हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ७९८ ⇒ भैंस के आगे बीन ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “भैंस के आगे बीन।)

?अभी अभी # ७९८ ⇒ आलेख – भैंस के आगे बीन ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

बीन एक वाद्य यंत्र है कि नहीं, मैं नहीं जानता, लेकिन इतना जरूर जानता हूं कि अगर दुधारू पशुओं को संगीत सुनाया जाए, तो वे अधिक दूध देते हैं। फिर भी विशेषज्ञ हमें भैंस के आगे बीन बजाने से रोकते हैं, कहते हैं, भैंस के आगे बीन बजाने से क्या फायदा। भैंस तो दूध देने से रही, कहीं बीन की धुन सुन कोई नागिन प्रकट ना हो जाए, क्योंकि कल्याणजी आनंद जी के बाद बीन पर केवल नागिन का ही तो कॉपीराइट हैं। वैसे भी मन डोले, मेरा तन डोले, पर भैंस का नागिन डांस, एक हास्यास्पद कल्पना ही हो सकती है, कोई रियलिटी शो नहीं।

भैंस के बारे में हमारे कई पूर्वाग्रह हैं। अगर कबीर ढाई आखर प्रेम का पढ़ने वाले को पंडित मानते हैं, तो हम निरक्षर के बारे में यह घोषणा कर देते हैं, कि उसके लिए तो काला अक्षर भैंस बराबर है। एक छोटा सा अक्षर जिसका कभी क्षरण नहीं होता, उसकी तुलना किसी विशालकाय भैंस से करना, क्या अक्षर का अपमान नहीं। बेचारी भैंस का क्या वह तो वैसे ही बदनाम है। उसके आगे आप चाहे बीन बजाओ अथवा राग भैरवी गाओ।।

मैंने केवल बचपन में मां का दूध पीया है, उसके बाद आज तारीख तक मेरा पालन पोषण भैंस के दूध पर ही हुआ है, फिर चाहे वह बंदी के दूधवाले का पानी मिला दूध हो अथवा अमूल और सांची का फैट युक्त गोल्डब्रांड भैंस का दूध। मुझे दूध पर भी भरोसा है, और अपनी अक्ल पर भी। लेकिन जब किसी को यह कहते सुनता हूं कि अक्ल बड़ी या भैंस, तो मुझे तो भैंस ही बड़ी लगती है, क्योंकि उसी के दूध से मुझमें बुद्धि और प्रज्ञा का विकास हुआ है। मैं अपना अपमान सह सकता हूं, लेकिन भैंस का नहीं।

आखिर भैंस के प्रति इतना दुराग्रह क्यों। द्वापर युग में गोवर्धन धारी भगवान श्रीकृष्ण ने अवतार लिया, गोकुल, नंदगांव और वृंदावन की कुंज गलियों में गोप गोपियों सहित रास रचाया, छोटी छोटी गैया और छोटे से गोपाल को कौन भूल सकता है। बालकृष्ण की बंसी की तान पर क्या गऊ और क्या ग्वाल, सब दौड़ पड़ते थे, लेकिन बस बेचारी भैंस का ही कहीं वर्णन देखने/सुनने में नहीं आया।।

गाय तो वैसे भी हमारी माता है, लेकिन भैंस को तो मौसी का दर्जा भी नहीं मिल पाया। धन्यभाग बिल्ली के, जो वह शेर की मौसी तो कहलाती है। आज भी रसोई में पहली रोटी गाय की ही होती है, भैंस की नहीं। कितना आदर सम्मान गाय को, उसके लिए गोशाला, और भैंस के लिए तबेला। पूर्वजों के निमित्त गऊ ग्रास और भैंस को सिर्फ घास।

कोई स्वर्गवासी, कोई परलोकवासी तो कोई गोलोकवासी और बेबस, बेचारी भैंस लेती रहती उबासी।

भैंस पर किसी को कोई यकीन नहीं, भरोसा नहीं। लो गई भैंस पानी में और जब भी भरोसा किया, भरोसे की भैंस ने हमेशा पाड़ा ही जना।

मैं अच्छी तरह से जानता हूं, भैंस की तारीफ में कितने भी कसीदे काढ़ लूं, किसी को कोई फर्क नहीं पड़ना। लगता है मेरी बुद्धि ही घास चरने गई थी, जो मैं भैंस का गुणगान कर बैठा। किसी ने सच ही कहा है, भैंस के आगे बीन बजाने से क्या फायदा।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ७९७ ⇒ सपने अपने अपने ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “सपने अपने अपने।)

?अभी अभी # ७९७ ⇒ आलेख – सपने अपने अपने ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

सपने तो सपने, कब हुए अपने ! यह भी क्या बात हुई ? अपने ही सपने, अपने नहीं होंगे, तो किसके होंगे। अमीर आदमी के तो सभी सपने सच हो जाते हैं, उसकी आँखों की नींद गायब हो जाती है। अब सपने आएँ भी तो कैसे, और अगर आ भी गए तो वापस ग़रीबी के आने से तो रहे।

ग़रीब का सपनों पर जन्मसिद्ध अधिकार है। उसे, कम से कम, सपने देखने से तो कोई नहीं रोक सकता। उसकी हालत तो यह है कि अगर वह आँखें खोल, जीवन की कड़वी सच्चाई से रूबरू होना चाहे, तो सियासत उसे फिर सपने दिखाना शुरू कर देती है। बहुत देख लिए उसने, खुली आँखों से, समाजवाद और गरीबी हटाओ के सपने। अब अच्छे दिनों के सपने देखने के लिए उसके पास वक्त नहीं।।

जिनका यथार्थ कड़वा होता है, वे मीठे सपनों से ही काम चला लेते हैं। जो व्यावहारिक, सकारात्मक सोच और पुरुषार्थी लोग होते हैं, वे सपने देखने में नहीं, सपनों को सच करने में यक़ीन रखते हैं। फिर चाहे वह ओलिंपिक में गोल्ड मेडल का सपना हो, या कौन बनेगा करोड़पति की हॉट सीट पर अमित जी से हाथ मिलाने का।

सपने देखना आपका, (सं)वैधानिक अधिकार है। आप जैसे चाहें सपने देखें, अच्छे-बुरे, शालीन -अशालीन, अहिंसावादी-आतंकवादी, कोई आपको नहीं रोक सकता। यह आपका निजी और अंदर का मामला है। लक्स अंडरवियर से सभी अधिक अंदरूनी।।

फिल्मों को सपनों से बहुत प्रेम है। बहारों के सपने, शहर और सपना तो ठीक, बेचारी स्वप्नसुंदरी पर भी फ़िल्म बना डाली, ड्रीमगर्ल ! आम आदमी को सिर्फ़ चार आने में सच्चाई से सपनों के संसार में ले जाने का दायित्व हमारी फिल्में पिछले कई सालों से बखूबी निभाती चली आ रही है। अब तो अपनी हथेलियों में, जहाँ कभी कराग्रे वस्ते लक्ष्मी, कर मूले सरस्वती का वास था, वहाँ आज एक स्मार्ट फ़ोन सभी सपनों को साकार कर रहा है। अब लोग सपने नहीं देखते, हर चीज़ लाइव देखते हैं, अपने घरों में, बैडरूम में, ड्रॉइंग रूम में, कभी अकेले में, तो कभी सपरिवार।

आप इसे आधी हक़ीक़त और आधा फसाना भी कह सकते हैं। हम खुश हैं, जो मिला उसमें भी, जी न मिला उसमें भी। सपने देखना हम नहीं छोड़ेंगे। अपने तो कब के पराये हो चले, कम से कम सपने तो अपने हैं।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २४३ – आलेख – महाआरती ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ ☆

श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है सामाजिक विमर्श पर आधारित विचारणीय आलेख महाआरती ”।) 

☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २४३ ☆

🌻आलेख🌻 🪔महाआरती 🪔

समय के साथ सब बदल जाता है। नही बदलता तो सिर्फ बड़े – छोटे, अमीरी – गरीबी, छल-छलावा, ऊँच- नीच, जात – पात।

मान सम्मान तो पलक झपकते ही बदल जाते हैं। ऊँचे भव्य पंडाल में महाआरती का आयोजन।

यदि कोई समान्य आमजन का पंडाल बना जिसमें मध्यमवर्गीय परिवार है। वो महाआरती के विशेष आयोजन को करने अपने से बड़ों को बुलाते हैं, परन्तु वही महाआरती जब कुछ उच्च वर्ग और अमीर पंडाल है तो  मध्यमवर्गीय को आरती दूर से देखने को मिलता है, परन्तु उतारा करके ग्रह दोष शांत कर भंडारा खिलाते उन्हें गरीब और मध्यमवर्गीय परिवार को पंक्तियां बनवा देते हैं। और सभी लाईन लगकर भंडारा लेते भी है क्योंकि उन्हें वह बड़े आदमियों का प्रसाद वितरण लगता है।

माँ के आँचल में क्या अमीर क्या गरीब? पर हाय रे माया जीवन को सार्थक बनाने के लिए महाआरती करने के लिए पैसा और हैसियत दोनों का होना कितना जरुरी है।

जगजननी आज भी मोहनी रुप धारण करने का समय आ गया है। जहाँ पर पाप, बड़े अमीर, हैसियत, और बड़े रुदबे रुपी दानव से बचाकर संस्कार, सादगी, सहजता भावों को अमर करना होगा।

© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # १४९ – देश-परदेश – छाता बनवा लो ☆ श्री राकेश कुमार ☆

श्री राकेश कुमार

(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ  की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” ज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)

☆ आलेख # १४९ ☆ देश-परदेश – छाता बनवा लो ☆ श्री राकेश कुमार ☆

नब्बे के दशक तक ” छाता बनवा लो” जैसे शब्द कान में सुनाई दिया करते थे। अब तो ये शब्द सुने हुए एक लंबा अंतराल हो चुका हैं। पहले पैदल चलते हुए कांधे पर बड़े से झोले में अपनी पूरी दुकान को समेट कर द्वार द्वार से कारीगर अपनी सेवाएं देते थे।

आश्चर्य तो तब होता था, भरी बरसात में ये लोग स्वयं छाता वहन नहीं कर पाते थे। हमारे यहां गरीबी का ये अलाम है, दूध विक्रेता स्वयं दूध नहीं पी पाता हैं।

बाद के वर्षों में ये छाता सुधारक पुरानी साइकिल से गली कूचे पहुंच कर सेवा देने लगे थे। समय ने करवट ली, लोगों का रहन सहन, सुविधा जनक हुआ, लोग छत वाली कार में घूमने लगें। छाते का उपयोग ही कम हो गया, बाइक और स्कूटर वाले भी छाते का उपयोग कर पाने में असहज हैं। गरीब लोग तो प्रिपोपलाइन के पुराने बोरे से वर्षा ऋतु में काम चला लेते हैं।

हमने तो बचपन से लेकर आजतक भी काले रंग का जेब्रा ब्रांड का छाता ही उपयोग किया हैं। दुनिया तो अब रंगीन छातों की हो चुकी हैं। हमारे पिताश्री वर्षा ऋतु की समाप्ति पर छाते को धूप में अच्छे से सुखाकर और उसके अंदर लगी हुई धातु की डांडियों पर तेल लगाने के बाद ही रखते थे, ताकि उस में जंग आदि ना लगे। अब तो हर वर्ष नया खरीदने का रिवाज़ बन चुका हैं।

मुम्बई जैसे शहर जहां वर्षा तो अधिक होती ही है, लोग पैदल भी खूब चलते है, छाते अभी भी अपनी उपयोगिता प्रमाणित करते हैं। वहां इसकी मरम्मत का कार्य अधिकतर मोची ही कर लेते हैं।

चीन देश से सस्ते और घटिया छातों ने इन कारीगरों की रोजी रोटी छीन ली हैं। “उपयोग और फेंको ” पद्धति ने कुटीर उद्योगों की रीढ़ की हड्डी तो तोड़ी ही है, साथ ही साथ रिपेयर जैसे छोटे काम करने वाली क़ौम का प्रायः खात्मा ही कर दिया हैं।

ये कारीगर भी सीजनल कार्य की कर पाते थे। जून के अंत से सितंबर माह की समाप्ति तक ही इनकी आवश्यकता रहती हैं। अब सितंबर माह भी समाप्त हो रहा है, हम भी अपनी लेखनी को विराम देते हैं।

© श्री राकेश कुमार

संपर्क – B 508 शिवज्ञान एनक्लेव, निर्माण नगर AB ब्लॉक, जयपुर-302 019 (राजस्थान)

मोबाईल 9920832096

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ७९६ ⇒ दिल की नज़र से ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “दिल की नज़र से।)

?अभी अभी # ७९६  ⇒ आलेख – दिल की नज़र से ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

दिल तो हम सबका एक ही है, लेकिन अफसाने हजार !

आँखें तो सिर्फ दो ही हैं, लेकिन ये नज़र कहां नहीं जाती। आपने सुना नहीं, जाइए आप कहां जाएंगे, ये नजर लौट के फिर आएगी। आँखों का काम देखना है, और दिल का काम धड़कना। आँखों में जब नींद भर जाती हैं, वे देखना बंद कर देती हैं, और इंसान बंद आंखों से ही सपने देखना शुरू कर देता है, लेकिन बेचारे दिल को, चैन कहां आराम कहां, उसे तो हर पल, धक धक, धड़कना ही है।

ऐसा क्या है इस दिल में, और इन आँखों में, कि जब मरीज किसी डॉक्टर के पास जाता है, तो वह पहले कलाई थाम लेता है और बाद में उसके यंत्र से दिल की धड़कन भी जांच परख लेता है। और उसके बाद नंबर आता है, आंखों का। आंखों में नींद और ख्वाब के अलावा भी बहुत कुछ होता है। बुखार में आँखें जल सकती हैं, आँखों में कंजक्टिवाइटिस भी हो सकता है। शुभ शुभ बोलें। ।

दिल जिसे चाहता है, उसे अपनी आंखों में बसा लेता है, और फिर शिकायत करता है, मेरी आंखों में बस गया कोई रे, हाय मैं क्या करूं। अक्सर दिल के टूटने की शिकायत आती है, और दिल के घायल होने की भी। जब कोई नजरों के तीर कस कस कर मारेगा, तो दिल को घायल तो होना ही है।

ईश्वर ने हमारा हृदय बड़ा विशाल बनाया है शायद इसीलिए कुछ लोग दरियादिल होते हैं। आप दिल में चाहें तो एक मूरत बिठा लें, और अगर यह दिल पसीज जाए तो दुनिया के सभी दुख दर्द इसमें समा जाएं। ।

हमारी आंखों ने भी कच्ची गोलियां नहीं खेलीं ! बसो मेरे नयनन में नंदलाल ! मोहिनी मूरत, सांवरी सूरत, नैना बने बिसाल। किसी को आंखों में बसाने के लिए पहले आंखों को बंद करना होता है। बाहरी नजर तो खैर कमाल करती ही है, एक अंतर्दृष्टि भी होती है, जो नेत्रहीन, लेकिन प्रज्ञाचक्षु भक्त सूरदास के पास मौजूद थी। कितना विशाल है हमारी अंतर्दृष्टि का संसार।

लेकिन इस जगत के नजारे भी कम आकर्षक नहीं ! नजरों ने प्यार भेजा, दिल ने सलाम भेजा और नौबत यहां तक आ गई कि ;

मुझे दिल में बंद कर दो

दरिया में फेंक दो चाबी।

यह कुछ ज्यादा नहीं हो गया। लेकिन यह तो कुछ भी नहीं, और देखिए ;

आँखों से जो उतरी है दिल में

तस्वीर है एक अन्जाने की।

खुद ढूंढ रही है शमा जिसे

क्या बात है उस परवाने की। ।

जरूर आँखों और दिल के बीच कोई हॉटलाइन है।

ऐसा तो हो ही नहीं सकता कि कोई चीज आपको पसंद आए, और उसके लिए आपका मन ना ललचाए। ये दिल का शब्द भंडार भी कम नहीं। जी, कहें, जिया कहें अथवा जिगर कहें। आपने सुना नहीं, नजर के सामने, जिगर के पास।

नज़ारे हम आँखों से देखते हैं, और खुश यह दिल होता है। गौर फरमाइए ;

समा है सुहाना, सुहाना

नशे में जहां है।

किसी को किसी की

खबर ही कहां है।

………..

नजर बोलती है

दिल बेजुबां है। ।

आजकल हम दिल की बात किसी को नहीं कहते। आप भी शायद हमसे असहमत हों, लेकिन नजर वो, जो दुश्मन पे भी मेहरबां हो। जिन आंखों में दर्द नहीं, दिल में रहम नहीं, तो हम क्यों बातें करें रहमत की, इंसानियत की।

शैलेंद्र ने सच ही कहा है ;

दिल की नजर से

नजरों के दिल से

ये बात क्या है

ये राज़ क्या है

कोई हमें बता दे। ।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – संस्मरण ☆ दस्तावेज़ # ४४ – भारतीय आयुध निर्माणी का निगमीकरण: एक नए युग की शुरुआत / The Legacy and New Dawn of India’s Ordnance Factories – ☆ श्री जगत सिंह बिष्ट ☆

श्री जगत सिंह बिष्ट

(Master Teacher: Happiness & Well-Being, Laughter Yoga Master Trainer, Author, Blogger, Educator, and Speaker.)

(ई-अभिव्यक्ति के “दस्तावेज़” श्रृंखला के माध्यम से पुरानी अमूल्य और ऐतिहासिक यादें सहेजने का प्रयास है। श्री जगत सिंह बिष्ट जी (Master Teacher: Happiness & Well-Being, Laughter Yoga Master Trainer, Author, Blogger, Educator, and Speaker) के शब्दों में  “वर्तमान तो किसी न किसी रूप में इंटरनेट पर दर्ज हो रहा है। लेकिन कुछ पहले की बातें, माता पिता, दादा दादी, नाना नानी, उनके जीवनकाल से जुड़ी बातें धीमे धीमे लुप्त और विस्मृत होती जा रही हैं। इनका दस्तावेज़ समय रहते तैयार करने का दायित्व हमारा है। हमारी पीढ़ी यह कर सकती है। फिर किसी को कुछ पता नहीं होगा। सब कुछ भूल जाएंगे।”

दस्तावेज़ में ऐसी ऐतिहासिक दास्तानों को स्थान देने में आप सभी का सहयोग अपेक्षित है। इस शृंखला की अगली कड़ी में प्रस्तुत है श्री जगत सिंह बिष्ट जी का एक ऐतिहासिक दस्तावेज़ भारतीय आयुध निर्माणी का निगमीकरण: एक नए युग की शुरुआत / The Legacy and New Dawn of India’s Ordnance Factories ।) 

☆  दस्तावेज़ # ४४ – भारतीय आयुध निर्माणी का निगमीकरण: एक नए युग की शुरुआत ☆ श्री जगत सिंह बिष्ट ☆ 

(लोगों से बातचीत, AI पर रिसर्च के आधार पर और अपनी पूर्व में संग्रहित जानकारी को मिलजुला कर एक दस्तावेज़)

भारतीय आयुध निर्माणी, जिसका इतिहास 200 वर्षों से भी अधिक पुराना है, देश की सुरक्षा व्यवस्था का एक अहम हिस्सा रही है। कभी अंग्रेजों के शासन में शुरू हुए ये कारखाने बाद में भारत की सबसे बड़ी रक्षा उत्पादन इकाइयाँ बन गईं।

कोलकाता में मुख्यालय रखने वाला ऑर्डिनेंस फैक्ट्री बोर्ड (OFB) 41 फैक्ट्रियों और लगभग 80,000 कर्मचारियों का समूह था, जो हथियारों, गोला-बारूद, और सैनिकों के उपकरण बनाता था।

परंपरा और चुनौतियाँ

200 वर्षों की गौरवशाली परंपरा के बीच, कई समस्याएं सामने आईं। उत्पादन में देरी, गुणवत्ता की शिकायतें, और प्रबंधन का हठधर्मी रवैया – ऑर्डिनेंस फैक्ट्री बोर्ड की कमजोरियां थीं।

सरकारी नियमों की वजह से तेजी से बदलते वैश्विक रक्षा बाजार में तालमेल बिठाने में कठिनाई होती थी। कर्मचारियों की मेहनत के बावजूद, सुधार की जरूरत बढ़ती गई।

निगमीकरण से क्या बदला?

सरकार ने यह निर्णय लिया कि OFB को खत्म करके इसकी फैक्ट्रियों को 7 नए, स्वतंत्र, लेकिन पूरी तरह से सरकारी स्वामित्व वाले, रक्षा सार्वजनिक क्षेत्र उपक्रमों (DPSUs) में बदला जाएगा।

यह निगमीकरण है, ना कि निजीकरण। इसका मतलब है कि ये नई कंपनियां सरकार की ही होंगी, लेकिन प्रबंधन अधिक पेशेवर, कुशल, और बाज़ार उन्मुख होगा।

इन 7 DPSUs के नाम हैं:

  • म्यूनिशंस इंडिया लिमिटेड, बख्तरबंद वाहन निगम लिमिटेड,
  • एडवांस्ड वेपन्स एंड इक्विपमेंट इंडिया लिमिटेड,
  • ट्रूप कम्फर्ट्स लिमिटेड,
  • यंत्र इंडिया लिमिटेड,
  • इंडिया ऑप्टेल लिमिटेड, ग्लाइडर्स इंडिया लिमिटेड।

भ्रांतियों का समाधान

कई बार यह गलतफहमी फैलती रही है कि इन नई कंपनियों का संचालन निजी कॉर्पोरेट्स जैसे अदाणी समूह द्वारा किया जा रहा है, जो सच नहीं है।

सभी DPSUs पूरी तरह से सरकार के नियंत्रण में हैं और उनका संचालन सरकार द्वारा नियुक्त बोर्ड करता है।

कोलकाता में नियुक्त डीजीओएफ का कार्यालय भी अब बंद हो चुका है।

आगे का रास्ता

यह निगमीकरण हमारी रक्षा उत्पादन व्यवस्था को और मजबूत करेगा। उत्पादन में सुधार, गुणवत्ता में सुधार, और नई तकनीकों को अपनाने का अवसर मिलेगा। कर्मचारियों के हितों की रक्षा की गई है और उन्हें आधुनिक औद्योगिक माहौल में नए कौशल सीखने का मौका मिलेगा।

यह बदलाव केवल एक नयी शुरुआत है, जिसमें हमारे आयुध निर्माणी के शौर्य को बनाए रखते हुए, उन्हें भविष्य की चुनौतियों के लिए तैयार किया जा रहा है। हर कर्मचारी की मेहनत, समर्पण, और परंपरा से जुड़ाव, इस परिवर्तन की सफलता की कुंजी है।

🔸

 – जगत सिंह बिष्ट

🍀The Legacy and New Dawn of India’s Ordnance Factories 🍀

India’s ordnance factories stand as a proud symbol of the nation’s defense manufacturing heritage, tracing back over 200 years to the early 1800s.

The journey began under British colonial rule when the first gunpowder factory was established in 1787 at Ishapore near Kolkata, starting production in 1791. The Gun Carriage Agency at Cossipore (now Kolkata), which began production in 1802, remains the oldest ordnance factory still operational today.

These factories have supported India’s armed forces through multiple wars— from the 1947 independence battle to the Kargil conflict in 1999 — serving as the “arsenal of the nation.”

Over two centuries, the Ordnance Factory Board (OFB), headquartered in Kolkata, expanded to include 41 factories that manufactured a wide range of weapons, ammunition, vehicles, and equipment, employing over 80,000 workers.

The factories prided themselves on a glorious legacy of steadfast support to the defense forces, technological contribution to India’s industrial rise, and pioneering roles in setting up research and industrial institutions across the country.

🌱Challenges Behind the Legacy

However, this illustrious history was also marked by deep-rooted challenges. Despite the vast workforce and legacy, productivity remained low; factories were often criticised for delayed deliveries, substandard product quality, and operational inefficiencies.

The OFB operated under rigid government structures that limited autonomy and innovation, making modernization a slow process. Many workers dedicated decades to their craft, yet the system struggled to keep pace with evolving defense demands and global defense manufacturing standards.

🌱The Corporate Reform:

♦️Corporatisation, Not Privatisation

Recognising the urgent need for reform, the Government of India, after extensive deliberation and consultations, initiated a landmark decision in 2021: the dissolution of the Ordnance Factory Board and the corporatisation of its factories into seven new Defence Public Sector Undertakings (DPSUs).

It is important to note that this was a corporatisation and not a privatisation. The new DPSUs remain 100% government-owned and controlled, operating with greater autonomy, professional management, and commercial agility.

The seven DPSUs are:

✅Munitions India Limited

✅Armoured Vehicles Nigam Limited

✅Advanced Weapons and Equipment India Limited

✅Troop Comforts Limited

✅Yantra India Limited

✅India Optel Limited

✅Gliders India Limited

This transition was designed to create entities that are more efficient, accountable, and competitive while preserving the legacy and welfare of the workers.

Salaries, pensions, and employment terms were protected during the transition, easing initial apprehensions among employees.

♦️Dispelling Misconceptions

Despite official clarifications, rumours have persisted that the DPSUs are being handed over to private corporates like Adani for management. This is a false narrative.

The seven DPSUs are fully owned by the government and managed by government-appointed boards. No private company controls or manages these defense units.

The former Directorate General of Ordnance Factories in Kolkata was closed along with the OFB, and the centralized command structure replaced by autonomous DPSUs, each with its own board, but under the Ministry of Defence and Department of Defence Production’s oversight.

🌷The Road Ahead: Vision and Optimism

The corporatisation has already shown positive signs with increased financial discipline, improved productivity, and a rise in exports. Efforts are underway to modernize infrastructure, enhance quality standards, and actively pursue technological collaborations.

The government’s vision is to transform these DPSUs into world-class defense manufacturers, supporting India’s goal of becoming self-reliant in defense production while preserving the industrial heritage and workforce welfare.

For workers and staff, the journey might feel like entering a new era of challenges and opportunities. The hope is that this corporate model will allow their valuable skills and dedication to shine, with better resources, management, and future prospects.

🔸

© जगत सिंह बिष्ट

Laughter Yoga Master Trainer

LifeSkills

A Pathway to Authentic Happiness, Well-Being & A Fulfilling Life! We teach skills to lead a healthy, happy and meaningful life.

The Science of Happiness (Positive Psychology), Meditation, Yoga, Spirituality and Laughter Yoga. We conduct talks, seminars, workshops, retreats and training.

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ७९५ ⇒ परछाई ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “परछाई।)

?अभी अभी # ७९५  ⇒ आलेख – परछाई ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

मुझसे लंबी होती मेरी परछाई! हम बड़े होते हैं, बढ़ते हैं। बढ़ने की एक उम्र होती है। जिसको जितना बढ़ना होता है, बढ़ ही जाता है। किसी की उम्र तो बढ़ती रहती है, लेकिन बढ़ना रुक जाता है। और फलस्वरूप कोई नाटा तो कोई लंबा कहलाता है। बोलचाल की भाषा में इसे कद कहते हैं।

सुबह की धूप को खिलती धूप कहा जाता है, क्योंकि सुबह ताज़गी का पर्याय है! चाहे डाली पर लगा फूल हो, या कोई फूल सा चेहरा, अगर वह सुबह नहीं खिला, तो क्या खिला! यही तो वह समय है, जब क़ुदरत भी मुस्कुराती है।।

खिलना ही विकसित होना है, खिलखिलाना ही पल्लवित होना है। सुबह की खिलती धूप में सैर के लिए टहलते वक्त, अचानक मेरी नज़र अपने साये पर पड़ गई! वह मुझसे दो कदम आगे चल रहा था, और उसका कद मुझसे कई गुना बड़ा था।

मुसीबत में साया भी साथ नहीं देता! लेकिन हर सुबह मेरे लिए ज़िन्दगी की एक नई सुबह होती है। सुबह जब कोई फिक्र साथ नहीं होती, तो साया भी अपने से बड़ा नज़र आता है। वह मुझसे दो कदम आगे ही चलता है।।

दोपहर को जब सूरज सर पर चढ़ता नज़र आता है, साया छोटा होता चला जाता है। उधर सूरज आसमान पर, इधर साया ग़ायब, खुद में पूरी तरह से समाया हुआ। जब मुसीबत सर पर आई, सबसे पहले साये ने साथ छोड़ा।

फिर ज़िन्दगी की शाम भी होती है। वह सूरज जो कभी सर पर था, क्षितिज में शनैः शनैः अस्ताचल की ओर प्रस्थान करने लगता है। अब उसमें वह आग नहीं। साये फिर लंबे होने लगते हैं। गोद में आये बच्चे की तरह साया भी ज़मीन पर उतर, पहले कुछ कदम साथ चलता है, फिर पिछड़ जाता है। अतीत की परछाइयाँ हम से लंबी ज़रूर होती हैं, लेकिन हमसे पिछड़ती जाती हैं। हम आगे और हमारा, हम से लंबा अतीत, हमारा पीछा करते हुए। अतीत का साया हमसे कितना भी लंबा हो, पिछड़ ही जाता है।।

हम जीवन की सुबह में आगे देखते हैं, और जीवन की शाम में पीछे मुड़ -मुड़ कर। जब तक सूरज की रोशनी है, साया कभी हमारे आगे, कभी हमारे अंदर और कभी हमारे पीछे है। बचपन के आगे सुनहरे भविष्य का लंबा साया है। जवानी संघर्ष-काल है! साया आपके कंधे से कंधा मिला रहा है, इसलिए नज़र नहीं आ रहा। शाम ढलते ही आप आगे हैं, आपकी उपलब्धियाँ आपके पीछे। कद में आपसे कई गुना बड़ी।

आप यथार्थ हैं! आपका अपना कद ही आपकी परछाई है। जो समय के साथ घटता-बढ़ता रहता है। चाहें लालबहादुर शास्त्री हो, या सुनील गावस्कर, इनका कद छोटा होते हुए भी, इनकी ऊँचाई से कई गुना ऊँचा है। इनकी उपलब्धियां, इनके गुण ही इनकी वास्तविक ऊँचाई है। बिग भी का तो कद भी ऊँचा है, लेकिन उसने भी कई बार अपने साये को घटते-बढ़ते देखा है। कोई व्यक्ति केवल कद से ही महान नहीं होता। कर्म ही उसे महान बनाते हैं।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य #२९४ ☆ पाश्चात्य संस्कृति का भारतीय संस्कृति पर प्रभाव… ☆ डॉ. मुक्ता ☆

डॉ. मुक्ता

(डा. मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य” के माध्यम से  हम  आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी की मानवीय जीवन पर आधारित एक विचारणीय आलेख पाश्चात्य संस्कृति का भारतीय संस्कृति पर प्रभाव। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की  लेखनी को  इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें।) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य  # २९४ ☆

☆ पाश्चात्य संस्कृति का भारतीय संस्कृति पर प्रभाव… ☆

‘संस्कृति/ जो सुसंस्कृत करती है हमें/ धरोहर हमारे देश की/ जिसके सम्मुख नतमस्तक विश्व/   ज्ञानोदय रूपी सूर्योदय हुआ/ सबसे पहले यहां/ ज्ञान रुपी रश्मियाँ/ फैली इसके प्रांगण में/ अपनाया दूसरे देशों ने/ हमारी संस्कृति को/ पहुंचे उन्नति के शिखर पर वे।’ 2007 में प्रकाशित काव्य-संग्रह अस्मिता की उपरोक्त  पंक्तियां भारतीय संस्कृति के स्वरूप, महत्ता व उज्ज्वल रूप को दर्शाती हैं। संस्कृति हमेशा सुसंस्कारों से सिंचित करती है और ज्ञान रूपी सूर्योदय भी सबसे पहले भारत में होता है। ऋतु-परिवर्तन, तीज-त्योहार, अतिथि-सत्कार आदि हमारी संस्कृति की विशेषताएं हैं। ‘अरुण यह मधुमय देश हमारा/ जहां पहुंच अनजान क्षितिज को/ मिलता एक सहारा।’ हमारा देश महान् है। यहां का आतिथ्य, पारस्परिक स्नेह, सौहार्द व त्याग क़ाबिले-तारीफ़ है। हम अजनबी लोगों को अपना बनाने में पारंगत है। अहिंसा परमोधर्म, मूक जीवों के प्रति करुणा भाव, हमारी संस्कृति के मुख्य आकर्षण हैं। हम सभी धर्मों में आस्था रखते हैं। जाति-पाति भेदभाव से हम बहुत ऊपर हैं। हम में प्रेम व समर्पण की भावना कूट-कूट कर भरी हुई है।

रामचरितमानस में राम, लक्ष्मण, सीता, उर्मिला, भरत, शत्रुघ्न आदि सभी पात्रों का त्याग स्तुत्य है। दधीचि का अपनी हड्डियों का दान देना श्लाघनीय है। हम किसी प्राणी को आपदा में देखकर उसके रक्षार्थ प्राणोत्सर्ग को सदैव तत्पर रहते हैं। क्षमा भाव हमारे अंतर्मन में कूट-कूट कर भरा है। जैन धर्म में क्षमापर्व इसका उल्लेखनीय उदाहरण है। कुरुक्षेत्र में कृष्ण द्वारा अर्जुन को युद्ध के मैदान में दिए दिया गया निष्काम कर्म का संदेश आज भी अनुकरणीय है। इसमें माया-मोह के बंधनों से ऊपर उठने का मार्ग दर्शाया गया है।

‘ब्रह्म सत्यम्, जगत मिथ्या’ का भाव सर्वोपरि है अर्थात् ब्रह्म के अतिरिक्त संसार में सब मिथ्या है। परंतु वह माया के कारण सत्य भासता है। ‘यह किराए का मकान है/ कौन कब तक ठहर पाएगा/ खाली हाथ तू आया है बंदे! खाली हाथ तू जाएगा’ और ‘यह दुनिया है/ दो दिन का मेला/ हर शख्स यहां है अकेला/ तन्हाई में जीना सीख ले/ तू दिव्य खुशी पा जाएगा।’ और ‘एकला चलो रे’ का संदेश जनमानस में समाया हुआ है।

भगवत् गीता को मैनेजमेंट गुरु के रूप में विभिन्न देशों में पढ़ाया जाना उसकी उपयोगिता व उपादेयता को सिद्ध करता है। इसलिए भारत विश्व गुरु कहलाता था। परंतु धीरे-धीरे हम अपनी संस्कृति से दूर होते चले गए, जिसके परिणाम-स्वरुप जीवन-मूल्यों का निरंतर पतन होता गया। रिश्तों में सेंध लग गई तथा अविश्वास के कारण गया रिश्तो में खटास उत्पन्न हो गई। दिलों में घृणा का भाव पसरने लगा। सब अपने-अपने द्वीप में कैद होकर रह गए। संबंध- सरोकार समाप्त हो गए। अपने, अपने बन अपनों पर घात लगाने लगे। दूसरे शब्दों में पीठ में छुरा घोंपने लगे और असहिष्णुता बढ़ती गई हम आत्मकेंद्रित होते गए तथा स्व-पर व राग- द्वेष ने दिलों में आशियाँ बना लिया। चारवॉक दर्शन के ‘खाओ-पीओ और मौज उड़ाओ’ का प्रभाव हम पर हावी हो गया। मर्यादा न जाने किस कोने में मुंह छुपा कर बैठ गई। हम सब सीमाओं को लाँघकर स्वयं को सर्वश्रेष्ठ समझने लगे। मैं, मैं और सिर्फ़ मैं का बोलबाला हो गया। पैसा प्रधान हुआ और अहंनिष्ठ इंसान स्वयं को सर्वश्रेष्ठ समझने लगा। बड़े बुज़ुर्ग, माता-पिता व गुरुजन हाशिये पर चले गए। ‘जब अपने आँखें दिखाने लगे/ पल-पल वे बेवजह डराने लगें/ तो समझो कलयुग आ गया है।’

सो! शराब, सिगरेट व रेव पार्टियों का प्रचलन बढ़ गया। संबंध हैलो-हाय तक सिमट कर रह गए व महिलाएं महफ़िलों की शोभा बनने लगी। शराब व सिगरेट पीकर सड़कों पर हंगामा करना सामान्य बात हो गई। जींस कल्चर व शरीर पर घटते वस्त्रों का प्रचलन बढ़ गया। इतना ही नहीं, वे ‘तू नहीं और सही’ की ओर आकर्षित हुए, जिसके कारण अलगाव व तलाक़ आदि के हादसों में वृद्धि हो गई। आजकल हर तीसरी लड़की सिंगल रहती है, क्योंकि लिव-इन व मीटू का प्रचलन बेतहाशा बढ़ गया। लड़के-लड़कियां ‘को-लिव’ में एक छत के नीचे रहने लगे और ड्रग्स का सेवन कर होशो-हवास खोने के भयंकर परिणाम सबके समक्ष हैं। हिंदू लड़कियां इन हादसों का शिकार अधिक हो रही हैं। थोड़े दिन के पश्चात् पार्टनर द्वारा विवाह से इन्कार कर देने पर वे सकते में आ जाती हैं। फलत: वे उनके टुकड़े-टुकड़े कर इत-उत फेंक देते है, जिसे देखकर ह्रदय आक्रोश से भर जाता है और एक लंबे अंतराल तक हम स्वयं को इस दु:ख से मुक्त नहीं कर पाते।

सुप्रीम कोर्ट द्वारा लिव-इन व मीटू को मान्यता देना हृदय को विचलित करता है। परंतु अब लिव-इन के लिए माता-पिता की अनुमति होने को आवश्यक स्वीकारा गया है। यदि हम वृद्धों की दशा पर दृषटिपात करें तो बुज़ुर्गों की सम्पत्ति हथियाने के पश्चात् उन्हें बेघर कर वृद्धाश्रम में छोड़ देना हृदय को कोंचता व कचोटता है, शर्मसार करता है। वहीं उनका अपने घर में तिल-तिल कर मर जाना समाज को आईना दिखाता है– यह सब देखकर कलेजा मुँह को आता है। पैसे के लिए सभी रिश्तों को नकार कर कत्ल कर देना सोचने को विवश करता है–’कैसे हैं यह रिश्ते।’ आजकल स्नेह, प्रेम सौहार्द जाने कहां लुप्त हो गए और संवेदनाएं मर गई हैं। पूरे समाज में अजनबीपन का एहसास परिलक्षित है और हम पाश्चात्य की जूठन का अमृत-सम सहर्ष आचमन कर रहे हैं।

दूसरी ओर विदेशों में लोग हमारी संस्कृति को अपना रहे हैं। वे योग, ध्यान की ओर आकर्षित हो रहे हैं। हमारे वेदों के महत्व को वे स्वीकारने लगे हैं। दया, करुणा, ममता व संबंधों की स्वीकार्यता का भाव पनप रहा है तथा हिन्दू धर्म में उनकी श्रद्धा व आस्था दिन-प्रतिदिन बढ़ रही है। परंतु दीये तले सदैव अंधेरा रहता है। हम अपनी संस्कृति को भूलते जा रहे हैं और हमारा  जो भी शोध विदेशों के माध्यम से हमारे देश में आता है, हम उसे सत्य स्वीकारते हैं; उसका गुणगान करते हैं।

महाकुंभ सिर्फ़ तीन नदियों का ही संगम नहीं है, त्रिदेव भी वहां उपस्थित हैं। विभिन्न अखाड़ों,  नागा साधुओं के साथ विभिन्न धर्म, राज्यों व देश-विदेश के लोगों का वहां आस्था की डुबकी लगाना– हमें सोचने व स्वीकारने पर विवश कर देता है कि मेरा देश व संस्कृति महान् है, अनुकरणीय है, सर्वश्रेष्ठ है, सर्वोत्तम है। संस्कृति देश के धर्म, वेशभूषा, प्रभु में आस्था, तीज त्यौहार, रीति-रिवाज़ व मन के उल्लास-उमंग को दर्शाती है। विभिन्न देशों से लोगों का साइकिल पर विश्व भ्रमण करते हुए भारत में आकर हिंदुत्व को स्वीकारना और सदा के लिए यहाँ बस जाना– जहां हमारे देश व संस्कृति के महान् होने का परिचायक है, वहीं हमारे लिए गर्व, गौरव व उल्लास का विषय है।

संपूर्ण विश्व में भारत ही केवल हिंदू राष्ट्र है, जहां विभिन्न धर्म, जाति, मज़हबों के लोग प्रेम से रहते हैं। हमारे वेद, पुराण, शास्त्र आदि इसका साक्ष्य हैं। हम हज़ारों वर्ष तक गुलाम रहे और विशाल भारत से कटकर अनेक देशों का प्रादुर्भाव हुआ। इसका कारण हमारी हमारी स्वार्थपरता व मानसिक दासता रही है, जिसके कारण हम आत्मकेंद्रित होते गए और देशहित में हमने कभी नहीं सोचा। इसका अंजाम हमारे कश्मीरी भाई 1990 से आज तक भुगत रहे हैं। धारा 370 और 35 ए हटने के 35 वर्ष पश्चात् भी वे अपने राज्य में लौटने का साहस नहीं जुटा पाए और  आज भी शरणार्थियों तक जीवन जी रहे हैं। उनकी वेदना, पीड़ा व संत्रास का आकलन वर्तमान सरकार ने किया। परंतु वे उन्हें उनके  अधिकार अभी तक भी नहीं दिलवा पाए। धर्म परिवर्तन भी कोढ़ की भांति हमारे देश में खोखला कर रहा है, जिसके कारण भारत देश में अनेक देश पनप रहे हैं। राजनीतिज्ञ वोटों की राजनीति में विश्वास रखते हैं और सत्ता पाने के निमित्त अपने देश की स्वतंत्रता को दाँव पर लगाने में लेशमात्र तक भी संकोच नहीं करते, जो देश के लिए अत्यंत लज्जास्पद व हानिकारक है।

काश! हम अपनी संस्कृति के उदार दृष्टिकोण को स्वीकार पाते। भारत माता की रक्षा हेतू प्राणोत्सर्ग करने को सदैव तत्पर रहते तथा अपने अंतर्मन में त्याग करुणा, क्षमा आदि देवीय  गुणों को विकसित करते। पाश्चात्य संस्कृति को हम अपने हलक़ से न उतरने देते तथा अपनी जड़ों से जुड़े रहते। माता-पिता, गुरुजन व बड़े-बुज़ुर्गों का मान-सम्मान करते और वसुधैव कुटुंबकम् में विश्वास करते। अपने देश की बेटियों की अस्मिता पर कभी आंच न आने देते तथा अपना सर्वस्व लुटाने का जुनून मन में पनपने देते। देश के रणबांकुरों के परिवारों की हर संभव सहायता करते, क्योंकि उन शहीदों की शहादत के कारण ही हमारा देश आज सुरक्षित है और हम सुक़ून की साँस ले पा रहे हैं। उनके परिवार का एक व्यक्ति शहीद नहीं होता बल्कि पूरे परिवार पर घने काले आपदाओं के बादल मंडराने लगते हैं और वे आजीवन उस भयंकर त्रासदी से उबर नहीं पाते। यदि हमारा देश सुरक्षित होगा तभी हम अमनो-चैन से जी पाएंगे। हमारा विकास भी तभी संभव होगा, जब हम स्वदेशी को हृदय से अपनाएंगे तथा राष्ट्र-हित में अपने प्राणों की बलि देने को तत्पर रहेंगे। जीवन-मूल्यों को धारण करेंगे तथा उनका अवमूल्यन नहीं होने देंगे। भावी पीढ़ी में सुसंस्कारों का सिंचन करेंगे। उन्हें वेबसाइट, मीडिया व मोबाइल के चक्रव्यूह में नहीं फंसने देंगे ताकि संपूर्ण मानव के रूप में उनका सर्वांगीण विकास हो सके और हमारा देश सुरक्षित हाथों में रहे।

वैसे संसार में जहां भी जो भी अच्छा मिले, उसे मानव को अपना लेना चाहिए। जो ग्रहणीय नहीं है, उसका त्याग कर दीजिए और किसी को न बुरा कहिए, न ही कीजिए। कबीर जी के शब्दों में ‘बुरा जो देखन मैं चला, मोसे बुरा न कोय‘ द्वारा आत्मचिंतन व आत्मावलोकन करने का संदेश प्रेषित है। दैवीय गुणों को जीवन में धारण कीजिए, क्योंकि जो तुम्हारे भाग्य में है, वह तुम्हें अवश्य मिलेगा और जो आप देते हो, वह लौटकर नहीं अवश्य तुम्हारे पास आता है। इसलिए जो आपको मिला है, उसका संग्रह मत कीजिए; बांटने का सुख प्राप्त कीजिए, क्योंकि जो आप देते हैं, वह लौट कर आपके पास अवश्य आता है। क्योंकि ‘धन दौलत, पद-प्रतिष्ठा तेरे साथ कुछ भी नहीं जाएगा/ इस धरा का सब यही धरा पर रह जाएगा’– यही है हमारी भारतीय संस्कृति का अवदान जो हमें पाश्चात्य संस्कृति से श्रेष्ठ बनाती है। हमें दूसरों की अच्छी बातों को अहमियत देना है और बेवजह उनकी आलोचना करना कारग़र नहीं है। हमें नीर-क्षीर विवेकी होते हुए हंस की भांति मोतियों को चुनना है।

तुरंत प्रतिक्रिया देना भी उचित नहीं है। अक्सर यह हमें विचित्र व अशोभनीय स्थिति में डाल देता है, जिनके लिए हमें पछताना पड़ता है। सो! सोच-समझ कर निर्णय लेना चाहिए। आइए! हम सत्यम्, शिवम्, सुंदरम की राह पर चलते हुए शिव की भांति परहित में हलाहल का आचमन करने को सदैव तत्पर रहे। यही मानव जीवन की सार्थकता है, जो हमें विभिन्न देशों की संस्कृति से उत्तम व श्रेष्ठ सिद्ध करती है।

●●●●

© डा. मुक्ता

माननीय राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत, पूर्व निदेशक, हरियाणा साहित्य अकादमी

संपर्क – #239,सेक्टर-45, गुरुग्राम-122003 ईमेल: drmukta51@gmail.com, मो• न•…8588801878

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ७९४ ⇒ काग के भाग ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “काग के भाग।)

?अभी अभी # ७९४ ⇒ आलेख – काग के भाग ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

अभी काग के भाव बढ़े हुए हैं! पीतल भले ही कभी सोने के भाव न बिके, पितृ-पक्ष में कोयल पीतल है, और कौआ सोना। भक्त और विभक्त में अंतर देखिये! यूँ तो कहने को दोनों ही कवि हैं। लेकिन एक कितना सकारात्मक और एक कितना नकारात्मक।

एक भक्त कवि रसखान हुए हैं, जो कहते हैं –

काग के भाग बड़े सजनी,

हरि हाथ सौं ले गयो माखन रोटी!

और अब एक कलयुगी कवि को देखिये –

कौआ कोयल दोनों काले

पर दोनों के काम निराले।

कांव कांव कौआ करता है

गंदी जगह पेट भरता है

कोयल कू कू बहुत सुहाती

डाल डाल पर वह है गाती।।

सौ दिन कोयल के! लेकिन एक दिन काग का भी होता है, जब हमें डाल पर कोयल की नहीं, काग की तलाश होती है। रसखान की भी उस काग में वही श्रद्धा है, जो हमारी श्राद्ध पक्ष में कौए के लिए होती है। एक का काग हरि के हाथ की रोटी ले जाता है, और दूसरे का काग खीर पूड़ी पर हाथ साफ करता है।

श्रद्धा और भक्ति दोनों में तर्क नहीं चलता! इनके अलावा एक अंध-विश्वास भी होता है ;

भोर होते कागा पुकारे काहे राम!

कौन परदेसी आएगा मोरे धाम।

और देखिये ;

मोरी अटरिया पे कागा बोले

मोरा जीया डोले

कोई आ रहा है।

उधर डाल पर कोई कौआ बोला, इधर किसी मेहमान के आने का अंदेशा हुआ। यानी जब डाकिया और एसएमएस नहीं था, तब कबूतर संदेश ले जाते थे, और कौआ मैसेज पढ़कर सुनाता था।

काँव काँव! Somebody is coming at your place.

लो जी रसखान और हमने तो काग को गुणों की खान साबित कर दिया। अब एक दो अवगुण तो सबमें होते ही हैं जी। फिर भी जब देखो तब कोयल का गुणगान। आप अगर काक-भुशुण्डि की कथा और पढ़ लें, तो रसखान से पूरी तरह सहमत होंगे कि वाकई काग के बड़े भाग हैं।

जब शंकर जी पार्वती जी को राम कथा सुनाते हैं, तो एक काग महाराज वह कथा सुन लेते हैं, और उनका ही जन्म काक-भुशुण्डि के नाम से होता है। अब सुबह -सुबह पूरा शिव-पुराण तो नहीं बाँचा जाता न! आपके भी बड़े भाग, जो आज काग-महात्म्य आपके कानों तक पड़ा।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # २५९ ☆ आस्था और पर्यावरणीय चेतना का प्रतीक: नवरात्रि पर्व… ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ ☆

श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की  प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं  में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना आस्था और पर्यावरणीय चेतना का प्रतीक: नवरात्रि पर्व। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  – आलेख  # २५९ ☆ आस्था और पर्यावरणीय चेतना का प्रतीक: नवरात्रि पर्व…

*

मातु स्वरूप लगे मनभावन, ज्योति जले जग ज्योतित जंगम।

सिंह विराजत आप कृपामय, दिव्य सुहावन आगम संगम।।

रूप अलौकिक पावन मंगल, फैल रही मन मोह तरंगम।

भक्त खड़े दरबार निहारत, अष्टभुजा वरदान विहंगम।।

(किरीट सवैया)

*

मैया का अष्टभुजा स्वरूप, लाल चुनरिया, सिंह सवारी मनमोहक लगता है। हर त्योहार की तरह इसमें भी पर्यावरण की रक्षा का संदेश जौ बोने और उसे 9 दिनों तक उगते हुए देखना।

जौ को प्रथम अन्न मानते हैं, इसे मिट्टी के बर्तन में नवरात्रि के दिन मैया का स्वरूप मानकर बोया जाता है। दो- तीन दिनों में इसमें अंकुरण होता है और हरे रंग की पत्तियों के शुभ दर्शन होते हैं।

*

पूरी तरह हरा- सुख समृद्धि

आधा हरा आधा पीला- मिलाजुला असर

ऊँचाई तक स्वस्थ्य पौध- विजय/ जीत का प्रतीक है।

*

मंदिर में पुजारी जी और घरों में बड़े बुजुर्ग इसे विधि विधान के साथ बोते हैं। नवमीं के दिन कलश विसर्जन के बाद इन जवारों को भक्त अपने शुभ स्थानों में रखते हैं। इसे सुख शांति, वैभव का प्रतीक माना जाता है।

आस्थावान बनने के साथ ही पर्यावरण के हितैषी भी बनें, श्रद्धा और विश्वास के साथ जो भी कार्य होगा वो फलदायक होता है।

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©  श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

माँ नर्मदे नगर, म.न. -12, फेज- 1, बिलहरी, जबलपुर ( म. प्र.) 482020

मो. 7024285788, chhayasaxena2508@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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