन लाभकारी होते हैं। कड़वी बातें भी लाभकारी हो सकती हैं लेकिन स्वस्थ व्यक्ति को कभी जहर के इंजेक्शन नहीं दिए जाते।

लोग कैसे मीठा खाकर जहर उगल देते हैं। जरूर अंदर कहीं जहर का भंडार होगा।

कांटे से कांटा निकाला जाता है और लोहा ही लोहे को काटता भी है। सिर्फ एक बूंद जहर काफी होता है किसी स्वादिष्ट खाद्य पदार्थ को जहरीला बनाने के लिए। कैसे होते होंगे जहरीले इंसान, जो सिर्फ नफरत की आग ही उगलते होंगे और जहर भरी बातों के तीर ही चलाते होंगे।।

जो सांपों को अभय देते हैं, भले ही उनके कलेजे पर सांप लौटे, वे नीलकंठ ही कहलाते हैं। बुराई रूपी जहर को न निगलना और ना ही उगलना। ब्लड बैंक तो सुना था, आशुतोष नीलकंठ तो पॉइजन बैंक हैं। एक ऐसा स्विस बैंक जहां ज़हर भी अमृत की तरह ही सुरक्षित है। अगर हमें भी अमर होना है तो सहनशक्ति और धैर्य के साथ, जहर को कंठ में ही धारण करना होगा। और कुछ ना सही, तो कम से कम, हम यह प्रार्थना तो कर ही सकते हैं ;

हे नीलकंठ, हे महादेव

ऐसी कृपा अब कर दो।

मेरे मन में ज़हर भरा है

उसको अमृत कर दो।

हे नीलकंठ हे महादेव।।

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ८५३ ⇒ संचार क्रांति ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “संचार क्रांति…“।)

?अभी अभी # ८५३ ⇒ आलेख – संचार क्रांति ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

हमारे देश में क्रांतियाँ वैसे भी कम ही होती हैं ! आज़ादी के बाद ले-देकर एक संपूर्ण क्रांति हुई, और उसके बाद संचार क्रांति ! हमारे देश में जब भी क्रांति होती है, न जाने क्यों सत्ता परिवर्तन भी हो जाता है।

आज हमारे जिन हाथों में एंड्राइड फोन है, वह कभी एक पेजर के लिए भी तरस जाता था। पेजर को पैंट के बेल्ट के साथ एक रिवाल्वर की तरह लटकाया जाता था, पेजर की घंटी बजती थी, और आपको सन्देश मिलता था। पेजर-मैन दौड़कर किसी एस टीडी से कॉल लगा लेता था।।

फिल्मों में एक हास्य-अभिनेता सतीश कौशिक थे, डेविड धवन के कारण उनका एक किरदार पप्पू पेजर बहुत लोकप्रिय हुआ।

आज पप्पू लोकप्रिय है, और पेजर आउट ऑफ डेट। वैसे इतिहास गवाह है कि पप्पू भी हमारे लिए नया नहीं। हर पाँच परिवार में एक पप्पू पैदा होता है, जो माँ का भी लाड़ला होता है। पप्पू आज भी लाड़ला है, पेजर गायब हो गया।

काजल की कोठरी और कोयले की दलाली में काले हाथ, दो विपरीत परिस्थितियां हैं, कोलगेट कांड और 2-G स्पेक्ट्रम ने फिर क्रांति की, और कांग्रेस विक्स फॉर्मूला-44 बनकर रह गई। हरिवंश राय के वंशज एक आईडिया लेकर आए, वॉक एंड टॉक ! What an idea Sir ji ? आज अभिषेक कहाँ वॉक कर रहे हैं, और कहाँ टॉक, ऐश्वर्या ही जाने।।

कभी कुछ मीठा हो जाए, और नवरत्न तेल से मालिश के वाद, अगर कुछ दिन गुजरात में गुज़ार लिए जाएँ, तो क्या बुरा है। बाद में तो रोजी-रोटी के लिए वापस केबीसी में आना ही पड़ता है।

मन की बात के पश्चात देश में सेल्फ़ी-क्रांति आ गई। अब आप देश के प्रमुख सेवक के साथ भी सेल्फी ले सकते हैं। मधुर पलों की सेल्फी तक तो ठीक है, लेकिन खतरों के खिलाड़ी बनकर सेल्फ़ी लेना खतरे से खाली नहीं।।

आज इंसान की कमाई भी ऑन लाइन हो गई है, और खर्चे भी ऑन लाइन ! वह सुबह जागते ही ऑन लाइन हो जाता है। जिओ का फ्री डेटा उसके पास है। जब तक फ़ोन चार्ज होता है, वह भी चार्ज हो जाता है। फिर तो पूरा दिन ऑन लाइन ही निकलना है। दफ़्तर में भी ऑन लाइन, घर में भी ऑन लाइन ! और तो और गाँव में, भीड़ में, मेले में, अकेले में भी ऑन लाइन।

आज बच्चों को स्कूल में

i-lessons दिए जाते हैं। बच्चों को मोबाइल से दूर करना माँ-बाप से दूर करना जैसा है। ब्ल्यू-व्हेल से पीछा छूटा तो और कई खतरनाक मछलियाँ मौजूद है, एंड्राइड के तालाब में। राम नाम की माला जिन बुजुर्गों के हाथ में होनी थी, उनके हाथों में एंड्राइड फ़ोन देख यही कहा जा सकता है, हम 21 वीं सदी में पहुँच गए हैं। अगर गलती से कभी आपके घर नारायण पधार जाएँ, तो वीडियो-शॉट लेना न भूलें।।

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # १५६ – देश-परदेश – गोल गप्पा ☆ श्री राकेश कुमार ☆

श्री राकेश कुमार

(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ  की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” आज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)

☆ आलेख # १५६ ☆ देश-परदेश – गोल गप्पा ☆ श्री राकेश कुमार ☆

गोल गप्पे खाना भी एक कला हैं। हर व्यक्ति के खाने का तरीक़ा अलग अलग होता हैं। कभी गोल गप्पे के ठेले पर चटोरे लोगों को कुछ दूरी से इत्मीनान से देखिए, कसम से मुंह में पानी की बाढ़ ना आ जाय।

आज उपरोक्त समाचार को पढ़ा तो किसी जमाने में इस पर की गई रिसर्च याद आ गई। यदि आप चार लोगों से कम के ग्रुप में है, और खाने की गति धीमी है, फिर तो आप नुकसान में रहेंगे। कुछ लोग तो मुंह के अंदर बहुत दूर तक उंगलियों के सहारे गोल गप्पे को अंदर तक सुरक्षित छोड़ कर, आंनद प्राप्त करते हैं। कुछ अन्य लोग जिनका मुंह कुछ छोटा होता है वो गोल गप्पे को जिह्वा पर रख, एक उंगली से अंदर धकेल देते हैं। कुछ लोग तो टुकड़ा कर गोल गप्पे खा पाते हैं। इनके मुंह का आकार बहुत छोटा होता है, लेकिन ये लोग बड़ी बड़ी बातें खूब करते हैं। इनको देख कर ही “छोटा मुंह, बड़ी बात” जैसी किंवदंती का जन्म हुआ होगा।

गोल गप्पे की ख्याति पूरे विश्व में हो चली हैं। अमेरिका जैसे देश के सबसे बड़े ब्रांड आउटलेट “कास्को” तक ने गोल गप्पों की बिक्री आरंभ कर दी हैं। गोल गप्पे शर्त लगा कर खाए जाने की परंपरा देश में विगत कई दशकों से चल रही है।

जब हम गोल गप्पे खाते थे, तो जब भी ठेले वाले से पूछते थे, हो गए क्या ? उसका एक ही जवाब होता था, बस एक और बचा है, जिसको मीठी चटनी, बिना पानी के ग्रहण किया जाता था। पत्ते की कटोरी से, कागज की प्लेट से चाइना क्ले की प्लेट में गोल गप्पों का रस्वादन के अलावा कई बार ठेले वाले के हाथ से ही सीधा मुख में ही गप्प कर जाते थे।

व्हाट्स ऐप पर गोल गप्पों को लेकर कई भ्रांतियां फैलाई गई, लेकिन गोल गप्पों की खपत दिन दो गुनी और शाम चौगुनी बढ़ रही हैं। इसलिए ऊपर छपी खबर से डरना नहीं है। हमारे कुछ पाठक तो आलेख को मध्य में छोड़ कर गोल गप्पों के ठेले पर भाग गए है, आप क्यों नहीं गए, अभी तक?

© श्री राकेश कुमार

संपर्क – B 508 शिवज्ञान एनक्लेव, निर्माण नगर AB ब्लॉक, जयपुर-302 019 (राजस्थान)

मोबाईल 9920832096

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ८५२ ⇒ क्रोध और अपमान ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “क्रोध और अपमान…“।)

?अभी अभी # ८५२ ⇒ आलेख – क्रोध और अपमान ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

क्रोध और अपमान एक ही थाली के चट्टे बट्टे हैं। क्या कभी ऐसा हुआ है कि किसी ने आपका सम्मान किया हो, और आपको क्रोध आया हो। क्रोध को पीकर किसी का सम्मान भी नहीं किया जा सकता। इंसान और पशु पक्षियों की तरह, शब्द भी अपनी जोड़ी बना लेते हैं। खुदा जब हुस्न देता है, तो नज़ाकत आ ही जाती है। बांसुरी कृष्ण के मुंह लग जाती है और गांडीव अर्जुन के कंधे पर ही शोभायमान होता है। हुस्नलाल के साथ भगतराम ही क्यों ! शंकर प्यारेलाल की जोड़ी नहीं बनी, लक्ष्मीकांत जयकिशन के लिए नहीं बने। जहां कल्याणजी हैं, वहां आनंदजी ही होंगे, नंदाजी अथवा भेरा जी नहीं। धर्मेंद्र हेमा की जोड़ी भी रब ने क्या बनाई है। शब्दों की ये दोस्ती हम नहीं तोड़ेंगे।

करेला और नीम चढ़ा ! भाई तुम आम के पेड़ पर भी चढ़ सकते थे। अगर आपका सार्वजनिक सम्मान हो रहा हो तो आपके मन में लड्डू ही फूटेंगे, आप अपमान के घूंट थोड़े ही पिएंगे। हंसी के साथ खुशी है, वार के साथ त्योहार, आदर के साथ अगर सत्कार है तो नौकरी के साथ धंधा। आसमान में अगर खुदा है तो ज़मीन पर बंदा है। धंदा जो कभी तेज रहा करता था, आजकल मंदा है। सूरज है तो किरन है, चंदा है तो चांदनी है।।

शब्दों में आपस में दोस्ती भी है और दुश्मनी भी। जब दुश्मनी की बात आएगी तो सांप – नेवले, भारत – पाकिस्तान और भारत – चीन का जिक्र होगा। कांग्रेस मोदीजी को फूटी आंखों नहीं सुहाएगी और कंगना कभी शिव सेना को माफ नहीं कर पाएगी। देव – असुर कभी एक थाली में बैठकर खाना नहीं खाएंगे, मोदीजी अब कभी चाय पीने लाहौर नहीं जाएंगे। न नौ मन तेल होगा, न राधा नाचेगी।

जिस तरह बर्फ कभी जमती और कभी पिघलती है, शब्द भी कभी कभी जमते और पिघलते रहते है। ये ही शब्द कभी शोले बन जाते हैं तो कभी शब्दों को सांप सूंघ जाता है। शब्दों की मार से ही कभी किसी को सदमा होता है तो किसी को दमा। शब्द कानों में शहद भी घोल सकते हैं और ज़हर भी। कभी शब्द आंसू बनकर बह निकलते हैं तो कभी आग उगलने लगते हैं।।

शब्द ही भ्रम भी है और ब्रह्म भी। शब्दों का भ्रम जाल ही माया जाल है। शब्द ही जीव है, शब्द ही ब्रह्म। कभी नाम है तो कभी बदनाम। सस्ता शब्द अगर मूंगफली है तो महंगा शब्द बादाम। राम तेरे कितने नाम।

क्या कोई ऐसी रामबाण दवा है इस संसार में कि दुर्वासा को कभी क्रोध न आवे, चित्त की ऐसी स्थिति बन जावे कि मान अपमान दोनों उसमें जगह न पावे। शब्द मार करने के पहले ही पिघल जावे, तो शायद हमें क्रोध ही न आवे। शकर आसानी से पानी में घुल जाती है, सभी रंग मिलकर एक हो जाते। हमारा चित्त बड़ा विचित्र। यहां शब्द ही नहीं पिघल पाते। काश क्रोध और अपमान भी आसानी से द्रवित हो जावे। कितना अच्छा हो यह चित्त, बाल मन हो जावे, सब कुछ अच्छा बुरा, बहुत जल्द भूल जावे। लाख डांटे – डपटे, मारे मां, बच्चा मां से ही बार बार जाकर लिपट जावे।।

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संजय उवाच # ३१४ – बेसुरा होना कठिन है ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के  लेखक  श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है। साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ  हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको  पाठकों का  आशातीत  प्रतिसाद मिला है।”

हम  प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है  इस शृंखला की अगली कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों  के माध्यम से  हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)

☆  संजय उवाच # ३१४ ☆ बेसुरा होना कठिन है… ?

एक संगीतमय आध्यात्मिक आयोजन से लौट रहे थे। वृंद के एक युवा गायक ने किसी संदर्भ में एकाएक कहा, “गुरुजी, बेसुरा गाना बहुत कठिन है।” उसके इस वाक्य पर पूरे वृंद में एक ठहाका उठा। कुछ क्षण तो मैं भी उस ठहाके में सम्मिलित रहा पर बाद में ठहाका अंतर्चेतना तक ले गया और चिंतन में बदल गया। इतनी सरलता से कितनी बड़ी बात कह गया यह होनहार युवक कि बेसुरा होना कठिन है।

जीवन जीने के लिए मिला है। जीने का अर्थ हर श्वास में एक जीवन उत्पन्न करना और उस श्वास को जी भर जीना है। श्वास और उच्छवास भी मिलकर एक लय उत्पन्न करते हैं, अर्थात साँसों में भी सुर है। सुर का बेसुरा होना स्वाभाविक नहीं है। वस्तुत:  ‘बेसुरा होना कठिन है’, इस वाक्य में अद्भुत जीवन-दर्शन छिपा है।  इस दर्शन का स्पष्ट उद्घोष है कि जीवन सकारात्मकता के लिए है।

स्मरण आता है कि जयपुर से वृंदावन की यात्रा में एक सेवानिवृत्त न्यायाधीश से न्यायप्रणाली की विसंगतियों को लेकर संवाद हुआ था। उन्होंने बताया कि न्यायालय में आया हर व्यक्ति प्रथमदृष्टया न्यायदेवता के लिए निर्दोष है। उसे दोषी सिद्ध करने का काम पुलिस का है, व्यवस्था का है ।

महत्वपूर्ण बात है कि न्यायदेवता हरेक को पहले निर्दोष मानता है। इसका एक अर्थ यह भी है कि मनुष्य का मूल सज्जनता है। यह हम ही हैं जो भीतर के सज्जन को दुर्जन करने के अभियान में लगे होते हैं।

जीवन का अभियान सुरीला है, जीवन गाने के लिए है। नदी को सुनो, लगातार कलकल गा रही है। समीर को सुनो, निरंतर सरसर बह रहा है। पत्तों को सुनो, खड़खड़ाहट, एक स्वर, एक लय, एक ताल में गूँज रही है। बूँदों की टपटप सुनो, जो बरसात के साथ जब नीचे उतरती हैं तो एक अलौकिक संगीत उत्पन्न होता है। बादल की गड़गड़ाहट हो या बिजली की कड़कड़ाहट, संगीत का रौद्र रस अवतरित होता है। कभी रात्रि के नीरव में रागिनी का दायित्व उठाने वाले कीटकों के स्वर सुनो। बरसात में मेंढ़क की टर्र-टर्र सुनो।  कोयल की ‘कुहू’ सुनो, मोर की ‘मेहू’ सुनो। प्रकृति में जो कुछ सुनोगे वह संगीत बनकर कानों में समाएगा। शून्य में, निर्वात में जो कुछ अनुभव हो रहा है, वह संगीत है। तुम्हारे मन में जो गूँज रहा है, उसकी अनुगूँज भी संगीत है। हर तरफ राग है, हर तरफ रागिनी सुनाई पड़ रही है। यह कल्लोल है, यह नाद है, यही निनाद है।

इन सुरों को हम भूल गए। हमारे कान आधुनिकता और शहरीकरण के प्रदूषण से ऐसे बंद हुए कि प्रकृति का संगीत ही विस्मृत हो चला। हमने जीवन में प्रदूषण उत्पन्न किया, हमने जीवन में कर्कशता उत्पन्न की, हमने जीवन में कलह उत्पन्न किया, हमने जीवन में असंतोष उत्पन्न किया, हमने जीवन में अनावश्यक संघर्ष उत्पन्न किया। इन सबके चलते सुरीले से बेसुरे होने की होड़-सी लग गई।

कभी विचार किया कि इस होड़ में क्या-क्या खोना पड़ा?  परिवार छूटा, आपसी संबंध छूटे, संतोष छूटा, नींद छूटी, स्वास्थ्य का नाश हुआ। इतना सब खोकर कुछ पाया भी तो क्या पाया,…बेसुरा होना!.. सचमुच बेसुरा होना कठिन है।

संसार सुरीला है। जीवन के सुरीलेपन की ओर लौटो। तुम्हारा जन्म सुरीलेपन के लिए हुआ है।  सुरमयी संसार में सुरीले बनो। यही तुम्हारा मूल है, यही तुम्हारी प्रकृति है, यही तुम्हारी संस्कृति है।

स्मरण रहे, सुरीला होना प्राकृतिक है, सुरीला होना सहज है, सुरीला होना सरल है, बेसुरा होना बहुत कठिन है।

© संजय भारद्वाज 

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ 6 नवम्बर से मार्गशीर्ष साधना आरम्भ होगी। इसका साधना मंत्र होगा – ॐ नमो भगवते वासुदेवाय 🕉️ 

🕉️ इसके साथ ही हम श्रीमद्भगवद्गीता का पारायण करेंगे। इसमें 700 श्लोक हैं। औसत 24 श्लोक या उनके अर्थ का दैनिक रूप से पाठ करेंगे 💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं।

≈ संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ८५१ ⇒ समय सीमा ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “समय सीमा…“।)

?अभी अभी # ८५१ ⇒ आलेख – समय सीमा ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

समय को भी क्या कोई, कभी बांध पाया है। समय अपने आप में सीमातीत भी है और समयातीत भी। हमें समय थोक में नसीब नहीं होता, टुकड़ों टुकड़ों में परोसा जाता है समय हमें। समय अपनी गति से चलता रहता है, हम समय देखते ही रह जाते हैं, और समय हमसे आगे निकल जाता है। समय की गति तो इतनी तेज है कि वह पलक झपकते ही गुजर जाता है। बहता पानी है समय।

हमें अक्सर लगता है, कि हमारे पास बहुत समय है, लेकिन हम समय को न तो ताले में ही बंद कर सकते हैं, और न ही उसे किसी बैंक में फिक्स्ड डिपॉज़िट करवा सकते हैं। समय वह जमा राशि है, जिसे जमा करो तो ब्याज पर ब्याज लगने लगता है, और जो मूल है, वह भी खतरे में पड़ जाता है।।

समय को न तो हम बचा सकते और न ही खर्च कर सकते, बस केवल इन्वेस्ट कर सकते हैं। पैसे की ही तरह, अगर समय का भी सदुपयोग किया जाए, तो समय अच्छा चलता है। लोग अक्सर हमसे थोड़ा समय मांगा करते हैं। क्या उनके पास अपना समय नहीं है। क्या करेंगे, वे हमारा समय लेकर। हम भी उदार हृदय से अपना थोड़ा समय उन्हें दे भी देते हैं और फिर शिकायत करते हैं, फालतू में हमारा समय खराब कर दिया। मानो, समय नहीं, शादी का सूट हो। जिसे आप कम से कम ड्राइक्लीन तो करवा सकते हैं। खराब समय का आप क्या कर सकते हैं।

क्या हुआ, अगर उसने आपका थोड़ा सा समय खराब कर दिया। आपने जिंदगी में कौन सा समय का अचार डाल लिया। समय को तो खर्च होना ही है। आदमी पहले समय खर्च करके पैसे कमाता है और फिर खराब समय के लिए पैसे बचाकर रखता है। क्या पैसे बचाने से अच्छा समय आता है। कुछ भी कहो, खराब समय में पैसा ही काम आता है।।

पैसा बचाया जाए कि समय बचाया जाए ! समय तो निकलता ही चला जा रहा है। अच्छे समय में समझदारी इसी में है, पैसा कमाया जाए और उसे सही तरीके से इन्वेस्ट किया जाए। समय तो पंछी है, समय का पंछी उड़ता जाए ..!!

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ८५० ⇒ अवतार ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “अवतार…“।)

?अभी अभी # ८५० ⇒ आलेख – अवतार ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

बहुत पहले आकाशवाणी पर एक भजन सुना था, जिसके बोल कुछ इस प्रकार थे ;

पतितों को उबारा है तुमने

भक्तों को उबारो तो जानें।

हम भूल गए, भगवन तुमको

पर तुम न भुलाओ, तो जानें।।

उबारना, मतलब तारना! जिसका जन्म ही किसी को तारने के लिए हुआ हो, वह अवतार। आप इसे, अब तार, भी कह सकते हैं। लेकिन अब अवतार नहीं होते इसलिए पतितों को कोई तार नहीं रहा है। क्या पतितों को मारा नहीं जा सकता। ऐसा प्रतीत होता है, जिन पतितों को पहले कभी अवतारों ने तारा भी होगा, वे तैर कर इस भव सागर में वापस आ गए। अब हमें तारो, नहीं तो मारो।

अवतार का एक अर्थ और होता है, जो अवतरित हुआ, वह अवतार! जन्म तो खैर अवतारों का भी होता है लेकिन उन्हें प्रकट होना कहते है। भए प्रगट कृपाला, दीनदयाला कौशल्या हितकारी। उनकी तिथि मनाई जाती है, तारीख नहीं, राम नवमी। अवतार जो करते हैं, वह उनकी लीला होती है। कृष्ण जन्माष्टमी। वसु देवकी की आठवीं संतान अष्टमी को कंस के कारागृह में पैदा हुई। अवतारों का निर्वाण दिवस अथवा पुण्यतिथि नहीं मनाई जाती। जो अवतरित होते हैं, वे कालांतर में अपनी लीला समेट लेते हैं। आम और खास मानव शरीर धारी महान आत्माओं, विभूतियों में, सबके जन्म दिवस और पुण्य तिथि दोनों मनाई जाती है।।

पापी, दुष्ट और अधम में आसुरी शक्ति होती है, इसलिए वह सज्जनों की तुलना में अधिक शक्तिशाली होता है। जब साधु और शैतान का संतुलन गड़बड़ा जाता है, शैतान, साधु पर भारी पड़ने लगता है, तब संतों की रक्षा के लिए, ईश्वर को स्वयं अवतार लेना पड़ता है। केवल भक्ति से भी भगवान नहीं मिलते, शत्रुता से भी इश्वर को प्राप्त किया जा सकता है, क्योंकि उसके बारे में सुना है, वह दुष्टों को भी मारता नहीं, तारता है।

एक ओर राम नाम की लूट मची है, भक्त राम राम भजते, राम में समा रहे हैं, तो दूसरी ओर दैत्यों और असुरों की लाइन लगी है। हम पापी, अपराधी, अधम, नीच है, हमें भी मारो, सुना है आपके हाथों से मरने पर मुक्ति मिलती है। आप मारते नहीं, तारते हो। मुक्ति पाने का आसान रास्ता। गंगा में डुबकी, सभी पापों से मुक्ति। कुंभ में स्नान, अमृत कुंड में स्नान। दान – पुण्य से स्वर्ग की प्राप्ति, कठिन तपस्या से मनचाहे वर की प्राप्ति। खोने को कुछ नहीं। कोई खाली हाथ नहीं जाता। वह दाता, हम भिखारी।। हम पतित, तुम पतित पावन!

पतितों का तो उद्धार करते हो, और हम भक्तों को कायदे कानून सिखाते हो। गरुड़ पुराण से धौंस जमाते हो। नर्क, दोजख और जहन्नुम का डर और स्वर्ग, जन्नत और वैकुंठ का लालच। करुणा निधान का दण्ड विधान भी क्या कोई बुद्धिमान समझ पाया है।

वह भगवान है, सभी ऐश्वर्यों का स्वामी! वो जिस पर मेहरबान, वो पहलवान। कार्तिक मास कथाओं का, दान पुण्य और स्वयं के कल्याण का मास होता है।

घर बैठे, टीवी पर भागवत आई, तो हमने भी बहती गंगा में हाथ धो लिए। आरती चल रही है भागवत जी की। भागवत भगवान की है आरती। पापियों को पाप से है तारती। घर में जगदीश जी की आरती भी देखिए। मैं मूरख खल कामी, पाप हरो देवा। मैं समझदार, बुद्धिमान, पढ़ा लिखा आदमी कहां जाऊं? Go to hell. भगवान हैं हम, सुप्रीम कोर्ट के भी बाप। हमारा न्याय, ईश्वर का न्याय है। कोई अजामिल अपने पुत्र का नाम नारायण रख ले, और प्राण त्यागते वक्त उसे पुकारे, तो हम स्वयं चले आते हैं। आ जाते है राम, कोई बुला के देख ले।।

अच्छा है, अब अवतार नहीं होते। अपनी करनी का फल यहीं भोगो। कर लो कितने भी छल कपट, आपकी कॉन्फिडेंशियल फाइल ऊपर तैयार हो रही है। वहां कोई सोर्स अथवा रिश्वत काम नहीं आती। कर लो, जितना दान पुण्य का पाखंड करना है, जैसा करा है, वैसा ही भरना भी होगा।

आज के लोकतंत्र के अवतार संतों को तारने और दुष्टों को मारने आए हैं। काला हिट, जहरीला flit और कानून का शिकंजा ही काफी है इन इंसानियत के दुश्मन नीच, जहरीले कीड़े मकोड़े, सपोलों और बिच्छुओं के लिए। हे भगवान! हमारी भी सुन ले। दुष्टों को तार मत, उनको तो तू मार ही दे। कहीं ये रक्तबीज, अथवा भस्मासुर आगे चलकर, पुन: कोरोना बनकर मानवता को ही नष्ट ना कर दें।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य #३०१ ☆ सम्बन्ध बनाम मर्यादा… ☆ डॉ. मुक्ता ☆

डॉ. मुक्ता

(डा. मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य” के माध्यम से  हम  आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी की मानवीय जीवन पर आधारित एक विचारणीय आलेख सम्बन्ध बनाम मर्यादा। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की  लेखनी को  इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें।) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य  # ३०१ ☆

☆ सम्बन्ध बनाम मर्यादा… ☆

सम् + बन्ध अर्थात् समान रूप से बंधा हुआ… जहां समता हो; समानता हो; स्वैच्छिक बंधन हो; एक-दूसरे के प्रति सर्वस्य न्यौछावर करने का जज़्बा हो; मर-मिटने का संजीदा भाव हो; पहले आप, पहले आप की शालीनता हो; दूसरों में अच्छाई व गुण तलाशने का प्रयास हो। सो! यह संबंधों में प्रगाढ़ता स्थापित करने के लिए, दूसरों के दु:ख से द्रवित होकर, उन्हें कष्ट से मुक्ति प्रदान करने व करवाने का भाव अहम् भूमिका अदा करता है।

परंतु यह सब तो गुज़रे ज़माने की बातें हो गई हैं।   आजकल तो सब संबंध स्वार्थ पर आधारित हैं। हम धन-सम्पत्ति व रुतबा देखकर उसकी ओर आकर्षित होते हैं, क्योंकि आज का युग प्रतिस्पर्द्धा का युग है। हर इंसान अधिकाधिक धन कमाने हेतु मर्यादा को ताक पर रख, सीमाओं को लांघ कर आगे बढ़ जाना चाहता है। पैसे के लिए मानव सब संबंधों को दरक़िनार कर केवल अपनी उन्नति व स्वार्थ-पूर्ति के बारे में सोच-विचार करता है और राह में आने वाली समस्त बाधाओं को रौंदता हुआ लक्ष्य-प्राप्ति की ओर अग्रसर होता है। वह संबंधों की गरिमा व अहमियत को नकार बेतहाशा आगे बढ़ता जाता है और बीच राह आने वाली बाधाओं व किसी के प्रतिरोध करने पर किसी की हत्या करने में भी गुरेज़ नहीं करता।

चलिए! हम दृष्टिपात करते हैं उस मन:स्थिति पर… जब मानव में स्वयं को सर्वश्रेष्ठ सिद्ध करने की भावना बलवती होती है। उस स्थिति में वह अच्छे-बुरे व उचित-अनुचित के भाव का तिरस्कार कर, अपनी नज़रें लक्ष्य पर केंद्रित कर उस ओर अग्रसर होता है। संवाद संबंधों की जीवन-रेखा है और संबंध सेतु हैं… जीवन का मूलाधार हैं। इनके अभाव में धरा पर जीवन की कल्पना अधूरी है… सर्वथा असंभव है। परंतु आजकल तो पति-पत्नी दाम्पत्य बंधन में बंध, एक छत के नीचे रहते हुए भी अजनबी-सम व्यवहार करते हैं; एक-दूसरे से बेखबर जीवन पथ पर अग्रसर होते हैं; विवशता से अपना जीवन ढोते हैं। इस कारण संयुक्त परिवार- व्यवस्था चरमरा गयी है, जिसका सबसे अधिक ख़ामियाज़ा बच्चों व वृद्धों को भुगतना पड़ रहा है। स्नेह व सुरक्षा के अभाव में बच्चों के कदम अपराध जगत् की ओर प्रवृत्त हो रहे हैं, जो अपने कुकृत्यों से समाज व देश की जड़ों को खोखला कर रहे हैं।

यदि हम संबंधों का वर्गीकरण करें, तो कुछ संबंध जन्मजात होते हैं– जैसे माता-पिता भाई-बहन व अन्य परिवारजन..जिन से हम जन्म से ही रूबरू हो जाते हैं तथा इसमें हम तनिक भी हस्तक्षेप नहीं कर सकते। हमें न चाहते हुए भी उनसे निबाह करना पड़ता है। शायद! यह माता-पिता द्वारा प्रदत्त उपहार स्वरूप होते हैं, जिनके प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करना हमारा कर्तव्य नहीं, दायित्व होता है। हमें न चाहते हुए भी उन संबंधों को सहर्ष स्वीकारना व अहमियत देनी पड़ती है। कई बार बच्चे माता-पिता की ग़लतियों का अंजाम भुगतते हुए, आजीवन एकांत की त्रासदी झेलने को विवश हो जाते हैं तथा दायित्व-वहन करते हुए अपने जीवन का स्वर्णिम काल नष्ट कर देते हैं।

मानव एक सामाजिक प्राणी है और संबंध स्थापित करना उसकी मजबूरी होती है, क्योंकि अकेले रह कर जीवन जीने की कल्पना करना बेमानी है। तीसरे स्वार्थ के संबंध होते हैं, जिन्हें मानव अपनी खुदगर्ज़ी के लिए स्थापित करता है और उसका प्रयोग वह स्वार्थ-सिद्धि हेतु सीढ़ी के रूप में करता है। उस स्थिति में वह दूसरे को हानि पहुंचाने, यहां तक कि उसकी हत्या करने में तनिक भी संकोच नहीं करता। ऐसे संबंधों का

आजकल संसार में जाल बिछा हुआ है और हर इंसान मुखौटा धारण कर, दोहरा जीवन जीने को विवश है। यह संबंध अस्थायी होते हैं और लक्ष्य-प्राप्ति के पश्चात् अस्तित्वहीन हो जाते हैं; समाप्त हो जाते हैं…जैसे नज़रों से ओझल होने पर, व्यक्ति मन से भी उतर जाता है…बहुत दूर चला जाता है।

मुझे याद आ रहे हैं, ऐसे बहुत से क़िरदार, जो माता- पिता द्वारा प्रदत्त संबंधों की सज़ा आज तक भुगत रहे हैं। पुत्र की लालसा में सात-सात कन्याओं का भरा-पूरा परिवार जुटा लेने का प्रचलन आज भी बदस्तूर जारी है। पहले लोग यह चिंता नहीं करते थे  कि वे अपने बच्चों को धरोहर रूप में इतना बड़ा कर्ज़ अर्थात् उत्तरदायित्व सौंप कर जा रहे हैं, जिसका भुगतान उन्हें तथा आगामी पीढ़ियों को आजीवन अपने हाथों अपने सपनों को होम करके चुकाना पड़ेगा। शायद! इस ओर उनका लेशमात्र ध्यान भी नहीं जाता कि वह मासूम बच्चा कब बड़ा होगा और उसके आत्मनिर्भर होने तक वे जीवित भी रहेंगे या सारा बोझ उसके कंधों पर ज़बरदस्ती लाद कर, इस दुनिया से रुख्सत हो जाएंगे और वह नादान उनकी भयंकर-भीषण कारस्तानियों का फल आजीवन भुगतने को बाध्य होगा। क्या नाम देंगे आप ऐसे माता-पिता को, जन्मदाता…जो सृष्टि- सृजन में भरपूर योगदान देकर अपनी संतान को नरक में अकारण झोंक देते हैं।

यदि हम इसकी व्याख्या करें, तो उनके इस कर्म को भी अक्षम्य अपराध के रूप में स्वीकार किया जाना चाहिए और ऐसे अंधविश्वासी व स्वार्थी माता-पिता के लिए भी कठोर सज़ा व दण्ड का प्रावधान होना चाहिए। यह देखकर अत्यंत दु:ख होता है कि रिश्तों से अनजान, एक नवजात शिशु को न जाने कितने अटूट रिश्तों-बंधनों में बांध दिया जाता है… मानो उसे चक्रव्यूह में जकड़ दिया जाता है; जहां से मुक्ति पाने का कोई विकल्प-उपाय नहीं होता। वह निरीह औरत की भांति उस अपराध की सज़ा आजीवन भुगतने को विवश होता है, जो उसने किया ही नहीं और न ही समाज द्वारा प्रदत्त होता है–उसे अपना पक्ष रखने का अधिकार। इन परिस्थितियों में वह लड़का हो या लड़की, उसे अपना जीवन प्रतिदान रूप में देना पड़ता है…अपने सपनों-अरमानों को अपने हाथों रौंद कर; उनकी सहर्ष बलि देकर, अपने समस्त जीवन को बहन-भाइयों व माता-पिता के पालन-पोषण हेतु झोंकना पड़ता है। यहां लड़के- लड़की में भेद नहीं होता, क्योंकि यह मसला है, माता-पिता द्वारा की गई ग़लतियों का परिणाम भुगतने का..यहां तक तो समाज में समानाधिकार व्यवस्था लागू है…जिसमें कोई भेदभाव नहीं है। वैसे तो आजकल वृद्धावस्था में माता-पिता के भरण- पोषण का दायित्व, पुत्र न होने की स्थिति में पुत्री को वहन करना लाज़िमी है। ठीक ही तो है, अब तो उसे संपत्ति में समानाधिकार प्राप्त है। अधिकार व कर्त्तव्य का चोली-दामन का साथ है। एक के बिना दूसरा अस्तित्वहीन है। वैसे तो यह संतान का नैतिक दायित्व भी है।

हां! आवश्यकता है, माता-पिता को अपनी सोच बदलने की…सो! अब उन्हें बेटी के घर का अन्न-जल ग्रहण करने की परंपरा का त्याग करना होगा। वैसे भी बड़े-बड़े शहरों में अक्सर माता-पिता बेटियों के घर में रहते हैं। इसका मुख्य कारण है…बेटों का विदेशों में नौकरी करना और माता-पिता को पाश्चात्य  संस्कृति का रास न आना। अक्सर सिंगल चॉइल्ड होने के कारण भी बेटियों के लिए इस दायित्व को निर्वहन करना अनिवार्य हो जाता है।

आधुनिक युग में महिलाएं नौकरी करती हैं और दोहरा जीवन जीती हैं। परन्तु कहां बदल पाए हैं, हम अपनी दकियानूसी सोच; कहां त्याग पाए हैं रूढ़ियों, परंपराओं व प्राचीन मान्यताओं को… जिसका स्पष्ट प्रमाण है…पति व परिवारजनों की अपेक्षाओं में तनिक भी परिवर्तन न आना…जिसका संबंध उनकी सोच में परिवर्तनशीलता से है। परंतु वह सर्वथा असंभव है…ऐसा तो कभी हो नहीं सकता। भले ही हम भौतिक दृष्टि से संपन्न हो गए हैं, परंतु हमारी सोच, विचारधारा व मानसिक धरातल सदियों पहले जैसा है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण है…कन्या पक्ष के लोगों का वर-पक्ष के लोगों के सम्मुख ता-उम्र नत-मस्तक रहना; उनकी अप्रत्याशित इच्छाओं व मांगों की लंबी फेहरिस्त की पूर्ति करना, भले ही वे उस में सक्षम न हों। इतना ही नहीं, उनके माता-पिता और उनकी आगामी पीढ़ी के साथ न चाहते हुए भी संबंध-निर्वाह करना; उनकी नियति, मजबूरी व विवशता बन जाती है…. यहां तक कि मरणोपरांत मृत्युभोज व कफ़न जुटाना भी वधु के माता-पिता का ही दायित्व होता है। क्या हम चाह कर भी इन प्राचीन परंपराओं से भविष्य में भी मुक्ति पाने में समर्थ हो सकेंगे?

परंतु चंद महिलाएं अपनी संस्कृति को तज, ग़लत राहों पर चल पड़ी हैं। देर रात तक क्लबों में सिगरेट के क़श लगाना, जुआ खेलना तथा नशे की हालत में लड़खड़ाते हुए लौटना उनकी दिनचर्या में शामिल है। अपहरण, फ़िरौती, हत्या व धन-सम्पदा पाने के लिए विवाह रचाना, पति व परिवारजनों पर दहेज की मांग का इल्ज़ाम लगा जेल भिजवाना–उनके शौक में शामिल है’, जिसमें महिला के माता-पिता का भी भरपूर योगदान रहता है। वे ‘तू नहीं, और सही’ और खाओ पीओ, मौज उड़ाओ’ में विश्वास रखने लगी हैं …वे हर पल को खुशी से भरपूर जी लेना चाहती हैं। सो! संबंध-सरोकार अंतिम सांसें ले रहे हैं… मरने के कग़ार पर हैं। लिव-इन के प्रचलन के कारण परिवार टूट रहे हैं; सिंगल पेरेंट की संख्या बढ़ रही है, जिसका सबसे अधिक ख़ामियाज़ा बच्चे भुगत रहे हैं तथा अपराध-जगत् की ओर प्रवृत्त हो रहे हैं। सो! हमें प्रचलित मान्यताओं व अंधविश्वासों से मुक्ति पाने के लिए समाज में विवाह-रूपी संस्था को पुन: जीवन-दान प्रदान करना होगा। लिंग-भेद को नकारना होगा, ताकि तथाकथित माता-पिता ऐसे भीषण ग़ुनाह न करें और बच्चों को उनके कर्मों की सज़ा आजीवन न भुगतनी पड़े और वे अपने सपनों को साकार करने व जीवन को अपने ढंग से जीने को स्वतंत्र हों।

आइए! हम प्राचीन परंपराओं को तोड़, सामाजिक बुराइयों को दफ़न कर समूल नष्ट कर दें तथा नयी सोच, नयी उमंग व नयी तरंग के साथ, नवीन युग में पदार्पण करें, जहां लघुता-प्रभुता का भेद न हो और सब अपने कर्त्तव्य-दायित्वों का सहर्ष वहन करें। अपनी सीमाओं को लांघ, जीवन में मर्यादा का अतिक्रमण न करें, ताकि त्याग का सर्वोपरि भाव सदैव बना रहे। यही है मानव जीवन की अपेक्षा व पराकाष्ठा…जिसे धारण कर हम मासूमों को आत्महत्या करने से रोक पाएंगे…जो स्वयं को इन दायित्वों के चक्रव्यूह में फंसा हुआ पाते हैं और वे पलायनवादिता की राह पर चल पड़ते हैं, क्योंकि उन्हें अपने जीवन का अंत करने से सुगम, कोई दूसरा उत्तम उपाय-विकल्प दिखाई नहीं पड़ता।

परंतु हमें स्मरण रखना चाहिए कि मानव जीवन अनमोल है, जो हमें चौरासी लाख योनियों की यात्रा करने के पश्चात् प्राप्त होता है। सो! संबंधों को शाश्वत बनाए रखने के लिए दरक़ार है… स्नेह, सहयोग, समर्पण व त्याग की; प्रबल इच्छा-शक्ति, एकाग्रता व अटल विश्वास की… इन्हें जीवन में अपना कर, जहां हम संबधों व सरोकारों को जीवंतता प्रदान कर, समाज व देश को, समुन्नत व समृद्ध बना सकेंगे और स्नेह, प्रेम, सहयोग, सौहार्द, समन्वय व सामंजस्यता द्वारा समरसता का साम्राज्य स्थापित करने में समर्थ हो सकेंगे।

अंतत: मैं यह कहना चाहूंगी कि संबंध….अर्थात् यदि हम समान रूप से बंधे रहेंगे और मर्यादा व सीमाओं का उल्लंघन-अतिक्रमण नहीं करेंगे, तो ग़िले-शिक़वे व शिकायतें स्वत: समाप्त हो जाएंगी… हम अपने-अपने द्वीप से बाहर निकल, सौहार्दपूर्ण ढंग से अपना जीवन बसर कर सकेंगे। स्वार्थहीन संबंध स्थायी होते हैं, क्षणिक नहीं…न उनमें कोई वाद-विवाद व संघर्ष होता है; न ही प्रतिदान की इच्छा व आकांक्षा। सो! यही है संबंधों के स्थायित्व का मात्र उपादान, जिससे मर्यादा भी सुरक्षित रह सकेगी।।

●●●●

© डा. मुक्ता

माननीय राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत, पूर्व निदेशक, हरियाणा साहित्य अकादमी

संपर्क – #239,सेक्टर-45, गुरुग्राम-122003 ईमेल: drmukta51@gmail.com, मो• न•…8588801878

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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