☆ लघुकथा ☆ ~ लेखक लोकेश के विचार ~ ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆
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लोकेश की कलम उसके मन के भावों को पढ़ रही थीl लेकिन लोकेश का मन उथल-पुथल एवं बेचैनी से खुद को अलग ही नहीं कर पा रहा थाl नतीजा यह हुआ कि उसका आलेख उथल-पुथल और बेचैनी भरा ही उतराl लेख तो लेख था,लिखा गया तो उसे कहीं न कहीं उतरना ही थाl किताब के पन्नों में उतरकर लोगों के दिल में उतरना इन लेखों की फितरत होती हैl
लोकेश ने यह लेख कब लिखा और कब किताब के पन्नों में समाया, वह स्वयं ही भूल ही गया थाl धीरे धीरे काफी समय बीत गयाl
अब लोकेश एक बड़ा साहित्यकार और दर्शन शास्त्र का प्रवक्ता बन गया थाl उसके हर शब्द, हर वाक्य एक विचार बन गए थेl ऐसे विचार जो समाज को प्रेरणा देते थेl अब लोग लोकेश की लिखी हर पंक्तियों को लोकेश के विचार मानकर उसका आदर और अनुसरण करते थेl
सभागार में आज काफी भीड़ थीl लोकेश एक से एक सुंदर विचारों का प्रतिपादन कर रहे थेl दर्शक बड़ी ही शालीनता, धैर्य और गंभीरता के साथ लोकेश की हर बात को सुन रहे थे और अपने मन में उतार रहे थेl
अचानक सभागार में शोरगुल हुआl पीछे की पंक्तियों में बैठे हुए दो युवक समूहों के मध्य आपस में किसी मुद्दे पर गरमा गरम बहस होने लगी थीl युवकों का एक समूह बड़ी ही बेबाकी और दावे के साथ कह रहा था कि ये विचार लोकेश सर के हो ही नहीं सकतेl जबकि दूसरा समूह कह रहा था कि अरे भाई! आकर अपनी आंखों से देखा तो लो ये विचार लोकेश सर की ही एक पुस्तक में छपे हुए थेl मैं कहीं अन्यत्र से कोई विचार लाकर नही रख रहा हूँl युवक बार-बार लोकेश के उस पुस्तक का नाम भी ले रहे थे जिसमें ये विचार छपे थेl
मंच से संबोधन कर रहे लोकेश को अतीत में लिखी हुई अपनी उस पुस्तक का स्मरण हो रहा थाl यह विचार वास्तव में उसी के विचार थेl लेकिन मंच पर वक्ता के रूप सम्बोधन कर रहे लोकेश यह बताने का साहस नहीं जुटा पा रहे थे कि यह विचार आज मंच से मुख्य वक्ता के रूप में सम्बोधन कर रहे लोकेश के ही हैl अचानक लोकेश के अंतर्मन के लेखक ने उसके कानों में आकर कुछ कहा और लोकेश मंच से कुछ इस प्रकार का संबोधन करना शुरू कर दिए –
“मेरे प्यारे श्रोतागण ! मैं आपसे एक बात कहना चाहता हूंl यह जरुरी नही कि लेखक की लिखी हर बात सही ही होl लेखक के लेख तत्कालीन परिस्थितियों के आधार पर तो लिखे जाते ही जाते हैंl उससे भी बड़ी बात यह होती है कि लेख को लिखते समय लेखन की मन:स्थिति क्या है और उसका लेखकीय अनुभव कितना बड़ा हैl आज मैं इस बड़े मंच से हाथ जोड़कर आपसे अपील करना चाहता हूं कि मेरी ही पुस्तक में लिखे हुए मेरे ही इन विचारों को, मेरा विचार न मानते हुए, इसे अपने मन से निकाल देl आपको आज, वर्तमान के लोकेश की बात को माननी है न कि अतीत के उस लोकेश के विचारों का अनुसरण करना है, उसके वय उम्र में मानसिक उथल-पुथल के बीच लिखे गए थेl”
(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा – गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी, संस्मरण, आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – नसीहत।)
रोशनी ने गुस्से में कहा- “अरे! तुम लोगों के घर मैं इसीलिए नहीं आती। तुम्हारे घर में उठने बैठने की भी जगह नहीं है।”
“दीदी – हर किसी को अपने मायके आना अच्छा लगता है। आप चिंता मत करो, आप मेरे कमरे में जाकर सो जाओ आराम से। शादी ब्याह के काम में तो थोड़ी सी देर हो ही जाती है।” रूबी ने अपनी ननद मीनाक्षी से कहा।
“बस बस मां को तो तुम अपने इशारे में नचाती रहती हो सारा दिन उनसे कुछ ना कुछ काम करवाती रहती हो और आप मुझे नसीहत दे रही हो।”
(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है सामाजिक विमर्श पर आधारित विचारणीय लघुकथा “सरकारी रोटी ”।)
☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २५० ☆
🌻लघुकथा🌻 🫓 सरकारी रोटी 🫓
कड़कती ठंडक में कुछ भले नेताओं को आम जनता के लिए अलाव की सुविधा का ख्याल मन में आ ही जाता है। बड़े धर्मात्मा होते है। दो चार जगहों पर अलाव लगवा ही देते हैं।
नेता जी के घर के पास मैदान में अलाव लगाया गया। आते – जाते राहगीर थोड़ी देर हाथ- पैर सेकतें नजर आए।
अचानक व्हीलचेयर रिक्शा को धक्का लगाती, एक महिला जिसमें एक बुजुर्ग बैठे हुए थे, सामने बड़े कटोरे में गीला आटा मढ़ा हुआ रखा, जल्दी – जल्दी चली आ रही थीं।
बड़ी खुशी से थपोले मार चार छः रोटियाँ बनाई। हाथ पैर सेकें। शायद ठंड और भूख दोनों से राहत मिली।
सुबह-सुबह एक साथ वाला बोला – – हम तुम्हें सब कुछ बताते हैं। कल तुम्हें सरकारी रोटी मिली वो भी अलाव वाली। तुमनें बताया नहीं। घमासान लड़ाई। सरकारी अलाव वाली रोटियाँ का माजरा समझते फफक – फफक कर रो पड़े।
इससे तो अच्छा था हम पन्नी कागज जला कर ही रोटी बना लेती। कम से कम मार तो नही खाते।
(ई-अभिव्यक्ति में मॉरीशस के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री रामदेव धुरंधर जी का हार्दिक स्वागत। आपकी रचनाओं में गिरमिटया बन कर गए भारतीय श्रमिकों की बदलती पीढ़ी और उनकी पीड़ा का जीवंत चित्रण होता हैं। आपकी कुछ चर्चित रचनाएँ – उपन्यास – चेहरों का आदमी, छोटी मछली बड़ी मछली, पूछो इस माटी से, बनते बिगड़ते रिश्ते, पथरीला सोना। कहानी संग्रह – विष-मंथन, जन्म की एक भूल, व्यंग्य संग्रह – कलजुगी धरम, चेहरों के झमेले, पापी स्वर्ग, बंदे आगे भी देख, लघुकथा संग्रह – चेहरे मेरे तुम्हारे, यात्रा साथ-साथ, एक धरती एक आकाश, आते-जाते लोग। आपको हिंदी सेवा के लिए सातवें विश्व हिंदी सम्मेलन सूरीनाम (2003) में सम्मानित किया गया। इसके अलावा आपको विश्व भाषा हिंदी सम्मान (विश्व हिंदी सचिवालय, 2013), साहित्य शिरोमणि सम्मान (मॉरिशस भारत अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी 2015), हिंदी विदेश प्रसार सम्मान (उ.प. हिंदी संस्थान लखनऊ, 2015), श्रीलाल शुक्ल इफको साहित्य सम्मान (जनवरी 2017) सहित कई सम्मान व पुरस्कार मिले हैं। हम श्री रामदेव जी के चुनिन्दा साहित्य को ई अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों से समय समय पर साझा करने का प्रयास करेंगे।
आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय गद्य क्षणिका “– पाँव लागी माँ…” ।)
~ मॉरिशस से ~
☆ कथा कहानी ☆ गद्य क्षणिका # ८८ — पाँव लागी माँ —☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆
मेरी किशोर उम्र की बात है। हम मित्र फिल्म ‘मदर इंडिया’ देखने जाते। पर मुझे पैसा तो अपने पिता से ही मिलता, लेकिन वे घर पर नहीं थे। मैंने माँ से कहा। पड़ोस की औरतों से मेरी माँ के कानों में इस फिल्म की चर्चा पहुँची थी। मेरी माँ ने स्वयं अपने यहाँ से पैसा दे कर मुझे जाने के लिए कहा था। उस दिन मैं अपनी माँ के पैर छू कर ‘मदर इंडिया’ फिल्म देखने गया था।
(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के लेखक श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही गंभीर लेखन। शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है। साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको पाठकों का आशातीत प्रतिसाद मिला है।”
हम प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है इस शृंखला की अगली कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों के माध्यम से हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)
☆ संजय उवाच # ३१६ ☆ छत्रछाया…
प्रातः भ्रमण के बाद पार्क में कुछ देर व्यायाम करने के लिए बैठा। व्यायाम के एक चरण में दृष्टि आकाश की ओर उठाई। जिन पेड़ों के तनों के पास बैठकर व्यायाम करता हूँ, उनकी ऊँचाई देखकर आँखें फटी की फटी रह गईं। लगभग 70 से 80 फीट ऊँचे, विशाल पेड़ एवम उनकी घनी छाया। हल्की-सी ठंड और शांत वातावरण, विचार के लिए पोषक बने। सोचा, माता-पिता भी पेड़ की तरह ही होते हैं न! हम उन्हें उतना ही देख-समझ पाते हैं जितना पेड़ के तने को। तना प्रायः हमें ठूँठ-सा ही लगता है। अनुभूत होती इस छाया को समझने के लिए आँखें फैलाकर ऊँचे, बहुत ऊँचे देखना होता है। हमें छत्रछाया देने के लिए निरंतर सूरज की ओर बढ़ते और धूप को ललकारते पत्तों का अखण्ड संघर्ष समझना होता है। दुर्भाग्य यह कि अधिकांश मामलों में छाया समाप्त हो जाने पर ही समझ आता है, माँ-बाप का साया सिर पर होने का महत्व ! …
अँग्रेज़ी की एक लघुकथा इसी सार्वकालिक सार्वभौम दर्शन का शब्दांकन है। छह वर्ष का लड़का सामान्यत: कहता है, ‘माई फादर इज़ ग्रेट।’ बारह वर्ष की आयु में आते-आते उसे अपने पिता के स्वभाव में ख़ामियाँ दिखने लगती हैं। उसे लगता है कि उसके पिता का व्यवहार विचित्र है। कभी बेटे की आवश्यकताएँ पूरी करता है, कभी नहीं। किशोर अवस्था में उसे अपने पिता में एक गुस्सैल पुरुष दिखाई देने लगता है। युवा होने पर सोचता है कि मैं अपने बच्चों को दुनिया से अलग, कुछ हटकर-सी परवरिश दूँगा।…फिर उसकी शादी होती है। जीवन को देखने की दृष्टि बदलने लगती है। वह पिता बनता है। पिता होने के बाद अपने पिता का दृष्टिकोण उसे समझ आने लगता है। दस-बारह साल के बच्चे की हर मांग पूरी करते हुए भी कुछ छूट ही जाती हैं। यह विचार भी होता है कि यदि जो मांगा, उपलब्ध करा दिया गया तो बच्चा ज़िद्दी और खर्चीले स्वभाव का हो जायेगा। बढ़ते खर्च के साथ वह विचार करने लगता है कि उसके पिता सीमित कमाई में सारे भाई-बहनों की पढ़ाई का खर्च कैसे उठाते थे! उधर उसका बेटा/ बेटी भी उसे लगभग उसी तरह देखते-समझते हैं, जैसे उसने अपने पिता को देखा था। आगे चलकर युवा बेटे से अनेक बार अवांछित टकराव होता है। फिर बेटे की शादी हो जाती है। …चक्र पूरा होते-होते बचपन का वाक्य, काल के परिवर्तन के साथ,जिह्वा पर लौटता है, वह बुदबुदा उठता है, ‘माई फादर वॉज़ ग्रेट।’
अनुभव हुआ, हम इतने बौने हैं कि पेड़ हों या माता-पिता, लंबे समय तक गरदन उठाकर उनकी ऊँचाई निहार भी नहीं सकते, गरदन दुखने लगती है। गरदन दुखना अर्थात अनुभव ग्रहण करना। यह ऊँचाई इतने अधिक अनुभव की मांग करती है कि ‘इज़’ के ‘वॉज़’ होने पर ही दिखाई देती है।
…ईश्वर सबके सिर पर यह ऊँचाई और छत्रछाया लम्बे समय तक बनाये रखें।
अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆
मोबाइल– 9890122603
संजयउवाच@डाटामेल.भारत
writersanjay@gmail.com
☆ आपदां अपहर्तारं ☆
मार्गशीर्ष साधना संपन्न हुई। अगली साधना की जानकारी आपको शीघ्र दी जावेगी।
अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं।
≈ संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈
(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही गंभीर लेखन। शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं। हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)
संजय दृष्टि – संभावना
-देखता हूँ कि रोज़ सुबह बिना लांघा आप बालकनी में गमले में रखे पौधों में पानी डालते हैं।
-जी डालना ही चाहिए। इन पौधों को गमले में हमने लगाया है तो इन्हें समुचित जल, प्रकाश, खाद देना हमारा कर्तव्य बनता है। ये पौधे अपनी हर आवश्यकता के लिए हम पर निर्भर हैं।
-बात तो आपने पते की कही है। अच्छा एक बात और बताइए।
-पूछिए।
-यह इधर वाला जो गमला है, इसमें तो बहुत दिनों से कोई पौधा नहीं है। फिर इसकी मिट्टी में पानी क्यों डालते हैं आप?
-हाँ, इस गमले में कोई पौधा नहीं है। लेकिन इसकी माटी में पहले वाले पौधे के कुछ बीज पड़े होने की संभावना अवश्य है। हो सकता है कि उनमें से कोई बीज अंकुरण की तैयारी में हो। मैं गमले की मिट्टी नहीं, उसमें निहित संभावना के बीज सींचता हूँ।
अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆
मोबाइल– 9890122603
संजयउवाच@डाटामेल.भारत
writersanjay@gmail.com
☆ आपदां अपहर्तारं ☆
मार्गशीर्ष साधना संपन्न हुई। अगली साधना की जानकारी आपको शीघ्र दी जावेगी।
अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं।
≈ संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈
(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा – गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी, संस्मरण, आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – जीवन का रंग।)
☆ लघुकथा # ९५ – जीवन का रंग☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆
सुनो पूजा! तुम रोज-रोज खाना बनाकर क्यों बाहर को फेंक देती हो और मैं तुम्हें दो-चार चीज बनाने को बोल देता हूं तो तुम्हारा मुंह बन जाता है?
कमल जी ने गुस्से से अपनी बहु रानी की ओर देखा।
पूजा ने कहा – मम्मी जी आप मुझे देख रही है सुबह से मैं काम में व्यस्त हूं बाहर मैंने कब खाना फेंक दिया?
देखो बहू मैं क्यों झूठ बोलूंगी कल भी शाम को बाहर खाना पड़ा था और आज अभी यह देखना रोटी और यह सब्जी कितने अच्छे से उसके अंदर डाली हुई है रोल बनाकर?
मम्मी जी यह कौन कर रहा है?
मेरे पास इतनी फुरसत थोड़ी ना है कि मैं खाना बनाकर फेंकूंगी और आपको तो पता है कि मैंने आज आलू की सब्जी कहां बनाई?
ऐसी हरकतें कौन कर रहा है सामने वाली भाभी जी की यहां सीसीटीवी लगा हुआ है उसमें देख कर आती हूं। कौन है यह मेरे घर के सामने खाना फेंक कर घर में झगड़ा करवा रहा है?
बहु सामने वाली रागिनी भाभी जी के दरवाजे पर दस्तक देती है।
भाभी जी दरवाजा खोलिए थोड़ा काम है।
क्या हुआ? आज लग रहा है खाना जल्दी बन गया आपका – मुस्कुराते हुए रागिनी ने पूछा।
नहीं आज मेरा खाना जल्दी नहीं बना है बल्कि घर में युद्ध हो गया है। रागिनी तुम अपने सीसीटीवी में देखकर बताओ कि मेरे घर के सामने रोज-रोज खाना कौन रख रहा है?
रागिनी और पूजा ने जब सीसीटीवी में देखा तो उन्हें बहुत आश्चर्य हुआ कि उनके बगल वाली भाभी ही उनके घर के सामने रोज खाना रखकर, कुछ टोटका कर रही थी।
इसका वीडियो बना लेती हूं और मम्मी जी को दे देती हूं मुझे बहुत परेशान करके रखा है।
पूजा ने वापिस घर आकर अपनी सास को बताया कि – मम्मी जी आप मेरे मोबाइल में यह वीडियो देख लीजिए अब आपको पता चल जाएगा कि खाना कौन बना बनाकर फेंक रहा है वरना आपके बेटे के आने के बाद आप मेरी ही शिकायत करती।
अरे बहु यह क्या कह रही है मैं अभी इसकी खबर लेती हूं।
फिर वे पड़ोसन झुमरी बहू से मिलकर बोली – आजकल के व्हाट्सएप पर मोबाइल ज्ञान को सुन सुनकर यह तुझे क्या हो गया कि बाबा के चक्कर में पड़कर तू यह सब काम क्यों कर रही है? इस सब में तू अपना समय और घर दोनों को बर्बाद कर देगी। प्रेम और श्रद्धा से भगवान की पूजा कर और मानवता के धर्म को समझ।
कमल जी की बातें सुनकर उनकी पड़ोसन झुमरी एकदम सन्न रह जाती है उसके चेहरे का रंग उड़ जाता हैं। वह रोने लगती है और कहती है मम्मी जी अब ऐसा कभी नहीं होगा। अब मैं सही राह पर चलूंगी।
कमला जी ने कहा ठीक है आज मैं तुम्हें माफ कर रही हूं। बेटा जीवन के रंग अजब-गजब होते हैं खुशी-गम धूप-छाँव की तरह आते जाते है। तुम्हारी कोई समस्या है तो मेरे पास आओ।
(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है सामाजिक विमर्श पर आधारित विचारणीय लघुकथा “हस्तरेखा”।)
☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २४९ ☆
🌻लघुकथा🌻 🤲हस्तरेखा 🤲
सदियों से चली आ रही ज्योतिष विद्या, हस्त रेखा, टोना – टोटका, उपाय कोई मानता कोई नहीं मानता।
परन्तु जहाँ पर काम बन जाए सभी एक साथ।
एक हस्त रेखा वाले बाबा की दुकान चल पड़ी। 20-25 लोग सदैव लाईन पर खड़े ही मिलते।
अपना हुलिया इस कदर बना रखें थे कि सच में देखने वाला मोहित हो जाता था। हर बात सच्ची जान पड़ती थी।
अचानक एक हाथ आगे बढ़ा। बाबा जी ने देखा—तुम्हारी हस्त रेखा कह रही है तुम्हें किसी का मालिकाना मिलेगा। बिना कमाए ही सब मिलेगा।
जब तक कुछ और कहते उनको एक पर्ची दिखने लगी लिखा था – – चुपचाप स्वागत करके अपनी जगह मुझे बिठा दो। वरना – – हस्त रेखा मुझे भी बनाना आता है। पीछे की पंक्ति में माँ खड़ी है।
बिजलियाँ कौंध गई। अपनी गर्भवती स्त्री को मारते मारते अधमरा छोड़ बाबा बनने का ढोंग अब समाप्त होता दिखने लगा। मेरी हस्त रेखा में ढूँढ निकालने का योग बना हुआ है।
(ई-अभिव्यक्ति में मॉरीशस के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री रामदेव धुरंधर जी का हार्दिक स्वागत। आपकी रचनाओं में गिरमिटया बन कर गए भारतीय श्रमिकों की बदलती पीढ़ी और उनकी पीड़ा का जीवंत चित्रण होता हैं। आपकी कुछ चर्चित रचनाएँ – उपन्यास – चेहरों का आदमी, छोटी मछली बड़ी मछली, पूछो इस माटी से, बनते बिगड़ते रिश्ते, पथरीला सोना। कहानी संग्रह – विष-मंथन, जन्म की एक भूल, व्यंग्य संग्रह – कलजुगी धरम, चेहरों के झमेले, पापी स्वर्ग, बंदे आगे भी देख, लघुकथा संग्रह – चेहरे मेरे तुम्हारे, यात्रा साथ-साथ, एक धरती एक आकाश, आते-जाते लोग। आपको हिंदी सेवा के लिए सातवें विश्व हिंदी सम्मेलन सूरीनाम (2003) में सम्मानित किया गया। इसके अलावा आपको विश्व भाषा हिंदी सम्मान (विश्व हिंदी सचिवालय, 2013), साहित्य शिरोमणि सम्मान (मॉरिशस भारत अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी 2015), हिंदी विदेश प्रसार सम्मान (उ.प. हिंदी संस्थान लखनऊ, 2015), श्रीलाल शुक्ल इफको साहित्य सम्मान (जनवरी 2017) सहित कई सम्मान व पुरस्कार मिले हैं। हम श्री रामदेव जी के चुनिन्दा साहित्य को ई अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों से समय समय पर साझा करने का प्रयास करेंगे।
आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय गद्य क्षणिका “– गरीब लेखन…” ।)
~ मॉरिशस से ~
☆ कथा कहानी ☆ गद्य क्षणिका # ८७ — गरीब लेखन —☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆
युवक को कोठे पर आधारित एक उपन्यास से लेखन की शुरुआत करनी थी। इसके लिए आवश्यक था वह जा कर कोठे का अध्ययन करे। पर वहाँ उसे पता चला बहुत पैसा चुकाना पड़ता। वह चुका न पाता। तब तो वह वहाँ से बिना अनुभव कमाये लौट गया। उसने उस लेखन में मन को तपाया जो बिन दाम चुकाये सर्वत्र बिखरा होता है। यह एक गरीब लेखक का लेखन हुआ। वह कालांतर में अपने इस गरीब लेखन से संसार में छा गया।
(प्रख्यात कवि, नाटककर, शिक्षाविद और सामाजिक कार्यकर्ता श्री मंजीत सिंह जी, ‘ख़ान मंजीत भावड़िया “मजीद”’ के नाम से प्रसिद्ध हैं। वर्तमान में वे पंजाबी यूनिवर्सिटी, पटियाला से भाषा विज्ञान में पी एच डी कर रहे हैं और कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के उर्दू विभाग में सहायक प्राध्यापक के रूप में कार्यरत हैं और उर्दू भाषा के संरक्षण व प्रचार प्रसार के प्रति समर्पित हैं। उनकी प्रमुख साहित्यिक कृतियों में “हरियाणवी झलक” (काव्य संग्रह) और “बिराणमाट्टी” (नाटक), रम्ज़ ए उर्दू, हकीकत, सच चुभै सै शामिल हैं, जो हरियाणा की संस्कृति और सामाजिक जीवन की झलक प्रस्तुत करती हैं। उनके साहित्यिक कार्यों को हरियाणा साहित्य अकादमी, हरियाणा उर्दू अकादमी, वैदिक प्रकाशन और अन्य प्रतिष्ठित संस्थानों द्वारा सम्मानित किया गया है। साहित्य और शिक्षा के साथ-साथ, ख़ान मनजीत अपने पारिवारिक परंपरा से जुड़े हुए एक कुशल कुम्हार (पॉटर) भी हैं।)
आज प्रस्तुत है सुश्री अनुष्का शर्मा जी द्वारा लिखित पुस्तक “मां का जन्मदिन (बाल कहानियां)” पर चर्चा।
☆ “मां का जन्मदिन (बाल कहानियां)” – लेखिका – सुश्री अनुष्का शर्मा☆ चर्चा – श्री मनजीत सिंह ☆
पुस्तक चर्चा
पुस्तक -मां का जन्मदिन (बाल कहानियां)
प्रकाशन -नोशन प्रैस पब्लिकेशन हाउस, चेन्नई भारत
लेखिका- अनुष्का शर्मा
पुस्तक समीक्षा – मनजीत सिंह
क़ीमत -150 रूपए
पृष्ठ संख्या -49
☆ मां का जन्म दिन – अनुष्का शर्मा की बाल कहानियाँ – श्री मनजीत सिंह ☆
यह किताब मां का जन्म दिन बाल कहानियो की है मैं इस की पुस्तक समीक्षा कर रहा हूं मुझे अच्छा लगता है कि हमारे आगे आने वाली पीढी तैयार हो रही है । मेरी बेटी अनुष्का शर्मा द्वारा लिखी किताब है ।
जब हम बाल कहानियों में रस्किन बॉन्ड की किताबों की बात करते हैं, तो हमारे मन में हरी-भरी प्रकृति, पहाड़ और एक खूबसूरत गांव का इलाका याद आता है। ठीक उसी तरह की कहानी है बड़ी खूबसूरत बैकग्राउंड के साथ-साथ दिलचस्प कहानियां भी हैं। हालांकि अनुष्का शर्मा भी बाल साहित्य के लिए मशहूर होने वाली हैं, लेकिन इनकी किताबें बड़ों को भी उतनी ही दिलचस्प लगती हैं। हमें बाल कहानियां , कविता आदि पुस्तक के लिए ऐसी ही एक किताब मिली।
जब मैंने चला कि मैंने अनुष्का शर्मा की किताब बाल कहानियां की मिली तो मुझे पता था कि इसमें पढ़ने के लिए शानदार कहानियों का खजाना है। इस किताब में 13 कमाल की कहानियां हैं। कहानियां इतनी असली और शानदार हैं कि हमें उन्हें पढ़ने में बहुत मज़ा आया। शब्दकोश बहुत अच्छे से प्रयोग हैं और बहुत असली भी हैं।
कहानियां इतने असली तरीके से लिखी गई हैं, कि ऐसा लगता है जैसे कहानियां असल में हमारी आंखों के सामने हो रही हों।
मुझे इस किताब में सबसे ज़्यादा “चालू चिंकी चींटी” कहानी पसंद आई। मुझे यह इसलिए पसंद आया क्योंकि मुझे वह हिस्सा पढ़ना अच्छा लगा क्योंकि पिंकी और चिंकी दोनो चुगलखोर होती हैं।
नींद और सपना कहानी की कुछ पंक्तियां जो मुझे पसंद आई ।फ़कीर के साथ एक हट्टे-कट्टे व्यक्ति को देखकर सेठ ने उन्हें काम पर रख लिया। वे दोनों सेठ के कहे अनुसार काम करने लगे। जैसे ही दिन समाप्त हुआ. सेठ ने उन्हें उनकी दिहाड़ी दे दी। राजा और फ़क़ीर दोनों ही बहुत थक गए थे और रात भी हो गई थी। राजा को बहुत भूख भी लग रही थी। इसीलिए जो धन राजा ने दिन भर कड़ी मेहनत कर कमाया था, उससे उसने दाल-चावल खरीद लिए। दोनों को रात गुज़ारने के लिए एक टूटी-फूटी झोंपड़ी मिल गयी और दोनों वहां जाकर खाना खाकर सोने के लिए लेट गए।
राजा लेटते हुए सोचने लगा, ‘मुझे नहीं लगता कि मुझे आज भी नींद आएगी? फिर आज तो मैं अपने आरामदायक शयनकक्ष में भी नहीं हूँ, बल्कि एक झोंपड़ी में भूमि पर लेटा हुआ हूँ।’
राजा ने यह सोच कर अपनी आँखें बंद कर लीं, और जब उसने अपनी आँखें खोलीं तो देखा कि अगला दिन हो चुका था, और सूरज आसमान में आ गया था। राजा बहुत खुश हुआ। फ़क़ीर राजा से पहले ही सोकर उठ गया था। राजा फ़क़ीर के पास जाकर बोला, “मुझे कल इतनी अच्छी नींद आई जो शायद ही कभी इतने बरसों में आई हो। मगर यह सब कैसे हुआ? मैंने अपने सपने के बारे में भी नही।
दिवाली के तोहफे से कुछ पंक्तियां
“अब यह बताओ कि जो तुम्हारे उपहारों की सूची है उनमें से क्या क्या तुम्हारी बुनियादी जरूरतें हैं?”
यह सुनकर अगस्त्य चुप हो गया। उसके पापा ने कहा, “तुम्हे साइकिल की जरुरत है वह तुम्हें ज़रूर लेकर देंगे। मगर यह सब विडियो गेम, फ़ोन वगैरह, इसकी तुम्हें अभी ज़रुरत नहीं। तुम्हें हमने सारी सुविधाएं दी हुई हैं। किसी चीज़ की कमी नहीं है तुम्हारे पास, मगर इन लोगों की तो बुनियादी ज़रूरतें ही पूरी नहीं होतीं। तुम्हें इसलिए जीवन में ज़रूरत से ज़्यादा चीजें चाहिए क्योंकि तुम अपने दोस्तों के पास वह चीजें देखते हो, या तुम अपने से अमीर लोगों के साथ अपनी तुलना करते हो। मगर जब तुम अपनी तुलना इन लोगों से साथ करोगे तब तुम्हें एहसास होगा कि तुम कितने भाग्यशाली हो?”
अगस्त्य ने अपनी तुलना जब स्लम में रह रहे लोगों से करनी शुरु की, तब उसे एहसास हुआ कि सचमुच उसके जन्मदिन के उपहारों की मार्गे फजूल हैं। उनमें से आधी से अधिक चीज़ों की तो उसे ज़रुरत भी नहीं है।
दिवाली कहानी से पंक्तियां
रोहन और उसकी माँ को मेले में देख सुनीता सोचने लगी, ‘रोहन कितना मेहनती लड़का है। सुबह स्कूल आता है और शाम को मेले में दीये बेचता है। जहाँ सुनीता व उसका परिवार सुविधाजनक जीवन जी रहे हैं, वहीं रोहन अपने परिवार की आमदनी बढ़ाने के लिए काम कर रहा है। जहाँ मेरी बेटी मेले में हर झूला झूली, पसंद का खिलौना भी लिया और खूब खाया पीया, उसी मेले में रोहन अपने परिवार की घर चलाने में सहायता कर रहा था।” बस यही सोचते-सोचते सुनीता को नींद आ गयी।
अगले दिन जब वह स्कूल आयी और रोहन की कक्षा में पहुंची तो उसने देखा कि रोहन स्कूल नहीं आया था। सुनीता ने रोहन के दोस्त प्रतीक से पूछा तो उसने बताया, “मैम, उसे घर में काम है, इसलिए वह आज नहीं आ सका।” स्कूल की जैसे ही छुट्टी हुई सुनीता अपने घर न जाकर रोहन के घर चली गयी। वहां जाकर उसने देखा कि रोहन मिट्टी के दीये व घड़े, जो बाहर सूरज में सूख कर पक्के हो गए थे, को एक-एक कर एक जगह इकठ्ठा कर रहा था।
रोहन ने जैसे ही सुनीता को देखा तो वह काम छोड़कर अपनी अध्यापिका के पास आ गया और कहा, “मैम! आप यहाँ?”
रोहन के पिता, जो दीये बना रहे थे, वह भी रोहन के पास आ गए और बोले, ‘नमस्ते मैम! आप रोहन की गणित की अध्यापिका हो न, आप यहाँ? क्या रोहन अच्छे से पढ़ाई नहीं कर रहा?” इससे पहले सुनीता जवाब देती रोहन के पिता ही आगे बोल पड़े, “वो दरअसल दीवाली आने वाली है, और यही समय होता है हम कुम्हारों के थोड़े से ज्यादा पैसे कमाने का, और इसीलिए ही रोहन कुछ दिनों से स्कूल न जाकर घर पर मेरी मदद करा रहा था। मगर आप चिंता न करें, मैं कल से पक्का इसे स्कूल भेजूंगा।”
सुनीता ने रोहन के पापा से कहा, “आप परेशान न हों। रोहन एक होनहार व काबिल बच्चा है और अपना काम भी समय पर करता है। और इससे अच्छी क्या बात हो सकती है कि वह आपकी काम में मदद भी करता है। दरअसल मुझे आपसे कुछ काम था।”
सभी कहानियां अनुभव,मन,मां का जन्म दिन, मुझे इंसान बना दो,दावत-ए-गल्लू गधा,चालू चिंकी चींटी,शहर और गांव, नींद और सपना, जन्मदिन का तोहफा, दीवाली, ढिंढोरा, फुटबॉल मैच,भीख आदि पुस्तक में नीहित कहानियां लाजवाब और बहुत सुंदर शब्दों को गढ़ा है। अनुष्का शर्मा को मेरी तरफ से बधाई।
चर्चाकार… श्री मनजीत सिंह
सहायक प्राध्यापक (उर्दू), कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय कुरुक्षेत्र
manjeetbhawaria@gmail.com
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈