ई-अभिव्यक्ति: संवाद ☆ एक संवाद ☆ हेमन्त बावनकर ☆

हेमन्त बावनकर

☆ ई-अभिव्यक्ति – एक संवाद ☆ हेमन्त बावनकर ☆

प्रिय मित्रो,

ई-अभिव्यक्ति के सभी प्रबुद्ध लेखकगण तथा पाठकगण के आत्मीय स्नेह के लिए हृदय से आभार।

अक्तूबर २०२६ में आपकी प्रिय वैबसाइट ने सफलवर्ष पूर्ण करने जा रही है एवं १५ अगस्त २०२६ को ई-अभिव्यक्ति (मराठी) अपने सफल ६ वर्ष पूर्ण करने जा रही है।  

इन पंक्तियों के लिखे जाते तक ३४,३००+ रचनाएँ प्रकाशित हो चुकी हैं एवं 802964 से अधिक विजिटर्स आपकी प्रिय वैबसाइट https://www.e-abhivyakti.com पर विजिट कर अपना आत्मीय स्नेह और प्रतिसाद दे चुके हैं.

हमें इस सूचना को आपसे साझा करते हुए अत्यंत गर्व का अनुभव हो रहा है कि ई-अभिव्यक्ति भारत का प्रथम प्रकाशन है जो विगत चार वर्षों से फ्लिपबुक फोर्मेट में हिंदी एवं मराठी भाषा में दीपावली विशेषांक का निःशुल्क प्रकाशन कर रहा है.    

श्री संजय भारद्वाज

ई-अभिव्यक्ति के प्रकाशन के प्रारंभिक दिनों से प्रतिदिन एक रचना के प्रकाशन में श्री संजय भरद्वाज जी का अविराम साहित्यिक सहयोग रहा है. उन्होंने कई मील के पत्थर पार कर लिए हैं. 

श्री प्रदीप शर्मा

इसी कड़ी में हमें आज श्री प्रदीप शर्मा जी के अविराम १००० आलेखों के अविराम प्रकाशित करने का सौभाग्य मिला है. श्री प्रदीप शर्मा जी विगत कई वर्षों से लगातार अपने फेसबुक पेज पर प्रतिदिन एक आलेख प्रातः  ६ बजे तक पोस्ट कर देते हैं, जो अपने आप में एक अकल्पनीय उपलब्धि है. इसके लिए उन्हें हार्दिक बधाई। माँ सरस्वती उनकी कलम को यह शक्ति अविराम रखे यही मंगलकामना। इस अवसर पर हम प्रिय मित्र स्मृतिशेष भाई जय प्रकाश पाण्डेय जी का भी स्मरण करते हैं जिन्होंने हमें श्री प्रदीप शर्मा जी से परिचय कराया था. 

हमारे सम्पादक मंडल ने अपने प्रबुद्ध लेखकगण एवं पाठकगण के सहयोग से साहित्य सेवा में अपना निःस्वार्थ योगदान देकर साहित्य को नए आयाम देने का प्रयास किया है. 

आप को आश्चर्य होगा कि हमारे संपादक मंडल के सदस्य वरिष्ठ नागरिकों / साहित्यकारों का एक छोटा सा समूह है, जो बिना किसी व्यावसायिक लाभ के अपनी अभिरुचि स्वरुप  स्वान्तः सुखाय उत्कृष्ट साहित्य प्रदान करने को तत्पर है. ई-अभिव्यक्ति नवोदित साहित्यकारों से लेकर सम्माननीय वरिष्ठ साहित्यकारों के साहित्य को एक सम्माननीय  मंच प्रदान करता है और ससम्मान प्रकाशित करने का प्रयास करता है.

उपरोक्त सभी उपलब्धियों से ई-अभिव्यक्ति परिवार गौरवान्वित अनुभव करता है। हम कामना करते हैं कि – आप सभी का अपूर्व आत्मीय स्नेह एवं प्रतिसाद इसी प्रकार हमें मिलता रहेगा। 

आपसे सस्नेह विनम्र अनुरोध है कि आप ई-अभिव्यक्ति में प्रकाशित साहित्य को आत्मसात करें एवं अपने मित्रों से सोशल मीडिया पर अवश्य साझा करें। 

आपके विचारों एवं सुझावों की हमें प्रतीक्षा रहेगी।

एक बार पुनः आप सभी का हृदय से आभार ।

सस्नेह

हेमन्त बावनकर

पुणे (महाराष्ट्र)   

२५ मई २०२६   

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’≈

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ई-अभिव्यक्ति – संवाद ☆ स्मृतिशेष डॉ. राजकुमार तिवारी ‘सुमित्र’ द्वितीय पुण्यतिथि पर विशेष ☆ हेमन्त बावनकर ☆

हेमन्त बावनकर

☆ ई-अभिव्यक्ति – संवाद ☆ स्मृतिशेष डॉ. राजकुमार तिवारी ‘सुमित्र’ द्वितीय पुण्यतिथि पर विशेष 💐 हेमन्त बावनकर ☆

दो वर्ष के बाद भी ऐसा नहीं लगता कि सुमित्र जी नहीं रहे। ऐसा लगता है कि उनसे कल ही तो बात हुई थी। किन्तु, मृत्यु तो अटल सत्य है जिसे अस्वीकार नहीं किया जा सकता। वे अपने स्वजनों को शारीरिक रूप से अवश्य छोड़ कर चले गए किन्तु, उनकी स्मृतियाँ सदैव उनकी पीढ़ी एवं वर्तमान पीढ़ी के मस्तिष्क में आजीवन रहेंगी।

सुमित्र जी से पहली मुलाक़ात मेरे स्व. पिताश्री टी डी बावनकर जी (सुमित्र जी के मित्र) के साथ 1982 की एक शाम को उनके निवास पर हुई। उसके बाद एक ऐसा संबंध बना जो आजीवन चलता रहेगा। उनके द्वारा प्रकाशित मेरी प्रथम कहानी “चुभता हुआ सत्य’ नवीन दुनिया के पाक्षिक तरंग के प्रवेशांक में प्रकाशित हुई थी। उनके पत्र एवं तरंग की प्रति मेरे पास अभी तक सुरक्षित है।

मेरी उपरोक्त स्मृति तो मात्र एक प्रतीकात्मक उदाहरण है, उनसे जुडने वाले अनेकों मित्रों का जिन्हें उन्होने आजीवन अपना आत्मीय स्नेह और मार्गदर्शन दिया है। ऐसी अनेक कहानियाँ और संस्मरण आपको संस्कारधानी के साहित्य जगत में ही नहीं अपितु सारे विश्व के कई मित्रों में मिलेगी।

ई-अभिव्यक्ति के प्रथम अंक के लिए उनके आशीष स्वरूप प्राप्त कविता उद्धृत कर रहा हूँ जो मुझे ई-अभिव्यक्ति के सम्पादन में सदैव सकारात्मक मार्गदर्शन देती रहती है, एक गुरुमंत्र की मानिंद।

☆ अभिव्यक्ति  ☆

संकेतों के सेतु पर

साधे काम तुरंत |

दीर्घवयी हो जयी हो

कर्मठ प्रिय हेमंत

काम तुम्हारा कठिन है

बहुत कठिन अभिव्यक्ति

बंद तिजोरी सा यहां

दिखता है हर व्यक्ति

मनोवृति हो निर्मला

प्रकटें निर्मल भाव

यदि शब्दों का असंयम

हो विपरीत प्रभाव ||

सजग नागरिक की तरह

जाहिर हो अभिव्यक्ति

सर्वोपरि है देशहित

बड़ा न कोई व्यक्ति|

डॉ राजकुमार तिवारी ‘सुमित्र’

स्थान – दिल्ली 15 /10/18

मित्र श्री संतोष नेमा जी ने ‘सुमित्र संस्मरण’ प्रकाशित किया है। जिसमें 60 से अधिक लोगों के संस्मरण प्रकाशित किए गए हैं। श्री नेमा जी के शब्दों में ही “साहित्य के गंभीर अध्येता, अद्भुत रचनात्मकता, माधुर्य व्यवहार के चलते उनके हजारों चाहने वाले हैं जिनके दिलों में राजकुमार की तरह राज करते हैं. इस बात से अंदाजा लगाया जा सकता है कि उनकी श्रद्धांजलि सभा में भीड़ में उपस्थित हर एक आदमी अपनी भावांजलि देने के लिए आतुर था. जब मैंने यह देखा तब उसी क्षण मेरे मन में यह विचार आया की क्यों ना एक सुमित्र संस्मरण का प्रकाशन किया जाए जिसमें उनके प्रति सभी साहित्यकारों के संस्मरण एवं भाव समाहित किए जा सकें.”

सुमित्र जी के अनेकों स्वजनो के अनेकों संस्मरण हैं जो आजीवन उनकी याद दिलाते रहेंगे। उनकी प्रथम पुण्यतिथि पर ई-अभिव्यक्ति द्वारा प्रकाशित विशेष संस्करण भी मात्र एक प्रतीक ही था. यह विशेष संस्करण अपने प्रबुद्ध पाठकों के लिए पुनः प्रस्तुत कर रहे हैं.  

 

हेमन्त बावनकर

पुणे 

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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ई-अभिव्यक्ति: संवाद ☆ एक संवाद ☆ हेमन्त बावनकर ☆

हेमन्त बावनकर

☆ ई-अभिव्यक्ति – एक संवाद ☆ हेमन्त बावनकर ☆

प्रिय मित्रो,

ई-अभिव्यक्ति के सभी प्रबुद्ध लेखकगण तथा पाठकगण के आत्मीय स्नेह के लिए हृदय से आभार।

अक्तूबर २०२५ में आपकी प्रिय वैबसाइट ने सफलवर्ष पूर्ण किये हैं एवं १५ अगस्त २०२५ को ई-अभिव्यक्ति (मराठी) ने अपने सफल ५ वर्ष पूर्ण कर लिए हैं।  

इन पंक्तियों के लिखे जाते तक ३१,२००+ रचनाएँ प्रकाशित हो चुकी हैं एवं  710958 से अधिक विजिटर्स आपकी प्रिय वैबसाइट https://www.e-abhivyakti.com पर विजिट कर अपना आत्मीय स्नेह और प्रतिसाद दे चुके हैं.

हमें इस सूचना को आपसे साझा करते हुए अत्यंत गर्व का अनुभव हो रहा है कि ई-अभिव्यक्ति भारत का प्रथम प्रकाशन है जो विगत चार वर्षों से फ्लिपबुक फोर्मेट में हिंदी एवं मराठी भाषा में दीपावली विशेषांक का निःशुल्क प्रकाशन कर रहा है.    

इस सम्पूर्ण यात्रा में हम लोग काफी उतार चढ़ाव से गुजरे. गत एक वर्ष में हमने आपने प्रिय मित्र स्मृतिशेष जय प्रकाश पाण्डेय जी के साथ ही गुरुवर डॉ राजकुमार तिवारी ‘सुमित्र’ और प्रो. चित्रभूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ जी को खोया है जिनकी स्मृतियाँ सदैव अविस्मृत रहेंगी.  

हमारे सम्पादक मंडल ने अपने प्रबुद्ध लेखकगण एवं पाठकगण के सहयोग से साहित्य सेवा में अपना निःस्वार्थ योगदान देकर साहित्य को नए आयाम देने का प्रयास किया है. 

आप को आश्चर्य होगा कि हमारे संपादक मंडल के सदस्य वरिष्ठ नागरिकों / साहित्यकारों का एक छोटा सा समूह है, जो बिना किसी व्यावसायिक लाभ के अपनी अभिरुचि स्वरुप  स्वान्तः सुखाय उत्कृष्ट साहित्य प्रदान करने को तत्पर है. ई-अभिव्यक्ति नवोदित साहित्यकारों से लेकर सम्माननीय वरिष्ठ साहित्यकारों के साहित्य को एक सम्माननीय  मंच प्रदान करता है और ससम्मान प्रकाशित करने का प्रयास करता है.

हमारे संपादक मंडल का प्रयास रहता है कि – अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को पूरा सम्मान देते हुए निर्विवादित साहित्य प्रस्तुत करें। हम रंग, धर्म, जाति और राजनीति से सम्बंधित विवादित साहित्य को कदापि प्रोत्साहित नहीं करते. यदि हमें कोई साहित्य मिलता है तो उसे हम ससम्मान प्रकाशित करते हैं। हाँ साहित्य की अधिकता में कुछ विलम्ब की संभावना हो सकती है. यदि आपका कोई साहित्य प्रकाशित नहीं होता है तो कृपया यह समझा जाए कि वह हमारे निर्धारित साहित्यिक मानदंडों के अंतर्गत नहीं आते और इस सन्दर्भ में आपका सादर सहयोग अपेक्षित है. साहित्य के चुनाव में संपादक मंडल का निर्णय अंतिम एवं मान्य होता  है. 

उपरोक्त सभी उपलब्धियों से ई-अभिव्यक्ति परिवार गौरवान्वित अनुभव करता है। हम कामना करते हैं कि – आप सभी का यह अपूर्व आत्मीय स्नेह एवं प्रतिसाद इसी प्रकार हमें मिलता रहेगा। 

आपसे सस्नेह विनम्र अनुरोध है कि आप ई-अभिव्यक्ति में प्रकाशित साहित्य को आत्मसात करें एवं अपने मित्रों से सोशल मीडिया पर साझा करें। 

आपके विचारों एवं सुझावों की हमें प्रतीक्षा रहेगी।

एक बार पुनः आप सभी का हृदय से आभार ।

सस्नेह

हेमन्त बावनकर

पुणे (महाराष्ट्र)   

१४ नवम्बर २०२५  

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’≈

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ई-अभिव्यक्ति: संवाद ☆ एक संवादी सहप्रवासएक संवादी सहप्रवास ☆ हेमन्त बावनकर ☆

हेमन्त बावनकर

☆ ई-अभिव्यक्ती : एक संवादी सहप्रवास ☆ हेमन्त बावनकर ☆

सस्नेह नमस्कार.

ई-अभिव्यक्ती : साहित्य मंचाचे सर्व सुजाण साहित्यिक आणि वाचक यांचे मी मनापासून आभार मानू इच्छितो.

ऑक्टोबर २०२५ मध्ये आपली ही आवडती वेबसाईट सुरु झाल्याला ७ वर्षं पूर्ण झाली आहेत, आणि ई-अभिव्यक्ती – मराठी विभागाने दि. १५ ऑगस्ट २०२५ रोजी ५ वर्षांचा यशस्वी टप्पा पार केला आहे, ही गोष्ट अतिशय आनंददायक आहे.

…. या मंचावरून आजपर्यंत ३१,२००  पेक्षाही जास्त संख्येने विविध प्रकारच्या साहित्य-रचना प्रकाशित केल्या गेल्या आहेत. आणि 710958  पेक्षाही जास्त संख्येने रसिकांनी https:www.e-abhivyakti.com या आपल्या वेबसाईटला भेट देत उत्तम प्रतिसाद दिलेला आहे.

आपणा सर्वाना हेही ज्ञातच आहे की ई – अभिव्यक्ती साहित्य मंच गेल्या चार वर्षांपासून ‘ फ्लिपबुक ‘ या format मध्ये हिंदी आणि मराठी दिवाळी अंक नि:शुल्क प्रकाशित करत आहे, आणि अशा स्वरूपाचा भारतात प्रकाशित होणारा हा पहिला अंक आहे हे आम्ही अतिशय आनंदाने आणि अभिमानाने सांगू इच्छितो.

…… “ दुधात साखर “ म्हणता येईल अशी ‘ई-अभिव्यक्ती मराठी’ बाबतची आणखी एक विशेष गोष्ट म्हणजे >>> “ Feedspot “ या कंपनीने आपणहून केलेल्या सर्व्हेनुसार, ‘ ९० सर्वोत्तम मराठी ब्लॉग्स च्या त्यांनी केलेल्या यादीमध्ये आपला हा ब्लॉग २८ व्या क्रमांकावर आहे. ( आधीच्या २७ ब्लॉग्सपैकी १३ ब्लॉग्स फक्त वेगवेगळ्या वृत्तपत्रांचे आहेत हे या संदर्भात लक्षात घ्यायला हवे.)

आमच्या जाणकार आणि अनुभवसंपन्न लेखक/लेखिका, आणि कवी/कवयित्रींच्या, तसेच रसिक वाचकांच्या सहकार्याने आमचे संपादक मंडळ या निखळ साहित्य-सेवेसाठी नि:स्वार्थपणे संपूर्ण योगदान देते आहे, आणि साहित्याला एक नवे परिमाण देण्याचा सातत्याने प्रयत्न करत आहे.

… आपणास हे जाणून आश्चर्य वाटेल की आमचे संपादक मंडळ म्हणजे स्वतः साहित्यिक असणाऱ्या ज्येष्ठ नागरिकांचा एक अगदी लहानसा ग्रुप आहे आणि या कामात कुठलाही व्यावसायिक वा आर्थिक लाभ नसतांनाही, निव्वळ त्यांना स्वतःला साहित्याची मनापासून असणारी आवड आणि इतर साहित्यिकांबद्दल वाटणारा सहभाव याच कारणाने अनेकांचे चांगले साहित्य इतर असंख्य लोकांपर्यंत निरपेक्षपणे पोहोचवण्यासाठी हे सगळे संपादक मनापासून, तत्परतेने आणि सातत्याने काम करताहेत…. याला ‘स्वान्त सुखाय‘ असेही म्हणता येईल. नवोदित साहित्यिकांपासून ते सन्मान्य ज्येष्ठ साहित्यिकांपर्यन्त सर्वांसाठीच हा एक सन्माननीय साहित्य मंच सातत्याने उपलब्ध आहे, आणि अशा सर्वांनी आमच्याकडे पाठवलेले साहित्य नियमित स्वरूपात योग्य प्रकारे प्रकाशित करण्याचा मनापासूनचा प्रयत्न या मंचावरून सातत्याने केला जात आहे.

इथे आवर्जून एक गोष्ट सांगायला हवी ती अशी की, प्रत्येकाच्या अभिव्यक्ती-स्वातंत्र्याचा पूर्णतः आदर करत असतांनाच, कुठच्याही प्रकारचा जातीयवाद, धर्मवाद, किंवा राजकारण या संदर्भातले, किंवा इतर कुठलेही.. कुठल्याही प्रकारे विवाद्य ठरेल असे साहित्य वगळता, आम्हाला पाठवलेले सर्व साहित्य सन्मानपूर्वक प्रकाशित करायचे हाच संपादक मंडळाचा सततचा प्रयत्न असतो. अर्थात जेव्हा आमच्याकडे एकाच वेळी जास्त प्रमाणात साहित्य आलेले असते तेव्हा ते प्रकाशित व्हायला उशीर होण्याची शक्यता असते… नव्हे, बऱ्याचदा असा उशीर नाईलाजाने होतोही… पण ते प्रकाशित केले जातेच आणि याची दक्षता घेतली जाते.

…. पण आपले एखादे साहित्य अजिबातच प्रकाशित केलेच गेले नाही तर कृपया असे गृहीत धरावे की आम्ही निर्धारित केलेले साहित्यिक मानदंड लक्षात घेऊनच अशा साहित्याचा समावेश केला गेलेला नाही….. आणि या बाबतीत आपणा सर्वांचे सकारात्मक सहकार्य अपेक्षित आहे. साहित्याची निवड करण्याबाबतचा अंतिम निर्णय संपादक मंडळाचा असेल याची कृपया दखल घ्यावी

ई – अभिव्यक्ती परिवारासाठी आपल्या सर्वांचा उत्स्फूर्त सहभाग खरोखरच गौरवास्पद आहे…

आपणा सर्वांचा हा अनोखा स्नेह आणि मनापासूनचा प्रतिसाद असाच आम्हाला सतत मिळत राहू दे.

या निमित्ताने एक नम्र विनंती अशी की या मंचाद्वारे दैनिक स्वरूपात प्रकाशित होणारे सगळे साहित्य आपण स्वतः तर न चुकता वाचावेच, आणि सोशल मीडियाद्वारे आपल्या परिचितांनाही पाठवावे … जेणेकरून, एक साहित्यिक लिखाण अनेकांपर्यंत सहजपणे पोहोचावे हा या मंचाचा निरपेक्ष हेतू सफल होईल.

आपले विचार आणि सूचना नेहेमीच स्वागतार्ह आहेत.

आपणा सर्वांचे पुन्हा एकदा अगदी मनापासून आभार … आपल्यामधली ही स्नेहभावना सतत वृद्धिंगत होवो हीच कामना.

आपला स्नेहांकित,

हेमन्त बावनकर

पुणे (महाराष्ट्र)   

१४ नवम्बर २०२५  

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ ≈ मॉरिशस से ≈ – लघुकथा – संस्मरण… – ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

श्री रामदेव धुरंधर

(ई-अभिव्यक्ति में मॉरीशस के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री रामदेव धुरंधर जी का हार्दिक स्वागत। आपकी रचनाओं में गिरमिटया बन कर गए भारतीय श्रमिकों की बदलती पीढ़ी और उनकी पीड़ा का जीवंत चित्रण होता हैं। आपकी कुछ चर्चित रचनाएँ – उपन्यास – चेहरों का आदमी, छोटी मछली बड़ी मछली, पूछो इस माटी से, बनते बिगड़ते रिश्ते, पथरीला सोना। कहानी संग्रह – विष-मंथन, जन्म की एक भूल, व्यंग्य संग्रह – कलजुगी धरम, चेहरों के झमेले, पापी स्वर्ग, बंदे आगे भी देख, लघुकथा संग्रह – चेहरे मेरे तुम्हारे, यात्रा साथ-साथ, एक धरती एक आकाश, आते-जाते लोग। आपको हिंदी सेवा के लिए सातवें विश्व हिंदी सम्मेलन सूरीनाम (2003) में सम्मानित किया गया। इसके अलावा आपको विश्व भाषा हिंदी सम्मान (विश्व हिंदी सचिवालय, 2013), साहित्य शिरोमणि सम्मान (मॉरिशस भारत अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी 2015), हिंदी विदेश प्रसार सम्मान (उ.प. हिंदी संस्थान लखनऊ, 2015), श्रीलाल शुक्ल इफको साहित्य सम्मान (जनवरी 2017) सहित कई सम्मान व पुरस्कार मिले हैं। हम श्री रामदेव  जी के चुनिन्दा साहित्य को ई अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों से समय समय पर साझा करने का प्रयास करेंगे।

आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा “– संस्मरण… –” ।

~ मॉरिशस से ~

☆ कथा कहानी  ☆ — संस्मरण…  — ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

विश्व लेखक थामस के अद्भुत संस्मरणों की चार खंडीय नवीनतम कृति को विश्व पुरस्कार प्राप्त हो रहा था। पर कृति में उसका अपना एक भी संस्मरण नहीं था। उसने तमाम अनगढ़ लोगों से उनके संस्मरण पूछ कर अपने नाम से लिखे थे। उसने कहा उसके अपने संस्मरण न हो से वह पुरस्कार छोड़ रहा है। अपने इस सच के लिए थामस को एक विशेष पुरस्कार मिला। पुरस्कार में पैसा होने से उसने उन लोगों में बाँट दिया जिनके संस्मरण थे।

 © श्री रामदेव धुरंधर

17 – 03 – 2025

संपर्क : रायल रोड, कारोलीन बेल एर, रिविएर सेचे, मोरिशस फोन : +230 5753 7057   ईमेल : rdhoorundhur@gmail.com

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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ई-अभिव्यक्ति: संवाद ☆ प्रिय भाई और मित्र अभिमन्यु शितोले जी  – अश्रुपूर्ण विनम्र श्रद्धांजलि ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

☆ जब तक चाहें आपका ☆

🙏💐 प्रिय भाई और मित्र अभिमन्यु शितोले जी  – अश्रुपूर्ण विनम्र श्रद्धांजलि 💐🙏

उफ़…! भाई अभिमन्यु, यह कोई उम्र थी जाने की। अभिमन्यु शितोले का असमय जाना, नवभारत टाइम्स के राजनीतिक विषयों के सम्पादक का जाना, एक सच्चे और निर्भीक पत्रकार का जाना, मेरे एक बहुत अच्छे मित्र का जाना है। हम जब मिलते, अधिक से अधिक देर तक साथ रहने का प्रयास करते। दोनों सिद्धांतप्रिय, अधिकांश मसलों पर दोनों एकमत। महाराष्ट्र राज्य हिन्दी साहित्य अकादमी में हमने साथ काम किया। मित्रता का जन्म भी यहीं हुआ और परवान भी यहीं चढ़ी। अकादमी की बैठक के लिए मुंबई जाते और लौटते समय प्राय: मैं कोई आलेख या कविता लिखता। अभिमन्यु न केवल उसके पहले पाठकों में होते बल्कि सदा अपनी प्रतिक्रिया भी देते। अकादमी के लिए मैंने अटल जी की कविताओं पर आधारित एक कार्यक्रम रवींद्र नाट्य मंदिर में किया था। उसका धन्यवाद प्रस्ताव अभिमन्यु ने किया। उन्होंने कहा कि आज तक संजय को लेखक के रूप में जानता था, आज पहली बार निर्देशक, सूत्रधार संजय से मिला और बस उसका ही हो गया। यह पहला मौका था जब अभिमन्यु ने मेरे नाम के साथ ‘जी’ लगाने की औपचारिकता उतार फेंकी थी। वह दिल से गले मिले। तब से कभी संजय कहते, कभी संजय भैया।

बाद में जब कभी मैं मुंबई होता, हम यथासंभव मिलते। गत वर्ष 10 और 11 जनवरी को एस.एन.डी.टी. विश्वविद्यालय के बोर्ड ऑफ स्टडीज़ की बैठक थी। 10 जनवरी की रात मिलना तय हुआ। उन्होंने कहा कि रात का भोजन साथ करेंगे। किसी कारणवश उस दिन हम नहीं मिल पाए। अगले दिन शाम 5 की ट्रेन से मैं लौटने वाला था। वे डोंबिवली से जल्दी निकले। प्रेस क्लब में बैठकर हमने लम्बी चर्चा की। गत वर्ष किसी विवाह में बेटे के साथ पुणे आए थे। तय हुआ कि विवाह में भोजन करने के बजाय हम शहर के एक रेस्टोरेंट में साथ में भोजन करेंगे, पर इस बार भी साथ में भोजन नहीं हो पाया। हम रेल्वे स्टेशन पर मिले। लगभग डेढ़-दो घंटे साथ थे। बहुत सारी बातें कीं। घर-परिवार, नौकरी-कारोबार, बाल-बच्चे, चढ़ाव-उतार और भी जाने क्या-क्या! उनकी चिंताओं को पहली बार उन्होंने अभिव्यक्त किया। स्टेशन के सामने एक चालू किस्म की होटल में हमने चाय पी। संभवत: उनसे वह अंतिम प्रत्यक्ष संवाद था।

अपनी-अपनी रोटी सेंकने के इस दौर में अभिमन्यु ने लेखनी से सच के पक्ष में सदैव  आवाज़ उठाई। एक विषय पर तो नामोल्लेख के साथ मेरे पक्ष का उन्होंने समर्थन किया। बात मेरे या आपके पक्ष की नहीं, बात सच के समर्थन की थी।

भाई अभिमन्यु! कल ही किसी संदर्भ में याद किया था। यह भी कोई आयु थी जाने की? अपनी बीमारी के बारे में बताया होता तो कभी मिल ही लेते।

श्री संजय भारद्वाज

अकादमी के लिए मुंबई अप-डाउन करते हुए एक कविता लिखी थी। इसमें पौराणिक अभिमन्यु का संदर्भ था। इसे आज अभिमन्यु को ही श्रद्धांजलि के रूप में अर्पित कर रहा हूँ।

मेरे इर्द-गिर्द

कुटिलता का चक्रव्यूह

आजीवन खड़ा रहा,

सच और हौसले

की तलवार लिए

मैं द्वार बेधता रहा,

कितने द्वार बाकी,

कितने खोल चुका,

क्या पता….,

जीतूँगा या

खेत रहूँगा

क्या पता….,

पर इतना

निश्चित है-

जब तक

मेरा श्वास रहेगा,

अभिमन्यु मेरे भीतर

वास करेगा..!

अंतिम बात, तुम्हारी डीपी की बायो थी, जब तक चाहें आपका… हम मित्रों की चाहत में तुम हमेशा थे, हमेशा रहोगे। हम तुम्हें हमेशा चाहेंगे यार!

ईश्वर, पुण्यात्मा को मोक्ष में स्थान दीजिएगा।

 

संजय भारद्वाज

अतिथि संपादक (ई-अभिव्यक्ति)

08 मार्च 2025 

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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ई-अभिव्यक्ति – संवाद ☆ स्मृतिशेष डॉ. राजकुमार तिवारी ‘सुमित्र’ विशेष ☆ हेमन्त बावनकर ☆

💐 ई-अभिव्यक्ति – संवाद ☆ स्मृतिशेष डॉ. राजकुमार तिवारी ‘सुमित्र’ विशेष ☆ हेमन्त बावनकर 💐

हेमन्त बावनकर

प्रिय मित्रों,

एक वर्ष के बाद भी ऐसा नहीं लगता कि सुमित्र जी नहीं रहे। ऐसा लगता है कि उनसे कल ही तो बात हुई थी। किन्तु, मृत्यु तो अटल सत्य है जिसे अस्वीकार नहीं किया जा सकता। वे अपने स्वजनों को शारीरिक रूप से अवश्य छोड़ कर चले गए किन्तु, उनकी स्मृतियाँ सदैव उनकी पीढ़ी एवं वर्तमान पीढ़ी के मस्तिष्क में आजीवन रहेंगी।

सुमित्र जी से पहली मुलाक़ात मेरे स्व. पिताश्री टी डी बावनकर जी (सुमित्र जी के मित्र) के साथ 1982 की एक शाम को उनके निवास पर हुई। उसके बाद एक ऐसा संबंध बना जो आजीवन चलता रहेगा। उनके द्वारा प्रकाशित मेरी प्रथम कहानी “चुभता हुआ सत्य’ नवीन दुनिया के पाक्षिक तरंग के प्रवेशांक में प्रकाशित हुई थी। उनके पत्र एवं तरंग की प्रति मेरे पास अभी तक सुरक्षित है।

मेरी उपरोक्त स्मृति तो मात्र एक प्रतीकात्मक उदाहरण है, उनसे जुडने वाले अनेकों मित्रों का जिन्हें उन्होने आजीवन अपना आत्मीय स्नेह और मार्गदर्शन दिया है। ऐसी अनेक कहानियाँ और संस्मरण आपको संस्कारधानी के साहित्य जगत में ही नहीं अपितु सारे विश्व के कई मित्रों में मिलेगी।

ई-अभिव्यक्ति के प्रथम अंक के लिए उनके आशीष स्वरूप प्राप्त कविता उद्धृत कर रहा हूँ जो मुझे ई-अभिव्यक्ति के सम्पादन में सदैव सकारात्मक मार्गदर्शन देती रहती है।

संकेतों के सेतु पर

साधे काम तुरंत |

दीर्घवयी हो जयी हो

कर्मठ प्रिय हेमंत

काम तुम्हारा कठिन है

बहुत कठिन अभिव्यक्ति

बंद तिजोरी सा यहां

दिखता है हर व्यक्ति

मनोवृति हो निर्मला

प्रकटें निर्मल भाव

यदि शब्दों का असंयम

हो विपरीत प्रभाव ||

सजग नागरिक की तरह

जाहिर हो अभिव्यक्ति

सर्वोपरि है देशहित

बड़ा न कोई व्यक्ति|

स्थान – दिल्ली 15 /10/18

मित्र श्री संतोष नेमा जी ने हाल ही में ‘सुमित्र संस्मरण’ प्रकाशित किया है। जिसमें 60 से अधिक लोगों के संस्मरण प्रकाशित किए गए हैं। श्री नेमा जी के शब्दों में ही “साहित्य के गंभीर अध्येता, अद्भुत रचनात्मकता, माधुर्य व्यवहार के चलते उनके हजारों चाहने वाले हैं जिनके दिलों में राजकुमार की तरह राज करते हैं. इस बात से अंदाजा लगाया जा सकता है कि उनकी श्रद्धांजलि सभा में भीड़ में उपस्थित हर एक आदमी अपनी भावांजलि देने के लिए आतुर था. जब मैंने यह देखा तब उसी क्षण मेरे मन में यह विचार आया की क्यों ना एक सुमित्र संस्मरण का प्रकाशन किया जाए जिसमें उनके प्रति सभी साहित्यकारों के संस्मरण एवं भाव समाहित किए जा सकें.”

सुमित्र जी के अनेकों स्वजनो के अनेकों संस्मरण हैं जो आजीवन उनकी याद दिलाते रहेंगे। उनकी प्रथम पुण्यतिथि पर यह विशेष संस्करण भी मात्र एक प्रतीक ही है।

इस प्रयास में हम आपके संस्मरणों/विचारों को श्रद्धासुमन स्वरूप स्मृतिशेष डॉ राजकुमार तिवारी ‘सुमित्र’ जी को समर्पित करते है।  

बस इतना ही।

हेमन्त बावनकर, पुणे 

वर्तमान में बेंगलुरु से 

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ गय… ☆ सुश्री तृप्ती कुलकर्णी ☆

सुश्री तृप्ती कुलकर्णी

? कवितेचा उत्सव ?

☆ गय… ☆ सुश्री तृप्ती कुलकर्णी 

सुखाला नुसते ‘शब्द’देखील सहज गवसत नाहीत

पण दुःख मात्र सोबतच घेऊन येते आपली ‘लय’

*

त्या वेशीवरती जर नसतीच झाली आपुली भेट

तर डोळ्यांमध्ये का दाटून आली असती ‘सय’

*

रोज सुचतच नाही लिहायला मजला काहीबाही

पण लिहिते करते दुःखानेही सोडून जायाचे ‘भय’

*

तसे ऋतूंचे बहरणे होते नेहमी‌प्रमाणेच सुरळीत

पण बेसावध क्षणी मोहरण्याचे होते आपुले ‘वय’

*

मी थांबले होते नंतर त्या मोहक वळणापाशी

पण होकाराच्या विलंबाने केलीच नाही माझी ‘गय’

©  सुश्री तृप्ती कुलकर्णी

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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ई-अभिव्यक्ति – संवाद ☆ स्मृतिशेष जयप्रकाश पाण्डेय विशेष – कहाँ गए वे लोग ? ☆ हेमन्त बावनकर ☆

💐 स्व. जयप्रकाश पाण्डेय 💐

☆ ई-अभिव्यक्ति – संवाद ☆ स्मृतिशेष जयप्रकाश पाण्डेय विशेष – कहाँ गए वे लोग ? ☆ हेमन्त बावनकर

हेमन्त बावनकर

प्रिय मित्रों,

 वैसे तो इस संसार में प्रत्येक व्यक्ति एक विशिष्टता लेकर आता है और चुपचाप चला जाता है। फिर छोड़ जाता है वे स्मृतियाँ जो जीवन भर हमारे साथ चलती हैं। लगता है कि काश कुछ दिन और साथ चल सकता । किन्तु विधि का विधान तो है ही सबके लिए सामान, कोई कुछ पहले जायेगा कोई कुछ समय बाद। किन्तु, जय प्रकाश भाई आपसे यह उम्मीद नहीं थी कि इतने जल्दी साथ छोड़ देंगे। अभी कुछ ही दिन पूर्व नागपूर जाते समय आपसे लम्बी बात हुई थी जिसे मैं अब भी टेप की तरह रिवाइंड कर सुन सकता हूँ। और आज दुखद समाचार मिला कि आप हमें छोड़ कर चले गए। इस बीच न जाने कितने अपुष्ट समाचार मिलते रहे और हम सभी मित्र परमपिता परमेश्वर से प्रार्थना करते रहे कि कुछ चमत्कार हो जाये और हम सब को आपका पुनः साथ मिल जाए। 

कहाँ गए वे लोग ?

इस वर्ष (२०२४) के प्रारम्भ से ही जय प्रकाश जी के मन में चल रहा था कि एक ऐतिहासिक साप्ताहिक स्तम्भ “कहाँ गए वे लोग?” प्रारम्भ किया जाये जिसमें हम अपने आसपास की ऐसी महान हस्तियों की जानकारी प्रकाशित करें जो आज हमारे बीच नहीं हैं किन्तु, उन्होने देश के स्वतंत्रता संग्राम, साहित्यिक, सामाजिक या अन्य किसी क्षेत्र में अविस्मरणीय कार्य किया है।  और २८ फरवरी २०२४ को इस श्रृंखला की पहली कड़ी में पंडित भवानी प्रसाद तिवारी जी की स्मृति में एक आलेख प्रकाशित कर इस श्रृंखला को प्रारम्भ किया। भाई जय प्रकाश जी की रुग्णावस्था में इस कड़ी को भाई प्रतुल श्रीवास्तव जी ने सतत जारी रखा। हमें यह कल्पना भी नहीं थी कि जिस श्रृंखला को उन्होने प्रारम्भ किया हमें उस श्रृंखला में उनकी स्मृतियों को भी जोड़ना पड़ेगा। इससे अधिक कष्टप्रद और दुखद क्षण हमारे लिए हो ही नहीं सकते। 

हम भाई जय प्रकाश जी और श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव जी के साथ मिलकर सदैव नूतन और अभिनव प्रयोग की कल्पना कर उन्हें साकार करने का प्रयास करते रहते थे। इसके परिणाम स्वरूप हमने महात्मा गांधी जी के150वीं जयंती पर गांधी स्मृति विशेषांक, हरिशंकर परसाई जन्मशती विशेषांक, दीपावली विशेषांक जैसे विशेषांकों को प्रकाशित किया। डॉ कुंदन सिंह परिहार जी के 85 वे जन्मदिवस पर “85 पर – साहित्य के कुंदन” का प्रकाशन उनके ही मस्तिष्क की उपज थी। ऐसे कई अभिनव प्रयोग अभी भी अधूरे हैं और कई अभिनव प्रयोग उनके मन में थे जो उनके साथ ही चले गए। 

व्यंग्यम और व्यंग्य पत्रिकाओं से उनका जुड़ाव 

व्यंग्यम संस्था तो जैसे उनके श्वास के साथ ही जुड़ी थी। ऐसी कोई चर्चा नहीं होती थी जिसमें व्यंग्यम, अट्टहास और अन्य साहित्यिक पत्रिकाओं की चर्चा न होती हो। व्यंग्यम के वरिष्ठ सदस्यों और व्यंग्यकार मित्रो के दुख का सहभागी हूँ।

व्यंग्य लोक द्वारा – “व्यंग्य लोक स्व. जयप्रकाश पाण्डेय स्मृति व्यंग्य सम्मान” की घोषणा 

श्री रामस्वरूप दीक्षित जी द्वारा प्राप्त सूचनानुसार व्यंग्य लोक द्वारा – “व्यंग्य लोक स्व. जयप्रकाश पाण्डेय स्मृति व्यंग्य सम्मान” की घोषणा की गई है। इस सम्मान में रु 5000 राशि प्रदान करने की घोषणा की गई है। साथ ही पहला सम्मान स्व. जयप्रकाश जी के गृहनगर जबलपुर में प्रदान किया जाएगा। यह एक प्रशंसनीय कदम है। 

डॉ कुन्दन सिंह परिहार जी के अनुसार उन्होने सोशल मीडिया में 700 से अधिक मित्रों द्वारा अर्पित श्रद्धांजलियां और शोक संदेश देखे हैं जो उनके सौम्य व्यवहार और लोकप्रियता के प्रतीक हैं।  व्यंग्यम, अट्टहास, व्यंग्य लोक और अन्य पत्रिकाओं से जुड़े सभी वरिष्ठ साहित्यकारों और व्यंग्यकार मित्रो ने मेरे अनुरोध को स्वीकार कर इस विशेष अंक में भाई जय प्रकाश जी से जुड़ी हुई अपनी स्मृतियाँ और संक्षिप्त विचार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव जी, श्री प्रतुल श्रीवास्तव जी और श्री रमाकांत ताम्रकार जी के माध्यम से  प्रेषित किए।

इस प्रयास में हम आपके संस्मरणों/विचारों को श्रद्धासुमन स्वरूप भाई जय प्रकाश जी को समर्पित करते है।  

बस इतना ही।

हेमन्त बावनक, पुणे 

वर्तमान में बेंगलुरु से 

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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ई-अभिव्यक्ति: संवाद ☆ ई-अभिव्यक्ति के एक स्तम्भ भाई जय प्रकाश पाण्डेय जी अब स्मृतिशेष – अश्रुपूर्ण विनम्र श्रद्धांजलि  ☆☆ हेमन्त बावनकर

प्रिय भाई और मित्र जय प्रकाश पाण्डेय जी 

💐🙏 अश्रुपूर्ण विनम्र श्रद्धांजलि 💐🙏

प्रिय मित्रों,

 वैसे तो इस संसार में प्रत्येक व्यक्ति एक विशिष्टता लेकर आता है और चुपचाप चला जाता है। फिर छोड़ जाता है वे स्मृतियाँ जो जीवन भर हमारे साथ चलती हैं। लगता है कि काश कुछ दिन और साथ चल सकता । किन्तु विधि का विधान तो है ही सबके लिए सामान, कोई कुछ पहले जायेगा कोई कुछ समय बाद। किन्तु, जय प्रकाश भाई आपसे यह उम्मीद नहीं थी कि इतने जल्दी साथ छोड़ देंगे। अभी कुछ ही दिन पूर्व नागपूर जाते समय आपसे लम्बी बात हुई थी जिसे मैं अब भी टेप की तरह रिवाइंड कर सुन सकता हूँ। और आज दुखद समाचार मिला कि आप हमें छोड़ कर चले गए। इस बीच न जाने कितने अपुष्ट समाचार मिलते रहे और हम सभी मित्र परमपिता परमेश्वर से प्रार्थना करते रहे कि कुछ चमत्कार हो जाये और हम सब को आपका पुनः साथ मिल जाए। 

कहाँ गए वे लोग ?

इस वर्ष (२०२४) के प्रारम्भ से ही जय प्रकाश जी के मन में चल रहा था कि एक ऐतिहासिक साप्ताहिक स्तम्भ “कहाँ गए वे लोग?” प्रारम्भ किया जाये जिसमें हम अपने आसपास की ऐसी महान हस्तियों की जानकारी प्रकाशित करें जो आज हमारे बीच नहीं हैं किन्तु, उन्होने देश के स्वतंत्रता संग्राम, साहित्यिक, सामाजिक या अन्य किसी क्षेत्र में अविस्मरणीय कार्य किया है।  और २८ फरवरी २०२४ को इस श्रृंखला की पहली कड़ी में पंडित भवानी प्रसाद तिवारी जी की स्मृति में एक आलेख प्रकाशित कर इस श्रृंखला को प्रारम्भ किया। भाई जय प्रकाश जी की रुग्णावस्था में इस कड़ी को भाई प्रतुल श्रीवास्तव जी ने सतत जारी रखा। हमें यह कल्पना भी नहीं थी कि जिस श्रृंखला को उन्होने प्रारम्भ किया हमें उस श्रृंखला में उनकी स्मृतियों को भी जोड़ना पड़ेगा। इससे अधिक कष्टप्रद और दुखद क्षण हमारे लिए हो ही नहीं सकते। 

हम भाई जय प्रकाश जी और श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव जी के साथ मिलकर सदैव नूतन और अभिनव प्रयोग की कल्पना कर उन्हें साकार करने का प्रयास करते रहते थे। इसके परिणाम स्वरूप हमने महात्मा गांधी जी के150वीं जयंती पर गांधी स्मृति विशेषांक, हरिशंकर परसाई जन्मशती विशेषांक, दीपावली विशेषांक जैसे विशेषांकों को प्रकाशित किया। डॉ कुंदन सिंह परिहार जी के 85 वे जन्मदिवस पर85 पर – साहित्य के कुंदन” का प्रकाशन उनके ही मस्तिष्क की उपज थी। ऐसे कई अभिनव प्रयोग अभी भी अधूरे हैं और कई अभिनव प्रयोग उनके मन में थे जो उनके साथ ही चले गए। 

व्यंग्यम और व्यंग्य पत्रिकाओं से उनका जुड़ाव 

व्यंग्यम संस्था तो जैसे उनके श्वास के साथ ही जुड़ी थी। ऐसी कोई चर्चा नहीं होती थी जिसमें व्यंग्यम, अट्टहास और अन्य साहित्यिक पत्रिकाओं की चर्चा न होती हो। व्यंग्यम के वरिष्ठ सदस्यों और व्यंग्यकार मित्रो के दुख का सहभागी हूँ।

व्यंग्यम, अट्टहास और अन्य पत्रिकाओं से जुड़े सभी वरिष्ठ साहित्यकारों और व्यंग्यकार मित्रो से मेरा विनम्र अनुरोध है कि कृपया आप भाई जय प्रकाश जी से जुड़ी हुई अपनी स्मृतियाँ और संक्षिप्त विचार adm.eabhivyakti@gmail.com या apniabhivyakti@gmail.com पर शीघ्रतिशीघ्र प्रेषित करने का कष्ट कीजिए। ई-अभिव्यक्ति का सोमवार ३० दिसंबर का अंक श्रद्धासुमन स्वरूप उन्हें समर्पित है।  

बस इतना ही।

हेमन्त बावनकर

२७ दिसंबर २०२४ 

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