हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कादम्बरी # १५३ – बुन्देली कविता – ”तनक रुको घमधैयाँ लै लो” ☆ आचार्य भगवत दुबे ☆

आचार्य भगवत दुबे

(संस्कारधानी जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर आचार्य भगवत दुबे जी को सादर चरण स्पर्श । वे आज भी हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते हैं। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया है।सीमित शब्दों में आपकी उपलब्धियों का उल्लेख अकल्पनीय है। आचार्य भगवत दुबे जी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व की विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 ☆ हिन्दी साहित्य – आलेख – ☆ आचार्य भगवत दुबे – व्यक्तित्व और कृतित्व ☆. आप निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणा स्त्रोत हैं। हमारे विशेष अनुरोध पर आपने अपना साहित्य हमारे प्रबुद्ध पाठकों से साझा करना सहर्ष स्वीकार किया है। अब आप आचार्य जी की रचनाएँ प्रत्येक मंगलवार को आत्मसात कर सकें गे। 

आज प्रस्तुत हैं बुन्देली कविता – तनक रुको घमधैयाँ लै लो।)

✍  साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ कादम्बरी # १५३ ☆

☆  बुन्देली कविता – तनक रुको घमधैयाँ लै लो ☆ आचार्य भगवत दुबे ✍

तनक रुकौ घमछैयाँ लै लो हमें संग में सैंया लै लो

*

काये भगत जात हौ सरपट बलम उठा लो कैंयाँ लै लो

बुरौ नें मानौ पाँव पिरा रय पिया उमर लरकैयाँ लै लो

*

कितनी तपी ततूरी देखौ मानों कही पन्हैयाँ लै लो

टूट गए गैया-बछिया के गिरमा और गिरैंयाँ लै लो

*

जड़कारो आ रब है साम्हू गद्दा, खोल, रजैंया लै लो

पीरी पहीं बिछौना छोड़ौ भगवतराम-रमैयाँ लै लो

© आचार्य भगवत दुबे

82, पी एन्ड टी कॉलोनी, जसूजा सिटी, पोस्ट गढ़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – चुप्पियाँ – (२१) ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – चुप्पियाँ – (२१) ? ?

आदमी

बोलता रहा ताउम्र

दुनिया ने

अबोला कर लिया,

हमेशा के लिए

चुप हो गया आदमी

दुनिया आदमी पर

बतिया रही है!

 

?

© संजय भारद्वाज   

(2.9.2018, प्रातः 9:44 बजे)

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

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अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ मनोज साहित्य # २२५ – सजल – नैन उनके झुके तो नमन हो गया… ☆ श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” ☆

श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं सजग अग्रज साहित्यकार श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” जी  के साप्ताहिक स्तम्भ  “मनोज साहित्य ” में आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “सजल –  नैन उनके झुके तो नमन हो गया…। आप प्रत्येक मंगलवार को आपकी भावप्रवण रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे।

✍ मनोज साहित्य # २२५ ☆

☆ सजल –  नैन उनके झुके तो नमन हो गया…  श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

नैन उनके झुके तो नमन हो गया।

भावना का सहज, निर्गमन हो गया।।

*

राह में कल मिले, मुस्कराते हुए।

सामने आ गए, दिल चमन हो गया।।

*

प्रेम की राह कंटक भरी है प्रिये।

वासना में फँसे, तो पतन हो गया।।

*

द्वार में बैठकर, थी प्रतीक्षा हमें।

आँख पथरा गईं सच कथन हो गया।।

*

चाँदनी रात मिलने का वादा प्रिये।

तुम न आए मन में चुभन हो गया।।

*

देश की बात पर हम सभी एक हों।

सिर निछावर किया वह रतन हो गया।।

*

शूर होता वही जो मिटे देश पर।

वीर बलिदानियों का वतन हो गया।।

©  मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

16/6/26

संपर्क – 58 आशीष दीप, उत्तर मिलोनीगंज जबलपुर (मध्य प्रदेश)- 482002

मो  94258 62550

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २६९ – पर्यावरण संरक्षण ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ ☆

श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय और भावप्रवण कविता  “पर्यावरण संरक्षण”।) 

☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २६९ ☆

🌻कविता 🌧️पर्यावरण संरक्षण 🌻

वृक्ष रहे गुणकारी जानों, देती शीतल छाँव।

पवन सुगंधी भोर सुहानी ,लगते निर्मल गाँव।।

*

पुरवैया जो बहे सनातन, दीप जले है शाम।

राम – राम की जै जै कहते, करते अपने काम।।

बीच धार में मांझी गाता, तेरे भरोसे नाव।

पवन सुगंधी भोर सुहानी, लगते निर्मल गाँव।।

*

बदले ऋतु है बदली शोभा, खिले नीम पलाश।

कोयल कूके बागों में जब, पिया मिलन की आस।।

महुआ महके डाली- डाली,बढा़ हुआ है भाव।

पवन सुगंधी भोर सुहानी, लगते निर्मल गाँव।।

*

बौरें अमिया बेरी झूले, नीबू लटके डाल।

त्वचा निरोगी सुंदर काया, हरे नीम की छाल।।

पौधे जो मन को भाते हैं, बढे़ मनुज की चाव।

पवन सुगंधी भोर सुहानी, लगते निर्मल गाँव।।

*

 बाँस सागौन शीशम चंदन, कंचन सा है मोल।

वृक्ष हमारे संगी साथी, लगे बड़े अनमोल।।

घर मकान सब बनते इनसे, लगते इनमें दाँव।

पवन सुगंधी भोर सुहानी, लगते निर्मल गाँव।।

*

कृष्ण कन्हैया यमुना तट पर, झूले कंदब  डाल।

सिया राम की जोड़ी सुंदर, जटा जूट से बाल।।

सजी आलता लाल महावर, बैदेही के पाँव।

पवन सुगंधी भोर सुहानी,लगते निर्मल गाँव।।

*

तुलसी पीपल पूजे बरगद,धरे दीप घर द्वार।

कृष्णा कावेरी नित बहती, गंगा यमुना धार।।

झर – झर झरना बहते सुंदर, हरा भरा है ठाँव।

पवन सुगंधी भोर सुहानी, लगते निर्मल गाँव।।

© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ लेखनी सुमित्र की # २८९ – सूरज नहीं दिया…१ ☆ स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र” ☆

स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र”

(संस्कारधानी  जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर डॉ. राजकुमार “सुमित्र” जी  को सादर चरण स्पर्श । वे सदैव हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते थे। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया।  वे निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणास्रोत हैं। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता – सूरज नहीं दिया…१ ।)

✍ साप्ताहिक स्तम्भ – लेखनी सुमित्र की # २८८ ☆

☆ – सूरज नहीं दिया ☆ स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र” ✍

 गुड़ियों से खेल रही है

भावना‘,

मिट्टी खा रही है

कामना

और

धनुष साध रहा है हर्ष’–

इन्हें क्या मालूम

कि आज

कम हो गये हैं

मेरे जीवन के कितने वर्ष।

हाय! जिन्दगी कट रही है

किराये की छत में,

क्या दे पाऊँगा विरासत में?

अखबारों की कतरनें

बासी चिट्ठियाँ

और लाटरी की निर्जीव टिकिटें

भला 

किस काम आयेंगीं?

संभावना की फसलकी

पुरानी प्रतियाँ

इन्हें क्या दे पायेंगी?

सच तो ये है-

दुहरी जिन्दगी जीने वाले

मास्टर का

जीना मरना बराबर है,

ये मँहगाई

जीवित शव पर लगा हुआ करहै।

 क्रमशः अगले अंक में

स्व डॉ. राजकुमार “सुमित्र” 

साभार : डॉ भावना शुक्ल 

112 सर्राफा वार्ड, सिटी कोतवाली के पीछे चुन्नीलाल का बाड़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ अभिनव गीत # २८७ – “रोज यही दोहराती घडियाँ…” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी ☆

श्री राघवेंद्र तिवारी

(प्रतिष्ठित कवि, रेखाचित्रकार, लेखक, सम्पादक श्रद्धेय श्री राघवेंद्र तिवारी जी  हिन्दी, दूर शिक्षा, पत्रकारिता व जनसंचार,  मानवाधिकार तथा बौद्धिक सम्पदा अधिकार एवं शोध जैसे विषयों में शिक्षित एवं दीक्षित। 1970 से सतत लेखन। आपके द्वारा सृजित ‘शिक्षा का नया विकल्प : दूर शिक्षा’ (1997), ‘भारत में जनसंचार और सम्प्रेषण के मूल सिद्धांत’ (2009), ‘स्थापित होता है शब्द हर बार’ (कविता संग्रह, 2011), ‘​जहाँ दरक कर गिरा समय भी​’​ ( 2014​)​ कृतियाँ प्रकाशित एवं चर्चित हो चुकी हैं। ​आपके द्वारा स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम के लिए ‘कविता की अनुभूतिपरक जटिलता’ शीर्षक से एक श्रव्य कैसेट भी तैयार कराया जा चुका है। आज प्रस्तुत है आपका एक अभिनव गीत रोज यही दोहराती घडियाँ...”।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ # २८७ ☆।। अभिनव गीत ।। ☆

☆ “रोज यही दोहराती घडियाँ...” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी 

बेटा पंखा लगवाये

उपहार नहीं लेंगे

बाहर खटिया पर सोये

बाबा सब सहलेंगे

 

“संस्कार के नाम, त्याग

क्या किया पिताजी ने

मुश्किलात अब क्या हैं

उनको यह जीवन जीने”

 

कहकर बेटा तुरत फुरत

बाहर का रुख लेकर

निकल चुका होता कहता

हम क्या क्या कर लेंगे ?

 

उधर पूज्य माता जी

बैठीं चढ़ा चढ़ा पारा

अपनी बहू पवित्रा का

कर शापित भिनसारा

 

नाती की पसलियाँ पकड़

बैठीं सूखी खांसी

रोग इसी गर्मी में क्या

सब इंतकाम लेंगे

 

छोटीबहिन बागवाले

मंदिर के कोने से

टपर टपर बतियाती

किससे कई महीने से

 

बेटा सोच नहीं पाता

इस विकट परिस्थिति में

और पिता का कहना कि-

ऐसा , तो मर लेंगे

 

एक अनौखी कथा चला

करती है इस घरकी

रोज यही दोहराती घडियाँ

टिक-टिक दिनभर की

 

और चल रहा ढर्रा इनका

स्वाभिमान ढोते

हम यों लिख सकते यह

किस्सा बस क्या  करलेंगे?

 

©  श्री राघवेन्द्र तिवारी

18-06-2023

संपर्क​ ​: ई.एम. – 33, इंडस टाउन, राष्ट्रीय राजमार्ग-12, भोपाल- 462047​, ​मोब : 09424482812​

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – मातृरेखा ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – मातृरेखा ? ?

उसके विश्वास के आगे

मेरी उम्र की रेखा

बचपन पर ठहरी रहती है,

मेरे बीमार पड़ने पर

‘बेटे को नज़र लग गई’

जब मेरी माँ कहती है!

?

© संजय भारद्वाज   

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

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संजयउवाच@डाटामेल.भारत

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २६९ ☆ # “बांझ…” # ☆ श्री श्याम खापर्डे ☆

श्री श्याम खापर्डे

(श्री श्याम खापर्डे जी भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी हैं। आप प्रत्येक सोमवार पढ़ सकते हैं साप्ताहिक स्तम्भ – क्या बात है श्याम जी । आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता बांझ…”।

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २६९ ☆

☆ # “बांझ…” # ☆ श्री श्याम खापर्डे ☆

वह सुकुमार सी कली

जो नाजो से थी पली

जो चिड़ियों सी चहकती थी

जो मोगरे की खुशबू सी महकती थी

जिसके पायल की आवाज से

सुबह खिलखिलाती थी

जिसके आरती के बाद

रात जवान हो जाती थी

जिसकी सांसों को सुनकर

पुरवाई चलती थी

उसकी मुस्कान से

उसकी गृहस्थी की

ज्योत जलती थी

 

वह आज गुमसुम

चुपचाप शांत है

शायद कोई बात है

जिससे भयाक्रांत है

उसकी आंखों में वेदना

झलक रही थी

आंसू की धार

उसके पलकों से छलक रही थी

अपने हृदय में कोई पीड़ा

वह छुपाए जा रही थी

ससुराल में उसकी उपेक्षा

 उसे अंदर ही अंदर

खाए जा रही थी

घर का हर सदस्य उससे

 एक सवाल पूछ रहा था

जिसका जवाब

उसे नहीं सूझ रहा था

 

उसने कठोर नियम का पालन किया

हर विधि को पवित्रता से पूर्ण किया

हर पूजा स्थल के

चौखट पर माथा टेका

चमत्कार की आशा से

सब की तरफ देखा

हर बड़े चिकित्सक से मिली

पर उसके मन की कली नहीं खिली

उसने आधुनिक आईवीएफ का भी प्रयास किया

पर यहां पर उसने भी

उसे निराश किया

पति और घर वाले

 उसकी उपेक्षा करने लगे

वह तो एक बांझ है

सब तिरस्कार से कहने लगे

बांझ शब्द उसके कानों में

पिघले शीशे सा लगने लगा

उसके नारीत्व का अपमान

चोट खाए नागिन सा धीरे-धीरे जगने लगा

वह लोगों के तानों से टूट गई

उसकी खुशी उससे

 सदा के लिए रूठ गई

 

उसने आत्मबल से

एक कठोर निर्णय लिया

अपने पति को

उसमें सम्मिलित किया

वह एक बाल आश्रम में

अपने पति संग गई

वहां पर एक बच्ची को

गोद लेने की बात कही

सारी कागजी कार्रवाई के बाद

कुछ माह पश्चात

उन्हें किया गया याद

वह बच्ची उन्हें

गोद दी गई

उनकी कानूनी रजामंदी

अधिकारी के समक्ष ली गई

 

बच्ची को गोद लेकर

वह खुशी-खुशी घर आई

घर के हर कोने को सजाया

मिठाई लोगों में बटवाई

उसके जीवन में नई सुबह हुई

दूर हुई दुःख भरी सांझ

बच्ची को गोद में लेकर

वह नाच उठी

उसकी भावनाओं की

सभी सीमाएं टूटी

और पूछ बैठी

ऐ बेदर्द जमाने

बता-

अब मुझे कौन कहेगा बांझ ? /

© श्याम खापर्डे 

फ्लेट न – 402, मैत्री अपार्टमेंट, फेज – बी, रिसाली, दुर्ग ( छत्तीसगढ़) मो  9425592588

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ अभिव्यक्ति # -११२ – आओ फिर हम तितलियों के पीछे पीछे भागें… ☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

श्री राजेन्द्र तिवारी

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी जबलपुर से श्री राजेंद्र तिवारी जी का स्वागत। इंडियन एयरफोर्स में अपनी सेवाएं देने के पश्चात मध्य प्रदेश पुलिस में विभिन्न स्थानों पर थाना प्रभारी के पद पर रहते हुए समाज कल्याण तथा देशभक्ति जनसेवा के कार्य को चरितार्थ किया। कादम्बरी साहित्य सम्मान सहित कई विशेष सम्मान एवं विभिन्न संस्थाओं द्वारा सम्मानित, आकाशवाणी और दूरदर्शन द्वारा वार्ताएं प्रसारित। हॉकी में स्पेन के विरुद्ध भारत का प्रतिनिधित्व तथा कई सम्मानित टूर्नामेंट में भाग लिया। सांस्कृतिक और साहित्यिक क्षेत्र में भी लगातार सक्रिय रहा। हम आपकी रचनाएँ समय समय पर अपने पाठकों के साथ साझा करते रहेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण कविता आओ फिर हम तितलियों के पीछे पीछे भागें।)

☆ अभिव्यक्ति # ११२ ☆

☆ आओ फिर हम तितलियों के पीछे पीछे भागें☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

आओ फिर हम तितलियों के पीछे पीछे भागें,

हम फिर से लौट चलें, सुरमई बचपन में,

सुप्त हुई बचपन की भावना, अब तो जागें,

आओ फिर हम तितलियों के पीछे पीछे भागें,

*

नाव बनाकर कागज की, पानी में तैरा दें,

बच्चों के संग, बच्चे बन, फिर मुस्कान दिखा दें,

आओ फिर हम तितलियों के पीछे पीछे भागें,

*

छत पर जाकर, पतंग उड़ाएं, कटी पतंगें लूटें,

जल्दी से मान भी जाएं, जल्दी से फिर रूठें,

समय के पीछे न चलकर, समय के आगे भागें,

आओ फिर हम तितलियों के पीछे पीछे भागें,

*

निष्कलंक हो, निश्छल हो, निष्कपट हो जाएं,

बच्चों जैसे, बच्चों के संग, बच्चों के हो जाएं,

क्षणभंगुर जीवन का सपना, सपनों से अब जागें,

आओ फिर हम तितलियों के पीछे पीछे भागें.

© श्री राजेन्द्र तिवारी  

संपर्क – 70, रामेश्वरम कॉलोनी, विजय नगर, जबलपुर

मो  9425391435

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हिन्दी साहित्य – कविता – ☆ फूलों की सोच… ☆ सुश्री नरेंद्र कौर छाबड़ा ☆

सुश्री नरेंद्र कौर छाबड़ा

(सुप्रसिद्ध हिंदी साहित्यकार सुश्री नरेन्द्र कौर छाबड़ा जी पिछले 40 वर्षों से अधिक समय से लेखन में सक्रिय। 5 कहानी संग्रह, 1 लेख संग्रह, 2 लघुकथा संग्रह, 1 पंजाबी कथा संग्रह 1 तमिल में अनुवादित कथा संग्रह,मराठी में अनुवादित लघुकथा संग्रह, मराठी में अनुवादित  कहानी संग्रह, कुल 12 पुस्तकें प्रकाशित।  पहली पुस्तक मेरी प्रतिनिधि कहानियाँ को केंद्रीय निदेशालय का हिंदीतर भाषी पुरस्कार। एक और गांधारी तथा प्रतिबिंब कहानी संग्रह को महाराष्ट्र हिन्दी साहित्य अकादमी का मुंशी प्रेमचंद पुरस्कार 2008 तथा २०१७। प्रासंगिक प्रसंग पुस्तक को महाराष्ट्र अकादमी का काका कालेलकर पुरस्कार 2013 । लेखन में अनेकानेक पुरस्कार। आकाशवाणी से पिछले 45 वर्षों से रचनाओं का प्रसारण। लेखन के साथ चित्रकारी, समाजसेवा में भी सक्रिय । महाराष्ट्र बोर्ड की 10वीं कक्षा की हिन्दी लोकभारती पुस्तक में 2 लघुकथाएं शामिल 2018)

आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय कविता फूलों की सोच

? कविता – फूलों की सोच ? सुश्री नरेंद्र कौर छाबड़ा ?

मधुर महक से भरे

फूलों के गुच्छे

शीतल पवन से

हिलोरें लेते

मानो डालियों पर

झूला डाले

आनंद मगन हो रहे

 

डालियां उनके कानों में

सुरीली तान छेड़ती

हौले से पूछती हैं

कहां से लाते हो

यह भीनी मादक महक  ?

तुम्हारी जड़ों में तो माली

सड़ी गली गोबर

सूखे मरे पत्ते

कीड़ों की खाद

भरता रहता है

तुम पर उन सब का

कोई असर नहीं होता ?

 

फूल मुस्कुरा उठे

हम इंसान थोड़े ही हैं

जो सर्वश्रेष्ठ को लेकर

निकृष्ट बनाने में माहिर है

 

हमने तो सीखा है

सदा सुगंध ही सुगंध बिखेरना

मनुष्य बेशक

अपने स्वार्थ के चलते

हमारी अधखिली कलियों  को

कुचल मसल डालता है

पर हम भी अपनी

सुगंध बांटने से

पीछे नहीं हटेंगे

वह हमारे गुण चाहे

ना स्वीकारे 

हम उसके स्वार्थ

अवगुणों को

कभी नहीं अपनाएंगे

 

© नरेन्द्र कौर छाबड़ा

संपर्क –  सी-१२०३, वाटर्स एज, विशालनगर, पिंपले निलख, पुणे- ४११०२७ (महाराष्ट्र) मो.  9325261079 

Email-  narender.chhabda@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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