हिंदी साहित्य – कथा-कहानी ☆ लघुकथा – सुचालक ☆ सुश्री सविता मिश्रा ‘अक्षजा’ ☆

सुश्री सविता मिश्रा ‘अक्षजा

परिचय

शिक्षण : प्रयागराज विश्वविद्यालय से स्नातक (हिंदी, राजनीति-शास्त्र, इतिहास) 

सृजन की विधाएँ : लघुकथा, कहानी, व्यंग्य, छंदमुक्त कविता, पत्र, आलेख, समीक्षा, जापानी-विधा हाइकु-चोका आदि।

प्रकाशित कृतियाँ : ‘रोशनी के अंकुर’ एवं  ‘टूटती मर्यादा’ लघुकथा संग्रह तथा  ‘सुधियों के अनुबंध’ कहानी संग्रह। अस्सी के लगभग विभिन्न विधाओं में साझा-संग्रहों में रचनाएँ प्रकाशित। सम्पादन :  ‘खाकीधारी’ 2024{लघुकथा संकलन} ‘अदृश्य आँसू’ 2025 {कहानी संकलन} ‘किस्से खाकी के’ 2025 {कहानी संकलन} ‘उत्तर प्रदेश के कहानीकार’ 2025 {कहानी संकलन}

पुरस्कार : लघुकथा/समीक्षा/कहानी/व्यंग्य/कविता विधा में कई बार पुरस्कृत। आकाशवाणी आगरा से कहानी प्रसारित 

अनुवाद : ‘अदहने क आखर’ अवधी अनुबाद [लघुकथा-संकलन], कुछ लघुकथाएँ पंजाबी, उर्दू, नेपाली और उड़िया में अनूदित होकर प्रकाशित।

यू ट्यूब चैनेल :  ‘savita mishra akshja’ और ‘साहित्य एक समुन्दर: ‘अक्षजा’ नाम से।  ब्लॉग : ‘मन का गुबार’ एवं ‘दिल की गहराइयों से’।

सम्प्रति: परिवार की धुरी, ब्लॉगर, साहित्यकार, यूट्यूबर।

☆ लघुकथा – सुचालक ☆ सुश्री सविता मिश्रा ‘अक्षजा’ ☆

“आज मेरे मैसेज का तुमने कोई जवाब नहीं दिया।”

“सिर में दर्द हो रहा था यार।”

“क्यों! क्या हुआ?”

“अरे जानती ही हो, फेसबुक पर कहीं पार्टी विरोधी और समर्थकों की लम्बी हांक, तो कहीं जातिवाद का जहर।”

“अरे तो कौन कहता है कि फेसबुक की सारी पोस्ट पढ़ों!”

“सारी कौन पढ़ रहा। लेकिन फ्रेंडलिस्ट वालों की पोस्ट-कमेन्ट तो दिख ही जाती हैं। कमेन्ट ऐसे कि बुझ चुकी राख में भी आग पैदा कर दें।

“हटाओ अपनी फ्रेंड-लिस्ट से ऐसे सिर-दर्दो को, क्यों झेले पड़ी हो?”

“अरे यार! जातिवाद का जहर बोते देखकर क्रोध में दिल तो मेरा भी यही कहता है। उनकी प्रोफाइल खोलती भी हूँ, लेकिन अनफ्रेंड पर गया मेरा अँगूठा उस समय रुक जाता है, जब उनके द्वारा कहा गया दीदी/जिज्जी का सम्मानजनक संबोधन याद हो आता है।”

“भावनाओं में बहकर तुम उनके नकारात्मक विचारों को बढ़ावा दे रही हो, फिर से सोच लो!”

“नहीं यार, तू समझती क्यों नहीं है! ये दीदी/जिज्जी मेरे लिए सिर्फ शब्द नहीं है, बल्कि अपनेपन की मिठास है। मैं उन्हें अन्फ्रेंड करके इस रिश्ते को कसैला नहीं करना चाहती हूँ।”

“चाहे अपनी बात को शिष्टता से रखने पर भी वो तुम्हें अनफ्रेंड कर दें! पीठ पीछे तुम्हारी इस परम्परावादी सोच की चाहे हँसी ही क्यों न उड़ाएं! क्यों?” क्रोध की लकीरें दोनों के माथे पर उभर आई थीं।

“तू जानती है न कि स्त्रियाँ रिश्तों की सुचालक होती हैं। वे रिश्तों को तब तक जीना चाहती हैं, जब तक पानी सिर के ऊपर से न बहने लगे।” अब दोनों के चेहरे पर गर्वीली मुस्कान कानों तक खिंच गयी थी ।

© सुश्री सविता मिश्रा ‘अक्षजा’

सम्पर्क: फ़्लैट नंबर-302, हिल हॉउस, खंदारी अपार्टमेंट {हनुमान मन्दिर के बगल में} खंदारी, आगरा, {उ. प्र.} पिन-282002

ई-मेल: 2012.savita.mishra@gmail.com मोबाइल: 09411418621

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कथा कहानी – लघुकथा – “बच्चे पालने हैं…” ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

श्री कमलेश भारतीय 

(जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब)  शिक्षा-  एम ए हिंदी , बी एड , प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । यादों की धरोहर हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह -एक संवाददाता की डायरी को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से  कथा संग्रह-महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कथा कहानी – लघुकथा – “बच्चे पालने हैं ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

आज मेडिकल हाल बंद था ।

क्यों ? साथ वाले करियाना के दुकानदार से पूछा ।

कुछ बता नहीं पाया ।

काफी दिनों से यहीं दवाई लेने से एक मुस्कान का रिश्ता बन गया था और नम्बर भी ले लिया था । 

फोन मिलाया ।

-क्या हुआ ? मेडिकल हाल बंद क्यों है ?

-चालान हो गया ।

-क्यो ?

-नकली ग्राहक आया और बिना पर्ची वाली दवाई दे बैठा।

-फिर सात दिन मेडिकल हाल बंद करने का सरकारी हुक्म ।

-कब खुलेगा मेडिकल हाल ?

-बस । कल का दिन और बंद रहेगा ।

-जब इतनी बड़ी बात थी तो खोलने का हुक्म कैसे?

-ले लिया न माल इंस्पेक्टर ने ।

-अरे । ऐसे कैसे ?

-यह इंस्पेक्टर ऐसा ही है । कुछ दिन पहले सामने वाले केमिस्ट से भी ले गया ।

-तुमसे कितने ले गया ?

-छोड़ो जी ।

-क्यों ?

-बच्चे पालने हैं ।

-मैं तुम्हारे पैसे वापस दिला सकता हूं ।

-कैसे ?

-अधिकारियों तक मामला ले जाकर ।

-न जी । ऐसा न करना ।

-क्यों ?

-जो हो गया सो हो गया ।

-अरे ? कोई बड़ा जुर्म नहीं किया और बड़ी रकम ऐंठ ले गया और तुम चुप के चुप सह रहे हो जुल्म?

-बस जी । क्या करें ?…  बच्चे पालने हैं ।

शहीद भगतसिंह ने यदि एक बार भी सोचा होता कि बच्चे पालने हैं तो,,,,

मैं सोचता गया सोचता गया…

© श्री कमलेश भारतीय

पूर्व उपाध्यक्ष हरियाणा ग्रंथ अकादमी

संपर्क :   1034-बी, अर्बन एस्टेट-।।, हिसार-125005 (हरियाणा) मो. 94160-47075

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ पुरस्कृत लघुकथा – कोख में आत्महत्या… ☆ सुश्री नरेंद्र कौर छाबड़ा ☆

सुश्री नरेंद्र कौर छाबड़ा

(सुप्रसिद्ध हिंदी साहित्यकार सुश्री नरेन्द्र कौर छाबड़ा जी पिछले 40 वर्षों से अधिक समय से लेखन में सक्रिय। 5 कहानी संग्रह, 1 लेख संग्रह, 1 लघुकथा संग्रह, 1 पंजाबी कथा संग्रह तथा 1 तमिल में अनुवादित कथा संग्रह। कुल 9 पुस्तकें प्रकाशित।  पहली पुस्तक मेरी प्रतिनिधि कहानियाँ को केंद्रीय निदेशालय का हिंदीतर भाषी पुरस्कार। एक और गांधारी तथा प्रतिबिंब कहानी संग्रह को महाराष्ट्र हिन्दी साहित्य अकादमी का मुंशी प्रेमचंद पुरस्कार 2008 तथा २०१७। प्रासंगिक प्रसंग पुस्तक को महाराष्ट्र अकादमी का काका कलेलकर पुरुसकर 2013 लेखन में अनेकानेक पुरस्कार। आकाशवाणी से पिछले 35 वर्षों से रचनाओं का प्रसारण। लेखन के साथ चित्रकारी, समाजसेवा में भी सक्रिय । महाराष्ट्र बोर्ड की 10वीं कक्षा की हिन्दी लोकभरती पुस्तक में 2 लघुकथाएं शामिल 2018)

आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा कोख में आत्महत्या

? लघुकथा – कोख में आत्महत्या ? सुश्री नरेंद्र कौर छाबड़ा ?

(आचार्य जगदीशचंद्र शर्मा स्मृति अखिल भारतीय लघुकथा प्रतियोगिता 2025 में पुरस्कृत)

“ प्यारी मां , मैं जानता हूं आज तुम बेहद खुश हो , तनाव मुक्त हो, बल्कि यूं महसूस कर रही हो मानो जीवन में कोई बड़ी जंग जीत ली हो. आज तुमने सोनोग्राफी की आड़ में लिंग परीक्षण कराया. जब डॉक्टर ने कहा आपकी कोख में लड़का है तो तुम्हारे मुख से खुशी से हल्की सी चीख निकल गई थी. आखिर दो लड़कियों की कोख में हत्या के बाद तुम्हें वह खुशखबरी सुनने को मिली थी जिसका तुम मुद्दत से इंतजार कर रही थी.

डॉक्टर को अनेक बार धन्यवाद देकर तुम घर लौटी .पापा भी बहुत खुश हैं और दोनों बेटियों को जब बताया कि उनका भाई आने वाला है तो वे भी खुशी से चहकने लगीं .उन्हें भी खेलने के लिए छोटा सा खिलौना मिल जाएगा. राखी बांधने भाई के लिए कितना तरसती थीं अब वह इच्छा भी पूरी हो जाएगी.

 मेरी मां, विज्ञान ने कितनी भी तरक्की कर ली हो लेकिन इस बार डॉक्टर भी गच्चा खा गए. तुम्हारी कोख में लड़का नहीं बल्कि मैं हूं, न लड़का ना लड़की. जिसे आम  इंसान अधूरा कहते हैं. मैं चिंतित हूं यह सोच कर कि मेरे जन्म से तुम सबको कितना बड़ा सदमा लगेगा. मेरे जन्म पर तुमने बैंड बाजे बजवाने की योजना बना रखी है. उसके स्थान पर ताली बजाने वाले आ जाएंगे  क्या हाल होगा तुम्हारा ? बहनों का राखी बांधने का अरमान कहां पूरा होगा? समाज से तिरस्कार,  व्यंग्य बाण, खिल्ली, सहानुभूति के सिवाय कुछ भी तो नहीं मिलेगा.  कैसे जी पाओगे इतने तनाव, परेशानियों के बीच ? इन सब से बचने का एक ही तरीका है मेरे जन्म को रोकना.  इसी में सब की भलाई है. इसलिए मैं अपनी सांसों की गति को विराम देने जा रहा हूं. कोख में कन्या भ्रूण हत्या का सिलसिला तो वर्षों से जारी है , लेकिन कोख में आत्महत्या कदाचित पहली बार होगी वह भी एक ऐसे शिशु द्वारा जिसके आगमन का पूरा परिवार बड़ी शिद्दत से इंतजार कर रहा है.इंद्रधनुषी सपने देखे जा रहे हैं.खुशियां मनाने की बड़ी योजनाएं बनाई जा रही हैं.

हमारी जमात हमेशा सबकी खुशियों में शामिल होकर , नाच गाकर आशीर्वाद और दुआएं देती है.उसी का अनुसरण करते हुए मैं भी आपकी खुशियों और दुआओं की कामना करते हुए हमेशा के लिए बिदाई ले रहा हूं…”

 तुम्हारा अजन्मा शिशु

© नरेन्द्र कौर छाबड़ा

संपर्क –  सी-१२०३, वाटर्स एज, विशालनगर, पिंपले निलख, पुणे- ४११०२७ (महाराष्ट्र) मो.  9325261079 

Email-  narender.chhabda@gmail.com

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # 219 – वैज्ञानिक बाल कथा – शरीर की आत्मकथा – ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ ☆

श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

(सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” जी का  हिन्दी बाल -साहित्य  एवं  हिन्दी साहित्य  की अन्य विधाओं में विशिष्ट योगदान हैं। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में रचना सहित 145 बालकहानियाँ 8 भाषाओं में 1160 अंकों में प्रकाशित। प्रकाशित पुस्तकेँ-1- रोचक विज्ञान कथाएँ, 2-संयम की जीत, 3- कुएं को बुखार, 4- कसक, 5- हाइकु संयुक्ता, 6- चाबी वाला भूत, 7- बच्चों! सुनो कहानी, इन्द्रधनुष (बालकहानी माला-7) सहित 4 मराठी पुस्तकें प्रकाशित। मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी का श्री हरिकृष्ण देवसरे बाल साहित्य पुरस्कार-2018 51000 सहित अनेक संस्थाओं द्वारा सम्मानित व पुरस्कृत। साप्ताहिक स्तम्भ “श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य”  के अंतर्गत साहित्य आप प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकते हैं। आज प्रस्तुत है आपकी वैज्ञानिक बाल कथा – शरीर की आत्मकथा)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # 219 ☆

☆ वैज्ञानिक बाल कथा – शरीर की आत्मकथा ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ 

क्या आप मुझे जानते हो ? शरीर से आती आवाज सुन कर बेक्टो चौंका, ‘‘ नहीं तो ?’’

‘‘ मैं शरीर हूं. ’’ उस के शरीर से आवाज आई, ‘‘ चलो ! तुम्हें मैं अपनी आत्मकथा सुनाता हूं.’’ कहने के साथ उस ने लगातार बोलना शुरू किया. बेक्टो केवल गरदन हिलाहिला कर हांहां कहता रहा.

मेरे अंदर मस्तिष्क सब से महत्वपूर्ण अंग है. यह हजारों कंप्युटर जितनी सूचनाएं एकत्र कर सकता है. यह पूरे शरीर को अपने नियंत्रण में रखता है. किसे क्या काम करना है ?  कैसे करना है ? इन सब को यही दिशानिर्देश देता है.

दूसरा महत्वपूर्ण अंग आंख होती है. यह 2 मिली सैकण्ड में किसी भी चीज पर प्रतिस्थापित हो जाती है. किसी दृश्य को देखना इसी के द्वारा संभव है. हम ज्ञान का अधिकांश  भाग इसी के द्वारा अर्जित करते हैं.

तीसरा महत्वपूर्ण अंग फैफडे होते हैं. ये एक दिन में एक टेंकर से भी ज्यादा खून साफ कर के उसे पूरे शरीर में पंपा कर देते हैं. पूरे शरीर में आवश्यक पोषक तत्व पहुंचाने में इसी खून की महत्वपूर्ण भूमिका होती है.

हाथपैर हमारे चौथे महत्वूपर्ण अंग होते हैं. इस के द्वारा ही हम अधिकांश कार्य करते हैं. ये न हो तो हमारे अधिकांश कार्य बाधित हो जाए. इन अंग पर पाई जाने वाली एक इंच त्वचा में 72 फीट नव्र्स होती है.

कान हमारे पांचवे महत्वपूर्ण अंग है. इन के द्वारा हम ध्वनि सुन कर बोलना सीखते हैं. यदि ये न हो तो हम बोल नहीं सकते हैं. इसलिए जो व्यक्ति सुन नहीं पाता हे, वह बोल नहीं पाता है.

नाक हमारा छटा सब से महत्वपूर्ण अंग है. इस के बिना हम सूंघने में सक्षम नहीं हो सकते हैं. खुशबू और बदबू इसी से पता चलती है. ये नाक ही है जो हमारी सांस के रूप में जाने वाली हवा को साफ व शुद्ध करने का काम करती है.

मुंह हमारा सातवां सब से महत्वपूर्ण अंग है. इस के द्वारा हम बोलने और खाने का काम करते हैं. इस के अंदर उपस्थित मजबूत दांत 280 किलो तक का वजन सहन कर सकते हैं. दांत जितने दिखने में छोटे होते हैं उतने ही ज्यादा मजबूत होते हैं.

आठवें महत्वपूर्ण अंग हमारे निकास द्वार हैं. ये अंग हमारे शरीर के मलमूत्र को बाहर करते हैं.

उपरोक्त सभी अंग हमारे शरीर के महत्वपूर्ण अंग है जो हमे दिखाई देते हैं. इन के अलाव भी कई अंग है. गला, छाती, पेट, पीठ, कमर, घुटने, पिंडली और बहुत कुछ. मगर,  सब से महत्वूपर्ण अंग में त्वचा भी शामिल है.

वैसे हमारे शरीर के पास पांच ज्ञानेंद्रिया है. नाक,  कान,  आंख, मुंह और त्वचा. जिन के द्वारा हम ज्ञानवर्धन करते हैं.

इतना कह कर शरीर चुप हो गया. बैक्टो को अपने स्कूल जाना था. वह चुपचाप स्कूल चला गया. उसे आज अपनी पांचों ज्ञानेंद्रियो के बारे में लिखना था. शरीर की यह आत्मकथा सुन कर वह बहुत कुछ जान गया था. इसलिए वह खुश था. ‘‘ चलो ! आज मैं अपनी ज्ञानेंद्रियों के बारे में अच्छी तरह से लिख पाऊंगा.’’ 

© श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

11- 05-2019

संपर्क – 14/198, नई आबादी, गार्डन के सामने, सामुदायिक भवन के पीछे, रतनगढ़, जिला- नीमच (मध्य प्रदेश) पिनकोड-458226

ईमेल  – opkshatriya@gmail.com मोबाइल – 9424079675 /8827985775

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा-कहानी ☆ सेवकराम की लघुकथाएं – सम्मानपत्र, स्मृतिचिन्ह और पुस्तकें ☆ हेमन्त बावनकर ☆

हेमन्त बावनकर

☆  लघुकथा ☆ सेवकराम की लघुकथाएं ☆

☆ सम्मानपत्र, स्मृतिचिन्ह और पुस्तकें ☆

(मेरी लघुकथाओं के पात्र ‘सेवकराम’ के इर्दगिर्द रची गई कुछ लघुकथाओं को आपसे साझा करने का प्रयास।)

सेवकराम जी को अपने प्रिय साहित्यकार मित्र डॉ रंजीत की काफी याद आ रही थी. उनका देहावसान बीस दिन पूर्व ही हुआ था. उनके जाने के एक माह पूर्व ही उनकी पत्नी रंजना भाभी का देहावसान हो गया था.

उन्होंने अपना सारा जीवन अध्यापन और साहित्य सेवा में निकाल दिया. उनके सुशील और सेवाभावी पुत्र सुजीत और विनम्र पत्नी सुनीता ने रंजीत जी और रंजना भाभी की अंत तक सेवा की. ऐसे भाग्यशाली बहुत कम ही देखने को मिलते हैं. डॉ रंजीत ने अपने बेटे को बमुश्किल शहर के एक प्राइवेट कॉलेज में नौकरी भी दिला दी थी.

आज सेवाराम जी को डॉ रंजीत की याद उनके घर तक ले गई थी. सुजीत उन्हें डॉ रंजीत जी के कमरे में ले गया.  वे टेबल के पास कुर्सी पर बैठ गए जैसा हमेशा बैठते थे. कमरा अब भी वैसा ही था.

औपचारिकतावश सुजीत से उन्होंने पूछा – “बेटे मेरे लायक कुछ हो तो निसंकोच बताना.”

सुजीत ने झिझकते हुए अपनी समस्या साझा करना चाहा- “चाचा जी, आप यह सब जो इस कमरे में चारों ओर देख रहे हैं न, पिताजी के सम्मानपत्र, स्मृतिचिन्ह और पुस्तकों से भरी बुकशेल्फ! इतनी ही पुस्तकें इस दो कमरे के घर में भरी पड़ी हैं। मैं इनका क्या करूँ? कोई इन्हें लेने के लिए भी तैयार नहीं है. शहर में एक भी पुस्तकालय नहीं बचे जहाँ ये पुस्तकें दी जा सकें. उनके कोई मित्र भी लेने को तैयार नहीं हैं.”

अब सेवकराम जी का मस्तिष्क शून्य हो गया. उन्हें कुछ सूझ ही नहीं रहा था. बड़े मुश्किल से वह यही कह सके – “बेटा सुजीत, मुझे सोचने के लिए थोडा वक्त दो.”

और वे चुपचाप घर की ओर निकल पड़े.

©  हेमन्त बावनकर  

पुणे 

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # 234 – मै किसान हूँ ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ ☆

श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है सामाजिक विमर्श पर आधारित विचारणीय लघुकथा “मै किसान हूँ ”।) 

☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # 234 ☆

🌻लघु कथा🌻 👨‍🎓मै किसान हूँ 🌻

शहर में कई प्राईवेट दंत चिकित्सालय, और सभी अस्पताल में मारामारी। पहले हम, पहले हम, और नेता, पैसे वालों की पुर पहुँच। पूछताछ  कक्ष पर बैठी सिस्टर बार-बार कह रही थी – – – सभी लाइन में आए, सभी लाइन में आए!! अपनी-अपनी पारी से आए नहीं तो डॉक्टर साहब बाहर निकाल देंगे।

फिर ना कहना हमें बताया नहीं। सभी के नाम परिचय के साथ लिख रही थी।लगभग चौबीस वर्ष का युवक पिता के साथ बैठा था। जब उससे पूछा गया – –

आपका नाम– बहुत ही शालीनता के साथ उसने बोला- अभिषेक

किसको दिखाना है?

अपने पिताजी लेकर आया हूँ।

क्या करता है – – – खेती करता हूँ।

सर से पाँव तक  न जाने क्यों सभी  लोग देखने लगे। साधारण पहनावा पर कद काठी गठीला दमकता शरीर।

अपने पिताजी के दांत दर्द से वह परेशान हो रहा था। बातों ही बातों में पास बैठी एक सज्जन महिला ने पूछ लिया— नौकरी नहीं? मिली या पढ़ाई नहीं किया?

अभिषेक ने धीरे से गहरी मुस्कान के साथ बताया बी. ई. की पूरी पढ़ाई करने और सर्विस को छोड़ने के बाद मैं खेती करने आ गया।

पापा का हाथ बटाना चाहता हूँ।

और यह कहते हुए पेंट की जेब से नोटों की गड्डी को निकाला और फीस जमा करने लगा।

उसके दृढ विश्वास को देख महिला ने ताली बजाकर कहा – – गर्व से कहो मै किसान हूँ।

प्यार दुलार से उसके सिर पर हाथ फेरा और बोली अब कोई पूछे तो खेती करता हूँ नहीं गर्व से सीना तानकर कहना – – – मैं एक किसान हूँ।

अभिषेक के चेहरे पर मासूम भरी मुस्कान और किसान की पहचान।

© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ ≈ मॉरिशस से ≈ गद्य क्षणिका#68 – कविता का गिद्ध… – ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

श्री रामदेव धुरंधर

(ई-अभिव्यक्ति में मॉरीशस के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री रामदेव धुरंधर जी का हार्दिक स्वागत। आपकी रचनाओं में गिरमिटया बन कर गए भारतीय श्रमिकों की बदलती पीढ़ी और उनकी पीड़ा का जीवंत चित्रण होता हैं। आपकी कुछ चर्चित रचनाएँ – उपन्यास – चेहरों का आदमी, छोटी मछली बड़ी मछली, पूछो इस माटी से, बनते बिगड़ते रिश्ते, पथरीला सोना। कहानी संग्रह – विष-मंथन, जन्म की एक भूल, व्यंग्य संग्रह – कलजुगी धरम, चेहरों के झमेले, पापी स्वर्ग, बंदे आगे भी देख, लघुकथा संग्रह – चेहरे मेरे तुम्हारे, यात्रा साथ-साथ, एक धरती एक आकाश, आते-जाते लोग। आपको हिंदी सेवा के लिए सातवें विश्व हिंदी सम्मेलन सूरीनाम (2003) में सम्मानित किया गया। इसके अलावा आपको विश्व भाषा हिंदी सम्मान (विश्व हिंदी सचिवालय, 2013), साहित्य शिरोमणि सम्मान (मॉरिशस भारत अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी 2015), हिंदी विदेश प्रसार सम्मान (उ.प. हिंदी संस्थान लखनऊ, 2015), श्रीलाल शुक्ल इफको साहित्य सम्मान (जनवरी 2017) सहित कई सम्मान व पुरस्कार मिले हैं। हम श्री रामदेव  जी के चुनिन्दा साहित्य को ई अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों से समय समय पर साझा करने का प्रयास करेंगे।

आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय गद्य क्षणिका “– कविता का गिद्ध…” ।

~ मॉरिशस से ~

☆ कथा कहानी  ☆ गद्य क्षणिका # 68 — कविता का गिद्ध — ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

वह अपने कवि मित्र की तरह कविताएँ लिख कर उसी की तरह मशहूर होना चाहता था। पर पीछे तो छूट ही जाता था। बहुत बाद में उसे पता चला मित्र की कविताओं में तो बहुत सारा चोरी का माल है। उसके मन में बात आई, आज अपना स्वाभिमान इस तरह से हो जाए एक गिद्ध से अपनी होड़ मानता था। वक्त पर अपनी आँखें न खुलतीं तो कविता की देवी कभी पूछ लेती क्या गिद्ध का आभास तुम्हें होता नहीं था?

 © श्री रामदेव धुरंधर

11 / 07 / 2025

संपर्क : रायल रोड, कारोलीन बेल एर, रिविएर सेचे, मोरिशस फोन : +230 5753 7057   ईमेल : rdhoorundhur@gmail.com

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा – “जो भूला नहीं” ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

श्री कमलेश भारतीय 

(जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब)  शिक्षा-  एम ए हिंदी , बी एड , प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । यादों की धरोहर हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह -एक संवाददाता की डायरी को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से  कथा संग्रह-महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता)

☆ लघुकथा – “जो भूला नहीं” ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

– बेटा केशी! जल्द घर आ जाओ।

मां बुरी तरह सुबकती हुई फोन पर कह रही थी।

– क्यों? क्या हुआ?

– तुम्हारे छोटे भाई ने मुझे बैठक में अलग कर दिया है और अपनी रोटी पानी भी मैं ही बना कर खाती हूं। क्या करूं? बुढ़ापा पेंशन में कहीं गुजारा होता है! तुम आ जाओ बस।

– मैं कैसे आ सकता हूं मां?

– क्यों? तूने भी आंखें फेर लीं मां से?

– नहीं। पर मैं इतनी दूर जो हूं। छुट्टी लेनी पड़ेगी। मिले न मिले। बच्चों के पेपर हैं।

– जाओ फिर भूल जाओ मां को!

– ऐसे न कहो मां! मेरी मजबूरी को समझो। मैं जल्द आकर तुम्हें ले आऊंगा। फिर तो खुश?

– हाँ। जल्द आ जाना।

सुबकती सुबकती मां फोन रख गयी।

फिर जरूरत ही न रही लाने की।

कुछ दिन बाद माँ दम तोड़ गयी थी। भाई ने बुलाया और सब काम धाम छोड़कर भागा!

काश! पहले…!

© श्री कमलेश भारतीय

पूर्व उपाध्यक्ष हरियाणा ग्रंथ अकादमी

संपर्क :   1034-बी, अर्बन एस्टेट-।।, हिसार-125005 (हरियाणा) मो. 94160-47075

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संवाद # 152 ☆ लघुकथा – ☆ डॉ. ऋचा शर्मा ☆

डॉ. ऋचा शर्मा

(डॉ. ऋचा शर्मा जी को लघुकथा रचना की विधा विरासत में  अवश्य मिली है  किन्तु ,उन्होंने इस विधा को पल्लवित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी । उनकी लघुकथाएं और उनके पात्र हमारे आस पास से ही लिए गए होते हैं , जिन्हें वे वास्तविकता के धरातल पर उतार देने की क्षमता रखती हैं। आप ई-अभिव्यक्ति में  प्रत्येक गुरुवार को उनकी उत्कृष्ट रचनाएँ पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है स्त्री विमर्श पर आधारित एक विचारणीय लघुकथा ‘पर्दा। डॉ ऋचा शर्मा जी की लेखनी को सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – संवाद  # 152 ☆

☆ लघुकथा – सच से दो- दो हाथ ☆ डॉ. ऋचा शर्मा ☆

‘महेश! उठ कब तक सोता रहेगा?‘ – माँ ने आवाज लगाई। ‘ ‘कॉलोनी के सब लड़के क्रिकेट खेल रहे हैं, तू क्यों नहीं खेलता उनके साथ ? कितनी बार कहा है लड़कों के साथ खेलाकर। घर में घुसकर बैठा रहता है लड़कियों की तरह। ‘

‘मुझे अच्छा नहीं लगता क्रिकेट खेलना‘–उसने गुस्से से कहा।

सूरज की किरणें उसके कमरे की खिड़की से छनकर भीतर आ रही हैं। उसने लेटे- लेटे ही गहरी साँस ली-‘ सवेरा हो गया फिर एक नया दिन, पर मन इजाजत ही नहीं दे रहा बिस्तर से उठने की। करे भी क्या उठकर? उसके जीवन में कुछ बदलने वाला थोड़े-ही है? वही बातें, उसके शरीर को स्कैन करती निगाहें, मन में काई-सी जमी घुटन, जो न चुप रहने देती है, न चीखने। उसके शरीर का सच और घरवालों की आँखों पर पड़ा पर्दा? दो पाटों के बीच वह घुन-सा पिस रहा है, ओफ् ! – – – -’

तब तो अपना सच उसकी समझ से भी परे था, स्कूल-रेस में भाग लिया था। उसने दौड़ना शुरू किया ही था कि सुनाई दिया – ‘अरे! महेश को देखो, कैसे लड़की की तरह दौड़ रहा है। ‘ गति पकड़े कदमों में जैसे अचानक ब्रेक लग गया हो। वह वहीं खड़ा हो गया, बड़ी मुश्किल से सिर झुकाकर धीरे -धीरे चलता हुआ सबके बीच वापस आ खड़ा हुआ। क्लास में आने के बाद भी बच्चे उसे बहुत देर तक ‘लड़की -लड़की’ कहकर चिढ़ाते रहे। तब से वह कभी दौड़ ही नहीं सका, चलता तो भी कहीं से कानों में आवाज गूँजती- ‘लड़की है, लड़की‘, वह ठिठक जाता।

माँ के बार-बार कहने पर वह साईकिल लेकर निकल पड़ा और पैडल पर गुस्सा उतारता रहा। सारा दिन शहर में बेवजह घूमता रहा। साईकिल के पैडल के साथ ही विचार भी बेकाबू थे- ‘ बचपन से लेकर आज तक लोगों के ताने ही तो सुनता आया हूँ, आखिर कब तक चलेगा यह लुकाछिपी का खेल?‘

घर पहुँचकर उसने कमरे में जाकर अपना मनपसंद रंगीन शॉल निकाला और उसे दुप्पटे की तरह ओढ़कर मुस्कुराते हुए सबके बीच जाकर बैठ गया।

© डॉ. ऋचा शर्मा

प्रोफेसर एवं अध्यक्ष – हिंदी विभाग, अहमदनगर कॉलेज, अहमदनगर. – 414001

संपर्क – 122/1 अ, सुखकर्ता कॉलोनी, (रेलवे ब्रिज के पास) कायनेटिक चौक, अहमदनगर (महा.) – 414005

e-mail – richasharma1168@gmail.com  मोबाईल – 09370288414.

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – कथा-कहानी >> वेष की मर्यादा ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – कथा-कहानी >> वेष की मर्यादा ??

ठाकुर जी का मंदिर कस्बे के लोगों के लिए आस्था का विशेष केंद्र था। अलौकिक अनुभूति कराने वाला मंदिर का गर्भगृह, उत्तुंग शिखर, शिखर के नीचे उसके अनुज-से खड़े उरूश्रृंग। शिखर पर विराजमान कलश। मंदिर की भव्य प्राचीनता, पंच धातु का विग्रह और बूढ़े पुरोहित जी का प्रवचन..। मंदिर की वास्तु से लेकर विग्रह तक, पुरोहित जी की सेवा से लेकर उनके प्रवचन तक, सबमें गहन आकर्षण था। जिस किसी की भी दृष्टि मंदिर पर जाती, वह टकटकी बांधे देखता ही रह जाता।

मंदिर पर दृष्टि तो उसकी भी थी। सच तो यह है कि मंदिर के बजाय उसकी दृष्टि ठाकुर जी की मूर्ति पर थी। अब तक के अनुभव से उसे पता था कि पंच धातु की मूर्ति कई लाख तो दिला ही देती है। तिस पर सैकड़ों साल पुरानी मूर्ति याने एंटीक पीस। प्रॉपर्टी का डेप्रिसिएशन होता है, पर मूर्ति ज्यों-ज्यों पुरानी होती है, उसका एप्रिसिएशन होता है। मामला करोड़ों की जद में पहुँच रहा था।

उसने नियमित रूप से मंदिर जाना शुरू कर दिया। बूढ़े पुरोहित जी बड़े जतन से भगवान का शृंगार करते। आरती करते हुए उनकी आँखें मुँद जाती और कई बार तो आँखों से आँसू छलक पड़ते, मानो ठाकुर जी को साक्षात सामने देख लिया हो। मूर्ति की तरह ही पुरोहित जी भी एंटीक वैल्यू रखते थे।

आरती के बाद पुरोहित जी प्रवचन किया करते। प्रवचन के लिए बड़ी संख्या में लोग जुटते। उनका बोलना तो इतना प्रभावी ना था पर जो कुछ कंठ में आता, वह हृदय तल से फूटता। सुनने वाला मंत्रमुग्ध रह जाता। अनेक बार स्वयं पुरोहित जी को भी आश्चर्य होता कि वे क्या बोल गए। दिनभर पूजा अर्चना, ठाकुर जी की सेवा और रात में वही एक कमरे में पड़े रहते पुरोहित जी।

इन दिनों वेष की मर्यादा पर उनका प्रवचन चल रहा था।

“…श्रीमद्भागवत गीता का दूसरे अध्याय का 62वाँ और 63वाँ श्लोक कहता है,

“ध्यायतो विषयान् पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते।

सङ्गात्संजायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते॥

क्रोधाद्भवति संमोहः संमोहात्स्मृतिविभ्रमः।

स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति।

अर्थात विषयों का चिन्तन करनेवाले मनुष्य की उन विषयों में आसक्ति पैदा हो जाती है।  आसक्ति से कामना उत्पन्न होती है। कामना का अर्थ है, वांछा, प्राप्त करने की इच्छा। अतः आसक्ति से विषयभोग की इच्छा प्रबल हो जाती है। प्रबलता भी ऐसी कि विषयभोग में थोड़ा-सा भी विघ्न भी मनुष्य सहन नहीं कर पाता। यह असहिष्णुता क्रोध की जननी है।

 क्रोध आने पर मनुष्य का विवेक नष्ट हो जाता है। उसमें सम्मोह (मूढ़भाव) उत्पन्न हो जाता है। सम्मोह से स्मृति में भ्रम हो जाता है। स्मृति में भ्रम हो जाने पर बुद्धि का नाश हो जाता है। बुद्धि का नाश होनेपर मनुष्य कार्य-अकार्य में भेद नहीं कर पाता, सही-गलत का भान नहीं रख पाता। ऐसा मनुष्य अपनी स्थिति से गिर जाता है, उसकी आंतरिक मनुष्यता का पतन हो जाता है।

पूरी प्रक्रिया पर विचार करेंगे तो पाएँगे कि मनुष्यता कहीं बाहर से नहीं लानी पड़ती। सच्चाई, सद्विचार मूल घटक हैं जो हर मनुष्य में अंतर्भूत हैं। ये हैं तभी तो दोपाया, जानवर न कहलाकर मनुष्य कहलाया।

ध्यान रखना, हर मनुष्य मूलरूप से सच्चा होता है। दुनियावी  लोभ, लालच कुछ समय के लिए उसे उसी तरह ढके होते हैं जैसे जेर से भ्रूण। देर सबेर जेर को हटना पड़ता है, भ्रूण का जन्म होता है।

ढकने की बात आई तो वेष की भूमिका याद आई। आदमी की सच्चाई पर उसके वेष का बहुत असर पड़ता है। वह जिस वेष में होता है, उसके भीतर वैसा ही बोध जगने लगता है। सेल्समैन हो तो सामान बेचने के गुर उमगने लगते हैं। शिक्षक हो तो विद्यार्थी को विषय समझाने की बेचैनी घेर लेती है।  चौकीदार का वेश हो तो प्राण देकर भी संपत्ति, वस्तु या व्यक्ति की रक्षा करने के लिए मन फ़ौलाद हो जाता है…।”

…वह पुरोहित जी के वचन सुनता, मुस्करा देता।

आरती और प्रवचन के लिए रोज़ाना आते-आते पुरोहित जी से उसका संबंध अब घनिष्ठ हो चुका था। मंदिर के ताला-चाबी की जगह भी उसे ज्ञात हो चुकी थी। एक तरह से मंदिर का मैनेजमेंट ही देखने लगा था वह। 

प्रवचन की यह शृंखला तीन दिन बाद संपन्न होने वाली थी। हर शृंखला के बाद चार-पाँच दिन विराम काल होता। तत्पश्चात पुरोहित जी फिर किसी नये विषय पर प्रवचन आरंभ करते। आज रात उसने अपने सभी साथियों को बता दिया था कि विराम काल में ठाकुर जी का विग्रह कैसे अपने कब्ज़े  में लेना है। कौन सा दरवाजा कैसे खुलेगा, किस-किस दरवाज़े का ताला टूट सकता है, किसकी डुप्लीकेट चाबी वह बना चुका है। आज से तीसरी  रात योजना को सिद्ध करने के लिए तय हुई।

तीसरे दिन प्रवचन संपन्न हुआ। इस बार पुरोहित जी का स्वास्थ्य निरंतर बिगड़ता गया था। आज तो उन्हें बहुत अधिक थकान थी, ज्वर भी तीव्र था। उनका एक डॉक्टर शिष्य आज गाड़ी लेकर आया था। उसने ज़ोर दिया कि इस बार दवा से काम नहीं चलेगा। कुछ दिन दवाखाने में एडमिट रहना ही होगा।

पुरोहित जी, अपने ठाकुर जी को छोड़कर नहीं जाना चाहते थे। डॉक्टर शिष्य, स्थिति की नज़ाकत समझ रहा था, सो पुरोहित जी को साथ लिए बिना जाना नहीं चाहता था। अंतत:  जीत  डॉक्टर की हुई।

गाड़ी में बैठने से पहले पुरोहित जी ने उसे बुलाया। धोती से बंधी चाबियाँ खोलीं और उसके हाथ में देते हुए बोले,…”ठाकुर जी की चौकीदारी की ज़िम्मेदारी अब तुम्हारी। भगवान ने खुद तुम्हें अपना रक्षक नियुक्त किया है। आगे मंदिर की रक्षा तुम्हारा धर्म है।”

उसके बाँछें खिल गईं। उसने सुना रखा था कि ऊपर वाला जब देता है तो छप्पर फाड़कर देता है। सुने हुए को आज फलित होता देख भी रहा था। जीवन में पहली बार उसने मन ही मन सच्चे भाव से भगवान को माथा नवाया।

…रात का तीसरा पहर चढ़ चुका था। वह मंदिर के भीतर प्रवेश कर चुका था। अपनी टोली के आने से पहले सारे दरवाज़े खोलने थे। …अब केवल गर्भगृह का द्वार बाकी था। उसने चाबी निकाली और ताले में लगा ही रहा था कि गाड़ी में बैठते पुरोहित जी का चित्र बरबस सामने घूमने लगा,

“ठाकुर जी की चौकीदारी की ज़िम्मेदारी अब तुम्हारी। भगवान ने खुद तुम्हें अपना रक्षक नियुक्त किया है। आगे मंदिर की रक्षा तुम्हारा धर्म है।”

जड़वत खड़ा रह गया वह। भीतर नाना प्रकार के विचारों का झंझावात उठने लगा। ठाकुर जी के जिस विग्रह पर उसकी दृष्टि थी, उसी को टकटकी लगाए देख रहा था। उसे लगा केवल वही नहीं बल्कि ठाकुर जी भी उसे देख रहे हैं। मानो पूछ रहे हों,….मेरी रक्षा का भार उठा पाओगे न?…

विचारों की असीम शृंखला चल निकली। शृंखला के आदि से इति तक प्रवचन करते पुरोहित जी थे,

“….सम्मोह से स्मृति में भ्रम हो जाता है। स्मृति में भ्रम हो जाने पर बुद्धि का नाश हो जाता है। बुद्धि का नाश होनेपर मनुष्य कार्य-अकार्य में भेद नहीं कर पाता, सही-गलत का भान नहीं रख पाता..।”

उसकी स्मृति पर से भ्रम का कुहासा छँटने लगा था।

“..ध्यान रखना, हर मनुष्य मूलरूप से सच्चा होता है। दुनियावी  लोभ, लालच कुछ समय के लिए उसे उसी तरह ढके होते हैं जैसे जेर से भ्रूण। देर सबेर जेर को हटना पड़ता है, भ्रूण का जन्म होता है ।”

उसके अब तक के व्यक्तित्व पर निरंतर प्रहार होने लगे। भ्रूण जन्म लेने को मचलने लगा। जेर में दरार पड़ने लगी।

तभी दरवाज़ा खुलने की आवाज़ ने उसकी तंद्रा को भंग कर दिया। लाठियाँ लिए उसकी टोली अंदर आ चुकी थी।

“….आदमी की सच्चाई पर उसके वेष का बहुत असर पड़ता है। वह जिस वेष में होता है, उसके भीतर वैसा ही बोध जगने लगता है।”

ठाकुर जी के चौकीदार में बिजली प्रवाहित होने लगी। चौकीदार ने टोली को ललकारा। आश्चर्यचकित टोली पहले तो इसे मज़ाक समझी। सच्चाई जानकर टोली, चौकीदार पर टूट पड़ी।

चौकीदार में आज जाने किस शक्ति का संचार हो गया था।  वह गोरा-बादल-सा लड़ा। उसकी एक लाठी, टोली की सारी लाठियों पर भारी पड़ रही थी। लाठियों की तड़तड़ाहट में खुद को कितनी लाठियाँ लगीं, कितनी हड्डियाँ चटकीं, पता नहीं पर लहुलुहान  टोली के पास भागने के सिवा और कोई विकल्प नहीं बचा।

शत्रु के भाग खड़े होने के बाद उसने खुद को भी ऊपर से नीचे तक रक्त में सना पाया। किसी तरह शरीर को ठेलता हुआ गर्भगृह के द्वार तक ले आया। संतोष के भाव से ठाकुर जी को निहारा। ठाकुर जी की मुद्रा भी जैसे स्वीकृति प्रदान कर रही थी। उसके नेत्रों से खारे पानी की धारा बह निकली। हाथ जोड़कर रुंधे गले से बोला,

“…ठाकुर जी आप साक्षी हैं। मैंने वेष की मर्यादा रख ली।”

कुछ दिनों बाद मंदिर के परिसर में पुरोहित जी की समाधि के समीप उसकी भी समाधि बनाई गई।

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© संजय भारद्वाज  

 अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

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🕉️ श्री विष्णु साधना रविवार 6 जुलाई 2025 (देवशयनी एकादशी) को सम्पन्न हुई। अगली साधना की जानकारी शीघ्र ही दी जवेगी। ध्यान और आत्म परिष्कार यथावत चलते रहेंगे। 💥 🕉️  

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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