मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ श्री अशोक भांबुरे जी यांची कविता अभिव्यक्ती #३१४ ☆ फुलांना वेचल्यानंतर… ☆ श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे ☆

श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे

 

? अशोक भांबुरे जी यांची कविता अभिव्यक्ती # ३१४ ?

☆ फुलांना वेचल्यानंतर… ☆ श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे ☆

☆

सुखाने मी निघालो बघ यमाने गाठल्यानंतर

जराही दाह होईना कलेवर पेटल्यानंतर

*

असे चटके दिले त्यांनी इथे सोशीक लोकांना

जखम होते बरी म्हणती मिठाने शेकल्यानंतर

*

किती गर्दी इथे केली बघ्यांनी रंजनासाठी

कुणीही थांबला नाही तमाशा संपल्यानंतर

*

अनोखी कल्पना शक्ती जिथे रचनेत सापडते

कवीला वाचता येते कवन हे वाचल्यानंतर

*

इथे तर रानमेव्याला कुणीही मोल देईना 

सुक्यामेव्यास या किंमत बघाना वाळल्यानंतर

*

फुले रस्त्यात पडलेली चुरडली ना कधी पायी

सुगंधी हात झाले रे फुलांना वेचल्यानंतर

*

सुखाचा शोध घेताना भटकलो काल मी होतो

सुखाला जाणता आले समाधी लागल्यानंतर

*

कसे घरट्यात ते घुसले किती दादागिरी केली

अता बंदिस्त हे पाणी जहाले गोठल्यानंतर

*

दुधाची काळजी नाही जरी ते नासले आहे

कलाकंदामधे गोडी जरासे आटल्यानंतर

☆

 © अशोक श्रीपाद भांबुरे

धनकवडी, पुणे ४११ ०४३.

ashokbhambure123@gmail.com

मो. ८१८००४२५०६, ९८२२८८२०२८

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ कली-दुनिया… ☆ श्रीशैल चौगुले ☆

श्रीशैल चौगुले

? कवितेचा उत्सव ?

☆ कली-दुनिया… ☆ श्रीशैल चौगुले ☆

☆

चार पावलांनी दुनियाच संपते

वित्त, प्रतिष्ठा, सत्ता, अहंम, व्यापते.

*

शर्यतीत जीवन पुढेच पळते

सजीवाचे नियम पाळणे छळते.

*

ज्याची त्याची गती पुसून आता गेले

युगासवे धावणे हेची दैव झाले.

*

ज्याने-त्याने रमावे ऐश्वर्यात झोकी

स्वयं सोडला तर ओझे सर्व बाकी.

*

सन्मानाचा डौल विजयाची देतो ग्वाही

जिंकण्यासाठीच आयुष्य संपून जाई.

*

वर्णावे काय या कलियुगाचे क्रमण

क्षणात बदले काळचक्राचे भ्रमण.

*

थांबावे तर संकट, चालणे बिकट

जगणे थांबून राही, मरण निकट.

*

आकाशी हाताचा स्पर्श, कवेत सागर

रात्रंदिनात ना राहिले वेळ अंतर.

*

असत्य, हिंसा, अनिती, असूरीचे पाश

सत्य द्वापार-त्रेता, मात्र कलित-नाश.

 ☆

© श्रीशैल चौगुले

मो. ९६७३०१२०९०.

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर ≈

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मराठी साहित्य – चित्रकाव्य ☆ हिशोब पूर्वसंचितांचा… ☆ श्री आशिष बिवलकर ☆

श्री आशिष  बिवलकर

?️?  चित्रकाव्य  ?️?

? हिशोब पूर्वसंचितांचा… ? श्री आशिष  बिवलकर ☆

☆

प्रत्येक श्वासासाठी संघर्ष,

नियतीने लिहिलाय भाळी |

कोवळ्या वयात डायलीसिस,

असह्य वेदना त्याला छळी |

*

भोग शरीराचे देताना,

दैव करत नाही विचार |

लहानग्यांना देखील,

सोसावे लागती उपचार |

*

काय असतो अपराध,

निरागस कोवळ्या जीवाचा |

खेळ मांडते ते प्रारब्ध,

हिशोब पूर्वसंचितांचा |

*

पालक होतात हतबल,

त्याच्यासाठी करून धडपड |

पोटच्या गोळ्यासाठी देतात,

नशिबाची परीक्षा अवघड |

*

आयुष्याच्या सारीपाटावर,

नियती फेकत असते फासे |

सोंगटी सारखे खेळवतं,

खेळ खेळते तिला हवे तसे |

*

हातीपायी धडधाकट असणाऱ्यांनी,

संघर्ष अशा बालकांचा तो बघावा |

जमेल तसा माणुसकीचा आधार,

अशा कुटुंबांना आपुलकीने द्यावा |

©️ वास्तवरंग

☆

(चित्र सौजन्य – श्री आशिष बिवलकर) 

© श्री आशिष  बिवलकर

बदलापूर

मो 9518942105

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ दावण… ☆ प्रा तुकाराम दादा पाटील ☆

श्री तुकाराम दादा पाटील

? कवितेचा उत्सव ?

☆ दावण… ☆ प्रा तुकाराम दादा पाटील ☆

☆

बंद दाराआड चर्चा चाललेली ऐकतो

बोललो नाही कधीही आज थोडे बोलतो

*

संपला आतंक नाही खूप मेली माणसे

सोडला मी तोल नाही संयमाने सांगतो

*

तापल्या वाटा सुखाच्या सावल्या ही पेटल्या

शांततेने चालण्याला वाट साधी मागतो

*

हरवला विश्वास इथला प्रेम आहे गोठले

राजसत्ता चालवाया पण जिव्हाळा लागतो

*

कैद झाले देव सारे बंद झाली मंदिरे

बावळा झाला पुजारी नाचनंगा घालतो

*

कोंडुनी स्वातंत्र्य तुम्ही का गुलामी लादता

दडपणा खालीच सगळे आज आम्ही नांदतो

*

पारध्याच्या दावणीला लोक कोणी बांधले

कोण दाणे टाकतो तर कोण माना छाटतो

☆

© प्रा. तुकाराम दादा पाटील

मुळचा पत्ता  –  मु.पो. भोसे  ता.मिरज  जि.सांगली

सध्या राॅयल रोहाना, जुना जकातनाका वाल्हेकरवाडी रोड चिंचवड पुणे ३३

दुरध्वनी – ९०७५६३४८२४, ९८२२०१८५२६

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संजय उवाच # ३२० – सोना और सोना ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के  लेखक  श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है। साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ  हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको  पाठकों का  आशातीत  प्रतिसाद मिला है।”

हम  प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है  इस शृंखला की अगली कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों  के माध्यम से  हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)

☆  संजय उवाच # ३२० ☆ सोना और सोना… ?

‘समय बलवान, समय का करो सम्मान’, बचपन में इस तरह की अनेक कहावतें सुनते थे। बाल मन कच्ची मिट्टी होता है, जल्दी ग्रहण करता है। जो ग्रहण करता है, वही अंकुरित होता है। जीवनमूल्यों के बीज, जीवनमूल्यों के वृक्ष खड़े करते हैं।

अब अनेक बार  किशोरों और युवाओं को मोबाइल पर बात करते सुनते हैं,- क्या चल रहा है?… कुछ खास नहीं, बस टीपी।.. टीपी अर्थात टाइमपास। आश्चर्य तो तब होता है जब अनेक पत्र-पत्रिकाओं के नाम भी टाइमपास, फुल टाइमपास, ऑनली टाइमपास, हँड्रेड परसेंट टाइमपास देखते-सुनते हैं। वैचारिक दिशा और दशा के संदर्भ में ये शीर्षक बहुत कुछ कह देते हैं।

वस्तुतः व्यक्ति अपनी दिशा और दशा का निर्धारक स्वयं ही होता है। गोस्वामी जी ने लिखा है- “बड़े भाग मानुष तन पावा। सुर दुर्लभ सब ग्रंथन्हि गावा।।” मनुष्य तन पाना सौभाग्य की बात है। देवताओं के लिए भी यह मनुष्य योनि पाना दुर्लभ है। वस्तुत: ईश्वर से साक्षात्कार की सारी संभावनाएँ इसी योनि में हैं। ध्यान देने योग्य बात है कि यह योनि नश्वर है।

योनि नश्वर है, अर्थात कुछ समय के लिए ही मिली है। यह समय भी अनिश्चित है। किसका समय कब पूरा होगा, यह केवल समय ही जानता है। ऐसे में क्षण-क्षण का अपितु क्षणांश का भी जीवन में बहुत महत्व है। जिसने समय का मान किया, उसने जीवन का सदुपयोग किया। जिसने समय का भान नहीं रखा, उसे जीवन ने कहीं का नहीं रखा। अपनी कविता ‘क्षण-क्षण’ का स्मरण हो आता है। कविता कहती है,  “मेरे इर्द-गिर्द / बिखरे पड़े हज़ारों क्षण / हर क्षण खिलते/ हर क्षण बुढ़ाते क्षण/ मैं उठा/ हर क्षण को तह कर / करीने से समेटने लगा / कई जोड़ी आँखों में / प्रश्न भी उतरने लगा / क्षण समेटने का / दुस्साहस कर रहा हूँ /मैं यह क्या कर रहा हूँ?..अजेय भाव से मुस्कराता / मैं निशब्द / कुछ कह न सका/ समय साक्षी है / परास्त वही हुआ जो/ अपने समय को सहेज न सका।”

एक प्रसंग के माध्यम से इसे बेहतर समझने का प्रयास करते हैं। साधु महाराज के गुरुकुल में एक अत्यंत आलसी विद्यार्थी था। हमेशा टीपी में लगा रहता। गुरुजी ने उसका आलस्य दूर करने के अनेक प्रयास किए पर सब व्यर्थ। एक दिन गुरुजी ने एक पत्थर उसके हाथ में देकर कहा,” वत्स मैं तुझ से बहुत प्रसन्न हूँ। यह पारस पत्थर है। इसके द्वारा लोहे से सोना बनाया जा सकता है। मैं दो दिन के लिए आश्रम से बाहर जा रहा हूँ। दो दिन में चाहे उतना सोना बना लेना। कल सूर्यास्त के समय लौट कर पारस वापस ले लूँगा।” गुरु जी चले गए। आलसी चेले ने सोचा, दो दिन का समय है। गुरु जी नहीं हैं, सो आज का दिन तो सो लेते हैं, कल बाजार से लोहा ले आएँगे और उसके बाद चाहिए उतना सोना बना कर लेंगे। पहले दिन तो सोने पर उसका उसका सोना भारी पड़ा। अगले दिन सुबह नाश्ते, दोपहर का भोजन, बाजार जाने का लक्ष्य इस सबके नाम पर टीपी करते सूर्यास्त हो गया। हाथ में आया सोना, सोने के चलते खोना पड़ा।

स्मरण रहे, यह पारस कुछ समय के लिए हरेक को मिलता है। उस समय सोना और सोना में से अपना विकल्प भी हरेक को चुनना पड़ता है। इति।

© संजय भारद्वाज 

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ सरस्वती साधना बुधवार 14 जनवरी से शुक्रवार 23 जनवरी तक चलेगी 🕉️

💥इसका साधना मंत्र होगा – ॐ ऐं सरस्वत्यै ऐं नम: 💥

💥 मालाजप, सूर्य नमस्कार आवर्तन, आत्मपरिष्कार मूल्यांकन एवं मौन साधना के साथ सरस्वती वंदना जारी रखें 💥

💥सरस्वती वंदना💥

 या कुन्देन्दुतुषारहारधवला या शुभ्रवस्त्रावृता।

या वीणावरदण्डमण्डितकरा या श्वेतपद्मासना।

या ब्रह्माच्युतशङ्करप्रभृतिभिर्देवैः सदा वन्दिता।

सा मां पातु सरस्वती भगवती निःशेषजाड्यापहा॥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

≈ संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ “तो” आणि आपण! ☆ श्री प्रमोद वामन वर्तक ☆

श्री प्रमोद वामन वर्तक  

? कवितेचा उत्सव ?

☆ 🙏 “तो” आणि आपण! 🙏 ☆ श्री प्रमोद वामन वर्तक ☆

☆

नाही त्यास वावडे

सोनेरी देव्हाऱ्याचे,

“तो” जाणतो खरे रंग

हृदयातील भक्तीचे!

 “तो” भाव भावाचा

 सदा असे भुकेला,

 भुलेल का “तो” अशा

 बेगडी देखाव्याला?

साध्या नमस्काराची

“तो” धरीतसे आस,

असे साऱ्या चराचरी

त्याचाच बघा वास!

 “तो” दिसतो सर्वांना

 वेगवेगळ्या रुपात,

 पण समजावया हवा

 भाव आपल्या मनांत!

सदा राहून सजग

वावरा या जगती,

पडेल अवचित गाठ

कळेल त्याची महती!

कळेल त्याची महती!

☆

© प्रमोद वामन वर्तक

संपर्क – दोस्ती इम्पिरिया, ग्रेशिया A 702, मानपाडा, ठाणे (प.) 400610 

मो – 9892561086 ई-मेल – pradnyavartak3@gmail.com

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – चित्रकाव्य ☆ फूल म्हणू की भूल मना… ☆ सुश्री नीलांबरी शिर्के ☆

सुश्री नीलांबरी शिर्के

?️?  चित्रकाव्य  ?️?

? फूल म्हणू की भूल मना… ?  सुश्री नीलांबरी शिर्के ☆

☆

फूल म्हणू की भूल मना

दर्शने काही सुचेचना!

सूर्यकिरणी सौंदर्य नाहते

पाहते मी पुन्हा पुन्हा!

*
सौंदर्याला कणखर वेढा

नजाकतीने पडे भोवती!

सहजपणाने खडू नये

म्हणत असावी नियती!

☆

© सुश्री नीलांबरी शिर्के

मो 8149144177

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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सूचना/Information ☆ संपादकीय निवेदन ☆  कविता – ती चार दैवी मुले – सौ.उज्वला सुहास सहस्त्रबुद्धे – अभिनंदन ☆ सम्पादक मंडळ ई-अभिव्यक्ति (मराठी) ☆

‘सूचना/Information 

(साहित्यिक एवं सांस्कृतिक समाचार)

सौ.उज्वला सुहास सहस्त्रबुद्धे

💐 संपादकीय निवेदन 💐

💐 ✒️ अभिनंदन! अभिनंदन! अभिनंदन! ✒️ 💐

तितिक्षा इंटरनॅशनल, पुणे यांनी आयोजित केलेल्या दशकपुर्ती सोहळा काव्यलेखन स्पर्धेत आपल्या समुहातील ज्येष्ठ साहित्यिका श्रीमती उज्ज्वला सहस्रबुद्धे यांना त्यांच्या ‘तितिक्षा’ या रचनेसाठी सर्वोत्कृष्ट काव्य पुरस्कार मिळाला आहे.

ई अभिव्यक्ती मराठी परिवारातर्फे त्यांचे मन: पूर्वक अभिनंदन आणि पुढील लेखनासाठी शुभेच्छा 💐 💐

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– आजच्या अंकात वाचूया त्यांचे एक पुरस्कार प्राप्त कविता – “ती चार दैवी मुले…”

– संपादक मंडळ

ई – अभिव्यक्ती, मराठी विभाग

☆ ☆ ☆ ☆ ☆

पुरस्कार प्राप्त कविता

विषय – तितिक्षा 

? कवितेचा उत्सव ?

☆ ती चार दैवी मुले… ☆ सौ.उज्वला सुहास सहस्त्रबुद्धे ☆

☆

बालपणी हरवली,

छाया माथ्यावरची!

पोरकी झाली चौघे,

वाट धरी पैठणची!… १

*

ब्रम्ह वृंदास सामोरे,

प्रश्न केले अवघड!

शुध्दिपत्र मिळण्यास,

खूप केली धडपड!… २

*

ज्ञाना देई गुरूपद,

निवृत्तीस ते श्रध्देने!

चालले सोपान, मुक्ता,

मागुती त्यांच्या मायेने!.. ३

*

तितिक्षा सर्वास होती,

घेण्यास ज्ञान सखोल!

वृत्ती सर्वांच्याच होत्या,

तितिक्षेत समतोल!… ४

*

आकलन झाले सर्वां,

ही आहेत दैवी बाळे!

यांच्या अथांग ज्ञानात,

श्रीकृष्ण अंतरी खेळे!.. ५

*

जाणली त्यांची तितिक्षा,

योगेश्वराने अंतरी!

ज्ञानेश्वरी ही जन्मली,

या नेवाश्यात भूवरी!.. ६

☆

© सौ. उज्वला सुहास सहस्रबुद्धे

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – मनमंजुषेतून ☆ अडखळलेली पावलं… ☆ श्री नितीन सुभाष चंदनशिवे ☆

श्री नितीन सुभाष चंदनशिवे

? मनमंजुषेतून ?

☆ अडखळलेली पावलं… ☆ श्री नितीन सुभाष चंदनशिवे ☆

रुसून माहेरी आलेल्या ताईला सांगत होती आजी असेच काही समजावून…

“पिठात पाणी घातल्याबिगर भाकरी थापता येत न्हाई पोरी,

जगाची रीतच अशी ही सासुरवास कुणाला चुकलाय का?

कसा संसार उभा जन्म केला आमचं आम्हाला ठावं. “

 

मग आठवलं मला बालपण,

ताईने अंगणात आखलेली ती रिंगणं…

दगडाची चीप रिंगणात टाकून लंगडी खेळत म्हणायची,

“माझ्या नादाला कुणी जर लागलं तर,

एका फटक्यात आडवी करीन… “

तेव्हा आई म्हणायची

” उद्या लगीन झाल्यावर कळल तुला.

सासू एका दणक्यात सरळ करील. “

 

नाक फुगवत ताई म्हणायची

“अगं सासू असू दे न्हायतर नवरा.

मी करीन त्याचा भवरा.. “

 

आम्ही सगळे खळखळून हसायचो…

आणि ताई वाघिणीसारखी चालत म्हणायची,

“नाद करायचा न्हाय माझा चल हो बाजूला. “

आणि राजकुमारी असल्यागत ऐटीत झोक्यावर जाऊन बसायची.

 

आत्ता हीच वाघीण शेळी होऊन बसली होती

आज्जी सांगत होती.. आणि ताई फक्त मान डोलवत होती.

व्यवस्थेच्या पिंजऱ्यात ठेवलेली कोंबडीच ना शेवटी ती…

फरक इतकाच… मरेपर्यंत धगीवर शिजत राहते बस इतकंच…

 

जरा काय झालं, कुणी काय बोललं की,

रुसून लगेच माहेराला यायची.

माहेरपण जगायची..

चार दिवसात राग संपायचा

कुणीतरी समजूत काढायचं.

मग अचानक भावजी यायचे

चिमणी पुन्हा हसायची.. सगळं विसरायची.

आणि परत तिच्या चिमण्यासोबत निघायची…

 

“सासरच्या घरी जाताना अर्धं पोतं ज्वारी,

थोडंसं गहू, जमलंच तर वायशी तांदूळ,

आणि बरणीभर लोणचं, थोडीशी चटणी… 

आणि तिच्या काळजाची वाटणी करून

तिची निरोपाची पावलं चालू लागायची

 

गाडी यायची.. गडबड व्हायची

सामान अगोदर आत.. नंतर आमची चिमणी.. मग भावजी आत

खिडकीतून हात हातात यायचा

तिचे पाणावलेले डोळे.. त्या हिरव्या बांगड्या..

आणि खिडकीच्या काचेतून बाहेर हसत असलेलं..

तिचं तिच्या जन्मासोबत आलेलं स्वातंत्र्य…

 

टांग… टांग… घंटा वाजायची

तिचं स्वातंत्र्य आकाशात भुर्रकन उडून जायचं…

कंडक्टर दार जोरात ओढून घ्यायचा.

गाडी पुढे जायची..

 

तेव्हा… मला दिसायचं

गाडीच्या पाठीमागे लिहिलेले वाक्य..

 

“मुलापेक्षा मुलगी बरी

प्रकाश देते दोन्ही घरी”

——

© श्री नितीन सुभाष चंदनशिवे (दंगलकार)

लेखक / कवी

संपर्क – मु. पोस्ट. कवठेमहांकाळ, जि. सांगली.

मो 7020909521

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ “सुटल्या गाठी…” ☆ सौ राधिका भांडारकर ☆

सौ राधिका भांडारकर

? कवितेचा उत्सव ?

☆ “सुटल्या गाठी...” ☆ सौ राधिका भांडारकर ☆

(अनलज्वाला वृत्त ८+८+८)

☆

साक्षीभावे पाही जेव्हा गतकालाला

जाणवते  मज अपार तृप्ती  शांत मनाला

 *

हळूच मग मी पीळ उसवते बंधनातला

तो एक श्वास मुक्त मोकळा तेव्हा सुटला

 *

सुटल्या गाठी सुटली माया निरोप समयी

विरक्त झाले संसारी मी नच लोभमयी

 *

त्या काळाच्या गाठोड्याला कशास उपसा

का अडकावे  पुनश्च आता  नुसता जलसा

*

मावळतीचे रंग मनाला किती भुलवती

बघायचे का वळून मागे वळणावरती

 *

आयुष्याच्या चौरंगावर विणले धागे

जो येतो तो जातो सारे ठेवित मागे

*

नकोत गाठी नकोत भेटी अलिप्त व्हावे

जळी राहोनि कोरडेपणी सुख मानावे

*

सुखदुःखाच्या गाठी मधले  आर्त गुंतणे

काळासोबत विरुनी  जावो हेच मागणे

☆

© सौ. राधिका भांडारकर

ई ८०५ रोहन तरंग, वाकड पुणे ४११०५७

मो. ९४२१५२३६६९

radhikabhandarkar@yahoo.com

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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