(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा – गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी, संस्मरण, आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – कर्तव्य।)
आशा जी अपने एक बैग में किताबें भरकर जल्दी-जल्दी अपने कदम बढ़ाते हुए ऑटो रिक्शा में बैठकर सिटी के बीच स्थित हिंदी लाइब्रेरी में पहुंच जाती हैं। जैसे ही वे गेट के अंदर जाती है, पक्षियों की चहचहाहट का मनोरम संगीत माहौल को खुशनुमा बना रहा था।
बाहर एक टेबल पर अखबार और तरह-तरह की मैगजीन रखी थी।
नगर के सभी वरिष्ठ नागरिक यहाँ पर आकर अखबार पढ़ते हैं और वे अपने बच्चों के अच्छे कपड़े, किताब, कॉपी, जैकेट एवं जूते सब यहाँ एक कोने में अलमारी में रख देते हैं जरूरतमंद अपने घर ले जाते हैं।
यह देखकर आशा जी को बहुत अच्छा लगा मन में एक प्रसन्नता हुई उन्होंने बाहर बैठे व्यक्ति से पूछा कि – “मैं भी कुछ दान करना चाहती हूँ, कहाँ रख सकती हूँ? पास बैठे व्यक्ति ने कहा कि “आप अंदर जाइए वहां पर एक बुजुर्ग दंपति बैठे हैं वह आपको सब बता देंगे।”
उसे सामने रिसेप्शन में बैठे सीनियर सिटीजन नजर आए ।
देखकर आशा ने कहा- “मैं कुछ किताबें यहाँ पर दान करने के लिए लाई हूँ लेकिन मैं क्या कुछ सामान भी लाकर यहाँ रख सकती हूँ?”
बुजुर्ग दंपति ने कहा- “बिल्कुल बहन आप यहाँ पर आकर पढ़ सकती हैं और सामान को दान दे सकते हैं।”
आशा जी ने कहा- “यहाँ पर मैं बैठकर अपने लेखन कार्य को अच्छे से कर सकती हूँ।”
आज मैंने एक बात समझी -“आप रचनाकारों को लिखने के लिए प्रेरित करने का नेक कार्य भी कर सकती हैं।”
वृद्ध महिला ने कहा- “महिलाऍं बहुत संघर्ष से लेखन कार्य करती है इसलिए हम उन्हें आगे बढ़ाने के लिए प्रेरित करते हैं। हमारे लाइब्रेरी में कोई भी आ सकता है।”
आशा जी ने कहा – “अधिकार की बात सब करते हैं किन्तु, आपने एक मिसाल कायम की है। अपने कर्तव्य का समाज के प्रति निर्वाह किया है।”
बुजुर्ग दंपति और आशा जी दोनों मुस्कुराने लगते हैं आशा जी की ऑंखों में एक नई ऊर्जा और चमक आ जाती है।
(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है सामाजिक विमर्श पर आधारित विचारणीय लघुकथा “करुण पुकार”।)
☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २५९ ☆
🌻लघुकथा🌻 🛕 करुण पुकार🛕
मंदिर के पास घर निवास होने से सभी प्रकार के आराधना प्रार्थना की आवाज आती रहती है। कभी बच्चे होने का बधावा, कभी मुंडन में रोती किलकारी, कभी कन्या भोज, कभी देवी पूजन, कभी बेटी की बारात में माता पूजन, कभी बहू के आने के बाद मंदिर में चढ़ावा, और कभी किसी के अपने से बिछड़ जाने पर शांत मन से बैठ सीढियों पर बातें करना।
घंटी और साज बाजे की आवाज बदल जाती है। कभी शहनाई, कभी ढोल, कभी मृदंग, कभी मंजीरे की झनक और कभी सिसकती आँहे, सिर्फ घंटी की पुकार, परंतु ईश्वर को पाने या उनसे मन्नत करने का तरीका अलग-अलग परंतु ठिकाना सबका एक।
आज सुबह आरती वंदन के बाद घंटी की आवाज थोड़ी धीमी सी आ रही थी, परंतु शोर शराबा कुछ बाँटने का हो रहा था। मंदिर प्रांगण भीड़भाड़ से भरा था। नीचे – ऊपर, आती- जाती, सीढ़ी पर बैठी अम्मा का गीत आज ऊंचे स्वर पर कुछ प्रसन्नता पूर्वक आ रही थी – – – जो अक्सर बैठकर करुण पुकार करती रहती थी।
धीरे से सविता ने पूछा अम्मा क्या बात है। आज करुण पुकार की जगह मीठे- मीठे गीत गा रही हो। बिटिया— आज बरसों बाद मेरा बेटा अपना बेटा लेकर आ रहा है। उसने मुझे बताया है कि मंदिर में आ जाना देख लेना। बस उसी का इंतजार कर रही हूँ।
सविता आश्चर्य से देखती रही क्या?? तुम्हें ले जाएगा।
अरे कहाँ। मैंने उसे अपना बनाया था। अनाथ को लालन-पालन कर पढ़ा लिखा बड़ा किया।
बिटिया उसने मुझे अपना थोड़े ही माना था। मेरी संतान नहीं है वह।
सविता तो बस सुनकर हृदय से गमगीन हो गई। जिस बच्चे के लिए वह तड़प रही है। वह तो सिर्फ उसे एक नौकरानी (आया) समझ रहा था।
इससे तो अच्छा था वह स्वयं ही अनाथ रहती किसी अनाथ को सनाथ बनाते। उसकी करुण पुकार बाजे शहनाइयों के बीच दब गई।
(ई-अभिव्यक्ति में मॉरीशस के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री रामदेव धुरंधर जी का हार्दिक स्वागत। आपकी रचनाओं में गिरमिटया बन कर गए भारतीय श्रमिकों की बदलती पीढ़ी और उनकी पीड़ा का जीवंत चित्रण होता हैं। आपकी कुछ चर्चित रचनाएँ – उपन्यास – चेहरों का आदमी, छोटी मछली बड़ी मछली, पूछो इस माटी से, बनते बिगड़ते रिश्ते, पथरीला सोना। कहानी संग्रह – विष-मंथन, जन्म की एक भूल, व्यंग्य संग्रह – कलजुगी धरम, चेहरों के झमेले, पापी स्वर्ग, बंदे आगे भी देख, लघुकथा संग्रह – चेहरे मेरे तुम्हारे, यात्रा साथ-साथ, एक धरती एक आकाश, आते-जाते लोग। आपको हिंदी सेवा के लिए सातवें विश्व हिंदी सम्मेलन सूरीनाम (2003) में सम्मानित किया गया। इसके अलावा आपको विश्व भाषा हिंदी सम्मान (विश्व हिंदी सचिवालय, 2013), साहित्य शिरोमणि सम्मान (मॉरिशस भारत अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी 2015), हिंदी विदेश प्रसार सम्मान (उ.प. हिंदी संस्थान लखनऊ, 2015), श्रीलाल शुक्ल इफको साहित्य सम्मान (जनवरी 2017) सहित कई सम्मान व पुरस्कार मिले हैं। हम श्री रामदेव जी के चुनिन्दा साहित्य को ई अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों से समय समय पर साझा करने का प्रयास करेंगे।
आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय गद्य क्षणिका “– तकदीर…” ।)
~ मॉरिशस से ~
☆ कथा कहानी ☆ गद्य क्षणिका # ९८ — तकदीर —☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆
(रिश्तों पर आधारित मेरी एक भावनात्मक सोच)
उसने जीवन पर्यंत अपनी तकदीर की तुलना अमावस से की। उसके पास न कभी ठीक से पैसा आया और न सेहत उस पर कृपालु हुई। यही उसकी तकदीर को अंधेरे पक्ष में ढालता था। परंतु आज उसके लिए तकदीर की परिभाषा बदल रही थी। उसके अपने बेटे – बेटियाँ उसके कंठ में पानी डाल रहे थे। सब की आँखों में उसके लिए मोह की आभा थी। पत्नी रो कर कह रही थी मत जाओ! उसने अपनों का यह संसार तकदीर से ही तो पाया था। बंद होती उसकी आँखों की अंतिम भाषा में लिखा हुआ था, — “इतनी तकदीर तुम्हारे पास थी और तुम यही पहचान न पाए थे।”
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री ओमप्रकाश पाण्डेय जीभारतीय स्टेट बैंक से 2015 में सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृत्त. सन 2018 से कविताओं और लघु कथाओं का नियमित रूप से लेखन. दो काव्य संग्रह “ऑंचल” और “किलकारियाँ (बालगीत संग्रह)” तथा दो कथा संग्रह “चूड़ियाँ” और “अनपढ़” प्रकाशित. लगभग तीन सौ से अधिक कहानियाँ व लघु कथाएं रचित जिनमें “मार्निंग वाक” (दस कहानियाँ), “आधुनिक विक्रम और वेताल की कथा” (दस कहानियाँ), दीदी, प्रश्न या आमंत्रण, सोंच, विश्वास आदि चर्चित रहीं हैं. आपके द्वारा सात सौ से अधिक कविताएँ रचित जो कई साहित्यक मंचों पर प्रस्तुत की गईं हैं. आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय कथा “बड़की बहू“.)
☆ कथा कहानी ☆ बड़की बहू —☆ श्री ओमप्रकाश पाण्डेय ☆
अरे बड़की बहु, बेटी मुझको चाय पिला दो, एक घंटे से जग कर बैठा हूँ, अभी तक मुझे चाय नहीं मिली. जी, बाबू जी, अभी लाती हूँ, अदरक अभी ही डाला है, चाय जरा ठीक से खौल जाय तो लेकर आती हूँ, बड़की बहु यानी मनोरमा ने अपने ससुर, देव बाबू को कहा. यह बड़की बहु और देव बाबू का रोज सुबह का यह प्रथम वार्तालाप होता है. मनोरमा रोज परिवार में सबसे पहले उठती है, नित्यकर्म से निवृत्त होकर वह सबसे पहले अपने लिए और देव बाबू के लिए चाय बनाती है. देव बाबू भी अप आदत से बाध्य, एक – दो बार मनोरमा से चाय मांगते ही हैं, हांलाकि उन्हें भी पता रहता है कि चाय बन रही है. थोड़ी देर बाद बड़की बहु और देव बाबू दोनों एक साथ दिन की पहली चाय पीते हैं. यह क्रम पिछले बीस सालों से निरंतर चल रहा है.
छब्बीस साल पहले देव बाबू की पत्नी संध्या जी का कैंसर की बिमारी से पचास साल की आयु में देहांत हो गया. संध्या जी अपने पीछे देव बाबू के साथ -साथ , अपने तीन बेटे अतुल, आलोक, अजय और एक बेटी पल्लवी को छोड़ कर गयीं थीं. पत्नी संध्या के आकस्मिक निधन से देव बाबू को कुछ समझ में नहीं आ रहा था. जिस समय संध्या जी का देहांत हुआ, उस समय तक किसी बेटे की शादी नहीं हुई थी. पल्लवी सबसे छोटी बेटी थी, जो कि उस समय केवल पन्द्रह साल की थी और कक्षा नौ में पढ़ रही थी. परिवार में किसी के कुछ समझ में नहीं आ रहा था. संध्या जी के देहांत के बाद काफी रिश्तेदार आये थे. देव बाबू की बड़ी बहन शोभा, लगभग आठ महीने रह कर परिवार को संभाले रखी, लेकिन कोई कितने दिन रहता. अन्त में शोभा दीदी , देव बाबू को यह कहते हुए कि मैं बीच- बीच में आती रहूंगी, घबराना मत, भगवान सब ठीक कर देंगे, अपने घर चलीं गयीं. देव बाबू भी दीदी को कितना दिन रोकते.
दीदी के जाने के बाद बेटी पल्लवी ने अपनी नन्हीं हाथों में घर की बागडोर सम्भालने का प्रयास किया. उसके इस प्रयास में तीनों भाई भी लग गए. कोई झाड़ू लगा देता, कोई बर्तन साफ कर देता, कोई आटा गूंथता और देव बाबू रोटी सब्जी बनाते. दाल, चावल और सब्जी भी ऐसे ही बन जाता. यह सामूहिक कार्य कई महीनों तक चला. एक दिन रात में पल्लवी ने अपने सबसे बड़े भाई अतुल को कहा भईया, मैं खाना बना लूंगी, आप लोग बाकी के काम कर लो. अतुल ने पल्लवी से कहा सोच लो, कर पाओगी! पल्लवी ने कहा भईया आप भी तो नौकरी करते हैं, सुबह नौ बजे निकल जाते हैं और रात में आठ बजे तक लौटते हैं, कितना करेंगे. मैं तो अभी कक्षा नौ में ही पढ़ती हूँ और स्कूल तो बगल में ही है. दोनों भईया भी तो पढ़ाई कर रहे हैं, एक एम एस सी और दूसरे बी एस सी में हैं. मुझे करने दीजिये, जो काम मैं नहीं कर पाऊंगी, वह काम आप लोग देख लीजियेगा. तो उस दिन से चौके के जिम्मेदारी पल्लवी ने अपने उपर स्वयं ले लिया.
एक दिन की बात, सम्भवतः रविवार का दिन था, शाम को देव बाबू के एक बचपन के मित्र लहरी जी आ गए. पल्लवी चाय बना कर ले आयी. लहरी जो को पल्लवी ने प्रणाम किया और चाय और नमकीन का प्लेट रख कर चली गई. लहरी ने कहा कि यार भाभी को गये एक साल से उपर हो गया, घर की कोई व्यवस्था करो. देव बाबू ने कहा कि सोच तो मै भी रहा हूँ, लेकिन कुछ निर्णय नहीं कर पा रहा हूँ. लहरी ने पूछा क्या सोच रहे हो? देव बाबू ने कहा कि सोच रहा हूँ कि अतुल की शादी कर दूं, उसे रेलवे में नौकरी करते हुए चार साल हो भी गया है और शादी की उम्र भी हो ही गयी है. लहरी ने कहा कि यह विचार तो बहुत ही अच्छा है, कोई लड़की देखी है! देव बाबू ने कहा एक लड़की के बारे में पता लगा है, पढ़ी- लिखी है और परिवार भी बहुत ही सम्भ्रान्त है और मेरे परिवार से उनका पुराना परिचय है. लहरी ने कहा कि फिर देरी किस बात की है, शादी तय कर दो. लेकिन अतुल से भी पूछ लो, अब हम लोगो का जमाना तो रहा नहीं. देव बाबू बोले एक दिन अतुल से अकेले में बात करता हूँ, वह न तो नहीं कहेगा क्योंकि वह भी सारी बातें खुद भी समझता है . लेकिन बात तो करना ही पड़ेगा, देव बाबू ने कहा. लहरी ने कहा जल्दी बात करके, शादी करके, बहु ले आओ, घर में एक महिला का होना बहुत जरूरी है.
इस बातचीत के दो दिनों के बाद मकरसंक्रांति की छुट्टी थी, इस कारण अतुल घर पर ही था. देव बाबू ने अतुल को अपने कमरे में बुलाया और कहा कि बेटा तुमसे एक जरुरी बात करना है. अतुल ने कहा बाबू जी कहिये, क्या बात है? देव बाबू ने कहा कि तुम्हें नौकरी करते हुए चार साल हो गये हैं, अब तुम शादी कर लो, अगर तुम्हारे मन में कोई लड़की हो तो बताओ, नहीं तो मैं कहीं बात चलाऊँ. अतुल ने कहा, पापा शादी आप ही तय कर दीजिए. जहाँ आप को ठीक लगे, तय कर दीजिए, मुझे कुछ नहीं कहना है. लेकिन एक बात मेरे मन में बार- बार आता है कि जो भी लड़की आयेगी, क्या वह इतनी बड़ी जिम्मेदारी संभाल पायेगी, जिसकी आप अपेक्षा करते हैं. वह भी तो कालेज से निकली हुई कोई लड़की ही तो होगी. उसके कुछ अपने सपने होंगे. अगर वह सपने पूरे करना चाहे तो, अथवा आजकल लड़कियां शादी के बाद पति के साथ अलग रहना चाहतीं हैं, अगर वह भी यही चाहे तो क्या होगा?
देव बाबू थोड़ी देर चुप रहे, फिर बोले कि अतुल बेटा तुम्हारी बात तो सही है, लेकिन क्या इस कारण से तुम शादी ही नहीं करोगे? देखो मैं तुम्हारी शादी की बात परिवार के लिए नहीं , तुम्हारे लिए कर रहा हूँ. तुम्हारी शादी की उम्र हो गई है और तुम कमाने भी लगे हो. एक उम्र में सबकी शादी होती है, तो तुम्हारी शादी की भी बात मैं कर रहा हूँ. परिवार की अधिक चिंता करने की आवश्यकता नहीं, अभी तक तो ईश्वर ही परिवार चला रहा है, आगे भी वही देखेगा! तुम बताओ कि तुम शादी करना चाहते हो कि नहीं. अतुल बोला पापा मैं शादी तो करना ही चाहता हूँ, लेकिन बस एक ही डर है कि अगर परिवार में वह घुल- मिल नहीं पायी, तो क्या होगा? देव बाबू बोले कल से डरने की जरूरत नहीं, कल हमेशा अनिश्चित होता है, इस कारण सही उम्र में शादी कर लेना ही उचित होता है. अतुल ने कहा ठीक है पापा जैसा आप को ठीक लगे, वैसा करिये.
पिता और पुत्र में इस वार्तालाप के लगभग दो- तीन माह के बाद , देव बाबू की छोटी बहन शुभांगनी, जो जमशेदपुर में रहती थी, उसने देव बाबू को फोन किया कि भईया, अतुल बेटे के लिए मैंने एक लड़की देखी है, उसकी बायोडाटा मैं भेज रही हूँ, आप देख लीजिए. लड़की का परिवार मेरे बगल में ही रहता है और वे मेरे काफी घनिष्ट हैं, काफी अच्छे लोग हैं. लड़की ने एम एस सी , भौतिक विज्ञान से किया है. आगे पी एच डी करने का उसका विचार है. देव बाबू ने व्हाट्सएप खोला और उसका फोटो सहित पूरा विवरण देखा. पहली ही नज़र में देव बाबू को लड़की तो पसंद आ गयी, लेकिन उन्होंने शुभांगनी को तत्काल कुछ कहा नहीं. रात्रि में जब अतुल आफिस से घर आया तो देव बाबू ने कहा कि तुम्हारी जमशेदपुर वाली बुआ ने एक लड़की का बायोडाटा भेजा है, तुम भी देख लो. अभी यह बात बाप- बेटे में हो ही रही थी कि बेटी पल्लवि आ गयी. पूछी पापा किसका बायोडाटा है और देव बाबू के हाथ से मोबाइल लेकर देखने लगी. पल्लवि बोली तो यह बात है, भईया की शादी की बात चल रही है और हम लोगों को पता ही नहीं. फोटो देख कर बोली कि लड़की तो काफी सुन्दर है, भईया की इसके साथ बहुत ही अच्छी जोड़ी रहेगी और जब तक देव बाबू कुछ कहते, वह दौड़ कर बाकी दोनों भाईयों को भी फोटो दिखा दिया. सभी भाईयों ने भी कहा जोड़ी तो अच्छी रहेगी.
दूसरे दिन देव बाबू ने शुभांगनी से बात किया और भाई- बहन में यह तय हुआ कि पहले देव बाबू जमशेदपुर जा कर लड़की देख लें, परिवार से मिल लें, और अगर पसंद आ जाये तो फिर आगे शादी की बात की जाये. देव बाबू बोले कि ठीक है मैं अगले हफ्ते जमशेदपुर आ रहा हूँ. उन्होंने अतुल को बता दिया कि मैं अगले हफ्ते जमशेदपुर लड़की देखने जा रहा हूँ. अतुल ने कहा कि ठीक है , जैसा आप उचित समझिये. जब देव बाबू जमशेदपुर पहुंचे तो स्टेशन पर शुभांगनी और उसके पति अमर नाथ , दोनों देव बाबू को लेने आये थे. घर पहुंचने पर अमर नाथ ने कहा कि भईया लड़की के पिता , विश्वम्भर सिंह जी भी आप की तरह ही कोल इंडिया में काम करते थे, और वे लोग भी मूलतः गाजीपुर के रहने वाले हैं, अभी यहीं मकान खरीद लिया है और यहीं बस गये हैं.. उनका एक बेटा है, जो किसी बैंक में उच्चाधिकारी है और एक बेटी मनोरमा है, जिससे अतुल की शादी की बात हम लोग सोच रहे हैं. आज शाम को उनके परिवार को हमने अपने यहाँ खाने पर बुलाया है. उसी समय आप लड़की भी देख लीजियेगा और परिवार से भी मिल लीजियेगा. देव बाबू बोले ठीक है.
शाम को सात बजे के आसपास विश्वम्भर सिंह जी सपरिवार अमर नाथ जी के घर पर आये. अमर नाथ ने विश्वम्भर सिंह जी से देव बाबू का परिचय कराया. दोनों चूंकि कोल इण्डिया में ही अधिकारी थे, इसलिए परिचय होते ही एक प्रकार का औपचारिक संबंध तुरन्त स्थापित हो गया और पुरानी बातें होने लगीं. विश्वम्भर सिंह जी ने देव बाबू जी से पूछा कि सेवानिवृत्त के बाद आप अपना समय कैसे व्यतीत करते हैं? देव बाबू ने हंसते हुए कहा कि अब मुझे बिना कुछ किये समय व्यतीत करने की आदत पड़ गयी है. दोनों में बातें हो ही रहीं थी कि अमर नाथ जी आ गये और देव बाबू से मनोरमा का परिचय कराया. मनोरमा ने देव बाबू का चरण स्पर्श किया. देव बाबू ने आर्शिवाद दिया और बैठने के लिए कहा. मनोरमा ने एक शमीज- सलवार का सूट पहन रखा था. देव बाबू ने मनोरमा से कुछ औपचारिक बातें करते हुए भी, बड़े ध्यान से मनोरमा को देख भी रहे थे. मनोरमा को भी इस बात की जानकारी तो थी ही कि यह सारा आयोजन उसकी शादी के पृष्ठभूमि में ही हुआ है.
मनोरमा , देव बाबू को पहली ही दृष्टि में पसंद आ गयी. रात के भोजन के उपरांत, विश्वम्भर सिंह जी ने देव बाबू को अपने घर भोजन के लिए आमंत्रित किया, जिसे देव बाबू ने स्वीकार कर लिया. दो दिन के बाद रविवार को शुभांगनी, अमरनाथ और देव बाबू , विश्वम्भर सिंह जी के यहाँ शाम को गये. चाय पीने के बाद विश्वम्भर सिंह जी ने देव बाबू से मनोरमा के शादी की बात की. देव बाबू ने कहा कि मुझे तो आप की बेटी को अपने घर की बहू बनाने में हर्ष ही होगा, लेकिन अब हम लोगो का जमाना तो रहा नहीं, अब तो बच्चे ही निर्णय करते हैं. अच्छा होगा यदि मेरा बेटा और आप की बेटी दोनों आपस में बात कर लें. मेरे तरफ से तो हाॅं है. तो तय हुआ कि मनोरमा और अतुल पहले मिल लें, अगर वे दोनों शादी के लिए सहमत हों, तो आगे बात किया जाये. मनोरमा ने कहा कि उसका इस महीने पी एच डी के लिए कोई फार्म भरना है और विभागाध्यक्ष से भी कई मीटिंग है, तो इस महीने उसके लिए मिलना सम्भव नहीं है. अगले महीने वे मिल सकते हैं.
खैर दूसरे महीने अतुल अपनी बुआ शुभांगनी के यहाँ जमशेदपुर पहुँच गया. दूसरे दिन अतुल और मनोरमा दोनों, एक माल में मिले. औपचारिक बातों के उपरांत अतुल ने मनोरमा से कहा कि मनोरमा मेरी माँ का देहांत कई वर्षों पहले हो चुका है, मैं बड़ा भाई हूँ, मेरे दो और छोटे भाई और एक छोटी बहन है . इस कारण शायद तुम्हें कुछ ज्यादा जिम्मेदारी उठानी पड़े. मेरी मजबूरी यह है कि मैं परिवार को अभी छोड़ कर अलग नहीं रह सकता. बाकी तुम सोच लो. मनोरमा अतुल की सारी बातें ध्यान से सुनती रही. फिर थोड़ी देर के बाद मुस्कुराते हुए बोली, अतुल जी अभी तो हमारी शादी भी नहीं हुई है और आप अलग रहने की बात सोचने लगे! अतुल यह सुन कर थोड़ा शर्मिंदा हुआ, लेकिन फिर सम्भलते हुए बोला कि मैं केवल अपनी स्थित स्पष्ट कर रहा था. मनोरमा ने कहा देखो अतुल ईश्वर की जो इच्छा होगी, वही होगा. माल में ही एक होटल में दोनों ने खाना खाया और खाने के उपरांत दोनों ने शादी करने का फैसला कर लिया. देव बाबू तो सुन कर बहुत खुश हुए. घर में भी सभी भाई- बहन बहुत खुश थे कि चलो अतुल भईया की शादी अब जल्दी हो जायेगी.
दो महीने बाद मनोरमा और अतुल की शादी बड़े धूम- धाम से जमशेदपुर में हो गई. अपने घर से विदा हो कर मनोरमा जब अतुल के घर आयी तो मनोरमा का स्वागत घर के दरवाजे पर परिवार के सभी बड़े- बुजुर्गों ने घर के बड़ी बहू के रूप में परम्परागत रीति से किया. घर के चौखट लांघने के उपरांत अचानक मनोरमा को शादी के बाद उसको परिवार में अपने वर्तमान स्थिति का आभास हुआ. जो मनोरमा कल तक एकदम स्वछंद लड़की व बेटी मात्र थी, अचानक वह देव बाबू परिवार की बड़की बहू हो गई. एक सप्ताह तक परिवार के रिश्तेदारों का आना- जाना लगा रहा. एक सप्ताह के बाद देव बाबू की सारी बहनें एक -एक करके अपने घर चलीं गईं. उसके दो – चार दिनों के भीतर सारे मेहमान भी चले गए और घर में केवल देव बाबू, उनके तीनों बेटे, बेटी और बहू रह गये. रिश्तेदारों और मेहमानों के चले जाने के बाद घर एकदम खाली -खाली लगने लगा था.
एक सप्ताह के बाद एक दिन देव बाबू ने अतुल को बुलाया और कहा बेटा यह दस लाख का चेक लो और बहू के साथ यूरोप घूमने चले जाओ. अतुल ने कहा कि पापा आप के दिमाग में यह विचार कहाँ से आ गया . देव बाबू ने कहा कि बेटा हम लोगों का जमाना कुछ और था, आज कुछ और है! परिवर्तनों को मैं अच्छी तरह समझता हूँ, यूरोप घूमने चले जाओ . काम तो जीवन भर लगा ही रहेगा! मनोरमा सुनी तो एकदम चौंक गयी. अतुल से बोली कि पापा के दिमाग में भी क्या- क्या चलता रहता है!
खैर वीजा और अन्य आवश्यक काम करने में एक माह लग गए और एक माह के उपरांत अतुल और मनोरमा अपनी यूरोप यात्रा पर निकल गये. लगभग बीस दिनों के बाद दोनों वापस आये. मनोरमा ने अपने पी एच डी करने का विचार तत्काल के लिए छोड़ दिया और एक स्थानीय कालेज में अस्थायी रूप से पढ़ाने लगी. लेकिन मनोरमा ने बिना किसी शोर- शराबा के धीरे -धीरे परिवार का काम समझने व करने लगी. इतने दिनों के भीतर पल्लवी भी बी एस सी में पहुँच चुकी थी. परन्तु ननद- भौजाई दोनों मिल कर ऐसे रहतीं थीं कि जैसे दोनों सगी बहनें हों. देव बाबू यह देख कर बहुत खुश थे. समय अपने गति से आगे बढ़ता जा रहा था.
देव बाबू के दोनों बेटों आलोक और अजय की भी नौकरी लग गयी. आलोक की नौकरी एक साफ्टवेयर कम्पनी में बंगलौर में लगी और अजय की रिजर्व बैंक आफ इण्डिया में लगी और उसकी पोस्टिंग चेन्नई में हुई. परिवार में खुशी की लहर दौड़ गयी. दोनों भाई अपनी- अपनी नौकरी पर चले गए. उन दोनों के चले जाने से घर अचानक खाली लगने लगा. लेकिन सब लोग खुश भी थे कि चलो इस जमाने में भी बिना किसी पैरवी के दोनों को अच्छी नौकरी मिल गई.
मनोरमा के पैर भारी होने के कारण घर में झाड़ू- पोछा करने और बर्तन साफ करने के लिए एक नौकरानी रख लिया गया था. चूंकि मनोरमा के डिलवरी के दिन करीब आ रहे थे, तो मनोरमा की माँ जानकी देवी ने मनोरमा को जमशेदपुर अपने घर बुला लिया. देव बाबू भी यही चाहते थे, क्योंकि घर में कोई बड़ी महिला तो थी नहीं जो कि देखती. एक महीने के बाद मनोरमा को एक प्यारी सी बेटी हुई. खबर सुनते ही अतुल जमशेदपुर के लिए चल दिया, उसको तो खुशी का ठिकाना नहीं था. पूरा परिवार बहुत खुश था . परिवार में बहुत दिनों के बाद एक शिशु का आगमन हुआ था. लगभग दो महीने के बाद मनोरमा घर आयी. पौत्री के खुशी में देव बाबू ने एक बड़ा आयोजन किया . बंगलौर और चेन्नई से दोनों चाचा लोग भी आये. पल्लवी के तो खुशी का ठिकाना नहीं था, उसे कोई बुआ कहने वाली आ गयी थी. वह उस नन्हीं सी गुड़िया को सदैव अपने पास ही लिए रहती थी.
एक दिन रात्रि के भोजन के समय जब परिवार के सब लोग एक साथ बैठे थे तो मनोरमा ने कहा कि अजय और आलोक को नौकरी करते हुए काफी दिन हो गये, बाबूजी अब इनकी भी एक – एक करके शादी कर ही दीजिये. यह सुन कर अतुल ने कहा कि इन दोनों की शादी तो होगी ही, पहले पल्लवी की शादी कर देते हैं. पल्लवी ने कहा कि भईया आप मुझे भगाने के पीछे क्यों पड़े हो, अभी तो भतीजी मिली है. तो उस दिन तय हुआ कि पहले पल्लवीकी शादी पहले कर लिया जाए, फिर दोनों भाईयों की शादी के बारे में सोचा जायेगा. इसी बीच मनोरमा को कहीं से पता चला कि अजय का प्रेम संबंध किसी प्रेरणा नामक लड़की, जो कि अजय के साथ ही उसके आफिस में काम करती है, के साथ चल रहा है. एक दिन बातों ही बातों में मनोरमा ने पूछ ही लिया कि अजय भईया अगर कोई आपको पसंद है तो बताईये आप की भी शादी कर ही दिया जाए. संकोच करने की आवश्यकता नहीं, आज नहीं तो कल आप को बताना ही पड़ेगा! अच्छा हो ” शीघ्रम शुभम् ” के सिद्धांत का पालन करते हुए, आप शादी कर ही लो. अचानक मनोरमा द्वारा अपनी शादी की बात सुन कर अजय चौंक गया. बोला भाभी आपको कैसे पता चला! मनोरमा बोली भईया हमारे भी अपने सूत्र हैं, छिपाने से कोई लाभ नहीं, अगर आप गम्भीर हों, तो हमें बताईये, मैं बाबू जी से बात करती हूँ.
अजय बोला भाभी मुझे कुछ समय दीजिये, प्रेरणा से पूछ कर बताता हूँ. मनोरमा बोली चलो आप ने नाम तो बता दिया, अब फोटो भी दिखा ही दो. अजय ने अपने मोबाइल में प्रेरणा का जो फोटो रखा था, दिखा दिया. मनोरमा बोली पसंद तो आप की बहुत ही अच्छी है, कभी अगर सम्भव हो तो बात कराना. अजय बोला भाभी प्रेरणा से बात तो करा दूंगा, लेकिन शादी की बात तो आप दो साल सोचों मत. मनोरमा बोली वह क्यों? अजय बोला मैं नौकरी छोड़ कर एम बी ए करने के लिए सोच रहा हूँ, क्योंकि आजकल आगे के कैरियर के लिए एम बी ए आवश्यक हो गया है. मनोरमा बोली बात तो आप की सही है. ठीक है, पहले तो पल्लवी की ही शादी होनी है. अपने जानकारी में कोई पल्लवी लायक लड़का देखो तो बताना . अजय ने कहा भाभी मेरा एक बैचमेट है, यहीं अपने शहर का ही है, मेरे साथ कालेज में था. वह कालेज के बाद वायु सेना में आफिसर हो गया है. उसके परिवार में भी मेरा आना -जाना है, इधर काफी दिनों से मेरी उससे बात नहीं हुई है, लेकिन कोई बात नहीं, मैं उससे बात करता हूँ. मनोरमा बोली ठीक है.
खैर इसी बीच देव बाबू के एक रिश्तेदार ने पल्लवी के लिए एक लड़का बताया. देव बाबू भी उसके परिवार को जानते थे. पल्लवी की शादी की बात चलायी गयी. कुछ दिनों में पल्लवी की शादी तय हो गई. लेकिन लड़के ने कहा कि अभी पांच महीने उसे कोई छुट्टी आफिस से नहीं मिलेगी , इस कारण शादी कुछ महीनों के लिए टाल दिया गया. आने वाले जनवरी में पल्लवी की शादी होनी तय हो गयी. परिवार में किसी बेटी की शादी बहुत दिनों बाद हो रही थी, तो घर में काफी खुशी का माहौल था. कपड़े और गहनों की खरीदारी करते- करते मनोरमा थक चुकी थी, क्योंकि परिवार में वही अकेली महिला! यद्यपि लड़के वाले काफी सज्जन थे, उनकी कोई भी मांग नहीं थी, लेकिन देव बाबू तो अपनी एकलौती बेटी के शादी में इतने उत्साहित थे कि पूछो न! खैर साहब तय समय पर पल्लवी की शादी धूम – धाम से हो गई और पल्लवी अपने ससुराल चली गई.
पल्लवी की शादी की तैयारी और बाकी कामों से मनोरमा पूरी तरह थक चुकी थी, उसी में छोटी बेटी को भी सम्भालना पड़ता था. पल्लवी के जाने के बाद मनोरमा एकदम अकेली हो गई. पल्लवी की शादी में काफी पैसे खर्च हुए, देव बाबू तो बहुत पहले ही रिटायर हो चुके थे, उनके पास तो कुछ खास पैसा तो था नहीं, अतः अधिकांश खर्च अतुल को ही करने पड़े. हालांकि दोनों छोटे भाई भी नौकरी कर रहे थे, लेकिन किसी ने पल्लवी की शादी में कुछ भी पैसा दिया नहीं. अतुल ने एक बार इसकी चर्चा मनोरमा से किया भी, लेकिन मनोरमा ने कहा कि किसी भाई से कुछ मत कहिये. अगर उनको अपनी बहन की शादी में देना होता तो खुद ही दे देते. मनोरमा ने आगे कहा कि क्या उनको नहीं पता है कि शादी में कितना पैसा खर्च हो रहा है? जाने दीजिये, भगवान सब करा देगा. लेकिन एक बात जो अतुल को नहीं पता था वह यह कि देव बाबू ने अपने दोनों छोटे बेटों से पैसा मांगा था, लेकिन दोनों बेटों ने कुछ बहाना बना कर, पैसे देने में असमर्थता जाहिर कर दिया था. देव बाबू मन ही मन इतने दुखी हुए थे कि इसकी चर्चा उन्होंने अतुल अथवा मनोरमा से भी नहीं किया, उन्होंने सोचा कि शादी के शुभ अवसर पर इस बात को किसी को नहीं बताना चाहिए, ईश्वर सब ठीक कर देगा, और हुआ भी ऐसा ही. पल्लवी की शादी बहुत ही शानदार और धूम- धाम से हो गई.
पल्लवी की शादी के एक वर्ष के बाद मनोरमा को एक बेटा हुआ. देव बाबू बहुत ही प्रसन्न हुए. पौत्र के जन्म के उपलक्ष्य में एक बहुत बड़ा आयोजन किया गया. परिवार के सभी लोग आये. पल्लवी भी अपने पति कौशिक के साथ आयी. आयोजन के बाद पल्लवी कुछ दिनों के लिए मायके ही रह गयी. एक दिन जब दोनों ननद और भौजाई बैठे हुए कुछ सामान्य परिवारिक बातें कर रहे थे तो मनोरमा बोली कि पल्लवी, अब मैं काम करते – करते बहुत थक गयी हूँ, अब अजय की शादी हो तो मुझे कुछ आराम मिले! पल्लवी हंस कर बोली भाभी आप भ्रम में हो, शादी होते ही , मेरे दोनों भाई अपनी पत्नी को लेकर अपने- अपने घर चले जायेंगे . देखियेगा कोई एक दिन के लिए भी अपनी पत्नी को यहाँ पर नहीं छोड़ेगा. मनोरमा बोली पल्लवी तुम्हें ऐसा क्यों लगता है? पल्लवी बोली जैसा आपने और भईया ने परिवार के लिए किया, वैसा कोई नहीं करेगा, इतना त्याग आजकल कौन करता है! और हुआ भी ठीक वैसे ही. जैसे ही आलोक और अजय की शादी हुई, दोनों अपनी- अपनी पत्नी को बिना पूछे, यहाँ तक कि उन्होंने देव बाबू जी से भी नहीं पूछा और शादी के एक हप्ते के बाद , अपनी पत्नी को साथ लेकर चले गए. फिर मनोरमा क्या बोलती! और बोलने के लिए बचा भी क्या था! अपने दोनों छोटे बेटों के इस व्यवहार से देव बाबू मन ही मन काफी दुखी थे, लेकिन उन्होंने भी किसी से कुछ नहीं कहा और वैसे भी उन्हें यह आभास तो था ही कि उनके कहने से भी क्या होने वाला. केवल परिवार में कलह ही होगा. इसलिए वह सब ईश्वर की इच्छा मान कर चुप ही रहे.
आजकल देव बाबू ज्यादा बोलते नहीं, घर से भी बाहर कम ही निकलते हैं. कभी मनोरमा से पूछ लेते हैं कि बाजार से कुछ सामान या सब्जी आदि लाना है क्या? अगर मनोरमा कहती कि हाॅं बाबू जी लाना है, तो ले आते. कोई अगर मित्र घर पर आ गया तो उनके साथ बैठ कर बातें कर लेते, नहीं तो अपना पूरा समय अपने दोनों पौत्र व पौत्री के साथ बिताते. आजकल थोड़ी उम्र सम्बंधित बीमारी जैसे उच्च रक्तचाप व डायबिटीज़ से कुछ अधिक ही परेशान हैं. इधर रक्तचाप काफी बढ़ जाने के कारण कई बार उन्हें नर्सिंग होम में भर्ती भी करना पड़ा. एक दिन रात में देव बाबू ने अतुल और मनोरमा को बुला कर कहा कि देखो मैं अब अस्सी वर्ष से अधिक का हो गया हूँ, कोई भी आदमी अमर हो कर नहीं आया है, मैं भी अमर नहीं हूँ, एक दिन सबको भगवान के यहाँ जाना है. मेरे लिए बहुत परेशान मत हुआ करो. मनोरमा बोली बाबू जी आप कैसी बातें कर रहे हैं, इसमें परेशान होने वाली बात क्या है! घर में कोई भी बीमार रहेगा तो उसे परिवार के लोग डाक्टर को दिखायेगें ही, घर में चुपचाप बैठ कर , बीमार व्यक्ति की उपेक्षा करेगा! या उसके मरने की प्रतिक्षा करेगा! किसी को ऐसा नहीं करना चाहिए और मैं तो निश्चित रूप से ऐसा नहीं करुंगी. वैसे जैसी ईश्वर की इच्छा! देव बाबू मनोरमा को देखते रह गए, बस ऑंखों में ऑंसू भर आये.
खैर साहब समय कहाँ रूकता है, कुछ भी हो, वह तो अपनी गति से चलता ही रहता है. एक दिन रात में देव बाबू के सीने में काफी तेज दर्द शुरू हुआ, दर्द बरदास्त के बाहर होता जा रहा था. तुरन्त ऐम्बुलेंस बुलाया गया और उन्हे एक प्रतिष्ठित नर्सिंग होम में ले जाया गया. समय पर डाक्टर भी आ गए, जरुरी टेस्ट आदि किये गए. पता लगा कि देव बाबू को बहुत गहरा हृदय आघात लगा है, लेकिन घबराने की कोई बात नहीं है. लेकिन मनोरमा और अतुल को समझते देर नहीं लगा कि डाक्टर पूरी बात बता नहीं रहे. जिसका डर था, वही हुआ! दो दिन नर्सिंग होम में इलाज के बावजूद भी, रात में दो बजे , देव बाबू नहीं रहे.
अतुल और मनोरमा दोनों देव बाबू के साथ ही कमरे में थे, लेकिन अब कमरे में केवल देव बाबू का पार्थिव शरीर भर था. पंक्षी पिंजरे से निकल चुका था!
खैर मित्रों ने अतुल और मनोरमा दोनों को सम्भाला और दोनों बेटों और पल्लवी को मोबाइल से देव बाबू के मृत्यु का समाचार बताया. दोनों बेटों और पल्लवी ने कहा कि मेरे आने के बाद ही अन्तिम संस्कार किया जाये. शाम होते- होते दोनों बेटे और पल्लवी तथा परिवार के अन्य लोग भी आ गये. पल्लवी ने कहा कि पापा का अन्तिम संस्कार वाराणसी में होगा. देव बाबू के पार्थिव शरीर के साथ परिवार के सभी लोग वाराणसी आये और हरिश्चन्द्र घाट पर पूरे धार्मिक विधी से देव बाबू का अंतिम दाह संस्कार हुआ. इसके बाद परिवार के सभी लोग वापस घर आये. घर में रोज भागवत का पाठ करने के लिए शाम को एक पंडित जी आते थे. परिवार के सभी लोग एवं मित्रों के परिवार भी श्रृद्धा से भागवत का पाठ रोज सुनते थे. दसवीं और तेरहवीं को पूरे धार्मिक विधी से पूजा हुआ एवं पंडितों को खुले हृदय और श्रृद्धा से दान- दक्षिणा दिया गया.
आज देव बाबू के मृत्यु को पन्द्रह दिन हो चुके थे. अब तक अतुल और मनोरमा को एक क्षण के लिए आराम व एकांत नहीं मिला था. आज जब मनोरमा को एकांत मिला तो वह रोने लगी. इतने में अतुल आ गया, मनोरमा को समझाने की जगह वह भी दहाड़ मार कर रोने लगा. रोने का आवाज़ सुन कर दूसरे कमरों से पल्लवी और दोनों भाई व अन्य लोग भी आ गए. किसी के पास कहने के लिए कुछ था नहीं,और कोई कहता भी क्या! सभी रोने लगे. थोड़ी देर बाद माहौल शांत हुआ. इतने में बाई सबके लिए चाय बना कर ले आयी. परिवार के पुराने पंडित, दूबे जी भी थे, उन्होंने कहा देखो देव बाबू अपनी पूरी आयु अच्छी तरह जी कर और भरा – पूरा परिवार छोड़ कर गए हैं, उनके लिए दुख करने का कोई कारण नहीं है. आप सब लोग देव बाबू के आर्शीवाद से अपना जीवन बिताईये. सभी लोग भी दूबे जी के विचार से तो सहमत थे ही, लेकिन मन नहीं मान रहा था कि देव बाबू नहीं रहे!
कुछ दिनों बाद दोनों भाई भी अपनी नौकरी की जगह पर चले गए, लेकिन पल्लवी नहीं गयी और एक माह के लिए रुक गई. मनोरमा भी सामान्य हो गई थी. एक दिन वह बच्चों को स्कूल भेज कर घर में यूँ ही बैठी थी कि पल्लवी आ गयी. पल्लवी बोली क्या भाभी , आप के बाल भी सफेद होने लगे, चलिए ब्यूटी पार्लर आप के बाल ठीक करा दें. मनोरमा बोली अरे अब उम्र हो गया तो बाल सफेद होंगे ही और इस उम्र में क्या ब्यूटी पार्लर जाना! तुम्हें जाना है तो चली जाओ. पल्लवी नहीं मानी और अपने साथ मनोरमा को ब्यूटी पार्लर ले गयी. रास्ते में पल्लवी बोली भाभी, किसी भी कारण से कभी भी, किसी का जीवन रुकता नहीं. मनोरमा ने स्नेह से पल्लवी को देखा और बोली मेरी छोटी ननद बहुत जल्दी बड़ी हो गई. इतना कह कर मनोरमा ने पल्लवी को गले लगा लिया.
(सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” जीका हिन्दी बाल -साहित्य एवं हिन्दी साहित्य की अन्य विधाओं में विशिष्ट योगदान हैं। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में रचना सहित 145 बालकहानियाँ 8 भाषाओं में 1160 अंकों में प्रकाशित। प्रकाशित पुस्तकेँ-1- रोचक विज्ञान कथाएँ, 2-संयम की जीत, 3- कुएं को बुखार, 4- कसक, 5- हाइकु संयुक्ता, 6- चाबी वाला भूत, 7- बच्चों! सुनो कहानी, इन्द्रधनुष (बालकहानी माला-7) सहित 4 मराठी पुस्तकें प्रकाशित। मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी का श्री हरिकृष्ण देवसरे बाल साहित्य पुरस्कार-2018 ₹51000 सहित अनेक संस्थाओं द्वारा सम्मानित व पुरस्कृत। साप्ताहिक स्तम्भ “श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य” के अंतर्गत साहित्य आप प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकते हैं। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – “प्रेरणा”।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # २४३ ☆
☆ लघुकथा – प्रेरणा☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ ☆
खुद कमा कर पढ़ाई करने वाले एक छात्र की सिफारिश करते हुए कमलेश ने कहा, “यार योगेश! तू उस छात्र की मदद कर दें. वह पढ़ने में बहुत होशियार है. डॉक्टर बन कर लोगों की सेवा करना चाहता है.”
“ठीक है मैं उस की मदद कर दूंगा. उस से कहना कि मेरी नई नियुक्त संस्था से शिक्षाऋण का फार्म भर कर ऋण प्राप्त कर लें.” योगेश ने कहा तो कमलेश बोला, “मगर, मैं चाहता हूं कि तू उस की निस्वार्थ सेवा करें. उसे सीधे अपने नाम से पैसा दान दें.”
“नहीं यार! मैं ऐसा नहीं करना चाहता हूं ?” यौगेश ने कहा तो कमलेश बोला, “इस से तेरा नाम होगा ! लोग तूझे जिंदगी भर याद रखेंगे.”
“हाँ यार. तू बात तो ठीक कहता है. मगर, मैं नहीं चाहता हूं कि उस छात्र की मेहनत कर के पढ़ने की जो प्रेरणा है वह खत्म हो जाए.”
“मैं उसे जानता हूं, वह बहुत मेहनती है. वह ऐसा नहीं करेगा”, कमलेश ने कुछ ओर कहना चाहा मगर, यौगेश ने हाथ ऊंचा कर के उसे रोक दिया.
“भाई कमलेश ! यह उस के हित में है कि वह मेहनत कर के पढाई करें”, कह कर यौगेश ने अपनी आंख में आए आंसू को पौंछ लिए, “तुम्हें तो पता है कि दूध का जला छाछ भी फूंक—फूंक कर पीता है.”
(वरिष्ठ साहित्यकारडॉ सत्येंद्र सिंह जी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत। मध्य रेलवे के राजभाषा विभाग में 40 वर्ष राजभाषा हिंदी के शिक्षण, अनुवाद व भारत सरकार की राजभाषा नीति का कार्यान्वयन करते हुए झांसी, जबलपुर, मुंबई, कोल्हापुर सोलापुर घूमते हुए पुणे में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी के पद से 2009 में सेवानिवृत्त। 10 विभागीय पत्रिकाओं का संपादन, एक साझा कहानी संग्रह, दो साझा लघुकथा संग्रह तथा 3 कविता संग्रह प्रकाशित, आकाशवाणी झांसी, जबलपुर, छतरपुर, सांगली व पुणे महाराष्ट्र से रचनाओं का प्रसारण। जबलपुर में वे प्रोफेसर ज्ञानरंजन के साथ प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े रहे और झाँसी में जनवादी लेखक संघ से जुड़े रहे। पुणे में भी कई साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। वे मानवता के प्रति समर्पित चिंतक व लेखक हैं। अप प्रत्येक बुधवार उनके साहित्य को आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय आलेख – “प्रश्नविहीन… “।)
☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ५६ ☆
लघुकथा – प्रश्नविहीन… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆
प्रतीक की कार्यालय में नौकरी लगी तो भंडार विभाग में लिपिक के रूप में और धीरे धीरे प्रमोशन पाकर अधीक्षक के पद तक प्रोन्नत हो गए। भंडार विभाग से उनका कहीं ट्रांसफर नहीं हुआ। भंडार विभाग के जरिए ही हर विभाग के हर सामान की खरीद हुआ करती थी और मरम्मत कार्य भी। पता नहीं क्यों किसी भी वस्तु का डैड स्टाक रजिस्टर नहीं मिलता था। शायद कोई देखता ही नहीं। हालांकि हर साल ऑडिट होता। विजिलेंस द्वारा भी इंसपेक्शन हुआ करता। लेकिन प्रतीक पर कभी आंच नहीं आई। हर अफसर के परिवार के लोग प्रतीक को जानते थे और बच्चे तो उनसे लिपट जाते थे। कुछ भी चाहिए प्रतीक अंकल मौजूद।
सभी अफसरों की वे नाक का बाल थे। नए अफसर कहीं से ट्रांसफर होकर आते तो प्रतीक उनकी सेवा में हाजिर। चैंबर के पर्दे साहब की मरजी के अनुसार बदल जाते । नया फर्नीचर आ जाता। नई डिजाइनदार टेबल व कुर्सियाँ। पुराने पर्दे व फर्नीचर कहां जाते किसी को पता नहीं।
एक डायरेक्टर आए कोलकाता से ट्रांसफर होकर। नाम था सदानंद कुरील। बहुत तेज तर्रार। उन्होंने पदभार संभाला तो दूसरे दिन प्रतीक उनके चेंबर में हाजिर। कुरील साहब ने उनकी तारीफ पूछी तो बताया मैं प्रतीक, अधीक्षक भंडार विभाग। कुरील साहब ने कहा, मैंने तो आपको बुलाया नहीं फिर कैसे चैंबर में सीधे आ गए। प्रतीक ने कहा कि आपके पी.ए. ने बुलाया। कुरील साहब ने पी.ए. को बुलाकर पूछा कि मैंने तो नहीं कहा कि भंडार अधीक्षक को बुलाओ, फिर ये यहां क्यों आए। पी.ए. ने कहा कि सर जो भी नए डायेक्टर आते हैं तो उन्हें नया फर्नीचर पर्दे आदि लगते हैं, इसलिए। अच्छा, कुरील साहब ने हुंकार भरी। अच्छा प्रतीक बाबू आप आ ही गए हैं तो बताइए, नए अफसरों के लिए क्या क्या मंगाते हैं और पुराना सामान कहां जाता है। अब तक की खरीद और पुराने सामान के निपटारे का रिकार्ड ले आइए।
प्रतीक की बोलती बंद। जी सर कहकर चैंबर से बाहर निकल आए। कई दिनों बाद तक वे नहीं आए तो कुरील साहब ने पी.ए. से प्रतीक को बुलाने को कहा। पी.ए. ने बताया कि वह अस्पताल में भरती हैं। कुरील साहब ने पी.ए. से उनकी छुट्टी और सिक रिपोर्ट का रिकार्ड मंगवाया। रिकार्ड देखकर कुरील साहब ने भंडार अधिकारी को बुलाया। उनसे पूछा कि प्रतीक आपके अधीक्षक हैं, उन्हें क्या हुआ है। भंडार अधिकारी का मुंह सूख गया। बोल नहीं पाए। कुरील साहब बोले चलिए प्रतीक को देखने अस्पताल चलते हैं। दोनों पहुंचे तो अस्पताल में अफरा तफरी मची थी। कुरील साहब को देखकर चिकित्सा अधिकारी और घबडा गए, तुतलाते से बोले, सर प्रतीक ने विष पान कर लिया। कुरील साहब बोले कि आप यहां क्या कर रहे हैं. जाइए उसे बचाइए। चिकित्सा अधिकारी भर्राए स्वर में बोले, नहीं बचा पाए सर। अस्पताल के बाहर मीडिया कर्मी और प्रेस प्रतिनिधियों की भीड थी। हर एक का चेहरा प्रश्नविहीन।
(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा – गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी, संस्मरण, आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – सुकून।)
इस भाग दौड़ की जिंदगी में समझ में नहीं आता क्या करूँ क्या न करूँ?
आज पैदल चल रही हूँ तो यह रास्ता भी मुझे बहुत लंबा लग रहा है कमल जी अपने आप से बातें करते हुऐ आराम से धीरे-धीरे चल रही थी।
दीवार पर लिखे हुए सभी पोस्ट को ध्यान से पढ़ रही थी और आसपास की दुकानों के बोर्ड भी पढ़ रही थी। चलो अच्छा है आज गाड़ी खराब हो जाने से कुछ तो फायदा हुआ पता चल जाएगा कि कहाँ क्या मिलता है?
तभी अचानक एक पोस्ट दिखाई दिया उसमें लिखा था कि चाय कॉफी के साथ यहाँ बातों का आनंद लें।
यह कैसी दुकान है कमल जी ने सोचा कुछ देर रुकने के बाद उनके मन में विचार आया चलो अंदर चल कर देखती हूँ घर जल्दी जाकर क्या करूंगी अकेली ही तो रहती हूँ बच्चों ने तो मुझे अकेला छोड़कर विदेश चले गए समय काटने के लिए पास के स्कूल में पढ़ाती हूँ।
उन्होंने देखा काफी सारे लोग बैठे हैं एक लाइब्रेरी है उसमें कुछ लोग ऑनलाइन पढ़ रहे हैं कुछ पेपर और किताबें पढ़ रहे है, चाय कॉफी और नाश्ता भी मिल रहा है।
तभी एक मुस्कुराती हुई महिला ने कहा -” मैडम आप क्या लेंगे लिए यहाँ बैठ जाइए।”
कमल जी ने कहा बहन जी कैसी जगह है इसके बारे में आप मुझे कुछ बताइए?
उसे महिला ने कहा मेरा नाम कविता है, हम पति-पत्नी यहां रहते हैं हमारा बहुत बड़ा घर था सड़क के किनारे हम अकेले रहते थे इसलिए हम लोगों ने सारी किताब कॉपी को एक जगह रख दिया और कुछ कंप्यूटर भी खरीद लिए हैं बच्चे पढ़ते हैं और जो हमारी तरह बुजुर्ग हैं वह भी यहां आते हैं हम सभी एक दूसरे के साथ अपना अनुभव बताते हैं और इतनी देर हम सब कैसे बैठ पाएंगे इसलिए यहाॅं पर चाय कॉफी नमकीन बिस्कुट सैंडविच और पकौड़ी मिलती है।
बाबाजी आप लोग तो बहुत अच्छे कार्य कर रहे हो मुझे तो यह पता ही नहीं था।
कविता ने कहा बहन क्या करें हमारी मजबूरी है और वक्त की मांग है आज के जमाने में किसी के पास समय नहीं है और हमारे पास समय ही समय है तो क्यों ना हम सभी को सुकून बाँटे।
कविता ने कहा ठीक कह रही हो बहन मुझे भी एक कप चाय पिला दो। कविता और रागिनी दोनों मुस्कुराने लगती हैं उनकी आंखों में एक चमक आ जाती है।
(ई-अभिव्यक्ति में मॉरीशस के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री रामदेव धुरंधर जी का हार्दिक स्वागत। आपकी रचनाओं में गिरमिटया बन कर गए भारतीय श्रमिकों की बदलती पीढ़ी और उनकी पीड़ा का जीवंत चित्रण होता हैं। आपकी कुछ चर्चित रचनाएँ – उपन्यास – चेहरों का आदमी, छोटी मछली बड़ी मछली, पूछो इस माटी से, बनते बिगड़ते रिश्ते, पथरीला सोना। कहानी संग्रह – विष-मंथन, जन्म की एक भूल, व्यंग्य संग्रह – कलजुगी धरम, चेहरों के झमेले, पापी स्वर्ग, बंदे आगे भी देख, लघुकथा संग्रह – चेहरे मेरे तुम्हारे, यात्रा साथ-साथ, एक धरती एक आकाश, आते-जाते लोग। आपको हिंदी सेवा के लिए सातवें विश्व हिंदी सम्मेलन सूरीनाम (2003) में सम्मानित किया गया। इसके अलावा आपको विश्व भाषा हिंदी सम्मान (विश्व हिंदी सचिवालय, 2013), साहित्य शिरोमणि सम्मान (मॉरिशस भारत अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी 2015), हिंदी विदेश प्रसार सम्मान (उ.प. हिंदी संस्थान लखनऊ, 2015), श्रीलाल शुक्ल इफको साहित्य सम्मान (जनवरी 2017) सहित कई सम्मान व पुरस्कार मिले हैं। हम श्री रामदेव जी के चुनिन्दा साहित्य को ई अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों से समय समय पर साझा करने का प्रयास करेंगे।
आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय गद्य क्षणिका “– रोग ग्रसित राजा…” ।)
~ मॉरिशस से ~
☆ कथा कहानी ☆ गद्य क्षणिका # ९७ — रोग ग्रसित राजा —☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆
राजा के तीन रोग थे। उसने अपने रोग स्वयं में छिपाये रखा क्योंकि रोग प्रकट होने से उसका मस्तक झुकता। आश्चर्य, उसके देश के कवि ने उसके तीन रोगों से मिलती जुलती कविता लिख दी। राजा क्रोधित हुआ। उसने कवि की हत्या करवा दी। जहाँ लाश फेंकी गई वहाँ सुन्दर फूल खिले। राजा को ये फूल बहुत पसंद आए। पर उसे जब पता चला ये फूल उसके शत्रु के वक्ष पर उगे हुए हैं बिलखने पर चौथे रोग ने उसे ग्रस लिया।
(प्रतिष्ठित साहित्यकार मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग जी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत। सम्प्रति – भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त अधिकारी, शिक्षा – एम फिल (समाजशास्त्र), प्रकाशन – दो कविता संग्रह एवं तीन शेर ओ अश्आर के संग्रह प्रकाशित। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – “अंतिम पड़ाव में…”।)
लघुकथा – अंतिम पड़ाव में… मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग ☆
गांव से विधुर पिता जी बेटे के पास रहने शहर आ गये थे। उनके आते ही बहू बेगम के चेहरे की भाव भंगिमा बिगड़ी हुई थी। अनुभवी पिता तुरंत ताड़ गये। बहू बेटे को बुला कर बोले- देखो बेटा, तुम दोनों नौकरी पेशा हो और बहुत बिज़ी रहते हो इसलिये
मैं अपने लिये कुछ व्यवस्थाएं प्लान करके आया हूँ। वो ये कि – मेरे नाश्ते, और दोनों टाईम खाने के लिये टिफ़िन सर्विस और कपड़े धुलवाने लांड्री वाला तय कर देना। एक इंडक्शन कुकर ले आया था और चाय बनाने की सामग्री, तो सुबह जल्दी उठता हूं इसलिये चाय अपनी मैं बना लिया करूँगा। अपनी दवाईयां भी होम डिलीवरी से आनलाईन मंगवा लिया करूँगा। अपने सभी खर्च भी अपनी पेंशन से वहन कर लूंगा। जब भी समय मिले मेरे साथ कुछ देर बैठ लिया करना।
बहू बेगम फिर भी चहक पड़ीं -” तो हमारे यहाँ वृद्धाश्रम जैसे रहने का मतलब क्या हुआ,पिता जी ? पिता जी शांत स्वर में बोले- मैं तो बस इस अंतिम समय में तुम लोगों और पोते पोती का साथ और लाड़ दुलार को जीने यहाँ चला आया हूँ। अन्यथा न लेना। तुम लोगों की निजी ज़िंदगी में हस्तक्षेप नहीं करना चाहता हूं। सेवक तो गाँव में भी बहुत थे पर तुम सबका साथ कहाँ था वहां। इतना हक मुझे दे देना ,बस और कुछ नहीं चाहिए मुझे। अब न केवल बहू बेगम बल्कि बेटा भी पूर्णतः निरुत्तर थे।
(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा – गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी, संस्मरण, आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय कहानी – ई-ग्रुप।)
सभी दोस्तों को बैठे देख कर रवि ने बोला,” हम लोग यहाँ निमंत्रण देने आए थे पर लग रहा है कि अब दावत खाकर ही जाएंगे।”
“दावत तो शौक से खाइए पर जो निमंत्रण देने आए थे कहीं उसे अकेले ही हजम मत कर लेना।”
ज्योति की यह बात सुनकर सभी जोर से ठहाका लगाकर हँस पड़े।
विकास ने कहा -“नहीं ऐसी गलती कभी नहीं कर सकते पार्टियाँ तो अपनी जिंदगी का सबसे अहम हिस्सा है, खुशियाँ मनाने के लिए यानी वह दिन जो रोज – रोज आएंगे।
रवि ने कहा-“ऐसा हम चाहते हैं।”
“ओह! लगता है तुम्हारी शादी की सालगिरह है, मुबारक हो” रवि के दोस्तों ने कहा।”
” मुबारकबाद आज नहीं देना परसों हमारे घर आकर ही देना” ज्योति ने कहा” वैसे आप सभी के घर आकर निमंत्रण देने वाले थे, हम लेकिन सब लोग यहीं मिल गए इसीलिए एक साथ बोल दिया।”
“अरे, छोड़ो भी ज्योति इतनी तकलीफ और औपचारिकता की क्या जरूरत है ?”
“आप तो बस बताइए कब आना है हम लोग स्वयं पहुंच जाएंगे व्हाट्सएप ग्रुप में मैसेज डाल देती तब भी हम पहुंच जाते।”
विकास ने कहा-“परसों यानि शुक्रवार को 7:00 बजे यार पार्टी यदि शनिवार को रखें, तो ज्यादा अच्छा रहता रविवार को आराम से सोते।”
रवि ने कहा-“यार क्या कहें हमारी सालगिरह शुक्रवार को है उसी दिन आना तो अच्छा रहेगा क्योंकि 15वीं सालगिरह है और आप जैसे जिंदादिल लोग यदि आएँगे तो पार्टी में चार चांद लग जाएंगे।”
ज्योति ने कहा- ” फोटो और वीडियो रिकॉर्डिंग वाले को भी बुलाया है समाचार पत्रों में भी भेजना है इसलिए देर मत करना अच्छे से तैयार होकर समय पर आना।”
सभी दोस्तों में से अचानक विकास ने कहा-” जिंदादिल तो हम सभी हैं पर यह नुमाइश करने की क्या जरूरत है वह जोर से हॅंसने लगा।”
रवि ने कहा-“क्या मतलब है?”
विकास ने कहा-“शादी की सालगिरह हल्ले गुल्ले के साथ मनाना मेरे ख्याल से तो यार नुमाइश करना ही है दोस्तों को बुलाने की किसी बहाने की जरूरत नहीं होती।”
रवि ने कहा-“पार्टी एक दूसरे के साथ मनानी चाहिए पर फेसबुक और समाचार पत्रों के माध्यम से ही तो असली आनंद आता है वरना रोज तो हम एक दूसरे के साथ कहां रहते हैं।”
“तुम नौकरी वाले हम बिजनेसमैन की बात नहीं समझोगे इसी बहाने हमें बिजनेस और नए-नए रिलेशन भी मिलते हैं।”
“यह खुफिया बात है । वह जोर से हॅंसा।”
सभी दोस्तों ने कहा-” तो मियां बीवी मिलकर हमें परेशान करने का सोच रहे हो।”
विषय बदलें और वातावरण से तनाव हटे इसके लिए ज्योति ने कहा।
विकास की पत्नी ने कहा- “चलो हम सभी लोग खाना खा लेते हैं।”
“कहाँ हो विकास भाई, ठहाके के इस गुलजार माहौल में किसी की तुलना नहीं करनी चाहिए।”
विकास की पत्नी (रजनी) ने कहा- “भाई साहब यह सब बातें छोड़िए आज तो आपकी पार्टी हो रही है ना, आप मजे लीजिए?”
रवि ने कहा-“कुछ लोग जैसे विकास बहुत बड़ा कंजूस हैं अकेले पार्टी मनाने को ही खुशी कहते हैं ।”
ज्योति ने कहा- “खुशी जब तक व्हाट्सएप और फेसबुक में फोटो न डालो तो कैसे आनंद प्राप्त होता है।”
सभी लोग ज्योति और रवि के घर शुक्रवार के दिन गए उन्हें शादी की सालगिरह की बधाई दे रहे थे दोनों बहुत अच्छे लग रहे थे रवि डॉ शंकर का बेटा था डॉक्टर साहब अब बहुत बुजुर्ग और कमजोर हो गए थे ।
दोस्तों ने पूछा- “तुम्हारे पिताजी नजर नहीं आ रहे हैं उन्हें क्यों नहीं बुलाया? क्या वह कहीं बाहर गए हैं?”
रवि ने कहा-“हम यंगस्टर की पार्टी में पिताजी आकर क्या करेंगे? शायद इसीलिए वे अपने अस्पताल में गए होंगे, आजकल ज्यादातर वे वहीं रहते हैं।”
तभी अचानक उनके घर के ऊपर की मंजिल से जोर से आवाज आई ।
ऐसा लगा कि कोई गिर पड़ा है।
विकास ने कहा- “यार लगता है ऊपर कुछ गिरा है।”
रवि ने कहा- “यार तू पार्टी के मजे ले नहीं तो ऊपर जा आराम कर हमें परेशान मत कर?”
विकास जब कमरे में गया तो उसने देखा – “डॉक्टर शंकर गिर पड़े थे उनके सिर से खून निकल रहा था।”
वह तुरंत उन्हें लेकर अस्पताल गया उनके सिर पर गहरी चोट लग गई थी और उनका बीपी बहुत लो हो गया था वह अस्पताल से रवि को और ज्योति को फोन कर रहा था लेकिन किसी ने उसका फोन नहीं सुना और सब फोटो खींचा रहे थे रात के 10:00 बजे रवि ने विकास को फोन करके कहा कि यार तुम कहाँ चले गए थे? कितनी सुंदर सुंदर फोटो पेपर के फ्रंट पेज में मैं कल की न्यूज़ के लिए दे दिया हूं लेकिन तुम क्यों नहीं आए और तुम्हारा एक भी फोटो नहीं है।
विकास ने कहा- ” मैं शंकर अंकल के साथ अस्पताल में हूँ अंकल की हालत बहुत गंभीर है।” तुम्हें बहुत फोन किया लेकिन तुमने फोन नहीं उठाया किसी क्षण कुछ भी हो सकता है बचपन में जब हम तुम छोटे थे तो अंकल ने मेरी बहुत मदद की इसलिए ऊपर जब आवाज आई तो मैं अपने आप को नहीं रोक पाया लेकिन तुम अब बहुत बड़े आदमी बन गए हो? इसलिए हम जैसे छोटे लोगों की अब तुम्हें परवाह नहीं रह गई है।
रवि ने कहा-“छोड़ो विकास मुझे नीचा मत दिखाओ तुमने कोई महान कार्य नहीं किया है आखिर मेरे पिताजी डॉक्टर थे और तुम उन्हीं के अस्पताल में उन्हें भर्ती कराने के लिए लेकर गए और मेरे ऊपर इल्जाम लगा रहे हो।”
“ठीक है मैं आता हूँ।”
ज्योति और विकास अस्पताल पहुंचते हैं और साथ ही साथ मीडिया और प्रेस वाले को भी बुलाते हैं ।
दोनों रोनी सूरत बनाने का नाटक करते हैं और कहते हैं।
“मेरे पिताजी बहुत बीमार हैं।”
रवि ने पत्रकारों से कहा- इस तरह की अच्छी सी न्यूज़ अखबार में फ्रंट पेज पर फोटो के साथ छापना चाहिए।
विकास दूर से यह सब कुछ देखते हुए मुस्कुराता रहता है ।
एक लंबी सांस लेते हुए गहरी चिंता में खो जाता है। उसके मस्तिष्क में अचानक विचार आता है कि क्या यही जो मैं देख रहा हूँ सच है क्या एक पुत्र भी इतना स्वार्थी होता है?
वाह-वाह ई- ग्रुप और इसकी महिमा।
अब लोग पिताजी की भी फोटो को अपने सोशल प्लेटफॉर्म में डालकर हमदर्दी लेते हैं और महान बनने का स्वांग रचते हैं।
सही परिभाषा सेवा करने की बस फोटो और स्टेटस में ही है, घर से भी ज्यादा महत्वपूर्ण ये ई ग्रुप है।