श्री शांतिलाल जैन
(आदरणीय अग्रज एवं वरिष्ठ व्यंग्यकार श्री शांतिलाल जैन जी विगत दो दशक से भी अधिक समय से व्यंग्य विधा के सशक्त हस्ताक्षर हैं। आपकी पुस्तक ‘न जाना इस देश’ को साहित्य अकादमी के राजेंद्र अनुरागी पुरस्कार से नवाजा गया है। इसके अतिरिक्त आप कई ख्यातिनाम पुरस्कारों से अलंकृत किए गए हैं। इनमें हरिकृष्ण तेलंग स्मृति सम्मान एवं डॉ ज्ञान चतुर्वेदी पुरस्कार प्रमुख हैं। श्री शांतिलाल जैन जी के स्थायी स्तम्भ – शेष कुशल में आज प्रस्तुत है उनका एक अप्रतिम और विचारणीय व्यंग्य “इंद्रलोक से कल्पना का पूर्वलोक निहारते हुए…” ।)
☆ शेष कुशल # ५९ ☆
☆ व्यंग्य – “इंद्रलोक से कल्पना का पूर्वलोक निहारते हुए…” – शांतिलाल जैन ☆
विक्रम सम्वत् 2103, भाद्रपद कृष्णा त्रयोदशी, दिनांक 18 अगस्त, 2047, रविवार. इंद्रलोक में आज साप्ताहिक अवकाश है. सभा में अप्सराएँ नृत्य करने नहीं आएँगी. देव छोटे छोटे समूह बनाकर अनौपचारिक विमर्श में लीन थे. एक छोटे से समूह में देव अपने पूर्वलोक में सर्वत्र बिखरे विकास का आलोक निहार रहे हैं.
विकसित जंबूद्वीप. जितना दृश्य उनके नेत्रों में समा पाता है सड़कें ही सड़कें दिखाई पड़तीं हैं. नश्वर संसार में अविनाशी राजमार्गों का चमचमाता विशाल जाल देखकर मन पुलकित हो उठा है. नीली छतरी के पार से जिस तरफ दृष्टि जितनी दूर तक जा पाती है पिछड़ेपन की कोई निशानी दिखाई नहीं पड़ती, न वन और न वन्य जीव, न चौपाए, न पक्षी, न खेत, न नदी, न तालाब, न झरने, न पहाड़, न हरे-भरे खेत, न लहराती फ़सलें, न हरीतिमा के विस्तार, न छोटे गाँव, न मिट्टी के घर. इन सब को एक संग्रहालय में समेट दिया गया जिसे आप वर्किग-डे में 11 से 5 के बीच टिकट खरीदकर देख सकते हैं. बहरहाल, देव देख पा रहे हैं तो बस तेज़ रफ्तार मोटरें, हैचबैक, सेडान, प्रीमियम सेडान, टेस्ला, बीवाईडी, लिमोजिन, फ्लाईओवर, टोल प्लाज़ा, लेन-ही-लेन, सड़कें-ही-सड़कें. कहीं कहीं खुली जगह के टापू जो दीख रहे हैं उन पर भी धड़ल्ले से सड़क निर्माण का कार्य चल रहा है. खुली जगह एक इंच बचेगी नहीं. लेन के दोनों ओर चमचमाते रिसोर्ट, ढ़ाबे और रिट्रीट दृष्टिगोचर हो रहे हैं. हर लेन में वाहनों की लम्बी कतारें, कतारों में दौड़ता विकास, तेज़ी से घूमते टायरों से घरघराती आवाज़ निकालता विकास, ओजोन परत में छेद करता विकास, कार्बन से धरती को तप्त करता विकास. कुछेक वर्ष पूर्व तक कितना पिछड़ा हुआ था उनका अपना पूर्वलोक!! युगों युगों से जम्बूद्वीप की राजसत्ता पर्यावरण बचाने के फेर में विकास की उपेक्षा करती रही, अब सब ठीक हो गया लगता है.
एक अन्य देव ने कहा – ‘वह पर्वत भी दृष्टिगोचर नहीं हो रहा जिसकी कंदराओं में बैठकर हमने घोर तपश्चर्या की थी.’
‘हाँ देव, वह उस ओर था. अब उसे समतल कर सड़क बना दी गई है. राष्ट्रीय राजमार्ग. एनएच-92947. राजमार्गों ने शतकों का शतक पूरा कर लिया है. राजमार्ग भी कितने चौड़े, बाप-रे-बाप!! उस ओर दृष्टि डालिए देव, आपके नेत्र खुले-के-खुले रह जाएँगे. दिल्ली मुंबई राजमार्ग. चार सौ बत्तीस लेन का. दो सौ सोलह लेन पर जानेवाली गाड़ियाँ, दो सौ सोलह लेन पर आनेवाली गाड़ियाँ. इसे कहते हैं विकास!’
‘वह आश्रम भी दृष्टिगोचर नहीं हो रहा जहाँ इंद्र हमारी तपस्या में विघ्न उत्पन्न करने के हेतु से ऋषि कन्याएँ डेपुट किया करते थे. वह अरण्य भी दिखाई नहीं दे रहा जहाँ हम वानप्रस्थ के लिए निकले थे और नश्वर देह का विसर्जन किया था.’
‘हाँ देव, पहले वहाँ रिसोर्ट बना, अब एक चमचमाता मॉल बन गया है. जंबूद्वीप इतना विकसित तब हो गया होता तो हम वानप्रस्थ में जाते ही क्यों. फ़ाईवस्टार ओल्ड एज होम में जीवन का अंतिम समय गुजार लेते.’
विमर्श के दौरान देवों को अपने पूर्वलोक में चौड़ी होती जाती सड़क की निरंतर बहती धाराओं को अवलोकित कर गर्व की अनुभूति हो रही थी. मगर तभी, एक देव का कमल सदृश मुख मुरझाने लगा. वे बोले – ‘सब कुछ अच्छा है मगर पर्यावरण लील लिए जाने का दुःख लग रहा है!!’
‘आपका भाग्य अच्छा है देव, आप यहाँ बैठकर पर्यावरण पर रंज प्रकट कर रहे हैं. जंबूद्वीप में करते तो टूलकिट उपयोग करने के आरोप में कारागार में डाल दिए जाते. बरसों नागरिकों ने चार फुटिया सड़क का अभिशाप झेला है, अब वे चार सौ बत्तीस लेन की सड़क आनंद उठा रहे हैं, और आप हैं कि पर्यावरण का रोना लेकर बैठ गए हैं.’
‘तो क्या देव जंबूद्वीप के सभी नागरिकों ने ऐसा ही राष्ट्र चाहा था ?’
‘नहीं देव. एक्टिविस्ट का छोटा सा समूह था वहाँ, अर्बन नक्सली कहाता था. वो उन दीन-हीन मनुष्यों की पक्षधरता में खड़ा रहता जिनका जल, जंगल, जमीन सब छिनता चला जा रहा था. वो कभी जैव-विविधता की बात करता, कभी अल-नीनो की. विकास उसे सुहाता नहीं था. आंदोलनजीवी कहाता. वो घर और भूमि से बेदख़ल किए जाने वाले नागरिकों के लिए आंदोलन करता. धरती बचाने की पहल करते करते राजसत्ता से भिड़ जाता. लेकिन राज्य व्यवस्था के कर्ण पर कभी जूँ नाम का प्राणी रेंगा भी नहीं. विकास थमा नहीं देव, और थमेगा भी नहीं. चार हज़ार बत्तीस लेन की सड़क की डीपीआर रेडी है. जनसामान्य का मानस बना दिया गया है कि वे सड़क-निर्माण को ही विकास का पर्याय मान लें. जंबूद्वीप में वे ही नागरिक बचे रह पाएँगे जो विकास के संग-संग दौड़ लगा पाने के सक्षम हों, शेष तो बस…..’
अर्बन नक्सली टाईप के देव को छोड़कर शेष सभी ने जंबूद्वीप के अतिविकसित हो जाने पर गहरा संतोष व्यक्त किया और विमर्श को विराम देते हुए अपने अपने वैमनिकों में प्रस्थान कर गए.
-x-x-x-
(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)
© शांतिलाल जैन
बी-8/12, महानंदा नगर, उज्जैन (म.प्र.) – 456010
9425019837 (M)
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈







