हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # २२३ – बालकहानी –लिपि की कहानी – ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ ☆

श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

(सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” जी का  हिन्दी बाल -साहित्य  एवं  हिन्दी साहित्य  की अन्य विधाओं में विशिष्ट योगदान हैं। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में रचना सहित 145 बालकहानियाँ 8 भाषाओं में 1160 अंकों में प्रकाशित। प्रकाशित पुस्तकेँ-1- रोचक विज्ञान कथाएँ, 2-संयम की जीत, 3- कुएं को बुखार, 4- कसक, 5- हाइकु संयुक्ता, 6- चाबी वाला भूत, 7- बच्चों! सुनो कहानी, इन्द्रधनुष (बालकहानी माला-7) सहित 4 मराठी पुस्तकें प्रकाशित। मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी का श्री हरिकृष्ण देवसरे बाल साहित्य पुरस्कार-2018 51000 सहित अनेक संस्थाओं द्वारा सम्मानित व पुरस्कृत। साप्ताहिक स्तम्भ “श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य”  के अंतर्गत साहित्य आप प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकते हैं। आज प्रस्तुत है आपकी बालकहानी –लिपि की कहानी)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # २२३

☆ बालकहानी –लिपि की कहानी ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ 

मुनिया की सुबह तबीयत खराब हो गई। उसने एक प्रार्थनापत्र लिखा। अपनी सहेली के साथ स्कूल भेज दिया। प्रार्थनापत्र में उसने जो लिखा था, उसकी अध्यापिका ने उस प्रार्थनापत्र को उसी रूप में समझ लिया। और मुनिया को स्कूल से छुट्टी मिल गई।

क्या आप बता सकते है कि मुनिया ने प्रार्थनापत्र किस लिपि में लिख कर पहुंचाया था। नहीं जानते हो ? उसने प्रार्थनापत्र देवनागरी लिपि में लिख कर भेजा था।

देवनागरी लिपि उसे कहते हैं, जिसे आप इस वक्त यहाँ पढ़ रहे है। इसी तरह अंग्रेजी अक्षरों के संकेतों के समूहों से मिल कर बने शब्दों को रोमन लिपि कहते हैं।

इस पर राजू ने जानना चाहा, “क्या शुरु से ही इस तरह की लिपियां प्रचलित थीं?”

तब उस की मम्मी ने बताया कि शुरु शुरु में ज्ञान की बातें एक दूसरे को सुना कर बताई जाती थीं। गुरुकुल में गुरु शिष्य को ज्ञान की बातें कंठस्थ करा दिया करते थे। इस तरह अनुभव और ज्ञान की बातें पीढ़ी-दर-पीढ़ी जाती थीं।

मनुष्य निरंतर, विकास करता गया। इसी के साथ उस का अनुभव बढ़ता गया। तब ढेरों ज्ञान की बातें और अनुभव को सुरक्षित रखने की आवश्यकता महसूस हुई।

इसी आवश्यकता ने मनुष्य को प्रत्येक वस्तु के संकेत बनाने के लिए प्रेरित किया। तब प्रत्येक वस्तु को इंगित करने के लिए उस के संकेताक्षर या चिन्ह बनाए गए। इस तरह चित्रसंकेतों की लिपि का आविष्कार हुआ। इस लिपि को चित्रलिपि कहा गया।

आज भी विश्व में इस लिपि पर आधारित अनेक भाषाएं प्रचलित हैं। जापान और चीन की लिपि इसका प्रमुख उदाहरण है। शब्दाचित्रों पर आधारित ये लिपियों इसका श्रेष्ठ नमूना भी है।

चित्रलिपि का आशय यह है कि अपने विचारों को चित्र बना कर अभिव्यक्त किया जाए। मगर यह लिपि अपना कार्य सरल ढंग में नहीं कर पायी। क्यों कि एक तो यह लिपि सीखना कठिन था। दूसरा, इसे लिखने में बहुत मेहनत करनी पड़ती थी। तीसरा, लिखने वाला जो बात कहना चाहता था, वह चित्रलिपि द्वारा वैसी की वैसी व्यक्त नहीं हो पाती थी। चौथा, प्रत्येक व्यक्ति के लिए यह आकर्षण का केंद्र नहीं थी। और यह दुरुह थी।

तब कुछ समय बाद प्रत्येक ध्वनियों के लिए एक एक शब्द संकेत बनाए गए। जिन्हें हम वर्णमाला में पढ़ते हैं। मसलन- क, ख, ग आदि। इन्हीं अक्षरों और मात्राओं के मेल से संकेत-चिन्ह बनने लगे। जो आज तक परिष्कृत हो रहे हैं।

हरेक वस्तु के लिए एक संकेत चिन्ह बनाए गए। विशेष संकेत चिन्ह विशेष चीजों के नाम बताते हैं। इस तरह प्रत्येक वस्तु के लिए एक शब्द संकेत तय किया गया। तब लिपि का आविष्कार हुआ।

इस तरह सब से पहले जो लिपि बनी, उसे ब्राह्मी लिपि के नाम से जाना जाता है। बाद में अन्य लिपियां इसी लिपि से विकसित होती गई।

ऐसे ही धीरे धीरे विकसित होते हुए आधुनिक लिपि बनी। जिसमें अनेक विशेषताएं हैं। प्रमुख विशेषता यह है कि इसे जैसा बोला जाता है, वैसा ही लिखा भी जाता है। अर्थात् यह हमारे विचारों को वैसा ही व्यक्त करती है।

इनमें से बहुत सी लिपियों से हम परिचित हैं । ब्रिटेन में अंग्रेजी भाषा बोली जाती है। इस भाषा को रोमन लिपि में लिखते हैं। पंजाबी भाषा, गुरुमुखी लिपि में लिखी जाती है। इसी तरह तमिल, तेलगु, कन्नड़ तथा मलयालम आदि ब्राह्मी लिपि में लिखी जाती हैं।

अब यह भी जान लें कि विश्व की सबसे प्राचीन लिपियां निम्न हैं- ब्राह्मी, शारदा आदि।

© श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

16-07-2024

संपर्क – 14/198, नई आबादी, गार्डन के सामने, सामुदायिक भवन के पीछे, रतनगढ़, जिला- नीमच (मध्य प्रदेश) पिनकोड-458226

ईमेल  – opkshatriya@gmail.com मोबाइल – 9424079675 /8827985775

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – लघुकथा – चाय ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – लघुकथा – चाय ? ?

…..पापा जी, ये चार-चार बार चाय पीना सेहत के लिए ठीक नहीं है। पता नहीं मम्मी ने कैसे आपकी यह आदत चलने दी? कल से एक बार सुबह और एक बार शाम को चाय मिलेगी। ठीक है..?

..हाँ बेटा ठीक है.., कहते-कहते मनोहर जी बेडसाइड टेबल पर फ्रेम में सजी गायत्री को निहारने लगे। गायत्री को भी उनका यों चार-पाँच बार चाय पीना कभी अच्छा नहीं लगता था। जब कभी उन्हें चाय की तलब उठती, उनके हाव-भाव और चेहरे से गायत्री समझ जाती। टोकती, ..इतनी चाय मत पिया करो। मैं नहीं रहूँगी तो बहुत मुश्किल होगी। आज पी लो लेकिन कल से नहीं बनेगी दो से ज़्यादा बार चाय।

….पैंतालीस साल के साथ में कल कभी नहीं आया पर गायत्री को गये अभी पैंतालीस दिन भी नहीं हुए थे कि..! …तुम सच कहती थी गायत्री, देखो जो तुम नहीं कर सकी, तुम्हारी बहू ने कर दिखाया.., कहते-कहते मनोहर जी का गला भर आया। जाने क्यों उन्हें हाथ में थामी फ्रेम भी भीगी-भीगी सी लगी।

?

© संजय भारद्वाज  

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️  नवरात्र साधना सोमवार दि. 22 सितम्बर 2025 से बुधवार 1 अक्टूबर तक चलेगी 🕉️

💥 इस साधना का मंत्र होगा-

या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता,
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।

इस मंत्र की कम से कम एक माला (108 जप) का संकल्प लेना होगा। माला जप के साथ मौन साधना एवं आत्मपरिष्कार साधना चलेंगी। 💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा # ८७ – खुशियाॅं बाँटना… ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆

श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा –  गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी,  संस्मरण,  आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – खुशियाॅं बाँटना।)

☆ लघुकथा # ८७ – खुशियाॅं बाँटना श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ 

सफाई जोर शोर से चल रही रीना बहू आज चमत्कार कैसे?

हर कमरे से लेकर किचन तक सुंदर सजा हुआ दिख रहा है। बहु क्या आपके कुछ दोस्त घर पर खाने पर आ रहे हैं क्या?

कहीं भी धूल का एक कण नहीं, ऐसा लग रहा है किसी फाइव स्टार होटल में आ गए हैं पूरा घर फूलों से सजा है एक-एक चीज अपनी जगह पर है पहले तो कभी ऐसा नहीं किया?

क्या बात है मां क आज आपने तो बिल्कुल सवालों की झड़ी लगा दी रीना ने मुस्कुराते हुए कहा।

आप ही तो कहती है मां की साफ-सुथरे घर में लक्ष्मी का वास होता है और पितृपक्ष चल रहे हैं तो वह भगवान के रूप में हमारा घर देखने आए हैं बाबूजी बिखरा घर देखेंगे तो उन्हें कितना दुख होगा?

मां आज सफाई करते हुए मुझे बाबूजी की डायरी मिली जिसमें उन्होंने लिखा था कि उन्हें साफ सुथरा और फूलों से सजा घर बहुत अच्छा लगता है एकदम आप ही की तरह मैंने भी आज घर को सजाया है आज उनके श्राद्ध की तिथि है, पंडितों को बुलाया है और बाबूजी की पसंद का सारा खाना बना रही हूं मिठाई बस बाहर से आर्डर करती हूँ अभी थोड़ी देर में आ जाएगी आप एक बार देख लो कोई कमी तो नहीं है?

बाबूजी के साथ तो मुझे ज्यादा दिन रहने को नहीं हुआ क्योंकि मेरी शादी कम उम्र में हो गई थी लेकिन अब यह लग रहा है माँ कि बाद में यह श्राद्ध करने से तो अच्छा है कि आपको हम जीते जी खुशी दे दें।

क्या बात है बहू आजकल किसकी संगत में रह रही हो जो इतनी अच्छी बातें कर रही हो?

मां आपको मेरी हर बात मजाक क्यों लगती है?

नहीं तुम आजकल की बहुएं नौकरी करने वाली हो हमारी तरह कहां?

मैं पढ़ी-लिखी ज़रूर हूँ और अपने संस्कार समझती हूँ, आपको पता है मां सच बात तो यह है कि मैं जब अपने घर गई थी अपनी मां को देखा और पिताजी को देखा और भाभी का उनके साथ बर्ताव देखा तब मेरा मन रोने लगा। वहां से लौटी और तुरंत अपने घर को सजाने लग गई कि जो मेरे पास है उसे तो मैं ठीक कर सकती हूँ, सास कमल की ऑंखों में आंसू भर गए?

तू बहु नहीं बेटी है । पापा जी का श्राद्ध है, माँ ने बुलाया है। ऐसा फोन करके अपने मम्मी पापा को बोलो। फिर मैं उन्हें रोक लूंगी कुछ दिन हम सब साथ रहेंगे सब ठीक हो जाएगा।

जब इंसान नहीं रहता तब उसकी कीमत समझ में आती है।

कहाँ मैं तेरी बातों में लग गई पंडित जी आ रहे होंगे ।

चल पागली रोना छोड़? जीवन तो चलने का नाम है।

बस मेरी एक बात याद रखना जीवन में हमेशा खुशियाँ बांटना।

© श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

जबलपुर, मध्य प्रदेश मो. 7000072079

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा – “मनीप्लांट , मैं और आप” ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

श्री कमलेश भारतीय 

(जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब)  शिक्षा-  एम ए हिंदी , बी एड , प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । यादों की धरोहर हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह -एक संवाददाता की डायरी को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से  कथा संग्रह-महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता)

☆ लघुकथा – “मनीप्लांट , मैं और आप” ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

अड़ोसियों-पड़ोसियों, नाते रिश्तेदारों और दोस्तो -दुश्मनों के ड्राइंगरूम्ज में मनीप्लांट की फैलती लहराती बेलों की हरियाली ने मुझे मोहित कर लिया। इस बात ने तो और भी कि जिस घर में मनीप्लांट फलता फूलता है , उस घर में धन की बारिश हो जाती है। शायद इसीलिए मनीप्लांट ड्राइंगरूम में लगाया जाता है। जितना मनीप्लांट फैलता है , उतना ही ड्राइंगरूम सजाया संवारा जाता है। मनीप्लांट और ड्राइंगरूम की खूबसूरती में गहरा नाता है। इस बात पर मुझे ईमान लाना पड़ा। मैंनै भी मनीप्लांट लगाने की ठानी।

 वैसे भी श्रीमती जी अड़ोसियों पड़ोसियों, नाते रिश्तेदारों और दोस्तों दुश्मनों को दिन प्रतिदिन ऊंचाइयां फलांगते देख देख कर चिड़चिड़ी रहने लगी थी। दिन रात बिना पानी पिये ही मुझे कोसती रहती थी। मेरे निकम्मेपन और अपनी किस्मत को लेकर माथा पीटने के साथ साथ मेरे साथ हुई शादी को एक मनहूस सपने और हादसे से कम नहीं मान रही थी। इस सारे नाटक में भी अपने मेकअप को रत्ती भर भी बिगड़ने नहीं थी। उसका विचार था कि ड्राइंगरूम सुंदर हो न हो उसमें बैठने वाली तो बनी ठनी होनी ही चाहिए।

अपनी श्रीमती जी के कोसने से घबरा कर और फूटी किस्मत सुधारने के लिए मैंने मनीप्लांट लगा तो लिया पर एकदम अनाड़ी जो ठहरा। मैंने मनीप्लांट को उजाले में , धूप में रख दिया और वो बजाय फैलने के दिन प्रतिदिन पीला पड़ने लगा। श्रीमती जी को मुझे कोसने का एक और बहाना मिल गया। श्रीमती जी को मेरे अनाड़ीपन को देखकर कोसने का एक और बहाना मिल गया। वे उस दिन को रोने लगी जब इस लाल बुझक्कड़ के पल्ले बांध दी गयी थी। यह मेरी हार थी।

अब मैं हारने के लिए कतई तैयार नहीं था। इसलिए मैंने बारीकी से आसपास के लोगों के यहां मनीप्लांट को देखना शुरू किया। तब कहीं जाकर पता चला कि मनीप्लांट को छाया और अंधेरे कोने में रखने पर ही इसके फैलने की उम्मीद की जा सकती है।

तब से मैं मनीप्लांट को लेकर कम औ, खुद को लेकर अधिक चिंतित हूं कि किसकी छाया में बैठकर ऐसे काले धंधे करूं जिससे मेरे ड्राइंगरूम में नयी से नयी चीज़ें आती जायें और सबसे बढ़कर मेरे मनीप्लांट की तरक्की दूसरों को जला भुनाकर राख कर दे। पर उसके लिए मैं अभी सोच रहा हूं ,,,आपकी कोई राय बने तो मुझे लिख भेजिएगा।

© श्री कमलेश भारतीय

पूर्व उपाध्यक्ष हरियाणा ग्रंथ अकादमी

संपर्क :   1034-बी, अर्बन एस्टेट-।।, हिसार-125005 (हरियाणा) मो. 94160-47075

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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English Literature – Short Stories ☆ “एकदा नैमिषारण्ये ” श्री संजय भारद्वाज (भावानुवाद) – ‘Naimisharanya — The Forest…’ ☆ Captain Pravin Raghuvanshi, NM ☆

Captain Pravin Raghuvanshi, NM

(Captain Pravin Raghuvanshi —an ex Naval Officer, possesses a multifaceted personality. He served as a Senior Advisor in prestigious Supercomputer organisation C-DAC, Pune. He was involved in various Artificial Intelligence and High-Performance Computing projects of national and international repute. He has got a long experience in the field of ‘Natural Language Processing’, especially, in the domain of Machine Translation. He has taken the mantle of translating the timeless beauties of Indian literature upon himself so that it reaches across the globe. He has also undertaken translation work for Shri Narendra Modi, the Hon’ble Prime Minister of India, which was highly appreciated by him. He is also a member of ‘Bombay Film Writer Association’.

We present an English Version of Shri Sanjay Bhardwaj’s Hindi Short Stories एकदा नैमिषारण्ये.  We extend our heartiest thanks to the learned author Captain Pravin Raghuvanshi Ji (who is very well conversant with Hindi, Sanskrit, English and Urdu languages) for this beautiful translation and his artwork.)

English Version by – Captain Pravin Raghuvanshi

?~ Naimisharanya — The Forest~??

In the revered land of Naimisharanya, a sage once recounted a tale that held the devotees spellbound.

“There existed a land of unparalleled beauty,” he began, “where lush greenery stretched as far as the eye could see.”

Curiosity sparkled on every face, and in unison, they implored,

“Guru ji, tell us more of this enchanting land!”

The sage smiled, his words weaving a tapestry of wonder.

“This land was alive with gardens blooming in radiant hues, and rivers flowing with waters as pure as nectar. Its inhabitants revered these rivers as nurturing mothers, offering aarti with heartfelt devotion. They cherished cows as their own mothers, and tended the land with care. Only half of it was cultivated; the rest remained untamed, a sanctuary for grazing animals. Trees were protected with reverence, and the five elements of nature were honored in all their glory. In every leaf, every gust of wind, they perceived the divine. Such was the land’s splendor that even the gods looked upon it with envy.”

Generations passed, and the story was retold, filling hearts with longing and wonder.

Years later, a new generation—familiar with the tale only through hearsay—gathered around the sage. Seated in air-conditioned rooms, sipping mineral water from plastic bottles, they asked,

“Tell us once more of that wondrous land!”

The sage’s eyes twinkled as he began anew,

“There once was a land in Naimisharanya…”

~ Pravin Raghuvanshi

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

श्री संजय भारद्वाज जी की मूल रचना

? संजय दृष्टि – एकदा नैमिषारण्ये ? ?

सूत जी बोले, ‘नैमिषारण्य में एक सुंदर भूखंड हुआ करता है..।’ श्रद्धालुओं के चेहरे पर उस सौंदर्य का वर्णन सुनने की उत्सुकता जगी।

‘उस भूखंड के बारे में बताइए न प्रभु!’, सामूहिक स्वर में मनुहार थी।

‘इस भूखंड में हर तरफ हरीतिमा है। भूखंड का प्रत्येक नगर आकर्षक उद्यानों से सुशोभित है। यहाँ की नदियों में प्रवाहित होता सलिल अमृत-सा निर्मल और प्राणों को पुष्ट करने वाला  है। यहाँ के निवासी नदियों को माता के रूप में पूजते हैं। उनकी आरती उतारते हैं। गौ को वे अपनी जननी के समान मान देते हैं। अपने स्वामित्व की आधी भूमि पर ही वे अलट-पलट कर कृषि करते हैं, शेष भूमि पशुओं के चरने के लिए छोड़ दी जाती है। यहाँ हरे वृक्षों की कटाई प्रतिबंधित है, उनकी रक्षा करने और महात्म्य सुनने का भी विधान है। पंचमहाभूतों की प्रतिष्ठा है। प्रकृति के घटकों में ही ईश्वर के दर्शन किये जाते हैं। स्वर्ग के सुख और देवता भी ईर्ष्या करें, ऐसा मनोरम है ये भूखंड!’

कथा सुनाई जाती रही, पीढ़ियों तक श्रोता तृप्त होते रहे। कालांतर में अपने पूर्वजों से इस भूखंड का वर्णन सुनने वाली नई पीढ़ी को भी पुरानी कथा में उत्सुकता जगी।

खेत और पेड़ रौंद कर खड़ी की गई चमचमाती गगनचुम्बी इमारत के एअर कंडीशंड कक्ष में प्लास्टिक  की बोतल से मिनरल पानी पीते हुए नई पीढ़ी ने सूत जी से कहा, ‘उस सुंदर भूखंड की कथा सुनाइए न!’

सूत जी बोले, ‘नैमिषारण्य में एक समय ऐसा सुंदर भूखंड हुआ करता था..!’

?

♥ ♥ ♥ ♥

© संजय भारद्वाज  

मोबाइल– 9890122603, संजयउवाच@डाटामेल.भारत, writersanjay@gmail.com

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© Captain Pravin Raghuvanshi, NM

Pune

≈ Editor – Shri Hemant Bawankar/Editor (English) – Captain Pravin Raghuvanshi, NM ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # 222 – कहानी – मित्र की सरलता – ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ ☆

श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

(सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” जी का  हिन्दी बाल -साहित्य  एवं  हिन्दी साहित्य  की अन्य विधाओं में विशिष्ट योगदान हैं। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में रचना सहित 145 बालकहानियाँ 8 भाषाओं में 1160 अंकों में प्रकाशित। प्रकाशित पुस्तकेँ-1- रोचक विज्ञान कथाएँ, 2-संयम की जीत, 3- कुएं को बुखार, 4- कसक, 5- हाइकु संयुक्ता, 6- चाबी वाला भूत, 7- बच्चों! सुनो कहानी, इन्द्रधनुष (बालकहानी माला-7) सहित 4 मराठी पुस्तकें प्रकाशित। मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी का श्री हरिकृष्ण देवसरे बाल साहित्य पुरस्कार-2018 51000 सहित अनेक संस्थाओं द्वारा सम्मानित व पुरस्कृत। साप्ताहिक स्तम्भ “श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य”  के अंतर्गत साहित्य आप प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकते हैं। आज प्रस्तुत है आपकी कहानी – मित्र की सरलता।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # 222

☆ कहानी – मित्र की सरलता ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ 

राहुल व देवांश सड़क पर खड़े बातें कर रहे थे। तभी एक मोटरसाइकिल आकर उनके पास रूकी।

“क्यों रे! अपने आप को बहुत होशियार समझता है,” जैसे ही मोटरसाइकिल पर सवार रघु ने कहा तो राहुल उसे देख कर चौंक गया।

“क..क.. क्या?” उसके मुंह से आवाज नहीं निकल रही थी। वह डर गया था। रघुवीर उर्फ रघु उसके स्कूल का दादा था। उसकी एक गैंग थी। वह सभी पर रौब जमाता था। इसलिए सभी उससे डरते थे।

“ज्यादा होशियार बनता है क्यों?” उसने आंखें तरेर कर कहा, “यदि मैं तेरी कॉपी से जरा सा देख लेता तो तेरा बाप का क्या बिगड़ जाता? तेरी परीक्षा थोड़ी ही रुक जाती।” उसने राहुल को घुरा।

जैसे ही रघु ने यह कहा देवांश को सब माजरा समझ में आ गया। राहुल ने परीक्षा में रघु को नकल नहीं करने दी थी इस कारण वह भड़का हुआ था। उसने जब देखा राहुल कुछ नहीं बोल पा रहा है तो रघु को ओर भी तेज गुस्सा आ गया।

“अरे! बोलता क्यों नहीं? सांप सूंघ गया है क्या?”

“वो.. वो सर देख लेते!”

“सर देख लेते,” रघु ने चिढ़कर कहा, “सर की इतनी हिम्मत, मेरे सामने मैं कुछ बोलते,” कहते हुए रघु ने राहुल के सिर पर एक चपत जमा दी, “साला! साणा बनता है।”

यह देखकर देवांश को बहुत बुरा लगा। वह अपने मामाजी के यहां गांव में आया हुआ था। इसलिए वह समझ गया कि रघु की दादागिरी स्कूल के साथ-साथ बाहर भी चलती है। इसलिए उसने राहुल से कहा, “चल यार! मुझे काम है। चलते हैं,” कहने के साथ देवांश ने राहुल का हाथ पकड़ा कर खींचा।

“अबे! कहां जाता है?” रघु ने अकड़ कर कहा, “यदि कल के पेपर में देखने नहीं दिया तो ध्यान रखना हाथपैर तोड़ दूंगा।”

“जी,” राहुल ने कहा तो देवांश को एक तरकीब सुझाई दे गई। वह इस तरकीब से रघु की दादागिरी उतार सकता था, इसलिए उसने कहा, “अरे रघु भाई!”

“क्या है?” रघु ने चौंक कर पूछा, “बोल।”

“अरे रघु भाई, राहुल की इतनी हिम्मत नहीं कि वह आपको नकल करने से मना कर सकें। मगर वह क्या है..,” कह कर देवांश रुका।

रघु का पारा चढ़ा हुआ था। उसने कहा, ” वह क्या है? बोल जल्दी।”

“इसका भाई है ना वह,” कहते हुए देवांश ने खेत की ओर इशारा किया, “उसका कहना है कि तूने किसी को नकल कराई तो तेरी खैर नहीं है।”

“उसने कहा था,” रघु बोला, “वह तो साला एक नंबर का डरपोक और मरियल है।”

यह सुनकर राहुल डर गया था। उसने झट से कहा, “नहीं-नहीं, उसने नहीं बोला था।”

“अच्छा!”

“हां तो क्या हुआ?” देवांश ने रघु को उकसाया, “अगर वाकई तुम रघु दादा हो तो उसे सबक सिखा कर बताओ तो जानू?”

रघु को कोई चैलेंज करें वह कैसे बर्दाश्त कर सकता था? उसने कहा, “तू रघु दादा को चैलेंज दे रहा है। इसका अंजाम जानता है?”

“हां-हां जानता हूं। ऐसे बहुत से दादा देखे हैं मैंने शहर में, हिम्मत हो तो उसे सबक सिखा कर बताओ तो जानू?”

यह सुनकर रघु का पारा चढ़ गया। वह झट से मोटरसाइकिल से उतरा,” तू यहां रुक सोनू, मैं भी उसे सबक सिखा कर आता हूं,” कहते हुए वह खेत की मुंडेर कूद कर विकास के पास पहुंच गया।

वहां जाकर उसने सीधे विकास का गिरेबान पकड़ा और कहा, ” क्यों रे डेढ़ फसली, दादा बनता है,” कहने के साथ रघु ने विकास का कालर पकड़ कर दो थप्पड़ जड़ दिए।

विकास कुछ समझ नहीं पाया। यह क्या हुआ? तभी पास ही चर रहे बैल की निगाहें रघु की हरकत पर चली गई। वह विकास को थप्पड़ मार रहा था।

तभी अचानक वह दौड़कर आया। उसने आते ही सिंग से रघु को उठाया। हवा में उछाल दिया। रघु इसके लिए तैयार नहीं था। वह हवा में उछला। पत्थर की मुंडेर पर जाकर गिरा।

यह सब अचानक हुआ था। वह बहुत तेजी से उछला था और पत्थर पर गिरा था। गिरते ही उसके हाथ की हड्डी टूट गई थी। विकास कुछ-कुछ सम्हल चुका था। वह चिल्लाकर बोला,” रामू! रुक जा!”

मगर रामू बैल कहां रुकने वाला था। वह गुस्से में था। उसके मालिक को कोई हाथ लगाएं, यह उसे बर्दाश्त नहीं था। रघु ने उसे थप्पड़ जड़ दिए थे इस कारण वह बहुत तेजी से चिल्लाते हुए अपना गुस्सा उतार रहा था।

दोबारा रघु की ओर तेजी से दौड़ा। यह देखकर रघु घबरा गया। उसके सामने साक्षात मोड़ तांडव कर रही थी। मगर वह उठ नहीं पा रहा था इसलिए जोर से चिल्ला पड़ा, “अरे! मार डाला! कोई बचाओ!” कह कर वह चीखा। तभी उसका मित्र सोनू वहां आ गया।

तभी विकास ने सोनू को इशारा कर दिया। वह अंदर नहीं आए। इसी के साथ विकास तेजी से रघु के पास पहुंच गया, “नहीं रामू, इसे छोड़ दो।”

मगर रामू ने तेज गर्दन हिलाकर जोर से हुंकार भरी। जैसे वह रघु को जोरदार सबक सिखाना चाहता है।

विकास रामू का गुस्सा जानता था। वह तुरंत रामू के पास गया। उसे गले से लगाते हुए बोला, “नहीं रामू, इसे छोड़ दे।”

तभी विकास में तुरंत उसके दोस्त सोनू कहा, “सोनू! इसे ले जा। नहीं तो यह बैल इसको मार डालेगा।”

सोनू तुरंत रघु के पास गया। उसको हाथ टूट चुका था। पैर में चोट आई हुई थी। उसे पकड़ कर सोनू तुरंत खेत के बाहर ले गया। इस तरह रघु अपनी जान बचा कर भाग गया।

इस घटना के बाद से रघु ने दादागिरी लगाना छोड़ दिया। वह समझ गया था कि किसी का सरल व हृदय मित्र उसे कभी भी सबक सिखा सकता है।

© श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

28-01-2022

संपर्क – 14/198, नई आबादी, गार्डन के सामने, सामुदायिक भवन के पीछे, रतनगढ़, जिला- नीमच (मध्य प्रदेश) पिनकोड-458226

ईमेल  – opkshatriya@gmail.com मोबाइल – 9424079675 /8827985775

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ समय चक्र # २६७ ☆ बाल कहानी – कृष्णावतार की कविता में कहानी…  ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’ ☆

डॉ राकेश ‘चक्र

(हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी  की अब तक लगभग तेरह दर्जन से अधिक मौलिक पुस्तकें ( बाल साहित्य व प्रौढ़ साहित्य ) तथा लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन।लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन। कई कृतियां पंजाबी, उड़िया, तेलुगु, अंग्रेजी आदि भाषाओँ में अनूदित । कई सम्मान/पुरस्कारों  से  सम्मानित/अलंकृत।  भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय द्वारा बाल साहित्य के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य श्री सम्मान’ और उत्तर प्रदेश सरकार के हिंदी संस्थान द्वारा बाल साहित्य की दीर्घकालीन सेवाओं के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य भारती’ सम्मान, अमृत लाल नागर सम्मानबाबू श्याम सुंदर दास सम्मान तथा उत्तर प्रदेश राज्य कर्मचारी संस्थान  के सर्वोच्च सम्मान सुमित्रानंदन पंतउत्तर प्रदेश रत्न सम्मान सहित बारह दर्जन से अधिक राजकीय प्रतिष्ठित साहित्यिक एवं गैर साहित्यिक संस्थाओं से सम्मानित एवं पुरुस्कृत। 

आदरणीय डॉ राकेश चक्र जी के बारे में विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 संक्षिप्त परिचय – डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी।

आप  “साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र” के माध्यम से  उनका साहित्य प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र – # २६७ ☆ 

☆ बाल कहानी – कृष्णावतार की कविता में कहानी ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’ 

(नाना से सुनी कृष्णावतार की कविता में कहानी)

 

गर्मियों की छुट्टियाँ हो गईं थीं। अर्णव और सोनी अपनी नानी के घर आए हुए थे।

वे जब भी नाना-नानी के घर आते, तब दोनों ही अपने नाना और नानी से जीभरकर बातें करते। कभी अपने स्कूल की बातें बताते, तो कभी दोस्तों की। लेकिन दोनों ही कहानी सुनने के बहुत शौकीन थे। वे कभी नाना के पास सोते, तो कभी नानी के। उनके नाना और नानी नई-नई कहानियाँ सुनाते।

एक दिन वे अपने नाना जी के साथ सोने आए, तब अर्णव बोला, ” प्यारे नाना मुझे भगवान कृष्ण की कहानी सुनाओ न।”

तभी सोनी बोल पड़ी, ” हाँ नानाजी मुझे भी भगवान कृष्ण की कहानी सुननी है।”

प्यारे बच्चो तुम्हें आज भगवान कृष्ण की कहानी कविता में सुनाता हूँ।”

“क्या कहा कविता में कहानी नानानी।” सोनी ने चोंकते हुए पूछा।

“हाँ बच्चो कविता में कहानी, आपको सच में बहुत पसंद आएगी।

हमारे मित्र चक्र ने कविता में पूरी कहानी लिखी है, सुनाता हूँ, जिनकी लिखीं कुछ लिखीं किताबें आपको दी थीं न।”

“हाँ-हाँ हम समझ गए। हमें उनकी किताबें बहुत अच्छी लगीं।” दोनों ही समवेत स्वर में बोले।

“देखो बच्चो ध्यान से सुनना। हुंकारे भरते रहना। कहीं सो मत जाना कहानी सुनते-सुनते।”

 दोनों समवेत स्वर में बोले, “नहीं, नहीं नानाजी। आप जल्दी से सुनाइए न!”

“बच्चो अब सुनो कविता में पूरी कहानी ध्यान से- बच्चो इस कहानी का शीर्षक है –कृष्णावतार और मुन्ना जी

—-

“बोला मुन्ना मातु से, कृष्ण लिए अवतार।

कैसे जन्मे कृष्ण जी, मुझे बताओ सार ।।

सुनो पुत्र पावन कथा, श्री कृष्ण भगवान।

अपने ही वरदान से, दिया देवकी – मान।।

 *

उग्रसेन ने पुत्र का, नाम रखा था कंस।

अतिशय ही वह क्रूर था, देता सबको दंश।।

 *

उग्रसेन राजा हुए, मथुरा ब्रज के धाम।

वे उदार प्रभु भक्त थे, करते जनहित काम।।

 *

उग्रसेन के भ्रात थे, देवक उनका नाम।

पुत्री उनकी देवकी, जने उसी ने श्याम।।

 *

हुआ ब्याह वसुदेव से, जो कुंती के भ्रात।

मंत्री मथुरा राज के, बँधी देवकी साथ।।

 *

विदा हुई जब देवकी, रथ को हाँके कंस।

बहुत खुशी था आज वह, जैसे मानस हंस।।

 *

रथ लेकर आगे बढ़ा, आई यह आवाज।

कंस काल सुत आठवाँ, छीने तेरा ताज।।

 *

जैसे ही उसने सुना, बहना का सुत काल।

गुस्से में वह भर गया, हुआ चेहरा लाल।।

 *

तुरत – फुरत वापस हुआ, डाला उनको जेल।

जंजीरों में जकड़कर, नहीं करा फिर मेल।।

 *

उग्रसेन क्रोधित हुए, किया कंस प्रतिरोध।

कंस न माना एक भी, भूल गया सब बोध।।

 *

कैद किए अपने पिता, डाला कारागार।

मद, घमण्ड में भूलकर, खूब किया प्रतिकार।।

 *

राजा मथुरा का बना, बढ़ गए अत्याचार।

मनमानी वह नित करे, बढ़े पाप के भार।।

 *

भद्र अष्टमी व्योम घन, छाईं खुशी अपार।

मातु देवकी गर्भ से, हुआ कृष्ण अवतार।।

 *

पुत्र आठवें कृष्ण थे, सत्य हुई यह बात।

बरसे जमकर मेघ तो, थी अँधियारी रात।।

 *

ताले टूटे जेल के, हुआ कृष्ण अवतार।

प्रहरी सोए नींद में, मातु कर रही प्यार।।

 *

वासुदेव गोकुल चले, सुत को लेकर साथ।

शेषनाग अवतार ने, ढका कृष्ण का गात।।

 *

यमुना जी भी घट गईं, किया कृष्ण को पार।

घर आए वह नन्द के, प्रभु की कृपा अपार।।

 *

लिटा पलँग पर कृष्ण को, हो वसुदेव निहाल।

प्रभु की लीला चल रही, अदभुत मायाजाल।।

 *

मातु यशोदा नींद में, रिमझिम है बरसात।

बेटी उनकी साथ ले, लौटे रातों – रात।।

 *

जन्मे माता रोहिणी, सुंदर से बलराम।

जग में प्यारे नाम हैं, बलदाऊ औ’ श्याम।।

 *

धन्य यशोदा हो गईं, पाकर के गोपाल।

गोकुल में खुशियाँ बढ़ीं, उच्च नन्द का भाल।।

 *

अत्याचारी कंस के, बढ़े पाप आचार।

चली एक कब कंस की, ईश लिए अवतार।।

 *

बलदाऊ सँग कृष्ण ने, किए अनेकों खेल।

गोकुल रसमय हो गया, बढ़ा प्रेम अरु मेल।।

 *

गाय चराईं कृष्ण ने, ग्वालों के नित संग ।

कभी चुराते मधु, दही, सभी देखकर दंग।।

 *

मिश्री, माखन, दही प्रिय, उनको भाए खूब।

रोज करें नाटक नए, कभी न आए ऊब।।

 *

हँस – हँस बीता बालपन, किए चमत्कृत काम।

देख चकित गोकुल हुआ, मनमोहन – बलराम।।

 *

कंस किया मलयुद्ध को, मिला निमंत्रण श्याम।

साथ – साथ दोनों चले, कृष्ण और बलराम।।

 *

छोटे से ही कृष्ण ने, मल्ल भी दिए पछाड़।

अत्याचारी कंस को, दिया उसी दिन मार।।

 *

कैद से छूटे मातु – पित, और नानु उग्रसेन।

खुशियाँ घर – घर बढ़ गईं, प्रेम में भीगे नैन।।

 *

मातु देवकी खुश बहुत, और पिता वसुदेव।

कृष्ण सभी को प्रिय हैं, हैं देवों के देव।।

 *

मुन्ना भी खुश बहुत था, सुनकर कृष्णावतार।

भक्तों का करते रहे, सदा कृष्ण उद्धार।।

 *

“बच्चो कैसी लगी कविता में कहानी।”

तभी अर्णव बोला, ” मुझे तो बहुत ही सुंदर लगी।”

सोनी भी कहाँ चुप रहने वाली थी, वह भी बोली, ” नानाजी इतने सरल शब्दों में इत्ती अच्छी कहानी, मुझे तो बहुत पसंद आई है। मैं तो याद करके कृष्णजन्माष्टमी पर अबकी बार स्कूल में सुनाऊँगी।”

“अरे वाह सोनी, क्या बात है? बच्चो मुझे तो नींद आने लगी है, अब आप दोनों भी सो जाओ। पाँच बार गायत्री मंत्र का सुनाते-सुनाते।”

तीनों ही गायत्री समवेत स्वर पढ़ने लगते हैं—

“ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात —“

“बच्चो इस मंत्र का अर्थ हिंदी में याद है न।”

“हाँ नाना जी मुझे याद है। आपने ही तो याद कराया है। मुझे तो गायत्री मंत्र बोलकर बहुत अच्छी नींद आती है।” सोनी बोली।

अर्णव बोला, “मुझे भी। डरावने सपने भी नहीं आते कभी।”

“अच्छा एक बार दोहरा लेते हैं- हे प्रभु आप प्राण स्वरूप हैं, आप दुःखनाशक हैं, आप पापनाशक हैं, आप मेरी अंतरात्मा में धारण कर मुझे अच्छे रास्ते पर चलाते रहिए।”

बच्चो अब लाइट बंद करता हूँ, “शुभरात्रि बच्चो।”

“शुभरात्रि नाना जी!”

© डॉ राकेश चक्र

(एमडी,एक्यूप्रेशर एवं योग विशेषज्ञ)

90 बी, शिवपुरी, मुरादाबाद 244001 उ.प्र.  मो.  9456201857

Rakeshchakra00@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – एकदा नैमिषारण्ये ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – एकदा नैमिषारण्ये ? ?

सूत जी बोले, ‘नैमिषारण्य में एक सुंदर भूखंड हुआ करता है..।’ श्रद्धालुओं के चेहरे पर उस सौंदर्य का वर्णन सुनने की उत्सुकता जगी।

‘उस भूखंड के बारे में बताइए न प्रभु!’, सामूहिक स्वर में मनुहार थी।

‘इस भूखंड में हर तरफ हरीतिमा है। भूखंड का प्रत्येक नगर आकर्षक उद्यानों से सुशोभित है। यहाँ की नदियों में प्रवाहित होता सलिल अमृत-सा निर्मल और प्राणों को पुष्ट करने वाला  है। यहाँ के निवासी नदियों को माता के रूप में पूजते हैं। उनकी आरती उतारते हैं। गौ को वे अपनी जननी के समान मान देते हैं। अपने स्वामित्व की आधी भूमि पर ही वे अलट-पलट कर कृषि करते हैं, शेष भूमि पशुओं के चरने के लिए छोड़ दी जाती है। यहाँ हरे वृक्षों की कटाई प्रतिबंधित है, उनकी रक्षा करने और महात्म्य सुनने का भी विधान है। पंचमहाभूतों की प्रतिष्ठा है। प्रकृति के घटकों में ही ईश्वर के दर्शन किये जाते हैं। स्वर्ग के सुख और देवता भी ईर्ष्या करें, ऐसा मनोरम है ये भूखंड!’

कथा सुनाई जाती रही, पीढ़ियों तक श्रोता तृप्त होते रहे। कालांतर में अपने पूर्वजों से इस भूखंड का वर्णन सुनने वाली नई पीढ़ी को भी पुरानी कथा में उत्सुकता जगी।

खेत और पेड़ रौंद कर खड़ी की गई चमचमाती गगनचुम्बी इमारत के एअर कंडीशंड कक्ष में प्लास्टिक  की बोतल से मिनरल पानी पीते हुए नई पीढ़ी ने सूत जी से कहा, ‘उस सुंदर भूखंड की कथा सुनाइए न!’

सूत जी बोले, ‘नैमिषारण्य में एक समय ऐसा सुंदर भूखंड हुआ करता था..!’

?

© संजय भारद्वाज  

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️  नवरात्र साधना सोमवार दि. 22 सितम्बर 2025 से बुधवार 1 अक्टूबर तक चलेगी 🕉️

💥 इस साधना का मंत्र होगा-

या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता,
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।

इस मंत्र की कम से कम एक माला (108 जप) का संकल्प लेना होगा। माला जप के साथ मौन साधना एवं आत्मपरिष्कार साधना चलेंगी। 💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा – वक्त सबका बाप है ☆ डॉ. रामेश्वरम तिवारी ☆

डॉ. रामेश्वरम तिवारी

संक्षिप्त परिचय

  • हिंदी-प्राध्यापक(सेवानिवृत्त) महारानी लक्ष्मीबाई शासकीय कन्या स्नातकोत्तर महाविद्यालय, भोपाल  (म.प्र).
  • नई दुनिया, दैनिक भास्कर, वीणा, हंस, धर्मयुग, कादम्बिनी आदि पत्र-पत्रिकाओं में कविता और लघुकथाएँ प्रकाशित। पुस्तकः कविता के ज़रिए,  मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी के सौजन्य से प्रकाशित।

आज प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम विचारणीय लघुकथा वक्त सबका बाप है

☆ लघुकथा – वक्त सबका बाप है ☆ डॉ. रामेश्वरम तिवारी

गली, मोहल्ले, गाँव से लेकर शहर, शहर से लेकर देश, और देश से लेकर दुनिया भर में चौधरियों की भरमार है। यह परम्परा भिन्न-भिन्न नामों और उपाधियों से आदिम काल से चली आ रही है और आगत में भी अनवरत रूप से गतिमान रहेगी।

चौधरी अपने को सर्व शक्तिमान मानता है और कई मायनों में होता भी है। उसके चारों ओर चमचों की फ़ौज लगी रहती है। वह प्रशंसा का भूखा होता है। बड़ी-बड़ी डींगें हाँकना उसकी आदत में शुमार होता है। अपनी ताकत और दौलत के बूते पर ज़रूरतमंद और कमजोर व्यक्तियों पर अपनी हुकूमत क़ायम रखता है। अपने जायज़-नाजायज फ़ैसलों को थोपकर अपना रौब गाँठता है। अपने अधीनों पर जुल्म और ज़्यादतियाँ ढहाता है और बेचारे अधीनस्थ चुपचाप बर्दाश्त करते रहते है।

इधर पिछली सदी में दुनिया के सबसे बड़े और शक्तिशाली चौधरी के समक्ष छोटे, पर खुद्दार और मजबूत इरादों के धनी चौधरी ने चुनौती पेश कर दी है। उनके बीच ऐसी ज़बरदस्त भिड़ंत हुई कि उसकी बड़े चौधरी की हेकड़ी निकल गई। वह पगला कर गली के गुंडों की तरह धमकियों पर उतर आया। कल तक जो दुनिया में लगी युद्धाग्नि को बुझाने के हवाई दावे किया करता था, आज वही दुनिया को आग के हवाले करने की बातें कर रहा है।

पर इन दिनों हवा में ग़ज़ब का शोर है। लोगों का कहना है कि बड़बोले चौधरी का भेजा फिर गया है। दुनिया को अपनी उँगली पर नचाना चाहता है, पर वह भूल गया कि वक्त के दरिए का ढेर सारा पानी बह चुका है। वह जिन देशों के लोगों को गँवार और जंगली समझा करता था उनमें आत्म स्वाभिमान जाग उठा है। वे अपने पैरों पर उठ खड़े हुए हैं। उन्होंने सहमति में सिर हिलाने, हाथ ऊपर उठाने और जी-हजूरी करने से साफ़-साफ मना कर दिया है।

कदाचित मद में अँधा चौधरी भूल गया कि दुनिया में किसी भी महाबली की चौधाराहट हमेशा के लिए नहीं रही है। वक्त का कोई बाप नहीं है। वक्त सबका बाप है। और जब वक्त अपने पर आता है, तो बड़े से बड़े राजे-महाराजे, अर्जुन जैसे धनुर्धरों, भीम जैसे महाबाहो, सिकंदरों, बादशाहों की पलक झपकते खटिया खड़ी कर देता है।… तो सुनो! मिस्टर चौधरी फिर तुम किस देश की मूली हो।

© डॉ. रामेश्वरम तिवारी

सम्पर्क – सागर रॉयल होम्स, होशंगाबाद रोड, भोपाल-462026

मोबाईल – 8085014478

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कथा-कहानी # # १२९ – सबसे खास: हमारे बॉस – भाग – ३ ☆ श्री अरुण श्रीवास्तव ☆

श्री अरुण श्रीवास्तव

(श्री अरुण श्रीवास्तव जी भारतीय स्टेट बैंक से वरिष्ठ सेवानिवृत्त अधिकारी हैं। बैंक की सेवाओं में अक्सर हमें सार्वजनिक एवं कार्यालयीन जीवन में कई लोगों से मिलना   जुलना होता है। ऐसे में कोई संवेदनशील साहित्यकार ही उन चरित्रों को लेखनी से साकार कर सकता है। श्री अरुण श्रीवास्तव जी ने संभवतः अपने जीवन में ऐसे कई चरित्रों में से कुछ पात्र अपनी साहित्यिक रचनाओं में चुने होंगे। उन्होंने ऐसे ही कुछ पात्रों के इर्द गिर्द अपनी कथाओं का ताना बाना बुना है। प्रस्तुत है एक अप्रतिम श्रृंखला सबसे खास: हमारे बॉस” 

☆ कथा-कहानी # १२९ – सबसे खास: हमारे बॉस – भाग – ३ 🥇 श्री अरुण श्रीवास्तव ☆

शीर्षक भ्रमित करता है क्योंकि हमारे माइंडसेट इस तरह बन गये हैं कि व्यक्ति या पद के हमारे आकलन हमारे अनुभवों और अपेक्षाओं पर आधारित होते हैं। हम अक्सर मान लेते हैं कि हमें जो मिला, शायद योग्यता से कम मिला है या फिर ज़रूरत से ज्यादा पा लिया है।कम मिलने पर तो हम निष्पक्षता की गुहार लगाते हुये उत्तरदायित्व रूपी टोपी से उस सर (Head) को सुशोभित करने में रत्ती भर संकोच नहीं करते जो हमारा हेड या बॉस होता है पर अपेक्षा और योग्यता से अधिक मिलने का पूरा श्रेय खुद ही हड़पने में संकोच नहीं करते।पर मान लीजिए कि बॉस की जगह ईश्वर हो तो फिर क्या होता है।जीवन, सिर्फ ऑफिस की चारदीवारों से घिरा नहीं होता, पाना और खोना, कम या ज्यादा, जैकपॉट या सेट बेक सब कुछ ही तो जीवन के अंग ही हैं जिसमें शैशव काल से लेकर वृद्धावस्था तक हर पायदान के परिणाम ईश्वर ने निर्धारित कर दिया है।

अगर मिल गया तो बहुत अच्छा और अगर नहीं मिला तो ये ईश्वर की इच्छा। “जाहे विधि राखे राम, ताहि विधि रहिए “हमारी सनातन काल से चली आ रही जीवनशैली है जो शायद बदलते समय के साथ धूमिल पड़ रही है क्योंकि अधिकांश परिवारों का अपने नौनिहालों के लिए लक्ष्य 95% से शुरू हो रहा है।हम लोगों के सेवाकाल में भी वार्षिक मूल्यांकन में 95% पाना, याने “पदोन्नत” होने का अवसर गंवाना माना जाता रहा था।पर ये नंबर गेम बहुत कुछ छीन लेता है और शुरु हो जाती है रेटरेस। शुक्र है कि ये नंबर गेम हम सभी के जीवनकाल के लिए ईश्वरीय विधान नहीं है। प्रकृति ने सभी को सुनहले पल के उपहार दिये हैं।बहुत कुछ देख पाते हैं पर बहुत कुछ छूट भी जाता है, जो छूट जाता है वो शायद फोकस कहीं और होने से या फिर सर के ऊपर से गुजर जाने जैसा ही होता है।हर पल अपने आप में महत्वपूर्ण होता है जिसमें जीवन पाने से लेकर जीवन खोने तक की संभावनाएं छुपी रहती हैं, “जिंदगी का सफर है ये ऐसा सफर, कोई समझा नहीं, कोई जाना नहीं।है ये ऐसी डगर, चलते हैं सब मगर, कोई समझा नहीं कोई जाना नहीं”।

जीवन चलने का नाम है तो इसी तरह हम सभी और हम सभी के बॉस और उनकी भी बॉस भी इसी परंपरा का पालन करते रहेंगे याने यह श्रंखला जारी रहेगी। 

© अरुण श्रीवास्तव

संपर्क – 301,अमृत अपार्टमेंट, नर्मदा रोड जबलपुर 

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈

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