हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – ऋषिकेश-हरिद्वार – भाग-२४ ☆ श्री सुरेश पटवा ☆

श्री सुरेश पटवा

(श्री सुरेश पटवा जी  भारतीय स्टेट बैंक से  सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों  स्त्री-पुरुष “गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की  (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं  तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व  प्रतिसाद मिला है। अब आप प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकते हैं यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर)

? यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – ऋषिकेश-हरिद्वार – भाग- २४ ☆ श्री सुरेश पटवा ?

ऋषिकेश-हरिद्वार

सामान्यत: ऋषिकेश जाने के लिए लोग हरिद्वार से होकर जाते हैं। देहरादून से एक सीधा रास्ता भी हरिद्वार जाता है। मसूरी से भी ऋषिकेश जाना चाहें तो पहाड़ों से गुज़रते आप ऋषिकेश पहुँच सकते हैं। मसूरी से आप सीधे यमनोत्री भी जा सकते हैं। वापसी लौटते समय पौंथी से रास्ता बदल कर टेहरी गढ़वाल से गंगोत्री भी जा सकते हैं। वहाँ से वापस ऋषिकेश आकर रुद्रप्रयाग पहुँचिए। रुद्रप्रयाग से केदारनाथ और बद्रीनाथ की यात्रा की जा सकती है। इस तरह ऋषिकेश छोटे चार धाम का प्रवेश द्वार है। ऋषिकेश (संस्कृत : हृषीकेश) उत्तराखण्ड के देहरादून जिले का एक हिन्दू तीर्थस्थल है। यह गढ़वाल हिमालय का प्रवेश्द्वार है। ऋषिकेश, हरिद्वार से 25 किमी उत्तर में तथा देहरादून से 43 किमी दक्षिण-पूर्व में स्थित है।

 ऋषिकेश

28 जुलाई 2021 को हम ग्यारह बजे के लगभग देहरादून से निकले। दाहिनी तरफ़ मैदान और बाईं तरफ़ हिमालय के पहाड़ बहुत सुंदर चित्रमय झांकी प्रस्तुत कर रहे थे। देहरादून से ऋषिकेश के रास्ते में एक स्थान थानो और भोगपुर गाँव के बीच एक पहाड़ी बड़ा झरना बरसाती पानी से बह रहा था। सामने से एक कार आती दिखी वह इस पार निकल आई। उसे निकलती देख हमारी टेक्सी के ड्रायवर मुबारक खान ने हमारी गाड़ी भी झरना पार करने को आगे बढ़ा दी। लेकिन हमारी तरफ़ पानी का बहाव तेज था। गाड़ी के आगे पानी का सैलाब बढ़ता गया और गाड़ी निकलने के पहले गाड़ी के चकों ने ज़मीन छोड़ दी और चके रेत में फ़्री घूमने लगे। गाड़ी में पानी भरने लगा। ड्राईवर को गाड़ी का एंजिन चालू रखने बोलकर तुरंत कार का दरवाज़ा खोलकर नीचे उतरना मुनासिब समझा क्योंकि कार के भीतर तेज़ी से पानी भरने लगा था। यदि आटोमेटिक लॉक बंद हो जाए और गाड़ी में पानी भरता रहे तो जान के लाले पड़ सकते थे। इसलिए कार का गेट खोलकर जैसे ही बाहर निकले कार के अंदर तेज़ी से पानी भर गया। सभी को बाहर निकालना पड़ा। सबने मिलकर खूब धक्के लगा कर गाड़ी निकालने की कोशिश की। राहगीरों की भीड़ लगने लगी। दो लड़के मोटर साईकिल से भोगपुर की तरफ़ जा रहे थे। उन्होंने आकर गाड़ी को धक्का देकर निकालने में मदद की। लेकिन गाड़ी हिली तक नहीं।

गाड़ी को धक्का लगाने के प्रयास में हमारा एक मोबाईल पानी में गिर गया। बहुत ढूँढा पर नहीं मिला। सब घबरा गए। बहुत कोशिश की गाड़ी नहीं निकली। दूसरे मोबाईल से उत्तराखंड राज्य के रेस्कू टीम को 112 पर खबर दी। इसके पहले उनकी टीम आए। आठ दस लोग आ गए। उनमें एक बड़ी बोलेरो लोडिंग गाड़ी भी थी। पास में ही जुगाड़ का तार मिल गया। कार को तार से बांध कर गाड़ी खींच कर बाहर निकाली। जान में जान आयी।

धक्का लगाने वालों में एक लड़के का नाम न्यूटन आस्टिन था। वह ईसाई प्रचारक था। उसे पानी में गिरे मोबाईल मिलने पर सूचना देने हेतु अपना नम्बर देकर हम ऋषिकेश की तरफ़ बढ़ गए। ऋषिकेश पहुँचने पर उसका संदेश आया कि हमारा मोबाईल मिल गया है। उसे लेने बीस किलोमीटर दूर उनके घर पहुँचना होगा। हम ऋषिकेश भ्रमण करके उनके घर पहुँचे। उन्होंने चाय नाश्ता कराया और हमारा मोबाईल हमें दिया। हमने उन्हें मिठाई के लिए पाँच सौ रुपए देकर उनसे बिदा ली। गाड़ी में पानी भरने से लग़ेज में रखे हमारे सारे कपड़े गीले हो गए। एक भी कपड़ा सूखा नहीं बचा। 

ऋषिकेश हिमालय का प्रवेश द्वार है। जहाँ गंगा पर्वतमालाओं को पीछे छोड़ समतल धरातल की तरफ तेज़ी से आगे बढ़ती जाती है। ऋषिकेश का शान्त वातावरण कई विख्यात आश्रमों का घर है। उत्तराखण्ड में समुद्र तल से 1360 फीट की ऊँचाई पर स्थित ऋषिकेश भारत के पवित्र तीर्थस्थलों में एक है। हिमालय की निचली पहाड़ियों और प्राकृतिक सुन्दरता से घिरे इस धार्मिक स्थान से प्रवाहित गंगा नदी इसे अतुल्य बनाती है। ऋषिकेश को केदारनाथ, बद्रीनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री का प्रवेशद्वार माना जाता है। हर साल यहाँ के आश्रमों में बड़ी संख्या में तीर्थयात्री ध्यान लगाने और मन की शान्ति के लिए आते हैं। विदेशी पर्यटक भी यहाँ आध्यात्मिक सुख की चाह में नियमित रूप से आते रहते हैं।

ऋषिकेश से सम्बन्धित अनेक धार्मिक कथाएँ प्रचलित हैं। कहा जाता है कि समुद्र मन्थन के दौरान निकला विष शिव ने इसी स्थान पर पिया था। विष पीने के बाद उनका गला नीला पड़ गया और उन्हें नीलकण्ठ के नाम से जाना गया। शिव ने केदार में गंगा को जटा में इसी स्थान पर ऋषि स्वरुप धारण कर केश से गंगा को हरिद्वार में अवतरित किया था। जहाँ गंगा ने विष्णु की चरण वंदना कर मैदान में प्रवेश किया था। एक अन्य अनुश्रुति के अनुसार भगवान राम ने वनवास के दौरान यहाँ के जंगलों में कुछ समय व्यतीत किया था। रस्सी से बना लक्ष्मण झूला इसका प्रमाण माना जाता है। विक्रमसंवत 1996 में लक्ष्मण झूले का पुनर्निर्माण किया गया। यह भी कहा जाता है कि ऋषि रैभ्य ने यहाँ ईश्वर के दर्शन के लिए कठोर तपस्या की थी। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान हृषीकेश के रूप में प्रकट हुए। तब से इस स्थान को ऋषिकेश नाम से जाना जाता है।

गंगा नदी के एक किनारे को दूसरे किनारे से जोड़ता लक्ष्मण झूला नगर की विशिष्ट पहचान है। इसे विक्रम सम्वत् 1996 में वर्तमान रूप दिया गया था। कहा जाता है कि गंगा नदी को पार करने के लिए लक्ष्मण ने इस स्थान पर जूट का झूला बनवाया था। झूले के बीच में पहुँचने पर वह हिलता हुआ प्रतीत होता है। 450 फीट लम्बे इस झूले के समीप ही लक्ष्मण और रघुनाथ मन्दिर हैं। झूले पर खड़े होकर आसपास के खूबसूरत नजारों का आनन्द लिया जा सकता है। लक्ष्मण झूला के समान राम झूला भी नजदीक ही स्थित है। यह झूला शिवानन्द और स्वर्ग आश्रम के बीच बना है। इसलिए इसे शिवानन्द झूला के नाम से भी जाना जाता है। ऋषिकेश मैं गंगाजी के किनारे की रेत बड़ी ही नर्म और मुलायम है, इस पर बैठने से यह माँ की गोद जैसी स्नेहमयी और ममतापूर्ण लगती है, यहाँ बैठकर दर्शन करने मात्र से असीम शान्ति और रामत्व का उदय होने लगता है। ऋषिकेश में स्नान करने का प्रमुख घाट है जहाँ प्रात: काल में अनेक श्रद्धालु पवित्र गंगा नदी में डुबकी लगाते हैं। इसी स्थान से गंगा नदी दायीं ओर मुड़ जाती है। गोधूलि वेला में यहाँ की नियमित पवित्र आरती का दृश्य अत्यन्त आकर्षक होता है।

स्वामी विशुद्धानन्द द्वारा स्थापित आश्रम ऋषिकेश का सबसे प्राचीन आश्रम है। स्वामी जी को ‘काली कमली वाले’ नाम से भी जाना जाता था। इस स्थान पर बहुत से सुन्दर मन्दिर बने हुए हैं। यहाँ खाने पीने के अनेक होटल हैं जहाँ केवल शाकाहारी भोजन ही परोसा जाता है। आश्रम के आसपास हस्तशिल्प के सामान की बहुत सी दुकानें हैं।

लगभग 5,500 फीट की ऊँचाई पर स्वर्ग आश्रम की पहाड़ी की चोटी पर नीलकण्ठ महादेव मन्दिर स्थित है। कहा जाता है कि भगवान शिव ने इसी स्थान पर समुद्र मन्थन से निकला विष ग्रहण किया था। विषपान के बाद विष के प्रभाव  से उनका गला नीला पड़ गया था और उन्हें नीलकण्ठ नाम से जाना गया था। मन्दिर परिसर में पानी का एक झरना है जहाँ भक्तगण दर्शन करने से पहले स्नान करते हैं।

भरत मंदिर ऋषिकेश का सबसे प्राचीन मन्दिर है जिसे आदि गुरू शंकराचार्य ने बनवाया था। भगवान राम के छोटे भाई भरत को समर्पित यह मन्दिर त्रिवेणी घाट के निकट ओल्ड टाउन में स्थित है। मन्दिर का मूल रूप 1398 में तैमूर आक्रमण के दौरान क्षतिग्रस्त कर दिया गया था। हालाँकि मन्दिर की बहुत सी महत्वपूर्ण चीजों को उस हमले के बाद आज तक संरक्षित रखा गया है। मन्दिर के अन्दरूनी गर्भगृह में भगवान विष्णु की प्रतिमा एकल शालीग्राम पत्थर पर उकेरी गई है। आदि गुरू शंकराचार्य द्वारा रखा गया श्रीयन्त्र भी यहाँ देखा जा सकता है।

लक्ष्मण झूले को पार करते ही कैलाश निकेतन मन्दिर है। 12 खण्डों में बना यह विशाल मंदिर ऋषिकेश के अन्य मन्दिरों से भिन्न है। इस मंदिर में सभी देवी देवताओं की मूर्तियाँ स्थापित हैं।

ऋषिकेश से 22 किलोमीटर की दूरी पर 3,000 साल पुरानी वशिष्ठ गुफा बद्रीनाथ-केदारनाथ मार्ग पर स्थित है। इस स्थान पर बहुत से साधुओं विश्राम और ध्यान लगाए देखे जा सकते हैं। कहा जाता है यह स्थान भगवान राम और बहुत से राजाओं के पुरोहित वशिष्ठ का निवास स्थल था। वशिष्ठ गुफा में साधुओं को ध्यानमग्न मुद्रा में देखा जा सकता है। गुफा के भीतर एक शिवलिंग भी स्थापित है। यह जगह पर्यटन के लिये बहुत मशहूर है।

राम झूला पार करते ही गीता भवन है जिसे 2007 में श्री जयदयाल गोयन्दकाजी ने बनवाया था। यहां रामायण और महाभारत के चित्रों से सजी दीवारें इस स्थान को आकर्षण बनाती हैं। यहां एक आयुर्वेदिक डिस्पेन्सरी और गीताप्रेस गोरखपुर की एक शाखा भी है। प्रवचन और कीर्तन मन्दिर की नियमित क्रियाएँ हैं। शाम को यहां भक्ति संगीत का आनन्द लिया जा सकता है। तीर्थयात्रियों के ठहरने के लिए यहाँ सैकड़ों कमरे हैं।

ऋषिकेश से नीलकण्ठ मार्ग के बीच मोहनचट्टी स्थान आता है जिसका नाम है फूलचट्टी, यह स्थान बहुत ही शान्त वातावरण का है यहाँ चारो और सुन्दर वादियाँ है। नीलकण्ठ मार्ग पर मोहनचट्टी आकर्षण का केंद्र बनता है |

अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान का अस्पताल परिसर 400 मीटर के दायरे में फैला है देखने योग्य भव्य ईमारत है, इसके कई भाग हैं-ट्रॉमा सेण्टर, Emergency आदि।

ऋषिकेश घूमकर आठ बजे रात को हरिद्वार लेवल होटल में रुके। होटल के चारों तरफ़ खाने-पीने की दुकानों का अम्बार लगा था लेकिन बाहर निकलने को कपड़े ही नहीं थे इसलिए होटल के ज़रूरत से ज़्यादा महँगे मीनू कार्ड से भिंडी मसाला और चपाती का सेवन कमरे में किया।

जब सामान खोल कर देखा तो सभी कपड़े और अन्य सामान पानी से तरबितर मिले। यह तय किया कि सभी कपड़ों की गीज़र के गर्म पानी में निथार कर सुखाए जाएँ। दस-बारह हैंगर मंगा कर उनमें कपड़े फँसाकर पंखे की हवा में सूखने डाले। कपड़ों से टपकता पानी देख श्रीमती जी ने एक लम्बी रस्सी ढूँढ निकाली उसे कमरे में आरपार बांधने की कोशिश दो घंटे होती रही लेकिन कपड़ों के वज़न से रस्सी टूट जाती थी। हारकर कपड़ों को यहाँ वहाँ फैलाया। सौम्या ने एक प्रेस करने वाली स्त्री मंगा ली। दूसरे दिन पहनने के लिए एक जींस और दो टॉप प्रेस से सुखा लिए। दो बजे रात तक यही सब चलता रहा।

क्रमशः…

© श्री सुरेश पटवा 

भोपाल, मध्य प्रदेश

*≈ सम्पादक श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – इंद्रधनुष्य ☆ “Mind–Body Connection.. कसे?”  – मूळ लेखक व अनुवादक : अज्ञात ☆ प्रस्तुती – सौ. मंजुषा सुनीत मुळे ☆

सौ. मंजुषा सुनीत मुळे

? इंद्रधनुष्य ?

☆ “Mind–Body Connection.. कसे?”  – मूळ लेखक व अनुवादक : अज्ञात ☆ प्रस्तुती – सौ. मंजुषा सुनीत मुळे ☆

“Mind–Body Connection” 

: किंवा अंतिम प्लासिबो इफेक्ट.

काठीच्या आधाराने चालणाऱ्या वृद्ध पुरुषांचा एक गट एका घरात शिरला… आणि आठवड्याभराने ते धावत बाहेर पडले!

ना औषध, ना शस्त्रक्रिया.

… फक्त त्यांच्या मेंदूतला एक छोटासा स्विच ‘ऑन’ केल्यामुळे.

कसे? …

 

ही घटना १९७९ साली घडली.

हार्वर्ड विद्यापीठातील एक अत्यंत बुद्धिमान मानसशास्त्रज्ञ – डॉ. एलेन लॅंगर – यांनी काहीतरी विलक्षण करण्याचा निर्णय घेतला. त्यांना टाइम ट्रॅव्हल करायचे होते, पण कोणत्याही मशीनशिवाय.

 

त्यांनी जवळजवळ ८० वर्षांचे आठ वृद्ध पुरुष निवडले. काहींना काठीशिवाय चालता येत नव्हते, काहींचे हात थरथरत होते, काहींना मोतीबिंदू होता, तर काहींना स्वतःचे नावसुद्धा नीट आठवत नव्हते.

 

त्यांच्या मुलांना वाटले की त्यांच्या वडिलांना वृद्धाश्रमात पाठवले जात आहे.

पण त्यांना हे माहीत नव्हते की त्यांच्या वडिलांना १९५९ सालात पाठवले जात होते!

 

नाही, कोणतेही जादुई जग नव्हते.

डॉ. लॅंगर यांनी बोस्टनमधील एका जुन्या मठाची सजावट पूर्णपणे १९५९ च्या शैलीत केली होती. तिथे १९७९ चा कसलाही मागमूस नव्हता. टीव्ही काळा-पांढरा होता, त्यावर १९५९ मधील बातम्या आणि Ed Sullivan Show चालू होते. रेडिओवर त्या काळातील गाणी होती. मासिके, वर्तमानपत्रे—सगळेच वीस वर्षे जुने!

 

आता कथेतला पहिला धक्का…

 

ते आठ वृद्ध पुरुष तिथे पोहोचल्यावर त्यांना वाटले की कोणी तरी येऊन त्यांचे सामान खोलीत नेऊन देईल—जसं त्यांच्या घरी होत असे.

 

पण डॉ. लॅंगर ठामपणे म्हणाल्या,

“इथे कोणीही तुमची मदत करणार नाही. तुम्हालाच तुमच्या बॅगा उचलून न्याव्या लागतील. ”

 

ते चिडले, कुरकुरले.

पण पर्याय नसल्यामुळे जड सूटकेसेस घेऊन जिना चढले.

– – आणि तिथेच त्यांच्या मेंदूला पहिला संदेश गेला—

“मी असहाय नाही… मी हे करू शकतो. ”

 

एकच अट होती—या एका आठवड्यासाठी त्यांना असे वागायचे होते की साल १९५९ आहे.

 

त्यांना भूतकाळात बोलायचे नव्हते, फक्त वर्तमानकाळात.

उदा. “आत्ता राष्ट्राध्यक्ष आयझेनहॉवर काय करत आहेत? ”

किंवा “हवाना मध्ये कास्त्रो काय करत आहेत? ”

 

त्या काळातील राजकारण, खेळ, चित्रपट—सगळ्यांवर चर्चा करायची होती, जणू ते अजूनही तिथेच जगत होते… ज्या वयात त्यांच्यात जी ऊर्जा होती—५५–६० वर्षांची—त्याच ऊर्जेने बोलायचे होते.

 

पहिले दोन दिवस फार अवघड गेले. पण तिसऱ्या दिवसापासून एक विचित्र जादू सुरू झाली… 

 

संधिवातामुळे सरळ बसू न शकणारा माणूस आता जेवणाच्या टेबलावर ताठ बसून राजकारणावर वाद घालत होता.

ज्याला नीट ऐकू येत नव्हते, तो रेडिओचा आवाज कमी करून गाणी ऐकत होता.

 

.. ते संपूर्ण वातावरणच त्यांना सांगत होते—

“तुम्ही म्हातारे नाही… तुम्ही अजूनही मजबूत, मध्यमवयीन आहात. ”

 

सर्वात मोठा धक्का आठवड्याच्या शेवटच्या दिवशी बसला.

– – आश्रमासमोरील मैदानातले दृश्य पाहून डॉ. लॅंगर यांना स्वतःच्या डोळ्यांवर विश्वास बसत नव्हता.

आठवडाभरापूर्वी बसमधून उतरताना इतरांची मदत घेणारे हे वृद्ध पुरुष आता मैदानात ‘टच फुटबॉल’ खेळत होते! हो, फुटबॉल!

त्यांना धावताना पाहून असं वाटत होतं, जणू त्यांचे वय खरंच २० वर्षांनी कमी झाले आहे.

 

प्रयोगाच्या शेवटी जेव्हा त्यांची शारीरिक तपासणी झाली, तेव्हा डॉक्टरही थक्क झाले.

– – त्यांची पकड (grip strength) वाढली होती, सांध्यांची लवचिकता सुधारली होती, दृष्टी आणि श्रवणशक्तीही सुधारली होती! चष्म्याशिवाय लहान अक्षरे वाचता येत होती.

त्यांचा IQ स्कोअरही वाढला होता.

 

सगळ्यात रंजक गोष्ट म्हणजे—

प्रयोगापूर्वी आणि नंतरचे फोटो जेव्हा अशा लोकांना दाखवले गेले ज्यांना या प्रयोगाबद्दल काहीच माहीत नव्हते, ते म्हणाले,

“नंतरच्या फोटोमध्ये हे लोक खूपच तरुण दिसतात! ”

 

– – म्हणजे फक्त त्यांची भावना नाही, तर चेहऱ्यावरील सुरकुत्याही कमी झाल्या होत्या.

जैविकदृष्ट्याही त्यांचे वय मागे गेले होते!

 

डॉ. एलेन लॅंगर यांनी हे सिद्ध केले की जेव्हा आपण स्वतःला सांगतो—

“मी म्हातारा झालोय, आता माझ्याकडून होत नाही”—

तेव्हा आपले शरीर ते मान्य करते आणि हळूहळू बंद पडू लागते.

 

आपला समाज आपल्याला शिकवतो की म्हातारपण म्हणजे आजारपण.

आणि आपण तेच स्क्रिप्ट फॉलो करतो.

 

पण जेव्हा त्या वृद्ध लोकांचे वातावरण बदलले आणि त्यांना अजूनही तरुण आहोत असे वाटायला लावले, तेव्हा त्यांच्या शरीरानेही तसाच प्रतिसाद दिला.

 

– – यालाच म्हणतात “Mind–Body Connection” — किंवा अंतिम प्लेसिबो इफेक्ट!

 

म्हणून मित्रांनो,

कधी कधी म्हणता 

“मूड नाहीये, थकवा आलाय, माझ्याकडून नाही होणार…”

 

— तेव्हा जरा विचार करा 

८० वर्षांचे लोक फक्त विचार बदलून काठ्या फेकून देतात आणि फुटबॉल खेळतात, तर तू काय नाही करू शकणार?

.. तुझ्या मर्यादा शरीरात नाहीत, त्या मनात आहेत.

.. जेव्हा तू स्वतःला कमकुवत समजतोस, तेव्हा तू कमकुवत होतोस.

.. आणि जेव्हा तू स्वतःला सुपरहिरो समजतोस, तेव्हा मेंदू शरीराला तसा सिग्नल देतो.

 

फोन बाजूला ठेव, आरशात बघ आणि म्हण—

“मी बॉस आहे. माझ्या ऊर्जेला मर्यादा नाहीत. ”

 

माझ्यावर विश्वास ठेव—

तुझं शरीर ते ऐकायलाच लागेल.

 

सुरुवात कर.

जग तुझी वाट पाहत आहे!!!

*******

लेखक व अनुवादक : अज्ञात

प्रस्तुती : सौ. मंजुषा सुनीत मुळे

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – उत्तराखंड तराई क्षेत्र – भाग-२३ ☆ श्री सुरेश पटवा ☆

श्री सुरेश पटवा

(श्री सुरेश पटवा जी  भारतीय स्टेट बैंक से  सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों  स्त्री-पुरुष “गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की  (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं  तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व  प्रतिसाद मिला है। अब आप प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकते हैं यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर)

? यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – उत्तराखंड तराई क्षेत्र – भाग- २३ ☆ श्री सुरेश पटवा ?

सहस्त्रधारा देहरादून

सुबह दस बजे गेस्ट हाऊस से रवाना हुए। देहरादून से राजपुर सड़क से दाहिनी तरफ़ के रास्ते पर 16 किलोमीटर की दूरी पर एक गांव है रामपुर। इस गांव में बहने वाला गंधक झरना अपनी औषधीय गुणों के लिए बहुत प्रसिद्ध है। ऐसा माना जाता है की त्वचा से जुड़ी बीमारियों के लिये इस झरने से बहने वाला पानी बहुत उपयोगी होता है। विश्वास है कि इस झरने के पानी से नहाने पर कई तरह के त्वचा रोगों को खत्म किया जा सकता है।

पहाड़ियों के बीच से रिमझिम बारिश के साथ चलते हुए सहस्त्रधारा पहुँच गए। इस जगह का नाम सहस्त्रधारा रखे जाने का कारण बहुत रोचक है, इस जगह के पास स्थित पहाड़ो में बहुत छोटी-छोटी गुफाएं बनी है। इन सभी छोटी-छोटी गुफाओं के अंदर से बूंदों के रूप मे लगातार पानी टपकता रहता है। यह पानी एकत्र होकर बहुत सारी छोटी-छोटी धारा के रूप में आगे बढ़ता है। यहाँ बहने वाली पानी की छोटी-छोटी धाराएँ तलहटी में पहुंच कर एक बड़ी धारा का रूप ले लेती है इस वजह से इस जगह को सहस्त्रधारा कहा जाता है। पहाड़ो की तलहटी में बसे होने की वजह से प्राकृतिक रूप से भी बहुत ज्यादा सुंदर और मनमोहक जगह है। वर्तमान में सहस्त्रधारा एक पारिवारिक पिकनिक स्पॉट के रूप में बहुत ज्यादा प्रसिद्ध है।

मालसी डियर पार्क देहरादून

सहस्त्रधारा से देहरादून वापस लौटते समय राजपुर सड़क पर स्थित मालसी डियर पार्क पहुँचे। 22 एकड़ में फैला हुआ यह डियर पार्क परिवार और बच्चों के लिए सबसे शानदार जगहों में से एक है। इस पार्क के अंदर डियर के अलावा अन्य वन्यजीवों में मोर और नीलगाय, जैसे जानवर और पक्षी दिखाई देते है। बच्चों के मनोरंजन के लिए पार्क कुछ झूले भी लगाए हुए है। सप्ताहांत में स्थानीय निवासी मालसी डियर पार्क में आना बेहद पसंद करते है।

रोबर्स केव (गुचुपानी) देहरादून

रोबर्स केव देहरादून से 8 किलोमीटर दूर अनारवाला गांव में स्थित देहरादून का सबसे ज्यादा रोमांचक पर्यटक स्थल है। स्थानीय निवासी रोबर्स केव को गुचुपानी के नाम से पुकारते है। रोबर्स केव एक प्राकृतिक गुफा है जिसकी लंबाई लगभग 600 मीटर है।

इस गुफा की सबसे रोमांचक बात यह है की इस गुफा में पूरे साल घुटनों तक पानी बहता रहता है, इसलिए जब आप इस गुफा में प्रवेश करते है तो आपको एक अलग ही रोमांच महसूस होता है। आप जैसे-जैसे रोबर्स केव में अंदर जाते है तो कई जगह गुफा सँकरी हो जाती है। इस गुफा में वैसे तो पानी के मुख्य स्त्रोत अभी तक पता नहीं चला है लेकिन गुफा के अंदर लगभग 10 मीटर ऊंचाई से एक झरना गिरता है।

स्थानीय निवासियों का ऐसा मानना है की बहुत पहले इस जगह का उपयोग चोर और डाकू छुपने के लिए किया करते थे इस वजह से इस गुफा को रोबर्स केव के नाम से जाना जाने लगा। रोबर्स केव के आसपास स्थानीय निवासियों ने खाने पीने की दुकाने लगा रखी है। गुफा में आप के जूते या सैंडल खराब ना हो इसलिए अंदर पानी में चलने के लिए रोबर्स केव के पास आपको चप्पल भी किराए पर मिल जाएगी।

टपकेश्वर मंदिर देहरादून –

देहरादून से 5.5 किलोमीटर दूर गढ़ी केंट में एक प्राचीन शिव मंदिर है। यह प्राचीन शिव मंदिर गढ़ी केंट में बहने वाली एक छोटी नदी के किनारे पर बना हुआ है। इस प्राचीन मंदिर को टपकेश्वर महादेव के नाम से जाना जाता है। टपकेश्वर मंदिर का इतिहास महाभारत काल से जुड़ा हुआ है। ऐसा माना जाता है कि गुरु द्रोणाचार्य के पुत्र अश्वथामा का जन्म इसी स्थान पर हुआ था।

आज भी इस प्राचीन शिवलिंग पर चट्टान से लगातार पानी की बूंदे टपकती रहती है इसलिये इस मंदिर को टपकेश्वर महादेव के नाम से पुकारा जाता है। टपकेश्वर महादेव मंदिर के पास एक छोटी नदी भी बहती है जिसमें यहाँ आने वाले पर्यटक और श्रद्धालु नहाने का आनदं भी ले सकते है।

इस मंदिर और इस स्थान को लेकर गुरु द्रोण और उनके पुत्र अश्वथामा को लेकर एक रोचक कथा प्रचलित है। एक बार की बात है गुरु द्रोण के पुत्र अश्वथामा को एक बार बहुत जोर से भूख लगती है तो वह अपने माता पिता से पीने के लिए दूध मांगते है। गुरु द्रोण अपने पुत्र के दूध की मांग को पूरा करने में असमर्थता दिखाते है। गुरु द्रोण की इस बात से दुखी होकर अश्वथामा उसी समय भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिये तपस्या करने लग जाते है। कुछ समय के बाद अश्वथामा की तपस्या से प्रसन्न हो कर भगवान शिव तपस्या स्थल पर पर दूध की धारा बहा देते है और इस प्रकार अश्वथामा की भूख शान्त होती है। कहते हैं उस समय के बाद से ही यहाँ स्थित गुफा की चट्टान से शिवलिंग पर दूध की बूंदे टपक रही है। हमें दूध की बूँदें नहीं दिखीं। वहाँ एक पंडित जी ने बताया कि पापियों को दूध की बूँदें नहीं दिखतीं।

फारेस्ट रिसर्च इंस्टिट्यूट देहरादून

देहरादून में स्थित वन अनुसंधान संस्थान भारत का सबसे बड़ी प्राकृतिक अनुसंधान संस्थान है। देहरादून के घण्टाघर से वन अनुसंधान संस्थान की दूरी लगभग 6 किलोमीटर है। भारत में इसका निर्माण 1906 में ब्रिटिश शासनकाल के दौरान किया गया था। इस संस्थान की इमारत अपने ग्रीक-रोमन वास्तुशैली में बने हुए होने के कारण पूरे विश्व में प्रसिद्घ है। वन अनुसंधान संस्थान की इमारत का आकार भी इसकी प्रसिद्ध का बहुत बड़ा कारण है, यह इमारत लगभग 450 हेक्टेयर क्षेत्र में बनी हुई है।

वन अनुसंधान संस्थान में वानिकी से जुड़े छह संग्रहालय बने हुए है। इन छह संग्रहालय में जंगल-विज्ञान, कीट-विज्ञान, सामाजिक वानिकी, गैर-लकड़ी से बने वन उत्पाद, प्रकृति विज्ञान और लकड़ी की अलग-अलग किस्म का प्रदर्शन किया गया है। इस संस्थान में संग्रहालय के अलावा यहाँ बना हुआ उद्यान भी पर्यटकों के आकर्षण का विशेष केंद्र रहता है। फ़िल्म इंडस्ट्री की कुछ बड़ी फिल्मों का फिल्माकंन भी इसी वन अनुसंधान संस्थान में किया गया है। वनस्पति विज्ञान और जंगल विज्ञान से जुड़े हुए लोगों के लिए यह संस्थान किसी खजाने से कम नहीं है। वन अनुसंधान संस्थान के अंदर फोटोग्राफी पूरी तरह से प्रतिबंधित है। 

झंडा जी दरबार साहिब

देहरादून में झंडा दरबार साहिब सिख समुदाय की धार्मिक आस्था का बहुत बड़ा केंद्र है, और देहरादून के नामकरण का इतिहास भी झंडा गुरु दरबार साहिब से जुड़ा हुआ है। बाबा राम राय (1745-1687) सातवें सिख गुरु हर राय के सबसे बड़े पुत्र और आठवें गुरु हर कृष्ण दास के भाई थे। औरंगज़ेब ने आठवें गुरु हर कृष्ण दास और राम राय में फूट डालने के उद्देश्य से राम राय को दिल्ली में सिक्ख पंथ की जड़ें मज़बूत करने हेतु कई सहूलियतें दीं और जिस जगह आज देहरादून आबाद है वहाँ गुरुद्वारा स्थापना हेतु मदद दी।

मंदिर का केंद्रीय परिसर गुरु राम राय की मृत्यु के बारह साल बाद 1699 में पूरा हुआ था, और पूरा संरचनात्मक कार्य 1703 और 1706 के बीच समाप्त हो गया था; माना जाता है कि संरचना के पूरा होने के बाद भी अलंकरण और पेंटिंग का काम लंबे समय तक चलता रहा। गुरु राम राय की पत्नी माता पंजाब कौर ने निर्माण कार्य की देखरेख की और 1741/42 में अपनी मृत्यु तक दरबार के मामलों का प्रबंधन किया।

राम राय सिख धर्म में एक अपरंपरागत संप्रदाय, रामरायस के संस्थापक थे। उन्होंने गुरु राम राय दरबार साहिब की स्थापना की, जो देहरादून में एक गुरुद्वारा है जिसे इंडो-इस्लामिक वास्तुकला शैली में बनाया गया था। उन्होंने गढ़वाल के समकालीन महाराजा फतेह शाह से राम राय को हर संभव मदद देने के लिए कहा। प्रारंभ में, धमावाला में एक गुरुद्वारा (मंदिर) बनाया गया था। वर्तमान भवन, गुरु राम राय दरबार साहिब का निर्माण 1707 में पूरा हुआ था। दीवारों पर देवी-देवताओं, संतों, संतों और धार्मिक कहानियों के चित्र हैं। फूलों और पत्तियों, जानवरों और पक्षियों, पेड़ों, नुकीली नाकों वाले समान चेहरे और मेहराबों पर बड़ी-बड़ी आँखों के चित्र हैं जो कांगड़ा-गुलेर कला और मुगल कला की रंग योजना के प्रतीक हैं। ऊंची मीनारें और गोल शिखर मुस्लिम वास्तुकला के नमूने हैं। सामने 230 गुणा 80 फीट का विशाल तालाब वर्षों से पानी की कमी के कारण सूख गया था। लोग कूड़ा फेंक रहे थे; इसे पुनर्निर्मित और पुनर्जीवित किया गया है। मुगल शैली से बनी हुई एक इमारत है।

झंडा गुरु दरबार साहिब में प्रत्येक वर्ष झंडा पर्व मनाया जाता है। देहरादून में होने वाला यह झंडा पर्व होली के दिन से पांच दिन बाद मनाया जाता है जो आठ दिन तक चलता है। यहाँ होने वाले झंडा पर्व में लाखों की संख्या में गुरु राम राय के अनुयायी और सिख धर्म से जुड़े हुए श्रद्धालु दर्शन करने के लिए आते है।

बुद्ध मोनेस्ट्री

देहरादून से 11 किलोमीटर दूर स्थित बुद्ध मोनेस्ट्री जिसे Mindrolling Monastery के नाम से भी जाना जाता है। बौद्ध धर्म को बढ़ावा देने के लिये इस बौद्ध मंदिर का निर्माण कुछ बौद्ध भिक्षुओं द्वारा गया। जापानी वास्तुशैली में निर्मित इस बौद्ध मंदिर का निर्माण कार्य 1965 में पूरा हुआ।  

बौद्ध धर्म में आस्था रखने वाले और बहुत सारे देशी और विदेशी पर्यटक आते है। इस बौद्ध मंदिर के प्रमुख आकर्षण केन्द्र यहाँ स्थित 103 फ़ीट ऊंची भगवान बुद्ध की प्रतिमा और मंदिर के अंदर बनाई गई सुंदर पेंटिंग्स है। इन पेंटिग्स में भगवान बुद्ध के पूरे जीवन को बहुत ही सुंदर तरीके से उकेरा गया है।

इसके अलावा इस मंदिर की पांच मंजिला इमारत भी अपने वास्तुकला की वजह से पर्यटकों का ध्यान आकर्षित करती है। इस मंदिर की इमारत की ऊंचाई कुल 220 फ़ीट है और मंदिर की चौथी मंजिल से बहुत ही मन मोहक प्राकृतिक दृश्य दिखाई देते है। यहाँ आने वाले पर्यटकों की सुविधा के लिये मंदिर के परिसर में ही खाने पीने की दुकानें बनी हुई है और अगर आप की बौद्ध धर्म में रुचि है तो आप यहाँ से बौद्ध धर्म से जुड़ी पुस्तकें भी खरीद सकते है।

देहरादून के आस पास घूमने के लिए कुछ प्रसिद्ध पर्यटन स्थल  – धनोल्टी, नई टिहरी, टिहरी झील, ऋषिकेश, नरेंद्र नगर, नाग टिब्बा, राजाजी राष्ट्रीय उद्यान, मालसी डियर पार्क, मसूरी, हरिद्वार, चम्बा, दशावतार मंदिर, जोरांडा फाल्स, बरेहिपानी और न्यू टेहरी टाउनशिप, माताटीला डैम और देओगढ़ किला है। पर्यटक यहाँ पर कई एडवेंचर स्पोर्ट जैसे रिवर राफ्टिंग, बंजी जम्पिंग, रॉक क्लाइम्बिंग, हाईकिंग और ट्रैकिंग का आनंद भी ले सकते हैं। पेशेवर कैंप पर्यटकों को रुकने के साथ साथ अन्य सुविधाएं भी उपलब्ध करते है।

क्रमशः…

© श्री सुरेश पटवा 

भोपाल, मध्य प्रदेश

*≈ सम्पादक श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – मी प्रवासिनी ☆ आमची थोडी धार्मिक, आध्यात्मिक आणि निसर्ग सहल…! ☆ सौ.उज्वला सुहास सहस्त्रबुद्धे ☆

सौ.उज्वला सुहास सहस्त्रबुद्धे

☆ आमची थोडी धार्मिक, आध्यात्मिक आणि निसर्ग सहल… ☆ सौ.उज्वला सुहास सहस्त्रबुद्धे ☆

“केल्याने देशाटन, पंडित मैत्री, सभेत संचार, शास्त्र, ग्रंथ विलोकन मनुजा चातुर्य येतसे फार! “

फार पूर्वीपासून आपण हा श्लोक ऐकत आलो आहोत. पूर्वीच्या काळी प्रवास, सभा, दूर वर जाऊन शास्त्रांचा अभ्यास या गोष्टी थोड्या अवघड होत्या… त्यामुळे हे ज्याच्या हातून घडत असेल तो हुशार, चतुर आणि पंडित समजला जाई, पण काळ इतका झपाट्याने बदलला आहे की, आता फोन, मोबाईल, गुगल यामुळे जग क्षणात जवळ येत आहे. सुदैवाने आम्ही या बदलत्या काळात राहिलो आहोत. त्यामुळे आम्ही चौघी जावांनी ज्येष्ठ नागरिक असूनही स्वतःच्या जीवावर प्रथमच अशी लांबची ट्रिप आयोजित केली होती..

मुख्य म्हणजे साठे टूर्सचे मालक आमच्या नात्यातीलच असल्याने त्यांच्याकडून आम्हाला ट्रिप संबंधी सर्व मार्गदर्शन मिळाले. ट्रीपचा प्रत्येक दिवस एक एक स्थळ तसेच तेथील मुक्कामही त्यांनी आम्हाला बुक करून दिला होता. ट्रेनची तिकिटे, हॉटेल बुकिंग या दोन महत्त्वाच्या गोष्टी कळल्यावर आता ट्रिप ची तयारी करायला हरकत नाही असे वाटले. चौघींच्याही मुलांनी आम्हाला घराबाहेर पडायला प्रोत्साहन दिले हे विशेषच! अशा तऱ्हेने सर्व प्रकारची तयारी करून एक महिन्यापूर्वी आम्ही या ट्रिपसाठी पैसे भरले आणि आता शरीराने आणि मनाने ट्रिप साठी तयार झालो होतो. आत्ता पर्यंत नवऱ्याबरोबर फिरायची सवय, त्यामुळे महत्त्वाच्या गोष्टी त्यांच्याकडे सोपवल्या की, आम्ही फक्त कपड्यांच्या बॅगा भरणार! पण यावेळी सर्वच तयारी आपली आपण!

त्यातून कारवार, कर्नाटकात जायचं म्हणजे भाषेचा प्रश्न! पण आमच्या मोठ्या जाऊबाई कानडीच्या बऱ्यापैकी जाणकार असल्यामुळे त्यांनी ती बाजू सांभाळली. नंबर दोनच्या जाऊ बाई ही मार्गदर्शनाला तत्पर! मी आणि धाकटी जाऊ दोघींनी फायनान्स विभाग सांभाळला. ठराविक पैसे गोळा करून झालेला खर्च लिहिणे आणि पैसे सांभाळणे! असो, ही झाली ट्रीपची सुरुवात! नमनाला घडाभर तेल! प्रत्यक्षात ट्रिपचं वर्णन येणार आहेच!

आमचा उतू चाललेला उत्साह घेऊन 10- 1 -2026 रोजी रात्री पुणे रेल्वे स्टेशनवर जमलो, तेव्हा आम्ही पाल्य आणि आमची मुले पालक असल्याने नीट जा, काळजी घ्या, तब्येती सांभाळा, उगीच पळापळी करू नका वगैरे वगैरे सल्ले ते आम्हाला देत होते. आम्ही लहानपणी त्यांच्या मागे पळलो, आता ते आमच्या मागे! रिझर्वेशन मध्ये जागांची थोडी उलटापालट झाली होती. सर्वांची रिझर्वेशन तिकिटे वेगवेगळ्या कंपार्टमेंटमध्ये होती. , पण रात्रीचे अकरा वाजता ट्रेन सुटल्याने उद्या सकाळी बघू काही ॲडजस्टमेंट होते का? अशा विचाराने आम्ही आपापल्या 

बेडवर झोपलो. रात्री वेगवेगळी गावे, शहरे रेल्वे बरोबर मागे पडत होती. सकाळी सकाळी मिरज आले, पुढे रेल्वे कर्नाटकात शिरली आणि वातावरण बदलत गेले.

प्रत्येकीने ठरवल्याप्रमाणे लाडू, चिवडा, मेथी पराठे, गुळपोळ्या याशिवाय काही चटक-मटक पदार्थ घेतले होतेच, तरीही सकाळी इडली वडा हा गरम गरम नाश्ता आम्ही घेतला. गाडी जसजशी कर्नाटकात जात होती तशीच थंडी कमी जाणवू लागली पण बाहेरची हिरवी झाडी मनाला आनंद देऊ लागली!

 चौघी जावांच्या गप्पा तर अखंड चालू होत्या. बेळगाव नंतर लोंढ्याला ट्रेन ने ट्रॅक बदलला आणि वेग पकडला. संध्याकाळी पाचच्या दरम्यान उडपी स्टेशन आले.. आता बघायचे होते की, आपल्याला कोणती गाडी आणि ड्रायव्हर मिळणार आहे याची!

 आम्हाला गाडीचा नंबर आणि ड्रायव्हर कोण असेल ते कळवलेले होते, त्याप्रमाणे ‘जॉय’ या ड्रायव्हरची भेट झाली. “जॉय” खरोखरच जाॅयफुल, एनर्जेटिक माणूस होता! वयाने जेमतेम पंचविशीचा असेल पण त्याच्या कामात हुशार होता. त्याच्या कानडीला आमच्या मोठ्या वहिनी बरोबर समजून घेत होत्या. आम्ही आपले थोडा इंग्रजी, मराठीचा सहारा घेत संवाद करत होतो. सामान डिकीत टाकून आमची गाडी आमच्या पहिल्या हॉटेल मुक्कामावर गेली. हॉटेलचं नाव होतं ” *हॉटेल पर्ल”*

हॉटेल खरोखरच छान होतं! तिथे दोन खोल्यांचे बुकिंग होते. एका खोलीत नंबर १/२ आणि दुसऱ्या खोलीत नंबर ३/४ असा जावांचा क्रम होता. खोलीची पाहणी केली आणि प्रथम रूमवर चहा मागवला, फ्रेश झालो, तयार झालो, उडुपी ची फेरी मारायला बाहेर पडलो.

एका सरळ रस्त्याने जाऊन त्याच पावली परत येताना आईस्क्रीम आणि थोडी पोट पूजा केली आणि रूमवर परत आलो. कालची रात्र प्रवासात गेली होती, त्यामुळे आज रूमवर छान झोप लागली!

सकाळी ठरल्याप्रमाणे पहिली आवराआवरी करून उडपीच्या कृष्ण मंदिरात आलो. तिथे माझ्या तिन्ही जावांनी लिहिलेल्या भगवद्गीतेच्याप्रती दिल्या, प्रमाणपत्र घेतले. मी यात नसल्याने हॉलमध्ये बसले होते. तिथे लहान मुलांचा एक ग्रुप भगवद्गीता म्हणत होता. त्यांच्या मॅडमच्या मार्गदर्शनाखाली त्यांनी 2, 12 आणि 15 असे अध्याय म्हटले.. मला श्रवण भक्ती करता आली!

(आता गीता लिहिण्यासाठी मी आणली आहे, बघूया कधी संकल्प सुरू होईल आणि पूर्ण करेन)

त्यानंतर आम्ही प्रसादाच्या रांगेत उभे राहिलो तो अनुभव मात्र जरा जास्त त्रासदायक होता. गर्दी खूप होती, पण इतके कृष्णभक्त आहेत हे पाहून बरे वाटले. जवळपास दीड तास उभे राहिल्यावर दर्शन प्रसाद मिळाला. त्या दिवशी दुपारीच आम्ही मुरडेश्वर ला जायला निघालो. मुर्डेश्वर चे *आर एन एस गेस्ट* *हाऊस* वर आमचा दुसरा मुक्काम होता..

मुर्डेश्वर ला मसाल्याच्या पदार्थांची बरीच दुकाने होती. तिथे खरेदी करण्याचा मोह काही आवरला नाही! थोडे काजू घेतले. किरकोळ खरेदी म्हणत म्हणत बॅगा भरल्या जात होत्या!

हॉटेल समुद्राजवळच असल्याने मनसोक्त सागर दर्शन होत होते! शंकराचे मंदिर छानच! परिसर निसर्गरम्य असल्यामुळे खूपच छान वाटत होते. तिथे प्रसाद घेऊन दुपारी आम्ही गोकर्ण महाबळेश्वरला जाण्यास निघणार होतो.

आमचा ड्रायव्हर खूप उत्साही असल्यामुळे त्यांनी आम्हाला काही ठिकाणी स्वतः हून दाखवली. वाटेत एक मारुतीचे मंदिर बघायला मिळाले. सभोवतालचा निसर्ग बघत बघत आम्ही गोकर्ण महाबळेश्वरला निघालो होतो.. त्या छोट्याश्या प्रवासात आम्ही धारेश्वर आणि गुणवंतेश्वर ही दोन ठिकाणे पाहिली. त्या दिवशी मंगळवार असल्याने गणपती दर्शन मिळाले याचा आनंद वाटला!

13तारखेला सकाळी गोकर्ण महाबळेश्वर दर्शन खूप छान झाले. तरीही योगायोगाने काही अभिषेक वगैरे करायचा असल्यामुळे आम्हाला दुपारी पण देवळात जाऊन दर्शन घेता आले.

आम्हाला 14 तारखेला दुपारपर्यंत मडगाव येथे पोहोचायचे होते. मडगावहून निजामुद्दीन रेल्वे पकडायची होती.

14 तारखेच्या सकाळी हॉटेल वर भरगच्च नाश्ता करून सामानासह आम्ही बाहेर पडलो. ओम बीचवर गेलो, तेव्हा समुद्र पाहून मन प्रसन्न झाले. समुद्रात घुसलेल्या खडकांच्या एका रांगेने ओम चा आकार धारण केलेला आम्हाला दाखवला, संपूर्ण प्रवास समुद्राबरोबरच चालू होता, त्यामुळे मला तरी खूप छान वाटत होते! त्या बीच चे नाव ‘ *कुडले बीच’* असे होते. तिथे किनाऱ्यावर अनेक स्टॉल्स होते. ते पाहता पाहता किरकोळ खरेदी ही झालीच! वाटेत महाबलम् गुंफा पाहिली. शंकराचे वास्तव्य गुहेत पाहताना मन नेहमीच गंभीर होते!

ओम बीचवर फिरवून आमच्या सारथ्याने आम्हाला स्टेशनवर नेण्यासाठी गाडी काढली.. आमची ट्रेन 3-45वाजता होती. पण आम्ही सव्वा दोन वाजेपर्यंत स्टेशनवर पोहोचलो.

आता घराची ओढ लागली होती. खूप थकलो होतो… पाय भरभर उचलत नव्हते.. नाही- नाही म्हणत सामानाची एखादी पिशवी वाढली होतीच, त्यामुळे सामानासाठी कुली ठरवला आणि अर्थात ते बरेच झाले. कारण गाडी एक नंबर प्लॅटफॉर्मवर न लागता तीन किंवा चार नंबर वर येणार आहे.. अशी अनाउन्समेंट झाली. आम्ही चौघी सावकाशीने दादर चढून प्लॅटफॉर्म गाठला. कुली चांगला मिळाला. त्याने सामान चढवून दिले. इतरही लोकांनी आम्हाला मदत केली.

आता मात्र आम्हाला भूकही लागली होती.. सकाळच्या नाश्त्यानंतर खायला वेळच मिळाला नव्हता. संध्याकाळी दिप्ती ने आणलेल्या गुळपोळ्या आणि इतर किरकोळ खाऊ खाऊन आम्ही पुन्हा पसरलो.. परतीचा प्रवास झोपेतच झाला. पहाटे चार वाजता पुणे स्टेशनवर उतरलो. मस्त चहा प्यायलो. इतक्यात अद्वैतची गाडी आली आणि आम्हा सर्वांना सुखरूप घरी पोहोचता आले.. आत्तापर्यंत केलेले प्रवास हे थोडे कमी वयात आणि नवऱ्यांच्या जीवावर केलेले होते, पण स्वतंत्रपणे ठरवून चौघी जावांनी ही मोठी ट्रीप ठरवली आणि पार पाडली याचा निश्चितच आनंद झाला. पुन्हा नवीन ऊर्जा घेऊन आलो! वयानुसार सर्वांनाच आल्यावर दोन दिवस झोपावे लागले पण मिळालेला आनंद हा नक्कीच खूप होता! लगेच एकमेकींना फोन करून पुढची ट्रिप कधी करू या अशी विचारणाही आम्ही केली!

एकमेकीं बरोबर ट्रीप चे फोटो शेअर केले आणि पुनः प्रत्ययाचा आनंद घेतला!

© सौ. उज्वला सुहास सहस्रबुद्धे

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – उत्तराखंड तराई क्षेत्र – भाग-२२ ☆ श्री सुरेश पटवा ☆

श्री सुरेश पटवा

(श्री सुरेश पटवा जी  भारतीय स्टेट बैंक से  सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों  स्त्री-पुरुष “गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की  (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं  तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व  प्रतिसाद मिला है। अब आप प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकते हैं यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर)

? यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – उत्तराखंड तराई क्षेत्र – भाग- २२ ☆ श्री सुरेश पटवा ?

5.उत्तराखंड तराई क्षेत्र – हरि के द्वार से नैनों के ताल तक  

किसी क्षेत्र विशेष का भौगोलिक और ऐतिहासिक अध्ययन करके वहाँ मनोरंजक रूप से घूमना पर्यटन कहलाता है और बिना अध्ययन के कहीं जाना घूमना कहलाता है। हिमालय पर्वत और हिंद महासागर स्थित विभिन्न स्थानों का पर्यटन लोगों को हमेशा से लुभाता रहा है। हिमालय पर्यटन में जम्मू-कश्मीर लद्दाख़, हिमाचल, नेपाल, सिक्किम, भूटान अब तक घूम चुके थे और उत्तराखंड के बद्रीनाथ और केदारनाथ घूम कर कुमायूँ और गढ़वाल के तराई वाले हिस्से छूटे थे। 24-31 जुलाई 2021 के बीच इनके पर्यटन को निकले।

 

उत्तराखंड के तराई इलाक़ों की यात्रा हेतु भोपाल से 24 जुलाई को तीन बजे शताब्दी एक्सप्रेस से रवाना हुए। ग्वालियर में सहकर्मी रहे मित्र राजीव दुबे ट्रेन पर मिलने आए और चिप्स के पैकेट एवं पेप्सी की बड़ी बोतल थमा गए। कुरकुरी नमकीन चिप्स चबाते और पेप्सी के घूँट हलक के नीचे उतारते राजीव के साथ ग्वालियर में 2006 से 2010 के बीच गुज़ारे दिन की मानसिक जुगाली में मुरेना निकल गया। मुरेना निकलते ही पुल की धड़धड़ाहट से चौंक कर नीचे देखा तो चम्बल लबालब यौवन से लकदक नवयौवना की तरह इठलाती चली जा रही थी। पेप्सी का घूँट गले के ऊपर रोककर नदी का सम बहाव निहारते वह पुल निकल गया, जिसके नीचे अप्रेल 2010 की झुलसती दोपहरी में बैंक के ऑडिटर के साथ चिल्ड बियर और मुर्ग़ मुसल्लम की दावत का लुत्फ़ उठाया था। ऑडिटर साहब को डाकू देखना था, उन्हें जयप्रकाश नारायण के समक्ष ऐच्छिक समर्पित एक बुजुर्ग डाकू से उसी पुल के नीचे मिलवाया था जिसके ऊपर से ट्रेन गुज़र रही थी।

 

चिप्स की कुरमुराहट के बीच धौलपुर स्टेशन निकलते ही दिमाग़ में डाकुओं के क़िस्से कुडमुँड़ाने लगे। माधौसिंह और पान सिंह तोमर के अलावा अत्याचार सहती बैंडिट क्वीन फूलन देवी और उनके पीछे भागती पुलिस के सिपाही के पैरों से रोंदे चम्बल के बीहड़ रिमझिम फुहार से नहाते नज़र आ रहे थे। सोचते-सोचते झपकी लग गई। उसके बाद घर से लाया खाना खाकर सिटिंग चेयर को पीछे झुकाकर एक हल्की नींद निकाली ही थी, तभी सवारियों की रेलमपेल में आँख खुली तो देखा रेलगाड़ी आगरा कैंट स्टेशन पर खड़ी है। एक भारी भरकम सवारी भारी भरकम सामान सहित पूरा कुनबा लेकर चढ़ी। उनकी कुर्सियाँ तो पक्की थीं परंतु सामान को ऊपर रखने को लेकर झिकझिक होने लगी। उन्होंने दूसरों का सामान हटा कर अपना सामान ज़माना शुरू किया तो आसपास की सवारियाँ भड़कने लगीं। आख़िर में सवारियों के हिसाब से सामान की जगह तय होकर व्यवस्था बनने ही जा रही थी। तभी एक जनानी सवारी ने साथ वाले से पूछा- मोटा पागल है क्या? पीछे से किसी सज्जन ने फुसफुसाती चुटकी ली कि लगता है अस्पताल से छुट्टी कराकर आए हैं। आगरा वाले भारी भरकम भाई साहब के तेज कानों ने सुन लिया। आधा घंटा हंगामेदार माहौल रहा। लोग मास्क हटाकर तुमुल युद्ध में शरीक हो गए। आगरा वाले भाई साहब बोले हाँ! हम तो ठीक होकर आ गए। आपको भर्ती कराए देते हैं। चुटकी वाले भाई साहब नींद का बहाना करते चिमाई दावे पड़े रहे। मामला ठंडा हुआ, तब सबको मास्क नाक पर चढ़ाने का ध्यान आया। तब तक मथुरा स्टेशन से वैंडरों की “मथुरा के पेड़े और आगरा का पेठा” आवाज़ें आने लगीं। फिर एक झपकी के बाद नींद खुली तो ट्रेन निज़ामुद्दीन स्टेशन से गुजर रही थी।

 

रात्रि को साढ़े ग्यारह बजे नई दिल्ली स्टेशन पर वेटिंग लाउंज में दस रुपए प्रति घंटे के हिसाब से भुगतान करके कमर सीधी करने लेटे परंतु यात्रियों के आने-जाने से ख़लल होता रहा, लिहाज़ा मुश्किल से दो घंटे नींद लगी। करवट बदलते छह बजे तक समय बिताया। फिर पता चला कि देहरादून शताब्दी रेलगाड़ी प्लेटफ़ार्म नम्बर एक के बजाय सोलह से रवाना होगी। प्लेटफ़ार्म नम्बर एक से सोलह तक की दो किलोमीटर की दूरी तय करके ट्रेन में जा बैठे। ट्रेन नियत समय पर चल पड़ी।

 

देहरादून शताब्दी की यात्रा सुखद रही। रेलगाड़ी तय समय से चली। ग़ाज़ियाबाद, मेरठ, मुज़फ़्फ़रनगर, सहारनपुर, रुड़की, हरिद्वार होते हुए देहरादून समय से पहले पहुँच गई। प्लेटफ़ार्म से बाहर निकले तो एक लम्बी क़तार कोविड की जाँच के लिए लगी थी। हम भोपाल के बंसल अस्पताल से कोविड जाँच रिपोर्ट साथ लेकर चले थे, इसलिए बिना किसी परेशानी के बाहर निकल टेक्सी में बैठ स्टेट बैंक के गेस्ट हाऊस पहुँच गए।

 

देहरादून में इंदिरा मार्केट, तिब्बत बाज़ार, पल्टन बाज़ार और राजपुर रोड पर दोनों तरफ़ दुकानों का जमावड़ा है। उत्तराखंड की राजधानी बनने के बाद देहरादून मैदानी इलाक़ों तरफ़ तेज़ी से बसना शुरू हो गया था। जिसकी रफ़्तार जारी है। हम शाम को शहर के हृदय स्थल घंटाघर पहुँचे। घंटाघर से लगे पल्टन बाज़ार घूमे वहाँ से एक रास्ता सीधा नगर के सबसे पुराने गुरुद्वारे पहुँचता है जहाँ गुरु रामराय ने दिल्ली से आकर डेरा रखा था। दून घाटी में डेरा रखने से यह स्थान देहरादून हो गया। वह गुरुद्वारा झण्डा गुरुद्वारा कहलाता है। वहाँ का होली पर मनाया जाने वाला रंग उत्सव प्रसिद्ध है। शाम को पल्टन बाज़ार और राजपुर रोड पर घूमते रहे। रात को देहरादून के प्रसिद्ध के सी सूप बॉर में चाइनीज़ खाना खाकर आराम किया।

 

25 जुलाई को रविवार का दिन था। देहरादून में लॉकडाउन था इसलिए गेस्ट हाऊस से निकलना सम्भव नहीं था। नाश्ता करके एक अच्छी नींद निकाली। दोपहर को लंच के बाद जिम कार्बेट की किताबें पढ़ते रहे। कुछ कहानियाँ साथ वालों को पढ़कर सुनाईं। शाम को अरविंद भैया की नातिन श्रद्धा सिसोदिया की बिटिया श्रुति सिसोदिया तंवर दामाद साहब सहित पधारीं। तीन घंटे उनके साथ गुज़ारे। वे जाते-जाते बहरूज की बिरयानी का ऑनलाइन आर्डर दे गईं। नौ बजे के लगभग बिरयानी की डेलिवरी प्राप्त हुई। भोजन करके आराम  किया।

 

 

मसूरी धनोल्टी

26 जुलाई 2021 को सुबह आठ बजे देहरादून गेस्ट हाऊस से मसूरी के लिए रवाना हुए। देहरादून 2001 में राजधानी और टेहरी बाँध बनने के बाद से तेज़ी से जनसंख्या के दबाव में फैलना शुरू हुआ था। वहाँ एक मात्र मुख्य सड़क राजपुर मार्ग के दोनों तरफ़ प्रीमीयम और साधारण फ़्लैट की भरमार हो गई है। आगे बढ़ने पर राजपुर रोड से एक रास्ता मसूरी को कट जाता है। मसूरी के लिए रास्ता कटते ही तराई से पहाड़ियों में यात्रा  शुरू होती है। एक तरफ़ ऊँचे पहाड़ और दूसरी तरफ़ गहरी खाईयों का न ख़त्म होने वाला सिलसिला आरम्भ होता है। चढ़ाई शुरू होते ही सड़क किनारे एक शिव मंदिर पड़ा। वहाँ सूचना लगी थी कि यह निजी मंदिर है इसमें कोई भी नगद या अन्य चढ़ावा न चढ़ाएँ। उल्टा आपको प्रसाद और चाय का सेवन कराया जाता है। बाजू में एक छोटा रेस्टोरेंट है जिसमें मंदिर की तरफ़ से पचास प्रतिशत अनुदान पर सामान मिलता है।

 

आधा घंटा चलने के बाद भट्टा जल प्रपात तक नीचे उतरने की ट्रोली सेवा की बुकिंग कुटिया आई। वहाँ से दो सौ रुपए का टिकट कटा कर ट्रोली में सवार हुए। ट्रोली का इंतज़ार कर रहे थे, तभी केंटीन वाला आया। उसकी चाय के दाम बीस रुपए था। यह सोचकर कि उनका रोज़ी रोज़गार का ज़रिया भी हम जैसे पर्यटक हैं। बीस रुपए की चाय गले के नीचे उतारी, तब तक ट्रोली का झूला आ गया। सवार होकर एक हज़ार फुट नीचे उतर चले। चारों तरफ़ बादलों से घेरे में लग रहा था कि स्वर्ग की यात्रा आरम्भ हो गई है। चिकोटी काट कर देखी तब पता चला कि पूरे होशोहवास में चीड़ चिनार देवदार के वृक्षों के बीच से हवा में तैरते चले जा रहे हैं।

 

रिमझिम बारिश की बूँदों के बीच भट्टा प्रपात पहुँचे तो पता चला कि मसूरी झील का पानी इस तरफ़ उतार पर झरना बनाकर एक प्रपात बनाता है। थोड़ी देर रुककर वापसी यात्रा करके टेक्सी में आ बिराजे। फिर तीखी चढ़ाई से गुज़रते हुए मसूरी पहुँच गए। परंतु हमने तय किया था कि अभी सीधे धनौल्टी जाएँगे जो मसूरी से और आगे तीस किलोमीटर ऊँचे पहाड़ों को पार करके आने वाला था। रास्ते में चार-दुकान पर्यटन स्थल आया। पता करने पर मालूम हुआ कि एक ऊँची पहाड़ी पर सचिन तेंदुलकर ने एक शाही फ़्लैट ख़रीदा था तब वे अपने दोस्तों के साथ यहाँ पधारे थे। उसी समय चार लोगों ने भीड़ की सेवा हेतु दुकान लगा ली थीं जिसमें सचिन ने साठ रुपए कप के हिसाब से दोस्तों के साथ चाय का सेवन किया था। वह स्पॉट चार-दुकान पोईंट नाम से प्रसिद्ध हो गया।

 

मसूरी बसावट की भी एक कहानी पता चली। देहरादून मध्य युग में औरंगज़ेब की सिक्खों में फूट डालने की नीति से बस चुका था। मसूरी बसने की राह देख रहा था। जिसे एक अंग्रेज ने शुरू किया। ईस्ट इंडिया कंपनी के लेफ्टिनेंट फ्रेडरिक यंग शिकार के लिए मसूरी आए। उन्होंने कैमल्स बैक रोड पर एक शिकार लॉज बनाया, और 1823 में दून के मजिस्ट्रेट बने। उन्होंने पहली गोरखा रेजिमेंट बनाई और घाटी में पहला आलू बोया। मसूरी में उनका कार्यकाल 1844 में समाप्त हुआ, जिसके बाद उन्होंने दीमापुर और दार्जिलिंग में सेवा की, अंत में एक जनरल के रूप में सेवानिवृत्त होकर आयरलैंड लौट आए। मसूरी में यंग का कोई स्मारक नहीं है। हालांकि, देहरादून में एक यंग रोड है जिस पर ओएनजीसी का तेल भवन खड़ा है। 1832 में, मसूरी भारत के महान त्रिकोणमितीय सर्वेक्षण का टर्मिनस था जो देश के दक्षिणी सिरे पर शुरू हुआ था। उस समय के भारत के महासर्वेक्षक जॉर्ज एवरेस्ट चाहते थे कि भारतीय सर्वेक्षण का नया कार्यालय मसूरी में स्थित हो। उसी वर्ष मसूरी में पहली बियर ब्रूवरी सर हेनरी बोहले द्वारा “द ओल्ड ब्रूवरी” के रूप में स्थापित की गई थी। 1850 में मैकिनॉन एंड कंपनी के रूप में सर जॉन मैकिनॉन द्वारा फिर से स्थापित किए जाने से पहले शराब की भठ्ठी दो बार खुली और बंद हुई। हिंद महासागर से बनकर उठे बादल पूरे देश में बारिश का मनभावन सुहावना मौसम रच कर हिमालय से रुककर तराई के इलाक़ों में अच्छी बारिश करते हुए पहाड़ों पर रुककर छाए रहते हैं। उन्ही के बीच से रास्ता गुजरता रहा।

 

मसूरी शांत और खूबसूरत जगह। हम समय बचाने के हिसाब से मसूरी पार करके सीधे धनौल्टी चले गए। धनौल्टी देवदार के जंगल से घिरा है। अब देवदार का जंगल ही इसकी पहचान बन चुका है। यहां रहने के लिए कुछ होटल बन गये है। गढवाल मंडल टूरिज्म का गेस्ट हाउस भी है। शहर की भीडभाड़ से दूर जाना चाहते हैं तो धनौल्टी अच्छी जगह है। मसूरी घूमने के बाद यहां ठहरा जा सकता है।

 

धनौल्टी काफ़ी शान्तिपूर्ण स्थल के रूप में भी जानी जाती है जिस कारण यहाँ पर्यटकों की भीड़ अधिक रहती है। लंबी जंगली ढलानें, ठंडी व शांत हवाएँ, स्थानीय लोगों द्वारा की जाने वाली मेहमान नवाजी, मनमोहक मौसम, बर्फ से ढंके पहाड़ यहाँ की ख़ास विशेषताओं में शामिल हैं, जो इस जगह को सुकूनभरी छुट्टियाँ बिताने के लिए एक आदर्श जगह बनाते हैं। देखने लायक़ जगहों में बारेहीपानी और जोरांडा फॉल्स, दशावतार मन्दिर, ईको-पार्क, सुरकंडा देवी, मन्दिर, हिमालयन वीवर्स, जैन मंदिर आदि शामिल हैं। सर्दियों में स्नो फॉल का मजा लेना चाहते हैं तो वहाँ जरूर जाएं। यहां देखने लायक कई जगह हैं। जैसे एप्पल गार्डन में घुड़सवारी का आनंद ले सकते हैं। यहां सालभर मौसम ठंडा रहता है। दिसंबर के बाद यहां बर्फबारी होना शुरू हो जाती है। धनोल्टी मै एडवेंचर से भरपूर 🏕️camping की अच्छी सुविधा है।

 

धनौल्टी से वापसी में मसूरी के दर्शनीय स्थल देखे। मसूरी में माल रोड प्रसिद्ध जगह है लेकिन बाज़ार बहुत महँगा है। देहरादून से माल लाकर वहाँ दुगुने-तिगुने दाम पर बेंचा जाता है। ख़रीदी के लिए देहरादून का पल्टन बाज़ार या इंदिरा मार्केट वाजिब है।

 

केम्पटी फाल याने जल प्रपात मसूरी से पंद्रह किलोमीटर है। एक बहुत छोटा पहाड़ी जल प्रपात चट्टानों को काटकर गिरता है। अंत में एवरेस्ट हाऊस देखने गए। यह एवरेस्ट के स्वामित्व में लगभग 11 वर्षों तक उनका निवास था। उन्होंने इसे जनरल व्हिश से खरीदा था। 1832 में बने इस घर को आज सर जॉर्ज एवरेस्ट हाउस एंड लेबोरेटरी या पार्क हाउस के नाम से जाना जाता है। यह घर पार्क एस्टेट में गांधी चौक/लाइब्रेरी बाजार (मसूरी में माल रोड के पश्चिमी छोर) से लगभग 6 किलोमीटर पश्चिम में स्थित है। इसके स्थान से एक तरफ दून घाटी और उत्तर में अगलर नदी घाटी और हिमालय श्रृंखला के मनोरम दृश्य दिखाई देते हैं। परंतु घाटियों में बादलों की जमघट होने के कारण हमें कुछ भी दिखाई नहीं दिया। अप्रेल-मई के महीनों में जब आसमान साफ़ होता  है तब घाटियों का दृश्य मनोरम होता है। दिसम्बर-जनवरी में बर्फ़वारी से घाटियाँ सफ़ेद चादर ओढ़ लेती हैं। भूमिगत पानी के कुंड हैं (या शायद बर्फ के भंडारण के लिए गड्ढे, क्योंकि क्षेत्र में पानी की कमी है) जो काफी गहरे हैं और घर के बाहर सामने के यार्ड में खुले पड़े हैं, कूड़े से भरे हुए हैं और फिसलने का खतरा है।

 

इंटीरियर को हटा दिया गया है लेकिन फायरप्लेस, छत, और दरवाजे और खिड़की के फ्रेम अभी भी बने हुए हैं। घर स्टील ग्रिल से सुरक्षित है और इसमें प्रवेश नहीं किया जा सकता है। यह संपत्ति बेहतर रूप से जानी जाती है और पहुंच मार्ग में सुधार किया गया है, दीवारों को भित्तिचित्रों से ढक दिया गया है और समय-समय पर साफ किया जाता है। इसका पूरी तरह जीर्णोद्धार और रखरखाव वांछित है।

 

 

27 जुलाई 2021 का दिन हमने देहरादून के दर्शनीय स्थलों के लिए तय कर रखा था क्योंकि एक दिन कठिन यात्रा के बाद दूसरा दिन थोड़ा आराम भरा होना चाहिए, नहीं तो लगातार थकान से घूमने का मज़ा जाता रहता है और पर्यटक ऊब का शिकार होने लगते हैं। इस समय चारों तरफ़ से घनघोर बारिश की खबरें आ रही हैं। हालाँकि हमने जिन स्थानों को चुना है वे बारिश के मौसम में जोखिम भरी नहीं मानी जाती परंतु फिर भी मौसम का क्या भरोसा। यही बात यात्रा को रोमांचक बनाती है।

 

देहरादून गढ़वाल इलाक़े का प्रमुख शहर और उत्तराखंड की राजधानी है। देहरादून दून घाटी में हिमालय की तलहटी में स्थित है, जो पूर्व में गंगा की एक सहायक सोंग नदी और पश्चिम में यमुना की सहायक आसन नदी के बीच स्थित है। यह शहर अपने सुरम्य परिदृश्य और थोड़ी हल्की ठंडी जलवायु के लिए जाना जाता है और आसपास के क्षेत्र के लिए प्रवेश द्वार प्रदान करता है। शहर समुद्र तल से 2,100 फुट की ऊंचाई पर स्थित है। देहरादून गढ़वाल शासकों के लिए एक महत्वपूर्ण केंद्र रहा है जिसे अंग्रेजों ने कुमायूँ-गढ़वाल के शासन का केन्द्र बना लिया था। इस शहर को उत्तराखंड हिमालय का प्रवेश द्वार भी कहा जाता है।

 

स्कंद पुराण में दून का उल्लेख केदारखंड नामक क्षेत्र के एक भाग के रूप में किया गया है, जो शिव का निवास स्थान है। हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार, प्राचीन भारत में महाभारत महाकाव्य युग के दौरान, कौरवों और पांडवों के महान शिक्षक द्रोणाचार्य यहां रहते थे, इसलिए इसका नाम “द्रोणनगरी” पड़ा। शहर को देवभूमि (“देवताओं की भूमि”) के रूप में भी माना जाता है।

 

देहरादून उपनाम “दून वैली” का इतिहास रामायण और महाभारत की कहानी से जुड़ा है। ऐसा माना जाता है कि रावण और भगवान राम के बीच युद्ध के बाद, भगवान राम और उनके भाई लक्ष्मण ने इस स्थल का दौरा किया था। इसके अलावा, महाभारत में कौरवों और पांडवों के महान गुरु, द्रोणाचार्य के नाम पर ‘द्रोणनगरी’ के रूप में जाना जाता है। माना जाता है कि उनका जन्म और निवास देहरादून में हुआ था। देहरादून के आसपास के क्षेत्रों में प्राचीन मंदिरों और मूर्तियों से मिले साक्ष्यों को रामायण और महाभारत की पौराणिक कथाओं से जोड़ा गया है। ये अवशेष और खंडहर लगभग उतने ही पुराने माने जाते हैं। इसके अलावा, स्थान, स्थानीय परंपराएं और साहित्य महाभारत और रामायण की घटनाओं के साथ इस क्षेत्र के संबंधों को दर्शाते हैं। महाभारत की लड़ाई के बाद इस क्षेत्र पर पांडवों का प्रभाव था क्योंकि हस्तिनापुर के शासकों ने सुबाहू के वंशजों के साथ इस क्षेत्र पर सहायक के रूप में शासन किया था। इसी तरह, इतिहास के पन्नों में ऋषिकेश का उल्लेख है जब भगवान विष्णु ने संतों की प्रार्थना का जवाब दिया, राक्षसों का वध किया और संतों को भूमि सौंप दी। महाभारत के समय में चकराता नामक स्थान का ऐतिहासिक प्रभाव बताया जाता है।

 

सातवीं शताब्दी में, इस क्षेत्र को सुधानगर के नाम से जाना जाता था और चीनी यात्री ह्वेन त्सांग ने इसका वर्णन किया था। सुधानगर को बाद में कालसी के रूप में पहचाना जाने लगा। कालसी में यमुना नदी के किनारे के क्षेत्र में अशोक के शिलालेख पाए गए हैं जो प्राचीन भारत में इस क्षेत्र के महत्व को दर्शाते हैं। पड़ोसी क्षेत्र हरिपुर में, राजा रसला के समय से खंडहरों की खोज की गई थी जो इस क्षेत्र की समृद्धि को भी दर्शाते हैं।

 

ब्रिटिश राज के आरम्भिक दिनों में शहर का आधिकारिक नाम देहरा था। देहरादून दो शब्दों “देहरा” + “दून” से मिलकर बना है। देहरा शब्द “डेरा” से लिया गया है, जिसका अर्थ है शिविर और गढ़वाली भाषा में दून एक घाटी को कहते हैं। यह घाटी मध्य हिमालय और “शिवालिक” के बीच स्थित है। शहर की स्थापना तब हुई जब सातवें सिख गुरु, गुरु हर राय के पुत्र बाबा राम राय ने 1675 में इस क्षेत्र में अपना “डेरा” या शिविर लगाया। उस समय से आधुनिक देहरादून शहर का विकास शुरू हुआ। यह तब की बात है जब देहरा शब्द दून से जुड़ा और इस तरह इस शहर का नाम देहरादून पड़ा। आसपास की अन्य प्रमुख दून घाटियां कोटली दून, पाटली दून और पिंजौर दून हैं।

 

देहरादून के नाम का इस्तेमाल होने से पहले, जगह को पुराने नक्शों पर गुरुद्वारा (वेब ​​द्वारा एक नक्शा, 1808) या गुरुद्वारा (जेरार्ड द्वारा एक नक्शा, 1818) के रूप में दिखाया गया है। जेरार्ड के नक्शे में उस स्थान का नाम “देहरा या गुरुद्वारा” रखा गया है। इस मूल सिख मंदिर के चारों ओर कई छोटे गाँव थे जो अब आधुनिक शहर के कुछ हिस्सों के नाम हैं।

 

देहरादून पर गजनी के महमूद ने 1024 में, 1368 में तैमूर लंग ने, 1757 में रोहिल्ला प्रमुख नजीबउद्दौला और 1785 में गुलाम कादिर ने  आक्रमण किया था। नेपाली राजा पृथ्वी नारायण शाह ने 1806 में अल्मोड़ा, पठानकोट, कुमाऊं, गढ़वाल, सिरमुर, शिमला, कांगड़ा और देहरादून को एकजुट किया। पश्चिमी मोर्चे पर गढ़वाल और हिमाचल प्रदेश के कुछ हिस्सों में पंजाब तक और पूर्वी मोर्चे पर सिक्किम राज्य से परे दार्जिलिंग तक एक संक्षिप्त अवधि के लिए नेपाल का हिस्सा रहा आया। ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी 1814 से 1816 तक ब्रिटिश-नेपाल युद्ध से उसे भारत में मिला लिया। युद्ध सुगावली की संधि पर हस्ताक्षर के साथ समाप्त हुआ जिसमें नेपाल ने अपने नियंत्रण का लगभग एक तिहाई ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी को सौंप दिया था। अंग्रेजों ने 1816 में देहरादून प्राप्त किया और 1827-1828 में लंढौर और मसूरी का विकास किया। भारत के पहले प्रधान मंत्री जवाहरलाल नेहरू देहरादून शहर के काफी शौकीन थे और अक्सर वहाँ जाते रहते थे। 1964 में दिल्ली में निधन से पहले उन्होंने अपने अंतिम कुछ दिन यहां बिताए। स्वतंत्रता आंदोलन के एक अन्य नेता, रास बिहारी बोस, जो ग़दर षडयंत्र भारतीय राष्ट्रीय सेना के प्रमुख आयोजकों में से एक थे जिसका मुख्यालय अपने शुरुआती दिनों में देहरादून में स्थित था। जिन्हें स्वतंत्रता संग्राम जारी रखने के लिए 1915 में जापान जाने के लिए मजबूर होना पड़ा था।

 

देहरादून का अफगान संबंध प्रथम आंग्ल-अफगान युद्ध (1839) से जुड़ा है, जिसके बाद अफगान अमीर दोस्त मोहम्मद खान (अफगानिस्तान के अमीर) को अंग्रेजों ने देहरादून में निर्वासित कर दिया था। वह 6 साल से अधिक समय तक मसूरी में रहे। मसूरी नगरपालिका के अंतर्गत आने वाले बालाहिसर वार्ड का नाम दोस्त मोहम्मद के महल के नाम पर रखा गया है। प्रसिद्ध देहरादून बासमती को उनके साथ अफगानिस्तान के कुनार प्रांत से लाया गया था और इसे आज भी घाटी के व्यंजन के रूप में गिना जाता है।

 

चालीस साल बाद, दूसरे एंग्लो-अफगान युद्ध के बाद, उनके पोते, मोहम्मद याकूब खान को 1879 में निर्वासन के लिए भारत भेजा गया था। अपने दादा की तरह, उन्होंने अपने निवास के रूप में दून घाटी को चुना। याकूब औपचारिक रूप से देहरादून में बसने वाला पहला अफगान बना। वर्तमान मंगला देवी इंटर कॉलेज कभी काबुल पैलेस था जहाँ याकूब ने अपने जीवन के कुछ साल बिताए थे।

 

अफगान शाही परिवार ने देहरादून में उपस्थिति बनाए रखी। यह अफगानिस्तान के अंतिम से दूसरे राजा मोहम्मद नादिर शाह का जन्मस्थान था। दो विचित्र महल – देहरादून में काबुल पैलेस और मसूरी में बाला हिसार पैलेस – अफगानिस्तान के साथ इस संबंध की गवाही देते हैं। वे इन अफगान शासकों द्वारा 20 वीं शताब्दी के शुरुआती भाग में भारत में निर्वासन में बनाए गए थे। बाला हिसार पैलेस को अब मसूरी के विनबर्ग एलन स्कूल में बदल दिया गया है।

 

अफगानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ गनी ने उल्लेख किया है कि उनकी दादी देहरादून में पली-बढ़ी हैं। “मैं टैगोर की बात करता हूं क्योंकि मुझे टैगोर से प्रशिक्षित मेरी दादी ने पाला था जो देहरादून में रहती थीं …,” डॉ गनी ने भारत की दृष्टि और उल्लेखनीय परिवर्तन के बारे में बात करते हुए कहा।

 

देहरादून शहर मुख्य रूप से दून घाटी में स्थित है और क्लेमेंट टाउन 1,350 फीट की ऊंचाई पर है और मालसी 2,300 फीट से ऊपर है जो शहर से 15 किमी दूर है। मालसी लेसर हिमालयन रेंज का शुरुआती बिंदु है जो मसूरी और उससे आगे तक फैला हुआ है। देहरादून जिले में जौनसार-बावर पहाड़ियाँ समुद्र तल से 12,100 फीट ऊपर हैं। मसूरी का पहाड़ी क्षेत्र समुद्र तल से 6,135 से 6,617 फीट की ऊंचाई तक जाता है। इसकी भू-आकृति विज्ञान और मौसम संबंधी विशेषताएं इसे कई प्राकृतिक खतरों के प्रति संवेदनशील बनाती हैं। भूकंप के अलावा, यह क्षेत्र अक्सर भूस्खलन, बादल फटने, अचानक बाढ़, शीत लहरों और ओलावृष्टि से तबाह हो जाता है।

 

दून घाटी में रायवाला, ऋषिकेश, डोईवाला, हर्रावाला, देहरादून, हरबर्टपुर, विकासनगर, सहसपुर, सेलाकी, सुभाष नगर और क्लेमेंट टाउन सहित बस्तियां शामिल हैं। जिले में राजाजी राष्ट्रीय उद्यान है जो हाथियों का घर है, मसूरी में बेनोग वन्यजीव अभयारण्य और आसन संरक्षण रिजर्व (आसन बैराज)। दून घाटी में तराई और भाबर के जंगलों के साथ-साथ शिवालिक पहाड़ियाँ और मसूरी और चकराता जैसे हिल स्टेशन युक्त कम हिमालयी रेंज हैं। जिले की सीमा उत्तर में हिमालय, दक्षिण में शिवालिक पहाड़ियों की राजाजी रेंज, पूर्व में गंगा नदी और पश्चिम में यमुना नदी से लगती है। पर्वत श्रृंखलाओं की तलहटी में स्थित शहरों में सहस्त्रधारा, लाखमंडल, गौतम कुंड, चंद्रबनी, कालसी और डाकपत्थर शामिल हैं।

 

यह जिला दो प्रमुख भागों में विभाजित है: शिवालिक से घिरा मुख्य शहर देहरादून और हिमालय की तलहटी में स्थित जौनसार-बावर। उत्तर और उत्तर पश्चिम में यह उत्तरकाशी और टिहरी गढ़वाल जिले से, पूर्व और दक्षिण में पौड़ी गढ़वाल और गंगा नदी से, पश्चिम में, यह हिमाचल प्रदेश के शिमला और सिरमौर जिलों, हरियाणा के यमुनानगर जिले और टोंस और यमुना नदियाँ से घिरा है। दक्षिण में हरिद्वार और उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जिले हैं।

 

स्वतंत्रता के बाद देहरादून और गढ़वाल और कुमाऊं के अन्य हिस्सों को संयुक्त प्रांत में मिला दिया गया था जिसे बाद में उत्तर प्रदेश राज्य का नाम दिया गया था। उत्तर प्रदेश पुनर्गठन अधिनियम 2000 के तहत उत्तर प्रदेश के उत्तर-पश्चिमी जिलों से उत्तराखंड राज्य (जिसे पहले उत्तरांचल कहा जाता था) बनाकर देहरादून को इसकी राजधानी बनाया गया।

क्रमशः…

© श्री सुरेश पटवा 

भोपाल, मध्य प्रदेश

*≈ सम्पादक श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – लद्दाख़ यात्रा – भाग-२१ – नेपाल यात्रा – हिमालय की गोद में – १८ ☆ श्री सुरेश पटवा ☆

श्री सुरेश पटवा

(श्री सुरेश पटवा जी  भारतीय स्टेट बैंक से  सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों  स्त्री-पुरुष “गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की  (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं  तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व  प्रतिसाद मिला है। अब आप प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकते हैं यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर)

? यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – लद्दाख़ यात्रा – भाग- २१ ☆ श्री सुरेश पटवा ?

अमृतसर पंजाब का सबसे महत्वपूर्ण और पवित्र शहर माना जाता है। सिक्खों का सबसे बड़ा गुरूद्वारा स्वर्ण मंदिर अमृतसर में है। ताजमहल के बाद सबसे ज्यादा पर्यटक अमृतसर के स्वर्ण मंदिर को ही देखने आते हैं। स्वर्ण मंदिर अमृतसर का दिल माना जाता है। अमृतसर का इतिहास गौरवमयी है। यह अपनी संस्कृति और लड़ाइयों के लिए बहुत प्रसिद्ध रहा है। अमृतसर अनेक त्रासदियों और दर्दनाक घटनाओं का गवाह रहा है। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का सबसे बड़ा नरसंहार अमृतसर के जलियांवाला बाग में ही हुआ था। इसके बाद भारत पाकिस्तान के बीच जो बंटवारा हुआ उस समय भी अमृतसर में बड़े स्तर पर हत्याकांड हुआ। यही नहीं अफगान और मुगल शासकों ने इसके ऊपर अनेक आक्रमण किए और इसको कई बार बर्बाद किया। इसके बावजूद सिक्खों ने अपने दृढ संकल्प और मजबूत इच्छाशक्ति से इसे हर बार बसाया। हालांकि अमृतसर में समय के साथ काफी बदलाव आए हैं लेकिन आज भी अमृतसर की गरिमा बरकरार है।

स्वर्ण मंदिर अमृतसर का सबसे बड़ा आकर्षण है। इसका पूरा नाम हरमंदिर साहब है लेकिन यह स्वर्ण मंदिर के नाम से प्रसिद्ध है। अमृतसर शहर स्वर्ण मंदिर के चारों तरफ बसा हुआ है। स्वर्ण मंदिर में प्रतिदिन हजारों पर्यटक आते हैं। अमृतसर का नाम उस तालाब के नाम पर रखा गया है जिसका निर्माण गुरू रामदास ने अपने हाथों से कराया था। यह गुरू रामदास का डेरा हुआ करता था। अकबर ने गुरु रामदास को उस ज़मीन का पट्टा दिया था, जिस पर स्वर्ण मंदिर का निर्माण हुआ है।

हमने टैक्सी नियत पार्किंग में खड़ी कर दी। जूतों की उतराई-पहनाई और रखने-उठाने की मुश्किल से बचने के लिए, जूते वाहन में ही छोड़ दिए। पार्किंग से मंदिर प्रांगण तक़रीबन डेढ़-दो किलोमीटर रहा होगा। धूप तेज होने से पाँव जलने लगे। बाज़ार के बीच से होकर रास्ता था। छाया देखकर ठंडी जगह पर पैर रख कर चलते रहे। दुकानों पर लस्सी और सिकंजी की बहार थी। अधिकतर दुकाने कपड़ों की और कुछ जूते-चप्पल की दुकाने भी थीं। आधा घंटा में मंदिर परिसर पहुँच गये। परिसर में चोकोर परकोटा है। बीच में स्वर्णमंदिर चमचमाता नज़र आ रहा है। जिसकी प्रतिच्छाया सरोवर में झिलमिला रही है। मंदिर के दाहिने और बाएँ तरफ़ से परकोटा में प्रवेश द्वार हैं। हम बाएँ दरवाज़े से अंदर घुसे। हरमंदिर साहब का इतिहास याद आने लगा।

गुरुनानक, गुरु अंगददेव और गुरु अमरदास के बाद चौथे सिख गुरु रामदास ने अमृतसर में दरबार साहिब के नाम से मशहूर मंदिर बनाने की  शुरुआत 1577 में की थी और पांचवें गुरु अर्जन ने मंदिर की स्थापना का कार्य पूरा किया था। मंदिर को पूरा करने में आठ साल लगे थे। इसके निर्माण के बाद गुरु अर्जन ने सिख धर्म के पवित्र ग्रंथ आदि ग्रंथ को स्थापित किया था। आदि ग्रंथ, सिखों द्वारा दस मानव गुरुओं के वंश के बाद अंतिम, संप्रभु और अनंत जीवित गुरु का रूप माना जाता है। इसमें 1,430 पृष्ठ हैं, जिनमें से अधिकांश को 31 रागों में विभाजित किया गया है।

सिखों और मुस्लिमों के बीच लंबे समय से चले विवाद से 1762 में मंदिर ध्वस्त हो गया था। 1776 में एक नया मुख्य प्रवेश द्वार, मार्ग और गर्भगृह का निर्माण पूरा हुआ, जबकि सरोवर  के चारों ओर पूल का काम 1784 में समाप्त हो गया।

रणजीत सिंह ने घोषणा की कि वह संगमरमर और सोने के साथ इसका पुनर्निर्माण करेंगे। मंदिर को 1809 में संगमरमर और मिश्रित सोना-तांबे में पुनर्निर्मित किया था, और 1830 में रणजीत सिंह ने सोने की पर्त के साथ गर्भगृह को सुसज्जित करने के लिए सोना दान किया।

मंदिर में अकाल तख्त भी मौजूद है जो ‘छठे गुरु का सिंहासन कहा जाता है। छठे गुरु हरगोबिंद द्वारा इसे बनवाया गया था। यह सिखों के लिए सत्ता के  पांच तख़्तों में से एक है। अकाल तख्त राजनीतिक संप्रभुता का प्रतीक है और ऐसी जगह है जहां सिख लोगों के आध्यात्मिक और लौकिक सरोकारों को संबोधित किया जाता है। हरमंदिर साहब में पूरे दिन गुरुबानी की स्वर लहरियां गुंजती रहती हैं। मंदिर परिसर में पत्थर का स्मारक लगा हुआ है। यह पत्थर जांबाज सिक्ख सैनिकों को श्रद्धाजंलि देने के लिए लगा हुआ है।

सिक्ख गुरूग्रंथ साहिब में आस्था रखते हैं। उनके लिए गुरू ही सब कुछ हैं। स्वर्ण मंदिर में प्रवेश करने से पहले वह मंदिर के सामने सर झुकाते हैं, फिर पैर धोने के बाद सीढ़ियों से मुख्य मंदिर तक जाते हैं। सीढ़ियों के साथ-साथ स्वर्णमंदिर से जुडी हुई सारी घटनाएं और इसका पूरा इतिहास लिखा हुआ है। स्वर्ण मंदिर बहुत ही खूबसूरत है। इसमें रोशनी की सुन्दर व्यवस्था की गई है। सिक्खों के अलावा भी बहुत से श्रद्धालु यहां आते हैं। उनकी स्वर्ण मंदिर और सिक्ख धर्म में अटूट आस्था है। हमने परकोटा से मंदिर की परिक्रमा करके लंगर में प्रसादी ग्रहण की और परिसर से वापस निकले।  

अमृतसर एक भयानक जलियांवाला बाग हत्याकांड का गवाह रहा है। 13 अप्रैल 1919 को इस बाग में एक सभा का आयोजन किया गया था। इस सभा को बीच में ही रोकने के लिए जनरल डायर ने बाग के एकमात्र रास्ते को अपने सैनिकों के साथ घेर लिया और भीड़ पर अंधाधुंध गोली बारी शुरू कर दी। इस गोलीबारी में बच्चों, बूढ़ों और महिलाओं समेत लगभग 300 लोगों की जान गई और 1000 से ज्यादा घायल हुए। यह घटना को इतिहास की सबसे दर्दनाक घटनाओं में से एक माना जाता है। जलियांवाला बाग हत्याकांड इतना भयंकर था कि उस बाग में स्थित कुआं शवों से पूरा भर गया था। अब इसे एक सुन्दर पार्क में बदल दिया है और इसमें एक संग्राहलय का निर्माण भी कर दिया है। इसकी देखभाल और सुरक्षा की जिम्मेदारी जलियांवाला बाग ट्रस्ट की है। यहां पर सुन्दर पेड लगाए गए हैं और बाड़ बनाई गई है। इसमें दो स्मारक भी बनाए गए हैं। जिसमें एक स्मारक रोती हुई मूर्ति का है और दूसरा स्मारक अमर ज्योति है।

बारह बजे अमृतसर से पठानकोट होते हुए धर्मशाला के लिए रवानगी डाली। पंजाब की उर्वरा ज़मीन पर बासमती चावल की खेती लहरा रही है। सफ़ेद बगुले कुलाँचे भरते मटरगश्ती में संलग्न हैं। अमृतसर से पठानकोट तक छै लेन की मज़बूत सड़क बन गई है। सबसे पहले बटाला आया। बटाला पंजाब राज्य के गुरदासपुर ज़िले का एक शहर है। बटाला एक मुख्य औद्योगिक केन्द्र है और पंजाब के महत्वपूर्ण माझा सांस्कृतिक क्षेत्र का एक केन्द्रबिन्दु माना जाता है। फिर धारीवाल आया। धारीवाल गुरदासपुर जिले में पंजाब का 5 वां सबसे बड़ा शहर और अपनी ऊनी मिल के लिए सबसे प्रसिद्ध है। यह शहर अपर बारी दूबा नदी के तट पर स्थित है जो व्यास नदी में मिलती है। वहाँ से गुरदासपुर 13 किमी दूर है।  

गुरदासपुर की स्थापना 17वीं शताब्दी की शुरुआत में पनियार गांव के एक ब्राह्मण गुरिया जी ने की थी। उन्होंने गुरदासपुर के लिए सांगी गोत्र के जाट समुदाय से जमीन खरीदी थी। उन्ही के नाम पर गुरदासपुर नाम पड़ा। गुरिया जी के दो पुत्र थे-नवल राय और पाला जी। नवल राय के वंशज गुरदासपुर में बस गए। गुरु नानक देव की पत्नी का मायका गुरदासपुर में था।

भारत के विभाजन से पहले, गुरदासपुर जिले का भविष्य लंबे समय तक तय नहीं किया गया, क्योंकि यह मुसलमान बहुल था। सीमा सीमांकन समिति द्वारा प्रारंभिक योजना पठानकोट (उस समय गुरदासपुर जिले का हिस्सा) को पाकिस्तान और शकरगढ़ को भारत में रखने की बात थी। हालांकि, बाद में निर्णय की बारीक ट्यूनिंग के रूप में इसके विपरीत किया गया। यानी शकरगढ़ पाकिस्तान को दिया गया था और गुरदासपुर जिला (पठानकोट के साथ) भारत को दिया गया। गुरदासपुर ब्यास और रावी नदियों के बीच एक शहर है। इसमें गुरदासपुर जिले का प्रशासनिक मुख्यालय है, जो पाकिस्तान के साथ सीमा साझा करता है।

अंत में, रैडक्लिफ अवार्ड के तहत, केवल एक तहसील शकरगढ़- को पाकिस्तान में स्थानांतरित कर दिया गया, और शेष जिला भारत के साथ रख दिया। गुरदासपुर जिले से कई मुसलमान पाकिस्तान चले गए; सिख और हिंदू सीमा पार कर भारत आ गए। भारी मात्रा में हिंसक वारदातें हुईं। गुरदासपुर भारत को देने का दबाव नेहरू-पटेल का था। पाकिस्तान को भरोसा था कि मुस्लिम बहुल होने से और सीमा पर होने से गुरदासपुर उन्हें मिलेगा तो जम्मू-कश्मीर भारत से पूरी तरह कट जाएगा। वह उसे अधिग्रहण कर लेगा। जब पाकिस्तान ने देखा कि गुरदासपुर उन्हें पूरा नहीं मिला तो उन्होंने कश्मीर में क़बायली हमला शुरू करवा दिए। गुरदासपुर ज़िले में गुरुद्वारा दरबार साहिब, करतारपुर – सबसे प्रसिद्ध सिख गुरुद्वारों में से एक, जहाँ सिख गुरु नानक देव ने अपने अंतिम दिन बिताए थे।

धारीवाल के बाद पठानकोट आया। पठानकोट ऐतिहासिक महत्व वाला एक प्राचीन शहर है। पठानकोट में पाए गए पुराने सिक्के यह सिद्ध करते हैं कि यह पंजाब के सबसे पुराने स्थलों में से एक है। यह हमेशा से बहुत महत्व का स्थान रहा होगा क्योंकि यह पहाड़ियों की तलहटी में स्थित है। पठानकोट हिमाचल में स्थित नूरपुर राज्य की राजधानी थी और अकबर के शासनकाल में इसका नाम बदलकर धमेरी (नूरपुर) कर दिया गया था। राजपूत के पठानिया कबीले ने अपना नाम पठानकोट से लिया है।

पठानकोट को कांगड़ा और डलहौजी की सुरम्य तलहटी में चक्की नदी पर स्थित होने के कारण जम्मू, कश्मीर, डलहौजी, चंबा, कांगड़ा, धर्मशाला, मैकलोडगंज, ज्वालाजी, चिंतपूर्णी और आगे हिमालय पहाड़ों में जाने से पहले एक विश्राम स्थल के रूप में उपयोग किया जाता है। पठानकोट जम्मू और कश्मीर और हिमाचल प्रदेश के आस-पास के क्षेत्रों के लिए एक शिक्षा केंद्र के रूप में प्रसिद्ध है। इन राज्यों के कई ग्रामीण छात्र शिक्षा के लिए पठानकोट आते हैं। पठानकोट में हल्का नाश्ता किया और गाढ़ी चाय पी। अब शिवालिक पहाड़ियाँ शुरू हो गईं। सबसे पहले काँगड़ा ज़िले का नूरपुर आया।

काँगड़ा क्षेत्र में ब्रिटिश राज के आगमन से पहले धर्मशाला और इसके आसपास के क्षेत्रों में दो सहस्राब्दियों तक कटोच राजवंश का शासन था। 1810 में सिख राजवंश के महाराज रणजीत सिंह और राजा संसार सिंह कटोच के मध्य हुई ज्वालामुखी की संधि के बाद कटोच केवल काँगड़ा क्षेत्र में स्थानीय जागीरदार रह गए। 1848 में अंग्रेज़ों ने कब्ज़ा कर लिया था। 1849 में कांगड़ा जिले के अंदर एक फौजी छावनी के लिए धौलाधार पर्वत की ढलानों पर एक स्थान को चुना गया, जहां एक हिन्दू धर्मशाला स्थित थी। ऐसी मान्यता है कि धर्मशाला नगर का नाम धर्मशाला शब्द से उत्पन्न हुआ है।

धर्मशाला वर्ष 1849 में कांगड़ा में स्थित सैन्य छावनी के रूप में अस्तित्व में आया। वर्ष 1855 में धर्मशाला को कांगड़ा जिले का मुख्यालय घोषित किया गया था। धर्मशाला में सिविलियन और छावनी क्षेत्र की बढ़ती चहल-पहल को देखते हुए, सुविधाएं लोगों को मुहैया करवाने के लिए नगर परिषद बनाने का विचार बना था। पांच मई 1867 को यहां नगर परिषद अस्तित्व में आई थी। उस समय बनी नगर परिषद की पहली बैठक भी 6 मई 1867 को तत्कालीन जिलाधीश एल्फिनस्टोन की अध्यक्षता में हुई थी।

धर्मशाला के 1867 में नगर परिषद बनने के बाद यहां सुविधाओं में इजाफा हुआ। 1896 में धर्मशाला में लोगों को बिजली भी मिलनी शुरू हुई थी। तत्पश्चात नगर में कार्यालयों के विकास के अतिरिक्त व्यापार व वाणिज्य, सार्वजनिक संस्थान, पर्यटन सुविधाओं तथा परिवहन गतिविधयों में भी उन्नति हई। वर्ष 1905 व 1986 के भूकम्पों से नगर का बहुत नुकसान हुआ। 1926 से 1948 के बीच यहां पर इंटर कॉलेज सहित महाविद्यालय खुला तो वर्ष 1935 में सिनेमा हाल भी यहां खुला। बढ़ते समय के साथ-साथ सामाजिक सुधारों के साथ संगीत, साहित्य और कला के क्षेत्र में भी यह क्षेत्र कहीं पीछे नहीं रहा। 1960 से महामहिम दलाई लामा का मुख्यालय भी धर्मशाला में स्थित है।

धर्मशाला राज्य की शीतकालीन राजधानी है। यह कांगड़ा नगर से 16 किमी की दूरी पर स्थित है। धर्मशाला के मैक्लॉडगंज उपनगर में केंद्रीय तिब्बती प्रशासन के मुख्यालय हैं, और इस कारण यह दलाई लामा का निवास स्थल तथा निर्वासित तिब्बती सरकार की राजधानी है। दो घंटे बौद्ध मंदिर में गुज़ारे। धर्मशाला को भारत सरकार के स्मार्ट सिटीज मिशन के अंतर्गत एक स्मार्ट नगर के रूप में विकसित होने वाले सौ भारतीय नगरों में से एक के रूप में भी चुना गया है।

12 जुलाई 2022 को पठानकोट से जम्मू के रास्ते पर पंजाब की जम्मू-कश्मीर सीमा पर करके कठुआ, बरनोटी, जसरोटा, छन्नी और सम्बा जो कि चिकन नेक बिंदु पर स्थित हैं, को पार करके जम्मू शहर में दाखिल हुए। जम्मू शहर ऐतिहासिक नगर है और पूर्व जम्मू प्रांत की राजधानी रह चुका है और बाद में भी भारत के जम्मू एवं कश्मीर राज्य की शीतकालीन राजधानी रह चुका है। राय जम्बुलोचन राजा बाहुलोचन का छोटा भाई था। बाहुलोचन ने तवी नदी के तट पर बाहु किला बनवाया था और जम्बुलोचन ने जम्बुपुरा नगर बसवाया था। नगर के नाम का उल्लेख महाभारत में भी मिलता है। जम्मू शहर से 32 किलोमीटर दूर अखनूर में पुरातात्त्विक खुदाई के बाद इस जम्मू नगर के हड़प्पा सभ्यता के एक भाग होने के साक्ष्य भी मिले हैं। जम्मू में मौर्य, कुशाण और गुप्त वंश काल के अवशेष भी प्राप्त हुए हैं। 480 ई. के बाद इस क्षेत्र पर एफ्थलाइटिस का अधिकार हो गया था और यहां कपीस और काबुल से भी शासन हुआ था। इनके उत्तराधिकारी कुशानो-हेफ्थालाइट वंश के थे, जिनका अधिकार 565 से 670 ई. तक रहा। तदोपरांत 670 ई. से लेकर 11वीं शताब्दी तक शाही राजवंश का राज रहा जिसे गजनी के अधीनस्थों ने छीन लिया। जम्मू का उल्लेख तैमूर के विजय अभियानों के अभिलेखों में भी मिलता है। इस क्षेत्र ने सिखों एवं मुगलों के आक्रमणों के साथ एक बार फिर से शक्ति-परिवर्तन देखा और अन्ततः ब्रिटिश राज का नियंत्रण हो गया। यहां 840 ई. से 1869 ई. तक देव वंश का शासन भी रहा था। तब नगर अन्य भारतीय नगरों से अलग-थलग पड़ गया और उनसे पिछड़ गया था। उसके उपरांत डोगरा शासक आये और जम्मू शहर को अपनी खोई हुई आभा व शान वापस मिली। उन्होंने यहां बड़े बड़े मन्दिरों व तीर्थों का निर्माण किया व पुराने स्थानों का जीर्णोद्धार करवाया, साथ ही कई शैक्षिक संस्थान भी बनवाये। उस काल में नगर ने काफ़ी उन्नति की। 1817 में 43 कि.मी लम्बी रेल लाइन द्वारा जम्मू को सियालकोट से जोड़ा गया था, किन्तु 1947 में भारत के विभाजन के बाद यह रेल लाइन बंद कर दी गयी क्योंकि सियालकोट से आवाजाही की कड़ी टूट गयी थी। उसके बाद जम्मू शहर में 1971 तक कोई रेल सेवा नहीं थी। तभी भारतीय रेल ने पठानकोट-जम्मू तवी ब्रॉड गेज रेल लाइन डाली और अन्ततः 1975 में एक बार फ़िरसे नये जम्मू-तवी रेलवे स्टेशन के साथ जम्मू शेष भारत से रेल द्वारा जुड़ गया। वर्ष 2,000 में पुराने रेलवे स्टेशन का अधिकांश भाग ध्वस्त कर वहां एक कला केन्द्र बनाया गया।

जम्मू में बहुत तेज गर्मी है। न धरती पर बारिश है और न आसमान में बादल दिख रहे हैं। तभी दूसरे चौराहे पर अमरनाथ यात्रियों के लिए संचालित भंडारे में भोजन किया। उसके बाद दस मिनट में जम्मू विमानतल पहुँच गये। इलेक्ट्रॉनिक डिस्प्ले बोर्ड पर Go first की फ़्लाइट नम्बर G-196 दोपहर बाद तीन बजे का प्रस्थान प्रदर्शित हो रहा है।

इति वृतांत

क्रमशः…

© श्री सुरेश पटवा 

भोपाल, मध्य प्रदेश

*≈ सम्पादक श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – लद्दाख़ यात्रा – भाग-२० – नेपाल यात्रा – हिमालय की गोद में – १७ ☆ श्री सुरेश पटवा ☆

श्री सुरेश पटवा

(श्री सुरेश पटवा जी  भारतीय स्टेट बैंक से  सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों  स्त्री-पुरुष “गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की  (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं  तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व  प्रतिसाद मिला है। अब आप प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकते हैं यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर)

? यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – लद्दाख़ यात्रा – भाग- २० ☆ श्री सुरेश पटवा ?

10 जुलाई 2022 को गुलमर्ग में सर्द रात गुज़ारने के बाद नाश्ता निपटाया। गाड़ी वालों ने गुलमर्ग के पर्यटन स्थलों के भ्रमण हेतु एक वाहन का खर्चा 4,000/- बताया। लम्बी बातचीत और बोलियों के उतार चढ़ाव के बाद 3,000/- में सौदा पट गया। लेकिन ईद के कारण गाड़ी नहीं आ पायी इसलिए कार्यक्रम निरस्त करना पड़ा। बारह बजे दोपहर को हमारी टैक्सी आ गयी। हम हाउसबोट में शिफ़्ट होने को श्रीनगर रवाना हुए। वहाँ हाउसबोट में रुकना है। हमने सोचा भीड-भाड से परे शांत वातावरण में किसी हाउसबोट में रहने की इच्छा है तो नागिन लेक या झेलम नदी पर खडे हाउसबोट में ठहर सकते हैं। नागिन झील भी कश्मीर की सुंदर और छोटी-सी झील है। यहां प्राय: विदेशी सैलानी ठहरना पसंद करते हैं। झेलम नदी में छोटे हाउसबोट होते हैं।

आज कश्मीर में बक़रीद मनाई जा रही है। गुलमर्ग से श्रीनगर के लिए निकले। चीड़, चिनार, देवदार के पेड़ जो आते वक्त स्वागत द्वार थे, अब बिदाई तोरण नज़र आ रहे हैं। जल के कई रिसाव स्थान पार करते विचार आ रहा है कि भारत के हिमालयी क्षेत्र सभी एक जैसे ही हैं। पूरे हिमालयी क्षेत्र के इलाकों में चश्मों को अलग-अलग नामों से जाना जाता है, सिक्किम में धारा, तो उत्तराखण्ड में जलस्रोत, बावली, तो हिमाचल में नौले, खात्री या छुरुहरा और मेघालय में जलकुण्ड और सतपुड़ा इलाक़े में झरने।

प्रतिभा की तबियत ख़राब होने से उन्हें नूरा अस्पताल में दिखाना पड़ा। दो घंटे इलाज करने में व्यतीत हुए। तीन बजे हाउसवोट पहुँचे। चीयरफ़ुल चार्ली नामक हाउसवोट में पहुँचे। हाउसवोट मालिक को बुकिंग लेकर कुछ कठिनाई थी। उसने दो-तीन लोगों को फ़ोन घुमाया तब जाकर वोट में कमरा मिला। यहाँ से किनारे का नजारा बेहद खूबसूरत है। शिकारे बहते नज़र आ रहे हैं। आज बक़रीद की छुट्टी होने से सभी शिकारे काम पर लगे हैं। असलम भाई डाँगोला की मिशन कश्मीर हाउसवोट में एक रात का आशियाना है। उन्होंने बताया कि यदि आप सात दिनों के लिए कश्मीर आते हैं तो आपको सिर्फ़ 40,000/- रुपयों में यहाँ रहना, खाना, टैक्सी उपलब्ध रहेगी। उनका मोबाईल नम्बर 9419065385 है। हाउसवोट में सामने बैठे हैं। यहाँ से सामने शंकराचार्य पहाड़ी और बाजू में जबरवन पहाड़ी दिख रही है। शाम हो रही है। अब शिकारों की भीड़ बढ़ती जा रही है। शिकारों में शराब, चिकन टिक्का, पनीर टिक्का और दूसरी चीजें मिल रही हैं।

हाउसबोट एक तरह की लग्जरी में तब्दील हो चुके हैं। कुछ लोग दूर-दूर से केवल हाउसबोट में रहने का लुत्फ उठाने के लिए ही कश्मीर आते हैं। हाउसबोट में ठहरना सचमुच अपने आपमें एक अनोखा अनुभव है। परंतु वास्तव में इसकी शुरुआत लग्जरी नहीं, बल्कि मजबूरी में हुई थी। कश्मीर में हाउसबोट का प्रचलन डोगरा राजाओं के काल में तब शुरू हुआ था, जब उन्होंने किसी बाहरी व्यक्ति द्वारा कश्मीर में स्थायी संपत्ति खरीदने और घर बनाने पर क़ानूनी प्रतिबंध लगा दिया था। उस समय कई अंग्रेजों और अन्य आसामियों ने बडी नाव पर लकडी के केबिन बना कर यहां रहना शुरू कर दिया। फिर तो डल झील, नागिन झील और झेलम पर हाउसबोट में रहने का चलन हो गया। बाद में उनकी देखादेखी स्थानीय लोग भी हाउसबोट में रहने लगे। आज भी झेलम नदी पर स्थानीय लोगों के हाउसबोट तैरते देखे जा सकते हैं। शुरुआती दौर में बने हाउसबोट बहुत छोटे होते थे, उनमें इतनी सुविधाएं भी नहीं थीं, लेकिन अब वे लग्जरी रूप ले चुके हैं। सभी सुविधाओं से लैस आधुनिक हाउसबोट किसी छोटे होटल के समान हैं। डबल बेड वाले कमरे, अटैच बाथ, वॉर्डरोब, टीवी, डाइनिंग हॉल, खुली डैक आदि सब पानी पर खडे हाउसबोट में है। लकडी के बने हाउसबोट देखने में भी बेहद सुंदर लगते हैं। अपने आकार एवं सुविधाओं के आधार पर ये विभिन्न दर्जे के होते हैं। शहर के मध्य बहती झेलम नदी पर बने पुराने लकडी के पुल भी पर्यटकों के लिए एक आकर्षण है। कई मस्जिदें और अन्य भवन झेलम नदी के निकट ही स्थित है।

हमारे पैकेज में डल झील में एक घंटे का शिकारा सफ़र तय था लेकिन आज शिकारों पर भारी भीड़ होने से सात बजे शिकारा आया। पानी की बोतल में स्कॉच के दो पेग भरकर एक घंटा शिकारा सैर से डल झील का भरपूर मज़ा लिया। चारों तरफ़ पहाड़ों पर हरियाली का आलम था। गवर्नर हाउस, शंकराचार्य पहाड़ी और मुग़ल क़ालीन क़िला ढलते सूरज की मद्धिम रोशनी में सुहाने लग रहे थे। जी भरकर फ़ोटो उतारीं। कश्मीर की डल झील को मन भरकर जी लिया।

हाऊसबोट पर तीन कश्मीरी थे। उनसे बातें होती रहीं। उन्होंने बताया कि पहाड़ों की चट्टानों और भूमि में स्थित जल ही चश्मों में फूटता है। चश्मे अक्सर ऐसे क्षेत्रों में प्राकृतिक होते हैं जहाँ धरती में दरारें और रिसाव हो, जिनमें बारिश का पानी प्रवेश कर जाये। फिर यह पानी जमीन के अन्दर ही प्राकृतिक नालियों और गुफ़ाओं में घूमता हुआ किसी और जगह से चश्मे के रूप में उभर आता है।

कश्मीर के गाँवों में अभी भी चश्में ही पानी का मुख्य स्रोत हैं। कश्मीर के गाँवों में ज़मीनी खेती ही रोजी-रोटी का एक बड़ा सहारा है। ज्यादा ऊँचाई वाले इलाकों में खासकर चश्में ही पानी और सिंचाई के स्रोत थे। उपेक्षा और नए ‘विज्ञानियों के नजर में अनुपयोगी’ चश्मों को लोग भूलते गए। कई प्राकृतिक चश्में सालों पहले बन्द हो गए या कर दिए गए। लोगों ने उनके आस-पास और उनके ऊपर घर बना लिये। लोग भूल गए कि कभी यहाँ कोई चश्मा भी था। पिछले साल जब ज्यादा बारिश हुई तो उनके घर के नीचे से कमरों में पानी आने लगा। तब याद आया कि वे किसी पानी की ‘जगह’ पर बैठे हुए हैं। उन्होंने पानी का आशियाना हथिया लिया है।

चश्में हालांकि बहुत ज्यादा पानी नहीं देते, पर चश्में आज भी कश्मीरी गाँवों में पीने के पानी के सबसे बड़े स्रोत हैं। हाँ! सिंचाई के लिये जरूर चश्मों से थोड़ा आगे बढ़कर 8वीं शताब्दी में कश्मीर के शासक ललितादित्य ने ऊँचे पठारों तक पानी पहुँचाने के लिये एक नए यंत्र का इस्तेमाल कराना शुरू किया था जिसका नाम था ढेंकी। इसमें किसान को एक बड़े खम्बे का इस्तेमाल करना था। जिसके मुँह पर पानी के लिये बाल्टीनुमा पात्र बँधा होता था। अपने पैरों से सन्तुलन बनाते हुए उसे पानी के कुएँ या किसी जलधारा से खींचना होता था। यह सारा काम मानवीय ऊर्जा से होता था, तब तक सब ठीक ही रहा। भूजल में कोई खास दिक्कत नहीं थी। पर पम्पिंग मशीनों ने दृश्य बदल दिया। भूजल की गिरावट ने चश्मों को सुखाना शुरू कर दिया है। अब तो कश्मीरी सिंचाई का वर्तमान तरीक़ा धीरे-धीरे ‘डीपवेल’ और ‘लिफ्ट इरिगेशन’ की तरफ जा चुका है। स्थान विशेष की योजना वहाँ की ज़मीनी हकीक़त से ही बनाई जानी चाहिए। हर कीमत पर इस बात को ध्यान में रखा जाना चाहिए। इसकी गहराई में वहाँ की संस्कृति, भौगोलिक, आर्थिक और सामाजिक स्थितियाँ सभी कुछ शामिल होती हैं। विकासवादी गतिविधियों और गलत निर्णयों के चलते चश्में खत्म होते जा रहे हैं।

पहले इस इलाके में भरपूर जंगल थे, जो चश्मों के पुनर्भरण में मददगार होते थे, लेकिन धीरे-धीरे जंगल कम हुए और चश्मों में जलापूर्ति कम होती गई। साथ ही पुनर्भरण क्षेत्रों में बिना समझे-बूझे पक्के निर्माण चश्मों की जल-भण्डारण क्षमता को घटा रहे हैं। कश्मीरी पहाड़ जो खुद ही ‘वाटर टैंक’ थे, उनको सुखा के सरकारों का जनस्वास्थ्य अभियांत्रिकी विभाग टैंकों और टैंकरों से पीने का पानी मुहैया करवाने की कोशिश कर रहा है। श्रीनगर और कुछ नगरों के नागरिकों को तो यह सुविधा उपलब्ध हो जाएगी, और होती रहेगी पर गाँवों को कौन पूछेगा। उनको तो अपने प्राकृतिक और टिकाऊ पानी के टैंक ‘चश्मों’ को ही ठीक-ठाक रखना होगा।

फिर विचार आया कि कश्मीरियत क्या है? “आज़ादी-आज़ादी, हम माँगते आज़ादी” और “भारत तेरे टुकड़े होंगे” नारे लगाने वाले कोई मिले नहीं। एक भले से दिखते पढ़े लिखे कश्मीरी से बातचीत कश्मीरियत को कुछ इस तरह बयाँ करती है।

इस्लाम आने के बाद सूफी संतों का दर्शन यहां की सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है। मध्ययुग में मुस्लिम आक्रान्ता सिकंदर बुतशिकन कश्मीर पर क़ाबिज़ हो गये। कुछ भले शाह ज़ैन-उल-आबदीन जैसे मुसलमान हिन्दुओं से अच्छा व्यवहार करते थे पर सुल्तान सिकन्दर बुतशिकन जैसों ने यहाँ के मूल कश्मीरी हिन्दुओं को मुसलमान बनने या राज्य छोड़कर जाने या मरने पर मजबूर कर दिया। कुछ ही सदियों में कश्मीर घाटी मुस्लिम बहुल हो गई। चौदहवीं शताब्दी में यहां मुस्लिम शासन आरंभ हुआ। उसी काल में फारस से सूफी संतों के रूप में इस्लाम का भी आगमन हुआ। यहां पर ऋषि परम्परा, त्रिखा शास्त्र और सूफी इस्लाम का संगम मिलता है, जो कश्मीरियत का सार है।

यहाँ की सूफ़ी-परम्परा बहुत विख्यात है, जो कश्मीरी इस्लाम को परम्परागत शिया और सुन्नी इस्लाम से थोड़ा अलग और हिन्दुओं के प्रति सहिष्णु बनाती है। यह हमने भी महसूस किया। सभी कश्मीरियों को आतंकी कह देना बहुत बड़ी नादानी और सिरे से बेमानी है। जन्नत-ए-कश्मीर भारत छोड़ कर जाते अंग्रेजों, रुकते हिंदुओं और बँटते मुसलमानों के बीच एक राजनीतिक मोहरा बन गया था। अब चुनावी बिछात पर शकुनि पाँसा है। चुनाव के वक़्त मंदिर-मस्जिद, कश्मीर और आतंक एक साथ परोसे जाते हैं।

हमने कहा- लेकिन 370 का समापन भारतीय राष्ट्र के लिए एक बड़ी उपलब्धि है। एक राष्ट्र, एक संविधान, राष्ट्रीय एकता और प्रभुसत्तावादी राज्य की अनिवार्यता होती है। आप क्या कहेंगे?

उन्होंने कहा- रियासत की परम्पराओं से मुक्त होना कठिन होता है। थोड़ा वक़्त लगेगा। कश्मीरी हिन्दुओं को कश्मीरी पंडित कहा जाता है और वो सभी ब्राह्मण माने जाते हैं। सभी कश्मीरियों को कश्मीर की संस्कृति, यानि कि कश्मीरियत पर बहुत नाज़ है। वादी-ए-कश्मीर अपने चिनार के पेड़ों, कश्मीरी सेब, केसर (ज़ाफ़रान, जिसे संस्कृत में काश्मीरम् भी कहा जाता है), पश्मीना ऊन और शॉलों पर की गयी कढ़ाई, गलीचों और देसी चाय (कहवा) के लिये दुनिया भर में मशहूर है। यहाँ का सन्तूर भी बहुत प्रसिद्ध है। कश्मीरी व्यंजन भारत भर में बहुत ही लज़ीज़ माने जाते हैं। ज़्यादातर कश्मीरी पंडित मांस खाते हैं। कश्मीरी लोगों के मांसाहारी व्यंजन हैं, नेनी (बकरे के ग़ोश्त का) क़लिया, नेनी रोग़न जोश, नेनी यख़ियन (यख़नी), मच्छ (मछली), इत्यादि। कश्मीरी पंडितों के शाकाहारी व्यंजन हैं : चमनी क़लिया, वेथ चमन, दम ओलुव (आलू दम), राज़्मा गोआग्जी, चोएक वंगन (बैंगन), इत्यादि। कश्मीरी मुसलमानों के (मांसाहारी) व्यंजन में कई तरह के कबाब और कोफ़्ते, रिश्ताबा, गोश्ताबा, इत्यादि शामिल होते हैं। परम्परागत कश्मीरी दावत को वाज़वान कहा जाता है। कहते हैं कि हर कश्मीरी की ये ख़्वाहिश होती है कि ज़िन्दगी में कम से कम एक बार अपने दोस्तों के लिये वो वाज़वान परोसे।

हमने पूछा- यदि कश्मीरियत कश्मीरी पंडितों की खैर ख़्वाह है तो कश्मीरी पंडित कब लौटेंगे, अभी माहौल ठीक नहीं लगता।

उन्होंने कहा- आग ठंडी होने में वक़्त लगता है, जनाब।

इतने में गिलासों में कहवा पेय आ गया। चुस्कियों के बीच कश्मीरी खान-पान पर चर्चा निकल पड़ी। उन्होंने बताया- कश्मीर घाटी की प्रसिद्ध फसल चावल यहाँ के निवासियों का मुख्य भोजन है। मक्का, गेहूँ, जौ और जई भी अन्य फसलें हैं। इनके अतिरिक्त विभिन्न फल एवं सब्जियाँ यहाँ उगाई जाती हैं। अखरोट, बादाम, नाशपाती, सेब, केसर, तथा मधु आदि का प्रचुर मात्रा में निर्यात होता है। कश्मीर केसर की कृषि के लिए प्रसिद्ध है। शिवालिक तथा मरी क्षेत्र में कृषि कम होती है। दून क्षेत्र में विभिन्न स्थानों पर अच्छी कृषि होती है। जनवरी और फरवरी में कोई कृषि कार्य नहीं होता। यहाँ  झीलों का बड़ा महत्व है। उनसे मछली, हरी खाद, सिंघाड़े, कमल एवं मृणाल तथा तैरते हुए बगीचों से सब्जियाँ उपलब्ध होती हैं। कश्मीर की मदिरा मुगल बादशाह बाबर तथा जहाँगीर को बड़ी प्रिय थी किंतु अब उसकी इतनी प्रसिद्धि नहीं रही। कृषि के अतिरिक्त, रेशम के कीड़े तथा भेड़ बकरी पालने का कार्य भी यहाँ पर होता है।

कश्मीर राज्य में प्रचुर खनिज साधन हैं किंतु अधिकांश अविकसित हैं। कोयला, जस्ता, ताँबा, सीसा, बाक्साइट, सज्जी, चूना पत्थर, खड़िया मिट्टी, स्लेट, चीनी मिट्टी, अदह (ऐसबेस्टस) आदि तथा बहुमूल्य पदार्थों में सोना, नीलम आदि यहाँ के प्रमुख खनिज हैं।

श्रीनगर का प्रमुख उद्योग कश्मीरी शाल की बुनाई है जो मुग़लों के समय ठीक से विकसित हुई थी और तभी से ही चली आ रही है। कश्मीरी कालीन भी प्रसिद्ध औद्योगिक उत्पादन है, किंतु आजकल रेशम उद्योग सर्वप्रमुख प्रगतिशील धंधा हो गया है। चाँदी का काम, लकड़ी की नक्काशी तथा पाप्ये-माशे यहाँ के प्रमुख उद्योग हैं। कश्मीर का प्रमुख धंधा पर्यटन  है जिससे राज्य को और स्थानीय निवासियों को बड़ी आय प्राप्त होती है। लगभग एक दर्जन औद्योगिक संस्थान स्थापित हुए हैं परंतु प्रचुर औद्योगिक क्षमता के होते हुए भी बड़े उद्योगों का विकास अभी तक नहीं हो पाया है। मुख्य नदियाँ सिन्धु, झेलम और चेनाब हैं। यहाँ कई ख़ूबसूरत झीलें हैं जैसे: डल, वुलर और नगीन।

उनसे विदाई लेकर हम हरि पर्वत किला की सैर को निकल गये। श्रीनगर के डल झील के पश्चिम में हरि पर्वत किला स्थित है। अता मोहम्मद खान ने किले का निर्माण कराया। हरि पर्वत को कोह-ए-मारन के नाम से भी जाना जाता है। यह किला श्रीनगर की डल झील के पश्चिम में स्थित है। जिला प्रशासन के मुताबिक इस किले का निर्माण 18वीं सदी में अफगान गवर्नर अता मोहम्मद खान ने कराया। बाद में 1590 में बादशाह अकबर ने किले में एक लंबी दीवार का निर्माण कराया। इस किले से डल झील की खूबसूरती देखते बनती है। किले की देख-रेख एवं रखरखाव भारतीय पुरातत्व विभाग करता है। हरि पर्वत किले के प्राचीन खंभे इसके सौंदर्य को और बढ़ाते हैं। यहां से मखदूम साहिब की दरगाह भी अच्छी तरह दिखती है। ऊंचाई पर स्थित होने के नाते यह किला श्रीनगर के सभी इलाके से नजर आता है। इस पर्वत की पश्चिमी ढलान पर भगवती पार्वती का मंदिर है। इस किले पर आने के लिए पर्यटकों को पुरातत्व विभाग से अनुमति लेनी होती है।

11 जुलाई 2022 को अब कश्मीर से बिदाई लेने का वक़्त आ गया है। सुबह आठ बजे श्रीनगर से अमृतसर फ़्लाइट है। शिकारे में सोए थे, नींद अच्छी आई और समय पर खुल भी गई। जब तक भूख और नींद ज़िंदा है, तब तक सब ठीक समझना चाहिए। आठ बजे फ़्लाइट पकड़ने के लिए पाँच बजे निकलना पड़ा। श्रीनगर विमानतल पर सघन चौकसी और सूक्ष्म जाँच परीक्षण से गुजरना पड़ा। गो-एयर की सेवा का स्तर ठीक नहीं है। हमेशा अफ़रातफ़री में काम होता है। विमान श्रीनगर से अमृतसर-दिल्ली होकर मुंबई जाना था। श्रीनगर से अमृतसर की सवारियाँ बहुत थीं। लगभग पूरा विमान ख़ाली हो गया। जबसे कश्मीर से धारा 370 हटी है। तब से पंजाब के सिक्ख कश्मीर में प्रॉपर्टी ख़रीदने लगे हैं। उन्होंने बताया अभी सस्ती मिल रही हैं। भविष्य में निजी क्षेत्र के अस्पताल और कारोबारी आएँगे तब महंगाई चरम पर पहुँचेगी। उस समय बेंच कर कमाई कर लेंगे। आज धर्मशाला के लिए टैक्सी से निकलना है। अमृतसर में विमान के उतरने के पहले ही अमृतसर के टैक्सी चालक का फ़ोन आ गया। संदीप सिंह टैक्सी नम्बर PB 01 B 4742 लेकर गेट पर खड़े मिले। उन्हें सीधा धर्मशाला जाना था। हमारे कहने पर स्वर्ण मंदिर दर्शन करने का कार्यक्रम बन गया।

क्रमशः…

© श्री सुरेश पटवा 

भोपाल, मध्य प्रदेश

*≈ सम्पादक श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – लद्दाख़ यात्रा – भाग-१९ – नेपाल यात्रा – हिमालय की गोद में – १६ ☆ श्री सुरेश पटवा ☆

श्री सुरेश पटवा

(श्री सुरेश पटवा जी  भारतीय स्टेट बैंक से  सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों  स्त्री-पुरुष “गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की  (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं  तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व  प्रतिसाद मिला है। अब आप प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकते हैं यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर)

? यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – लद्दाख़ यात्रा – भाग-१९ ☆ श्री सुरेश पटवा ?

08 जुलाई 2022 को हम श्रीनगर से पहलगाम जा रहे हैं। पहलगाम का रास्ता भी सैलानियों को बहुत प्रभावित करता है। मार्ग में पाम्पोर में केसर के खेत दिखाई देते हैं। जगह-जगह क्रिकेट के बैट रखे नजर आते हैं। यहां विलो-ट्री की लकडी से बैट बनते हैं। रास्ते पर सबसे पहले पम्पोर आया। जिसे पम्पर या पानपर के नाम से भी जाना जाता है। जम्मू-श्रीनगर राष्ट्रीय राजमार्ग झेलम नदी के पूर्वी किनारे पर स्थित कश्मीर का एक ऐतिहासिक शहर है। प्राचीन काल में इसे पदमपुर के नाम से जाना जाता था। यह अपने केसर के लिए प्रसिद्ध है। पम्पोर दुनिया के उन कुछ स्थानों में से एक है जहां दुनिया का सबसे महंगा केसर उगाया जाता है। पम्पोर केसर के लिए जगप्रसिद्ध है जिसका पाँच साला पौधा छै पत्तियाँ धारण करता है। अक्टूबर में फसल आती है। तीन पत्तियाँ लाल और तीन पत्तियाँ हरे रंग की होती हैं। लाल रंग की पत्तियाँ असली केसर होता है। जो बहुत महँगा मिलता है। हरे रंग की पत्तियों का औद्योगिक उपयोग पान और सब्ज़ी में मसालों के तौर पर होता है। यह क्षेत्र श्रीनगर शहर के केंद्र लाल चौक से लगभग 11 किलोमीटर दूर है। पम्पोर के क्षेत्र में स्थानों के नाम आम तौर पर -बल प्रत्यय के रूप में होते है, जैसे नामलाबल, कदलाबल, द्रंगबल, फ़्रेस्टबल और लेट्राबल के इलाके। पम्पोर में तीन झीलें भी हैं, झीलों में से एक सरबल झील के नाम से जानी जाती है। सरबल झील, तुलबाग से वुयान के रास्ते में चटलम के पास केसर के खेतों से होते हुए जाती है। चटलाम के निकट स्थित होने के कारण इसे चटलाम आर्द्रभूमि भी कहा जाता है।

उसके बाद अवंतिपुर या अवंतीपोरा आया, जिसे वूंटपोर के नाम से जाना जाता है। शहर का नाम अवंतिपुर कश्मीरी राजा अवंतिवर्मन के नाम पर रखा गया था और इसमें उनके द्वारा निर्मित 9वीं शताब्दी के दो हिंदू मंदिरों के खंडहर हैं। इस शहर की स्थापना अवंतिवर्मन ने की थी जो उत्पल वंश के पहले राजा थे और उन्होंने 855 से 883 ईस्वी तक कश्मीर पर शासन किया था। अवंतिवर्मन ने राजा बनने से पहले अवंतीपोरा में विष्णु को समर्पित एक हिंदू मंदिर का निर्माण किया, जिसे “अवंतिसवामिन” कहा जाता है। अपने शासनकाल के दौरान उन्होंने शिव को समर्पित “अवंतीश्वर” नामक एक दूसरा हिंदू मंदिर बनाया। दोनों मंदिर विशाल आयताकार पक्के आंगनों में बनाए गए थे। वे मध्य युग में नष्ट हो गए। 20 वीं शताब्दी की शुरुआत में पुरातत्वविद् दया राम साहनी द्वारा उनकी खुदाई की गई थी। भारतीय राज्यों में सिर्फ़ कश्मीर एक ऐसा प्रदेश है जिसका प्रामाणिक इतिहास कल्हण नामक विद्वान द्वारा राज़तरंगिणी नाम से अवंतीपुर में ही लिखा गया था।

भारत के हिमालयी क्षेत्र सभी एक जैसे ही हैं। पूरे हिमालयी क्षेत्र के इलाकों में चश्मों को अलग-अलग नामों से जाना जाता है। कश्मीर में नाग, सिक्किम में धारा, तो उत्तराखण्ड में जलस्रोत, बावली, तो हिमाचल में नौले, खात्री या छुरुहरा और मेघालय में जलकुण्ड। श्रीनगर से 53 किलोमीटर की दूरी पर अनंतनाग है। यह श्रीनगर और जम्मू के बाद जम्मू और कश्मीर का तीसरा सबसे बड़ा शहर है। इस शहर को इस्लामाबाद और अनंतनाग दोनों नामों से पुकारा जाता है।

शहर का संस्कृत नाम अनंतनाग नीलमात पुराण और अन्य ग्रंथों में वर्णित है। कश्मीर और लद्दाख के राजपत्र के अनुसार, इसका नाम विष्णु के महान नाग और अनंत काल के प्रतीक अनंत के नाम पर रखा गया है। माना जाता है कि इस्लामाबाद नाम एक मुगल गवर्नर इस्लाम खान के नाम से लिया गया है, जिन्होंने इस क्षेत्र में एक बगीचा लगवाया था।

डोगरा शासन के दौरान, अनंतनाग/इस्लामाबाद कश्मीर घाटी के तीन जिलों में से एक का मुख्यालय था, जिसे “अनंतनाग वज़रात” कहा जाता था। मार्तंड सूर्य मंदिर कश्मीर के महत्वपूर्ण पुरातात्विक स्थलों में से एक है, जिसे लगभग 500 ईस्वी में बनाया गया था। यह मंदिर अनंतनाग से 9 किमी पूर्व-उत्तर-पूर्व और मट्टन के दक्षिण में केहरीबल में स्थित है। इस प्रसिद्ध सूर्य मंदिर को शासक सिकंदर बुतशिकन ने नष्ट कर दिया था। अनंतनाग में एक रेस्टोरेंट में नाश्ता और काफ़ी पीकर चल दिए।

अमरनाथ यात्रा के कारण कई जगह जाम लग रहा था इसलिए क़ाफ़िला घिसटते हुए चल रहा था। हम लिद्दर नदी की कलकल के सरगम में ठंडी हवाओं के साथ चिनार और पाइन पेड़ों से बात करते आगे बढ़ते रहे। लिद्दर नदी पहले कभी लम्बोदरी नदी कहलाती थी। पेड़ों पर आशियाना जमाये पक्षी दिख जाते और हमें देखकर फुदक लेते। एक बंदरिया बच्चों को समेटने में परेशान थी। पाइन के पेड़ पर सुबह के नाश्ते के बाद की ऊधम उसकी परेशानी का सबब थी। उसके बच्चे पेड़ की डाल से लटक कर नीचे आ जाते। बंदरिया उन्हें पेड़ पर चढ़ने को हड़काने के लिए नीचे उतरती तो बच्चे ऊपर चढ़ जाते। ट्राफ़िक जाम में बंदरों की मटरगस्ती और लिद्दर नदी के बहाव के साथ एक कौए की काँव-काँव सुनकर चीड़-चिनार-देवदार वृक्षों की तरफ़ ध्यान गया। जिनके साये में ट्राफ़िक जाम का वक़्त गुज़ारा। ख़्याल आया कि इस सुंदर वातावरण में कोयल कूकनी चाहिए। परंतु कोयल कश्मीर में नहीं कूकती। उसे कूकने के लिए सतपुड़ा वाले आम के पेड़ चाहिए।    

इनके अलावा अवंतिपुर में 9वीं शताब्दी में बने दो मंदिरों के भग्नावशेष तथा मार्तड का सूर्य मंदिर भी आकर्षक हैं। सागरतल से 2130 मीटर की ऊंचाई पर बसा पहलगाम कभी चरवाहों का छोटा सा गांव था। किंतु यहां बिखरी नैसर्गिक छटा ने इसे खुशनुमा सैरगाह बना दिया। लिद्दर नदी इसकी छटा को और बढाती है। नदी पर कई जगह बने लकडी के पुल और दूर दिखते हिमशिखर पिक्चर पोस्टकार्ड से दृश्य प्रस्तुत करते हैं। देवदार के जंगल, झरने और फूलों के मैदान तो जगह-जगह नजर आएंगे। बैसरन के मर्ग, आडु, चंदनवाडी जैसे स्थान घोडों पर बैठकर घूमे जा सकते हैं। साहसी पर्यटक पहलगाम से तरसर, मरसर झीलें, दुधसर झील और कोलहाई ग्लेशियर जैसे ट्रेकिंग रूटों पर निकल सकते हैं। अमरनाथ यात्रा का मुख्य मार्ग पहलगाम से चंदनवाडी, शेषनाग, महागुनस, पंचतरणी, संगम होते हुए अमरनाथ गुफा जाता है।

हमारा क़ाफ़िला ग्यारह बजे पहलगाम पहुँचा। पहलगाम शाब्दिक अर्थ = चरवाहों का गाँव है। जम्मू और कश्मीर के अनन्तनाग जिले का एक लोकप्रिय पर्वतीय पर्यटन स्थल है। साथ ही अमरनाथ यात्रा का एक महत्वपूर्ण पड़ाव भी है। विश्व भर से हजारों पर्यटक प्रति वर्ष यहाँ आते हैं। यह अनन्तनाग से 45 किमी की दूरी पर लिद्दर नदी के किनारे स्थित है। पहलगाम, अननतनाग ज़िले की पाँच तहसीलों में से एक तहसील है। अनंतनाग से पहलगाँव की तरफ़ रास्ता मुड़ते ही लिद्दर नदी आपका स्वागत करती है। लिद्दर नदी किसी समय लम्बोदरी नाम से जानी जाती थी।

लिद्दर घाटी की पश्चिमी सीमा कश्मीर घाटी से लगी है और उत्तरी सीमा सिंधु घाटी के लगती है। घाटी की कुल लंबाई  40 किलोमीटर है। इसकी अधिकतम चौड़ाई पांच किमी है। लिद्दर बेसिन, दक्षिण और दक्षिण-पूर्व में पीर पंजाल रेंज, उत्तर में सिंधु घाटी और पूर्वोत्तर में जांस्कर श्रेणी द्वारा परिसीमित है।  लिद्दर जल निकासी बेसिन का कुल  क्षेत्र 1,134 किमी है। यह घाटी लिद्दर नदी द्वारा निर्मित है जो अंग्रेजी के वाई (Y) अक्षर के आकार में है। पहलगाम के ऊपर नदी दो धाराओं, पूरबी लिद्दर और पच्छिमी लिद्दर के रूप में बहती है। इन दो धाराओं में से पूर्वी लिद्दर नदी ऊपर की ओर चन्दनवाड़ी से होकर गुजरती है और इसका स्रोत शेषनाग झील और शीशराम ग्लेशियर है। पश्चिम लिद्दर नदी कोल होई ग्लेशियर से निकलती है और अपने रास्ते में कई हरे शंकुधारी जंगलों और अल्पाइन घास की उपत्यकाओं से गुजरती है। लिद्दर घाटी अन्य ज़िलों के लिये स्वच्छ जलापूर्ति का स्रोत है और साथ ही कृषि हेतु सिंचाई का साधन भी।  लिद्दर नदी अपने मार्ग में कई उल्लेखनीय प्राकृतिक स्थलों और पर्यटन स्थलों, उदाहरणार्थ, अरु, पहलगाम, बेताब घाटी, और अकद से होकर गुजरती है। इस घाटी में अवस्थित मुख्य कस्बों में मंडलान, लारिपोरा, फ्रास्लन, अशमुकाम और सीर हमदान हैं।

पहलगाम में घुड़सवारी का भय मिश्रित मज़ा लिया। तीन घंटे घुड़सवारी का एक स्पॉट मिनी-स्विट्ज़रलैंड है। जिसका रेट 2,500.00 रुपए प्रति सवार है। सौदेबाज़ी के बाद 2000.00 प्रति सवार तय हो गया। घोड़े पर बैठ कर सीधे पहाड़ चढ़ना सचमुच दिलेरी का काम है। पत्थर, कीचड़, पेड़, पौधे, अन्य घुड़सवार के बीच शुरू में घबराहट हुई। परंतु घोड़े पर बैठने की तकनीक समझने पर सहजता आ गई। सीधी चढ़ाई चढ़ने में अधिक पता नहीं चला लेकिन उतरने में सामने खाई दिखने से भय लगता रहा। घोड़े भी आपस में टकराते रहे। घोड़ा एक पेड़ के किनारे चला तो दाहिनी घुटना पेड़ से टकरा गया। एक कराह के साथ मुँह से गाली निकल गई।

एक फ़ोटोग्राफ़र प्रति फ़ोटो प्रिंट का 100.00 माँग रहा था, और उसकी फ़ोटो मोबाईल में देने का 20.00 प्रतिफ़ोटो। सौदेबाज़ी उपरांत क्रमशः 50.00 और 10.00 रुपए तय हुआ। उसने 128 फ़ोटो निकाल लिए। फ़ोटो प्रिंट में समय अधिक लगना था इसलिए मोबाईल में फ़ोटो लेने की सौदेबाज़ी शुरू हुई। उससे सारी फ़ोटो 1000.00 रुपए में ले लीं। वहीं पराठा खाया और घोड़े पर सवार होकर वापिस चल दिए।

अनंतनाग-पहलगाम सड़क पर ग्रीनहाइट होटल में रुके। एक बहुत ही शानदार और खूबसूरत लोकेशन पर आरामदायक होटल की बालकनी से लिद्दर नदी पर राफ़्टिंग के नज़ारे लुभावने थे। हमसे रहा नहीं गया। बालकनी में कुर्सी रखकर अड्डा जमाया। कमरे की बालकनी से सामने लिद्दर नदी के पार पहाड़ियों की एक के बाद एक चार क़तार दिख रही हैं। उनके पीछे सूर्य अस्ताचलगामी हो रहा है। नदी के दोनों तरफ़ होटलों का अम्बार है। दाहिनी तरफ़ पहाड़ों की आठ-दस क़तारें और उनके ऊपर बादलों की अठखेलियाँ आकर्षित कर रही हैं। लिद्दर नदी की ध्वनि सुनते बहुत देर तक बालकनी में बैठे रहे।

सैलानियों को आकर्षित करने वाले अन्य स्थानों में कोकरनाग 2012 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। यह स्थान औषधीय गुणों वाले प्राकृतिक चश्मों के लिए प्रसिद्ध है। कश्मीरी भाषा में नाग का अर्थ चश्मा भी होता है। वेरीनाग में भी कुछ प्राकृतिक चश्में हैं। यहां बादशाह जहांगीर ने चश्मों का जल एक ताल में एकत्र कर उसके आसपास एक उद्यान बनवाया था। 80 मीटर के दायरे में फैले आठ कोणों वाले इस ताल एवं उद्यान में चिनार के वृक्षों की कतारें सैलानियों का मन मोह लेती है। चार बजे के लगभग आधा घंटा वहाँ बिताया।

09 जुलाई 2022 को सुबह छै बजे पहलगाम से गुलमर्ग के लिए रवाना होना था लेकिन दो साथियों की तबियत ठीक न होने की वजह से नौ बजे के बाद रवाना हो सके। कश्मीर घाटी में श्रीनगर से किसी भी दिशा में निकल जाएं तो प्रकृति के इतने रूप देखने को मिलते हैं कि लगता है जैसे प्रकृति ने अपना खजाना यहीं छुपा रखा है। गुल का मतलब फूल और मर्ग याने वादी, गुलमर्ग का अर्थ हुआ फूलों की वादी। लिद्दर नदी में कल साफ़ कंचन पानी प्रवाहित हो रहा था। विगत रात अमरनाथ गुफा पर बादल फटने से आज सुबह लिद्दर नदी का पानी मटमैला हो गया है। अमरनाथ गुफा के एकतरफ से झेलम और सिंधु नदियों की सहायक नदियों का प्रवाह है।

अमरनाथ गुफा के पास बादल फटा है। सैलाब आया, कई लोग मारे गए, कई लापता हैं। इसे प्राकृतिक आपदा कहकर बात खत्म नहीं की जा सकती। प्रकृति ने नदी के रास्ते में तंबू लगाने के लिए नहीं कहा था। कोई तो ऑथोरिटी होगी, जिसकी देख रेख में अमरनाथ यात्रा चल रही है। क्या श्राइन बोर्ड इस आपदा के लिए ज़िम्मेदार नहीं? साफ दिख रहा है कि नदी के बीच में तंबू लगे हैं। पहाड़ों में मौसम की अनिश्चितता के चलते अतिरिक्त सावधानी की ज़रूरत थी। पहाड़ों को जिस क्रूरता के साथ काटा जा रहा, जंगल काटे जा रहे हैं, उससे पहाड़ कमज़ोर हुए हैं। बुलडोजरों से पहाड़ भी आतंकित हैं।

गुलमर्ग जाने के लिए अनंतनाग, अवंतिपुर के बाद नारबल से बाईं तरफ़ कट गया। कश्मीर में कौए और कुत्ते खूब हैं और खूब तंदुरुस्त भी हैं। सर्वत्र मांसाहार होने से बचा-खुचा खाना और कचरा उनका खाना ख़ज़ाना होता है। यदि ये दोनो यहाँ न हों तो धरती का स्वर्ग जानवरों हड्डियों और पक्षियों के पंखों से भर जायेगा। यह भी कश्मीरियत है। सुबह पैदल घूमने निकले तो फ़ौजियों से मेल-मुलाक़ात हुई। वे बनारस, नागालैंड और उत्तराखंड से आकर यहाँ ड्यूटी निभा रहे हैं। उन्हें स्टेट बैंक का अफ़सर होना बताया तो उन्होंने खुश होकर जयहिंद कहा। कुछ देर उनके निजी जीवन पर चर्चा हुई। उन्होंने हमसे पूछा कि सेवानिवृत्त जीवन कैसा चल रहा है। हमने जो बात कही वह उनके दिल को छू गई- हमने कहा- हर छै माह में लम्बा निकल लेते हैं। पैसा छोड़ कर जाएँगे, लड़का है तो बहु उड़ाएगी और बेटी है तो दामाद उड़ाएगा, इससे कहीं ठीक है कि आधा ख़ुद उड़ा कर जाओ। आधा छोड़ जाओ। वे हँस दिए, हम चल दिये।

कल बक़रीद है। कल से तीन दिन सब बंद रहेगा। लोग ईद की ख़रीदी में भारी संख्या में बाज़ारों में पहुँच रहे हैं। जम्मू कश्मीर पुलिस और केंद्रीय रिज़र्व पुलिस भारी संख्या में सड़क पर उतरी है। हर एक किलोमीटर के फ़ासले पर एक सुरक्षित वाहन कश्मीर पुलिस का और दूसरा रिज़र्व पुलिस का मुस्तैद है। हालाँकि दंगा उपद्रव की कोई सम्भावना नहीं है। ताली दो हाथ से बजती है और यहाँ दूसरा हाथ नदारत है। और अभी चुनाव भी नहीं हो रहा है। अचानक ट्रेन का फाटक आ गया। बारामूला से बनिहाल ट्रेन चलने लगी है। वह निकलने वाली है। हम रुके हैं।

जम्मू-बारामूला लाइन को जम्मू और कश्मीर को देश के बाकी हिस्सों से जोड़ने के लिए बिछाया जा रहा है। 356 किलोमीटर लंबा रेलवे ट्रैक जम्मू से शुरू होकर बारामूला पर खत्म होगा। यह भारतीय रेलवे के उत्तरी क्षेत्र के फिरोजपुर रेलवे डिवीजन के अधिकार क्षेत्र में आता है। 359 मीटर (1,178 फीट) लंबा चिनाब ब्रिज इस लाइन पर बना है। मार्ग के निर्माण में प्राकृतिक चुनौतियों का सामना करना पड़ा जिसमें प्रमुख भूकंप क्षेत्र और दुर्गम इलाके शामिल हैं। यह रेल अभी बनिहाल से बारामूला तक चल रही है। सरकार ने अगस्त 2022 तक कटरा-बनिहाल खंड को पूरा करने के लिए समय-सीमा तय की है, लेकिन कटरा-बनिहाल खंड को तय समय सीमा में पूरा करना मुश्किल लगता है।

बहुत देर होती देख सड़क पर उतर गये। एक कश्मीरी सज्जन से बातचीत होने लगी। उन्होंने बताया कश्मीर में हिंदी नहीं पढ़ाई जाती है। सरकारी स्कूलों में उर्दू माध्यम से पढ़ाई होती है। कॉन्वेंट स्कूलों में अंग्रेज़ी माध्यम है परंतु हिंदी नहीं बल्कि उर्दू एक वैकल्पिक भाषा के रूप में पढ़ाई जाती है। सभी हिंदी बोलते और समझते हैं लेकिन लिखना पढ़ना नहीं आता है। यहाँ सम्पर्क भाषा को हम हिंदी के बजाय हिंदुस्तानी कह सकते हैं। जम्मू-श्रीनगर रोड पर पुलिसिया हुक्म से रुके हैं। उन्होंने सामने से बालटाल से लौटने वाला अमरनाथ यात्रा कारवाँ छोड़ा है। बस, मिनी बस, कार, ट्रैव्लर्ज़ सरपट दौड़ रहे हैं। हमारी कार के सामने मुस्तैद सिपाही खड़ा है। हम संतरे की गोली चूस रहे हैं। उनका दाहिना हाथ बट पर और बायाँ हाथ बैरल पर है। ज़रा सी भी ग़ैर-बाजिब हरकत पर आप गोलियों के हमदम हो सकते हैं।

पर्यटन के दौरान सैलानी अक्सर खाने पीने में गलती करते हैं। पैकेज में ब्रेकफ़ास्ट और डिनर शामिल होता है। लोग क्या खाना है, निश्चित नहीं करते। वे वहाँ क्या परोसा गया है और लोगों की प्लेट में क्या खाया जा रहा है। ख़ुद की ज़रूरत और पचाने की क़ाबिलियत को अनदेखा कर गफ़लत में ठूँस कर नाश्ता कर लेते हैं। अपच के शिकार होते हैं। फिर कम खाना लेने से और खूब चलने से कमजोर होकर इन्फ़ेक्शन पकड़ लेते हैं। सैलानी को पाचन क्षमता और घूमने में मेहनत के हिसाब से खुद की प्लेट तय करनी चाहिए। 

असल में पर्यटन आसान काम नहीं है। लोग या तो ज़रूरत से अधिक खाकर पेट ख़राब कर लेते हैं या सही समय पर सही खाना नहीं खाने और अधिक मेहनत से कमजोरी के कारण इन्फ़ेक्शन के शिकार हो जाते हैं। सही समय पर सही भोजन और आराम से सेहत दुरुस्त रहती है। साथ में मानसिक और भावनात्मक मज़बूती भी पर्यटन में ज़रूरी है। अन्यथा आप घूमने का आनंद लेना तो दूर की बात है, चिड़चिड़े होकर सम्बन्धों को ख़राब कर सकते हैं। 

दो सदस्यों की तबियत ख़राब हो गई है। एक को ठंड लगने से टॉन्सिल में इन्फ़ेक्शन हो गया है। दूसरी सदस्य को सर्दी जुकाम हुआ था तब से पेट साफ़ नहीं हो रहा है। पम्पोर लेठपोरा में शाश्वत और प्रतिभा को अमरनाथ यात्रा हेतु तैनात स्वास्थ्य शिविर में दिखाया। वहीं एक केसर की दुकान पर्ल ओफ़ कश्मीर से 250.00 में गोरे और चमकदार होने के लिए एक ग्राम केसर और दिल की माली हालत सुधारने के लिए 400.00 में कहवा का एक डिब्बा यह सोच कर ख़रीदा कि अब फिरसे जवाँदिल और गोरे होकर कश्मीर आयेंगे। सौदेबाज़ी के बाद 650.00 की जगह 550.00 ही भुगतान किए।

नारबल से गुलमर्ग के लिए मुड़े। यहाँ से बारामूला 37 किलोमीटर और उरी 86 किलोमीटर दूर है। उसके उस तरफ़ मुज़फ़राबाद बॉर्डर है। जहाँ से भारत और पाकिस्तान के बीच व्यापार होता है। आगे मागम से निकले। ईद की ख़रीददारी शबाब पर दिखी। पापलर पेड़ की क़तारें शुरू हो गईं। जो कि गुलमर्ग की पहचान हैं। कुंजर और टंगमर्ग के बाद हम गुलमर्ग पहुँच गये। हम गुलमर्ग रिज़ॉर्ट में रुके। पुराना होटल हट टाइप बना है। केबल कार में बैठकर आसमान नापने की क़वायद में एक एजेंट को बुलाकर पता किया तो उसने कहा-कल ईद होने के कारण सभी स्टाफ़ चला गया है, और उसकी बुकिंग ऑनलाइन होती है। वह भी बंद हो चुकी है। इसलिए घोड़ों से या बड़ी गाड़ी से घूमने का विकल्प है।

राजमार्गो पर लगे दिशा-निर्देशों पर लिखे अनेक शहरों के नाम सैलानियों को आकर्षित करते हैं। लेकिन अधिकतर सैलानी, गुलमर्ग, सोनमर्ग और पहलगाम आदि घूमने जाते हैं। गुलमर्ग के रास्ते में कई छोटे सुंदर गांव और आसपास धान के खेत आंखों को सुहाते हैं। सीधी लंबी सडक के दोनों और ऊंची दीवार के समान दिखाई पडती पेडों की कतार अत्यंत भव्य दिखाई देती है। पुरानी फिल्मों में इन रास्तों के बीच फिल्माए गीत पर्यटकों को याद आ जाते हैं। तंग मार्ग के बाद ऊंचाई बढने के साथ ही घने पेडों का सिलसिला शुरू हो जाता है। कुछ देर बाद सैलानी गुलमर्ग पहुंचते हैं तो घास का विस्तृत तश्तरीनुमा मैदान देख कर मंत्रमुग्ध हो जाते हैं। जिस प्रकार उत्तराखंड में पहाडी ढलवां मैदानों को बुग्याल कहते हैं, कश्मीर में उन्हें मर्ग कहते है। गुलमर्ग का अर्थ है फूलों का मैदान। समुद्र तल से 2680 मीटर की ऊंचाई पर स्थित गुलमर्ग सैलानियों के लिए वर्ष भर का रेसॉर्ट है। यहां से किराये पर घोडे लेकर खिलनमर्ग, सेवन स्प्रिंग और अलपत्थर जैसे स्थानों की सैर भी कर सकते हैं। घोड़े से खिलन मर्ग, चिल्ड्रन पार्क, महाराजा पैलेस तक जाकर फ़िज़ा का लुत्फ़ उठा सकते हैं। केबल कार (गंडोला) द्वारा गुलमर्ग से कुँगडोरा जाकर चारों तरफ़ मनभावन दृश्यों का आनंद के सकते हैं।

विश्व का सबसे ऊंचा गोल्फकोर्स भी यहीं है। सर्दियों में जब यहां बर्फ की मोटी चादर बिछी होती है तब यह स्थान हिमक्रीडा और स्कीइंग के शौकीन लोगों के लिए तो जैसे स्वर्ग बन जाता है। यहां चलने वाली गंडोला केबल कार द्वारा बर्फीली ऊंचाइयों तक पहुंचना रोमांचक लगता है। ढलानों पर लगे चीड या देवदार के पेडों पर बर्फ लदी दिखती है। तमाम पर्यटक बर्फ पर स्कीइंग का आनंद लेते हैं तो बहुत से स्लेजिंग करके ही संतुष्ट हो लेते हैं। यहां पर्यटक चाहें तो स्कीइंग कोर्स भी कर सकते हैं। हर वर्ष होने वाले विंटर गेम्स के समय यहां विदेशी सैलानी भी बडी तादाद में आते हैं।

गुलमर्ग गोंडोला नंदा देवी, एलओसी और पीर पंजाल रेंज का शानदार दृश्य प्रस्तुत करता है। हिमालय पर्वतमाला की सुंदरता को संजोने के अलावा, पर्यटक घुड़सवारी और स्नो स्कीइंग जैसी अन्य गतिविधियों का आनंद ले सकते हैं। केबल कार गुलमर्ग गोंडोला दुनिया की दूसरी सबसे लंबी और दूसरी सबसे ऊंची केबल कार है।  दो चरणों में विभाजित, यह प्रति घंटे लगभग 600 लोगों को अपहरवत पर्वत तक ले जाता है, जहां गुलमर्ग में अधिकांश शीतकालीन खेल होते हैं।

गुलमर्ग गोंडोला के चरण 1 द्वारा गुलमर्ग रिज़ॉर्ट से कोंगदूरी पर्वत (मध्य स्टेशन) तक पहुँचे। यह 2,990 मीटर की ऊँचाई से शुरू हुआ और 400 मीटर की ऊर्ध्वाधर वृद्धि से 3390 मीटर की ऊँचाई पर पहुँचा कर रुका। गुलमर्ग गोंडोला का चरण 2 कोंगदूरी पर्वत को अपहरवत चोटी से जोड़ता है। केबल कार 1,330 वर्टिकल मीटर से लगभग 4,000 मीटर की ऊंचाई तक चढ़ती है। स्टेशन पर पहुंचने के बाद पर्वत की चोटी तक पहुंचने के लिए 30 मिनट का ट्रेक किया। यहां से एलओसी या नियंत्रण रेखा दिखाई दे रही है।

सबसे रमणीय स्थानों में से एक, खिलनमर्ग हिमालय की कुछ सबसे ऊंची चोटियों की मनोरम झलकियों से घिरा हुआ है। खिलनमर्ग एक लघु घाटी है जो 6 किमी की पैदल दूरी पर गुलमर्ग से 2000 फीट ऊपर स्थित है और जम्मू-कश्मीर में सबसे लोकप्रिय पर्यटन स्थलों में से एक है। यह स्थान साहसिक खेलों के साथ प्राकृतिक सौंदर्य का सही समावेश है, जो इसे हजारों आगंतुकों के लिए एक पसंदीदा स्थान बनाता है। ऑफबीट यात्रा के प्रति उत्साही लोगों के लिए खिलनमर्ग एक बेहतरीन जगह है क्योंकि यह स्थान सीधे वाहनों से उपलब्ध नहीं है। इस जगह तक पहुंचने के लिए या तो गुलमर्ग से पैदल चलना पड़ता है या एक टट्टू लेना पड़ता है। टट्टू की सीधी चढ़ाई चलनी पड़ी।

खिलनमर्ग वसंत ऋतु में खिलने वाले और सुगंधित फूलों से आच्छादित है और सर्दियों में स्कीइंग के प्रति उत्साही लोगों के लिए एक प्रिय गंतव्य है। जब ऊपर पहुँचे तो नंगा पर्वत शिखर और नन और कुन की जुड़वां चोटियाँ भी खिलनमर्ग से दिखाई दे रही थीं।

क्रमशः…

© श्री सुरेश पटवा 

भोपाल, मध्य प्रदेश

*≈ सम्पादक श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – शंकरचार्य पहाड़ी – भाग-१८ – नेपाल यात्रा – हिमालय की गोद में – १५ ☆ श्री सुरेश पटवा ☆

श्री सुरेश पटवा

(श्री सुरेश पटवा जी  भारतीय स्टेट बैंक से  सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों  स्त्री-पुरुष “गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की  (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं  तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व  प्रतिसाद मिला है। अब आप प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकते हैं यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर)

? यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – शंकरचार्य पहाड़ी – भाग-१८ ☆ श्री सुरेश पटवा ?

शंकरचार्य पहाड़ी

मुग़ल बाग़ घूमने के बाद होटल मुग़ल दरबार में लंच हेतु गये। कश्मीरी पुलाव ने कम लगी भूख को कुछ अधिक ही बुझाया। उसके बाद डल झील को निहारते हुए शंकरचार्य पहाड़ी पर गये। श्रीनगर में ही शंकराचार्य पर्वत है जहाँ विख्यात हिन्दू धर्मसुधारक और अद्वैत वेदान्त के प्रतिपादक आदि शंकराचार्य सर्वज्ञानपीठ के आसन पर विराजमान हुए थे। यह मंदिर शंकराचार्य पर्वत पर स्थित है। शंकराचार्य मंदिर समुद्र तल से 1100 फीट की ऊंचाई पर स्थित है। इसे तख्त-ए-सुलेमन के नाम से भी जाना जाता है। यह मंदिर कश्मीर स्थित सबसे पुराने मंदिरों में से एक है। इस मंदिर का निर्माण राजा गोपादित्य ने 371 ईसा पूर्व शिव मंदिर के रूप में करवाया था। डोगरा शासक महाराजा गुलाब सिंह ने मंदिर तक पंहुचने के लिए सीढ़िया बनवाई थी। इसके अलावा मंदिर की वास्तुकला भी काफी खूबसूरत है। क़रीब पाँच किलोमीटर वाहन से चलने के पश्चात 270 सीढ़ियों को हाँफते हुए चढ़कर शिव लिंग के दर्शन करने के उपरांत वह गुफा देखी जिसमें कभी आदि शंकराचार्य ने डेरा डाला, शास्त्रार्थ किया और तपस्या की थी।

 भारतीय सभ्यता की शुरुआत से कश्मीर भारत का अविभाज्य अंग रहा है। नीलमत पुराण, शिव पुराण और अनेकों धार्मिक साहित्य में कश्मीर भारत का हिस्सा प्रतिपादित होता है। विभाजन के समय भारत ने धर्म के आधार पर कभी भी न तो लोगों का बँटवारा माना और न ही दो राष्ट्रों के सिद्धांत को मान्यता दी इसलिए अलगाववादियों द्वारा “आज़ादी-आज़ादी” का राग अलापना तर्क सम्मत नहीं है। कश्मीर कभी भी भारत से पृथक नहीं रहा। उन्हें आज़ादी की घुटी शेख़ अब्दुल्ला ने आज़ाद मुस्लिम रियासत के नाम पर पिलाई थी। जिसे एक कश्मीरी पंडित जवाहर लाल नेहरू ने सही नहीं माना। कुछ लोग कहते हैं कि शेख़ अब्दुल्ला ने नेहरू का उपयोग किया था जबकि असलियत यह है कि नेहरू ने मुस्लिम बाहुल्य कश्मीर को भारत में मिलाने और बनाए रखने में शेख़ अब्दुल्ला का उपयोग किया और वक्त आने पर उन्हें जेल के सीखचों में भी रखा।

 जब आदि शंकराचार्य काशी के पंडितों से शास्त्रार्थ कर चुके तब उनको यह बात बताई गई कि कश्मीर के श्रीनगर में शारदा पीठ है वहाँ दर्शन शास्त्र के प्रकांड़ विद्वान हैं, जब तक उनसे शास्त्रार्थ न होगा उनकी विद्वाता सिद्ध न मानी जाएगी। वे श्रीनगर पहुँचे जिस स्थान पर शास्त्रार्थ किया वह पहाड़ी आज भी शंकराचार्य हिल के नाम से जानी जाती है।

 07  जुलाई 2022 को सुबह सोकर तो पाँच बजे उठ गए परंतु चाय के इंतज़ार में छै बजे तक आलस्य से पड़े रहे। सात बजे निकलना हुआ। अमरनाथ यात्रा के कारण तीन बजे के पूर्व सोनमर्ग पहुँच कर वापस निकलना होगा। इसलिए जल्दी निकले। सोनमर्ग का अर्थ सोने से बना घास का मैदान होता है। सोन का अर्थ सोना और मर्ग का मतलब वादी होता है। सुबह जब सूर्य की किरण हिमशिखरों पर पड़ती हैं तब एक सुनहरी रोशनी सम्पूर्ण वादी पर छा जाती है। इसलिए उसे सोनमर्ग कहते हैं। यह जगह श्रीनगर के उत्तर-पूर्व में 87 किलोमीटर दूर है। सोनमर्ग पर स्थित घाटी कश्मीर की सबसे बड़ी घाटी है। यह घाटी करीबन साठ मील लम्बी है। यहीं से कारगिल और द्रास होकर लेह की सड़क निकलती गई।

 सोनमर्ग कश्मीर की एक निराली सैरगाह है। समुद्र तल से लगभग 3000 मीटर की ऊंचाई पर स्थित यह एक रमणीक स्थल है। सिंध नदी के दोनों और फैले यहां के मर्ग सोने से सुंदर दिखाई देते हैं। इसीलिए इसे सोनमर्ग अर्थात सोने का मैदान कहा गया। सोनमर्ग से घुडसवारी करके थाजिवास ग्लेशियर भी देखने जा सकते हैं। वहां ग्लेशियर पर घूमने का आनंद भी लिया जा सकता है। अनंत हिमनदों के सामने खडे होकर प्रकृति की विशालता का एहसास मन में रोमांच उत्पन्न कर देता है। प्रतिवर्ष होने वाली अमरनाथ यात्रा का एक मार्ग सोनमर्ग से बालटाल होकर भी जाता है।

 हमारी यात्रा के समय अमरनाथ यात्रा भी चालू है। पूरी कश्मीर घाटी के चप्पे-चप्पे पर सेना का क़ब्ज़ा है। हरेक गली, नुक्कड़, सड़क के किनारे हथियार बंद सैनिक मुस्तैद खड़े चौकसी कर रहे हैं। ज़रा सी हरकत पर सीटियों की आवाज़ें गूँजने लगती हैं। अमरनाथ यात्रा की गाड़ियाँ निकल रही हैं। गंदेरबल, लहार, कांगम पार करके मामर में आठ बजे एक पंजाब गार्डन होटल में नाश्ता करने रुके। सोनमर्ग से एक रास्ता बालटाल निकलता है जो कि सीधा अमरनाथ गुफा तक जाता है। अमरनाथ यात्रा के यात्री जम्मू तक ट्रेन या बस से पहुँचे हैं। वहाँ से कश्मीर के वाहनों में बैठकर सोनमर्ग होकर बालटाल जा रहे हैं। मामर से घाट शुरू हो गये है। पहाड़ों से बातें करते बादल मन मोह रहे हैं। हरीगलीवान, गुंड के बाद सोनमर्ग पहुँच गये। वहाँ से डोमरी और संगम होकर अमरनाथ गुफा पहुँचा जा सकता है। यह रास्ता जोजिला दर्रा से होकर गुजरता है। अमरनाथ यात्रियों ने बताया कि यह रास्ता खड़ा और थकाऊ है। इसलिए पहलगाम से गुफा पहुँचने और गुफा से बालटाल होकर श्रीनगर लौटने का रास्ता अपनाना श्रेयस्कर होता है। 

 टैक्सी ने हमें सोनमर्ग में छोड़ दिया। वहाँ से पहाड़ों पर चढ़ने वाली फ़ोर व्हील ड्राइव एक अन्य टैक्सी किराए पर ली। शौकत वालिद ज़लील गुंड वाले की गाड़ी JK 01L-6290 पर बैठ कर फ़िश पोईंट, बालटाल, हेलिपैड, सरबल, बालटाल घाटी, जोजिला दर्रा, इंडिया गेट, ज़ीरो पोईंट तक गये। ड्राइवर अच्छे स्वभाव का लड़का है। जोजिला दर्रा के ज़ीरो पोईंट पर बर्फ़ गिरने लगी। ठंड बहुत बढ़ गई इसलिए बर्फीले पहाड़ से तुरंत नीचे उतरना पड़ा। यहाँ से द्रास 35 किलोमीटर रह जाता है। हमने एक पिघलते ग्लेशियर पर जाकर फ़ोटो खींचे। वहीं पर अस्सी रुपयों में प्लेट गरम मैगी मिल रही थी। ठंड भी खूब लग रही थी। सुबह के नाश्ते से बचाकर रखे ठंडे पराँठे निकाले और गरमागर्म मैगी के साथ खाये।  

 श्रीनगर लौटते समय खीर भवानी दर्शन हेतु रुके। खीर भवानी, क्षीर भवानी या राज्ञा देवी मंदिर भवानी देवी का एक प्रसिद्ध मंदिर है। जम्मू और कश्मीर के गान्दरबल ज़िले में तुलमुल गाँव में एक पवित्र पानी के चश्मे के ऊपर स्थित है। यह श्रीनगर से 25 किलोमीटर दूर है। पारंपरिक रूप से वसंत ऋतु में मंदिर में खीर चढ़ाया जाता था इसलिए नाम ‘खीर भवानी’ पड़ा। उन्हें महारज्ञा देवी के नाम से जाना जाता है। ऐसी मान्यता है कि किसी प्राकृतिक आपदा के आने से पहले  मंदिर के कुण्ड का पानी काला पड़ जाता है। जम्मू और कश्मीर के महाराजा प्रताप सिंह और महाराजा हरि सिंह ने मंदिर के निर्माण और जीर्णोद्धार में योगदान दिया है।

 यह मंदिर माता रंगने देवी को समर्पित है। वहाँ पहुँचने पर पता चला कि अमरनाथ यात्रियों को रुकने की व्यवस्था में मंदिर तीन बजे बंद हो चुका है। इसलिए दर्शन नहीं हो सके। प्रत्येक वर्ष जेष्ठ अष्टमी (मई-जून) के अवसर पर मंदिर में वार्षिक उत्सव का आयोजन किया जाता है। इस अवसर पर काफी संख्या में लोग देवी के दर्शन के लिए विशेष रूप से आते हैं।

 चट्टी पदशाही कश्मीर के प्रमुख सिख गुरूद्वारों में से एक है। सिखों के छठें गुरू कश्मीर आए थे, उस समय वह यहां कुछ समय के लिए ठहरें थे। यह गुरूद्वारा हरी पर्वत किले से बस कुछ ही दूरी पर स्थित है। उसे आज देखा। उसके बाद हज़रतबल पहुँचे। चार दिन बाद ईद का त्योहार होने से दुकानें सज रही थीं। जूते वाहन में उतारकर कर पैदल अंदर गए। यहाँ भिखारियों की भीड़ ने घेरा। किसी तरह बचते-बचाते अंदर पहुँचे।

 हजरतबल जिसे लोकप्रिय रूप से दरगाह शरीफ  कहा जाता है, कश्मीर में श्रीनगर के हजरतबल इलाके में स्थित है। इसमें एक अवशेष, मोई-ए- मुक़द्दस शामिल है, जिसे व्यापक रूप से इस्लामी पैगंबर मुहम्मद का बाल माना जाता है। यह श्रीनगर में डल झील के उत्तरी तट पर स्थित है, और इसे कश्मीर का सबसे पवित्र मुस्लिम तीर्थ माना जाता है।

 इस दरगाह में कई मुसलमानों द्वारा इस्लामिक पैगंबर मुहम्मद के बाल होने का विश्वास किया जाता है। अवशेष को पहली बार मुहम्मद के एक कथित वंशज सैयद अब्दुल्ला मदनी ने मदीना से 1635 में लाकर दक्षिण भारतीय शहर बीजापुर में बस गए। अब्दुल्ला की मृत्यु के बाद, उनके बेटे सैयद हमीद को वह अवशेष विरासत में मिला। कुछ ही समय बाद इस क्षेत्र पर मुगलों ने कब्जा कर लिया और हमीद से उसकी पारिवारिक संपत्ति छीनी जाने लगी। खुद को अवशेष की देखभाल करने में असमर्थ पाते हुए, उन्होंने इसे एक अमीर कश्मीरी व्यापारी ख्वाजा नूर-उद-दीन ईशाई को दे दिया।

 हजरतबल तीर्थ की स्थापना शुरू में ख्वाजा नूर-उद-दीन ईशाई की बेटी इनायत बेगम द्वारा की गई थी। इमारत का पहला निर्माण 17वीं शताब्दी में मुगल सूबेदार सादिक खान ने बादशाह शाहजहाँ के शासनकाल के दौरान किया था। इसे शुरू में इशरत जहां कहा जाता था। 1634 में शाहजहाँ ने इमारत को एक प्रार्थना कक्ष में बदलने का आदेश दिया था।

जब मुगल सम्राट औरंगजेब को पवित्र अवशेष के अस्तित्व और हस्तांतरण के बारे में सूचित किया गया था, तो उन्होंने इसे जब्त कर लिया और अजमेर में सूफी फकीर मुइन अल-दीन चिश्ती की दरगाह में भेज दिया, और ईशाई को दिल्ली में कैद कर लिया।

किंवदंती है कि नौ दिनों के बाद औरंगजेब ने चार खलीफाओं अबू बक्र, उमर, उस्मान और अली के साथ मुहम्मद का सपना देखा। सपने में, मुहम्मद ने उसे अजमेर से मोई-ए-मुक़द्दस को कश्मीर भेजने का आदेश दिया। तब औरंगजेब ने पवित्र अवशेष ईशाई को लौटाने और उसे कश्मीर ले जाने की अनुमति दी। हालांकि, जेल में रहते हुए ईशाई की पहले ही मौत हो चुकी थी। 1700 में अवशेष को ईशाई की बेटी इनायत बेगम के साथ कश्मीर ले जाया गया था। उसने वहां अवशेष की रखवाली कर हजरतबल तीर्थ की स्थापना की। तब से, उसके पुरुष वंशज मस्जिद में अवशेष की रखवाली कर रहे हैं। बेगम के पुरुष वंशज बंदे परिवार के नाम से जाने जाते हैं। 2019 तक, तीन मुख्य सदस्य पवित्र अवशेष की देखभाल करते हैं: मंजूर अहमद बंदे, इशाक बंदे और मोहिउद्दीन बंदे। अवशेष केवल विशेष इस्लामी अवसरों जैसे मुहम्मद और उनके चार मुख्य साथियों के जन्मदिन, पर सार्वजनिक दर्शन के लिए प्रदर्शित किया जाता है,

मोई-ए-मुक़क़दस, मुसलमानों द्वारा व्यापक रूप से मुहम्मद के बाल माने जाने वाला एक अवशेष, 27 दिसंबर 1963 को दरगाह से गायब होने की सूचना मिली थी। इसके लापता होने के बाद, सैकड़ों लोगों के साथ पूरे राज्य में बड़े पैमाने पर प्रदर्शन हुए। हजारों प्रदर्शनकारी सड़कों पर उतरे। 31 दिसंबर को, भारतीय प्रधान मंत्री जवाहरलाल नेहरू ने पवित्र मुस्लिम अवशेष के गायब होने पर राष्ट्र को सम्बोधित किया, और संदिग्ध चोरी की जांच के लिए केंद्रीय जांच ब्यूरो से एक टीम को जम्मू और कश्मीर भेजा।

इस घटना के कारण भारतीय राज्य पश्चिम बंगाल और पूर्वी पाकिस्तान (बांग्लादेश) में सांप्रदायिक तनाव और दंगे हुए, जिसके कारण भारत ने दिसंबर 1963 और फरवरी 1964 के बीच लगभग 200,000 लोगों को शरणार्थी शरण दी। अवशेष 4 जनवरी 1964 को भारतीय अधिकारियों द्वारा बरामद किया गया था। मांग की गई थी कि इसे आधिकारिक तौर पर बड़ों द्वारा पहचाना जाए। यह आरोप लगाया गया था कि राजनीतिक आकाओं ने बाल चुराया था ताकि वे बाद में इसे बहाल करने का श्रेय लेकर सत्ता में आ सकें। वर्तमान संरचना 1968 में शुरू होकर 11 साल बाद यह 1979 में बनकर तैयार हुई। इस मस्जिद को कई अन्य नामों जैसे हजरतबल, अस्सार-ए-शरीफ, मादिनात-ऊस-सेनी, दरगाह शरीफ और दरगाह आदि के नाम से भी जाना जाता है। इस मस्जिद के समीप ही एक खूबसूरत बगीचा और इश्‍रत महल है।

आज दोपहर सोनमर्ग से वापिस लौटते वक़्त जामा मस्जिद देखी, जो कश्मीर की सबसे पुरानी और बड़ी मस्जिदों में से है। मस्जिद की वास्तुकला काफी अद्भुत है। माना जाता है कि जामा मस्जिद की नींव सुल्तान सिकंदर ने 1398 ई. में रखी थी। इस मस्जिद की लंबाई 384 फीट और चौड़ाई 38 फीट है। इस मस्जिद में तीस हजार लोग एक-साथ नमाज अदा कर सकते हैं। पुराने शहर के मध्य नौहट्टा में स्थित, जामा मस्जिद को सुल्तान सिकंदर ने 1394 ई. में बनवाया था और 1402 ई. कश्मीर में सबसे महत्वपूर्ण मस्जिदों में से एक थी। श्रीनगर में धार्मिक-राजनीतिक जीवन का एक केंद्रीय क्षेत्र है। हर शुक्रवार को मुसलमानों की भीड़ उमड़ती है, यह श्रीनगर के प्रमुख पर्यटक आकर्षणों में से एक है।

दिन का अंतिम पड़ाव चश्मा शाही बगीचा था। चश्मे शाही या चश्मा शाही या (शाही वसंत), जिसे चश्मा शाही भी कहा जाता है, मुगल सम्राट शाहजहां के गवर्नर अली मर्दन खान द्वारा एक झरने के आसपास 1632 ईस्वी में निर्मित मुगल उद्यानों में से एक है। सम्राट के आदेशानुसार अपने ज्येष्ठ पुत्र राजकुमार दारा शिकोह के लिए उपहार स्वरूप बनाया गया था। यह उद्यान भारत के श्रीनगर में डल झील के सामने राजभवन (गवर्नर हाउस) स्थित है।

चश्मे शाही मूल रूप से वसंत से अपना नाम प्राप्त करता है जिसे कश्मीर की महान महिला संत रूपा भवानी द्वारा खोजा गया था, जो कश्मीरी पंडितों के साहिब वंश से थी। रूपा भवानी का पारिवारिक नाम ‘साहिब’ था और वसंत को मूल रूप से ‘चश्मे साहिबी’ कहा जाता था। वर्षों से यह नाम भ्रष्ट हो गया और आज इस स्थान को चश्मे शाही (रॉयल स्प्रिंग) के नाम से जाना जाता है।

चश्मा शाही के पूर्व में परी महल (फेयरी पैलेस) स्थित है जहाँ दारा शिकोह ज्योतिष सीखते थे और जहाँ बाद में उनके भाई औरंगजेब ने उनकी हत्या कर दी थी। यह उद्यान 108 मीटर लंबा और 38 मीटर चौड़ा है और एक एकड़ भूमि में फैला हुआ है। यह श्रीनगर के तीन मुगल उद्यानों में सबसे छोटा उद्यान है; शालीमार उद्यान सबसे बड़ा और निशात उद्यान दूसरा सबसे बड़ा उद्यान है। तीनों उद्यान डल झील के दाहिने किनारे पर बनाए गए थे, जिसकी पृष्ठभूमि में ज़बरवान रेंज है।

क्रमशः…

© श्री सुरेश पटवा 

भोपाल, मध्य प्रदेश

*≈ सम्पादक श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – कश्मीर यात्रा – जन्नत की सैर – भाग-१७ – नेपाल यात्रा – हिमालय की गोद में – १४ ☆ श्री सुरेश पटवा ☆

श्री सुरेश पटवा

(श्री सुरेश पटवा जी  भारतीय स्टेट बैंक से  सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों  स्त्री-पुरुष “गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की  (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं  तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व  प्रतिसाद मिला है। अब आप प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकते हैं यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर)

? यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – कश्मीर यात्रा – जन्नत की सैर – भाग-१७ ☆ श्री सुरेश पटवा ?

जम्मू-कश्मीर अपने अंदर अद्भुत खूबसूरती समेटे हुए है। यहां की अनोखी खूबसूरती के कारण ही कश्मीर को धरती का स्वर्ग कहा जाता है। कश्मीर की प्राकृतिक वादियां, झरने, नदियां, बर्फ से ढके पहाड़ और घने जंगल यहां की खूबसूरती को इस कदर बढ़ाते हैं कि हर साल लाखों की संख्या में पर्यटक जम्मू कश्मीर की ओर खिंचे चले आते हैं।

06 जुलाई 2022 को सुबह चार बजे उठकर छै बजकर पचपन मिनट की फ़्लाइट पकड़ने पाँच बजे लेह की होटल से रवाना हुए। होटल ने नाश्ते के लिए सैंडविच और फ़्रूट जूस पैकेज रख दिए हैं। लेह हवाईअड्डा पर बहुत अफ़रातफ़री का माहौल था। पहले तो अंदर घुसने की लम्बी क़तार, फिर चेक-इन काउंटर पर भारी भीड़ और काउंटर बदलने की क़वायद ने सब का मूड पूरी तरह ख़राब कर दिया। उस पर चिड़चिड़ाते यात्रियों के झगड़ों ने बचीखुची कसर निकाल दी। तीन काउंटर बदलने के बाद चेक-इन हुआ तो काउंटर पर कार्यरत कर्मचारी बोर्डिंग पास दिए बग़ैर काउंटर बंद करके चलती बनी। हम गो-फ़र्स्ट एयरलाईन कम्पनी के स्टाफ़ के पीछे बोर्डिंग पास के लिए भटकते रहे। यह तो अच्छा था कि सौम्या ने ई-वेब चेक-इन करके बोर्डिंग पास डाउनलोड कर रखे थे। उसमें भी एक नई समस्या आ खड़ी हुई। सौम्या का बोर्डिंग पास मोबाईल में नहीं खुल रहा था। गेट पर, फिर विमान में चढ़ने पर अनेक दिक़्क़त का सामना किया। अंत समय में चेकिंग कर्मचारी से हॉटस्पॉट लेकर बोर्डिंग पास दिखा कर विमान में सवार हुए। विमान में भी अव्यवस्था ने पीछा नहीं छोड़ा। वह विमान लेह से श्रीनगर होकर मुंबई जा रहा था। हमारी कुर्सियाँ अंत में 28-F, 29-F और 30-F थीं। ऊपर के सामान रखने की जगह बिल्कुल भी ख़ाली नहीं थी। यात्रियों की बहस से माहौल गर्माया हुआ था। आख़िर में यात्रियों ने घुटनों पर हैंडबैग रखकर बैठना ठीक समझा। विमान ने उड़ान भरी।

नीचे सिंधु नदी की घाटी में धीर-गम्भीर सिंधु नदी का नजारा दिखने लगा। हल्के बादलों से विमान ऊपर उठकर श्रीनगर की तरफ़ उड़ चला। हम थोड़ी सी देर में ही हिमशिखरों के ऊपर उड़ान भर रहे हैं। जँसकार घाटी से निकलती छोटी नदियों का बहाव सिंधु तरफ़ जा रहा हैं। कारगिल के नज़दीक द्रास दर्रा जैसे ही निकला सूखे पहाड़ हरेभरे पर्वतों में बदलने लगे। कल लद्दाख़ के ड्राइवर ने पूछा था कि साहब कल कहाँ जा रहे हैं। जब हमने उसे कश्मीर बताया तो वह बोला-कश्मीर में हरियाली के अलावा कुछ नहीं है। कश्मीरी टैक्सी चालक ने पूछा कि साहब कहाँ से आ रहे हैं। हमने लद्दाख़ बताया तो वह बोला- वहाँ सूखे पहाड़ों के अलावा कुछ नहीं है। सबको अपना स्थान प्यारा होता है। होटल में पोहा-चाय का नाश्ता किया। ग्यारह बजे श्रीनगर घूमने निकले।

श्रीनगर (Srinagar) भारत के जम्मू और कश्मीर राज्य का सबसे बड़ा शहर और ग्रीष्मकालीन राजधानी है। यह कश्मीर घाटी में झेलम नदी के किनारे बसा हुआ है, जो सिन्धु नदी की प्रमुख उपनदी है। प्रसिद्ध डल झील और आंचार झील भी श्रीनगर का महत्वपूर्ण भाग हैं। कश्मीर घाटी के मध्य में बसा दस लाख से अधिक जनसंख्या वाला यह नगर भारत के प्रमुख पर्यटन स्थलों में से एक है। श्रीनगर अपने उद्यानों व प्राकृतिक वातावरण के लिए जाना जाता है और यहाँ के कश्मीर शॉल, सेव व मेवा देशभर में प्रसिद्ध है।

श्रीनगर विभिन्न मंदिरों व मस्जिदों के लिए भी प्रसिद्ध है। समुद्रतल से 1700 मीटर ऊंचाई पर बसा श्रीनगर विशेष रूप से झीलों और हाऊसबोट के लिए जाना जाता है। इसके अलावा श्रीनगर परम्परागत कश्मीरी हस्तशिल्प और सूखे मेवों के लिए भी विश्व प्रसिद्ध है। श्रीनगर का इतिहास काफी पुराना है। माना जाता है कि सम्राट अशोक मौर्य ने इस नगर को बसाया था। इस जिले के चारों ओर पांच अन्य जिले स्थित है। श्रीनगर जिला कारगिल के दक्षिण में, बुदग़म के उत्तर-पश्चिम में स्थित है। ये शहर और उसके आस-पार के क्षेत्र एक ज़माने में दुनिया के सबसे ख़ूबसूरत पर्यटन स्थल माने जाते थे — जैसे डल झील, शालीमार और निशात बाग़, गुलमर्ग, पहलगाम, चश्माशाही, आदि। यहाँ हिन्दी सिनेमा की कई फ़िल्मों की शूटिंग हुआ करती थी। माना जाता है कि श्रीनगर की हज़रतबल मस्जिद में हजरत मुहम्मद की दाढ़ी का एक बाल रखा है। डल झील और झेलम नदी (संस्कृत : वितस्ता, कश्मीरी : व्यथ) में आवागमन, घूमने और बाज़ार और ख़रीददारी का ज़रिया ख़ास तौर पर शिकारा नाम की नावें हैं। कमल के फूलों से सजी रहने वाली डल झील पर कई ख़ूबसूरत नावों पर तैरते घर भी हैं जिनको हाउसबोट कहा जाता है।

पांच मील लम्बी और ढाई मील चौड़ी डल झील श्रीनगर की ही नहीं बल्कि पूरे भारत की सबसे खूबसूरत झीलों में से है। दुनिया भर में यह झील विशेष रूप से शिकारों या हाऊस बोट के लिए जानी जाती है। जिसके चारों तरफ़ बीस किलोमीटर सड़क का घेरा है। डल झील के आस-पास की प्राकृतिक सुंदरता लोगों को अपनी ओर आकर्षित करती है। डल झील चार भागों गगरीबल, लोकुट डल, बोड डल और नागिन में बंटी हुई है। इसके अलावा यहां स्थित दो द्वीप सोना लेंक और रूपा लेंक झील की खूबसूरती को ओर अधिक बढ़ाते हैं।

श्रीनगर का सबसे बडा आकर्षण यहां की डल झील है। जहां सुबह से शाम तक रौनक नजर आती है। सैलानी घंटों इसके किनारे घूमते रहते हैं या शिकारे में बैठ नौका विहार का लुत्फ उठाते हैं। दिन के हर प्रहर में इस झील की खूबसूरती का अलग रंग दिखाई देता है। देखा जाए तो डल झील अपने आपमें एक तैरते नगर के समान है। तैरते आवास यानी हाउसबोट, तैरते बाजार और तैरते वेजीटेबल गार्डन इसकी खासियत हैं। कई लोग तो डल झील के तैरते घरों यानी हाउसबोट में रहने का लुत्फ लेने के लिए ही यहां आते हैं। झील के मध्य एक छोटे से टापू पर नेहरू पार्क है। वहां से भी झील का रूप कुछ अलग नजर आता है। दूर सडक के पास लगे सरपत के ऊंचे झाडों की कतार, उनके आगे चलता ऊंचा फव्वारा बडा मनोहारी मंजर पेश करता है। झील के आसपास पैदल घूमना भी सुखद लगता है। शाम होने पर भी यह झील जीवंत नजर आती है। सूर्यास्त के समय आकाश का नारंगी रंग झील को अपने रंग में रंग लेता है, तो सूर्यास्त के बाद हाउसबोट की जगमगाती रोशनियों का प्रतिबिंब झील के सौंदर्य को दुगना कर देता है। शाम के समय यहां खासी भीड नजर आती है।

मुगल बादशाहों को वादी-ए-कश्मीर ने सबसे अधिक प्रभावित किया था। यहां के मुगल गार्डन इस बात के प्रमाण हैं। ये उद्यान इतने बेहतरीन और नियोजित ढंग से बने हैं कि मुगलों का उद्यान-प्रेम इनकी खूबसूरती के रूप में यहां आज भी झलकता है। मुगल उद्यानों को देखे बिना श्रीनगर की यात्रा अधूरी-सी लगती है। अलग-अलग खासियत लिए ये उद्यान किसी शाही प्रणय स्थल जैसे नजर आते हैं। शाहजहां द्वारा बनवाया गया चश्म-ए-शाही इनमें सबसे छोटा है। यहां एक चश्मे के आसपास हरा-भरा बगीचा है। इससे कुछ ही दूर दारा शिकोह द्वारा बनवाया गया परी महल भी दर्शनीय है। निशात बाग 1633 में नूरजहां के भाई द्वारा बनवाया गया था। ऊंचाई की ओर बढते इस उद्यान में 12 सोपान हैं। टिकट लेकर प्रवेश किया। चश्मे के किनारे से आगे बढ़ते गए। साथ में सैलानियों की भी भीड़ बढ़ती जा रही थी। फ़ोटो खींचने की जुगत में लोग पसीना-पसीना होकर उलझ रहे थे। हमें पता नहीं था कि एक महिला सैलानी अपने खाबिंद की तस्वीर खींच रही थी। हम बीच में आ गए। वह मोहतरमा बोलीं- कैसा पागल है? हमने कहा मेडम, हमें नहीं पता था कि आप तस्वीर खींच रहीं हैं। फिर आपने अपनी पागलपन की पदवी हमें क्यों दे दी। यह सार्वजनिक स्थल है आपके घर की बैठक नहीं जो आप मुफ़्त में अपनी ख़ानदानी पदवी हमें अता करें। वह महिला ग़ुस्से में लाल हो गई। उनके साथियों ने हमसे माफ़ी माँगते हुए कहा- माफ़ करें साहब, थोड़ी पागल है। 

उसके बाद शालीमार बाग पहुँचे, जिसे जहांगीर ने अपनी बेगम नूरजहां के लिए बनवाया था। वे गर्मियाँ श्रीनगर के इसी बाग में बिताते थे। इस बाग में कुछ कक्ष बने हैं। अंतिम कक्ष शाही परिवार की स्त्रियों के लिए था। इसके सामने दोनों ओर सुंदर झरने बने हैं। मुगल उद्यानों के पीछे की ओर जावरान पहाडियां हैं, तो सामने डल झील का विस्तार नजर आता है। इन उद्यानों में चिनार के पेडों के अलावा और भी छायादार वृक्ष हैं। इनमें रंग-बिरंगे फूलों की भरमार है। इन उद्यानों के मध्य बनाए गए झरनों से बहता पानी भी सैलानियों को मुग्ध कर देता है। ये सभी बाग वास्तव में शाही आरामगाह के उत्कृष्ट नमूने हैं। वहाँ झरनों और सरोवरों में बच्चे कूद कर नहा रहे थे, और भी अनुशासनहीनता देखने को मिलीं। एक माली सा दिखता आदमी एक गुलाब का फूल देकर कहने लगा कि कुछ ईनाम मिल जाये। पैसे नहीं देने पर बदतमीज़ी करने लगा। उसे डाँटकर भगाया। श्रीनगर में कहीं भी भिखारी परेशान करने लगते हैं।

क्रमशः…

© श्री सुरेश पटवा 

भोपाल, मध्य प्रदेश

*≈ सम्पादक श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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