हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # 679 ⇒ च्युंइगम ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए साप्ताहिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “च्युंइगम…“।)

?अभी अभी # 679 ⇒ च्युंइगम ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

[CENTER FRESH]

आप खुशी खुशी कुछ भी चबा सकते हो, लेकिन क्या आपने कभी गम को चबाया है ! हमारे साहित्य के वात्स्यायन, सच्चिदानंद ‘अज्ञेय ‘ फरमाते हैं ;

हम सब काल के दांतों तले

चबते चले जाते हैं

च्युइंगम की तरह

कच, कच कच

बड़ा कठोर सच …

और उधर सभी पीड़ाओं का संगीत से उपचार करने वालों का मानना है कि ;

जब दिल को सताये गम

तू छेड़ सखि सरगम

सा रे ग म पा …

हमारे जगजीत सिंह बड़े भोले हैं। वे नहीं जानते आज की पीढ़ी को। जब भी किसी खूबसूरत युवा चेहरे को मुस्कुराता देख लेते हैं, बेचारे बड़ी मासूमियत से पूछ लेते हैं ;

तुम इतना जो मुस्कुरा रहे हो

क्या गम है, जिसको चबा रहे हो !

उन्हें कौन बतलाए। आज की पीढ़ी इतनी खुश है, इतनी खुश है, कि कभी खुशी, कभी च्युंइगम। वह मस्ती में झूमते हुए सिर्फ किशोर के ही मस्ती भरे नगमे गाना चाहती है। गम छोड़ के मनाओ रंगरेली।

जिस तरह हाथी के दांत खाने के, और दिखाने के अलग होते हैं, ठीक उसी तरह गम भी दो तरह का होता है, खाने का और चिपकाने का। ठंड में अन्य सूखे मेवों के साथ गोंद के लड्डू बड़े स्वास्थ्य वर्धक होते हैं। नवजात शिशुओं की माता को भी कई औषधीय गुणों से युक्त, शक्तिवर्धक जापे के लड्डू खिलाए जाते हैं। बचपन में हमने भी चखे हैं। हमें तो च्युइंगम से बेहतर लगे। पसंद अपनी अपनी।।

जुगाली के भी सबके अपने अपने तरीके होते हैं। वैसे तो मुंह चलने और जबान चलने में अंतर है, लेकिन कुछ लोग इस भ्रम में रहते हैं कि च्युइंगम से मुंह तो चलता रहता है, लेकिन जबान पर ताला लग जाता है। कुछ सयाने लोग इसे जबड़ों के व्यायाम की संज्ञा भी देते हैं। चोर, चोरी से जाए, लेकिन हेराफेरी से ना जाए। पान आप उसे खाने नहीं दो, यहां वहां थूकने नहीं दो। गुटखा हमारे स्वास्थ्य के लिए तो हानिकारक है ही, जो इनका विज्ञापन कर रहे हैं, हमारी नजर में, वे भी कम खतरनाक नहीं। खुद तो पैसा कमाओ और हमारी आदत बिगाड़ो, यह नहीं चलेगा। हम भले ही अपनी आदत नहीं सुधार पाएं, लेकिन ठीकरा तो आपके माथे पर ही फोड़ेंगे। बॉयकॉट पद्मश्री की त्रिमूर्ति।

च्युंइगम को देख, हमें अपना बचपन याद आ गया। सुबह जब टहलने जाते थे, तो किसी भी नीम के पेड़ की नाजुक टहनियों को तोड़, उसकी दातून बना लेते थे और फिर, बस, उसे दांतों से चबाया करते थे। मसूड़ों और दांतों का व्यायाम होता था और नीम का कसैलापन शरीर में प्रवेश कर जाता था। करैला नीम चढ़े ना चढ़े, तब तो नीम ही हमारा हकीम भी था।।

मुखशुद्धि से मन की भी शुद्धि होती है। तन और मन अगर स्वस्थ रहे सौंफ, इलायची और लौंग का सेवन बुरा नहीं। लेकिन सिर्फ खुशी के खातिर, ऐसा भी क्या किसी गम को चबाना, जो बाद में तकलीफदेह साबित हो।

आप ही आपके चिकित्सक भी हो और निःशुल्क परामर्शदाता भी। गम को चबाना, अथवा गम को गलत करना, दोनों ही गलत है। हमारे होठों पर तो आज सिर्फ तलत है। हमारे सारे गम दूर करती सरगम। हमारी प्यारी कानों के जरिए आत्मा में प्रवेश करती असली च्युंइगम।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संजय उवाच # 288 – अपना समुद्र, अपना मंथन ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के  लेखक  श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है। साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ  हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको  पाठकों का  आशातीत  प्रतिसाद मिला है।”

हम  प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है  इस शृंखला की अगली कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों  के माध्यम से  हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)

☆  संजय उवाच # 288 ☆ अपना समुद्र, अपना मंथन… ?

महासागर अपने आप में अथाह जगत है। जाने कबसे  अनुसंधान हो रहे हैं, तब भी महासागर की पूरी थाह नहीं मिलती।

भीतर भी एक महासागर है। इसकी लहरें निरंतर किनारे से टकराती हैं। लहरों के थपेड़े अविराम उथल-पुथल मचाए रखते हैं। भीतर ही भीतर जाने कितने ही तूफान हैं, कितनी ही सुनामियाँ हैं।

भीतर का यह महासागर, इसकी लहरें, लहरों के थपेड़े सोने नहीं देते। अक्षय व्यग्रता, बार-बार आँख खुलना, हर बार-हर क्षण भीतर से स्वर सुनाई देना-क्या शेष जीवन भी केवल साँसे लेने भर में बिताना है?

योगेश्वर ने अर्जुन से कहा था, ‘प्रयत्नाणि सिद्धंति परमेश्वर:’ प्रयत्नों से, कठोर परिश्रम से लक्ष्य की प्राप्ति की जा सकती है, ईश्वर को भी सिद्ध किया जा सकता है। तो क्या हम कभी मथ सकेंगे भीतर का महासागर? 

मंथन इतना सरल भी तो नहीं है। देवताओं और असुरों को महाकाय पर्वत मंदराचल की नेति एवं नागराज वासुकि की मथानी करनी पड़ी थी।

समुद्र मंथन में कुल चौदह रत्न प्राप्त हुए थे। संहारक कालकूट के बाद पयस्विनी कामधेनु, मन की गति से दौड़ सकनेवाला उच्चैश्रवा अश्व, विवेक का स्वामी ऐरावत हाथी, विकारहर्ता कौस्तुभ मणि, सर्व फलदायी कल्पवृक्ष, अप्सरा रंभा, ऐश्वर्य की देवी लक्ष्मी, मदिरा की जननी वारुणी, शीतल प्रभा का स्वामी चंद्रमा, श्रांत को विश्रांति देनेवाला पारिजात, अनहद नाद का पांचजन्य शंख, आधि-व्याधि के चिकित्सक भगवान धन्वंतरि और उनके हाथों में अमृत कलश।

क्या हम कभी पा सकेंगे उन चौदह रत्नों को जो छिपे हैं हमारे ही भीतर?

स्वेदकणों से कमल खिला सकें तो इस पर विराजमान माता लक्ष्मी की अनुकम्पा प्राप्त होगी। धन्वंतरि का प्रादुर्भाव, हममें ही अंतर्निहित है, अर्थात  हमारा स्वास्थ्य हमारे हाथ में है। इस मंथन में कालकूट भी है और अमृत भी। जीवन में दोनों आएँगे। कालकूट को पचाने की क्षमता रखनी होगी। निजी और सार्वजनिक जीवन में अस्तित्व को समाप्त करने के प्रयास होंगे पर हमें नीलकंठ बनना होगा।

न गले से उतरा, न गले में ठहरा,

विष न जाने कहाँ जा छिपा,

जीवन के साथ मृत्यु का आभास,

मैं न नीलकंठ बन सका, न सुकरात..!

अमृतपान कल्पना नहीं है। सत्कर्मों से मनुष्य की कीर्ति अमर हो सकती है। अनेक पीढ़ियाँ उसके ज्ञान, उसके योगदान से लाभान्वित होकर उसे याद रखती हैं, मरने नहीं देतीं, यही अमृत-पान है। नेह का निर्झर किसी के होने को सतत प्रवहमान  रखता है, सूखने नहीं देता। सदा हरित रहना ही अमृत-पान है।

भूख, प्यास, रोग, भोग,

ईर्ष्या, मत्सर, पाखंड, षड्यंत्र,

मैं…मेरा, तू… तेरा के

सारे सूखे के बीच,

नेह का कोई निर्झर होता है,

जीवन को हरा किए होता है,

नेह जीवन का सोना खरा है,

वरना, मर जाने के लिए

पैदा होने में  क्या धरा है..!

अमृत-पान करना है तो महासागर की शरण में जाना ही होगा। यह महासागर हरेक के भीतर है। हरेक के भीतर चौदह रत्न हैं।… और विशेष बात यह कि हरेक को अपना समुद्र स्वयं ही मथना होता है।

मंथन आरंभ करो, संभावनाओं का पूरा महासागर प्रतीक्षा में है।

© संजय भारद्वाज 

अक्षय तृतीया, प्रातः 6:35 बजे, 30 अप्रैल 2025

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

💥 12 अप्रैल 2025 से 19 मई 2025 तक श्री महावीर साधना सम्पन्न होगी 💥  

🕉️ प्रतिदिन हनुमान चालीसा एवं संकटमोचन हनुमन्नाष्टक का कम से एक पाठ अवश्य करें, आत्मपरिष्कार एवं ध्यानसाधना तो साथ चलेंगे ही 🕉️

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों  को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

≈ संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # 678 ⇒ सामूहिक इच्छा शक्ति ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए साप्ताहिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “सामूहिक इच्छा शक्ति…“।)

?अभी अभी # 678 ⇒ सामूहिक इच्छा शक्ति ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

[ COLLECTIVE WILL ]

अगर इंसान में प्रबल इच्छा शक्ति हो तो वह अपनी इच्छाओं को दबा भी सकता है, और अगर वह अपनी इच्छाओं का गुलाम बनता चला गया, तो उसकी शक्तियां भी क्षीण होती चली जाती है। जहां चाह है, वहां राह है, यहां चाह से मतलब किसी की पसंद, रुचि अथवा wish से नहीं है, यह वही दृढ़ इच्छा शक्ति है जिसे अंग्रेजी में will कहा गया है। Where there is a will, there is a way. लोग भी कम नहीं, वे वसीयत में भी रास्ते ढूंढ निकालते हैं।।

मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। वह चाहता है, उसका एक घर हो, उसका एक परिवार हो। केवल घर परिवार से ही उसका काम नहीं चलता, उसे अच्छा पास पड़ोस भी चाहिए और आसपास का वातावरण भी शुद्ध चाहिए। वह चाहता है, वह चार लोगों के बीच उठे बैठे, हंसे बोले। बस यहीं से उसे अपने साथ, अपने परिवार के साथ अपने पास पड़ोस, मोहल्ले वाले, कुनबे वाले और पूरे देश के रहने वालों के प्रति मन में रुचि और रुझान पैदा हो जाता है। किसी भी अच्छी खबर से वह प्रसन्न होता है और बुरी खबर से उसका मन खिन्न हो जाता हैं। समय के साथ रिश्ते मजबूत होते हैं और एक दूसरे के लिए अपनेपन की भावना जागृत हो जाती है।।

इंसान में अगर भावना है तो संवेदना भी है। वह अच्छी और बुरी दोनों आदतों का पुतला है। परिवार ही उसकी प्रेम की पाठशाला भी है और अच्छी और बुरी संगति का उस पर समान असर पड़ता है। एक तरफ वह परस्पर सहयोग का पाठ सीखता है तो दूसरी ओर स्वार्थ और मतलब उसमें राग द्वेष और प्रतिस्पर्धा के बीज बो देते हैं। इन्हीं गुण अवगुणों के बीच ही तो एक समाज और देश का निर्माण होता है।

एकता में बल है ! बच्चों के सामने यह उदाहरण अक्सर एक कहानी के रूप में इस तरह पेश किया जाता है ;

एक बहेलिया था, जो पक्षियों को शिकार करने के लिए जाल बिछाया करता था। किसी जगह अन्न के दाने डालकर पहले वह उन पक्षियों को ललचाता था, और फिर उन पर जाल डालकर उन्हें पकड़ लेता था। लेकिन एक बार उसकी युक्ति काम नहीं आई। पक्षी जाल में फंस तो गए, लेकिन एक समझदार पक्षी ने बुद्धिमानी से काम लिया। उसने सभी पक्षियों को जोर लगाकर जाल सहित उड़ने की सलाह दी। सभी पक्षियों ने जोर लगाया और जाल सहित आसमान में उड़ पड़े। बाद में किसी सुरक्षित स्थान पर जाकर अपनी चोंच से जाल काटकर अपने आपको मुक्त कर लिया।

गुलामी की जंजीर भी एक ऐसा ही मायाजाल है, जिसके बंधन से मुक्त होना किसी एक व्यक्ति का करिश्मा नहीं हो सकता। किसी का विचार, किसी की राय, किसी का त्याग, किसी का शुभ संकल्प, कब एक सामूहिक संकल्प बन जाता है, एक आव्हान होता है और सामूहिक संकल्प और इच्छा शक्ति से गुलामी की बेड़ियां हमेशा के लिए टूट जाती हैं। कितने पक्षियों ने बहेलिये के जाल में फंसकर अपने प्राण गवाएं होंगे। पक्षियों की क्रांति का कोई इतिहास नहीं होता। लेकिन एक पक्षी आपको प्रेरणा तो दे ही सकता है। उसकी आहुति आपके मन में उत्साह और उमंग की आग तो पैदा कर ही सकती है। हमने भी अगर अपनी सामूहिक इच्छा शक्ति को पहचाना तो हम क्या नहीं कर सकते।।

कहने को आज हम आजाद हैं लेकिन अगर हमारी इच्छाएं और इरादे नेक नहीं हुए और उन्हें पूरा करने के लिए हम एकजुट नहीं हुए तो हमारी इच्छा सदिच्छा नहीं बन पाएंगी। आपसी मनमुटाव, असहमति और राजनीतिक उठापटक के जंजाल से हमें कौन मुक्ति दिलाएगा।

जब तक हमारी शक्ति और युक्ति बंटी हुई है, तब तक हम अपनी ही इच्छाओं के जाल में उलझे हुए हैं। कौन बहेलिया हमें बहला रहा है, फुसला रहा है, हमें पता ही नहीं है। हम आने वाले खतरे से अनजान, चुपचाप आराम से अपना दाना चुग रहे हैं। आपकी सामूहिक इच्छा शक्ति बार बार आपका आव्हान कर रही है;

कौन किसी को बांध सका

सय्याद तो एक दीवाना है।

तोड़ के पिंजरा,

एक न एक दिन

पंछी को उड़ जाना है।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # 677 ⇒ विचार और अभिव्यक्ति ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए साप्ताहिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “विचार और अभिव्यक्ति…“।)

?अभी अभी # 677 ⇒ विचार और अभिव्यक्ति ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

(Thought & expression)

क्या आपने thought of ocean (थॉट ऑफ़ ओशन) यानी विचारों के समुद्र के बारे में सुना है।

विचार हम उसे मानते हैं, जो प्रकट हो। यानी हम व्यक्त को ही विचार मानते हैं। फिर उस विचार का क्या, जो हमारे मन में पैदा तो होता है, लेकिन वह व्यक्त नहीं हो पाता। हमारी अभिव्यक्ति की विधा आज भी बोलने, लिखने और रिकॉर्ड करने तक ही सीमित है। वैसे दिव्यांग मूक बधिरों तक के लिए बिना बोले भी सांकेतिक भाषा विकसित हो चुकी है, दृष्टिबाधित के लिए ब्रेल और द्रुत गति से लिखने के लिए पिटमैन की शॉर्ट हैंड लिपि भी मौजूद है। आप लिखें और आप ही बांचे।

मन और बुद्धि जब मिल बैठते हैं, तो विचारों का जन्म होता है। श्रुति, स्मृति और संचित संस्कार हमारे अंदर एक थिंक टैंक का निर्माण करते हैं। लेकिन असल में शून्य के महासागर में कई विचार मछली की तरह तैरते रहते हैं। करिए, कितना शिकार करना है विचारों का। ।

मन का काम संकल्प विकल्प करना है। जो भी दृश्य आंखों के सामने आता है, वह मन में विचारों को जन्म देता है। विचार, विचार होते हैं, अच्छे बुरे नहीं होते। अगर बुरा विचार आपने मन में रख लिया, तो कोई हर्ज नहीं।

अच्छे विचार ही तो आपको एक अच्छा इंसान बनाते हैं। कौन आपके मन में झांकने बैठा है।

दुनिया में पूरा खेल व्यक्त विचारों का ही तो है। अगर बुरे विचार तो बुरा आदमी, और अच्छे विचार तो अच्छा आदमी। इसीलिए दास कबीर भी कह गए हैं ;

ऐसी वाणी बोलिए

मन का आपा खोए,

औरन को शीतल करे, आपहुं शीतल होए.

यानी बात मन, वचन और कर्म पर आ गई। अब अगर हमारे अंदर काम, क्रोध, लोभ और मोह के संस्कार हैं तो हम क्या करें, अपने मुंह पर ताला लगा लें। बस छान छानकर अच्छे विचारों को बाहर निकालो और बुरे विचारों को डस्टबिन में डाल दो।

आजकल तो कचरा भी री – साइकल हो रहा है, घूरे से सोना बनाया जा रहा है, लेकिन बेचारे बुरे विचार यहां से वहां तक रोते फिर रहे हैं, कोई घास नहीं डाल रहा। सबको अच्छे विचारों की तलाश है। ट्रक के ट्रक भरकर अच्छे विचार लाए जा रहे हैं और उनसे मोटिवेशनल स्पीच तैयार हो रही है। कितनी डिमांड है आजकल अच्छे विचारों की।।

एक गंदी मछली की तरह ही एक बुरा विचार पूरे समाज में गंदगी फैलाता है। अच्छे विचारों की खेती के लिए ही तो हम कीचड़ में कमल खिलाते हैं। जब बुद्धि, ज्ञान और विवेक काम नहीं करते, तो आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का सहारा लेते हैं। स्वच्छ भारत का संकल्प जितना आसान है उतना ही मुश्किल है, अच्छे विचारों के भारत का संकल्प।

काश हमारे मन में ऐसा कोई प्युरिफायर होता जो हमारे विचारों को फिल्टर कर देता, अच्छे विचार थिंक टैंक में, बुरे विचार नाली में। हो सकता है, संतों के पास कोई ऐसी फिटकरी हो, जिसके डालते ही, विचारों की गंदगी नीचे बैठ जाती हो, और चित्त पूरा साफ हो जाता है। जहां मन में मैल नहीं, वहां तो बस पूरा तालमेल ही है। हमारे आपके विचार आपस में कितने मिलते हैं।।

हैं न..!!

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य #275 ☆ शब्द-शब्द साधना… ☆ डॉ. मुक्ता ☆

डॉ. मुक्ता

(डा. मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य” के माध्यम से  हम  आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी की मानवीय जीवन पर आधारित एक विचारणीय आलेख शब्द-शब्द साधना। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की  लेखनी को  इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें।) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य  # 275 ☆

☆ शब्द-शब्द साधना… ☆

‘शब्द शब्द में ब्रह्म है/ शब्द शब्द में सार। शब्द सदा ऐसे कहो/ जिन से उपजे प्यार।’ वास्तव में शब्द ही ब्रह्म है और शब्द में ही निहित है जीवन का संदेश…इसलिए सदा ऐसे शब्दों का प्रयोग कीजिए, जिससे प्रेम भाव प्रकट हो। कबीरदास जी का यह दोहा ‘ऐसी बानी बोलिए/ मनवा शीतल होय। औरहुं को शीतल करे/ ख़ुद भी शीतल होय’ …उपरोक्त भाव की पुष्टि करता है। हमारे कटु वचन दिलों की दूरियों को इतना बढ़ा देते हैं; जिसे पाटना कठिन हो जाता है। इसलिए सदैव मधुर शब्दों का प्रयोग कीजिए, क्योंकि ‘शब्द से खुशी/ शब्द से ग़म। शब्द से पीड़ा/ शब्द ही मरहम’ शब्द में निहित हैं ख़ुशी व ग़म के भाव– परंतु उनका चुनाव आपकी सोच पर निर्भर करता है।

वास्तव में शब्दों में इतना सामर्थ्य है कि जहाँ वे मानव को असीम आनंद व अलौकिक प्रसन्नता प्रदान कर सकते हैं; वहीं ग़मों के सागर में डुबो भी सकते हैं। दूसरे शब्दों में शब्द पीड़ा है और शब्द ही मरहम है। शब्द मानव के रिसते ज़ख्मों पर कारग़र दवा का काम भी करते हैं। यह आप पर निर्भर करता है कि आप किस मन:स्थिति में किन शब्दों का प्रयोग किस अंदाज़ से करते हैं।

‘हीरा परखै जौहरी/ शब्द ही परखै साध। कबीर परखै साध को/ ताको मतो अगाध’ हर व्यक्ति अपनी आवश्यकता व उपयोगिता के अनुसार इनका प्रयोग करता है। जौहरी हीरे को परख कर संतोष पाता है, तो साधु शब्दों व सत्य वचनों अर्थात् सत्संग को ही महत्व प्रदान करता है और आनंद प्राप्त करता है। वह उनके संदेशों को जीवन में धारण कर सुख व संतोष प्राप्त करता है; स्वयं को भाग्यशाली समझता है। परंतु कबीरदास जी उस साधु को परखते हैं कि उसके भावों व विचारों में कितनी गहनता व सार्थकता है; उसकी सोच कैसी है और वह जिस राह पर लोगों को चलने का संदेश देता है; वह उचित है या नहीं? वास्तव में संत वह है; जिसकी इच्छाओं का अंत हो गया है और उसकी श्रद्धा को आप विभक्त नहीं कर सकते; उसे सत्मार्ग पर चलने से नहीं रोक सकते–वही श्रद्धेय है, पूजनीय है। वास्तव में साधना करने व ब्रह्मचर्य को पालन करने वाला ही साधु है, जो सीधे व सपाट मार्ग का अनुसरण करता है। इसके लिए आवश्यकता है कि जब हम अकेले हों, तो अपनी भावनाओं पर अंकुश लगाएं अर्थात् कुत्सित भावनाओं व विचारों को अपने मनोमस्तिष्क में दस्तक न देने दें। अहं व क्रोध पर नियंत्रण रखें, क्योंकि ये दोनों मानव के अजात शत्रु हैं, जिसके लिए अपनी कामनाओं-तृष्णाओं को नियंत्रित करना आवश्यक है।

अहं अर्थात् सर्वश्रेष्ठता का भाव मानव को सबसे दूर कर देता है, तो क्रोध सामने वाले को तो हानि पहुंचाता ही है; वहीं अपने लिए भी अनिष्टकारी सिद्ध होता है। अहंनिष्ठ व क्रोधी व्यक्ति आवेश में न जाने क्या-क्या कह जाता है; जिसके लिए उसे बाद में प्रायश्चित करना पड़ता है। परंतु ‘अब पछताए होत क्या, जब चिड़िया चुग गई खेत’ अर्थात् समय गुज़र जाने के पश्चात् हाथ मलने अर्थात् पछताने का कोई औचित्य अथवा सार्थकता नहीं रहती। प्रायश्चित करना हमें सुख व संतोष प्रदान करने की सामर्थ्य तो रखता है, ‘परंतु गया वक्त कभी लौटकर नहीं आता।’ शारीरिक घाव तो समय के साथ भर जाते हैं, परंतु शब्दों के ज़ख्म कभी नहीं भरते; वे तो नासूर बन आजीवन रिसते रहते हैं। परंतु कटु वचन जहाँ मानव को पीड़ा प्रदान करते हैं; वहीं सहानुभूति व क्षमा-याचना के दो शब्द बोलकर आप उन पर मरहम भी लगा सकते हैं। शायद! इसीलिए कहा गया है गरीब से गरीब व्यक्ति भी अपनी मधुर वाणी द्वारा दूसरे के दु:खों को दूर करने का सामर्थ्य रखता है। आपका दु:खी व आपदाग्रस्त व्यक्ति को ‘मैं हूं ना’ कह देना ही उसमें आत्मविश्वास जाग्रत करता है और वह स्वयं को अकेला व असहाय अनुभव नहीं करता। उसे ऐसा लगता है कि आप सदैव उसकी ढाल बनकर उसके साथ खड़े हैं।

एकांत में व्यक्ति के लिए अपने दूषित मनोभावों पर नियंत्रण करना आवश्यक है तथा सबके बीच अर्थात् समाज में रहते हुए शब्दों की साधना करना भी अनिवार्य है… सोच- समझकर बोलने की सार्थकता से आप मुख नहीं मोड़ सकते। इसलिए कहा जा सकता है कि यदि आपको दूसरे व्यक्ति को उसकी ग़लती का एहसास दिलाना है, तो उससे एकांत में बात करो, क्योंकि सबके बीच में कही गई बात बवाल खड़ा कर देती है। अक्सर उस स्थिति में दोनों के अहं का टकराव होता है। अहं से संघर्ष का जन्म होता है और उस स्थिति में वह दूसरे के प्राण लेने पर उतारु हो जाता है। गुस्सा चाण्डाल होता है… बड़े-बड़े ऋषि मुनियों के उदाहरण आपके समक्ष हैं। परशुराम का क्रोध में अपनी माता का वध करना व ऋषि गौतम का अहिल्या का श्राप देना आदि हमें संदेश देता है कि व्यक्ति को बोलने से पहले सोचना अर्थात् तोलना चाहिए। उस विषम परिस्थिति में कटु व अनर्गल शब्दों का प्रयोग नहीं करना चाहिए और दूसरों से वैसा व्यवहार करना चाहिए; जिसे सहन करने की क्षमता आप में है। सो! आवश्यकता है, हृदय की शुद्धता व मन की स्पष्टता की अर्थात् आप अपने मन में किसी के प्रति ईर्ष्या, दुर्भावना व दुष्भावनाएं मत रखिए, बल्कि बोलने से पहले उसके औचित्य-अनौचित्य का चिन्तन-मनन कीजिए। दूसरे शब्दों में किसी के कहने पर उसके प्रति अपनी धारणा मत बनाइए अर्थात् कानों-सुनी बात पर विश्वास मत कीजिए, क्योंकि विवाह के सारे गीत सत्य नहीं होते। कानों-सुनी बात पर विश्वास करने वाले लोग सदैव धोखा खाते हैं और उनका पतन अवश्यंभावी होता है। कोई भी उनके साथ रहना पसंद नहीं करता। बिना सोच-विचार के किए गए कर्म केवल आपको ही हानि नहीं पहुंचाते; परिवार, समाज व देश के लिए भी विध्वंसकारी होते हैं।

सो! दोस्त, रास्ता, किताब व सोच यदि ग़लत हों, तो गुमराह कर देते हैं; यदि ठीक हों, तो जीवन सफल हो जाता है। उपरोक्त उक्ति हमें आग़ाह करती है कि सदैव अच्छे लोगों की संगति करें, क्योंकि सच्चा मित्र आपका सहायक, निदेशक व गुरु होता है; जो आपको कभी पथ-विचलित नहीं होने देता। वह आपको ग़लत मार्ग व ग़लत दिशा की ओर जाने पर सचेत करता है तथा आपकी उन्नति को देख कर प्रसन्न होता है; आप को उत्साहित करता है। पुस्तकें मानव की सबसे अच्छी मित्र होती हैं। इसलिए कहा गया है कि ‘बुरी संगति से इंसान अकेला भला’और एकांत में अच्छे मित्र के साथ न होने की स्थिति में सद्ग्रथों व अच्छी पुस्तकों का सान्निध्य हमारा यथोचित मार्गदर्शन करता है।

हाँ! सबसे बड़ी है मानव की सोच अर्थात् जो मानव सोचता है, वही उसके चेहरे के भावों से परिलक्षित होता है और व्यवहार उसके कार्यों में झलकता है। इसलिए अपने हृदय में दैवीय गुणों स्नेह, सौहार्द, त्याग, करुणा, सहानुभूति आदि  को पल्लवित होने दीजिए… ईर्ष्या-द्वेष व स्व-पर की भावना को दूर से सलाम कीजिए, क्योंकि सत्य की राह का अनुसरण करने वाले की राह में अनगिनत बाधाएं आती हैं। परंतु यदि वह उन असामान्य परिस्थितियों में अपना धैर्य नहीं खोता; दु:खी नहीं होता, बल्कि उससे सीख लेता है तो वह अपनी मंज़िल को प्राप्त कर अपने भविष्य को सुखमय बनाता है। वह सदैव शांत भाव में रहता है, क्योंकि ‘सुख- दु:ख तो अतिथि हैं’…’जो आया है, अवश्य जाएगा’ को अपना मूल-मंत्र स्वीकार संतोष से अपना जीवन बसर करता है। सो! आने वाले की खुशी व जाने वाले का ग़म क्यों? इंसान को हर स्थिति में सम रहना चाहिए, ताकि दु:ख आपको विचलित न करें और सुख आपके सत्मार्ग पर चलने में बाधा उपस्थित न करें अर्थात् आपको ग़लत राह का अनुसरण न करने दें। वास्तव में पैसा व पद-प्रतिष्ठा मानव को अहंवादी बना देते हैं और उससे उपजा सर्वश्रेष्ठता का भाव अमानुष। वह निपट स्वार्थी हो जाता है और केवल अपनी सुख-सुविधाओं के बारे में सोचता है। इसलिए ऐसा स्थान यश व लक्ष्मी को रास नहीं आता और वे वहां से रुख़्सत हो जाते हैं।

सो! जहां सत्य है; वहां धर्म है, यश है और वहीं लक्ष्मी निवास करती है। जहां शांति है; सौहार्द व सद्भाव है; मधुर व्यवहार व समर्पण भाव है और वहां कलह, अशांति, ईर्ष्या-द्वेष आदि प्रवेश पाने का साहस नहीं जुटा सकते। इसलिए मानव को कभी भी झूठ का आश्रय नहीं लेना चाहिए, क्योंकि वह सब बुराइयों की जड़ है। मधुर व्यवहार द्वारा आप करोड़ों दिलों पर राज्य कर सकते हैं…सबके प्रिय बन सकते हैं। लोग आपके साथ रहने व आपका अनुसरण करने में स्वयं को गौरवशाली व भाग्यशाली समझते हैं। सो! शब्द ब्रह्म है; उसकी सार्थकता को स्वीकार कर जीवन में धारण करें और सबके प्रिय बनें, क्योंकि हमारी सोच, हमारे बोल व हमारे कर्म ही हमारे भाग्य-निर्माता हैं और हमारी ज़िंदगी के प्रणेता हैं।

●●●●

© डा. मुक्ता

माननीय राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत, पूर्व निदेशक, हरियाणा साहित्य अकादमी

संपर्क – #239,सेक्टर-45, गुरुग्राम-122003 ईमेल: drmukta51@gmail.com, मो• न•…8588801878

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # 676 ⇒ आप मुझे अच्छे लगने लगे ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए साप्ताहिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “आप मुझे अच्छे लगने लगे…“।)

?अभी अभी # 676 ⇒ आप मुझे अच्छे लगने लगे ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

जब हम अच्छे होते हैं, हमें अपने आसपास सब कुछ अच्छा अच्छा ही लगता है। हम सब, स्वभावतः होते तो अच्छे ही हैं, लेकिन कभी कभी हमें सब कुछ अच्छा नजर नहीं आता। हमारे मन की अवस्था के अनुसार हमारा स्वभाव बनता, बिगड़ता रहता है।

समय और परिस्थिति भी तो कहां हमेशा एक समान होती है।

जब मन चंगा होता है, तो गंगा नहाने का मन करता है। एकाएक सब कुछ अच्छा नजर आने लगता है। शायद फील गुड फैक्टर को ही अच्छा लगना कहते होंगे। मन की ऐसी उन्मुक्त अवस्था में, कोई व्यक्ति विशेष हमें अधिक पसंद आने लगता है, और हम अनायास ही कह उठते हैं, आप मुझे अच्छे लगने लगे। ।

कभी कभी आत्ममुग्ध अवस्था में हम भी अपने प्रियजनों से प्रश्न कर लिया करते हैं, मैं कैसा/कैसी लग रहा/लग रही हूं। मां बेटे से, बेटी मां से, पत्नी पति से, और एक सहेली दूसरी सहेली से, अक्सर यही तो प्रश्न करती रहती है। अगर वह अच्छा दिखेगा तो किसी को अच्छा लगेगा भी। तारीफ करना और सुनना किसे पसंद नहीं।

अगर आप किसी को अच्छे लग रहे हैं, तो अवश्य आपमें कुछ विशेष आकर्षण होगा। हमें भी यूं ही तो कोई नहीं भा जाता। अगर हम निश्छल और अलौकिक प्रेम की बात करें, तो अच्छा लगना एक ईश्वरीय अनुभूति है। मोहिनी मूरत, सांवली सूरत किसे पसंद नहीं। जहां सलोनापन, सादगी और भोलापन है, वहां शब्दाडंबर नहीं होता, अतिशयोक्ति नहीं होती, कोई अलंकार, रूपक, उपमा नहीं, बस मन से यही उद्गार प्रकट होते हैं, आप मुझे अच्छे लगने लगे। ।

ऐसी अनुभूति के क्षण हम सबके जीवन में आते रहते हैं। अगर हमारे चित्त परस्पर शुद्ध हों, तो शायद यह अनुभूति और अधिक व्यापक रूप से हम सभी के हृदय में जगह बना ले।

आज का हमारा जीवन इतना जटिल हो चुका है कि अच्छे और बुरे का तो भेद ही समाप्त हो गया है।

क्या अच्छे दिन, अच्छे लोगों के साथ ही समाप्त हो गए हैं।

अचानक दरवाजे पर दस्तक होती है, पड़ोस की एक दो वर्ष की कन्या मुझे तलाशती हुई कमरे में प्रवेश करती है। मुझे मानो मेरे प्रश्न का समाधान मिल गया हो। वह बोलती नहीं, लेकिन इशारों इशारों में सब कुछ कह जाती है।

उस बच्ची की आँखें मुझे देख मानो कह रही हैं, आप मुझे अच्छे लगने लगे। और मेरा भी उसको यही जवाब है, आप भी मुझे अच्छे लगने लगे। मैं यह भली भांति जानता हूं, मुझसे अच्छे इस दुनिया में कई लोग होंगे, लेकिन उस प्यारी दो वर्ष की कन्या जैसा अच्छा कोई हो ही नहीं सकता।

तुमसे अच्छा कौन है ?

आप मुझे अच्छे लगने लगे।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक साहित्य # 349 ☆ आलेख – “सेना और सरकार ही नहीं, नागरिक सहयोग से ही संभव है आतंक का मुकाबला…” ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # 349 ☆

?  आलेख – सेना और सरकार ही नहीं, नागरिक सहयोग से ही संभव है आतंक का मुकाबला…  ? श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

भारत ने हाल ही में पाकिस्तान स्थित आतंकी ठिकानों पर ऑपरेशन सिंदूर के तहत सटीक मिसाइल हमलों से पकिस्तान के कश्मीर में किए आतंक का सटीक बदला लिया। यह कार्रवाई न केवल भारतीय सेना की सैन्य कुशलता का प्रतीक है, बल्कि आतंकवाद के खिलाफ देश की स्पष्ट नीति को भी दर्शाती है। प्रगट रूप से यह ऑपरेशन एक सैन्य कार्यवाही है। किंतु आतंक के विरुद्ध इस तरह के आपरेशन सफल तभी होते हैं जब सेना, सरकार और नागरिकों के बीच समन्वय का एक सशक्त ढाँचा मौजूद हो। आतंकवाद से लड़ाई केवल बंदूकों और मिसाइलों से नहीं, बल्कि जनता की सजगता, सहयोग और राष्ट्रभक्ति से भी जीती जाती है।

 सीमाओं का कवच

भारतीय सेना है। जिसने ऑपरेशन सिंदूर जैसे अभियानों के माध्यम से यह साबित किया है कि वह भारत पर किसी आक्रमण या आतंकी घटनाओं का मुंहतोड़ जवाब देने में सक्षम है। सेना की यह ताकत केवल हथियारों की ताकत नहीं, बल्कि उच्चस्तरीय रणनीति, खुफिया जानकारी और साहस का परिणाम है। सेना के जवान सीमाओं पर दिन-रात तैनात रहकर देश की सुरक्षा सुनिश्चित करते हैं। 2016 के सर्जिकल स्ट्राइक और 2019 के बालाकोट एयरस्ट्राइक जैसे ऑपरेशन इसके उदाहरण हैं, जिन्होंने आतंकवाद के प्रति भारत की ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति को रेखांकित किया। ऑपरेशन सिंदूर देश की उसी नीति का हिस्सा है। नीति निर्माण से लेकर वैश्विक कूटनीति और सेना को छूट देना

सरकार का दायित्व है। सेना को राजनीतिक और तकनीकी समर्थन जनता की ताकत और एकजुटता ही प्रदान करती है। ऑपरेशन सिंदूर जैसे मिशन के पीछे सरकार की मंशा, अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पाकिस्तान को अलग-थलग करने की कोशिशें और आतंकवाद के खिलाफ वैश्विक गठजोड़ बनाने की रणनीति महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

नागरिक सहयोग सुरक्षा का तीसरा स्तंभ है।

यदि सेना और सरकार देश की रीढ़ हैं, तो नागरिक उसकी आत्मा। आतंकवाद से लड़ाई में नागरिकों की भूमिका कई स्तरों पर महत्वपूर्ण है। सूचना और खुफिया सहयोग स्थानीय निवासी ही दे सकते हैं। सूक्ष्म निरीक्षण तथा सतर्क रहने से आतंकियों की गतिविधियों के बारे में नागरिकों को जमीनी जानकारी हो सकती है। उदाहरण के लिए, जम्मू-कश्मीर में कई बार ग्रामीणों ने सुरक्षा बलों को आतंकवादियों के ठिकानों की जानकारी देकर बड़ी घटनाओं को रोका है। ‘आवाम की आवाज’ जैसे अभियान इसी सहयोग को बढ़ावा देते हैं।

सामाजिक जागरूकता और एकता आतंकवाद की सबसे बड़ी हार है। 2008 के मुंबई हमले के बाद देशभर में एकजुटता का जो स्वर उभरा, उसने आतंकवादियों के मनोबल को तोडा। नागरिकों का यही साहस आतंकवाद को विफल बनाता है।

बदलते परिवेश में तकनीकी और डिजिटल सतर्कता, सोशल मीडिया पर सतर्कता बरतने की जरूरत है। आतंकी समूहों का प्रचार-प्रसार रोकने में नागरिकों की भूमिका अहम है। झूठी खबरों को रिपोर्ट करना, युवाओं को कट्टरपंथी विचारों से बचाने के लिए जागरूकता फैलाना, और साइबर स्पेस में सक्रिय रहना—ये सभी आधुनिक समय की आवश्यकताएँ हैं।

केरल जैसे राज्यों में मुस्लिम समुदाय के नेताओं ने आतंकवाद के खिलाफ फतवा जारी किया। ऐसी पहलें समाज के अंदर से ही आतंकवाद की विचारधारा को चुनौती देती हैं।

भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में आतंकवाद से लड़ना सबके सम्मिलित प्रयासों से ही संभव है। पाकिस्तान द्वारा प्रायोजित आतंकवाद, उनके आंतरिक असंतोष का प्रभाव है। सीमा पार से होने वाली घुसपैठ जैसी समस्याएँ जटिल हैं। इनका समाधान तभी संभव है जब नागरिक सुरक्षा एजेंसियों के साथ मिलकर काम करें। उदाहरण के लिए, ‘मेरी चौकी, मेरी सुरक्षा’ जैसे कार्यक्रमों के तहत सीमावर्ती गाँवों के लोगों सदा सजग रहने को प्रशिक्षित किया जा सकता है।

ऑपरेशन सिंदूर की सफलता इस बात का प्रमाण है कि भारत आतंकवाद के प्रति नरम नहीं रहेगा। लेकिन दीर्घकालिक जीत के लिए सेना, सरकार और नागरिकों को एक टीम की तरह लगातार काम करना होगा। जब कोई बच्चा स्कूल में देशभक्ति की कविता सुनाता है, कोई युवा सोशल मीडिया पर सच्चाई फैलाता है, या कोई ग्रामीण संदिग्ध गतिविधि की रिपोर्ट करता है—तभी आतंकवाद की जड़ें कमजोर होती हैं। आतंक का बदला केवल मिसाइलों से नहीं, बल्कि हर नागरिक के संकल्प से लिया जा सकता है। सभी धर्मों के नागरिकों की यही समग्रता भारत की सच्ची ताकत भी है। सेना और सरकार ही नहीं, आतंक का मुकाबला नागरिक सहयोग से ही संभव है।

☆

© श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

म प्र साहित्य अकादमी से सम्मानित वरिष्ठ व्यंग्यकार

संपर्क – ए 233, ओल्ड मिनाल रेजीडेंसी भोपाल 462023

मोब 7000375798, ईमेल apniabhivyakti@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # 243 ☆ संकल्प का प्रकल्प… ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ ☆

श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की  प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं  में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना “संकल्प का प्रकल्प…”। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  – आलेख  # 243 ☆ संकल्प का प्रकल्प… ☆

कहते हैं अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता किंतु  अंकुरित होकर, पौध बनकर पुनः नवसृजन का चक्र चलाते हुए अनगिनत चने उत्पन्न कर सकता है। जहाँ एकता में बल होता है वहीं एक व्यक्ति भी संकल्प शक्ति के बल पर कुछ भी कर सकता है। अतः किसी भी हाल में निराश होने की आवश्यकता नहीं होती है। आपको पूरी हिम्मत के साथ लक्ष्य के प्रति सजग होना चाहिए तभी मंजिल आ कदम चूमेंगी और लोग आपके साथ होंगे।

आइए संकल्प लें-

गौरैया की देखभाल करेंगे

दाना पानी रख दिया, चहक- चहक कर बोल ।

आँगन गौरैया दिखी, मुस्काती मुँह खोल ।।

*

आहट पाते ही उड़े, गौरैया घर दूर।

फिर चुपके से आ चुगे, दाने सब भरपूर ।।

*

बना घोसला पेड़ पर, हरी भरी सी छाँव।

कलरव से जग गूँजता, चलो चलें हम गाँव ।।

*

खुशियों से जीवन भरा, रहे हमेशा आस ।

इनकी सेवा से बढ़े, जीवन में विश्वास ।।

*

©  श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

माँ नर्मदे नगर, म.न. -12, फेज- 1, बिलहरी, जबलपुर ( म. प्र.) 482020

मो. 7024285788, chhayasaxena2508@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # 675 ⇒ मस्तक ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए साप्ताहिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “मस्तक…“।)

?अभी अभी # 674 ⇒ मस्तक ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

सिर से पांव तक, अगर पूछा जाए, कि हमारे शरीर में, सबसे ऊंचा स्थान कौन सा है, तो शायद मस्तक ही कहलाएगा। मस्तक ऊंचा ही अच्छा लगता है, मस्तक झुका और इंसान झुका। मस्तक गर्व, गौरव, अभिमान और स्वाभिमान का सूचक है।

एक और प्यारा सा शब्द है, मुखमंडल, कुछ कुछ सुनने में कमंडल सा प्रतीत होता है। मुख कहां से शुरू होता है और कहां खत्म, किस मुंह से कहा जाए। मुख मस्तक, ओंठ, नासिका, शुभ्र दंत पंक्ति और गोरे गोरे गाल, तिस पर दो नैना मतवाले, हम पर जुलम करे। इसी चेहरे पर कहां भाल, ललाट, भौंह और भ्रू मध्य ! किसे माथा कहें, कहां निकालें मांग, कहीं टीका, तिलक, तो कहीं माथेरी बिंदी। बस यही सब तो है हमारे व्यक्तित्व का आभामंडल।।

मुंह, मुख, मुखड़ा, सूरत, और चेहरे के दायरे से क्या अलग है हमारा मस्तक !

जिसे हम मन मस्तिष्क कहते हैं, वह भी तो यहीं कहीं स्थित है। कुछ सोचने अथवा चिंतन की अवस्था में अनायास ही हमारा हाथ हमारे माथे पर चला जाता है। ज्ञान और विवेक का भंडार यह मस्तक, क्या भरोसा किसके आगे झुक जाए।

क्या मत्था, मस्तक से अलग है। कितना सुकून मिलता है, किसी पवित्र स्थान पर मत्था टेकने पर।

किसी के मस्तक अथवा सर पर हाथ रखने का क्या महत्व होता है, महिलाएं बिंदी, और पुरुष टीका, मस्तक के बीचों बीच क्यूं लगाते हैं, ऐसे प्रश्न कभी नहीं पूछे जाते, क्योंकि शायद सभी इसका महत्व जानते हैं, अथवा, बिना जाने ही मान बैठते हैं।।

हमारे मस्तक के ऊपर पहले हमारा ही सर अथवा खोपड़ी है, जिसके ऊपर भले ही सुंदर केश अथवा रेशमी जुल्फें हों, लेकिन अंदर भेजे में, न जाने क्या क्या भरा रहता है। ऊपर भले ही आकाश हो, चिदाकाश भी यहीं कहीं अवस्थित रहता है। क्या हमारा मन, मस्तिष्क अथवा बुद्धि ही हम पर शासन भी करती है, हमें नियंत्रित कर हम पर हुक्म चलाती है।

यह आज्ञा चक्र का क्या चक्कर है, कुछ समझ में नहीं आता।

कभी हम मस्त रहते हैं तो कभी तनावयुक्त ! मस्तक ऊंचा अगर आत्म विश्वास, विजय और गर्व का प्रतीक है तो झुका सर निराशा, पराजय और अवसाद की निशानी। हम अगर खड़े रहें तो पर्वतराज की तरह, किसी ठूंठ की तरह नहीं, और अगर झुकें तो किसी फलदार वृक्ष की भांति, किसी कमजोर अल्पमत वाली सरकार की तरह नहीं। हर व्यक्ति का मस्तकाभिषेक ज्ञान, बुद्धि, विवेक और वैराग्य से हो, स्वाभिमान हो तो सबके लिए मान सम्मान भी हो। अस्त व्यस्त से मस्त तक, सदा चमकता रहे हमारा मस्तक। हम नतमस्तक ..!!

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # 674 ⇒ अंतर्ज्ञान ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए साप्ताहिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “अंतर्ज्ञान…“।)

?अभी अभी # 674 ⇒ अंतर्ज्ञान ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

= INTUITION =

जानने की प्रक्रिया को ज्ञान कहते हैं। इसके लिए ईश्वर ने हमें एक नहीं पांच पांच ज्ञानेंद्रियां प्रदान की हैं। पांच ही कर्मेंद्रियों से मिल जुलकर इस मनुष्य का यह विलक्षण व्यक्तित्व बना है।

चेतन शक्ति, आप जिसे चाहें तो प्राण भी कह सकते हैं, हमारे पंच तत्वों से निर्मित शरीर में सततप्रवाहित होती रहती है।

हमारा उठना, बैठना, सोना, जागना, ऊंघना, हंसना, रोना, देखना, सुनना, बोलना, चखना, छूना जैसी सभी नियमित क्रियाएं मन मस्तिष्क द्वारा संचालित होती है। हमें लगता है, हम ही सब कुछ कर रहे हैं। जब कि सब कुछ अपने आप ही ही रहा है।

अगर आप ही कर्ता हैं, सब कुछ कर रहे हैं, तो रोक दीजिए सब कुछ। आँखें खुली रखिए और कुछ मत देखिए, मत सुनिए कुछ भी इन दोनों कानों से, सांस तो आप ही ले रहे हैं न। मत लिजिए एक दो दिन सांस, क्या बिगड़ जाएगा।

भूख प्यास का क्या है, रह लेंगे कुछ दिन भूखे प्यासे।

आते जाते विचारों पर भी पहरा बिठा दीजिए। अगर विचार अतिक्रमण करते हैं, तो उन पर बुलडोजर चला दीजिए।।

मन, बुद्धि और अहंकार भी आपका नहीं है। इसलिए अब मान भी जाइए, आपका अपना कुछ भी नहीं है। आपको इस पावन धरा पर उतारा गया है और आप अपने आप में एक सर्वगुण संपन्न, एक मानव हैं। A perfect human being creation of God, The Almighty!

मनुष्य जब पैदा होता है तो एक अबोध बालक होता है। शारीरिक विकास के साथ साथ ही उसका मानसिक विकास भी होता चला जाता है। सीखने की प्रवृत्ति उसकी जन्मजात ही होती है। परिवार और परिवेश के अलावा स्कूल वह स्थान होता है, जहां से वह सीखता है, ज्ञान अर्जित करता है। अनुशासित ज्ञान को अध्ययन कहते हैं। ज्ञान के स्तर को डिग्री में विभाजित किया गया है।

आप पढ़ते रहें, डिग्रियां हासिल करते रहें।

अध्ययन के लिए हमें ट्यूशन भी लेनी पड़ती है जो आज की भाषा में कोचिंग कहलाती है। सीखना एक सतत प्रक्रिया है जो अनुशासित डिग्रियां हासिल करने के पश्चात भी कभी खत्म नहीं होती। बाहरी ज्ञान की कोई सीमा नहीं। नौकरी धंधे और कामकाज में लग जाने के बाद कौन इंसान बाल भारती भाग १ और फिजिक्स केमिस्ट्री और बायोलॉजी पढ़ता है। अब काहे की पढ़ाई, काहे की ट्यूशन और काहे की परीक्षा। अब तो गाड़ी चल निकली।।

ट्यूशन अगर बाहरी ज्ञान है, तो इन्ट्यूशन अंतर्ज्ञान ! एक ज्ञान का भंडार हमारे अंदर भी है जिसका बाहरी ज्ञान से कोई संबंध नहीं होता। हम सोचते, समझते ही नहीं, चिंतन मनन भी करते हैं। हमारी कुछ आंतरिक प्रतिभाएं समय और परिस्थिति के साथ उभरकर बाहर आती हैं।

साहित्य, संगीत और अन्य ललित कलाओं को बस एक बार अवसर मिला और टूटे बांध की तरह वह प्रवाहित होने लगती है।

धुन, ध्यान और अंतर्ज्ञान को आप अलग नहीं कर सकते। बाहरी प्रकृति और हमारे अंदर की सृजन की प्रवृत्ति का जब मेल होता है तो एक महाकाव्य की रचना होती है। संगीत की कोई धुन किसी किताब अथवा साज से नहीं निकाली जाती, वह धुन अंदर से प्रकट होती है बाहर तो सिर्फ उसका स्वरूप ही दिखाई देता है।

टैगोर की गीतांजलि किसी शब्दकोश अथवा थिसारस या इनसाइक्लोपीडिया की उपज नहीं, यह कवि का अंतर्ज्ञान है जो सरिता की तरह सतत प्रवाहित होता रहता है।।

विश्व के अधिकांश वैज्ञानिक प्रयोग, खोज हों या अविष्कार, धुन, ध्यान और अंतर्ज्ञान का ही परिणाम हैं। कितनी विचित्र विधा है यह अंतर्ज्ञान ! ज्ञान पहले अंदर गया और बाद में कोई सिद्धांत बनकर बाहर निकला। एक चेतन मन तो है ही, एक अवचेतन मन भी है, जिसकी स्मृति के बारे में कुछ भी नहीं कहा जा सकता। चेतना के ऊपर पराचेतना का भी अस्तित्व है। अंतर्दृष्टि और अंतर्ज्ञान असीमित है।

एक गीत है, एक आवाज है, एक धुन है। हमें सिर्फ सुनाई देती है लेकिन उसका प्रभाव देखिए, आंख खोलकर नहीं, आंख बंद कर कर, कान खोलकर ;

मेरी आंखों में बस गया कोई रे, मैं क्या करूं …

क्या यह अतिक्रमण नहीं। रोक सकें तो रोकिए इसे। चलाइए बुलडोजर। यह धुन है, ध्यान है, अंतर्ज्ञान है। नमन उन अनंत विलक्षणप्रतिभाओं को जिनका प्रकाश सूर्य की तरह सदा, सर्वत्र दैदीप्यमान है।।

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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