हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २५८ – आलेख – संस्कारधानी मेरा अपना शहर ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ ☆

श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है आपका एक ज्ञानवर्धक आलेख “संस्कारधानी मेरा अपना शहर ”।) 

☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २५८ ☆

🌻आलेख🌻संस्कारधानी मेरा अपना शहर 🌧️

आइये जबलपुर के बारे में कुछ अंश  आपको बता रही हूंँ। ताल तलैया से घिरा हुआ माँ नर्मदा तट पवित्र स्थल जहाँ की संगमरमर की चट्टानें विश्व प्रसिद्ध है।

यहाँ के घाट, गौरी घाट, उमा घाट, तिलवारा घाट, भेड़ाघाट, ऐसे घाटों से सजा जिसमें 52 ताल और 84 छोटी तलैया शामिल है। इस कारण इसे तालों का शहर भी कहा जाता है।

इसका मुख्य नाम जाबालिपुरम था। जो हमारे जाबालि ऋषि के नाम पर पड़ा। इसे त्रिपुरा और गढा नाम से भी जाना जाता है।

मूलतः कलचुरी काल में त्रिपुरा उनकी राजधानी थी और गोड काल में गढ़ा प्रमुख  स्थल था। ऋषि जाबालि की तप स्थली होने के कारण इसे जाबालिपुरम कहा गया जो बाद में रूप बदलते- बदलते जबलपुर हो गया।

जबलपुर को हमारे संत श्रद्धेय विनोबा भावे जी ने संस्कारधानी घोषित किया। उनका दिया हुआ यह उपहार जीवनपर्यंत जबलपुर वासी अपने नाम और पता के साथ संस्कारधानी लिखते हैं।

पौराणिक गाथा है रानी दुर्गावती का साम्राज्य जिन्होंने ऐतिहासिक भूमिका निभाई। भारत के प्राचीन इतिहास को देखते हुए रानी दुर्गावती का साम्राज्य इसे कहा जाता है और जबलपुर में संस्कार, प्रीत, गीत, जीव, जल और सुंदर से सुंदर मंदिरों का गढ़ भी कहा जाता है। यहाँ पर माँ भगवती की तीन मुँह वाली मूर्ति जो तेवर में भी विराजी है। त्रिपुर सुंदरी के नाम से प्रसिद्ध है।

यहां पर माँ भगवती महाकाली महालक्ष्मी मां सरस्वती के एक ही पत्थर पर तीनों देवियों का मुँह जुड़ा हुआ है। हजारों की संख्या में रोज यहाँ दर्शन करते हैं। सुबह से शाम तक माँ भगवती का प्रसाद भंडारा के रूप में प्राप्त होता है।

चारों तरफ पहाड़ से घिरे होने के कारण इसे जल संग्रहण का मुख्य स्थल माना गया। माँ नर्मदा की असीम कृपा यहाँ पर बहुत सारे ऐसी अनुसंधान और योगशाला भी बनाई गई और जगह-जगह जल संरक्षण को महत्व दिया गया। एक प्रकार से पर्यावरण को बढ़ाया गया।

यहाँ पर भारत में युद्ध में होने वाले ट्रक,  गोला बारुद का निर्माण होता है। और यह निर्माण खमरिया फैक्ट्री जबलपुर में होता है। आज भी जब  सैनिक युद्ध के लिए निकलते हैं तो जबलपुर का ट्रक ट्रैक्टर और बड़ी-बड़ी तोप गाड़ी जबलपुर के ट्रेडमार्क से दिखाई देती है।

मध्य प्रदेश का हृदय स्थल बीच में होने के कारण जबलपुर सारी जगह से जुड़ा हुआ है। यहाँ पर हमारे महाभारत काल के साम्राज्य को भी शताब्दी कलचुरी वंश से जोड़ा जाता है।  गौड़ शासको के समय संग्राम शाह का यहाँ पर अधीनस्थ ग्रह मंडल का निर्माण भी बताया गया है जो हमारे समृद्ध और प्राचीन इतिहास को दर्शाते हैं।

रेल मार्ग बस सेवा और वायु सेवा निरंतर चारों दिशा और चारों ओर जाने का मुख्य जंक्शन स्टेशन जबलपुर है। यहाँ पर सबसे महत्वपूर्ण किला मदन महल का किला है जो एक पहाड़ी की चोटी पर स्थित है। 11वीं शताब्दी का गोंडवाना साम्राज्य के विरासत को आज भी दर्शाता है। इसका निर्माण गोड़ राजा मदन सिंह ने करवाया था।

यहाँ पर भेड़ाघाट में कई फिल्मों की शूटिंग पहले भी हुई अब भी होती है और लगातार फिल्मी दुनिया को भेड़ाघाट की संगमरमर की दुनिया पसंद आती है। यदा कदा छोटी बड़ी फिल्में यहाँ हमेशा बनती दिखाई देती है।

दुर्गावती का किला और दुर्गावती संग्रहालय जबलपुर की शान को और भी बढ़ता है। यहाँ पर नित्य प्रति मां नर्मदा की आरती इतनी सुंदर होती है कि हजारों की संख्या में यहाँ के श्रद्धालु नियमित शामिल होते हैं और पुण्य के भागीदार होते हैं।

जबलपुर का क्षेत्रफल 5211 वर्ग किलोमीटर है और यह पूर्ण रूप से नर्मदा नदी के तट पर बसा हुआ है। सांस्कृतिक विरासत, साहित्यिक विरासत, जबलपुर को माँ नर्मदा के कारण अत्यंत धरोहर के रूप में मिला है। आज भी यहां पर 64 योगिनी मंदिर अपनी कहानी 11वीं सदी के विरासत को दर्शाता है।

जबलपुर का खानपान रहन-सहन अत्यंत सादगी और रुचिकर है। दूसरे शहरों में आप दिनचर्या में ₹500 में आप दिन भर नहीं बिता सकते यहाँ पर खाने की इतनी अच्छी व्यवस्था है और साधु संतों के डेरो पर तो भोजन प्रसादी मुफ्त में। बस आप माँ नर्मदा की आश्रय में हो जाइए।

विदेशी पर्यटक का विशेष आकर्षण भेड़ाघाट की संगमरमर वादियाँ है। जहाँ सदैव नौका विहार होता है। शरद पूर्णिमा के अवसर पर चाँदनी रात का नौका विहार प्रसिद्धि और समृद्धि को दर्शाता है।

जबलपुर तीनो जल सेना थल सेना और वायु सेवा की टुकड़ी का केंद्र है। जहाँ पर आज भी स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस पर शानदार परेड और उनकी कलाकारी देखने को मिलती है।

वायुयान सेवा में सुविधाजनक यात्रा कर सकते है। जबलपुर की सबसे ऊंची इमारत कटंगा टीवी टावर के नाम से प्रसिद्ध है। जो 1992 में दूरदर्शन टेलीविजन नेटवर्क के लिए तैयार किया गया था और इसे ही  सैनिक को सलामी देने के लिए विशेष अवसरों पर इसे रोशन किया जाता है।

जबलपुर की रानी दुर्गावती यहाँ की गौड़ साम्राज्ञी थी। उनकी समाधि पर  भी श्रद्धा से गौड़ समाज ही नहीं वरन संपूर्ण जबलपुर वासी नतमस्तक होते हैं।

सदियों से इस शहर पर कई राजवंशों का शासन रहा है। जिसमें गोड़ मराठा और ब्रिटिश भी शामिल है। वास्तु कला खानपान संस्कृत साहित्य और सादगी से परिपूर्ण जबलपुर एक अनूठी छाप छोड़ता है।

जो एक बार आता है यहाँ का होकर ही रह जाता है। राजनीति से संबंधित इसे बीजेपी का गढ़ कहा जाता है। पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह जी चौहान जबलपुर की धरती को जब भी आते हैं चंदन जैसा लगाना कहते हैं। जबलपुर का मौसम बहुत ही सुहाना होता है। जब बारिश होती है तो ताल तलैया नदी नाले सब भरे हुए और उस पर हमारा जबलपुर एक सीप की तरह दिखाई देता है।

भगवान भोलेनाथ की असीम कृपा है कहा जाता है यहाँ के तट से भी आप कंकर पत्थर उठाकर ले जाएं उसे विधिवत पूजा नहीं करना पड़ता उसे स्थापित कर – – – हर कंकर शंकर होता है। माँ नर्मदा जी के तट को भगवान भोलेनाथ की असीम कृपा है।

नगरी चुनाव उपनगरी चुनाव ग्राम पंचायत सांसद विधायक सभी जबलपुर की शान को और भी बढ़ा देते हैं। लिखने को तो बहुत सारी बातें हैं जबलपुर पर जितना लिखूं काम ही होगा। परसाई महादेवी वर्मा हिंदी के प्रसिद्धता को बढ़ाते हुए हिंदी साहित्य जगत के लिए एक अमूल्य योगदान और अमिट छाप छोड़ गए हैं। जिसके कारण जबलपुर को साहित्यिक धरोहर भी कहा जाता है। घर-घर में तीज त्यौहार उतने ही शौक से मनाया जाता है जितना मंदिर पर भगवान की आरती।

यहां का दशहरा यानी क्वार की नवरात्रि पर माँ भगवती दुर्गा की आराधना जो होती है अतुलनीय अद्भुत और स्मरणीय होती है।

हर बार बृहद और नया। कभी समय मिले या घूमने का मन बन जाए तो जबलपुर जरूर आईयेगा। हमारे जबलपुर की शान भंवर ताल गार्डन शंकर चौरा जहाँ पर भगवान भोलेनाथ की विशाल प्रतिमा बनी हुई है। सप्त ऋषियों का मूर्ति गार्डन पर विराजित हुआ हुआ है।

और मेडिकल कॉलेज से लेकर, अस्पताल रेलवे अस्पताल मिलिट्री अस्पताल और सुख सुविधा पूर्ण सभी प्रकार के वातावरण से संपूर्ण हमारा जबलपुर बहुत ही शानदार जानदार ईमानदार और सबसे बड़ी बात मेहमान बाजी करने पर कभी भी कोई भी प्राणी चुकता नहीं है।

दिल खोलकर सभी को अपना मानते हैं और उसे हृदय पर बसाते हैं।

यह माँ भगवती की आराधना नर्मदा की सेवा दीपदान की सुंदरता और यहां के संस्कार की अमिट कहानी है जो शब्दों से नहीं केवल भाव से समर्पित की जा सकती है।

यहाँ पर खोवे की जलेबी जीवन पर्यन्त स्वाद याद रहता है।

पहाड़ी पर मां शारदा मैहर

त्रिपुर सुंदरी बसी तेवर

नारी को भाये है जेवर

भाभी का लाडला देवर

गुड़ की चाशनी सेवर

सेवा भाव संस्कारी मेयर

मिलता है घी प्योवर

जबलपुर महिमा लिखते मिलूँ

आप सभी को प्रणाम करते

सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

जीवन भर, माँ नर्मदे हर

☆

© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ९३८ ⇒ पूत के पांव ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “पूत के पांव…“।)

?अभी अभी # ९३८ ⇒ आलेख – पूत के पांव  ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

पूत, पुत्र को कहते हैं जो पंजाब में जाकर पुत्तर हो, जाता है। राज किसी का भी हो, अगर वह पूत राजस्थान के किसी रणबांकुरे के यहां पैदा हुआ है, तो राजपूत ही कहलाएगा। कल तक जो पूत सपूत तो क्यूं धन संचय, पूत कपूत तो क्यूं धन संचय, कहते नहीं थकते थे, वे ही आज बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ के मार्ग को प्रशस्त करते नज़र आ रहे हैं।

जरूर वे लोग भविष्य दृष्टा होंगे, जो पूत के पांव पालने में पहचान जाते होंगे। काहे का पंचांग और काहे का काल निर्णय। कौन अखबारों में आज जन्म लिए बालक का भविष्य पढ़े, बस पूत के पांव पालने में देखे, और जन्म कुंडली बना दी। कितने पप्पू और कितने चाय वाले होंगे हमारे देश में, काश किसी ने उनके पांव पालने में तब देख लिए होते तो आज देश और वंश दोनों धन्य हो जाते।।

पुत्र को तो हम पूत कह देते हैं, लेकिन पुत्री के लिए हमारा शब्दकोश खामोश है। बनारस में जिसे छोरा, छोरी कहते हैं, वही बंगाल में जाकर छोकरा, छोकरी हो जाता है। कहीं मद्रासी और बंगाली छोकरा छोकरी मिलकर फिल्मी गाने गाते हैं तो कहीं लड़के को पोट्टा और लड़की को पोट्टी कहकर बुलाया जाता है। बुजुर्ग लोग आज भी अपनी तीसरी पीढ़ी, अर्थात पोता और पोती को आशीर्वाद देते, देखे जा सकते हैं। पूतना कृष्ण लीला का एक महत्वपूर्ण चरित्र है, जिसका उद्धार नंद के बाल गोपाल ने किया था। वैसे भी पूतना जैसी संतान से तो नि:संतान रहना ही भला।

हमारी लोकोक्तियां, कहावतें और मुहावरे कभी कभी गागर में सागर का काम कर जाती हैं। इनमें कहीं वक्रोक्ति है तो कहीं व्यंग्य, कहीं कोई गंभीर संदेश है तो कहीं कोई छुपा हुआ राज। नन्हें मुन्ने बच्चे तेरी मुट्ठी में क्या है, क्या पूत के पांव पालने में, का लेटेस्ट वर्शन नहीं लगता ?

बस आज की व्याख्या अगर सकारात्मक है तो कल की कहावत में एक नहीं, कई अर्थ निहित हैं।।

कौन अपनी औलाद को अच्छी तरह नहीं पालता !

जन्म और कर्म दोनों के अपने सिद्धांत हैं। भाग्य और पुरुषार्थ का जरूर पालने से भी कुछ संबंध रहा होगा। जब कोई नि:संतान दंपत्ति किसी मासूम बच्चे/बच्ची को गोद लेता है तो क्या देखकर लेता है, पांव या और कुछ ? अब उस बालक को जहां पलना है, वही उसका पालना हुआ।

क्या पालक का पूत के पालने अर्थात् पालन पोषण करने से भी कोई संबंध है। पूत के पांव कब तक पालने में रहेंगे, वह पालने से जमीन पर भी आयेगा, घुटनों घुटनों चलेगा, ठुमक चलत रामचंद्र की तरह अपने पांवों पर खड़ा भी होगा। अपने कुल का नाम रोशन करेगा। कहीं नंद यशोदा तो कहीं माता कौशल्या और महाराज दशरथ। पूत के पांव सिर्फ पालने में ही नहीं नजर नहीं आते, अच्छी तरह पालने पोसने और संस्कारों से भी नजर आ जाते हैं। पालने के साथ जरा पालक पर भी गौर किया जाए।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संजय उवाच # ३२७ – अंतिम नींद ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के  लेखक  श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है। साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ  हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको  पाठकों का  आशातीत  प्रतिसाद मिला है।”

हम  प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है  इस शृंखला की अगली कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों  के माध्यम से  हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)

☆  संजय उवाच # ३२७ ☆ अंतिम नींद… ?

दूसरे के जागने-सोने, खाने-पीने, उठने-बैठने, हँसने-बोलने, यहाँ तक की चुप रहने में भी मीन-मेख निकालना, आदमी को एक तरह का विकृत सुख देता है।तुलनात्मक रूप से एक भयंकर प्रयोग बता रहा हूँ, विचार करना।

रात को बिस्तर पर हो, आँखों में नींद गहराने लगे तो कल्पना करना कि इस लोक की यह अंतिम नींद है। सुबह नींद नहीं खुलने वाली।…यह विचार मत करना कि तुम्हारे कंधे क्या-क्या काम हैं। तुम नहीं उठोगे तो जगत का क्रियाकलाप कैसे बाधित होगा। जगत के दृश्य-अदृश्य असंख्य सजीवों में से एक हो तुम। तुम्हारा होना, तुम्हारे लिए महत्वपूर्ण हो सकता है पर जगत में तुम्हारी हैसियत दही में न दिखाई देनेवाले बैक्टीरिया से अधिक नहीं है। तुम नहीं उठोगे तो तुम्हारे सिवा किसी पर कोई दीर्घकालिक असर नहीं पड़ेगा।

तुम तो यह विचार करना कि क्या तुम्हारे होने से तुम्हारे सगे-सम्बंधी, तुम्हारे परिजन-कुटुंबीय, मित्र-परिचित, लेनदार-देनदार आनंदी और संतुष्ट हैं या नहीं। बिस्तर पर आने तक के समय का मन-ही-मन हिसाब करना। अपने शब्दों से किसी का मन दुखाया क्या, आचरण में सम्यकता का पालन हुआ क्या, लोभवश दूसरे के अधिकार का अतिक्रमण हुआ क्या, अहंकारवश ऊँच-नीच का भाव पनपा क्या..?… आदि-आदि..। हाँ आत्मा के आगे मन और आचरण को अनावृत्त कर अपने प्रश्नों की सूची तुम स्वयं तैयार कर सकते हो।

प्रश्नों की सूची टास्क नहीं है। प्रश्न तुम्हारे, उत्तर भी तुम्हारे। असली टास्क तो निष्कर्ष है। अपने उत्तर अपने ढंग व अपनी सुविधा से प्राप्त कर क्या तुम मुदित भाव से शांत और गहरी नींद लेने के लिए प्रस्तुत हो?

यदि हाँ तो यकीन मानना कि तुम इहलोक को पार कर गए हो। 

सच बताना उठकर बैठ गए हो या निद्रा माई के आँचल में बेखटके सो रहे हो?

निष्कर्ष से अपनी स्थिति की मीमांसा स्वयं ही करना।

© संजय भारद्वाज 

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ आशुतोष साधना संपन्न हुई। अगली साधना की जानकारी शीघ्र ही दी जावेगी। 🕉️ 💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

≈ संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ९३७ ⇒ अक्षर जगत ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “अक्षर जगत…“।)

?अभी अभी # ९३७ ⇒ आलेख – अक्षर जगत ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

“अ” से ही शुरू होती अक्षरों की दुनिया ! अम्बर, अवनि, अग्नि, अखिलेश, अमर, अटल, असीम, अनंत, अक्षत, अनिमेष।

शब्द पहले अक्षर था, शब्द ब्रह्म, और जिसका क्षरण न हो वह कहलाया अक्षर।

ब्रह्म की तरह शब्द सब तरफ व्याप्त है, क्योंकि शब्द अपने आप में अक्षरों का समूह है, अक्षर भी सभी ओर व्याप्त है, लेकिन ब्रह्म की तरह दृष्टिगोचर भी नहीं होता।।

ब्रह्म ने अपने आप को व्यक्त किया ! पहले श्रुति, स्मृति और तत्पश्चात पुराण। वेदों की रचना ईश्वर ने की होगी, लेकिन हमारे अक्षर का तो कोई अतीत ही नहीं। एक ॐ से सृष्टि का निर्माण हो जाता है। शब्दातीत अक्षर तो फिर सनातन ही हुआ।

वाणी में वाक्, शब्द अवाक !

अक्षर में बीज, बीजाक्षर मंत्र।

बगुलामुखी, त्रिपुरा-सुंदरी, सौन्दर्य-लहरी, कुंडलिनी माँ जगदम्बे। कहीं भैरव तंत्र तो कहीं जन जन का गायत्री-मंत्र। और सभी मंत्रों में श्रेष्ठ सद्गुरु का गुरु-मंत्र।।

कितनी संस्कृति, कितनी भाषाएँ, कितने ग्रंथ ! अक्षर ही अक्षर। सौरमंडल में व्याप्त शब्द और गुरुवाणी का सबद। हमने-आपने बोला, वह शब्द, और एक नन्हे अबोध बालक में, परोक्ष रूप से विराजमान परम पिता, लीला रूप धारण कर, कोरे कागद पर छोटी छोटी उँगलियों में कलम पकड़े, मुश्किल से अक्षर- ज्ञान प्राप्त करता हुआ, जगत को यह संदेश देता हुआ, कि ज्ञान की परिणति अज्ञान ही है।

आज वही अक्षर कागज़ कलम का मोहताज नहीं ! एक नया संसार आज हमारी मुट्ठी में है। यह गूगल की अक्षरों की दुनिया है। शब्दों का भंडार है उसके पास ! पर प्रज्ञा नहीं, वाक् नहीं ! यहाँ श्रुति, स्मृति नहीं, सिर्फ मेमोरी है। कोई किसी का गुरु नहीं, कोई किसी का शिष्य नहीं ! कोई रिसर्च नहीं, केवल गूगल सर्च और गूगल गुरु को दक्षिणा, डेटा रिचार्ज।।

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – विविधा ☆ “स्वयंपाक घर आणि आंतरराष्ट्रीय घडामोडी…” ☆ श्री कौस्तुभ परांजपे ☆

श्री कौस्तुभ परांजपे

? विविधा ?

☆ “स्वयंपाक घर आणि आंतरराष्ट्रीय घडामोडी…” ☆ श्री कौस्तुभ परांजपे ☆

 स्वयंपाक घरात होणारी चर्चा काहि ठराविक मुद्यांवरच होते. त्या मुद्यांचा जागतिक मुद्यांशी तसा संबंध नसतो. तसा असायचं कारणही नाही. कारण आज भाजी कोणती करु?… या प्रश्नाशी जागतिक बाजारातपेेठेेत मिळणार्‍या भाज्या कोणत्या. त्या पालेभाज्या आहेत का फळभाज्या. त्या करायच्या कशा… म्हणजे.  तेलावर का शिजवून.  पातळ भाजी का दाण्याचा कुट लावायचा. किंवा त्यांचे असलेले बाजारभाव याचा आपल्याशी काहीही संबंध नाही. अगदी खोबरं किंवा मिर्ची याचा ऊल्लेख आला तरी खोबर्याच्या बाबतीत राजापुरी खोबरं आणि मिर्ची बाबत सिमला मिर्ची अथवा लवंगी मिर्ची या पनवेेल किंवा सिमल्याची.  नाहीतर कोल्हापुरची सीमा ओलांडून पलिकडे आम्ही गेलो नाही.

 फारतर दिवाळी जवळ आली की फराळाचे पदार्थ करायचे का… कोणते… का विकत आणायचे… यावर चर्चा होते.  किंवा थांबते. तिथे काही दिवाळीत विकत घ्यायच्या फटाक्यांचे प्रकार किंवा बाण आणि संरक्षण क्षेत्राकडे असणारे अग्निबाण.  किंवा फटाक्यातले बाॅम्ब आणि सैन्याकडे असणारे बाॅम्ब यांंचा या र्चेचत संबंध नसतो.

 अधुुनमधूून कामवाली येणार नाही.  किंवा पाणी येणार नाही याचवेळी थोडी आणिबाणी जाणवायची. पण ती सुध्दा घरगुती. त्याचा जागतिक घडामोडींशी किंवा निर्माण झालेल्या आणिबाणी सद्रुष्य परिस्थितीशी संबंध नसायचा. त्यामुळे स्वयंपाक घरात जागतिक चर्चा होतच नव्हती. थोडक्यात स्वयंपाकघर आणि जागतिक घडामोडी यांच्या सीमा सुरक्षित ठेवल्या होत्या. कोणत्याही प्रकारे सिमोल्लंघन किंवा घुसखोरी नव्हती.

 दोन देशात काही बाबतीत शीतयुद्ध असत. पण आमची चर्चा शितकपाट म्हणजेच फ्रिज यात काय भरलंय याच विषयावर फ्रिज व्हायची. त्यामुळे तिथेही असणारा आंतरराष्ट्रीय प्रभाव तसा थंडच होता. पण आता मात्र त्या चर्चा बदलल्या होत्या.

 रशिया.  युक्रेन.  इस्रायल.  चिन.  अमेरिका आणि विशेषकरून डोनाल्ड ट्रंप यांचा विषय येतोच. म्हणजे भंंगार किंंवा रद्दी घेणारा.  भाजीवाला जस सहजपणे दोनचार वेळा दारावरून ओरडत जातो.  तितक्याच सहजपणे यांचा विषय होतो. कारण काय तर या सगळ्यांमुळे वाढत जाणारे सोन्या चांदिचे भाव. हमास या शब्दाचा वापर तर हमाम साबण जितक्या सहजतेने आणि सारखा सारखा वापरतो तेवढ्या सहजतेने वापरला जात होता.

 आता टमाटा आणि डोनाल्ड ट्रंप यांचा काहीच संबंध नाही. तरीही डोनाल्ड ची धोरणंतर टमाट्याच्या भावासारखी रोज बदलतात असा सूर लावत त्याच्या धोरणांना आम्ही सहज टमाट्याच्या बरोबर तोंडीलावायला घेतो. डोनाल्ड या नावाचाच राग आहे.

 मी मोबाईल वर ॲलन डोनाल्ड या क्रिकेट खेळाडूची एक ध्वनीचित्रफित बघत होतो. त्याच्या आवाजाने घरात विचारलं.  काय पाहताय येवढं. मी सहज म्हंटल.  ङोनाल्डचा व्हिडीओ आहे छोटासा.  छान आहे.

 झालं… डोनाल्डचा व्हिडीओ.  आणि चांगला.  यावरच आवाज इतका वाढला कि कदाचित ॲलन किंवा ट्रंप पैकी कोणताही डोनाल्ड जवळ असता.  किंवा दोघेही असते तर ते सुध्दा थोडावेळ गप्प बसले असते…

 काय म्हणतोय तो आता.. आता काय वाढवतोय… मग मला सांगाव लागलं कि हा वेगळा डोनाल्ड आहे. हा फास्ट बॉलर होता… तरीही डोनाल्ड या नावाचा राग काही गेला नव्हता…

 असेल फास्ट बॉलर… याची धोरणं डोक्यावरुन जातात. त्याचे बाॅल जात असतील. पण सगळं डोक्यावरुनच जात नं… त्याचा बॉल डोक्याला लागू नये म्हणून निदान हेल्मेट तरी वापरता येतं. याच्या डोक्यावरुन जाणाऱ्या गोष्टींसाठी काय वापरणार… डोक्यावरुन जाणारा चेंडू कसा टाकायचा.  यासाठी तरी तो तुुमचा डोनाल्ड डोकं वापरत असेल. पण या डोनाल्डच्या डोक्याच काय… आता या युक्तीवादावर मी काय बोलणार… मी आपलं अंपायर्स काॅल सारखा निर्णय मान्य केला.

 हा राग काहि येवढ्यावरच थांबला नाही. पुढे सुरुच होतं.

 याचा राग कशावर.  तर आम्ही दुसरीकडून घेत असलेल्या तेलावर. अरे तुला काय त्याच्याशी. तुला विकायच तर आम्हाला परवडेल त्या किमतीला विक… आम्ही पाच किलो तेल घ्यायला बाजारात गेलो तरी दोन ठिकाणी तेलाचे भाव पाहतो… तुला जमत असेल तर दे.  नाहीतर जा तेल लावत… हे याचं म्हणजे वडाच तेल वांग्यावर काढण्यासारख आहे. यावर तेलाचा आंतरराष्ट्रीय विचार थांबतो. नाहीतर हे तेल प्रकरण इतक गरम झालं असत कि भक्त प्रल्हाद सारखं यालाही गरम तेलात टाकण्याची शिक्षा दिली असती.

 हा संताप किंवा राग थांबला अस वाटत होत. तेवढ्यात एक मित्र सपत्नीक आला. त्याचा दात दुखत असल्याने संध्याकाळी तो दाताच्या डाॅक्टरांकडे जाऊन आला होता.

 तो म्हणाला.  डाॅक्टरांनी त्याचे सहज दिसणारे दात त्यांच्या भिंगाच्या सहाय्याने पाहिले. दोनचार प्रश्न विचारले आणि म्हणाले.  फार काहि नाही.  थोडी मोकळी जागा आहे तिथे फक्त थोडी चांदी भरावी लागेल. इतकच. झालं… त्यावरून परत चर्चा सुरु झाली…

 काय भाव वाढत चाललेत चांदिचे. यांना काय लागत फक्त थोडी चांदी भरा म्हणून सांगायला. अगोदर ब्लड रिपोर्ट करणारे यांच्या संबंधातले असतात अस म्हणत होतो. आतातर चांदिवालेपण मिळालेले वाटतात. आणि जी चांदी वरुन दिसणारच नाही ती भरुन करायचं काय.. चाटायची आहे… चाटायची म्हंटली तरी दाताच्या खालीच असणार… कशी पुरणार जिभ…

 माझ्या पायातली साखळी किंवा अंगठी केली तर दिसेल किंवा दाखवता येईल. पण दातातल्या चांदिच काय करणार… ते काही हत्तीचे दात आहेत दिसायला.

असं म्हणत मित्राची बायको माझ्या बायकोबरोबर स्वयंपाक घरात गेली… आणि परत स्वयंपाक घरातल्या चर्चेत आंतरराष्ट्रीय घडामोडींचा संदर्भ आला…

 

©  श्री कौस्तुभ परांजपे

मो 9579032601

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ.उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ.मंजुषा मुळे/सौ.गौरी गाडेकर≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ९३६ ⇒ कंधा और बोझ ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “कंधा और बोझ …“।)

?अभी अभी # ९३६ ⇒ आलेख – कंधा और बोझ ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

हाथ जहां से शुरू होते हैं, उसे कंधा कहते हैं जितने हाथ उतने ही कंधे।

अक्सर हम जिन हाथों को मजबूत करने की बात करते हैं, वे खुद मजबूत कंधों पर आश्रित होते हैं।

अगर कंधा कमजोर हुआ, तो हाथ किसी काम का नहीं। फिल्म नया दौर में दिलीप साहब हाथ बढ़ाने की बात करते हैं। साथी हाथ बढ़ाना साथी रे। एक अकेला थक जाएगा, मिलकर बोझ उठाना। यहां पूरा बोझ तो कंधों पर है, और श्रेय हाथ ले रहे हैं।

एक फिल्म आई थी जागृति। उसमें भी कुछ ऐसा ही गीत था। हम लाए हैं तूफान से कश्ती निकाल के। इस देश को रखना मेरे बच्चों संभाल के। यानी पूरा बोझ बेचारे मासूम बच्चों पर। क्या आपको उनके कंधों पर लदे भारी बस्ते का बोझ नजर नहीं आता। और पूरे देश का बोझ उन पर लादने चले हो। बच्चे की जान लोगे क्या।।

हम जब छोटे थे तो कुछ औरतों को सर पर टोकनी उठाए देखते थे। किसी में सब्जी तो किसी में बर्तन।

ये मोहल्ले में फेरी लगाती थी। बर्तन वाली औरतें घर के पुराने कपड़ों के एवज में नए घर गृहस्थी के बर्तन देती थी। एक तरह का एक्सचेंज ऑफर था यह।

कपड़े दे दो, बर्तन ले लो, पैसे दे दो, जूते ले लो, की तर्ज पर। याद कीजिए फिल्म, हम आपके हैं कौन।

ऐसी ही कोई कपड़े बर्तन वाली औरत राह चलते, हमें रोक लेती थी। बोझा जब जमीन पर होता है, तो उसे सर पर लादने के लिए किसी की मदद लेनी पड़ती है। जब वह हमसे मिन्नत करती, बेटा जरा हाथ लगा दो, बहुत भारी है, तो हम पहले आसपास देखते थे, लेकिन फिर अनिच्छा से ही सही, हाथ लगा ही देते थे। वाकई, बोझा बहुत भारी होता था। कुछ समय के लिए हम सोच में भी पड़ जाते थे, इतना वजन, यह औरत कैसे उठा लेती है, लेकिन फिर सजग हो, अपने रास्ते चल पड़ते थे। उसकी दुआ जरूर हमें सुनाई देती थी, जिसे हम भले ही अनदेखा कर देते थे, लेकिन मन में किसी को मदद की संतुष्टि का भाव फिर भी आ ही जाता था।।

किसके कंधों पर कितनी जिम्मेदारियों का और कितनी मजबूरियों का बोझ है, यह केवल वह ही जानता है। शरीर के बोझ से मन का बोझ अधिक भारी होता है, लेकिन आप मानें या ना मानें, वह बोझ भी यही कंधे ढोते रहते हैं।

किसी के झुके हुए कंधों से ही पता चल जाता है, यह बेचारा, काम के बोझ का मारा, कुछ लेते क्यों नहीं, हमदर्द का सिंकारा।

जब बच्चे थे, तो पिताजी के कंधे पर बैठकर घूमने जाते थे। बड़े खुश होते थे, हम कितने बड़े हो गए हैं। जब असल में बड़े हुए तो असलियत पता चली, हमारे कंधों पर कितना बोझ है।।

चलो रे, डोली उठाओ कहार, पीया मिलन की रुत आई। लेकिन आजकल कहां कहार भी डोली उठाते हैं। चार पहियों की चमचमाती कार से, ब्यूटी पार्लर से सज धजकर आई दुल्हन, विवाह मंडप में प्रवेश करती है। कंधों से अधिक, कानों पर डायमंड इयररिंग्स का बोझ।

जमाना कितना भी आगे बढ़ जाए, जब इंसान यह संसार छोड़ता है तो चार कंधों की अर्थी पर ही जाना पड़ता है। यानी जन्म से अंतिम समय तक कंधे का साथ नहीं छूटता। अर्थी का बोझ भी मजबूत कंधे ही उठा पाते हैं। हमने तो जिधर भी कंधा लगाया है, अर्थी उधर ही झुकी है। कहीं से लपककर मजबूत कंधे आते हैं, और अर्थी से अधिक हमें राहत महसूस होती है। ईश्वर ना करे, हमें कभी किसी को कंधा देना पड़े, बोझ के मारे, हमारा कंधा उतर भी सकता है।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य #३१२ ☆ क्या प्रॉब्लम है…? ☆ डॉ. मुक्ता ☆

डॉ. मुक्ता

(डा. मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य” के माध्यम से  हम  आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी की मानवीय जीवन पर आधारित एक विचारणीय आलेख “क्या प्रॉब्लम है…?”। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की  लेखनी को  इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें।) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य  # ३१२ ☆

☆ क्या प्रॉब्लम है…? ☆

‘क्या प्रॉब्लम है’… जी हां! यह वह शाश्वत् प्रश्न है,जो अक्सर पूछा जाता है छोटों से; बराबर वालों से– परंतु आजकल तो ज़माना बदल गया है। अक्सर हर उम्र के लोग इन प्रश्नों के दायरे में आते हैं और हमारे बुज़ुर्ग माता-पिता तथा अन्य परिवारजन– सभी को स्पष्टीकरण देना पड़ता है। सोचिए! यदि रिश्ते में आपसे बहुत छोटी महिला यह प्रश्न पूछे,तो क्या आप सकते में नहीं आ जाएंगे? क्या होगी आपकी मन:स्थिति… जिसकी अपेक्षा आप उससे कर ही नहीं सकते। वह अनकही दास्तान आपकी तब समझ में तुरंत आ जाती है,जब चंद लम्हों बाद आपका अहं/ अस्तित्व पलभर में कांच के आईने की भांति चकनाचूर हो जाता है और उसके असंख्य टुकड़े आपको मुंह चिढ़ाते-से नज़र आते हैं। दूसरे शब्दों में आपको हक़ीक़त समझ में आ जाती है और आप तत्क्षण अचंभित रह जाते हैं यह जानकर कि कितनी कड़वाहट भरी हुई है सोमा के मन में– जब आपको मुजरिम की भांति कटघरे में खड़ा कर दिया जाता है और इल्ज़ामों की एक लंबी फेहरिस्त आपके हाथों में थमा दी जाती है। वह सोमा,जो आपको मान-सम्मान देती थी; सदैव आपकी तारीफ़ करती थी; जिसने इतने वर्ष एक छत के नीचे गुज़ारने के पश्चात् भी पलट कर कभी जवाब नहीं दिया था। वह तो सदैव परमात्मा का शुक्र अदा करती थी कि उसने उन्हें पुत्रवधु नहीं,बड़ी शालीन बेटी दी थी। परंतु जब विश्वास टूटता है; रिश्ते सहसा दरक़ते हैं तो बहुत तकलीफ़ होती है। हृदय कुलबुला उठता है,जैसे अनगिनत कीड़े उसके शरीर पर रेंग रहे हों और वह प्रश्नों के भंवर से चाह कर भी ख़ुद को मुक्त नहीं कर पाती।

‘आपको क्या प्रॉब्लम है?’ यदि बच्चे अपने मम्मी-पापा के साथ एकांत में समय गुज़ारना चाहते हैं; खाने के लिए नीचे नहीं आते तो…परंतु हम सबके लिए यह बंधन क्यों? वह वर्षों से अपने कौन-से दायित्व का वहन नहीं कर रही? आपके मेहमानों के आने पर क्या वह उनकी आवभगत में वह कमी रखती है,जबकि वे कितने-कितने दिन तक यहाँ डेरा डाले रहते हैं? क्या उसने कभी आपका तिरस्कार किया है? आखिर आप लोग चाहते क्या हैं? क्या वह इस घर से चली जाए अपने बच्चों को लेकर और आपका बेटा वह सब अनचाहा करता रहे? हैरान हूं यह देखकर कि उसे दूध का धुला समझ उसके बारे में अब भी अनेक कसीदे गढ़े जाते हैं।

वह अपराधिनी-सम करबद्ध प्रार्थना करती रही थी कि उसने ग़लती की है और वह मुजरिम है,क्योंकि उसने बच्चों को खाने के लिए नीचे आने को कहा है। वह सौगंध लेती है कि  भविष्य में वह उसके बच्चों से न कोई संबंध रखेगी; न ही किसी से कोई अपेक्षा रखेगी। तुम मस्त रहो अपनी दुनिया में… तुम्हारा घर है। हमारा क्या है,चंद दिन के मेहमान हैं। वह क्षमा-याचना कर रही थी और सोमा एक पुलिस अफसर की भांति उस पर प्रश्नों की बौछार कर रही थी।

जब जिह्वा साथ नहीं देती,वाणी मूक हो जाती है तो अजस्र आंसुओं का सैलाब बह निकलता है और इंसान किंकर्त्तव्य- विमूढ़ स्थिति में कोई भी निर्णय नहीं ले पाता। उस स्थिति में उसके मन में केवल एक ही इच्छा होती है कि ‘आ! बसा लें अपना अलग आशियां… जहां स्वतंत्रता हो; मानसिक प्रदूषण न हो; ‘क्या और क्यों’ के प्रश्न उन पर न दाग़े जाएं और वे उन्मुक्त भाव से सुक़ून से अपनी ज़िंदगी बसर कर सकें। इन परिस्थितियों में इंसान सीधा आकाश से अर्श से फ़र्श पर आन पड़ता है; जब उसे मालूम होता है कि इस करिश्में की सूत्रधार हैं कामवाली बाईएं–जो बहुत चतुर, चालाक व चालबाज़ होती हैं। वे मालिक-मालकिन को बख़ूबी रिझाना जानती हैं और बच्चों को वे मीठी-मीठी बातों से खूब बहलाती हैं। परंतु घर के बुज़ुर्गों व अन्य लोगों से लट्ठमार अंदाज़ से बात करती हैं,जैसे वे मुजरिम हों। इस संदर्भ में दो प्रश्न उठते हैं मन में कि वे उन्हें घर से निकालना चाहती हैं या घर की मालकिन उनके कंधे पर रखकर बंदूक चलाना चाहती है? छुरी हमेशा खरबूज़े पर ही पड़ती है,चाहे किसी ओर से पड़े और बलि का बकरा भी सदैव घर के बुज़ुर्गों को ही बनना पड़ता है।

वैसे आजकल तो बाईएं ऐसे घरों में काम करने को तैयार भी नहीं होती,जहां परिवार के सदस्यों के अतिरिक्त अन्य लोग भी रहते हों। परिवार की परिभाषा वे अच्छी तरह से जानती हैं… हम दो और हमारे दो,क्योंकि आजकल पति-पत्नी दोनों अक्सर नौकरी करते हैं। उनके घर से जाने के पश्चात् वे दिनभर अलग-अलग पोशाकों में सज-संवर कर स्वयं को आईने में निहारती हैं। यदि बच्चे छोटे हों, तो सोने पर सुहागा… उन्हें डाँट-डपट कर या नशीली दवा देकर सुला दिया जाता है और वे स्वतंत्र होती हैं मनचाहा करने के लिए। फिर वे क्यों चाहेंगी कि कोई कबाब में हड्डी बन कर वहां रहे और उनकी दिनचर्या में हस्तक्षेप करे? इस प्रकार उनकी आज़ादी में खलल पड़ता है। इसलिए भी वे बड़े बुज़ुर्गों से खफ़ा रहती हैं। इतना ही नहीं,वे उनसे दुर्व्यवहार भी करती हैं,जैसे मालिक नौकर के साथ करता है। जब उन्हें इससे भी उन्हें संतोष नहीं होता; वे अकारण इल्ज़ाम लगाकर उन्हें कटघरे में खड़ा कर देती है और घर की मालकिन को तो हर कीमत पर उनकी दरक़ार रहती है,क्योंकि बाई के न रहने पर घर में मातम-सा पसर जाता है। उस दारुण स्थिति में घर की मालकिन भूखी शेरनी की भांति घर के बुज़ुर्गों पर झपट पड़ती है,जो अपनी अस्मत को ताक़ पर रख कर वहां रहते हैं। एक छत के नीचे रहते हुए भी अजनबीपन का एहसास उन्हें नासूर-सम हर पल सालता रहता है। उस घर का हर प्राणी नदी के द्वीप की भांति अपना-अपना जीवन ढोता है। वे अपने आत्मजों के साथ नदी के दो किनारों की भांति कभी मिल नहीं सकते। वे उनकी जली-कटी सहन करने को बाध्य होते हैं और सब कुछ देखकर आंखें मूँदना उनकी नियति बन जाती है। वे हर पल व्यंग्य-बाणों के प्रहार सहते हुए अपने दिन काटने को विवश होते हैं। उनकी यातना अंतहीन होती है,क्योंकि वहाँ पसरा सन्नाटा उनके अंतर्मन को झिंझोड़ता व कचोटता है। दिनभर उनसे बतियाने वाला कोई नहीं होता। वे बंद दरवाज़े व शून्य छतों को निहारते रहते हैं। बच्चे भी उन अभागों की ओर रुख नहीं करते और वे अपने माता-पिता से अधिक स्नेह नैनी व कामवाली बाई से करते हैं।

‘हाँ! प्रॉब्लम क्या है’ ये शब्द बार-बार उनके मनोमस्तिष्क पर हथौड़े की भांति का प्रहार करते हैं और वे हर पल स्वयं को अपराधी की भांति दयनीय दशा में पाते हैं। परंतु वे आजीवन इस तथ्य से अवगत नहीं हो पाते कि उन्हें किस जुर्म की सज़ा दी जा रही है? उनकी दशा तो उस नारी की भांति होती है,जिसे उस अपराध के लिए दोषी ठहराया जाता है; जो उसने किया ही नहीं। उन्हें तो अपना पक्ष रखने का अवसर भी प्रदान ही नहीं किया जाता। कई बार ‘क्यों का मतलब’ शब्द उन्हें हांट करते हैं अर्थात् बाई का ऐसा उत्तर देना…क्या कहेंगे आप? सो! उनकी मन:स्थिति का अनुमान आप स्वयं लगा सकते हैं। सो! चिंतन-मनन कीजिए कि आगामी पीढ़ी का भविष्य क्या होगा?

वैसे इंसान को अपने कृत-कर्मों का फल अवश्य भुगतना पड़ता है,क्योंकि जैसा वह करता है,वही लौटकर उसके पास आता है। लोग चिंतित रहते हैं अपने बच्चों के भविष्य के बारे में और यह सोचकर वे हैरान-परेशान रहते हैं। आइए! यह समझने का प्रयास करें कि प्रॉब्लम क्या है और क्यों है? शायद! प्रॉब्लम आप स्वयं हैं और आपके लिए उस स्थान को त्याग देना ही उस भीषण समस्या का समाधान है। सो! मोह-ममता को त्याग कर अपनी राह पर चल दीजिए और उनके सुक़ून में ख़लल मत डालिए। ‘जीओ और जीने दो’, की अवधारणा पर विश्वास रखते हुए दूसरों को भी अमनोचैन की ज़िंदगी बसर करने का अवसर प्रदान कीजिए। उस स्थिति में आप निश्चिंत होकर जी सकेंगे और ‘क्या-क्यों’ की चिंता स्वत: समाप्त हो जाएगी। फलत: इस दिशा में न चिंता होगी; न ही चिंतन की आवश्यकता होगी।

●●●●

© डा. मुक्ता

माननीय राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत, पूर्व निदेशक, हरियाणा साहित्य अकादमी

संपर्क – #239,सेक्टर-45, गुरुग्राम-122003 ईमेल: drmukta51@gmail.com, मो• न•…8588801878

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ९३५ ⇒ उधार प्रेम की कैंची है ! ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “उधार प्रेम की कैंची है !“।)

?अभी अभी # ९३५ ⇒ आलेख – उधार प्रेम की कैंची है ! ? श्री प्रदीप शर्मा  ? 

आज नक़द, कल उधार और उधार प्रेम की कैंची है, लिखने वाले दुकानदार, कितना नकद से प्रेम करते हैं, और कितना भगवान समान ग्राहक से, यह छुपा नहीं है ! मैंने हमेशा नक़द ही सौदा लिया है, लेकिन किसी दुकानदार ने प्रेम के वशीभूत हो, मुझे गले नहीं लगाया। ऐसा कई बार हुआ है कि मैं नकद पैसे लिए, सौदे के लिए खड़ा रहा, और एक बहनजी उधारी का सामान और अपने सुंदर से बच्चे के लिए मुफ़्त में एक्लेयर्स ले, रवाना हो गई और दुकानदार मेरी उपेक्षा करते हुए उधारी के सामान को डायरी में नोट करता रहा। बाबूजी ! उधारी का मामला है, बाद में भूल जाता हूँ। यानी उधार की कैंची मुझ पर, और प्रेम बहनजी के लाड़ले पर।

यूँ तो नकद का मतलब रोकड़ा ही होता है, लेकिन जब से नोटबन्दी के पश्चात कैशलेस का चक्कर चला है, सरकारी भीम और paytm, कैश काउंटर पर विराजमान हो गए हैं। न सड़े गले, फटे-टूटे नकली नोटों की चिंता, न चोर-डाकुओं का डर ! रात को कैश घर ले जाते समय का खतरा, और घर पर भी भारी भरकम नकदी रखने के खतरे से तो बचे ही, ग्राहक को भी डिस्काउंट का फ़ायदा। हुआ न एक पंथ दस काज।।

लेकिन जब कोई दोस्त या रिश्तेदार उधार माँगता है तो वह यह नहीं कहता कि भैया मेरे खाते में हज़ार-पांच सौ जमा कर देना। बाकायदा भाव-ताव होता है। पाँच हज़ार की माँग नीचे आते आते पाँच सौ तक आ जाती है और वह आप पर एक तरह से अहसान जताता हुआ, उक्त राशि स्वीकार कर ही लेता है। मुझे मालूम था, आप इससे ज़्यादा नहीं दे पाओगे। अब किसी और के आगे हाथ पसारने पड़ेंगे।

मैंने किसी बैंक में उधार प्रेम की कैंची है, जैसी तख्ती लगी नहीं देखी ! आकर्षक दरों पर ऋण लीजिये के अंतर्गत, अगर बीवी को छोड़ दिया जाए, तो घर की हर चल, अचल सम्पत्ति पर प्रेम से उधार मिल सकता है। घर से लगाकर फ्रिज, टीवी, गीज़र, फर्नीचर और मोबाइल से ऑटो-मोबाइल तक ! पत्नी चल सम्पत्ति है या अचल, यह तो अटलजी भी नहीं जान पाए।।

कैंची से कपड़े कटते हैं, पार्लर में बाल कटते हैं, जिनकी ज़बान कैंची जैसी चलती है, वे सामने वाले की बात तक काट देते हैं, लेकिन उधार एक ऐसी कैंची है जो प्रेम के रिश्ते को काटती है।

पैसा रिश्ते को जोड़ता है, फिर चाहे वह नकद का हो, या उधारी का। कहने वालों का क्या, वे तो दहेज को भी प्रेम की कैंची कहने लग गए। अंगूर खट्टे हों, तो आदर्शवाद बुरा नहीं।

मैं न उधार देता हूँ, न लेता हूँ। फिर भी माथे पर इतना कर्ज़ है कि कितने ही जन्म ले लूँ, उतार नहीं पाऊँगा। माटी का कर्ज़, माता पिता, गुरुजन, समाज, परिजन, हितैषी और सद्गुरु के ऋण से कौन उऋण हो पाया है। यह ऋण उधार नहीं, प्रेम की कैंची नहीं, प्रेम का सागर है। लेकिन हमारी मज़बूरी यही कि हमारे पास सिर्फ़ एक गागर है।

प्रेम की यह गागर कभी खाली न हो। प्रेम के रिश्तों को भुनाया नहीं जाता, और अधिक मजबूत किया जाता है। किसी पर अहसान जताया नहीं जाता, अहसान चुकाया जाता है। उस ऊपर वाले के ही इतने कर्ज़ हैं, इतने अहसान हैं, लेकिन वह कोई साहूकार नहीं, सिर्फ मेहरबान है।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ सपने बड़े देखें…  ☆ सुश्री  मंजिरी “निधि” ☆

सुश्री  मंजिरी “निधि”

(ई-अभिव्यक्ति में बड़ोदा से सुश्री  मंजिरी “निधि” जी का स्वागत.  गद्य एवं छंद विधा में अभिरुचि के साथ ही महिला उद्यमी। आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय लेख ‘सपने बड़े देखें…‘।)

? आलेख – सपने बड़े देखें…  ☆ सुश्री  मंजिरी “निधि” ? ?

हम हमारे जीवन की जो अवधारणा रखते हैं, उसका हमारे जीवन पर बहुत प्रभाव होता है l यदि जीवन की अवधारणा बड़ी है, तो हमारे सपने बड़े होंगे l

सोलह वर्ष की उम्र में व्यक्ति जिंदगी जीने के लिये जो सपने देखता है उन्हें पूरा करने की लिये वो जी जान लगा देता है l इसीलिये कहते भी हैं कि युवा पीढ़ी का रहन सहन, उनकी भाषा, उनके अधरों पर गाने सुनकर उस राष्ट्र का भविष्य बताया जा सकता है l जीने के लिये यदि विशाल और सृजनशील सपने देखें तो हम स्वयं का, समाज का और राष्ट्र का नक्शा बदल सकते हैं l

बाबा आमटे के अनुसार ऐसे सृजनशील व साहसी युवा पीढ़ी का निर्माण हो जो अच्छी योजनाएं बनाये और उस पर काम भी करे l

चादर देखकर पैर पसारो इस कहावत को भूल कर पैर कितने पसारने हैं उसके हिसाब से चादर का निर्माण करना जरूरी है l

आज की दौर में नई राहें, नये सपने पूरे करने हेतु संघर्ष करना पड़े तो करो l बिपदाओं का सामना कर आगे बढ़ो l

अपयश अपराध नहीं बल्कि आगे जाने की सीढ़ी है l हमारा लक्ष्य बड़े सपने देखना होना चाहिए l उन सपनों को पूरा करने की जिद होनी चाहिए l उन सपनों को कैसे साकार करें इसका चिंतन होना चाहिए l

जीजा माता की प्रेरणा से छत्रपति शिवाजी महाराज ने सिर्फ सोलह वर्ष की आयु में हिन्दवी स्वराजय का सपना देखा था और उसे साकार भी किया l स्वातंत्र वीर विनायक दामोदर सावरकर जी ने सोलह वर्ष की उम्र में अपनी मातृभूमि को स्वतंत्र करने का इतिहास लिख दिया l

कहने का तातपर्य है कि ऐसे बड़े सपने जीवन की हर क्षेत्र में देखे जाते हैं और उन्हें पूरा करने हेतु अथक प्रयास भी करने होते हैं l एक समय कि बात हैं कि एक पेट्रोल पम्प पर एक लड़का पेट्रोल भरने का काम करता था l एक दिन किसी ने उससे कहा कि पूरी जिंदगी ऐसे पेट्रोल भरता रहेगा कि कोई सपने भी देखें हैं तूने जिंदगी में?

उसने कहा पेट्रोल केमिकल क्षेत्र में मेरी मालिकी की एक बड़ी कम्पनी खोलूंगा ऐसा मेरा सपना है l वहाँ खड़े लोग उसपर हसे l इतना बड़ा सपना?

लोगों ने मजाक उड़ाया कि पहले पेट्रोल तो भर ले….

और वह सपने देखने वाला लड़का और कोई नहीं बल्कि धीरुभाई अम्बानी था जिन्होंने सिद्ध किया कि सपने बड़े देखना चाहिए और उन्हें पूरा करने शिद्द्त से जोर लगा देना चाहिए l

हम सभी अपने कार्य क्षेत्र में ऐसे बड़े सपने देख, उन्हें पूरा कर अपने जीवन को एक नया रूप नया आकार दे सकते हैं l इस बात का मुझे भी स्वानुभव है और पूरा विश्वास भी है कि बड़े सपने देखना जरूरी है और वो पूरे भी होते हैंl

☆

© सुश्री  मंजिरी “निधि”
बड़ोदा, गुजरात

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक साहित्य # ४०२ ☆ आलेख – “डॉ धर्मवीर भारती की रचनाओं में व्यंग्य दृष्टि” ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ४०२ ☆

?  आलेख – डॉ धर्मवीर भारती की रचनाओं में व्यंग्य दृष्टि ? श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

 धर्मवीर भारती के लेखन में व्यंग्य उनकी संवेदना के भीतर घुली हुई वह कसक है जो करुणा, नैतिक बेचैनी और उनके लेखन में ऐतिहासिक दृष्टि के साथ मिलकर प्रकट होती है। वे हँसाने वाले व्यंग्यकार नहीं हैं बल्कि मुस्कान के भीतर छिपी हुई पीड़ा दिखाने वाले रचनाकार हैं। उनके नाटक , उपन्यास , कविता में व्यंग्य पात्रों की सहज अभिव्यक्ति से पाठक की अंतरात्मा को कुरेदता है।

उनका काव्य नाटक अंधा युग इसका सबसे सशक्त उदाहरण है। महाभारत के युद्ध के बाद की कथा के माध्यम से उन्होंने आधुनिक मनुष्य के नैतिक अंधेरे,  सत्ता की क्रूरता और विजेताओं की खोखली विजय पर ऐसा व्यंग्य किया है जो सीधे किसी व्यक्ति पर नहीं पूरी सभ्यता पर लक्षित है। उनके ये प्रयोग किसी नितांत व्यंग्य का टैग लगाए आज की कई  रचनाओं से अधिक प्रभावी हैं ।

उनकी अभिव्यक्ति में धृतराष्ट्र का अंधापन केवल शारीरिक नहीं रह जाता वह सत्ता में बैठे हर उस व्यक्ति का प्रतीक बन जाता है जो सच जानते हुए भी उसे देखना नहीं चाहता। उदाहरण स्वरूप नाटक में धृतराष्ट्र का संवाद “मैंने कुछ नहीं देखा कुछ नहीं सुना” आधुनिक शासकों की जानबूझकर की अज्ञानता पर तीखा व्यंग्य है जो युद्ध की विभीषिका को नजर अंदाज कर सत्ता की भूलभुलैया में भटकते हैं। गांधारी का क्षोभ और अश्वत्थामा का अंध प्रतिशोध आधुनिक राजनीतिक वर्गों की मानसिकता को उघाड़ते हैं जहाँ एक अन्य पंक्ति “विजय तो हुई पर मनुष्य कहाँ बचा” विजेताओं के खोखले दंभ पर प्रहार करती है।

उनके उपन्यास गुनाहों का देवता में भी व्यंग्य सामाजिक संरचनाओं पर है। स्वयं उपन्यास के नाम में ही व्यंग्य का कंट्रास्ट दिखता है। यह कृति प्रेमकथा का उपन्यास  मानी जाती है किन्तु, इसमें व्यंग्य अंतर्निहित है। प्रेम के नाम पर त्याग का महिमामंडन करने वाला समाज स्वयं प्रेम से डरता है। चंदर और सुधा के संबंधों की विवशताएँ पाठक को द्रवित करती हैं पर साथ ही यह प्रश्न भी उठाती हैं कि क्या हमारी नैतिकता वास्तव में मानवीय है या केवल सामाजिक सुविधा है। एक उदाहरण है चंदर का वह अंतर्मन जहाँ वह सोचता है “प्रेम तो देवत्व है पर समाज इसे गुनाह बना देता है” जो प्रेम को पवित्र बताकर त्याग थोपने वाली सामाजिक मान्यताओं पर सूक्ष्म व्यंग्य है। दूसरा उदाहरण सुधा का विवाह बिंदु है जहाँ प्रेम का बलिदान सामाजिक सम्मान के नाम पर मजबूर किया जाता है यह दर्शाते हुए कि हिन्दू समाज नारी को देवी बनाकर उसी के गुनाहों का देवता कैसे थोप देता है। यहाँ व्यंग्य खुलकर नहीं बोलता बल्कि परिस्थितियों की विडंबना में स्वतः उभरता है।

डॉ भारती की कविताओं विशेषकर कनुप्रिया में भी पारंपरिक प्रेम आख्यानों पर एक सूक्ष्म पुनर्पाठ दिखाई देता है। राधा का स्वर कहीं कहीं उस पुरुष केंद्रित मिथकीय संरचना पर प्रश्न करता हुआ प्रतीत होता है जिसने स्त्री को प्रतीक्षा और विरह की मूर्ति बनाकर स्थापित किया। कनुप्रिया नारी के अंतर्मन की परतें खोलती है जहाँ सुख के क्षणों में घिर आने वाली निर्व्याख्या उदासी और विप्र लब्धा रस की पीड़ा को सौंदर्यपूर्ण ढंग से व्यक्त करती है। यह व्यंग्य आक्रामक नहीं आत्म संवादी है। ठंडा लोहा संग्रह में शहर की उदासीनता अकेलेपन और मूल्य क्षय पर प्रतीकात्मक व्यंग्य है । जैसे मेरी दुखती हुई रगों पर ठंडा लोहा रखना उस व्यवस्था का प्रतीक है जो संवेदनशीलता पर कठोरता चढ़ाती है ।

पत्रकार और संपादक के रूप में जब वे धर्मयुग का संचालन कर रहे थे तब उनके संपादकीय लेखों में सामाजिक और राजनीतिक विसंगतियों पर संयत किन्तु तीक्ष्ण टिप्पणी मिलती है। वे शोर नहीं मचाते पर शब्दों के बीच ऐसी रिक्ति छोड़ते हैं जहाँ पाठक स्वयं व्यवस्था की विडंबना पहचान लेता है। धर्मयुग के माध्यम से उन्होंने नई पीढ़ी को विसंगति पहचानने की संवेदना दी।

उनके व्यंग्य की सबसे बड़ी विशेषता यही है कि वह व्यक्ति विरोधी नहीं स्थिति विरोधी है। उसमें क्रोध कम नैतिक पीड़ा अधिक है। वे उपहास नहीं करते बल्कि यह दिखाते हैं कि मनुष्य अपनी ही बनाई संरचनाओं में कैसे फँस गया है। इसलिए उनका व्यंग्य समय के साथ पुराना नहीं पड़ता क्योंकि वह किसी घटना पर नहीं मनुष्य की प्रवृत्ति पर केंद्रित है।

धर्मवीर भारती को पढ़ते हुए लगता है कि व्यंग्य तब सबसे प्रभावी होता है जब वह हँसी पैदा न करे बल्कि भीतर एक असुविधाजनक चुप्पी छोड़ जाए। वही चुप्पी उनकी रचनाओं की वास्तविक शक्ति है और वही उन्हें केवल साहित्यकार नहीं अपने समय का आत्मद्रष्टा बनाती है।

एक प्रसंग डॉ पुष्पा भारती के संस्मरण पढ़ने में मिला, रागदरबारी का प्रारंभिक लेखन श्रीलाल शुक्ल जी ने डॉ धर्मवीर भारती के मुंबई के जुहू वाले समुद्र किनारे के फ्लैट में ही किया था।

पुष्पा जी ने लिखा है, “मुंबई शहर के छोर पर महासागर से अभिप्रेरित ही रागदरबारी की पहली पंक्तियां हैं – महानगर के छोर से ही भारत में देहात का महासागर प्रारंभ हो जाता है…

तो जिन धर्मवीर भारती जी के घर में ही व्यंग्य का राग दरबार उपजा हो , उनके लेखन में व्यंग्य  स्वाभाविक रूप से घुला होना स्वाभाविक ही है।

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© श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

म प्र साहित्य अकादमी से सम्मानित वरिष्ठ व्यंग्यकार

संपर्क – ए 233, ओल्ड मिनाल रेजीडेंसी भोपाल 462023

मोब 7000375798, ईमेल apniabhivyakti@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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