हिन्दी साहित्य – कविता ☆ ये वक्त नहीं…! ☆ डॉ. रामेश्वरम तिवारी ☆

डॉ. रामेश्वरम तिवारी

संक्षिप्त परिचय

  • हिंदी-प्राध्यापक(सेवानिवृत्त) महारानी लक्ष्मीबाई शासकीय कन्या स्नातकोत्तर महाविद्यालय, भोपाल  (म.प्र).
  • नई दुनिया, दैनिक भास्कर, वीणा, हंस, धर्मयुग, कादम्बिनी आदि पत्र-पत्रिकाओं में कविता और लघुकथाएँ प्रकाशित। पुस्तकः कविता के ज़रिए,  मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी के सौजन्य से प्रकाशित।

आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण कविता – ये वक्त नहीं…!

☆ ॥ कविता॥ ये वक्त नहीं…! ☆ डॉ. रामेश्वरम तिवारी

ये वक्त नहीं सच बोलने का,

ढोल  की  पोल  खोलने का।

*

शहरों में  भेड़िए  घुस आए हैं,

रास्ता बचा नहीं है बचने का।

*

गिद्ध नज़रें गढ़ाए ताक में बैठे,

ठौर निरापद नहीं है रहने का।

*

सियासत  कोठे का पेशा हुई,

सबको इंतज़ार है बिकने का।

*

जिस्मों की नुमाइश हो रही है,

मेला  लगा इज़्ज़त बेचने का।

*

लोग अपने गुणगान में लगे हैं,

सब्र  नहीं दूसरे को सुनने का।

© डॉ. रामेश्वरम तिवारी

सम्पर्क – सागर रॉयल होम्स, होशंगाबाद रोड, भोपाल-462026

मोबाईल – 8085014478

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – चुप्पियाँ – (२५) ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – चुप्पियाँ – (२५  ? ?

तुम्हारा चुप

मेरे चुप से

अलग है,

मुझे लगा

वह रक्त की लालिमा

और जल की प्रवहनीयता पर

प्रश्न उठा रहा है।

?

© संजय भारद्वाज   

(2.9.2018, प्रातः 10:03 बजे)

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

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अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ मनोज साहित्य # २२६ – ये वसुंधरा हरी-भरी… ☆ श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” ☆

श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं सजग अग्रज साहित्यकार श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” जी  के साप्ताहिक स्तम्भ  “मनोज साहित्य ” में आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “ये वसुंधरा हरी-भरी…। आप प्रत्येक मंगलवार को आपकी भावप्रवण रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे।

✍ मनोज साहित्य # २२६ ☆

☆  ये वसुंधरा हरी-भरी…  श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

ये वसुंधरा हरी-भरी, कितनी हसीन है।

यह जन्म भूमि है मेरी, पावन जमीन है।।

*

देवों की जन्म भूमि यह,शत्-शत्  करें नमन।

माँ भारती की स्तुति पर, हमको यकीन है।।

*

शुभ संस्कार सभ्यता है, यह संस्कृति महान।

राम-कृष्ण-बुद्ध की धरा, भारत कुलीन है।।

*

हिमालय हमारा रक्षक,शिव-शक्ति की कृपा।*

माँ के चरण पखारता, सागर प्रवीन है।

*

मौसम बिखेरे रँग यहाँ, नाचे मन मलंग।

उमंगें हरेक पर्व में, हर भक्त लीन है।।

*

है देश यह सपेरों का, किसी ने यह कहा।

बदला है देखिए अभी, कितना नवीन है।।

*

निर्माण का संकल्प ले, बढ़ते कदम रहे।

प्रगतिशील है हरेक पथ, उन्नत मशीन है।।

*

दुश्मन पड़ोसी में बसे, हैं हर समय लड़े।

आतंकी पाक को अभी, लड़ाता चीन है।।

*

ब्रम्होस को हमने चला, जग को दिखा दिया।

हिन्दुस्ताँ बदल चुका है, शत्रु-दहन-सीन है।।

©  मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

23/6/26

संपर्क – 58 आशीष दीप, उत्तर मिलोनीगंज जबलपुर (मध्य प्रदेश)- 482002

मो  94258 62550

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ लेखनी सुमित्र की # २९१ – सूरज नहीं दिया…२ ☆ स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र” ☆

स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र”

(संस्कारधानी  जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर डॉ. राजकुमार “सुमित्र” जी  को सादर चरण स्पर्श । वे सदैव हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते थे। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया।  वे निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणास्रोत हैं। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता –  सूरज नहीं दिया…२ ।)

✍ साप्ताहिक स्तम्भ – लेखनी सुमित्र की # २१० ☆

☆ –  सूरज नहीं दिया ☆ स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र” ✍

मेरे बच्चो !

इस जमाने में

खुशहाली का रास्ता

बहुत तंग है.

आम आदमी के लिये बंद है,

सिफारिश के बिना योग्यता अपंग है।

यकीन करो,

मैं तुम्हारे लिये

सब सुख मुहैया करना चाहता हूँ,

एक सही आदमी की तरह जीकर

मरना चाहता हूँ।

काश!

शेष वर्षों में ऐसा हो पाए,

हर आदमी

जरूरत की चीजें पाए।

बहरहाल

मैं अपने पास

नहीं फटकने दूँगा हताशा, निराशा,

नहीं चाहिये सोने के कटोरे में दूधभात,

हड्डियों को चन्दन सा घिसकर

जुटा ही लूँगा बताशा ।

और जब

उम्मीद का बताशा चुकेगा

यानी जिन्दगी का बताशा घुलेगा

तब मेरे पौरुष का

आखिरी पृष्ठ खुलेगा,

जब सुलग रही होगी चिता

तब तुम कह सकोगे कि हमारा पिता

दूसरों के लिये भी जिया था

वो सूरज नहीं दिया था।

 

स्व डॉ. राजकुमार “सुमित्र” 

साभार : डॉ भावना शुक्ल 

112 सर्राफा वार्ड, सिटी कोतवाली के पीछे चुन्नीलाल का बाड़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ अभिनव गीत # २८८ – “भूल चुके लोगों की स्मृति में…” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी ☆

श्री राघवेंद्र तिवारी

(प्रतिष्ठित कवि, रेखाचित्रकार, लेखक, सम्पादक श्रद्धेय श्री राघवेंद्र तिवारी जी  हिन्दी, दूर शिक्षा, पत्रकारिता व जनसंचार,  मानवाधिकार तथा बौद्धिक सम्पदा अधिकार एवं शोध जैसे विषयों में शिक्षित एवं दीक्षित। 1970 से सतत लेखन। आपके द्वारा सृजित ‘शिक्षा का नया विकल्प : दूर शिक्षा’ (1997), ‘भारत में जनसंचार और सम्प्रेषण के मूल सिद्धांत’ (2009), ‘स्थापित होता है शब्द हर बार’ (कविता संग्रह, 2011), ‘​जहाँ दरक कर गिरा समय भी​’​ ( 2014​)​ कृतियाँ प्रकाशित एवं चर्चित हो चुकी हैं। ​आपके द्वारा स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम के लिए ‘कविता की अनुभूतिपरक जटिलता’ शीर्षक से एक श्रव्य कैसेट भी तैयार कराया जा चुका है। आज प्रस्तुत है आपका एक अभिनव गीत भूल चुके लोगों की स्मृति में...”।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ # २८८ ☆।। अभिनव गीत ।। ☆

☆ “भूल चुके लोगों की स्मृति में...” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी 

जीवन भर कर्मठता के

पर्याय रहे पापा ।

एक अबूझा किन्तु सार्थक

न्याय रहे पापा ॥

 

किसी एक स्थिर पड़ाव

पर ठहर नहीं पाये ।

सदा खोज में लगे रहे

हम समझ नहीं पाये ।

 

उनका हर गतिशील कदम

था चौपाई जैसा –

लोगों की नजरो में पर

असहाय रहे पापा ॥

 

सुबह किसी नदिया के तट से

लगभग आर्द्र दिखें ।

जन जन के विस्तृत ललाट पर

बस सौहार्द लिखें ।

 

जीवन के व्यापार जगत के

थे सदस्य जैसे –

लोगों को सुख देने का

व्यवसाय रहे पापा ॥

 

किसी भी जगह भरी भीड़ में

पहचाने जाते ।

भूल चुके लोगों की स्मृति में

फिर फिर आते ।

 

कर्मों की मोटी किताब जो

पढ़नी है सबको –

उसी ग्रंथ के छोटे से अध्याय

रहे पापा ॥

         

©  श्री राघवेन्द्र तिवारी

27-06-2026

संपर्क​ ​: ई.एम. – 33, इंडस टाउन, राष्ट्रीय राजमार्ग-12, भोपाल- 462047​, ​मोब : 09424482812​

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २७० ☆ # “यह बरसात का मौसम…” # ☆ श्री श्याम खापर्डे ☆

श्री श्याम खापर्डे

(श्री श्याम खापर्डे जी भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी हैं। आप प्रत्येक सोमवार पढ़ सकते हैं साप्ताहिक स्तम्भ – क्या बात है श्याम जी । आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “यह बरसात का मौसम…”।

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २७० ☆

☆ # “यह बरसात का मौसम…” # ☆ श्री श्याम खापर्डे ☆

यह बरसात का मौसम

यह ठंडी हवाएं

यह तपती हुई धरती

घटाओं को बुलाएं 

 

तपता हुआ कण-कण है

व्याकुल तन मन है

दीवानें मेंघों को

धरती बुला रही है हर क्षण है

दीवानेपन की तड़प किसको बताएं

 

कागज की कश्ती में

खोया हुआ बचपन है

फुवारों की मस्ती में

डूबा हुआ यौवन है

अंतिम प्रहर में

यह यादें कितना रुलाएं 

 

यह पानी की बूंदे

सब है आंखें मूंदे

भीगती तरुणाई

अपने प्रीतम को ढूंढें

प्रीतम की दूरी

अब उसको कितना सताएं

 

यह मेघों की आंख  मिचोली

धरती से ठिठौली

कहीं भीषण गर्मी

तो कहीं वर्षा की होली

वर्षा है जीवन

अब कैसे समझाएं

 

यहां तो मर गया है

लोगों के आंखों का पानी

हर तरफ देखो

बस यही है कहानी

हर शख्स दूसरे को

कदम कदम पर आजमाएं

 

यह बरसात का मौसम

यह ठंडी हवाएं

यह तपती हुई धरती

घटाओं को बुलाएं/

© श्याम खापर्डे 

फ्लेट न – 402, मैत्री अपार्टमेंट, फेज – बी, रिसाली, दुर्ग ( छत्तीसगढ़) मो  9425592588

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – चुनाव ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – चुनाव  ? ?

कुछ नहीं देती भावुकता,

कुछ नहीं देती कविता,

जीने का सामान करना सीखो,

जीवन में सही चुनाव करना सीखो,

एक पलड़े पर दुनियादारी रखी,

दूसरे पर कविता धर दी,

सही चुनने की सलाह सुन ली

और मैंने अपने लिए

कविता चुन ली..!

?

© संजय भारद्वाज   

(प्रात: 9:24 बजे, 23 जून 2021)

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कविता # ३६ – कविता – पिता… ☆ प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर ☆

डॉ.राजेश ठाकुर

( प्रो डॉ राजेश ठाकुर जी का  मंतव्य उनके ही शब्दों में –पाखण्ड, अंध विश्वास, कुरीति, विद्रूपता, विसंगति, विडंबना, अराजकता, भ्रष्टाचार के खिलाफ़ जन-समुदाय को जागृत करना ही मेरी लेखनी का मूल प्रयोजन है…l” अब आप प्रत्येक शनिवार डॉ राजेश ठाकुर जी की रचनाएँ आत्मसात कर सकते हैं. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण रचना “पिता“.)  

? साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कविता # ३६ ?

? कविता – पिता… ☆ प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर  ? ?

?

= 1 =

संतान के स्वप्नों का

संवाहक पिता।

परिवार की ख़ुशियों का

गुण-ग्राहक पिता।।

= 2 =

घर के विधि-विधान का

विधायक पिता।

कुटुम्ब की समृद्धि का

प्रस्तावक पिता।।

= 3 =

औलाद बे-उसूल तो

आक्रामक पिता।

धन-संसाधन जुटाए

सुख-दायक पिता।।

= 4 =

तात जनक बाप पापा

नायक पिता।

पालक वालिद परम

अभिभावक पिता।।

= 5 =

सिखाये आचरण-नियम

नियामक पिता।

आशीर्वाद-स्नेह का

परिचायक पिता।।

= 6 =

शुभकामनाएँ लाये सदा

लायक पिता।

करे जीवन लय-तालबद्ध

गायक पिता।।

= 7 =

सुखद स्वर्णिम बचपन

स्मारक पिता।

हर ज़ख़्म घाव दर्द का

निवारक पिता।।

= 8 =

कभी शीतल हिम तो कभी

पावक पिता।

हमारे यश-गौरव का

प्रचारक पिता।।

= 9 =

संतति के प्रारब्ध का

उन्नायक पिता।

पुत्र-पुत्री के भविष्य का,

उद्धारक पिता।।

= 10 =

संस्कार-कर्म प्रति सजग

विचारक पिता।

‘ राजेश ‘ प्रथम पूज्य है

विनायक पिता।।

© प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर

शासकीय कॉलेज़ केवलारी

संपर्क — ग्राम -धतूरा, पोस्ट – जामगाँव, तहसील -नैनपुर, जिला -मण्डला (म.प्र.) मोबा. 9424316071

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सविता साहित्य # ८ – !!वक्त!! ☆ सुश्री सविता खण्डेलवाल “भानु” ☆

सुश्री सविता खण्डेलवाल ‘भानु’

(लेखन-प्रकाशन – गत 2022 से छंद लेखन, एकल प्रकाशन– कलम के नवांकुर, अनुग्रह नवप्रस्तारित छंद पर लेखन (मैजिक बुक ऑफ रिकॉर्ड), साझा संकलन – तकरीबन 10, द्वादश ज्योतिर्लिंग (लंदन बुक आफ रिकार्ड), अनेकता में एकता (एशिया बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड), छंदावली – (मैजिक बुक ऑफ रिकॉर्ड), महाकाल साहित्य सम्मान से सम्मानित। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता !!वक्त!!)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सविता साहित्य # ८ ☆

☆ !! वक्त !! ☆ सुश्री सविता खण्डेलवाल “भानु” ☆

सृष्टि आरंभ से जो चला आ रहा, वो चला जा रहा नित्य ही साथ में।

 बिन रुके बिन झुके बिन थके वो चले, बैठता भी नहीं वो कहीं पाथ में।

 आदि में अंत में हर्ष में दर्द में, वो अकेला रहे सर्वदा साथ में।

वक्त होता सभी के सदा संग में, एक साथी नहीं वक्त के हाथ में।।

*

नित्य संसार को वो निहारा करे, रोकता भी नहीं टोकता भी नहीं।

प्रेम को दर्द को राग को द्वेष को, जानता है मगर बोलता भी नहीं।

लोग बोले भला या बुरा बोल दे, ले तराजू कभी तोलता भी नहीं।

भोर में रात में धूप में छांँव में, कर्म को टाल दे सोचता भी नहीं।।

*

बांधता वक्त सारे युगों को सदा, वक्त को बांध दे डोर ऐसी कहाँ।

 राम भी कृष्ण भी वक्त को मान दें, जन्म ले वक्त से देख छोड़ें जहाँ।

 वो बिना भेद के नित्य ही बाँटता, ज्ञान भी एक जैसा सभी को यहाँ।

 कर्म को धर्म मानो चलो धर्म से, दंड भी मोक्ष भी ईश देते वहाँ।।

© सुश्री सविता खण्डेलवाल “भानु”

झालरापाटन राजस्थान

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ “श्री हंस” साहित्य # २०९ ☆ गीत – ।। कोई हम में रहता तो कोई अहम में रहता है ।। ☆ श्री एस के कपूर “श्री हंस” ☆

श्री एस के कपूर “श्री हंस”

 

☆ “श्री हंस” साहित्य # २०९ ☆

☆ गीत ।। कोई हम में रहता तो कोई अहम में रहता है ।। ☆ श्री एस के कपूर “श्री हंस” ☆

कोई हम में रहता है तो कोई अहम में रहता है।

कोई मैं ही मैं में रहता कोई बस वहम में रहता है।।

***

अपनेपन का  अहसास ही ताकत की दवा देता है।

मत रहो सदा ही क्रोध में यह घृणा को हवा देता है।।

भटक जाता आदमी जब द्वेष ही कहन में रहता है।

कोई हम में रहता है तो कोई अहम में रहता है।।

***

खाक हो जाता बदन पर रंजिश खत्म नहीं होती है।

शत्रुता में कोई भी नीति  सफल  यत्न नहीं होती है।।

आगे बढ़ता नहीं जो अभिमान बोझ जहन में रहता है।

कोई हम में रहता है तो कोई अहम में रहता है।।

****

जो संबंध जोड़ता और निभाता वही सफल होता है।

जो स्पर्धा नहीं ईर्ष्या करता वह सफलता भी खोता है।।

दिल में घृणा आग तो मन मस्तिष्क भी दहन में रहता है।

कोई हम में रहता है तो कोई अहम में रहता है।।

© एस के कपूर “श्री हंस”

बरेली ईमेल – Skkapoor5067@ gmail.com, मोब  – 9897071046, 8218685464

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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