हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य #276 ☆ शक़, प्यार और विश्वास ☆ डॉ. मुक्ता ☆

डॉ. मुक्ता

(डा. मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य” के माध्यम से  हम  आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी की मानवीय जीवन पर आधारित एक विचारणीय आलेख शक़, प्यार और विश्वास। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की  लेखनी को  इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें।) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य  # 276 ☆

☆ शक़, प्यार और विश्वास ☆

मन के दरवाज़े से जब शक़ प्रवेश करता है; प्यार व विश्वास निकल जाते हैं, यह अकाट्य सत्य है। शक़ दोस्ती का दुश्मन है और उसके जीवन में दस्तक देते ही तहलक़ा मच जाता है; शांति व सुक़ून नष्ट हो जाता है। पारस्परिक स्नेह व सौहार्द दूसरे दरवाज़े से रफूचक्कर हो जाते हैं और उनके स्थान पर काम, क्रोध व ईर्ष्या-द्वेष अपनी सल्तनत क़ायम कर लेते हैं। दूसरे शब्दों में विश्वास वहां से कोसों दूर चला जाता है। जीवन में जब विश्वास नहीं रह जाता, तो वहां पर शून्यता पसर जाती है; शत्रुता का भाव काबिज़ हो जाता है और मानव ग़लत राहों पर अग्रसर हो जाता है। आजकल रिश्तों में अविश्वास की भावना हावी है, जिसके कारण अजनबीपन का एहसास सुरसा के मुख की भांति पांव पसार रहा है और संबंधों को दीमक की भांति चाट रही है। संदेह, संशय व शक़ ऐसा ज़हर है, जो स्नेह व विश्वास को लील जाता है। वह दिलों में ऐसी दरारें उत्पन्न कर देता है, जिन्हें पाटना असंभव हो जाता है और जब तक मानव इस सत्य से अवगत होता है; बहुत देर हो चुकी होती है। वह प्रायश्चित करना चाहता है, परंतु ‘अब पछताए होत क्या जब चिड़िया चुग गई खेत’ अर्थात् उसे खाली हाथ लौटना पड़ता है।

रिश्तों की माला जब टूटती है, तो जोड़ने से छोटी हो जाती है, क्योंकि कुछ जज़्बात के मोती बिखर जाते हैं। ‘रहिमन धागा प्रेम का, मत तोड़ो चटकाय/ टूटे ते पुनि न जुरे, जुरे ते गांठ परि जाय’ क्योंकि एक बार संशय रूपी गांठ मन में पड़ने से स्नेह, प्रेम व विश्वास दिलों से नदारद हो जाता है। इसलिए कहा जाता है कि रिश्तों का क्षेत्रफल कितना अजीब है/ लोग लंबाई-चौड़ाई तो नापते हैं/ गहराई कोई नहीं आंकता। आजकल के रिश्ते मात्र दिखावे के होते हैं, जो ज़रा की ठोकर लगते टूट जाते हैं, भुने हुए पापड़ की मानिंद और कांच के विभिन्न टुकड़ों में बिखर जाते हैं। वैसे भी आजकल रिश्तों की अहमियत रही ही नहीं; यहां तक कि खून के रिश्ते भी बेमानी भासते हैं। सो! इस स्थिति में मानव किस पर विश्वास करे?

छोटी सोच शंका को जन्म देती है और बड़ी सोच समाधान को। सुनना सीख लो, सहना आ जाएगा। सहना सीख लिया, तो रहना सीख जाओगे। इसलिए मानव का हृदय विशाल व सोच सकारात्मक होनी चाहिए, क्योंकि नकारात्मकता मानव को अवसाद के व्यूह में लाकर खड़ा कर देती है। मानव को दूसरों की अपेक्षा ख़ुद से उम्मीद रखनी चाहिए, क्योंकि दूसरों से उम्मीद रखना चोट पहुंचाता है और ख़ुद से उम्मीद रखना जीवन को प्रेरित करता है; निश्चित मुक़ाम पर पहुंचाता है। वैसे संसार में सबसे मुश्किल काम है आत्मावलोकन करना अर्थात् स्वयं को खोजना, क्योंकि आजकल मानव के पास समयाभाव है। सो! ख़ुद से मुलाकात कैसे संभव है? इससे भी बढ़कर कठिन है– अपनों में अपनों को तलाशना, क्योंकि चहुंओर अविश्वास का वातावरण व्याप्त है। हमारे अपने क़रीबी व राज़दार ही सबसे अधिक दुश्मनी निभाते हैं। इन असामान्य परिस्थितियों में मानव तनाव-ग्रस्त होकर सोचने लगता है ‘वक्त भी कैसी पहेली दे गया/ उलझनें हज़ार और ज़िंदगी अकेली दे गया।’ जीवन में इच्छाओं के मकड़जाल में फंसा इंसान लाख चाहने पर भी उनके शिकंजे से बाहर नहीं आ सकता। वक्त व ख़्वाहिशें हाथ में बंधी घड़ी की तरह होती हैं, जिसे हम विषम परिस्थितियों में उतार कर भी रख दें, तो भी चलती रहती है। इसलिए कहा जाता है कि ज़रूरतों को पूरा करना मुश्किल नहीं; परंतु आकांक्षाओं को पूरा करना असंभव है और नामुमक़िन है/ कुछ ख़्वाहिशों को ख़ामोशी से पालना अर्थात्  हमें इनके पीछे नहीं भागना चाहिए, क्योंकि यह तो मायाजाल है, जिसमें मानव फंस कर रह जाता है।

जीवन एक यात्रा है/ रो-रोकर जीने से लम्बी लगेगी/ और हंसकर जीने से कब पूरी हो जाएगी/ पता भी न चलेगा। सो! मानव को सदैव प्रसन्न रहना चाहिए तथा किसी से कोई अपेक्षा नहीं रखनी चाहिए, क्योंकि अपेक्षा व उपेक्षा दोनों मानव के लिए हानिकारक हैं। वे मानव को उस कग़ार पर लाकर खड़ा कर देती हैं, जहां वह स्वयं को असहाय अनुभव करता है। किसी से उम्मीद रखना और उसकी पूर्ति न होना; उपेक्षा का कारण बनता है। यह दोनों स्थितियां भयावह हैं। ‘उम्र भर ग़ालिब यह भूल करता रहा/ धूल चेहरे पर थी/ और आईना साफ करता रहा।’ मानव जीवन में यही ग़लती करता है कि वह सत्य का सामना नहीं करता और माया के आवरण में उलझ कर रह जाता है। इसलिए कहा जाता है कि अंदाज़ में न नापिए/ किसी की हस्ती/ ठहरे हुए दरिया/ अक्सर गहरे हुआ करते हैं। परंतु मानव दूसरों को पहचानने की ग़लती करता है और चापलूस लोगों के घेरे से बाहर नहीं आ सकता। दूसरों को खुश करने के लिए मानव को तनाव, चिन्ता व अवसाद से गुज़रना पड़ता है। खुश होना है/ तो तारीफ़ सुनिए/ बेहतर होना है तो निंदा/ क्योंकि लोग आप से नहीं/ आपकी स्थिति से हाथ मिलाते हैं। यह जीवन का कड़वा सच है। पद-प्रतिष्ठा तो रिवाल्विंग चेयर की भांति हैं, जिसके घूमते ही लोग नज़रें फेर लेते हैं।

वास्तव में सम्मान व्यक्ति का नहीं, उसके पद, स्थिति व रुतबे का होता है। सो! सम्मान उन शब्दों में नहीं, जो आपके सामने कहे गए, बल्कि उन शब्दों का होति है, जो आपकी अनुपस्थिति में कहे जाते हैं। इसलिए कहा जाता है कि व्यक्ति की सोच व व्यवहार उसके जाने से पहले पहुंच जाते हैं। सत्य को हमेशा तीन चरणों से गुज़रना पड़ता है– उपहार, विरोध व अंतत: स्वीकृति। सत्य को सबसे पहले उपहास का पात्र बनना पड़ता है; फिर विरोध सहना पड़ता है और अंत में उसे मान्यता प्राप्त होती है। परंतु सत्य तो सात परदों के पीछे से भी प्रकट हो जाता है। इसलिए कहा जाता है कि सत्य ही शिव है; शिव ही सुंदर है। जीवन में सत्य की राह पर चलना ही श्रेयस्कर है, क्योंकि उसका परिणाम सदैव कल्याणकारी होता है और वह सबको अपनी ओर आकर्षित करता है। व्यवहार ज्ञान से बड़ा होता है और हम अपने विनम्र व्यवहार द्वारा परिस्थितियों पर विजय प्राप्त कर सकते हैं। ज्ञान से शब्द समझ में आते हैं और अनुभव से विचार। सो! विचार ऐसे रखो कि किसी को तुम्हारे विचारों पर भी विचार करना पड़े अर्थात् सार्थक विचार और सार्थक कार्य-व्यवहार को जीवन में धरोहर-सम संजोकर रखें। जीवन में हमेशा कर्मशील रहें; थककर निराशा का दामन मत थामें, क्योंकि सफल व्यक्ति कुर्सी पर भी विश्राम नहीं करते। उन्हें काम करने में आनंद आता है। वे सपनों के संग सोते हैं और प्रतिबद्धता के साथ जाग जाते हैं। वे लक्ष्य के प्रति समर्पित होते हैं और वही उनके जीने का अंदाज़ होता है। यही सोच थी कलाम जी की–आत्मविश्वास रखो। कबीरदास जी के मतानुसार ‘आंखिन देखी पर विश्वास करें; कानों सुनी पर नहीं’, क्योंकि लोग किसी को खुश नहीं देख सकते। उन्हें तो दूसरों के जीवन में आग लगाकर आनंदानुभूति होती है। इसलिए वे ऊल-ज़लूल बातें कर उनका विश्वास जीत लेते हैं। उस स्थिति में उनके परिवार की खुशियों को ग्रहण लग जाता है। स्नेह व प्रेम भाव उस आशियाने से मुख मोड़ लेते हैं और विश्वास भी सदा के लिए वहां से नदारद हो जाता है। उस घर में मरघट-सा सन्नाटा पसर जाता है। घर परिवार टूट जाते हैं। संदेह व संशय के जीवन में दस्तक देते ही खुशियां अलविदा कह बहुत दूर चली जाती हैं। सो! एक-दूसरे के प्रति विश्वास भाव होना आवश्यक है, ताकि जीवन में समन्वय व सामंजस्य बना रहे। वैसे भी मानव को सब कुछ लुट जाने के पश्चात् ही होश जाता है। जब उसे किसी वस्तु का अभाव खलता है, तो ज़िंदगी की अहमियत नज़र आती है। इसलिए शीघ्रता से कोई निर्णय न लें, क्योंकि जो दिखाई देता है, सदा सत्य नहीं होता। मुश्किलें कितनी भी बड़ी क्यों न हों, हौसलों से छोटी रहती हैं। इसलिए संकट की घड़ी में अपना आपा मत खोएं; सुक़ून बना रहेगा और जीवन सुचारु रुप से चलता रहेगा।

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© डा. मुक्ता

माननीय राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत, पूर्व निदेशक, हरियाणा साहित्य अकादमी

संपर्क – #239,सेक्टर-45, गुरुग्राम-122003 ईमेल: drmukta51@gmail.com, मो• न•…8588801878

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈+

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # 682 ⇒ व्यंग्य – लड़की आँख मारे ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए साप्ताहिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “लड़की आँख मारे…“।)

?अभी अभी # 682 ⇒ लड़की आँख मारे ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

मुझे मरने मारने की बातें पसंद नहीं ! इनसे मुझे हिंसा और अपराध की बू आती है। वैसे आँख मारना भले ही हिंसा की श्रेणी में न आता हो, लेकिन आँख मारना एक अशालीन हरकत है और यह एक छेड़छाड़ का मामला होकर दंडनीय अपराध है।

यह सच है कि आँख मारने से एक मक्खी भी नहीं मरती ! लेकिन हमारा सभ्य समाज इसे मक्खी मारने से भी अधिक घृणित कार्य मानता है। आँख मारना, यह मनचलों, आवारा, छिछोरे छोरों का जन्मसिद्ध अधिकार है। संसद तो इसे एक असंसदीय आचरण भी घोषित कर चुकी है।।

कल एक विवाह समारोह में आयोजित महिला संगीत में जब एक छोटी सी बालिका ने, वो लड़की आँख मारे वाले गाने पर डांस प्रस्तुत किया तो सबकी आँखें खुली की खुली रह गई। मैं ऐसे वक्त डीजे के शोर से कानों को बचाता हुआ, चोरी से झपकी भी ले लिया करता हूँ। लेकिन इस गीत ने मेरी भी आँखें खोल दीं। बार बार कानों में जब आँख, आँख, आँख, आँख जैसा कर्कश शब्द पड़ने लगे तो कान भी सब कुछ सुनने के साथ देखने को भी मज़बूर हो जाते हैं।

लड़की आँख मारे और सीटी बजाए ! अब बोलिये, कौन से अपराध की कौन सी धारा लगाएंगे भद्र जन ;

वे क़त्ल भी करते हैं तो चर्चा नहीं होता। हम उफ़ भी करते हैं, तो हो जाते हैं बदनाम।

कहाँ गई वो कमसिन अदाएँ जिस पर हर शायर का कुर्बान होने को दिल करता था।।

मुक्त और उन्मुक्त में थोड़ा ही फ़र्क होता है। फिल्मी गाने जिस रफ़्तार से उन्मुक्त होते जा रहे हैं, हमारा सभ्य समाज भी अपने आपको उस शैली में ढाल रहा है। आज की पीढ़ी अपने कैरियर और पढ़ाई के तनाव को हल्के फुल्के मनोरंजन से ही दूर कर सकती है।

शादी विवाह एक ऐसा मौका होता है जहाँ अपनों के बीच इंसान अपने को अधिक तनावमुक्त महसूस करता है। महिला संगीत में फिल्मी गानों पर ही सही, डांस की हफ्तों प्रैक्टिस की जाती है। टीवी पर प्रसारित म्यूजिक और डांस के प्रोग्राम और फिल्में ही इनका आदर्श होती हैं।।

मन में मलिनता न हो, नज़र में खोट न हो, तो दुनिया में कहीं गंदगी नज़र न आए। शादियों में हँसी मज़ाक, गीत सङ्गीत जीवन में उत्साह और उमंग पैदा करता है। सभी अपने हैं, कैसी वर्जना, कैसी मर्यादा। कोई बुरा नहीं मानता, जब लड़की आँख मारे।।

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ ~ लखनऊ के बड़ा मंगल हनुमान जी की आराधना का विशेष पर्व ~ ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆

श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’

☆ आलेख ☆

☆ ~ लखनऊ के बड़ा मंगल हनुमान जी की आराधना का विशेष पर्व ~ ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆ 

मुझे ऐसा उत्सव पूरे हिंदुस्तान में कहीं नहीं दिखाई नहीं देता। श्री हनुमान जी आम जनमानस के सबसे लोकप्रिय एवं अटूट विश्वास के देवता है। यह बात सनातन संस्कृति से संबंध रखने वाले लगभग प्रत्येक भारतीय को भलीभांति ज्ञात है।

हिन्दू ही नहीं बल्कि अन्य धर्म -संप्रदाय के लोगों के मुंह से भी मैंने श्री हनुमान जी के विषय में जानते – कहते सुना है। अक्सर लोगों के द्वारा मैंने कहते सुना है कि भारत के हिन्दू समाज को वेद -वेदांत अन्य धर्म ग्रंथ का बहुत कुछ याद रहे या न रहे, श्री हनुमान चालीसा तो हर किसी को याद रहता ही रहता है।

व्यक्ति पूरा हनुमान चालीसा न पढ पावे तो भी कुछ पंक्तियां उन्हें याद रहती ही रहती हैं।

संकट काल में हनुमान जी को याद करके बड़े से बड़े विघ्न को स्वत: समाप्त कर लेने की क्षमता भारतीय जनमानस में रची -बसी है। हनुमान जी के विषय में कहा जाता है कि वह अतुलित बल के धाम और विद्या और ज्ञान के सागर हैं। लेकिन उन्हें उनकी विद्या को याद दिलाने की आवश्यकता साथ सदैव रही है। जैसा कि जामवंत जी ने हनुमान जी को उनकी बुद्धि और उनके बल को जब याद दिलाया तो वे विशाल समुंदर लांघ गए।

कभी-कभी मुझे ऐसा लगता है कि यह बात सिर्फ हनुमान जी पर लागू नहीं होती है। बल्कि हर हनुमान भक्त के ऊपर भी लागू होती है।

विदेशी मूल के बहुत सारे लोगों के विषय में मैंने सुना है कि वे नीम करोली बाबा के बड़े भक्त एवं अनुयायी है। हनुमान जी के भक्ति और चमत्कार के विषय में मैंने बहुत सारे लोगों के मुंह से कई कथाएं – घटनाक्रम सुनी है।

अब मैं लखनऊ और हनुमान जी की बात करता हूँ। श्रीहनुमान जी का और लखनऊ का बड़ा ही प्राचीन और आस्था विश्वास भरा नाता है। अवध के नवाब की हनुमत भक्ति, अलीगंज का हनुमान मंदिर, तथा लखनऊ के बड़े मंगल का महात्म्य इसका परिचायक है।

जैसा कि मैंने वर्ष 2013 लिखें अपने एक लेख “लखनऊ का बड़ा मंगल विशेष” जिसे मैं अपनी पुस्तक मानस में गुरु गंगा महिमा में स्थान दिया है को लिख चुका हूँ।

इसके अनुसार हमें लखनऊ में जगह-जगह पर श्रीहनुमान मंदिर दिख जाएंगे। श्री रामजानकी और लक्ष्मण जी के विग्रह से ज्यादा विग्रह एवं मंदिर श्रीहनुमान जी के मिलते हैं। श्रीहनुमान जी के मंदिरों में मूल विग्रह हनुमान जी का होता है, लेकिन वहां श्री राम दरबार की झांकी भी होती है।

आम भारतीय के जीवन में कुछ एक ऐसी समस्याएं हैं जो लगभग आती ही आती है। हनुमान जी के आराधना के महामंत्र हनुमान चालीसा में इन सारी समस्याओं का हल भरा पड़ा है।

इस संदर्भ में मैं हनुमान चालीसा की कुछ पंक्तियों को उद्धरित करता हूं –

जय जय जय हनुमान गोसाई। कृपा करहुँ गुरुदेव की नाई। ।

भूत-पिशाच निकट न आवे।  महावीर जब नाम सुनावे।।  

नासै रोग हरे सब पीरा। जपत निरंतर हनुमत बीरा। ।

दुर्गम काज जगत के जेते। सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते। ।

संकट ते हनुमान छुड़ावै। मन क्रम वचन ध्यान जो लावै। ।

और मनोरथ जो कोई लावै। सोई अमित जीवन फल पावै। ।

अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता। अस बर दीन जानकी माता। ।

संकट कटै मिटे सब पीरा। जो सुमिरै हनुमत बलबीरा। ।

जो सत बार पाठ कर कोई। छूटहि बंदी महा सुख होई। ।

जो यह पढे हनुमान चलीसा। होहि सिद्ध साखी गौरीसा। ।

श्री हनुमान चालीसा की ये ऐसी चौपाइयां है जो हमारी आम समस्याओं का सरल समाधान है, ऐसा हनुमान भक्तों का मानना है।

अपनी दादी आलिया बेगम के बीमार होने और उसके बाद हनुमान जी की कृपा से स्वस्थ होने के बाद लखनऊ के नवाब का हनुमान प्रेम बढ़ जाता है। जेष्ठ माह का महीना वास्तव में बहुत गर्म महीना होता है और प्राचीन काल में पदयात्राओं का प्रचलन था। लोग एक स्थान से दूसरे स्थान पर पैदल, ऊंट गाड़ी घोड़ा गाड़ी, या बैलगाड़ी से जाते थे। व्यापार भी लगभग इसी तरह से होता था। कहते हैं कि लखनऊ से गुजरने वाले इन यात्रियों को जेष्ठ के महीने में पानी पिलाने की परंपरा इस शहर में थी। इस शहर का श्रीहनुमान प्रेम सर्वविदित है। इस कारण सैकड़ो बरसों से चली आ रही परंपरा के अनुसार भंडारे के रूप में जगह-जगह पर जेठ के सभी मंगल में पंडाल सजाए जाते रहे हैं। पंडाल में श्री हनुमान जी की तस्वीर या विग्रह रखकर लोग बड़े ही श्रद्धा भाव के साथ लोगों को हनुमान जी के प्रिय प्रसाद का भोग लगाकर भक्तों के बीच वितरण करते हैं। पूरे जेष्ठ भर सभी मंगलवार को (अब तो कई जगह पर पूरे महीने) लखनऊ में हनुमान जी का यह उत्सव होता है। मुझे लगता है कि लखनऊ को छोड़कर पूरे भारत में हनुमान जी से जुड़ा हुआ यह जेष्ठ के बड़े मंगल जैसा त्यौहार कहीं नहीं मनाया जाता है। हालांकि अब लखनऊ से जुड़े हुए शहरों में जैसे रायबरेली, बाराबंकी, उन्नाव आदि में भी बड़ा मंगल मनाने की परंपरा प्रारंभ हो गई है। बड़े मंगल के भंडारे की एक विशेषता यह भी है कि इस भंडारे का प्रसाद हर कोई ग्रहण करना चाहता है। चाहे वह कितने भी बड़े ओहदे पर क्यों न हो। लोग अपनी गाड़ी रोक कर लाइन में लगकर प्रसाद ग्रहण करतें है। पूरी कद्दू की सब्जी और बूंदी इस भंडारे का मुख्य प्रसाद है। हालांकि आधुनिकता के जमाने में लोग न जाने और क्या-क्या वितरण कर रहे हैं। मैंने एक भंडारे में बोरा भर के चिप्स मंगाया गया था और उसको बांटते हुए मैंने देखा था। इसे देखकर मुझे खुशी भी हुई, वहीं कुछ हास्यास्पद भी लगा।

खैर इस बड़े मंगल में श्री हनुमान जी के भंडारे में श्रद्धारूप में जल प्रसाद से चलकर छप्पन किस्म के व्यंजन को वितरित करने की परंपरा है।

13 मई को लखनऊ का प्रथम बड़ा मंगल है। आज इस अवसर पर मैं आप सभी को ह्रदय से बधाई देता हूं और हनुमान जी से प्रार्थना करता हूं कि हे मेरे आराध्य, बल – बुद्धि के देवता आप अपनी कृपा इसी तरह हमारे भारत पर बनाये रखिएगा।

हमारे भारत का मान सम्मान गौरव और प्रतिष्ठा यथावत बना रहे।

श्री हनुमान जी से जुड़े हुए कुश्ती के अखाड़े भी पूरे भारत में है। उदा अखाड़े में कुश्ती होती है। कुश्ती में जब दो प्रतिभागी भाग लेते हैं तो जिनके पीठ में धूल लग जाती है उसे हारा हुआ मान लिया जाता है। आपके भक्त के विषय में कहा जाता है कि जिसके ऊपर हनुमान जी की कृपा होती है उसके पीठ में कभी धूल नहीं लगती है। यानी उसे सर्वदा विजय प्राप्त होती है। हे अंजनेय श्री हनुमानजी, ऐसी ही कृपा हम सभी हनुमान भक्तों एवं हमारे राष्ट्र पर बनाए रखिएगा। जैसा कि मैंने कहा सद्भाव और भाईचारे के मिसाल का यह त्यौहार, सामान्य त्यौहार नहीं बल्कि एक बड़ा उत्सव है, जो समाज को जोड़ता है। हमारी एकता अखंडता शौर्य पराक्रम का प्रतीक है। ऐसे पावन पर्व पर श्री हनुमान जी का वंदन करते हुए, सभी के प्रति धन्यवाद एवं बधाई ज्ञापित करते हैं।

♥♥♥♥

© श्री राजेश कुमार सिंह “श्रेयस”

लखनऊ, उप्र, (भारत )

दिनांक 22-02-2025

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # 244 ☆ जतन कीजिए… ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ ☆

श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की  प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं  में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना “जतन कीजिए…”। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  – आलेख  # 244 ☆ जतन कीजिए… ☆

मातु चरणों में हर पल नमन कीजिए ।

जिंदगी आप  अपनी  चमन  कीजिए ।।

पूज्यनीय भी  यही, वंदनीय भी  यही ।

ये दुखी हो न   ऐसा  जतन  कीजिए ।।

अक्सर हम अपने विचारों में बदलाव उनके लिए करते हैं, जो कुछ नहीं करते  क्योंकि हर  व्यक्ति आखिरी क्षण तक जीत के लिए प्रयास करता है उसे लगता है शायद ऐसा करने से कोई अंतर आए। सत्य तो यही है कि मूलभूत स्वभाव किसी का नहीं बदलता हाँ इतना अवश्य होता है कि परिस्थितियों के आगे  घुटने टेकने  पड़ जाते हैं।

ऐसे लोग जो निरन्तर अपने लक्ष्य के प्रति संकल्पबद्ध होकर परिश्रम करते हैं उनसे भले ही कुछ ग़लतियाँ जाने- अनजाने क्यों न हो जाएँ अंत में वे विजयमाल वरण करते ही हैं। ऐसी जीत जिससे कई लोगों को फायदा हो वो वास्तव में स्वागत योग्य होती ही है।

शांति और सुकून से बड़ा कुछ भी नहीं, इसे हर कीमत पर हासिल करना चाहिए। सत्यनिष्ठा के साथ कदम से कदम मिलाते हुए चलते रहें जीत आपकी राह निहार रही है।

©  श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

माँ नर्मदे नगर, म.न. -12, फेज- 1, बिलहरी, जबलपुर ( म. प्र.) 482020

मो. 7024285788, chhayasaxena2508@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – एक पाठ ऐसा भी ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – एक पाठ ऐसा भी ? ?

मनुष्य का जीवन घटनाओं का संग्रह है। निरंतर कुछ घट रहा होता है। इस अखंडित घट रहे को हरेक अपने दृष्टिकोण से ग्रहण करता है। मेरे जीवन में घटी इस सामान्य-सी घटना ने  असामान्य सीख दी। यह सीख आज भी पग-पग पर मेरा मार्गदर्शन कर रही है।

वर्ष 1986 की बात है। बड़े भाई का विवाह निश्चित हो गया था। विवाह जयपुर से करना तय हुआ। जयपुर में हमारा मकान है जो सामान्यत: बंद रहता है। पुणे से वहाँ जाकर पहले छोटी-मोटी टूट-फूट ठीक करानी थी, रंग-रोगन कराना था। पिता जी ने यह मिशन मुझे सौंपा। मिशन पूरा हुआ।

4 दिसम्बर का विवाह था। कड़ाके की ठंड का समय था। हमारे मकान के साथ ही बगीची (मंगल कार्यालय) है। मेहमानों के लिए वहाँ बुकिंग थी पर कुटुम्ब और ननिहाल के सभी  सभी परिजन स्वाभाविक रूप से घर पर ही रुके। मकान काफी बड़ा है, सो जगह की कमी नहीं थी पर इतने रजाई, गद्दे तो घर में हो नहीं सकते थे। अत: लगभग आधा किलोमीटर दूर स्थित सुभाष चौक से मैंने 20 गद्दे, 20 चादरें और 20 रजाइयाँ किराये पर लीं।

उन दिनों सायकलरिक्शा का चलन था। एक सायकलरिक्शा पर सब कुछ लादकर बांध दिया गया। दो फुट ऊँचा रिक्शा, उस पर लदे गद्दे-रजाई, लगभग बारह फीट का पहाड़ खड़ा हो गया। जीवन का अधिक समय पुणे में व्यतीत होने के कारण इतनी ऊँचाई तक सामान बांधना मेरे लिए कुछ असामान्य था।

…पर असली असामान्य तो अभी मेरी प्रतीक्षा कर रहा था।  रिक्शेवाला सायकल पर सवार हुआ और मेरी ओर देखकर कहा, ‘भाईसाब बेठो!” मेरी मंथन चल रहा था कि इतना वज़न यह अकेली जान केसे हाँकेगा! वैसे भी रिक्शा में तो तिल रखने की भी जगह नहीं थी सो मैं रिक्शा के साथ-साथ पैदल चलूँगा। दोबारा आवाज़ आई, “भाईसाब बेठो।” इस अप्रत्याशित प्रस्ताव से मैं आश्चर्यचकित हो गया। ” कहाँ बैठूँ?” मैंने पूछा। “ऊपरली बैठ जाओ”, वह ठेठ मारवाड़ी में बोला। फिर उसने बताया कि वह इससे भी ऊँचे सामान पर ग्राहक को बैठाकर दस-दस किलोमीटर गया है। यह तो आधा किलोमीटर है। “भाईसाब डरपो मनि। कोन पड्स्यो। बेठो तो सही।” मैंने उसी वर्ष बी.एस्सी. की थी। उस आयु में कोई चुनौती दे, यह तो मान्य था ही नहीं। एक दृष्टि डाली और उस झूलते महामेरु पर विराजमान हो गया। ऊपर बैठते ही एक बात समझ में आ गई कि चढ़ने के लिए तो मार्ग मिल गया, उतरने के लिए कूदना ही एकमात्र विकल्प है।

रिक्शावाले ने पहला पैडल लगाया और मेरे ज्ञान में इस बात की वृद्धि हुई कि जिस रजाई को पकड़कर मैं बैठा था, उसका अपना आधार ही कच्चा है। अगले पैडल में उस कच्ची रस्सी को थामकर बैठा जिससे सारा जख़ीरा बंधा हुआ था। जल्दी ही आभास हो गया कि यह रस्सी जितनी  दिख रही है, वास्तव में अंदर से है उससे अधिक कच्ची। उधर गड्ढों में सड़क इतने कलात्मक ढंग से धंसी थी कि एक गड्ढे से बचने का मूल्य दूसरे गड्ढे में प्रवेश था।   फलत: हर दूसरे गड्ढे से उपजते झटके से समरस होता मैं अनन्य यात्रा का अद्भुत आनंद अनुभव कर रहा था।

यात्रा में बाधाएँ आती ही हैं। कुछ लोगों का तो जन्म ही बाधाएँ उत्पन्न करने के लिए हुआ होता है। ये वे विघ्नसंतोषी हैं जिनका दृढ़ विश्वास है कि ईश्वर ने मनुष्य को टांग  दूसरों के काम में अड़ाने के लिए ही दी है। सायकलरिक्शा मुख्य सड़क से हमारे मकानवाली गली में मुड़ने ही वाला था कि गली से बिना ब्रेक की सायकल पर सवार एक विघ्नसंतोषी प्रकट हुआ। संभवत: पिछले जन्म में भागते घोड़े से गिरकर सिधारा था। इस जन्म में घोड़े का स्थान सायकल ने ले लिया था। हमें बायीं ओर मुड़ना था। वह गली से निकलकर दायीं ओर मुड़ा और सीधे हमारे सायकलरिक्शा के सामने। अनुभवी रिक्शाचालक के सामने उसे बचाने के लिए एकसाथ दोनों ब्रेक लगाने के सिवा कोई विकल्प नहीं था।

मैंने जड़त्व का नियम पढ़ा था, समझा भी था पर साक्षात अनुभव आज किया। नियम कहता है कि प्रत्येक पिण्ड तब तक अपनी विरामावस्था में  एकसमान गति की अवस्था में रहता है जब तक कोई बाह्य बल उसे अन्यथा व्यवहार करने के लिए विवश नहीं करता। ब्रेक लगते ही मैंने शरीर की गति में परिवर्तन अनुभव किया। बैठी मुद्रा में ही शरीर विद्युत गति से ऊपर से नीचे आ रहा था। कुछ समझ पाता, उससे पहले चमत्कार घट चुका था। मैंने अपने आपको सायकलरिक्शा की सीट पर पाया। सीट पर विराजमान रिक्शाचालक, हैंडल पर औंधे मुँह गिरा था। उसकी देह बीच के डंडे पर झूल रही थी।

सायकलसवार आसन्न संकट की गंभीरता समझकर बिना ब्रेक की गति से ही निकल लिया। मैं उतरकर सड़क पर खड़ा हो गया। यह भी चमत्कार था कि मुझे खरोंच भी नहीं आई थी…पर आज तो चमत्कार जैसे सपरिवार ही आया था। औंधे मुँह गिरा चालक दमखम से खड़ा हुआ। सायकलरिक्शा और लदे सामान का जायज़ा लिया। रस्सियाँ फिर से कसीं। अपनी सीट पर बैठा। फिर ऐसे भाव से कि कुछ घटा ही न हो, उसी ऊँची जगह को इंगित करते हुए मुझसे बोला,” बेठो भाईसाब।”

भाईसाहब ने उसकी हिम्मत की मन ही मन दाद दी लेकिन स्पष्ट कर दिया कि आगे की यात्रा में सवारी पैदल ही चलेगी। कुछ समय बाद हम घर के दरवाज़े पर थे। सामान उतारकर किराया चुकाया। चालक विदा हुआ और भीतर विचार की शृंखला चलने लगी।

जिस रजाई पर बैठकर मैं ऊँचाई अनुभव कर रहा था, उसका अपना कोई ठोस आधार नहीं था। जीवन में एक पाठ पढ़ा कि क्षेत्र कोई भी हो, अपना आधार ठोस बनाओ। दिखावटी आधार औंधे मुँह पटकते हैं और जगहँसाई का कारण बनते हैं।

आज जब हर क्षेत्र विशेषकर साहित्य में बिना परिश्रम, बिना कर्म का आधार बनाए, जुगाड़ द्वारा रातोंरात प्रसिद्ध होने या पुरस्कार कूटने की इच्छा रखनेवालों से मिलता हूँ तो यह पाठ बलवत्तर होता जाता है।

अखंडित निष्ठा, संकल्प, साधना का आधार सुदृढ़ रहे तो मनुष्य सदा ऊँचाई पर बना रह सकता है। शव से शिव हो सकता है।

?

© संजय भारद्वाज  

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

💥 12 अप्रैल 2025 से 19 मई 2025 तक श्री महावीर साधना सम्पन्न होगी 💥  

🕉️ प्रतिदिन हनुमान चालीसा एवं संकटमोचन हनुमन्नाष्टक का कम से एक पाठ अवश्य करें, आत्मपरिष्कार एवं ध्यानसाधना तो साथ चलेंगे ही 🕉️

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

≈ संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक साहित्य # 350 ☆ आलेख – “ऑपरेशन सिंदूर…  सेना के प्रति कृतज्ञ राष्ट्र” ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # 350 ☆

?  आलेख – ऑपरेशन सिंदूर…  सेना के प्रति कृतज्ञ राष्ट्र ? श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

भारतीय सैनिकों का इतिहास सदा से अदम्य साहस, समर्पण और देशभक्ति से भरा हुआ है। ऑपरेशन सिंदूर भी उसी गौरवशाली किताब का नया अध्याय है। हमारी सेना ने अद्वितीय वीरता दिखाते हुए दुश्मन को नए उपकरणों से, आक्रमण तथा सुरक्षा में तकनीकी कौशल से पाकिस्तान को मुंहतोड़ जवाब दिया। यह ऑपरेशन केवल एक सैन्य कार्रवाई नहीं, बल्कि हर उस सैनिक के संघर्ष का प्रतीक है, जो सीमा पर देश की रक्षा के लिए अपना सब कुछ न्योछावर करने को हमेशा तैयार रहता है। भारत की वायु सेना के मिसाइल आक्रमण बेमिसाल थे। देश की गुप्तचर एजेंसी ने सफलता की अद्भुत कहानी लिखी है। सीमा पर थल सेना अग्निपरीक्षा से गुजर रही थी। जवानों का संघर्ष अद्वितीय है।

ऑपरेशन सिंदूर के दौरान सैनिकों ने न केवल शारीरिक चुनौतियों का सामना किया, बल्कि मानसिक रूप से भी खुद को मजबूत रखा। ऊँचे पहाड़ों, खतरनाक मौसम और दुर्गम इलाकों में घात लगाए दुश्मन से लोहा लेना, बिना सीमा पार किए पाकिस्तान पर देश ने अभूतपूर्व प्रहार किए। यह असाधारण बात थी। हर उड़ान, हर कदम पर जान का जोखिम, परिवार से दूरियाँ, और अनिश्चितता के बीच सैन्य दल का धैर्य असाधारण था।

अब जबकि सीमा पर अपेक्षाकृत शांति है, देशवासियों का कर्तव्य है कि हम सब अपनी अपनी तरह से हमारी सेना के प्रति संजीदगी से कृतज्ञता ज्ञापित करें। सैनिकों के परिवारों का सहारा बनें।

जब जवान सीमा पर डटे होते हैं, तो उनके परिवार की चिंता उनके मन में हमेशा बनी रहती है। ऐसे में समाज का दायित्व है कि हम सेना के साथ खड़े रहें।

हमारा आर्थिक सहयोग सैनिकों के परिवारों को शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजमर्रा की जरूरतों के लिए मदद बन सकता है। हमारे छोटे-छोटे दान, स्कॉलरशिप या रोजगार के अवसर उनके जीवन में बड़ा बदलाव ला सकते हैं।

हम सेना को मानसिक संबल दे सकते हैं। सैन्य अभियानों के बाद जवानों और उनके परिवारों को मनोवैज्ञानिक समर्थन की आवश्यकता होती है। काउंसलिंग सेवाएँ, समर्थन समूह और मनोरंजन के कार्यक्रम उन्हें तनाव से उबारने में मदद कर सकते हैं।

शहीदों के बच्चों की शिक्षा को प्राथमिकता देकर हम उनके भविष्य को सुरक्षित कर सकते हैं। इसी तरह, परिवार के सदस्यों को व्यावसायिक प्रशिक्षण देकर आत्मनिर्भर बनाना भी महत्वपूर्ण है। स्थानीय समुदाय इन परिवारों के साथ त्योहारों, समारोहों या रोजमर्रा के कार्यों में शामिल होकर उन्हें अकेलापन महसूस न होने दें।

अपना टैक्स समय पर देना हर नागरिक का कर्तव्य होता है।

सैनिकों का सम्मान केवल शब्दों तक सीमित नहीं होना चाहिए। छोटे-छोटे प्रयास, जैसे सैन्य कल्याण कोष में योगदान, रक्तदान शिविरों में भाग लेना, या सेना के अस्पतालों में स्वयंसेवा करना, हमारी कृतज्ञता को व्यक्त करने के तरीके हैं। सोशल मीडिया पर उनकी बहादुरी की कहानियाँ साझा करके भी हम समाज में जागरूकता फैला सकते हैं।

राष्ट्रीय स्तर पर सारे मतभेद भुलाकर एकजुटता ही सेना की ताकत होती है।

ऑपरेशन सिंदूर जैसे अभियान हमें याद दिलाते हैं कि देश की सुरक्षा का दायित्व सिर्फ सैनिकों पर नहीं, बल्कि हर नागरिक पर है। उनके परिवारों की मदद करना, उनके संघर्षों को समझना और उन्हें सम्मान देना ही सच्ची देशभक्ति है। जब देश का हर व्यक्ति अपनी भूमिका निभाएगा, तभी हमारी सेनाएं निडर होकर सीमा पर डटे रहेंगे और हम निश्चिन्त होकर शांति से सो सकेंगे।

☆

© श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

म प्र साहित्य अकादमी से सम्मानित वरिष्ठ व्यंग्यकार

संपर्क – ए 233, ओल्ड मिनाल रेजीडेंसी भोपाल 462023

मोब 7000375798, ईमेल apniabhivyakti@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # 681 ⇒ सज्जन/सम्भ्रांत पुरुष ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए साप्ताहिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “सज्जन/सम्भ्रांत पुरुष…“।)

?अभी अभी # 681 ⇒ सज्जन/सम्भ्रांत पुरुष ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

(Thorough gentleman)

एक सज्जन पुरुष की क्या परिभाषा है, वह भला भी होता है, सभ्य भी होता है और चरित्रवान भी होता है। शिक्षित, विनम्र, सरल, और संस्कारी व्यक्ति को आप संभ्रांत भी कह सकते हैं।

जिस व्यक्ति में सभी पुरुषोचित गुण होते हैं, उसे अंग्रेजी में thorough gentleman कहा जाता है।

एक बड़ा प्यारा बंगाली शब्द है मोशाय जिसे हमारे यहां महाशय कहते हैं। यूं तो सभी अच्छाइयां एक व्यक्ति में होना संभव नहीं है, फिर भी हमारे सभ्य समाज की मान्यताओं पर जो व्यक्ति खरा उतरता है, उसे हमें सज्जन अथवा संभ्रांत मानने में कोई संकोच नहीं होता। ।

अंग्रेजी शब्द thorough का मतलब ही होता है, पूर्ण रूप से, अथवा अच्छी तरह से। मनोयोग से अध्ययन को thorough study कहा जाता है। बीमारियों की गहन जांच को भी thorough check up ही कहा जाता है। जेंटलमैन तो कोई भी हो सकता है, लेकिन thorough gentleman हर व्यक्ति नहीं होता।

भला आदमी, सीधा सरल इंसान, जिसमें शराफत कूट कूटकर भरी हो, उसे भी हम सज्जन ही तो कहते हैं। कहीं कहीं तो पसीने की तरह, ऐसे व्यक्ति के चेहरे से शराफत टपक रही होती है। डर है, कहीं इतनी शराफत ना टपक जाए, कि कुछ बचे ही नहीं। ।

अंग्रेजी में एक कहावत है, He is every inch a gentleman. यानी उस आदमी की शराफत इंच टेप से नापी जाती होगी।

हमारे समाज में भी तो कुछ लोग रहते हैं, जिनका कद ऊंचा होता है। कुछ समाज के मापदंड हैं, जो व्यक्ति की ऊंच नीच निर्धारित करते हैं। शायद इसीलिए हर आदमी ऊपर उठना चाहता है, इंच इंच, सेंटीमीटर के लिए मिलीमीटर से प्रयास करना पड़ता है।

बंगाल में एक लाहिड़ी महाशय हुए हैं, उनकी आध्यात्मिक ऊंचाई नापना इतना आसान नहीं था।

इनकी केवल एक तस्वीर ही उपलब्ध है, जिसके बारे में भी यह मान्यता है कि वह तस्वीर भी उनकी सहमति से ही कैमरे में कैद हो पाई, अन्यथा कोई फोटोग्राफर कभी उनकी तस्वीर कैद नहीं कर पाया।।

इतना ऊंचा कौन उठना चाहता है भाई। बस मानवीय गुण, नैतिकता, शराफत, ईमानदारी, विनम्रता, प्रेम और करुणा का समावेश हो हम सबमें। सबका उत्थान हो, लेडीज हों या जेंटलमैन, सभी thorough gentleman हों, सौम्य, भद्र, पुरुष हों, सौम्य, सुशील महिला हों।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – आलेख ☆ आपके भीतर क्या चल रहा है? ☆ श्री जगत सिंह बिष्ट ☆

श्री जगत सिंह बिष्ट

(Master Teacher: Happiness & Well-Being, Laughter Yoga Master Trainer, Author, Blogger, Educator, and Speaker.)

☆  आपके भीतर क्या चल रहा है? ☆ श्री जगत सिंह बिष्ट ☆ 

एक आत्मीय संवाद – अपने अंगों से

प्रस्तावना: शरीर के संकेतों को समझिए, इससे पहले कि स्थिति बिगड़ जाए

हममें से अधिकतर लोग तब तक अपनी सेहत पर ध्यान नहीं देते जब तक कोई परेशानी सामने न आए। लेकिन सोचिए, अगर हम अपने शरीर की आवाज़ को हर रोज़ थोड़ा-थोड़ा सुनें, उससे प्यार से बात करें, तो क्या हम बीमार होने से पहले ही बेहतर नहीं हो सकते?

हमारा शरीर कई अंगों का एक संगठित समूह है—हर अंग दिन-रात मेहनत करता है ताकि हम जीवन को पूरी ऊर्जा और संतुलन के साथ जी सकें। इस लेख में हम एक आत्मीय यात्रा करेंगे अपने भीतर, और जानेंगे दस अहम अंगों व प्रणालियों की सेहत कैसी होनी चाहिए, उसे और बेहतर कैसे बनाएं, और कब किसी चिकित्सक की सलाह लें।

यह लेख डराने या बोझिल ज्ञान देने के लिए नहीं है। यह एक स्नेहभरा आमंत्रण है—अपने आप से दोस्ती करने का, अपने शरीर को समझने का।

  1. हृदय: शरीर का न थकने वाला पंपिंग स्टेशन

स्वस्थ लक्षण व देखभाल:

अगर सीढ़ियाँ चढ़ने पर आपकी सांस जल्दी नहीं फूलती, आपकी त्वचा में गुलाबी आभा है और मन प्रसन्न रहता है, तो समझिए आपका हृदय खुश है। नियमित व्यायाम, पौष्टिक आहार, शांत निद्रा और तनाव का प्रबंधन– जैसे योग, ध्यान या हास्ययोग– हृदय की रक्षा करते हैं।

डॉक्टर से कब मिलें:

अचानक थकावट, सांस फूलना, पैरों में सूजन, या सीने में भारीपन—ये संकेत हैं कि दिल को आराम नहीं मिल रहा। ऐसे में डॉक्टर से सलाह लेना ज़रूरी है।

  1. जिगर (लिवर): मौन साधक

स्वस्थ लक्षण व देखभाल:

अगर पाचन ठीक है, थकान नहीं होती, और त्वचा साफ है, तो समझिए आपका जिगर अच्छा काम कर रहा है। इसे हल्का भोजन, शराब से परहेज, हल्दी, आंवला और हरी सब्जियों से मज़बूत बनाएं।

डॉक्टर से कब मिलें:

त्वचा या आंखों में पीलापन, गहरे रंग का मूत्र, पेट में भारीपन या थकावट—ये लिवर की परेशानी के संकेत हो सकते हैं।

  1. गुर्दे (किडनी): शरीर की प्राकृतिक छन्नी

स्वस्थ लक्षण व देखभाल:

पानी जैसा साफ़ मूत्र, आंखों में ताजगी और पैरों में सूजन का न होना, यह दर्शाता है कि गुर्दे ठीक हैं। पर्याप्त पानी पीना, नमक का सीमित सेवन और ब्लड प्रेशर व शुगर को नियंत्रित रखना आवश्यक है।

डॉक्टर से कब मिलें:

झागदार मूत्र, बार-बार पेशाब आना, खासकर रात में, या टखनों में सूजन—ये चेतावनी के संकेत हैं।

  1. फेफड़े: सांसों के प्रहरी

स्वस्थ लक्षण व देखभाल:

गहरी सांस ले पाना, दौड़ने-भागने के बाद जल्दी थकावट न होना, यह बताता है कि फेफड़े स्वस्थ हैं। ताज़ी हवा, प्राणायाम और धूम्रपान से दूरी फेफड़ों को ताकत देते हैं।

डॉक्टर से कब मिलें:

लगातार खांसी, सांस लेने में कठिनाई या सीने में जकड़न—ये फेफड़ों से जुड़ी दिक्कत के संकेत हो सकते हैं।

  1. थायरॉयड: मौन नियंत्रक

स्वस्थ लक्षण व देखभाल:

अगर वजन स्थिर है, ऊर्जा बनी रहती है, और मन में संतुलन है, तो थायरॉयड अच्छा काम कर रहा है। सीफ़ूड, मेवे और तनाव-मुक्त जीवन इसे स्वस्थ रखते हैं।

डॉक्टर से कब मिलें:

वजन का अचानक बढ़ना या घटना, बाल झड़ना, थकावट या मूड में उतार-चढ़ाव—ये थायरॉयड असंतुलन का संकेत हो सकते हैं।

  1. अग्न्याशय (पैंक्रियास): रक्त में मिठास का प्रहरी

स्वस्थ लक्षण व देखभाल:

दिनभर स्थिर ऊर्जा, मीठे की तीव्र craving न होना, और पेट भरा-भरा महसूस होना—ये स्वस्थ पैंक्रियास की निशानी हैं। कम चीनी, फाइबर युक्त आहार और नियमित भोजन मदद करते हैं।

डॉक्टर से कब मिलें:

बार-बार प्यास लगना, बार-बार पेशाब आना, धुंधली दृष्टि या वजन घटाना—ये डायबिटीज़ के शुरुआती संकेत हो सकते हैं।

  1. पेट और आंतें: शरीर का दूसरा मस्तिष्क

स्वस्थ लक्षण व देखभाल:

अगर खाना पचता है, पेट हल्का रहता है और मल नियमित है, तो पाचन अच्छा है। धीरे-धीरे खाना, खमीरयुक्त भोजन और दही जैसी चीज़ें आंतों को मजबूत बनाती हैं।

डॉक्टर से कब मिलें:

लगातार गैस, कब्ज़, पेट में भारीपन या जलन—ये आपके पाचनतंत्र की शिकायत हो सकती हैं।

  1. मस्तिष्क और तंत्रिका तंत्र: नियंत्रण का केंद्र

स्वस्थ लक्षण व देखभाल:

अगर मन साफ सोचता है, याददाश्त ठीक है और नींद गहरी आती है, तो तंत्रिका तंत्र संतुलित है। किताबें पढ़ना, ध्यान, समय पर सोना, और संवाद से मस्तिष्क सक्रिय रहता है।

डॉक्टर से कब मिलें:

सिरदर्द, भूलने की आदत, मन में घबराहट या नींद की परेशानी—ये संकेत हैं कि आपको मानसिक रूप से विश्राम और मार्गदर्शन की ज़रूरत है।

  1. रक्त और परिसंचरण तंत्र: जीवन की धारा

स्वस्थ लक्षण व देखभाल:

ऊर्जावान शरीर, त्वचा में चमक और चोटों का जल्दी भरना रक्त की गुणवत्ता को दर्शाता है। आयरन से भरपूर भोजन, व्यायाम और जल सेवन इसमें मदद करते हैं।

डॉक्टर से कब मिलें:

लगातार थकान, चक्कर आना, हाथ-पांव ठंडे रहना—ये रक्त की कमी या अन्य समस्या की ओर इशारा कर सकते हैं।

  1. हड्डियाँ और जोड़: मजबूती की नींव

स्वस्थ लक्षण व देखभाल:

अगर आप आसानी से चल-फिर सकते हैं, जोड़ों में दर्द नहीं होता और शरीर सीधा रहता है, तो हड्डियाँ स्वस्थ हैं। कैल्शियम, विटामिन डी, धूप, और हल्का वजन उठाना हड्डियों के लिए लाभदायक है।

डॉक्टर से कब मिलें:

जोड़ों में अकड़न, पीठ दर्द या लंबाई घटती प्रतीत हो तो हड्डियों की जांच आवश्यक है।

निष्कर्ष: एक आत्मीय यात्रा

स्वास्थ्य कोई मंज़िल नहीं—यह अपने शरीर से एक प्रेमपूर्ण रिश्ता है।

जब हम अपने भीतर की हलचलों को सुनना शुरू करते हैं, तो हम स्वयं के प्रति अधिक सजग और दयालु बनते हैं। इस लेख के माध्यम से आपका शरीर आपको कह रहा है—“मुझे पहचानो, मुझसे प्यार करो।”

खुशी से खाइए, मन से चलिए, चैन से सोइए, और ज़रूरत हो तो चिकित्सक को सलाहकार बनाइए—डर के नहीं, भरोसे के साथ!

अस्वीकरण:

यह लेख सामान्य स्वास्थ्य जागरूकता के उद्देश्य से लिखा गया है। कृपया किसी भी दवा, जांच या उपचार से पहले योग्य चिकित्सक की सलाह अवश्य लें।

© जगत सिंह बिष्ट

LifeSkills

A Pathway to Authentic Happiness, Well-Being & A Fulfilling Life! We teach skills to lead a healthy, happy and meaningful life.

The Science of Happiness (Positive Psychology), Meditation, Yoga, Spirituality and Laughter Yoga. We conduct talks, seminars, workshops, retreats and training.

Please feel free to call/WhatsApp us at +917389938255 or email lifeskills.happiness@gmail.com if you wish to attend our program or would like to arrange one at your end.

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # 131 – देश-परदेश – जिस लाहौर नही देख्या ओ जम्याइ नई ☆ श्री राकेश कुमार ☆

श्री राकेश कुमार

(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ  की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” आज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)

☆ आलेख # 131 ☆ देश-परदेश – जिस लाहौर नही देख्या ओ जम्याइ नई ☆ श्री राकेश कुमार ☆

हमने इस नाम से खेले जा रहे लाहौर में जन्में प्रसिद्ध नाटककार असगर वजाहत के प्रसिद्ध नाटक “जिस लाहौर नही देख्या ओ जम्याइ नई” के बारे में बहुत कुछ सुना हैं। ये नाटक जिन लाहौर नहीं वेख्या… शीर्षक से वर्षों से विभिन्न शहरों के रंगमंचों की शोभा बढ़ाता है। पंजाबी भाषा में लाहौर शहर की प्रसिद्धि की गहराई बताने के लिए कहावत का रूप ले चुका है। “जिन लाहौर नहीं वेख्या…वो जन्मया ही नहीं” अर्थात “जिसने लाहौर नहीं देखा, उसका जन्म ही नहीं हुआ”

देश के विभाजन से पूर्व लाहौर शहर को पूर्व का पेरिस कहा जाता था। फैशन की दुनिया में लाहौर की प्रसिद्धि अभी भी कायम है।

पवित्र शहर अमृतसर से करीब तीस मील की दूरी पर स्थित लाहौर आज भी उन लोगों के लिए अभिमान का प्रतीक है, जो विभाजन की वेदना में अपना सब कुछ छोड़ कर भारत में आ गए थे।

दिल्ली शहर हो या राजस्थान, एम पी, यू पी जैसे प्रदेश जहां शरणार्थी बन कर पंजाबी परिवार अपने बल बूते/ पुरुषार्थ से वापिस अपने मुकाम हासिल कर चुके है। बहुत सारे  कपड़े, श्रृंगार, ड्राई फ्रूट आदि की दुकानों के नाम के साथ लाहौर नाम जुड़ा हुआ मिलता है। इसी प्रकार से हैराबाद की प्रसिद्ध “कराची बेकरी” का नाम भी पूरे देश में प्रसिद्ध है।

इन दुकानदारों को अभी भी लोग “लाहौरी शाह (सेठ)” के नाम से जानते हैं। पाकिस्तान का फिल्मी उद्योग भी लाहौर शहर में स्थित है, इसलिए इसको “लॉलीवुड” भी कहा जाता है।

65 के युद्ध में भारतीय सेना ने लाहौर से भी पाकिस्तान में प्रवेश किया था, लेकिन करीब दस मील घुसने के बाद मानव निर्मित “इच्छोगिल नहर” बाधा बन गई थी।

अमृतसर के कुछ लोग 65 के सीज़ फायर के समय भारतीय सैनिकों के खाने के लिए खीर बना कर ले गए थे। सैनिकों ने भी स्वादिष्ट खीर का सेवन कर खुश होकर भारतीय नागरिकों को लाहौर में पाकिस्तानी नागरिकों की भैंसे, गाय आदि घरेलू पशुओं को ले जाने के किए कहा, ताकि उनको चारा पानी मिलता रहे। हमारे देश के नागरिक भी मुफ्त में मिले हुए जानवरों को अपने घर ले आए थे।

पुरानी कहावत है, “कर भला हो भला” ये ही सब हमारे देशवासियों के साथ हुआ था। आप भी चाहे तो हमारे इस लेख पर ताली बजा कर अपना भी भला करवा सकते हैं।

© श्री राकेश कुमार

संपर्क – B 508 शिवज्ञान एनक्लेव, निर्माण नगर AB ब्लॉक, जयपुर-302 019 (राजस्थान)

मोबाईल 9920832096

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # 680 ⇒ बाल की खाल ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए साप्ताहिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “बाल की खाल…“।)

?अभी अभी # 680 ⇒ बाल की खाल ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

बाल हो या नाखून, हमारे शरीर की ऐसी फसल है, जो जितना काटो, उतनी बढ़ती है। नख शिख वर्णन में कभी इनकी उपेक्षा नहीं की जा सकती। ये रेशमी जुल्फें, ये शरबती आंखें। न जाने क्यूं, नाखून पर किसी शायर की कलम नहीं चली। बालपन से ही इनका हमारा साथ खून का रिश्ता रहता है। खटमल की तरह ये हमारा खून तो नहीं चूसते, लेकिन हमारे शरीर का अभिन्न हिस्सा होने के बावजूद, जब इन पर मनमाने तरीके से चर्बी चढ़ जाती है, अर्थात् ये गाजर घास की तरह बढ़ना शुरू कर देते हैं, तो कैंची से इनके पर कतरना पड़ता है। जिस तरह एक पक्षी के पर कतरने पर दर्द नहीं होता, उसी तरह केश कर्तन भी पीड़ा रहित ही होता है। नाखून के बारे में तो एक पहेली का अक्सर जिक्र होता है, जिसका हल मुश्किल ना होते हुए भी, कुछ लोग, हल खोजते हुए, नाखून से अपना सर खुजाते, देखे जा सकते हैं ;

बीसों का सर काट लिया

ना मारा, ना खून किया ….

बेचारे बाल, हमारी खाल पर ही तो जिंदा हैं। ये खुद किसी को दर्द नहीं देते, परेशान नहीं करते। लेकिन जब इन्हें अनावश्यक तरीके से खींचा जाता है, तो खाल अर्थात् त्वचा को दर्द होता है। बालों को हम बड़े प्यार से सजाते संवारते हैं। एक शायर ने क्या खूब कहा है ;

जुल्फें संवारने से बनेगी ना कोई बात !

उठिये, किसी गरीब की किस्मत संवारिये ..

वह गरीब बेचारा क्या जाने, जुल्फें यूं ही नहीं संवारी जाती, लोमा हेयर ऑयल, केशवर्धक तेल और आलमंड ऑयल से भी जब काम नहीं बनता तो ब्यूटी पार्लर ही एकमात्र विकल्प बचता है। कुछ अभागे गरीब तो हमने ऐसे भी देखे हैं, जिनके चार -चार बाल बच्चे हो गए, सर में बाल बचे नहीं, फिर भी उनके पैंट की हिप पॉकेट में छोटा सा कंघा जरूर मिलेगा।

जब भी कोई लड़की देखे

मेरा दिल दिवाना बोले

ओले ओले ओले ओले।

शायद इसे ही कहते हैं, सर मुंडवाते ही ओले ओले। ।

जो छिद्रान्वेशी होते हैं, बात बात में मीन मेख निकालते हैं, उनकी यह हरकत बाल की खाल निकालने जैसी ही होती है। उन्हें यह समझना चाहिए, सिर्फ सिर के एक बाल को खींचने से खाल को कितना दर्द होता है। दु:शासन जब भरी सभा में पांचाली के केश खींचकर लाया होगा, तो उसे कितना दर्द हुआ होगा। पांचों पांडवों का मन तो किया होगा, इस दु:शासन की खाल खींच लें। तब कहां महात्मा गांधी थे। फिर भी वे मजबूर थे। क्योंकि तब वहां राम राज नहीं धर्म का राज था। और धर्मराज स्वयं जूए में द्रौपदी को हार बैठे थे।

बड़े बड़े बाल रखना, और उनकी देखभाल करना, बच्चों की देखभाल से कम कठिन परिश्रम का काम नहीं होता। आप किसी से उलझो ना उलझो, जुल्फें आपस में ही उलझ जाती हैं। कितने बालमा ऐसे हैं, जिन्होंने किसी की उलझी लट सुलझाई है। उनके आपस के झगड़े तो उनसे सुलझते नहीं, चले हैं किसी की लट सुलझाने। ।

आप बाल की चाहे जितनी खाल निकालें, बाल को कुछ नहीं होगा, लेकिन अगर आपने किसी के बाल को खींचा, तो हो सकता है कोई अपना आपा खो बैठे और काई ऐसी हरकत कर बैठे, जिससे आपकी त्वचा को भारी नुकसान पहुंचे। आगे क्या लिखूं, आप खुद समझदार हो। अपने बालों और नाखूनों का खयाल रखें। कोरोना काल में कुछ लोगों की तो घर में ही हजामत हो गई थी और कुछ बाबा रामदेव बन बैठे थे। नाखून नेल कटर से ही काटें, दांतों से नहीं …!!!

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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