हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ मनोज साहित्य # २१५ – हर कवि का कर्तव्य है… ☆ श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” ☆

श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं सजग अग्रज साहित्यकार श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” जी  के साप्ताहिक स्तम्भ  “मनोज साहित्य ” में आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “हर कवि का कर्तव्य है…। आप प्रत्येक मंगलवार को आपकी भावप्रवण रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे।

✍ मनोज साहित्य # २१५ ☆

☆ हर कवि का कर्तव्य है… ☆ श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” ☆

हर कवि का कर्तव्य है, कुछ न लिखें अनर्थ।

कविता न बदनाम हो, गूढ़ छिपा है अर्थ।।

*

कविता का जो धर्म है, पहले समझें आप।

मानव का यह ताप हर, दूर करे संताप।।

*

कविता मानव की सखा, जानें उसका मर्म।

कलम सिपाही है वही, समझे अपना कर्म।।

*

वेदशास्त्र इसमें लिखे, पद्य-गद्य अनमोल।

भारत के साहित्य में, मानव हित के बोल।।

*

विसंगतियों का दौर यह,स्वार्थ भाव है आज।

नैतिक मूल्यों को जगा, बदलें सकल समाज।।

*

परिहासों-चुटकुलों से, क्षण भर का आनंद।

कविता में संदेश हो, दूर करें छल-छन्द।।

*

कवियों का यह फर्ज है, कविता का यह धर्म।

गलत दिशा में जो चलें , दिखा राह सत्कर्म।।

*

कीचड़ में खुद न फँसें, सबका रखें खयाल।

मानव हित की सोच से,जग को करें निहाल।।

*

दरबारी खुद ना बने, उससे करें बचाव।

परहित में जो है लगा, उसका करें चुनाव।।

*

हर कवि को है चाहिये, करें फर्ज निर्वाह।

न्याय विवेकी ही रहें , यही कलम की चाह।।

©  मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संपर्क – 58 आशीष दीप, उत्तर मिलोनीगंज जबलपुर (मध्य प्रदेश)- 482002

मो  94258 62550

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – चीरहरण ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – चीरहरण ? ?

औरत की लाज-सी

खींचकर धरती की हरी चुनर

उतार दिया जाता है

उसकी कोख में पिघलता लोहा,

सरियों के दम पर खड़ी कर दी जाती हैं

विशाल अट्टालिकाएँ,

धरती के सीने पर बिछा दिया जाता है

काँक्रीट, सीमेंट, रेत ऐसे

किसी नराधम ने

मासूमों को चुनवा दिया हो जैसे,

विवश धरती अपनी कोख में

पथरीली आशंका के साथ

छिपा लेती है हरी संभावनाएं भी,

काल बीतता है

इमारत साल दर साल

थोड़ी-थोड़ी खंडहर होती है,

धरती की चुनर

शनैः-शनैः हरी होती है,

इमारत की बुनियाद झर जाती है

धरती की कोख भर आती है,

खंडहर ढक जाता है, उन्हीं

पेड़-पौधों, घास-फूल-पत्तियों से

जिनके बीज कभी पेट में छिपा लिये थे धरती ने!

?

© संजय भारद्वाज  

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ गुरुवार 12 मार्च से हमारी आपदां अपहर्तारं साधना आरंभ होगी। यह श्रीराम नवमी तदनुसार गुरुवार दि. 26 मार्च तक चलेगी। 🕉️ 

💥 इस साधना में श्रीरामरक्षा स्तोत्र एवं श्रीराम स्तुति का पाठ होगा‌। मौन साधना एवं आत्मपरिष्कार भी साथ-साथ चलेंगे।💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक साहित्य # ४०६ ☆ कविता – तलाश है प्यार की पैट्रियाड मिसाइल की ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ४०६ ☆

?  कविता – तलाश है प्यार की पैट्रियाड मिसाइल की ? श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

कुरुक्षेत्र,

अक्षौहिणी सेनाओं का टकराव

महान, गीता का ज्ञान

अधर्म पर धर्म की जय।

 

गागामेला,

सिकंदर की प्यास

विश्व विजय की आस

यूनान का उदय, फारस का त्रास।

 

कलिंग,

अशोक का शोक

शस्त्र से शास्त्र की ओर देश

हृदय परिवर्तन, शांति का संदेश।

 

तराईन, पानीपत, प्लासी,

वाटरलू, पहला, दूसरा विश्व युद्ध

कपट, गुप्तचर, ताकत

संघर्ष, झड़प, घात, प्रतिघात

अनवरत नई नई बिसात।

 

जिनके नाम पर है शांति पुरस्कार,

उन्हीं नोबल का था आविष्कार

डायनामाइट।

तोप, विस्फोट

शंखनाद, रणभेरी, दहाड़, टंकार, चीत्कार

अंततः वही सिसकी, दर्द, सीत्कार।

 

युद्ध थोपता है कोई और

जान से हाथ धोकर

कीमत चुकाता आया है कोई और

जलती मशालें, धूल के गुबार

कूच, अल्ग़ार, वार,

शौर्य, वीरता, गद्दार,

कूटनीति की जीत, हार।

 

रक्त सरिता, ध्वस्त मुकुट,

नियति विकट

हर युद्ध का अंत, परिवर्तन

एक नया राज्याभिषेक,

बनता है हल, युद्ध भी कभी।

 

लोग जो, मानते हैं

मानवता से ज्यादा,

धर्म या अपना बनाया कायदा

देखते हैं जो सिर्फ फायदा

 

मैं यह सब अनुभव कर,

पसीने से लतपथ छटपटाता हुआ हूं

बिस्तर पर,

सिर्फ अपने कलम कागज के साथ

उसी पक्षी सा आक्रांत,

जिसे देवदत्त ने

मार गिराया था

तीक्ष्ण बाणों से।

 

सिद्धार्थ हो कहां ?

आओ बचाओ

इस तड़पते विश्व को

जो मिसाइलों

की नोक पर

लगे

परमाणु बमों से भयाक्रांत

है सहमा सा।

 

युद्धोन्मादियों को समझा पाने को,

छोटी है मेरी कविता!

तलाश है मुझे

प्यार की ऐसी पैट्रियाड मिसाइल की,

जो, ध्वस्त कर सकती,

नफरत की स्कड मिसाइलें,

लोगों के दिलों में बनने से पहले ही

 

© श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव

समीक्षक, लेखक, व्यंगयकार

लंदन प्रवास पर

ए २३३, ओल्ड मीनाल रेसीडेंसी, भोपाल, ४६२०२३, मो ७०००३७५७९८

readerswriteback@gmail.कॉम, apniabhivyakti@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता – ☆ ज़ुबान… ☆ सुश्री नरेंद्र कौर छाबड़ा ☆

सुश्री नरेंद्र कौर छाबड़ा

(सुप्रसिद्ध हिंदी साहित्यकार सुश्री नरेन्द्र कौर छाबड़ा जी पिछले 40 वर्षों से अधिक समय से लेखन में सक्रिय। 5 कहानी संग्रह, 1 लेख संग्रह, 2 लघुकथा संग्रह, 1 पंजाबी कथा संग्रह 1 तमिल में अनुवादित कथा संग्रह,मराठी में अनुवादित लघुकथा संग्रह, मराठी में अनुवादित  कहानी संग्रह, कुल 12 पुस्तकें प्रकाशित।  पहली पुस्तक मेरी प्रतिनिधि कहानियाँ को केंद्रीय निदेशालय का हिंदीतर भाषी पुरस्कार। एक और गांधारी तथा प्रतिबिंब कहानी संग्रह को महाराष्ट्र हिन्दी साहित्य अकादमी का मुंशी प्रेमचंद पुरस्कार 2008 तथा २०१७। प्रासंगिक प्रसंग पुस्तक को महाराष्ट्र अकादमी का काका कालेलकर पुरस्कार 2013 । लेखन में अनेकानेक पुरस्कार। आकाशवाणी से पिछले 45 वर्षों से रचनाओं का प्रसारण। लेखन के साथ चित्रकारी, समाजसेवा में भी सक्रिय । महाराष्ट्र बोर्ड की 10वीं कक्षा की हिन्दी लोकभारती पुस्तक में 2 लघुकथाएं शामिल 2018)

आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय कविता जुबान

? कविता – ज़ुबान ? सुश्री नरेंद्र कौर छाबड़ा ?

किसी की जुबान होती है मीठी

किसी की होती कड़वी

किसी की मिश्री डली सी

किसी की होती जहरीली

*

किसी की जुबान मधुर घंटी सी

किसी की तूफान सी गरजती

किसी की शहद घोलती सी

किसी की आतंक पैदा करती

*

किसी की जुबान अमृत बरसाती

किसी की गालियों की बौछार

किसी की जुबान मन मोह लेती

किसी की दिल पर करती वार

*

किसी की जुबान कानों में रस घोलती

किसी की मन में घाव करती

किसी की जुबान स्वर लहरियां बिखेरती

किसी की कर्कश  दिलों को दुखाती

*

किसी की जुबान फूल बिखराती

किसी की कांटों में उलझाती

किसी से जुबान खुशियां बांटती

किसी की ईर्ष्या द्वेष झलकाती

*

किसी की जुबान आशीष बरसाती

किसी की कहलाती काली जुबान

किसी की बांटती आनंद सभी को

किसी की करती छलनी प्राण

*

किसी की जुबान उत्साह बढ़ाती

किसी की बांटती निराशा के बोल

किसी की अंधेरे में रोशनी भरती

किसी की बोले व्यर्थ नकारात्मक बोल

*

किसी की जुबान नाप तौलकर बोलती

किसी की कैंची सी चलती जाती

किसी की रहती सहयोग को तत्पर

किसी की बहाने बाजियां  बनाती

*

किसी की जुबान सत्य पर अडिग

किसी की होती झूठ का पुलिंदा 

किसी का मकसद होता मानव सेवा

किसी का केवल स्वार्थ दिखावा

*

सभी जुबानें समान दीं प्रकृति ने

फिर क्यों इतने भेद विसंगतियां हैं

सभी मीठी मधुर सकारात्मक हो जाएं

तो जहान का नक्शा ही बदल जाए

© नरेन्द्र कौर छाबड़ा

संपर्क –  सी-१२०३, वाटर्स एज, विशालनगर, पिंपले निलख, पुणे- ४११०२७ (महाराष्ट्र) मो.  9325261079 

Email-  narender.chhabda@gmail.com

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २६० – कविता – अंबिके ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ ☆

श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है समसामयिक विषय पर आधारित एक कविता  अंबिके”।) 

☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २६० ☆

🌻कविता🌻 अंबिके 🌻

*

हे अंबिके माँ ज्ञान देना, कर सकूं आराधना।

नित ध्यान में बैठी रहूँ मैं, पूर्ण कर माँ साधना।।

*

मारे सभी दानव दलों को, शस्त्र तू ही धारती।

रण भेद करती अंबिका तू, निर्बलों को तारती।।

 काली बनी कल्याण करती, रक्त खप्पर साजती।

नारायणी तूअंबिके नित, क्रोध में ललकारती।।

*

दानव दलों के अंग सारे, धार लेती देह में।

दो नैन जलते राह में है, छल रहे सब नेह में।।

 आगे बढ़ी माँ छोड़ के सब, रौंदती अंगार है।

ममता जगी है भाव में माँ , प्रेम के भंडार है।।

*

शिव जानते हैं अंबिका को, क्रोध में जलती रही।

 चरणों पड़े फिर आपके ही, जीभ तो निकली रही।।

हर अंग में लाली जगी है, लाज भरते नैन है।

हे अंबिके जगदंबिके माँ, आप ही तो चैन है।।

© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ लेखनी सुमित्र की # २७७ – कुछ दिनों से – २ ☆ स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र” ☆

स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र”

(संस्कारधानी  जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर डॉ. राजकुमार “सुमित्र” जी  को सादर चरण स्पर्श । वे सदैव हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते थे। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया।  वे निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणास्रोत हैं।

आज प्रस्तुत है, आपके काव्य संग्रह ‘उजास ही उजास‘ की एक भावप्रवण कविता – कुछ दिनों से।)

✍ साप्ताहिक स्तम्भ – लेखनी सुमित्र की # २७७ – कुछ दिनों से – २ – ✍

(काव्य संग्रहउजास ही उजास से )

हाँ दुख को पढ़ना भी एक कला

आजकल ये रिवाज

आम हो चला है

कि लोग

दूसरों के दुख का ढोल

अपने गले में टाँग लेते हैं

और

सूचनात्मक बाग देते हैं।

सवाल दुख-सुख का नहीं

सवाल है नियत का

अगर नियत में खोट है

तो फूल से छूना भी चोट है।

मैंने नहीं सीखा

दुख में दीन होना

शोभा नहीं देता

मनु राजा के बेटे को

कौड़ी के तीन होना/ हीन होना।

अरे, दुख आया है

केमिक

तो सहेंगे

हम भवानी कवि के वंशज

रोकर नहीं

गाकर कहेंगे।

दुख में गाना

कि

पागलपन नहीं/ कलेजे का काम है,

दुनिया है दुखदाता

है

और सुखदाता

पुरुषार्थी पुरुषोत्तम राम है।

आज के जमाने में राम का नाम

पुरानी मूर्तियों की तरह म्यूजियम में

रखा जाता है

और स्मगल के काम आता है

खैर कोई कुछ करे

 

© डॉ. राजकुमार “सुमित्र” 

साभार : डॉ भावना शुक्ल 

112 सर्राफा वार्ड, सिटी कोतवाली के पीछे चुन्नीलाल का बाड़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ अभिनव गीत # २७६ – “वे अव्यक्त हुये जाते हैं …” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी ☆

श्री राघवेंद्र तिवारी

(प्रतिष्ठित कवि, रेखाचित्रकार, लेखक, सम्पादक श्रद्धेय श्री राघवेंद्र तिवारी जी  हिन्दी, दूर शिक्षा, पत्रकारिता व जनसंचार,  मानवाधिकार तथा बौद्धिक सम्पदा अधिकार एवं शोध जैसे विषयों में शिक्षित एवं दीक्षित। 1970 से सतत लेखन। आपके द्वारा सृजित ‘शिक्षा का नया विकल्प : दूर शिक्षा’ (1997), ‘भारत में जनसंचार और सम्प्रेषण के मूल सिद्धांत’ (2009), ‘स्थापित होता है शब्द हर बार’ (कविता संग्रह, 2011), ‘​जहाँ दरक कर गिरा समय भी​’​ ( 2014​)​ कृतियाँ प्रकाशित एवं चर्चित हो चुकी हैं। ​आपके द्वारा स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम के लिए ‘कविता की अनुभूतिपरक जटिलता’ शीर्षक से एक श्रव्य कैसेट भी तैयार कराया जा चुका है। आज प्रस्तुत है आपका एक अभिनव गीत वे अव्यक्त हुये जाते हैं ...”।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ # २७६ ☆।। अभिनव गीत ।। ☆

☆ “वे अव्यक्त हुये जाते हैं ...” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी 

दिखते पिता इस तरह

बैठे अगले कमरे में ।

कभी किसी के लहजे में

तो घर के चेहरे में ॥

 

टँगी गंध है रही खूँटियों

पर वो  जिस्मानी ।

उनके कपड़ो से आती जो

जानी पहचानी ।

 

वहीं हृदय के घाव रहे

बेशक बिन मरहम के –

विवश पड़ा हो ज्यों कोई

चौपाया  कचरे में ॥

 

धुँधली हुई निगाह

पाँव में आ बैठा कम्पन ।

जिससे पता चला करता

बाकी है स्पन्दन ।

 

कभी बोलते तो ऐसा

सब लोग सुना करते –

कोई शख्स कुयें से बोले

काफी गहरे में ॥

 

छड़ी, पास की बुझी बुझी सी

दिखती कोने में ।

वे अव्यक्त हुये जाते हैं

जीवित होने में ।

 

पर कराहना उनका

जैसे बतला जाता है –

कोई कंकड़ कहीं

गिरा हो पानी ठहरे में ॥

 

रहते थे चुपचाप घरेलू

सब सम्बंधों पर ।

चले गये चुपचाप चार

लोगों के कन्धों पर ।

 

समझ न पाये उन्हें कभी

जाने अनजाने ही –

उलझे रहे निदान खोजते

भ्रम के पहरे में ॥

©  श्री राघवेन्द्र तिवारी

09-03-2026

संपर्क​ ​: ई.एम. – 33, इंडस टाउन, राष्ट्रीय राजमार्ग-12, भोपाल- 462047​, ​मोब : 09424482812​

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – गंदगी ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – गंदगी ? ?

गंदे फुटपाथ पर

रोज रात सोते हैं

कम उम्र के मर्दनुमा कुछ लड़के,

साथ ही उनींदी रहती हैं

इसी उम्र की कुछ औरतें

क्योंकि

लड़कियाँं किसी भी उम्र की हों

औरतनुमा नहीं होती

बल्कि

केवल औरत होती हैं,

वे परदे में हों, न हों

बेपर्दा आँखें

उन्हें बेलिबास घूरती हैं,

पेवमेंट ब्लॉक से लदे

बगैर पेड़ के ट्री गार्ड से भरे

साफ-सुथरे लम्बे-चौड़े फुटपाथ

अपने एसी बेडरूम में

उठा लाते हैं

रात को गंदे फुटपाथ, 

सारे परदे खींचकर

कई तरीकों से

कई बार

मसली-कुचली

जाती है गंदगियाँ,

भोर अंधेरे उसी

सड़ांध भरे फुटपाथ पर

फेंक दी जाती है गंदगियाँ,

सर्दी, धूप, बारिश में

दिन भर गंदगियाँ

यहाँ-वहाँ असहाय

छितरी पड़ी होती हैं,

ताज़ा अखबारों की

बासी खबरों में

अतिक्रमण के बोझ से दबे

फुटपाथ पर चिंता जताते

एसी बेडरूमों की तस्वीरें

भरी पड़ी होती हैं।

?

© संजय भारद्वाज  

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

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☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ गुरुवार 12 मार्च से हमारी आपदां अपहर्तारं साधना आरंभ होगी। यह श्रीराम नवमी तदनुसार गुरुवार दि. 26 मार्च तक चलेगी। 🕉️ 

💥 इस साधना में श्रीरामरक्षा स्तोत्र एवं श्रीराम स्तुति का पाठ होगा‌। मौन साधना एवं आत्मपरिष्कार भी साथ-साथ चलेंगे।💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ “गुल्लक की याद में…” ☆ मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग ☆

मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग

?  कविता – गुल्लक की याद में… ? मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग ☆

एक गुल्लक थी मेरे पास

घर के किसी कोने में

जिसमें मैं

यारी-दोस्ती, संबंध, सौहार्द

स्नेह और छोटी-छोटी खुशियों को

बचा कर, जमा कर और छुपा कर

रखा करता था

दुश्मन ज़माने की नज़र

लग गयी एक दिन

फ़िक्र और तनाव था

कि कैसे बचाऊँ इस पूंजी को

चलती तहज़ीब की गर्म हवाओं ने

एक दिन उस गुल्लक को

न सिर्फ़ गिरा कर तोड़ा और बिखेरा

बल्कि उसे पिघला कर

मेरे सामने ही उसे नेस्तनाबूद किया

मैं अपने आंगन में उस गुल्लक के अवशेषों का

एक मज़ार ही बना सका, अंततः..!!!!!

© मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग

संपर्कबिलासपुर (छ ग) मो नं 8319743682

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २५७ ☆ # “कविता का साया…” # ☆ श्री श्याम खापर्डे ☆

श्री श्याम खापर्डे

(श्री श्याम खापर्डे जी भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी हैं। आप प्रत्येक सोमवार पढ़ सकते हैं साप्ताहिक स्तम्भ – क्या बात है श्याम जी । आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता कविता का साया…”।

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २५७ ☆

☆ # “कविता का साया…” # ☆

मैं सुबह-सुबह घर से घूमने निकलता हूं

धीरे-धीरे नपे तुले कदमों से चलता हूं

तब वह भी मेरे साथ साथ चलती है

 

गार्डन में घूमते हुए

प्रकृति के नजारों को आंखों से चूमते हुए

सूर्य की कोमल किरणों से लिपटकर

कलियों को धीरे-धीरे उमलते हुए

मैं देखता हूं

कुछ देर बेंच पर बैठता हूं

वह भी बैठती हैं

जब मैं उठकर चलता हूं

वह भी मेरे साथ-साथ चलती है

 

जब वॉकिंग से घर आता हूं

फ्रेश होकर अखबार पढ़ता हूं

चाय की चुस्कियों के संग

समाचार की सुर्ख़ियों को पढ़कर

अपने विचार अपनी सोच गढ़ता हूं

अपनी दुनिया में पहुंच जाता हूं

तब भी वह मेरे साथ-साथ वहां भी चलती है

 

दिनभर कुछ ना कुछ करते रहता हूं

कभी पढ़ते रहता हूं

कभी लिखते रहता हूं

कभी घर के कामों में व्यस्त रहता हूं

और जब मैं आराम करता हूं

तब वह भी मेरे साथ-साथ आराम करती है

 

शाम को मित्रों के साथ

टी” पॉइंट पर

बैठकर गप्प मारते हुए

चाय पीते हुए

संसार की समस्याओं पर

आपसी विचार विमर्श

डिबेट करते हुए

शाम रात में ढलती है

तब मैं घर जाने को निकलता हूं

तब भी वह मेरे साथ साथ चलती है

 

रात में बिस्तर पर सोते हुए

जो बातें मन में उतरती है

आंखों के आगे आती है

दिल को झकझोरती है

तब भी वह मेरे साथ साथ होती है

 

फिर मैं अचानक उठकर

टेबल लैंप की रोशनी में

कुछ सोच कर

कलम उठाकर

लिखने बैठता हूं

तब वह मेरे कलम के

शब्दों के साथ-साथ चलती है

कागज पर उतरती है

नई रचना बनती है

वह मेरा साया नहीं

वह मेरी प्रिय कविता होती है

वह मेरी प्रिय कविता होती है /

 

© श्याम खापर्डे 

फ्लेट न – 402, मैत्री अपार्टमेंट, फेज – बी, रिसाली, दुर्ग ( छत्तीसगढ़) मो  9425592588

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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