हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – गढ़चिरौली यात्रा – भाग – ४९ ☆ श्री सुरेश पटवा ☆

श्री सुरेश पटवा

(श्री सुरेश पटवा जी  भारतीय स्टेट बैंक से  सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों  स्त्री-पुरुष “, गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की  (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं  तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व  प्रतिसाद मिला है। अब आप प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकते हैं यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर।)

? यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – गढ़चिरौली यात्रा – भाग- ४९ ☆ श्री सुरेश पटवा ?

8.गढ़चिरौली यात्रा

गढ़चिरौली

सुबह उठकर गढ़चिरौली ज़िले की अहेरी तहसील में स्थित सघन सागौन वन की सैर को निकल गए। गढ़चिरौली जिले का गठन 26 अगस्त 1982 को चंद्रपुर से गढ़चिरौली और सिरोंचा तहसीलों को अलग करके किया गया था। गढ़चिरौली जिला महाराष्ट्र के उत्तरी-पूर्वी कोने में स्थित है। यह पश्चिम में चंद्रपुर, उत्तर में  गोंदिया, पूर्व में  छत्तीसगढ़ राज्य के दुर्ग, राजनांदगाँव, बस्तर और जगदलपुर ज़िले और दक्षिण पश्चिम में  तेलंगाना  राज्य के करीमनगर और आदिलाबाद जिलों से  घिरा है। गढ़चिरौली  आदिवासी  ज़िला है। मुख्य निवासी गोंड और माडिया समुदाय के लोग है। एक खास बात यहाँ 1972 से बंगाली समुदाय के शरणार्थी विस्थापित किए गए हैं।

मध्य भारत के गोंडवाना साम्राज्य का इतिहास बहुत प्राचीन एवं समृद्ध रहा है। यहां अनेक गोंड राजाओं ने शासन किया है। सर्वाधिक समय तक राजा यादवराय के 62 वंशजों (यादवराय से लेकर सुमेदशाह तक) ने शासन किया। इस वंश में महान प्रतापी राजा संग्राम शाह (48वें) हुए। इन्होने युद्ध करके अनेक राजाओं को हराया और 52 गढ़ स्थापित किये। गोंडों के 36 राज्य उत्तर में रायगढ़ से दक्षिण में गढ़चिरोली तक और 16 राज्य गढ़ मंडला से मकड़ाई रियासत तक, इस प्रकार कुल 52 राज्यों का समूह गोंडवाना साम्राज्य कहलाता था।    महाराजा संग्राम शाह का विशाल साम्राज्य जिन 52 गढ़ों तक फैला था, जिनकी सीमा  पश्चिम में गिन्नौर गढ़ भोपाल, पूरब में लाफागढ़ बिलासपुर, उत्तर में सिंगोरगढ़, दमोह और दक्षिण में टीपागढ़ (गढ़चिरोली) महाराष्ट्र तक फैला था। इस तरह राजा संग्राम सिंह ने 52 गढ स्थापित करके दिल्ली के सुल्तान इब्राहीम लोदी से 1480 ई० में महाराजा और शाह की उपाधि धारण की थी।

प्राचीन काल में इस क्षेत्र पर राष्ट्रकूट, चालुक्य, देवगिरि के यादव और बाद में गढ़चिरौली के गोंडों का शासन था। 13 वीं शताब्दी में खांडक बल्लाल शाह ने चंद्रपुर की स्थापना की और इसे अपनी राजधानी बनाया। चंद्रपुर बाद में मराठा शासन में आया। 1853 में, बरार जिसमें चंद्रपुर (जिसे चंदा कहा जाता था) का हिस्सा भी था, ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी को सौंप दिया गया था। 1854 में चंद्रपुर सेंट्रल प्रांत एंड बेरार का एक स्वतंत्र जिला बन गया।

लॉर्ड कर्ज़न की राज्य पुनर्गठन योजना के अंतर्गत 1905 में अंग्रेजों ने चंद्रपुर और ब्रम्हपुरी से एक-एक जमींदारी संपत्ति का हस्तांतरण करके गढ़चिरौली तहसील बनाई। यह 1956 तक सेंट्रल प्रांत का हिस्सा था, जब राज्यों के पुनर्गठन के साथ, चंद्रपुर को बॉम्बे राज्य में स्थानांतरित कर दिया गया था। 1960 में, जब महाराष्ट्र बनाया गया, चंद्रपुर नए राज्य का एक जिला बन गया। 26 अगस्त 1982 को चंद्रपुर का विभाजन हुआ, जिसमें गढ़चिरौली तहसील एक स्वतंत्र जिला बन गया। गढ़चिरौली में नक्सलवाद की जड़ें जमी हैं। छापामार लड़ाके पहाड़ियों और घने जंगलों में रहते हैं और इसे रेड कॉरिडोर के हिस्से के रूप में नामित किया गया है।

गढ़चिरौली से तेलंगाना राज्य की सीमा पर दक्षिण दिशा में अल्लापल्ली नाम का वन आच्छादित गाँव है। अल्लापल्ली आमतौर पर गोंडवाना गांव है, लेकिन अब, कई लोग शिक्षा, व्यवसाय और जीविका कमाने के उद्देश्य से वहां आ बसे  हैं। अल्लापल्ली के जंगल विश्व प्रसिद्ध सागौन की लकड़ी के ख़ज़ाने हैं। अल्लापल्ली से परमिली- भामरागढ़ रोड पर 07 किलोमीटर दूर 100 साल पहले वैज्ञानिक प्रबंधन के तहत मूल जंगल के रूप में संरक्षित ‘ग्लोरी ऑफ अल्लापल्ली’ वन पारिस्थितिकी के एक जीवित संग्रहालय के रूप में प्रसिद्ध है। जहाँ पर 500  वर्ष पुराने सागौन के 120 फ़ुट ऊँचे पेड़ मौजूद हैं। जिसे सागौन कहा जाता है वह साग का पेड़ है, एक जगह पर बहुत अधिक संख्या में साग के पेड़ होने से उसे सागवन पुकारा जाने लगा, वही सागवन कालांतर में सागौन हो गया।

पहले अल्लापल्ली हैदराबाद के निज़ाम के नियंत्रण में था। बाज़ीराव ने मराठवाड़ा को जीतकर नियंत्रण में लिया तब इस इलाक़े को नागपुर के राघोजी भोसले के अधीन रख दिया। इसलिए अल्लापल्ली तहसील की जनसंख्या मुख्यतः तेलुगु भाषी है लेकिन गावों में गोड़ों की बसावट है। वर्तमान में अल्लापल्ली महाराष्ट्र के गढ़चिरौली ज़िले की तहसील ऐटापल्ली का एक ब्लॉक है। 

रेंज फ़ारेस्ट आफ़िसर गणेश लाँड़गे ने बताया कि जिस गेस्ट हाऊस में हम रुके हैं वह अंग्रेजों द्वारा 1910 में बनाया गया था। अल्लापल्ली से 130 किलोमीटर दक्षिण दिशा में हत्थी केम्प बनाया गया है। लकड़ी उठाने और ढ़ोने के लिए कुछ हाथी आसाम के काज़ीरंगा पार्क से लाए गए थे। मशीनीकरण से बेरोज़गार हाथियों को सेवानिवृत्त करके एक पहाड़ी इलाक़े में रखा गया है। जहाँ उन्हें सप्ताह में दो बार चावल गुड घी और केलों का भोजन कराने हेतु एक तालाब के बीच बने हत्थी केम्प में लाया जाता है। उनके पैरों में लोहे की मोटी ज़ंजीर बांधी है जिनके घिसटने से भूमि पर बनने वाले निशानों से वनरक्षक उनकी गतिविधियों पर नज़र रखते हैं और भोजन  के दिन उन्हें हाँका लगाकर हत्थी केम्प लाते हैं।

सबसे वयोवृद्ध हथिनी का नाम रूपा है, उसकी उम्र अस्सी साल बतायी जाती है। अल्लापल्ली की पुरानी हथिनी बसंती वहाँ के सबसे पुराने हाथी महालिंगा के संसर्ग से बच्चा नहीं दे रही थी इसलिए एक अन्य जवान हथिनी रूपा को हाथियों की संख्या बढ़ाने हेतु नागझिरा से अल्लापल्ली लाया गया। रूपा के पहुँचने से बसंती के कान खड़े हो गए। उसने महालिंगा पर कड़ी नज़र रखना शुरू कर दिया। दूसरी तरफ़ बसंती रूपा को चिंघाड़ कर चुनौतीपूर्ण धमकी देने लगी। एक दिन महलिंगा नज़र बचाकर रूपा के नज़दीक पहुँच सूँड़ से प्रेम का इज़हार करने लगा तो बसंती क्रोध से उफनते हुए रूपा पर टूट पड़ी और उसे धमकाकर घने जंगल में पहुँचा कर दम लिया। इस घटना के बाद वन अधिकारियों ने रूपा को तालाब की दूसरी तरफ़ आधे किलोमीटर लम्बी ज़ंजीरों से बांधकर वहीं उसके भोजन का इंतज़ाम कर दिया ताकि बसंती के दाम्पत्य जीवन में व्यवधान उत्पन्न न हो।

रूपा को अल्लापल्ली जंगल में बच्चे पैदा करके हाथियों की वंशवृद्धि का उद्देश्य पूरा न होते देख वन अधिकारियों ने केरल और आसाम से पशु विशेषज्ञ बुलाकर बसंती को एक साल तक कुछ इंजेक्शन दिए तो वह गर्भवती हुई और उसने बीस महीनों के बाद एक बच्चा जना, जिसका नाम प्रसिद्ध फ़िल्मी खलनायक अजीत के नाम पर रखा गया। बदली हुई परिस्थितियों में यह विचार करके कि शायद माँ बनने के बाद बसंती अब महालिंगा से रूपा को गर्भवती होने देगी। रूपा को उसके नज़दीक लाने की कोशिश की लेकिन बसंती ने अपनी मातृ सत्तात्मक पकड़ ज़रा सी भी ढ़ीली नहीं की। रूपा फिर एक बार मायूस हुई।  

कुछ सालों बाद अजीत जवान हो गया। रूपा की निगाह अजीत पर पड़ी। उसे भरोसा था कि बसंती अपने बच्चे अजीत के समागम से प्रजनन नहीं करेगी तो अजीत अंततोगत्वा उससे संसर्ग करेगा क्योंकि इलाक़े में उसके अलावा कोई और मादा नहीं है। बसंती को रूपा के इरादे भाँपते देर न लगी। अजीत भी अकसर भागकर रूपा के आसपास मँडराने लगा। जब अजीत उठाव पर आया तो बसंती ने उसके संसर्ग से एक और बच्चा दिया जिसका नाम एक अन्य फ़िल्मी विलेन रंजीत के नाम पर रखा गया। रूपा फिर एकबार मायूस हुई। बसंती का पुराना साथी महालिंगा उम्रदराज़ होकर मरा तब रूपा बसंती के परिवार को शान्तवना जताने आई परंतु बसंती ने उसे आते देख मुँह फेर लिया। अब रूपा ने हालात से समझौता करके जीना शुरू कर दिया है वह अकेली रहती है। हत्थी केम्प पहले आकर और भोजन करके चली जाती है। उसके जाने के बाद बसंती अपने परिवार को लेकर भोजन कराने आती है। मनुष्यों की तरह पशुओं में भी सौंतिया डाह के संघर्ष होते हैं।

हत्थी केम्प से लौटते समय मस्तिष्क में विचार आया कि पुरानी बाइबिल में लिखी, अब्राहम, साराह और हागार की कहानी के पात्र महालिंगा, बसंती और रूपा के रूप में साक्षात देखकर वापस लौट रहे हैं। अब्राहम पत्नी साराह और सेविका हागार के साथ दजला-फ़रात के मैदान में बसे कन्नान में रहते थे। साराह को बच्चे नहीं हो रहे थे इसलिए उसने अब्राहम से परिवार बढ़ाने के लिए सेविका हागार से बच्चा पैदा करने को कहा। अब्राहम और हागार से इस्माइल का जन्म हुआ। उसके बाद अब्राहम और साराह का भी  एक बच्चा इशाक नाम का हुआ। सुंदर सेविका हागार का बच्चा बड़ा होने से  साराह में सौंतिया डाह विकसित हुआ तो वह हागार और इस्माइल पर अत्याचार करने लगी। हागार पीड़ित होकर इस्माइल को लेकर अरब देश में मक्का पहुँची जहाँ इस्माइल के वंश में मुहम्मद का जन्म हुआ था जिन्होंने इस्लाम धर्म चलाया।

हत्थी केम्प से वापस अल्लापल्ली जंगल विभाग के गेस्ट हाऊस में रेंज आफ़िसर दोपहर का भोजन बनवाकर इंतज़ार कर रहे थे। भोजन करने के दौरान पता चला की टेक्सी ड्राईवर दारू से टुन्न होकर बकवास कर रहा है। फ़ारेस्ट गार्ड ने हमारे कहने पर उससे गाड़ी की चाबी छुड़ाकर हमें दे दी। रेंज फ़ारेस्ट आफ़िसर गणेश लाँड़गे से एक ड्राईवर का इंतज़ाम करवा कर हम भामरागढ़ की अगली यात्रा पर निकले।

अल्लापल्ली से 60 किलोमीटर की दूरी पर सिरोंजा डिविज़न का भामरागढ़ ब्लाक स्थित है। अल्लापल्ली से सात किलोमीटर पर वन विभाग का एक सौ वर्ष से प्राकृतिक अवस्था में आरक्षित वन है जिसमें किसी भी प्रकार की छेड़खानी नहीं की गई है। उसे “अल्लापल्ली का गौरव” वन नाम दिया है। उसमें पाँच सौ से अधिक वर्ष के पेड़ पाँच मीटर घेरे के हैं। वन विभाग के अधिकारियों ने बताया कि वह असंख्य जड़ीबूटियों का ख़ज़ाना है। भामरागढ़ के अंतर्गत कमलापुर रेंज है जो कि नक्सलवादियों का मायका माना जाता है। वहाँ महाराष्ट्र से पलकोटा और वेडिया नदियाँ छत्तीसगढ़ से आकर इंद्रावती नदी में मिलती हैं। त्रिवेणी संगम पवित्र स्थान माना जाता है। उन तीनों नदियों का जल इकट्ठा होकर इंद्रावती नदी के रूप में सिवनी ज़िले से निकली पेंच नदी वैनगंगा में मिलकर आगे वर्धा नदी से मिलकर प्राणहिता नदी कहलाने लगती है जो आगे तेलंगाना  के कालेश्वरम में गोदावरी से मिलती है। इस स्थान को “दक्षिण त्रिवेणी संगम” भी माना जाता है, क्योंकि यहाँ गोदावरी अपनी सहायक नदी प्रणाहिता से मिलती है, तीसरी नदी, हमेशा की तरह अदृश्य नदी सरस्वती है। हालाँकि सरस्वती हजारों साल पहले सूख गई थी, लेकिन यह यहाँ और कभी-कभी अदृश्य नदी के रूप में, कभी इलाहाबाद में, कभी श्रीशैलम, कालेश्वरम में, पॉप-अप होती रहती है, यह पता लगाना दिलचस्प होगा कि ये आस्था मान्यता कैसे विकसित हुई। जैसे ही आप गोदावरी के तट पर खड़े होते हैं, नदी आपके सामने जहाँ तक आप देख सकते हैं वहाँ तक फैल जाती है और दूसरे किनारे पर महाराष्ट्र का सिरोंचा जिला स्थित है! गोदावरी आंध्र प्रदेश और महाराष्ट्र के बीच प्राकृतिक सीमा बनाती है।

नक्सलियों के मायके अर्थात कमलापुर पहुँचते-पहुँचते शाम के छः बज चुके थे। फ़ारेस्ट गार्ड तुषार गौंड़ और वाहन चालक हमारे साथ थे। सबसे पहले बाबा आमटे के आश्रम हेमलकसा गए। उसके बाद त्रिवेणी संगम दर्शन किए। वहाँ तीन-चार युवक आ गए। संभवतः वे नक्सलियों के ख़बरी होंगे। उन्हें हमारे सुबह से उस इलाक़े में घूमने की जानकारी हो गई थी इसलिए वे टोह लेने आए थे। बातों-बातों में एक युवा जिसके चेहरे से बौद्धिकता झलक रही थी, उसने अंग्रेज़ी साहित्य पढ़ा था। अतः उससे घनिष्ठ बातें होने लगीं। उसने बताया कि 1984 में इस कमालपुर रेंज से सैंकड़ों की संख्या में युवा लड़के-लड़कियाँ नक्सली बने थे इसलिए इसे नक्सलियों का मायका कहा जाता है और वे इस इलाक़े में वारदात नहीं करते अपितु इंद्रावती नदी के उस पार छत्तीसगढ़ का भोपालपत्तनम रेंज लगता है वहाँ कोंटा से बचेली तक के इलाक़े में क्रियाशील होते हैं। उसने बताया कि आंदोलन के बड़े नेताओं ने हैदराबाद, नागपुर और मुंबई में बड़े कारोबार स्थापित कर लिए हैं  और छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र व तेलंगाना की सरकारों ने प्रतिभावान आदिवासियों को वन विभाग, पुलिस व अन्य सरकारी विभागों में ऊँचे पदों पर नियुक्त करके नक्सलियों के बीच नेतृत्व का संकट पैदा कर दिया है।

गढ़चिरोली में पता चला कि ब्रह्मपुरी, भंडारा, गोंदिया, बालाघाट होते हुए दो रास्ते,  एक लालबर्रा-बरघाट और दूसरा वारासिवनी-कटंगी से सिवनी पहुँचते हैं जहाँ से पेंच अभयारण्य पहुँचा जा सकता है।          

हम हेमलकसा आश्रम पहुँचे। वहाँ एक प्रेरक कहानी हाथ लगी। एक हिंदू ब्राह्मण परिवार में 26 दिसंबर 1914 को हिंगनघाट, वर्धा में देवीदास के घर एक बच्चे का जन्म हुआ था। उसका नाम मुरलीधर रखा गया। देवीदास ब्रिटिश भारत के जिला प्रशासन और राजस्व विभाग में अधिकारी थे। मुरलीधर को अंग्रेज़ी तौर तरीक़ों की तर्ज़ पर बचपन में बाबा करके पुकारा जाता था। वह आठ बच्चों में सबसे बड़ा था। उसका बचपन एक अच्छी हैसियत के ब्रिटिश नौकरशाह के सबसे बड़े बेटे के रूप में शिकार खेलों से भरा रोमांचक  घटनाओं के बीच बीता था। वह चौदह वर्ष की उम्र में बंदूक लेकर भालू और हिरण का शिकार करता था। जब वह गाड़ी चलाने योग्य हुआ तो पिता ने उसे पैंथर की खाल से बनी कुशन की गद्दियों वाली स्पोर्ट्स कार भेंट की थी। यद्यपि वह एक धनी परिवार में पैदा हुआ था, लेकिन हमेशा भारतीय समाज में व्याप्त  असमानता के बारे में सोचता रहता था। वह अपने पिता की नाराज़गी के बावजूद नौकरों के बच्चों के साथ नियमित रूप से खेलता था। दीवाली के दिन जब पूर शहर जगमगा रहा था दोस्तों के साथ बाज़ार में मटरगश्ती करते हुए उसका एक अंधे भिखारी से सामना हुआ। उसने मौज में आकर अपनी सिक्कों से भरी जेब को भीख के कटोरे में खाली कर दी। भिखारी को कटोरे का भार और बहुत सारे सिक्कों की खनक से महसूस हुआ  कि उसे मूर्ख बनाया जा रहा है, वह बोला “मै एक मजबूर भिखारी  हूं, मेरे कटोरे में पत्थर मत डालो, बाबा”, लड़के ने जवाब दिया “ये चोखे सिक्के हैं, पत्थर नहीं। आप चाहें तो कुछ ख़रीद कर इन्हें परख लें।”

इस घटना ने लड़के के मस्तिष्क पर गहरा प्रभाव छोड़ा कि इस तरह के दुःखी इंसान  उसकी ज़िंदगी के बिलकुल करीब मौजूद हैं, जिनकी जिंदगियों में आशा और विश्वास सिरे से नदारत हो चुके हैं। उसे अपने पिता की विलासिता से भरी दुनिया में ग़रीबों के प्रति मौजूद उपेक्षापूर्ण निर्दयता से चिड़ होती थी, कि लोग इतने बेरहम कैसे हो सकते हैं कि आसपास बजबजाती ग़रीबी और भुखमरी से अनजान बने रहकर गुलछर्रे उड़ाते रहें।

मुरलीधर एक डॉक्टर बनने की इच्छा रखता था, लेकिन उसके पिता ने उसे वकील बनने के लिए मजबूर किया। वह चाहते थे कि उनका बेटा बड़ा वकील बनकर परिवार की मिल्कियत को संभाले। लड़के ने धनाढ्य वातावरण के जीवन को बहुत अच्छी तरह से अपना लिया। अपने दिन घुड़सवारी, शिकार, क्लब में तास के पत्तों और टेनिस खेलने में बिताता था। वह अमीरों का एक समृद्ध जीवन जी रहा था जो मानते हैं कि पैतृक विशेषाधिकार केवल भाग्यशाली को जीने का मौका देते हैं और उनका ग़रीबों के भाग्य के प्रति कोई दायित्व नहीं है। इस विलासिता पूर्ण जीवन के बीच वह बेचैन रहता था। एक दिन उसे लगा जैसे उसे दुनिया में एक बड़ा उद्देश्य पूरा करना है।

मुरलीधर कानून में प्रशिक्षित होकर वर्धा में वकालत शुरू करके एक सफल वकील बन गया। वह महात्मा गांधी और बिनोवा भावे से प्रभावित होकर भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में शामिल हो गया। 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन में शामिल होने के कारण अंग्रेजों द्वारा कैद किया गया। उन्होंने भारतीय नेताओं के लिए एक बचाव वकील के रूप में काम करना शुरू किया। महात्मा गांधी द्वारा शुरू किए गए सेवाग्राम आश्रम में कुछ समय बिताया और गांधीवाद के अनुयायी बन गए। उन्होंने चरखे से बनाई खादी पहनकर गांधीवाद का अभ्यास व प्रचार किया। जब गांधी को पता चला कि उस लड़के ने एक एक ब्रिटिश अफ़सर के अत्याचार व उत्पीड़न से एक भारतीय लड़की को बचाया है, तब गांधी जी ने उसे “सत्य का निडर साधक” नाम दिया था।

उन दिनों कुष्ठ रोग से पीड़ित लोगों को एक सामाजिक कलंक माना जाता था और ऐसे रोगी समाज की मुख्य धारा से कटकर उपेक्षित जीवन जीने को अभिशप्त होते थे। मुरलीधर ने कोढ़ जैसे संक्रामक छुआछूत रोग को दूर करने का प्रयास किया। यहां तक ​​कि उन्होंने एक कोढ़ी को साथ रहने की अनुमति दी, यह साबित करने के उद्देश्य से एक प्रयोग के हिस्से के रूप में उन्हें इंजेक्शन लेने पड़े थे। तुलसीराम नाम के कुष्ठ पीड़ित व्यक्ति के साथ मुलाक़ात ने उनकी आत्म-छवि को चकनाचूर कर दिया। कुष्ठ रोग के अंतिम चरण में वह एक मांस के टुकड़ों के साथ उंगलियों या पैर की उंगलियों के बिना कीड़े और घावों के साथ वास्तव में एक जीवित लाश है। वह संक्रमण से घबरा गया। उसने खुद को निडर बनाने के बारे में सोचा। अगले 6 महीनों के लिए वह इस संकट की बेदर्द पीड़ा में रहा। उसने सोचा “जहाँ भय है वहाँ प्रेम नहीं है, और जहाँ प्रेम नहीं वहाँ कोई भगवान नहीं है।” भय और घृणा से घिरे कोढ़ियों की इस समस्या पर काबू पाने का केवल एक ही तरीका लग रहा था। उसे कुष्ठ पीड़ित लोगों के साथ रहना और काम करना होगा। उसने निश्चय किया।

“मुझे किसी भी चीज़ से कभी डर नहीं लगा जब मैंने एक भारतीय महिला का सम्मान बचाने के लिए ब्रिटिश ठोकरों से लड़ाई लड़ी, गांधी जी ने मुझे ‘अभय साधक’ कहा, जो सत्य का निर्भीक साधक था। जब वरोरा के सफाईकर्मियों ने मुझे नाले की सफाई के लिए चुनौती दी, तो मैंने ऐसा किया, लेकिन जब मैंने तुलसीराम की जीवित लाश देखी मैं डर गया। मुझे इस डर पर क़ाबू पाकर इसे कुष्ठ पीड़ितों के प्रति प्रेम में बदलना होगा।”

मुरलीधर ने कुष्ठ रोगियों की सेवा करने का निर्णय इस कारण लिया कि उन्हें एक ऐसे समाज का हिस्सा बनने में घृणा महसूस होती थी जो ऐसे दलित मनुष्यों की दुर्दशा के प्रति बहुत ही उदासीन था। उन्होंने इस उदासीनता को ‘मानसिक कुष्ठ’ के रूप में माना, जो कि सबसे भयावह बीमारी है जो किसी के अंगों को नहीं खो रही है, लेकिन अन्य मनुष्यों के लिए दया और करुणा महसूस करने के लिए प्रेम की ताकत खो रही है। उन्होंने लिखा:-

मैंने भगवान से अपनी आत्मा मांगी,

लेकिन मेरी आत्मा नदारत थी।

मैंने अपने में भगवान की तलाश की,

लेकिन मेरे भीतर भगवान भी नदारत था।

तब मैंने सेवा हेतु भाई-बहनों की मांग की।

मुझे उनमें आत्मा, भगवान और जीवन लक्ष्य मिल गया।

उन्होंने 1949 में 4 रुपये, 6 कुष्ठ रोगियों और एक लंगड़ी गाय के साथ वरोरा में महाराष्ट्र में अपना काम फैलाया है। कई संगठनों ने बाबा के कार्यों से प्रेरणा ली है और देश भर में और यहां तक ​​कि पूरी दुनिया में काम कर रहे हैं। दुनिया भर में मुरलीधर ने जो प्रभाव डाला, वह अचूक है और उनकी आत्मा एक दुर्लभ रत्न है जिसे दुनिया भाग्यशाली मानती थी।

मुरलीधर जानते थे कि बीमारी का इलाज करना ही पर्याप्त नहीं है बल्कि लोगों को इन सामाजिक प्रकोपों ​​से निजात दिलाकर आत्मनिर्भर, उत्पादक समाज का निर्माण करना महत्वपूर्ण है। कृषि से शुरू होकर वस्त्र उद्योग से लेकर लकड़ी के काम तक विभिन्न लघु और मध्यम स्तर के उद्योगों तक विस्तार एवं महारोगी सेवा समिति, वरोरा उत्पादक क्षेत्र में उनके सपनों का साकार स्वरुप था।

मुरलीधर ने महाराष्ट्र में कुष्ठ रोगियों, विकलांगों और समाज के हाशिये पर पड़े  लोगों के इलाज और पुनर्वास के लिए तीन आश्रमों की स्थापना की। महारोगी सेवा समिति, वरोरा (कुष्ठ सेवा समाज) कुष्ठ रोगियों के इलाज और मानसिक कुष्ठ रोग से पीड़ित समाज के उद्धार के उद्देश्य से स्थापित किया गया था, जिसे  बाबा ने ‘आनंदवन’ कहा जाता है, जिसका अर्थ है ‘फ़ारेस्ट ऑफ ब्लिस’। उन्होंने और उनकी पत्नी साधना ने 15 अगस्त 1949 को एक पेड़ के नीचे आनंदवन में एक कुष्ठ अस्पताल शुरू किया। 1973 में गढ़चिरौली जिले के माडिया गोंड आदिवासी लोगों के लिए काम करने के लिए लोक बिरादरी प्रचारक की स्थापना की। उन्होंने अपने जीवन को कई अन्य सामाजिक कार्यों के लिए समर्पित किया, विशेष रूप से भारत छोड़ो आंदोलन, वन्यजीव संरक्षण और नर्मदा बचाओ आंदोलन के महत्व पर सार्वजनिक जागरूकता बढ़ाने के लिए अनथक प्रयास किए। भारत सरकार ने 1971 में उनको पद्मश्री से सम्मानित किया।

उनके दो बेटे, विकास आमटे और प्रकाश आमटे, और पुत्रवधू, मंदाकिनी और भारती, डॉक्टर हैं। इन चारों ने अपना जीवन सामाजिक कार्यों के लिए समर्पित कर दिया है। प्रकाश और उनकी पत्नी मंदाकिनी महाराष्ट्र के गढ़चिरौली जिले के माड़िया गोंड जनजाति के हेमलकसा गाँव में स्कूल और अस्पताल चलाते हैं, साथ ही एक शेर और कुछ तेंदुओं सहित घायल जंगली जानवरों के लिए एक अनाथालय है। उनके दो बेटों, डॉ. दिगंत और अनिकेत ने भी उन्हीं कार्यों को अपना जीवन समर्पित किया। प्रकाश और मंदाकिनी को 2008 में सामुदायिक नेतृत्व के लिए मैगसेसे पुरस्कार मिला।

बाबा आमटे के बड़े बेटे विकास और उनकी पत्नी भारती आनंदवन में अस्पताल चलाते हैं और कई कल्याणकारी परियोजनाओं के साथ समन्वय करते हैं। आनंदवन में एक विश्वविद्यालय है, एक अनाथालय है, और अंधे और बधिरों के लिए स्कूल हैं। आनंदवन आश्रम आत्मनिर्भर है और इसके 5,000 से अधिक निवासी हैं। कुष्ठ रोग से पीड़ित लोगों के लिए “सोमनाथ” और “अशोकवन” आश्रमों की स्थापना की है।

क्रमशः…

© श्री सुरेश पटवा 

भोपाल, मध्य प्रदेश

≈ संस्थापक सम्पादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – गढ़चिरौली यात्रा – भाग – ४८ ☆ श्री सुरेश पटवा ☆

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8.गढ़चिरौली यात्रा

नागपुर

नागपुर का नामकरण नाग नदी के नाम पर हुआ  है जो कभी इस शहर से होकर बहती थी, अब एक नाला की शक्ल अख़्तियार कर चुकी है। पुरानी  नागपुर बस्ती ‘महाल’ नाग नदी के उत्तरी किनारे पर स्थित है। प्रत्यय पुर का अर्थ कई भारतीय भाषाओं में “शहर” है। इस प्रकार नाग नदी पर बसी बस्ती नागपुर कहलाई। नागपुर के पुराने नामों में से एक नाम “फणींद्रपुरा” था। इसकी उत्पत्ति संस्कृत शब्द फण (कोबरा का फन) से हुई है। नागपुर के पहले समाचार पत्र का नाम फणइन्द्रमणि था, जिसका अर्थ है एक गहना जिसे कोबरा के हुड पर स्थित माना जाता है। यह अज्ञानता के अंधेरे को रोशनी देने वाला अखबार हुआ करता था। बी.आर.अम्बेडकर के अनुसार शहर और नदी दोनों का नाम “नाग लोगों” के नाम पर रखा गया है। ब्रिटिश शासन के दौरान, शहर का नाम “नागपोर” (Nagpore) के रूप में लिखा जाता था।

पुरातात्विक स्रोतों के अनुसार वर्तमान नागपुर के आसपास मानव अस्तित्व का प्रमाण 3000 ईसा पूर्व से पाया गया है। द्रंगधाम (महाढ़  कॉलोनी के पास) में दफन स्थलों से संकेत मिलता है कि मेगालिथिक संस्कृति नागपुर के आसपास मौजूद थी। महाभारत काल में यह इलाक़ा विदर्भ नाम से जाना जाता था। जिसकी राजधानी अमरावती से कृष्ण ने रुक्मणी का अपहरण उसकी सहमति से करके विवाह किया था जबकि रुक्मणी का भाई रुक्मण उसका विवाह दुर्योधन से करने जा रहा था। “नागपुर” नाम का पहला संदर्भ वर्धा जिले के देवली में मिला है। दसवीं शताब्दी की तांबे की प्लेट के शिलालेख में शिलालेख नागपुरा-नंदिवर्धन द्वारा विजया (जिला) में स्थित एक गाँव के अनुदान का एक अभिलेख है, जो 940 ईस्वी में राष्ट्रकूट राजा कृष्ण तृतीय के समय में था। तीसरी शताब्दी के अंत में, राजा विंध्यशक्ति को नागपुर क्षेत्र पर शासन करने के लिए जाना जाता है। चौथी शताब्दी में वाकाटक राजवंश ने नागपुर क्षेत्र और आसपास के क्षेत्रों पर शासन किया जिसके गुप्त साम्राज्य के साथ अच्छे संबंध थे। वाकाटक राजा पृथ्वीविना प्रथम ने अपनी राजधानी को नागपुर से 38 किलोमीटर दूर नागदर्शन (प्राचीन नाम नंदिवर्धन) में स्थानांतरित कर दिया। वाकाटक के बाद यह क्षेत्र बादामी चालुक्यों, राष्ट्रकूटों के हिंदू राज्यों के शासन में आया। मालवा के परमारों ने ग्यारहवीं शताब्दी में नागपुर क्षेत्र को नियंत्रित किया था। नागपुर में परमारा राजा लक्ष्मीदेवा (1086-1094) का एक प्रशस्ति शिलालेख मिला है। इसके बाद, यह क्षेत्र देवगिरी के यादवों के अधीन आ गया। अलाउद्दीन खिलजी ने 1296 में देवगिरि पर कब्जा करने के बाद यादव साम्राज्य पर आक्रमण किया, जिसके बाद 1317 में तुगलक राजवंश सत्ता में आया। 17 वीं शताब्दी में, मुगल साम्राज्य ने इस क्षेत्र पर विजय प्राप्त की, हालांकि मुगल काल में क्षेत्रीय प्रशासन गोंड साम्राज्य द्वारा चलाया गया था। आधुनिक शहर को गोंड राजवंश के बख्त बुलंद शाह द्वारा  अट्ठारहवीं शताब्दी में बसाया गया था।

छिंदवाड़ा अर्थात देवगढ़-नागपुर मिलीजुली गौंड़ रियासत में बख्त बुलंद शाह के बाद, देवगढ़ के अगले राजा चांद सुल्तान थे, जिन्होंने पहाड़ियों के निचले क्षेत्र में निवास किया, जिसे नागपुर कहा जाता था, उन्होंने इसे एक शहर में बदल दिया। चांद सुल्तान ने चंद्रपुर बसाया था। 1739 में चांद सुल्तान की मृत्यु पर बख्त बुलंद के एक नाजायज बेटे वली शाह ने सिंहासन पर कब्जा कर लिया और चांद सुल्तान की विधवा ने अपने बेटों अकबर शाह और बुरहान शाह के हित में बरार के मराठा नेता राघोजी भोसले की सहायता ली। वली शाह को मौत के घाट उतार दिया गया और सही उत्तराधिकारियों को गद्दी पर बिठा दिया गया। 1743 में मराठा शासकों ने रियासत को मराठा साम्राज्य में मिला लिया। जिसकी शुरुआत राघोजी भोसले ने की, उन्होंने 1751 तक देवगढ़, चंदा और छत्तीसगढ़ के क्षेत्रों पर विजय करके नागपुर रियासत स्थापित कर ली।

1765 में नागपुर को काफी हद तक जला दिया गया और 1811 में आंशिक रूप से पिंडारियों आतंक छाया जिन्हें मार दिया गया। 1803 के द्वितीय एंग्लो-मराठा युद्ध में राघोजी भोसले द्वितीय अंग्रेजों के खिलाफ पेशवा से मिलकर लड़े। 1816 में राघोजी द्वितीय की मृत्यु के बाद, उनके पुत्र परसाजी को मुधोजी द्वितीय भोसले ने अपदस्थ कर दिया था और उनकी हत्या कर दी गई थी। इस तथ्य के बावजूद कि उन्होंने उसी वर्ष अंग्रेजों के साथ एक संधि कर ली, मुधोजी 1817 में तीसरे एंग्लो-मराठा युद्ध में पेशवा के साथ अंग्रेजों के खिलाफ लड़े, लेकिन वर्तमान नागपुर में सीताबर्डी के युद्ध में हार का सामना करना पड़ा। भीषण युद्ध एक महत्वपूर्ण मोड़ था क्योंकि इसने भोसले के पतन की नींव रखी और नागपुर शहर के ब्रिटिश अधिग्रहण का मार्ग प्रशस्त किया। मुधोजी को सिंहासन पर एक अस्थायी बहाली के बाद हटा दिया गया था, जिसके बाद अंग्रेजों ने राघोजी II के पोते राघोजी तृतीय भोसले को सिंहासन पर बिठाया। राघोजी III (जो 1840 तक चली) के शासन के दौरान, इस क्षेत्र का प्रशासन एक ब्रिटिश निवासी द्वारा किया जाता था। 1853 में, बिना वारिस को छोड़कर राघोजी तृतीय की मृत्यु के बाद अंग्रेजों ने नागपुर पर अधिकार कर लिया।

1853 से 1861 तक, नागपुर प्रांत (जिसमें वर्तमान नागपुर क्षेत्र, छिंदवाड़ा और छत्तीसगढ़ शामिल थे) मध्य प्रांत और बरार का हिस्सा बन गए और ब्रिटिश राजधानी के रूप में नागपुर के साथ ब्रिटिश केंद्र सरकार के अधीन एक आयुक्त के प्रशासन में आ गए। बरार को 1903 में जोड़ा गया था 1867 में ग्रेट इंडियन पेनिनसुला रेलवे (GIP) के आगमन ने एक व्यापार केंद्र के रूप में इसके विकास को प्रेरित किया।  टाटा समूह ने नागपुर में अपनी पहली कपड़ा मिल शुरू की, जिसे औपचारिक रूप से सेंट्रल इंडिया स्पिनिंग एंड वीविंग कंपनी लिमिटेड के रूप में जाना जाता था। कंपनी को लोकप्रिय रूप से “एम्प्रेस मिल्स” के रूप में जाना जाता था, क्योंकि इसका उद्घाटन 1 जनवरी 1877 को हुआ था, जिस दिन रानी विक्टोरिया को भारत की महारानी घोषित किया गया था।

असहयोग आंदोलन का आह्वान 1920 के नागपुर अधिवेशन से शुरू किया गया था। शहर ने 1923 में एक हिंदू-मुस्लिम दंगा देखा, जिसका के.बी. हेडगेवार, पर गहरा प्रभाव पड़ा, जिन्होंने 1925 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की स्थापना की, जो नागपुर के मोहितेवाड़ा महल में एक हिंदू राष्ट्रवादी संगठन था, जिसने हिंदू राष्ट्र बनाने का विचार रखा।  1927 के नागपुर दंगों के बाद आरएसएस को नागपुर में और काफ़ी लोकप्रियता मिली और संगठन का राष्ट्रव्यापी विकास शुरू हुआ।

इतिहास की इन अठखेलियों से विचरते हुए नागपुर से चंद्रपुर 160 किलोमीटर और चंद्रपुर  से गढ़चिरौली 80 किलोमीटर यानि कुल 240 किलोमीटर अच्छी-बुरी सड़क से यात्रा तय करके रात्रि नौ बजे गढ़चिरोली गेस्ट हाऊस में जाकर गरम पानी से नहाकर खाना खाया और ग्यारह बजे पलंग पर लिहाफ़ में घुसते ही नींद ने आ दबोचा।

क्रमशः…

© श्री सुरेश पटवा 

भोपाल, मध्य प्रदेश

≈ संस्थापक सम्पादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – गढ़चिरौली यात्रा – भाग – ४७ ☆ श्री सुरेश पटवा ☆

श्री सुरेश पटवा

(श्री सुरेश पटवा जी  भारतीय स्टेट बैंक से  सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों  स्त्री-पुरुष “, गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की  (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं  तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व  प्रतिसाद मिला है। अब आप प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकते हैं यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर।)

? यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – गढ़चिरौली यात्रा – भाग- ४७ ☆ श्री सुरेश पटवा ?

8.गढ़चिरौली यात्रा

नक्सलियों के मायके में

कैलाश मेश्राम की स्टेट बैंक के भोपाल स्थित स्थानीय कार्यालय में पदस्थी के दौरान मेरी उनसे हुई मुलाक़ात मित्रता में बदल गई। कुछ समय बाद कैलाश की पदोन्नति सहायक महाप्रबंधक की श्रेणी में होने के साथ उनका तबादला अंकेक्षण (Audit) विभाग में हो गया। दोनों घूमने-फिरने के शौक़ीन थे इसलिए कैलाश जहाँ भी आडिट करने जाते वहाँ मुझे घूमने-फिरने बुलाते। अनेकों बार कार्यक्रम बनता परंतु किन्ही कारणों से बिगड़ जाता। नवम्बर 2020 के पहले हफ़्ते में कैलाश को आडिट हेतु पंद्रह दिन गढ़चिरौली में रहना था। उन्होंने मुझे गढ़चिरौली भ्रमण हेतु आमंत्रित किया।

मैंने गढ़चिरौली के वनीय वैभव, गोंडी-तेलुगु-मराठी लोगों की मिलीजुली जीवंत संस्कृति, बाबा आमटे के पुत्र प्रकाश आमटे एवं उनकी पत्नी मंदाकिनी आमटे द्वारा पलकोटा, वेडिया और इंद्रावती नदियों के त्रिवेणी संगम पर स्थापित लोक बिरादरी सेवा आश्रम, अल्लापल्ली के प्रसिद्ध सागौन वन क्षेत्र और मार्क्सवादी नक्सल आतंकवाद के मायके के नाम से मशहूर कमलापुर वनक्षेत्र के बारे में सुन रखा था। गढ़चिरौली भ्रमण की बड़ी पुरानी इच्छा कुलबुला उठी। नौ नवम्बर 2020 को कार के टैंक में सिरे तक पेट्रोल भराकर सुबह छः बजे भोपाल से गढ़चिरौली के लिए निकल लिए।  

ठंडी हवा के झोंकों से बतियाते जैसे ही अब्दुल्लागंज पार किया विंध्याचल पर्वत के सुहाने दृश्य और ताज़ी हवा के झोंकों ने मन प्रसन्न कर दिया परंतु वह प्रसन्नता अधिक देर नहीं टिकी रही क्योंकि आगे आठ-दस किलोमीटर लम्बा धूल भरा ट्रैफ़िक जाम उसका स्वागत करने को तैयार था। फ़र्स्ट ग़ैर में घिसटते-घिसटते एक घंटे का रास्ता तीन घंटों में पूरा कर इटारसी पार करके केसला और पथरौटा से गुज़र कर शाहपुर पहुँचने ही वाले थे कि सतपुड़ा की लुभावनी हरीतिमा को छूकर आए हवा के झोंकों ने उसकी तबियत खुश कर दी। पता चला कि बैतूल ज़िला लग चुका है। हरे भरे पहाड़ों से घिरे एक ढ़ाबे पर मुँह-हाथ धोकर घर से लाया टिफ़िन ख़ाली करके पेट में भरा और वहाँ पड़ी खटिया पर पटिया को सिरहाना बनाकर लेट गए। लेटते ही दिमाग़ में बैतूल ज़िले की भौगोलिक संरचना और बसावट के विचार तरंगित होने लगे।

बैतूल

बैतूल समुद्र तल से 2,000 फीट की ऊँचाई पर स्थित वनों और जैव विविधता से समृद्ध क्षेत्र  है, जो पूरे वर्ष यहाँ जलवायु को सुखद व मनमोहक बनाता है। यह सतपुड़ा रेंज के मैदानी इलाकों में स्थित होने से धूल भरे शहर के जीवन से एक सुखद, शांतिपूर्ण भ्रमण हेतु उपयुक्त है। बैतूल ज़िला मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल से 180 किलोमीटर दूर छिंदवाड़ा, नागपुर, खंडवा, होशंगाबाद, हरदा जिलों की गोद में सतपुड़ा पर्वत के दक्षिणी पठार से नागपुर की तरफ़ फैले मैदान तक फैला हुआ है।

इतिहास की किताबों में यह क्षेत्र वाकाटक वंश, राष्ट्रकूट, सतवाहन, मुगल, गोंड, भोंसले, ब्रिटिश के अधीन रहा बताया जाता है। उन्नीसवीं शताब्दी की शुरुआत में, बैतूल क्षेत्र बदनूर का इलाक़ा के नाम से जाना जाता था। इस स्थान और ज़िले का वर्तमान नाम इसके दक्षिण में लगभग 5 किमी की दूरी पर बसे एक छोटे से शहर बैतूल-बाजार के कारण पड़ा है। लेकिन बैतूल शब्द कहाँ से आया? बैतूल का शाब्दिक अर्थ “बिना बाढ़” का है। इस क्षेत्र के चारों तरफ़ कपास की खेती बहुतायत से होती थी। किसानों ने यहाँ भी कपास लगाना शुरू किया लेकिन यहाँ की ज़मीन पथरीली और जलवायु नम से होने से यहाँ कपास का पौधा बढ़ता (तूल) नहीं था। जैसे “बातों को तूल  न देना” याने  न बढ़ाना एक मुहावरा है। वैसे ही कपास के पौधों का न बढ़ना बैतूल हो गया।

वहाँ आदिवासियों की छोटी हाट लगती थी जिसे बैतूल बाज़ार पुकारा जाने लगा। उन्नीसवी सदी में उड़ीसा और छत्तीसगढ़ फ़तह करके लौटते वक्त चौथ-सरदेशमुखी वसूली हेतु बिरार का इलाक़ा शिवाजी के वंशज राघोजी भोसले को सौंपा गया था। मराठा साम्राज्य विखंडन होने पर अंग्रेजों ने बैतूल को राजस्व तालुक़ा बना दिया। 1822 में जिला मुख्यालय को वर्तमान स्थान पर स्थानांतरित कर दिया गया, तभी से स्थानीय बोली में बदनूर इलाक़ा बैतूल के नाम से जाना जाने लगा।

बहुत कम लोग जानते हैं कि उन्नीसवीं शताब्दी में मराठों ने मंदिरों और पूजा स्थलों के रूप में अपने अमिट निशान छोड़ हैं। कई हिंदू और जैन मंदिर इस क्षेत्र के आसपास उसी समय के बने हैं। एक पहाड़ी की चोटी पर बना, मुक्तागिरी जैन मंदिर जैनियों के लिए यह एक पवित्र स्थान है। सबसे प्रसिद्ध मंदिर शहर के केंद्र से लगभग आठ किलोमीटर की दूरी पर स्थित बालाजीपुरम मंदिर है। 15 एकड़ में फैला, मंदिर 2001 में बनाया गया एक लंबा ढांचा और वास्तुकला में आधुनिक है। बसंत पंचमी के त्योहार पर हर साल मेला भरता है। कुकरुखमाला, सोना घाटी, मुलताई और शापना जलाशय आसपास के अन्य पर्यटन स्थल हैं।

अमरावती जिले में हाटीघाट और चिकलदा पहाड़ियों के किनारे ताप्ती की सहायक नदियाँ मोरंड और गंजल दक्षिणी-पश्चिमी सीमा निर्धारित करती  हैं। मोरंड नदी और ढोढरा मोहर रेलवे स्टेशन के आगे से तवा नदी ज़िले की उत्तरी सीमा बनाती हैं।  पूर्वी सीमा छोटी नदियों और पहाड़ियों से गुलज़ार हैं। जिनमें से खुरपुरा और रोटिया नाला बरसात के दिनों में बादलों से ढँके अनेकों प्रपातों का निर्माण करते  हैं। गोंड, कोरकु, भरिया, कुर्मी, कुनबी, मेहरा और चमार इस ज़िले के मुख्य निवासी हैं। क़रीब आधा घंटा आराम के बाद पुनः यात्रा शुरू करके शाम को पाँच बजे के आसपास नागपुर शहर के मकान दिखने लगे।

क्रमशः…

© श्री सुरेश पटवा 

भोपाल, मध्य प्रदेश

≈ संस्थापक सम्पादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक साहित्य # ४२७ ☆ यात्रा संस्मरण – लंदन डायरी – लंदन के घरों की छत पर उल्लू और दरवाजे पर सिंह ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ४२७ ☆

?  यात्रा संस्मरण – लंदन डायरी – लंदन के घरों की छत पर उल्लू और दरवाजे पर सिंह ? श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

लंदन में चलते हुए मेरी एक आदत बन गई है। सड़क पर चलते हुए अब मैं केवल सामने नहीं देखता, कभी ऊपर भी देखने लगता हूं। यह आदत इस शहर ने ही डाली है।

किसी पुराने भवन की खिड़की के ऊपर अचानक कोई पत्थर का चेहरा दिखाई दे जाता है। किसी दरवाजे के दोनों ओर दो छोटे सिंह बैठे मिल जाते हैं। कहीं छत के किनारे कोई पक्षी पंख समेटे बैठा है और कहीं भवन की दीवार पर कोई विचित्र सा जीव मानो सदियों से आने जाने वालों को देख रहा हो।

पहले मुझे लगता था कि यह सब वास्तुशिल्प की सजावट भर है। लेकिन थोड़ा खोजने पर पता चला कि लंदन के इन पत्थर और धातु के जीवों की भी अपनी एक भाषा है।

मिसाल के लिए सिंह।

लंदन में सिंह केवल चिड़ियाघर में नहीं मिलते। वे भवनों की रखवाली भी करते हैं। Bank of England की वास्तुकला में सिंहों की उपस्थिति को शक्ति का प्रतीक माना गया है और उन्हें बुरे इरादों से रक्षा करने वाली छवि से भी जोड़ा गया है। वहां सिंह दरवाजों, दीवारों और भवन के भीतर तक दिखाई देते हैं। उसी भवन में उल्लू भी हैं, जिन्हें ज्ञान और विवेक का प्रतीक माना गया है।

यहां एक तथ्य खास तौर पर ध्यान खींचता है। सिंह लंदन या ब्रिटेन के जंगलों का स्वाभाविक प्राणी नहीं है। ब्रिटेन में सिंह कभी जंगली पशु के रूप में नहीं रहे। फिर भी ब्रिटिश प्रतीक संसार में सिंह की उपस्थिति इतनी गहरी है कि वह राजसत्ता, शक्ति, साहस और संरक्षण का मानो स्वाभाविक प्रतीक बन गया है। शायद इसी कारण लंदन की इमारतों पर पत्थर के सिंह इतने सहज दिखाई देते हैं, जैसे वे इस शहर के पुराने निवासी हों। Bank of England स्वयं सिंह को शक्ति का प्रतीक और बुरे इरादों से रक्षा करने वाली स्थापत्य छवि के रूप में बताता है।

अर्थात भवन भी शायद कह रहा होता है, बाहर से मजबूत दिखो पर भीतर से समझदार रहो।

लंदन में सिंहों की कहानी इससे भी पुरानी और रोचक है। Trafalgar Square में Nelson’s Column के नीचे बैठे चार विशाल कांस्य सिंहों को Sir Edwin Landseer ने बनाया था और 1867 में उन्हें वहां स्थापित किया गया। उनकी भूमिका केवल सौंदर्य बढ़ाने की नहीं, बल्कि Nelson की स्मृति की रक्षा करने वाले प्रहरी जैसी कल्पित की गई।

Oxford Street के पास Stratford Place के प्रवेश द्वार पर सिंह की मूर्ति लगी है। अठारहवीं शताब्दी में बने इस परिसर के प्रवेश पर सिंहों की मौजूदगी मानो आने वाले को बता रही थी कि भीतर कोई साधारण जगह नहीं, एक विशिष्ट आवासीय संसार है।

और फिर है South Bank Lion,

कभी यह सिंह Lambeth की Lion Brewery की छत के ऊपर बैठकर Thames की ओर देखता था। 1837 में William Frederick Woodington ने इसे Coade Stone में बनाया था। Brewery खत्म हुई, भवन भी चला गया, लेकिन सिंह बचा रहा। वह लंदन में इधर से उधर घूमता हुआ अंततः Westminster Bridge के पास पहुंच गया। आज वह Grade II* listed ऐतिहासिक मूर्ति है।

एक सिंह ने मानो नौकरी बदल ली, लेकिन शहर नहीं छोड़ा।

उल्लुओं की कहानी कुछ और दिलचस्प है।

Southwark में एक पुराने मकान की ऊपरी मंजिल की दीवार पर एक उल्लू और एक बिल्ली की छोटी मूर्तियां लगी हैं। स्थानीय तौर पर यह जगह “Owl and the Pussy-Cat” house के नाम से जानी जाती है। इन मूर्तियों का वास्तविक कारण आज भी निश्चित रूप से ज्ञात नहीं है। अनुमान लगाया जाता है कि शायद इनका संबंध Edward Lear की प्रसिद्ध कविता से हो, लेकिन यह भी केवल संभावना है।

मुझे लंदन की यही बात अच्छी लगती है। यहां हर चीज का अर्थ जरूरी नहीं कि एक ही हो।

कभी मूर्ति वास्तुशिल्प है, कभी प्रतीक, कभी इतिहास की बची हुई निशानी और कभी किसी व्यक्ति की निजी शरारत।

सबसे बड़ी बात आम लोग भी अपने घरों में ये प्रतीक मूर्तियाँ लगवाये हुए हैं।

हमारे यहां भी घरों के बाहर हाथी, सिंह, घोड़े, हंस और देवी देवताओं की प्रतिमाएं दिखाई देती हैं। उनके पीछे अक्सर धार्मिक विश्वास, वास्तु संबंधी धारणाएं या शुभता की कामना होती है। लंदन में भी प्रतीक हैं, लेकिन उनका अर्थ अधिक बार इतिहास, शक्ति, पेशे, कला, स्मृति या निजी रुचि से जुड़ता दिखाई देता है।

और शायद इसीलिए यहां चलते हुए ऊपर देखना भी एक तरह का इतिहास पढ़ना है।

नीचे फुटपाथ पर आज का लंदन चल रहा है। लोग मोबाइल पर बातें कर रहे हैं, बसें आ जा रही हैं, साइकिलें निकल रही हैं, कोई टु गो कप कॉफी लेकर जल्दी में है।

और ठीक उनके ऊपर, किसी पुराने भवन की छत पर बैठा एक पत्थर का उल्लू चुपचाप सब देख रहा है।

वह न मोबाइल देखता है, न घड़ी।

सिंह भी वहीं है, अपनी जगह अडिग।

सदियों से शायद उसका काम ही यही है, शहर को मूक रहकर देखते रहना।

मैं सोचता हूं, लंदन के भवन केवल ईंट, पत्थर और शीशे से नहीं बने हैं। उनके चेहरे भी हैं, कान भी हैं, आंखें भी हैं और कभी कभी छत पर बैठे हुए उल्लू भी।

बस फर्क इतना है कि लंदन की इन मूर्तियों से दोस्ती करने के लिए आपको ऊपर देखना पड़ता है।इस शहर में इतिहास अक्सर संग्रहालय में बंद नहीं मिलता।कभी वह आपके सिर के ऊपर छत पर बैठा होता है।

 ☆

© श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव

समीक्षक, लेखक, व्यंगयकार

लंदन प्रवास पर

ए २३३, ओल्ड मीनाल रेसीडेंसी, भोपाल, ४६२०२३, मो ७०००३७५७९८

readerswriteback@gmail.कॉम, apniabhivyakti@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

 

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – पग-पग नर्मदा यात्रा – भाग – ४६ ☆ श्री सुरेश पटवा ☆

श्री सुरेश पटवा

(श्री सुरेश पटवा जी  भारतीय स्टेट बैंक से  सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों  स्त्री-पुरुष “, गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की  (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं  तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व  प्रतिसाद मिला है। अब आप प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकते हैं यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर।)

? यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – पग-पग नर्मदा यात्रा – भाग- ४६ ☆ श्री सुरेश पटवा ?

7.पग-पग नर्मदा यात्रा

नर्मदा परिक्रमा:दूसरा चरण

पिपरहा से सतधारा 14 नवम्बर 2019

पिपरहा में नर्मदा का एक रेतीला किनारा है। आश्रम व्यवस्था बहुत अच्छी है रात को स्वामी जी के सेवक ने स्वादिष्ट खिचड़ी खिलाई। रास्ते में गन्ने और तुअर की खड़ी फ़सल के अलावा कुछ न दिखता था। गुड़ की चरखी सक्रिय होने लगीं। तीन बड़े कड़ाह लाइन से बनाए, उनके नीचे आग जलाने हेतु ख़ाली जगह आगे तक चली गई है, आख़िर में धुँआ निकलने की चिमनी है जिनसे धुँआ निकल रहा था। पूरे भारत में करेली मंडी का गुड़ मशहूर है। गुड़ की दो और मंडी श्रीधाम और नरसिंहपुर में चालु हो गईं हैं। मंडी में किसान का गुड़ तीस-पेंतीस रुपए किलो बिकता है वह लोगों तक पहुँचते-पहुँचते सौ रुपए किलो हो जाता है। एक सहयात्री मुंशीलाल भाई  ने एक किलो गुड़ और एक किलो तुअर दाल ख़रीदी, दूसरे जगमोहन भाई ने बीज रहित हल्के हरे रंग के भटे लेकर पिट्ठु बेग में रख लिए।

रास्ते में बहुत से परिक्रमा वासी मिले वे सब के सब कहार, ढीमर, नाई, विश्वकर्मा या पिछड़े वर्ग के थे। कोई भी ब्राह्मण, वैश्य, क्षत्रि, ठाकुर यहाँ तक कि कोई लोधी परिक्रमा शुरू करता या यात्रा करता नहीं मिला। परिक्रमा किसी मन्नत या जन्नत की कामना से की जाती है इसलिए नर्मदा के प्रति अगाध आस्था उनका अवलंबन होता है, उनकी  प्रेरणा होती है। वे लट्ठा कपड़े की दो आधी लुंग्गी, दो आधी बाँह के कुर्ते के साथ उसी कपड़े से सिला दो तरफ़ा लटकन झोला काँधे पर लटकाते हैं, जिसमें दो शीशियों में नर्मदा जल और पूजा का सामान रखा रहता है। एक लोटा और गिलास होना ज़रूरी होता है। हाथ में एक छड़ी जिसे वे सुखनाथ कहते हैं उनका आभूषण है। कई नंगे पैर, कुछ चप्पल और कुछ प्लास्टिक जूते पहने मिले।

नर्मदा की छाती को छलनी करते रेत माफ़िया के कारिंदे दिखे उनसे बातें करने पर रेत माफ़िया कारोबार समझ आया। बीच नदी से रेत निकालने वाले को 250 रुपए, नाव से डंपर में भरने वाले को 200 रुपए मिलते हैं।  एक डंपर के माफ़िया किंग को बाज़ार से 5000 रुपए मिलते हैं। 450 की लागत में 350 का डीज़ल जोड़ लें तो 4200 रुपयों का लाभ एक डंपर पर होता है। ऐसे पाँच फेरों पर 21000 रोज़ाना का धंधा है। पकड़े जाने का कोई डर नहीं क्योंकि पूरा काम दूसरों से कराया जाता है। यदि कारिंदे पकड़े भी गए तो पुलिस, प्रशासन, नेता विधायक किसी को गवाह नहीं बनने देते, कोई अड़ा तो उसकी लाश नर्मदा जी की भेंट चढ़ जाती है, अब प्रेस के लोग भी सक्रिय भागीदार हैं। इस महान देशभक्ति पूर्ण राष्ट्रवाद में दोनों राजनैतिक दलों के नेताओं और कार्यकर्ताओं में आपसी समझ से मिलीभगत विकसित होकर एक तंत्र का रूप ले चुकी है। नेता, पुलिस, अधिकारी, मिडिया इन सभी के परिजन, चंगु-मंगू सरकारी ठेकेदार या बिल्डर-कालोनाइजर्स, इन सभी को मुफ्त के भाव की रेत-गिट्टी-पत्थर-लकड़ी-जमीन मिलती है। इन दबंगों पर हाथ डालने की हिम्मत कौन करे, जो करे वो पिटे, मंत्री का दर्जा प्राप्त कम्प्यूटर बाबा भी नाकाम हैं। छोटी नदियों की बर्बादी के बारे में सोचा भी नहीं जा सकता। चम्बल इलाके में ठाकुर मूंछ पर ताव देकर चम्बल में उत्खनन कर रहे हैं, सालों से रोकने की घोषणाएं हो रही हैं लेकिन होता कुछ नहीं, जो रोकने की हिमाकत करता है उस पर ट्राली चढ़ा दी जाती है। कई पुलिस, सरकारी अधिकारी जान गँवा चुके हैं। सभी नदियों की यही दुर्दशा है। स्वार्थ में अंधे लोग धरती माँ की छाती का सारा दूध निचोड़ कर उसे मरने के लिए छोड़ देंगे। स्थिति वाकई भयावह हैl गर्मियों में जगह जगह नर्मदा जी का प्रवाह रुक जाता है।  बरगी डेम से अमावस्या/पूर्णिमा पर स्नान के लिए पानी छोड़ा जाता हैl अत्यधिक उत्खनन के कारण नर्मदा जी की जल धारण क्षमता कम हो गई है। सहायक नदियों का बारिश के बाद सूख जाना, जंगल की अत्यधिक कटाई जैसे कारक इसके लिए प्रमुख रूप से जिम्मेदार है।

शेर नदी अब तक नरसिंघपुर करकबेल के बीच ट्रेन से घरघराते हुए देखी थी जो लखनादौन के दक्षिणी पूर्वी जंगल में बटका से निकलती है हर्रई जागीर का घेर लगाकर नर्मदा से मिलने नीचे भागती है। रातीकटार गाँव के निकट नर्मदा में मिलती है। उसे नज़दीक से देखा, शेर नदी को नाव से पार किया। जहाँ मिलन होता है वहाँ ऐसा लगा मानो नर्मदा भी उत्तरी तट से दौड़कर शेर को गले लगाने भागती आई है, प्रेम की गहराई का नाप नहीं होता। नर्मदा-शेर मिलन स्थल का संगम बहुत गहरा था। वहाँ से बरमान राजमार्ग पुल दिखने लगा तो यात्रियों में ऊर्जा का संचार होकर क़दम तेज़ हो गए और बारह किलोमीटर की रुकरूक कर यात्रा पाँच घंटों में पूरी करके तीन बजे सतधारा पहुँच गए। जब सारे साथी नहाकर पूजा कर रहे थे, मन-मस्तिष्क में कुछ ऐसे  विचार उभर आए।

हमारा धर्म हमें समग्रता में प्रकृति के प्रति कृतज्ञता प्रकट करना सिखाता है। वैदिक सभ्यता हमें प्रकृति के चर यथा पृथ्वी, अग्नि, अरुण, वरुण, आकाश और इंद्रियों के रूप में हमारे शरीर में मौजूद इन तत्वों के स्वामी मन स्वरुप इंद्र के प्रति यज्ञों से “तेरा तुझको अर्पण” करना सिखाता है। उपनिषद हमें आत्मा-परमात्मा से मिलाकर आध्यात्मिकता की रहस्यमयी दुनिया की दार्शनिक सैर कराते हैं। षठ दर्शन के निचोड़ स्वरुप वेदान्त दर्शन के आधार पर रचे पुराण जन साधारण को यज्ञों की कठिन दुरुह प्रक्रिया से हटाकर और आध्यात्मिकता की तर्क-वितर्क सघनता से बचाकर आश्चर्य जनक क़िस्से कहानियों के माध्यम से कर्म-अकर्म, धर्म-अधर्म, जन्म-पुनर्जन्म और निष्काम कर्म का अभ्यास कराते हुए वेदों के अरुण, वरुण, अग्नि, पृथ्वी, पेड़-पौधों, पशु-पक्षियों और नदियों की पूजा का पाठ पढ़ाते हैं। इसीलिए नर्मदा को देवी मानकर पूजना प्रकृति के प्रसाद जल तत्व जो 70% परिमाण में हमारे शरीर में जीवन की नैया खेता है, के प्रति कृतज्ञता प्रकट करना है। वेदों में वर्णित प्रकृति याने प्रथम-कृति के स्वामी रुद्र पुराणों में शिव हो गए हैं। नर्मदा का हरेक कंकड़ शंकर की तरह पूजनीय हो गया। लोकआस्था के पक्ष में इससे बड़ा कौन सा तर्क हो सकता है। नर्मदा के प्रति पूज्य भावना जीवन के प्रति आस्था की प्रतीक है। हिंदू धर्म कृतज्ञता पर टिका है, कृतघ्नता पर नहीं।  सेमेटिक धर्म के अहमन्य कृतघ्न लोगों ने प्रकृति चरों की उपेक्षा से अपने देशों को सुलगते रेगिस्तान बना लिए हैं, भारत अभी भी सुजलाम-सुफलाम है।

क्रमशः…

© श्री सुरेश पटवा 

भोपाल, मध्य प्रदेश

≈ संस्थापक सम्पादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – पग-पग नर्मदा यात्रा – भाग – ४५ ☆ श्री सुरेश पटवा ☆

श्री सुरेश पटवा

(श्री सुरेश पटवा जी  भारतीय स्टेट बैंक से  सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों  स्त्री-पुरुष “, गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की  (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं  तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व  प्रतिसाद मिला है। अब आप प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकते हैं यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर।)

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7.पग-पग नर्मदा यात्रा

नर्मदा परिक्रमा:दूसरा चरण

समनापुर से पिपरहा 13 नवम्बर 2019

समनापुर पहुँचते-पहुँचते अरुण भाई की पीठ में दाहिनी तरफ़ दर्द होने लगा, समनापूर में जगमोहन भाई ने उनकी पीठ दबाई, अविनाश भाई ने दर्द-नाशक क्रीम लगाकर कंबिफ़्लेम गोली खिलाई। उन्हें आराम लगा, लेकिन दर्द हुआ क्यों?

पहली बात है कि हम केवल पैरों से नहीं चलते बल्कि पूरे शरीर से चलते हैं, दाहिना पैर आगे बढ़ाकर रखते समय पीठ के बाँए तरफ़ की मांसपेशियाँ सक्रिय होतीं हैं, बाँए पैर बढ़ाते समय दाहिना हिस्सा ज़ोर लगाता है। इस प्रकार पीठ भी चलने में थकती है।

दूसरी बात सुबह ख़ाली पेट दस किलोमीटर चलने से शरीर में मांसपेशियाँ में ऊर्जा ख़त्म होती है तो हड्डियों को ज़ोर लगाना पड़ता है, वे दर्द करने लगती हैं।

तीसरा ख़ाली पेट रहने से गैस बनने से भी दर्द होता है।

चौथा नींद पूरी न होने से माँसपेशियों को आराम न मिलने से शरीर में जान नहीं रहती, चलने में थकावट से दर्द हो सकता है।

आपस में चर्चा करके निश्चय किया कि आगे इन बातों का ध्यान रखना होगा। कुछ साथियों ने छोटा धुँआधार नहीं देखा था, वे सुबह छः बजे वहाँ चले गए इसलिए सात बजे निकलने के बजाय आठ बजे पिपरहा के लिए यात्रा शुरू की। खेत में बखर चल जाने से रास्ता बहुत ऊबड़-खाबड़ था उस पर मुसीबत यह कि तीन चौड़े नाले किनारदार पगडंडियों से पार करने पड़े। पहले बम्होरी गाँव पड़ा वहाँ किसान के खेत से गन्ना काट कर खाया। उसके बाद हथिया, झामर, घूरपुर और घाट-पिपरिया होते हुए पिपरहा पहुँचना था।

सुबह आठ बजे पंद्रह किलो वज़न लाद कर चल पड़े दो किलोमीटर चलकर नर्मदा का बहुत सुंदर घाट हथिया घाट आया वहाँ नर्मदा संगमरमर की शिलाओं का निर्माण करते हुए भारी खरखराहट से बह रहीं हैं नहाने योग्य किनारा नहीं है। थोड़ा नाश्ता खाया फिर आगे बढ़े तो चिंकी घाट आश्रम में सेवक ने चाय पिलाई। इसे च्यवन ऋषि का आश्रम स्थान बताया, वे औषधि विज्ञान के प्रणेता माने जाते हैं। च्यवन ऋषि का आश्रम इन भूमध्य सागरीय पर्वतीय वनस्पतियों के बीच होना सही प्रतीत होता है, क्योंकि औषधीय पौधे कर्क और मकर रेखा के बीच ऐसी ही जलवायु में पनपते हैं। उसके बाद झामर गाँव से होते हुए घूरपुर आश्रम पहुँचे। वहाँ एक महाराष्ट्रियन युवक चार महीने से चौमासा बिता रहा रहे हैं। वे निरंतर चिल्ला कर बोलते रहते, शायद अंदरूनी ख़ालीपन को भरने की कोशिश में पूरे ख़ाली होकर समाधि के चरम बिंदु की तलाश में भटक रहे हों। उनसे मिलने लातूर से गाड़ी भरकर एक परिवार आया हुआ था। उनका भोजन तैयार हो रहा था यहां महाराष्ट्र के रत्नागिरी जिले से एक साधु चौमासा कर रहे थे। उनके भक्तों ने भंडारा आयोजित किया था सो पूरन पोली, हलुआ, लड्डू, पूरी, सब्जी, दाल, चावल सब कुछ भरपेट खाया। एक घंटे आराम करके निकल पड़े। रास्ता अत्यंत दूभर था दो साथी तो आसानी से पार कर गए लेकिन तीन साथी भय से थरथराते नाला पार न कर सके। वे ऊपर चढ़कर दो किलोमीटर घूम कर पिपरहा के किनारे पहुँचे। दो साथी छोटा धुँआधार पहुँचे उन्होंने एक घंटे धुँआधार निहारा फिर एक किलोमीटर ऊपर चढ़ कर बिछड़े साथियों से जा मिले। एक निजी धर्मशाला में विश्राम करने रुक गए। थोड़ी देर बाद शरण पाने पाँच परिक्रमा यात्री वहाँ पहुँचे लेकिन जगह की कमी महसूस कर वे गाँव के स्कूल में जाकर रुके। करण सिंह ढीमर ने हमारे भोजन की व्यवस्था कर दी।

कुछ आश्रमों में अहमन्य, अहंकारी और धनलिप्सा में डूबे मठाधीशों के क्रोधी, वैमनस्य और लोभी चरित्र पर एक महाराज जी से चर्चा हुई तो हमने उनसे जानना चाहा कि :- “महाराज! काम, क्रोध, लोभ, मद, मोह और मत्सर इन छः दोषों को हिंदू धर्मशास्त्रों में षठरिपु कहा गया है इनमें से एक भी दोष का लेशमात्र साधु के समस्त ज्ञान वैराग्य को नष्ट करने हेतु पर्याप्त है।”

महाराज बोले “ये सब शास्त्रों में लिखी बातें हैं, ये लोग यम, नियम, संयम और समाधि द्वारा सन्यास की स्थिति तक पहुँचने की विभिन्न दशाओं में भटक रहे हैं, जब उन्हें ज्ञान प्राप्त हो जाएगा तब उनके षठरिपु शांत हो जाएँगे।”

हमने कहा “महाराज गीता तो प्रपंचियों को भी ईश्वर को समर्पण द्वारा मुक्ति का मार्ग बताती है, सांख्ययोग, कर्मयोग, ज्ञानयोग, सन्यासयोग और पतंजलि योग भगवान तक पहुँचने के मार्ग हैं। अंत में भगवान कहते हैं कि मनुष्य कितना भी बड़ा पापी हो लेकिन अंत में सच्ची समर्पित भक्तियोग द्वारा मुझे प्राप्त कर सकता है, अतः मेरी शरण में आओ, मम शरणम ब्रज! क्या ये बाबा बनावटी भक्ति के अज्ञान योग से सम्पत्ति लोभ में डूबे हुए नहीं हैं।”

महाराज ने यह कहकर वार्ता समाप्त की, “शायद आप ठीक कह रहे हैं। संसार में सब प्रकार के लोग होते हैं।”

क्रमशः…

© श्री सुरेश पटवा 

भोपाल, मध्य प्रदेश

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – पग-पग नर्मदा यात्रा – भाग – ४४ ☆ श्री सुरेश पटवा ☆

श्री सुरेश पटवा

(श्री सुरेश पटवा जी  भारतीय स्टेट बैंक से  सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों  स्त्री-पुरुष “, गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की  (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं  तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व  प्रतिसाद मिला है। अब आप प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकते हैं यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर।)

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7.पग-पग नर्मदा यात्रा

नर्मदा परिक्रमा:दूसरा चरण

गरारू घाट से समनापुर 12 नवम्बर 2019

आज कार्तिक मास  की चौदहवीं के चाँद की रात है, आज तक चौदहवीं के चाँद के रूप में रूपहले परदे पर वहिदा रहमान का चेहरा शकील बदायुनी के गीत

और रवि के संगीत की धुन पर मुहम्मद रफ़ी  के दिलकश गायन के साथ गुरुदत्त की अदायगी को जानते थे। सोचा आज नर्मदा के लावण्यमय सलिल प्रवाहित धुन पर चाँदनी को लहरों पर लास्य करते देखेंगे। रात दो बजे कार्तिक पूर्णिमा की खिली चाँदनी में सुवासित वसुन्धरा का अवलोकन किया तो मैथिलीशरण गुप्त लिखित पंचवटी काव्य सहज ही फूट पड़ा।

चारुचंद्र की चंचल किरणें, खेल रहीं हैं जल थल में,

स्वच्छ चाँदनी बिछी हुई है अवनि अम्बर तल में।

पुलक प्रकट करती धरती, हरित तृणों की नोकों से,

मानों झूम रहे हैं तरु भी, मन्द पवन के झोंकों से॥

सोचा यहाँ टेंट में लेटे हुए इतना सुंदर दृश्य है तो नर्मदा के कल-कल जल में चाँदनी का नृत्य लास्य कैसा होगा, हमसे रहा नहीं गया। नर्मदा किनारे पहुँचे तो अलौकिक सौदर्य से स्तब्ध रह गए, ऐसा लगा जीवन को सम्पूर्णता प्राप्त हुई, यदि अभी यमराज आकर चलने को कहें तो चाँदनी के डोले में बैठकर ख़ुशी-ख़ुशी यमलोक चल देंगे। फिर तंद्रा टूटी तो क्या देखा…!

क्या ही स्वच्छ चाँदनी यह, क्या ही निस्तब्ध निशा;

है स्वच्छन्द-सुमंद गंध वह, निरानंद है कौन दिशा?

बंद नहीं अब भी चलते हैं, नियति के कार्य-कलाप,

कितने एकान्त भाव से, कितने शांत और चुपचाप।।

क़रीब एक घंटा शांत और चुपचाप चार चीजें हमसे बतियाती रहीं, नर्मदा, चाँदनी, कलकल ध्वनि और शीतल पवन, ब्रह्म मुहूर्त होने को था,  एक झपकी लेने इन शब्दों को गुनगुनाते वापस लौट पड़े…!

है बिखेर देती वसुंधरा मोती सबके सोने पर,

रवि बटोर लेता है उनको सदा सवेरा होने पर।

और विरामदायिनी अपनी संध्या को दे जाता है,

शून्य श्याम-तनु जिससे नया रूप झलकाता है।

सौंदर्य रसपान के बाद की निद्रा चार बजे नर्मदा उसपार से आती मुर्ग़े की बाँग से टूटी और हम पंचवटी के किरदारों की तर्ज़ पर लोटा भरकर प्रकृतिजन्य निस्तार को निकल गए।

गरारू घाट पर नर्मदा के अद्भुत सौंदर्य के दर्शन होते हैं। पौराणिक मान्यता है कि देवासुर संग्राम के समय गरूड़ देव ने तपस्या की थी, दो आमने-सामने पहाड़ियों पर शिव और गरूड़ मंदिर हैं जिन्हें गौड़ राजा बलवंत सिंह ने सत्रहवीं सदी में इंडो-पर्शियन शैली में बनवाया था। गुंबद व आर्च पर्शियन शैली और तोरण व गर्भगृह भारतीय शैली में बने हैं। असल में जिसे पर्शियन कला कहा जाता है वह पूरी तरह पर्शियन नहीं है, सिकंदर द्वारा पर्शिया याने ईरान को जीतने के बाद ग्रीक मूर्तिकला और भवन निर्माण ईरानी तरीक़ों में घुल मिल गए हैं। गुंबद और आर्च में वही मिलाजुला रूप दिखता है।

सोलहवीं सदी में मुग़ल सेनापति आसफ़ख़ान द्वारा रानी दुर्गावती के पराभव के बाद अकबर ने गोंडवाना को अधीनस्थ करके कराधीन राज्य के रूप में मुग़ल साम्राज्य में मिला लिया जिसकी राजधानी मदनमहल रही आई लेकिन राज्य व्यवस्था गोंडवाना राजाओं के हाथ में रही। मुग़लों को सालाना एकमुश्त रक़म बतौर नज़राना मिल जाती थी। गोंडवाना राजा छोटी रियासतों और जागीरों के माध्यम से राज्य का प्रबंधन और लगान वसूली करता था। फ़तहपुर, मकड़ाई, शोभापुर, देवगढ़, छिन्दवाड़ा और छत्तीसगढ़ी  रियासतें तथा जबलपुर, नरसिंहपुर, होशंगाबाद और छिन्दवाड़ा जिलों में हर्रई जागीर जैसी सैकड़ों जागीरें थीं। राजा बलवंत सिंह मुग़ल दरबार में जाते रहते थे। वे शाहजहाँ के समकालीन थे जो कि मुग़ल स्थापत्य कला का स्वर्णकाल माना जाता है। राजा बलवंत सिंह ने मुग़ल स्थापत्य कला से प्रभावित होकर इन मंदिरों का निर्माण और मरम्मत कार्य करवाया था। इन मंदिरों का रख रखाव अच्छा नहीं है। पहाड़ियों पर शिव और गरूड़ मंदिर से नर्मदा का पूर्व की तरफ़ दस किलोमीटर से पश्चिम में दस किलोमीटर तक प्रवाह का विहंगम दृश्य दिखता है। संभवतः नर्मदा के पूरे प्रवाह में ऐसा नज़ारा सिर्फ़ वहीं से नज़र आता होगा। उत्तरी तट पर बिखरी हरियाली और पेड़ों के प्रतिबिम्ब नर्मदा में झिलमिल करते लुभावने लग रहे थे। पहाड़ियों के दक्षिण में दलहन के पीले खेतों के साथ गन्ने के खेतों के हरियाली बिखेरते नज़ारे थे।

जब हम गरारू घाट से सात बजे चले तब केरपानी घाट पर बना नर्मदा पुल और उसके बारह पाए स्पष्ट दिख रहे थे लेकिन वह पाँच किलोमीटर दूर था। नर्मदा किनारे बखेरे खेतों से पगडंडी पकड़ी कहीं-कहीं स्प्रिंकलर की सिंचाई से मिट्टी गीली होने से रेतीले रास्ते पर चलना पड़ा। तीन नालों की गहराई बड़ी मुश्किल से पार कर पाए। बारह बजे के आसपास केरपानी पुल के नीचे डेरा जमाया वहाँ से दो किसान विधिविधान से अखंड परिक्रमा उठा रहे थे। उन्होंने भंडारा का आयोजन किया था, उसी में भरपेट प्रसादी ग्रहण की। उन दोनों ने कर्मकांड पूरा करके भोजन किया फिर विदाई देने आए साथियों के साथ गाँजे की संगत जमाई।

क्रमशः…

© श्री सुरेश पटवा 

भोपाल, मध्य प्रदेश

≈ संस्थापक सम्पादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – पग-पग नर्मदा यात्रा – भाग – ४३ ☆ श्री सुरेश पटवा ☆

श्री सुरेश पटवा

(श्री सुरेश पटवा जी  भारतीय स्टेट बैंक से  सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों  स्त्री-पुरुष “, गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की  (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं  तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व  प्रतिसाद मिला है। अब आप प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकते हैं यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर।)

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7.पग-पग नर्मदा यात्रा

नर्मदा परिक्रमा:दूसरा चरण

घुग़री से गरारू घाट 11 नवम्बर  2019

घुग़री से आगे बढ़ने के पहले लोगों से आगे के रास्ते के बारे में जानकारी लेने नीचे घाट पर उतरे तो पता चला कि नर्मदा किनारे का रास्ता ख़राब है। बहुत ऊबड़-खाबड़ या कीचड़ मिलेगी इसलिए नहर के किनारे चलने लगे। सुबह जब चलना शुरू करते हैं तब स्फूर्ति से लंबा रास्ता तय करने का प्रयास रहता है लेकिन एकाध किलोमीटर चलने पर माँस पेशियाँ तैयार होतीं हैं परंतु साँस को आराम देने के लिए थोड़ा आराम ज़रूरी रहता है। कोई दो किलोमीटर दूर एक गौड़ परिवार का खुला घर दिखा, नर्मदे हर उद्घोष के बाद रुके। उनका नाम मुन्ना ठाकुर राजगौड़ था, उनके तीन मुस्कुराते निश्छल चेहरे वाले बच्चों से बच्चा बनकर बतियाया, एक बच्चे ने सीताफल खाने को दिया और भैंस का ताजा दूध बासी रोटी के साथ पिया। उसकी बीबी चतुर थी उसने वहाँ 30 रुपए लीटर मिलने वाला दूध का भाव हमसे 40 रुपए लीटर तय करके ठग लिया। हमें कबीर की उलटवासी याद आ गई।

 कबीरा आप ठगाइए, और न ठगिए कोय

आप ठगाए सुख ऊपजे, और ठगे दुःख होय।

वैसे हम भी ठगाए नहीं थे क्योंकि शहरों में 50 रुपए मिलने वाले नक़ली दूध की जगह सामने भैंस से दुहता असली दूध 40 रुपए लिया था। अरुण भाई ने ख़ुश होकर उसे 100 रुपए दिए। इस मामले में अरुण भाई काइयाँ गुज़ारती  न होकर ठेठ बुंदेलखंडी हैं, दिल ख़ुश-तिजोरी फुक्क। मुन्ना ठाकुर राजगौड़ की पत्नी तीन बच्चों की माँ होने के बाद भी स्वाभाविक सुंदर, फ़ुर्तीली व चपल थी, वह मेहनतकश नारी देह की मालकिन थी। उसने शायद ही कभी ब्यूटी पार्लर का मुँह देखा हो जहाँ शहरी औरतें शरीर में क़ैद माँस पिंडों को क्रीम से थ्रेडिंग करवा कर सौंदर्य का आभास ख़रीदती रहती हैं। उनके भोजन में शाकाहार और मांसाहार दोनों हैं। उन्हें बटेर, खरगोश और मछली भोजन हेतु आसानी से मिल जाते हैं। उन्होंने खुलकर हमसे बातें कीं। असल में इंसान प्यार और बातचीत का भूखा होता है, लोगबाग अहंकारी चित्त होने के कारण खुलना नहीं चाहते।

रहीमन पैडा प्रेम को निपट सिलसिली गैल

बिलछत पैर पीपिलि को लोग लदावत बैल।

प्रेम व्यवहार की गली अत्यंत चिकनी फिसलन भरी है, लोग उस पर भी कंधों पर अहंकारी बैल को लादकर चलना चाहते हैं, यह कैसे सम्भव है।

हमारे एक साथी की बवासीर भड़क गई बहुत सारा ख़ून बह जाने से कमज़ोरी स्वाभाविक थी, अविनाश भाई ने उन्हे ग्लूकोज़ का घोल पिलाया लेकिन इसके बावजूद उन्होंने यात्रा करना जारी रखा। रास्ते में एक स्थान पर चढ़ाई करते हुए उन्हें चक्कर आ गया। पुनः खजूर और गुड खिलाया, वे दस मिनट में दुरुस्त होकर चलने लगे। उन्हें समझाया कि ज़्यादा तेज़ चलना ठीक नहीं है। उन्होंने सामान्य गति से चलते हुए नियत यात्रा पूरी की लेकिन आख़िरी दिन सतधारा में नहाते हुए मुँह के बल गिरे, उनकी नाक पर गहरी चोट आई। उन्हें तैरना नहीं आता था। ग़नीमत है कि वे नर्मदा की गहराई में नहीं गिरे वरना बड़ा हादसा हो सकता था। 

नरसिंहपुर जिले का पूरा इलाक़ा लोधियों से आबाद है। लोधी एक बहुत मेहनतकश और जूझारू क़ौम है। खेतों में बेतहाशा मेहनत करते दिखते हैं। चारों तरफ़ गन्ने की दस-बारह फ़ुट ऊँची और पीले फूल से सजी तुअर दाल की फ़सल लहरा रही थी। एक खेत में एक लोधी किसान उसकी पत्नी और दो पुत्र सहित आलू की बौनी कर रहे थे। उन्होंने बताया छोटे अंकुरित आलुओं की ख़रीद नरसिंघपुर से करके लाए हैं। चार भैंसों का गोबर इकट्ठा करके खाद बनाकर क्यारियों में पहले खाद बिछाते हैं फिर अंकुरित आलू रखकर मिट्टी से पूर देते हैं। एक आलू से दस-बारह आलू उपजते हैं। आलुओं की बातों में हमने धीरे से बात ऊठाई कि यार आलू चिप्स के साथ चाय मिल जाती तो मज़ा आ जाता। कहने भर की देर थी, किसान की पत्नी चाय बना लाई। किसान ने बताया कि किसानी से घर का ख़र्च मुश्किल से निकलता है। किसान की क़िस्मत छलनी में दूध छानने जैसी है। अच्छी फ़सल आए तो दाम गिर जाते हैं और फ़सल ख़राब हो जाए तो लागत नहीं निकलती है। आदर्शवादियों ने “किसान को अन्नदाता बताकर” उसकी आशान्वित समृद्ध सम्भावनाओं को निरस्त कर दिया। व्यापारियों और कारोबारियों के हाथों किसान दोहरे शोषण के शिकार हैं, वे एक तरफ़ खाद, बीज, कीटनाशक और उपकरणों की क़ीमत बढ़ाकर भारी मुनाफ़ा कमाते हैं वहीं दूसरी तरफ़ किसान के उत्पाद अनाज मंडी, फल मंडी,  सब्ज़ी मंडी में औने-पौने में ख़रीद कर तिजोरी भरते हैं। इस शोषण तंत्र को किसान-नेता और कारोबारियों का नेतृत्व राजनैतिक दबंगई  से किसान हितैषी बनकर बड़ी कुशलता पूर्वक चलाते हैं, वे किसानों की ऋण माफ़ी का आंदोलन करके उन पर अहसान का बोझ डालकर वोट-बैंक पक्का कर सत्ता के भागीदार हो शोषण तंत्र अनवरत चलाते रहने में सफल हैं। किसान अब सिर्फ़ किसान नहीं बना रहना चाहता वह यूरोप और अमेरिकी किसानों की तर्ज़ पर यथार्थवादी कारोबारी बनना चाहता है, लेकिन कारोबारी शोषण तंत्र का शिकंजा उसे साँस नहीं लेने देता उसका दम घुटते रहता है किसानों की मानसिक प्रताड़ना की भयावहता आए दिन उनकी आत्महत्या  की घटनाओं से समझी जा सकती है। स्वार्थी और कलुषित मनुष्यों का षड़यंत्रकारी तंत्र देखिए किसान को अन्नदाता कहकर भिखारी और क़र्ज़ न चुकाने वाला बेईमान बना दिया और महिलाओं को देवी बताकर उनकी इज़्ज़त लूट साक्ष्य मिटाने हेतु जलाने लगे। 

गरारू घाट के एक आश्रम में पहुँचने पर एक अद्भुत स्वामी जी के दर्शन हुए। वे बंगाली स्वामी पहुँचते से ही बोले यहाँ जगह नहीं है, आप लोग चाय पीजिए और आगे मंदिर पर रुकने का इंतज़ाम कीजिए। हमने कहा “स्वामी जी यहाँ रुकते तो आपसे वेदांत ज्ञान लेते।” उन्होंने डाँटते हुए कहा वेदांत जानने के लिए एक-दो साल भी कम है फिर तुरंत पैंतरा बदल कर बोले “ब्रह्म क्या है, हम, तुम सबमे यहाँ तक कण-कण में ब्रह्म है, आपको जानकारी मिल गई न, अब आप स्वयं पढ़ो और जानो, आप आगे जाओ।” हमने कहा “स्वामी जी ज्ञान हेतु गुरु का माध्यम ज़रूरी है।” वे फुफकारते हुए बोले बाबा “लो चाय पीओ आगे बढ़ो।” बाद में अगले दिन उनके एक सेवक ने बताया कि बंगाली बाबा अपने व्यवहार के लिए दुखी हो रहे थे।

तक़रीबन एक किलोमीटर पहाड़ी चढ़कर ऊपर पहुँचे वहाँ एक कथा वाचक का पंडाल लगा था उनके सेवक नरेश लोधी ने स्वागत किया और खुले में टेंट में सोने की जगह दे दी। रात में एक भद्र महिला द्वारा भेजे दूध में अविनाश भाई का पोहा शक्कर मिलाकर खाकर सोने की कोशिश की तब नर्मदा के बहाव की ध्वनि सुनाई दी, पूरे खिले चाँद की चटक चाँदनी में दूर से आती कलकल मद्धिम ध्वनि लोरी सी लग रही थी। सोने के पूर्व प्रयास भाई ने कविताएँ सुनाईं। दो-चार जुगलबंदी हमने भी बांचीं।

क्रमशः…

© श्री सुरेश पटवा 

भोपाल, मध्य प्रदेश

≈ संस्थापक सम्पादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – पग-पग नर्मदा यात्रा – भाग – ४२ ☆ श्री सुरेश पटवा ☆

श्री सुरेश पटवा

(श्री सुरेश पटवा जी  भारतीय स्टेट बैंक से  सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों  स्त्री-पुरुष “, गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की  (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं  तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व  प्रतिसाद मिला है। अब आप प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकते हैं यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर।)

? यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – पग-पग नर्मदा यात्रा – भाग- ४२ ☆ श्री सुरेश पटवा ?

7.पग-पग नर्मदा यात्रा

नर्मदा परिक्रमा:दूसरा चरण

साँकल  से घुग़री 10 नवम्बर 2019

जबलपुर जिले की सीमा तक सतपुड़ा नर्मदा का बायाँ हाथ पकड़े हुए चलता है धरतीकछार गाँव के नज़दीक सनेर नदी संगम पर सतपुड़ा नर्मदा का हाथ छोड़कर आज़ाद कर देता है। झाँसीघाट से साँकल घाट तक नर्मदा स्वतंत्र प्रवाहित होती है फिर दमोह जिले से विन्ध्याचल आकर नर्मदा का दाहिना हाथ हीरापुर रेंज के रूप में बढ़कर थाम लेता है। यदि विन्ध्याचल महाशय रास्ते में न आते तो नर्मदा रायसेन जिले से होती हुई भोपाल जिले निकल जाती या बेतवा से  मिलकर यमुना से भेंट करके गंगा से गले मिल गंगासागर में एकाकार हो जाती। साँकल से अविनाश बेहतरीन फ़ोटोग्राफ़ी के लिए अपना केमरा सभी के लिए भोजन, दवाई और विभिन्न खाद्य वस्तुएँ और हमारा चार्जर, चड्डी और बानियान लेकर जुड़ गए। 

अब हम लोग बरगी बाँध से आती नहर के किनारे-किनारे चलते हुए गुड़वारा पहुँचे। गाँव का नाम गुड़वारा बिलकुल सही है क्योंकि वहीं से करेली तहसील शुरू होती है चारों तरफ़ गन्ने के खेतों का सिलसिला पूरे इलाक़े में नज़र आता है। गुड़वारा के पहले एक किसान कैलाश दांगी किसानी का काम करते मिले उन्होंने हमें चाय पीने का निवेदन किया हम लोगों ने तत्काल उनके निवेदन को स्वीकार कर लिया उनके निवास स्थान पर उनके साथ चाय पीने के लिए चल दिए। उनका लड़का आईपीएस परीक्षा की तैयारी इंदौर में रहकर कर रहा है, वह गांव आया था उसके साथ उनका एक दोस्त भी आया हुआ था तीन-चार दिन पहले उनका दोस्त नर्मदा में स्नान के लिए उनके साथ गया और वह गहरे पानी में डूबने से उसकी मृत्यु हो गई इसलिए इस परिवार के सभी लोग दुःखी थे। उनके घर पहुँचकर चाय ग्रहण की, बरंडा में एक बड़ी गागर में इलेक्ट्रिक मथनी से मक्खन निकाला जा रहा था उसमें से निकला मही दो लीटर की बोतल में भरवा कर चल पड़े। जो दोपहर की बाटी-दाल के बाद गटक लिया। गुड़वारा से उतरकर नीचे नर्मदा घाट पर पहुँच स्नान करके साँकल से जुड़े नए साथी अविनाश दवे के द्वारा लाईं मैथीपूड़ी आँवला आचार के साथ खाईं और चल पड़े अगली मंज़िल की ओर, रास्ते में बुधघाट में एक किलोमीटर ऊँची पहाड़ी चढ़कर एक आश्रम पहुँचे वहाँ पड़ी कुर्सियों पर बैठ गए। एक सेवक ने पानी पिलाया। थोड़ी देर में साधु लिबास में शैतान नज़र आया, उसने आते ही घुड़कियाँ देनी शुरू कीं, और साफ़तौर से कह दिया कि न आप यहाँ नहा सकते हैं और ना भोजन परसादी की कोई व्यवस्था है। हम लोग नीचे उतर कर अगले पड़ाव की खोज में चल दिए। शाम को पाँच बजे घुग़री पहुँचे। जिस घाट रुकने की सोचते हैं वहीं घाट पर दो-तीन कुत्ते स्वागत करते हैं, फिर वे आपके साथ आश्रम तक आकर वहीं अड्डा जमा लेते हैं मानो हम उनके पाहूँने हों। दूसरे दिन सुबह थोड़ी दूर विदाई देने साथ आते हैं। साधु लिबास में शैतान से कुत्ते समझदार हैं, बेचारे स्वागत-विदाई में पूँछ हिलाते हैं।

घुग़री में एक परकम्मा कर चुके बम-बम बाबा के नाम से आश्रम चलाते हैं। वे गाँव से दान लेकर भोजन का सामान देते हैं। उन्हें मेहनताना पर भोजन बनाने की बात कही तो वे आटा-दाल एक गौंड़ के घर दे आए। आठ बजे भोजन बनकर आया तब ग्रहण किया। आश्रम के सामने चार विशाल बट वृक्ष आश्रम को एक छतरी की तरह ढँके हुए है, वृक्षों के पत्तों से छनकर आती चाँदनी की रोशनी एक अजीब सी रूमानियत पैदा कर रही थी, लिहाज़ा परकम्मा वासियों का प्रेमिल हृदय गीत-ग़ज़ल की लहरियों में गोते खाने लगे।

पिछले बीस-पच्चीस सालों में भारत के गाँवों का जीवन तेज़ी से बदला है। खेतों को बैलों से बखरने  और बैलगाड़ी की जगह ट्रैक्टर और लोडिंग वाहन ने ली है, हरेक किसान के घर एक-दो मोटर साइकिल और समृद्ध किसानों के पास जीप-कार आ गईं हैं। पुरुषों के पहनावे से धोती-क़मीज़ या कुर्ता ग़ायब हो चुके हैं। उनकी जगह जींस टी-शर्ट स्पोर्ट बानियाँन ले चुके हैं। लड़कियाँ जींस टाप पर आ गईं हैं। लड़के-लड़कियाँ आपस में खुले हैं, अब वे आपस में बातचीत करने लगे हैं। सरकारी स्कूल में सह-शिक्षा और मध्याह्न भोजन से खुलापन आया है लेकिन विकृति नहीं आई है इसका कारण घरों का सांस्कृतिक वातावरण और धार्मिक आस्था में पिरोए नैतिक मूल्य है।

क्रमशः…

© श्री सुरेश पटवा 

भोपाल, मध्य प्रदेश

≈ संस्थापक सम्पादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – पग-पग नर्मदा यात्रा – भाग – ४१ ☆ श्री सुरेश पटवा ☆

श्री सुरेश पटवा

(श्री सुरेश पटवा जी  भारतीय स्टेट बैंक से  सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों  स्त्री-पुरुष “, गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की  (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं  तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व  प्रतिसाद मिला है। अब आप प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकते हैं यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर।)

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7.पग-पग नर्मदा यात्रा

नर्मदा परिक्रमा:दूसरा चरण

ब्रह्मकुण्ड से साँकल 09 नवम्बर 2019

पौराणिक मान्यता है कि देवासुर संग्राम के पहले देवताओं ने ब्रह्मकुंड पर तपस्या की थी दैवीय  शक्तियों से दुर्गा देवी का प्रकट आविर्भाव हुआ था। दस किलोमीटर आगे भैंसा नामक गाँव है उसी के पास मुआर घाट पर देवी-भैंसासुर संग्राम हुआ था जहाँ देवी ने भैंसासुर का वध में किया था। ब्रह्मकुण्ड में देवासुर संग्राम के दौरान ब्रह्मा का वास रहा था।

ब्रह्मकुण्ड से चले एक घंटा हुआ था कि विंध्य पर्वत की भांडेर पर्वत श्रेणी के कगार से उत्तरी तट पर हीरापुर के नज़दीक हिरन नदी खरखराती आकर नर्मदा में समा गई। हिरन नदी जबलपुर जिले के कुंडम के निकट से निकलती है, दमोह जिले के तेंदुखेड़ा और सागर जिले के नौरादेही से कई नाले और बेलकुंड, सोहर और कैंर को समेटते परिअत नदी उसमें आ मिलती है। हिरन नदी जबलपुर जिले और नरसिंहपुर जिले की सीमा निर्धारित करती है।

सुबह आठ बजे साँकल के लिए रवाना हुए एक दिन पहले की थकाऊ यात्रा के बाद थोड़ा आराम से चलने का निर्णय लिया। धीरे-धीरे चलना शुरू किया पहले बरगी से आती नहर के किनारे चलने लगे लेकिन एक राहगीर के सुझाव पर नर्मदा के तट पर उतर गए। रास्ता ऊबड़-खाबड़ और कीचड़ सने खेतों से था, सामने से चमकते सूर्य की बढ़ती गर्मी मुश्किल बढ़ा रहीं थीं, शरीर पसीने से तरबतर माँसपेशियाँ लस्तपस्त हो चुकीं थीं, ऐसे में साँकल सराय जाने के लिए एक किलोमीटर की तंग पहाड़ी सामने आ गई। पाँच मिनट हाँफती साँस को थामा फिर चढ़ने लगे और आधा घंटे की चढ़ाई के बाद एक मकान पर धर्मशाला लिखा दिखा वहाँ पहुँचे तो पता चला कि रामप्रसाद साहू ने परकम्मा वासियों के लिए धर्मशाला बनाई है। एक कमरा खोला उसमें आमने सामने दो दरवाज़े थे और चारों कोनों में गेहूँ के बोरों की छल्ली लगी थी। अस्सी वर्षीय रामप्रसाद साहू से मुलाक़ात हुई उनके पोते-पोतियाँ आ गए। उन्होंने स्वागत करके भोजन इत्यादि के लिए आश्वस्त करके पोती को बुलाकर उनकी माँ को भोजन की व्यवस्था करने को कहा। थोड़ी देर बाद जनानख़ाना से ख़बर आई कि “मम्मी कल ग्यारस उपासी थीं, आज शनीचर उपासी हैं उनने कही है कि वे थकीं हैं न बना पाएँगी।” रामप्रसाद आँखों में पानी भरकर बोले बाबा हम परवश हैं आप सीधो लेकर बना लो। क़रीब दो घंटे बाद एक गोल लौंकी परांत में हँसिए के साथ डोलती आई, हमें हाथ आजमाते देख दादा की बहु पल्लू में मुस्कुराते हुए  बोली, रहन दो बाबा हम बनाए दे रहे। चार बजे तीस रोटियों के साथ सब्ज़ी बनकर आ गईं। हरेक ने चार-चार रोटियाँ लौकी साग के साथ साफ़ कीं और दो-दो रोटियाँ बचाकर रखीं जिन्हें रात को आठ बजे दूध-गुड़ से खाईं। इस प्रकार लंच-डिनर दोनों सध गए, एकै साधे सब सधे, सब साधे सब जाए।

रात में रामप्रसाद साहू बोले “लोधी घमंडी हैं धर्मशाला के सामने हैंडपम्प नहीं लगने दे रहे,  अपने खेतों के बीच में पड़ने वाली ज़मीन को किसी भी तरह धौंस धपट से ख़रीद कर एक चक बना लेते हैं। नरसिंहपुर जिले की अस्सी प्रतिशत ज़मीन उनके स्वामित्व में है।” लोधियों का थोड़ा परिचय लेते चलें। लोधी (लोधाया लोध) भारत में पायी जाने वाली एक किसान जाति है। ये मध्यप्रदेश में बहुतायत में पाये जाते हैं, मुस्लिम आक्रमण और प्रताड़ना से तंग आकर पहले विस्थापित होकर पश्चिमोत्तर सीमा से उत्तर भारत, फिर नर्मदा घाटी में आ बसे है। नरसिंहपुर जिले में लोधी हैं परंतु होशंगाबाद जिले में वे नदारत हैं, वहाँ रघुवंशी, गूज़र अधिक हैं। लोधी ‘अन्य पिछड़े वर्ग’ की एक जाति है, परंतु इस जाति के लोग राजपूतो से संबधित होने का दावा करते हुए ‘लोधी-राजपूत’ कहलाना पसंद करते हैं। जबकि, इनके राजपूत मूल से उद्धृत होने का कोई साक्ष्य नहीं है और न ही इन लोगो में राजपूत परंपराए प्रचलित है। हमने आठ-दस किसानों से पूछा राजपूतों की उत्पत्ति सूर्य से, जैसे राम का इक्ष्वाकु वंश सूर्यकुल से उत्पन्न हुई या कृष्ण का यादव वंश चंद्रकुल से आया है,  उनकी सिलसिलेवार वंशावली मिलती है। लोधियों की उत्पत्ति सूर्य या चंद्र, किससे हुई है। उन्होंने बताया कि लोधी ठाकुर हैं, बस इतना जानते हैं। असल में, वे पिछड़ा वर्ग का लाभ लेते हैं इसलिए खुलकर नहीं बोलते। ब्रिटिश शासन के एक प्रशासक, रोबर्ट वेन रुसेल ने लोधी शब्द के कई संभव शाब्दिक अर्थों का जिक्र किया है, उदहरणार्थ लोध वृक्ष के पत्तों से रंगो का निर्माण करने का कार्य करने के कारण ये लोग लोधी कहलाए। रुसेल ने यह भी कहा है कि ‘लोधा’ मूल शब्द है जो कि बाद में मध्य प्रदेश में ‘लोधी’ में रूपांतरित हो गया। एक अन्य सिद्धान्त के अनुसार, लोधी अपने निवास अफ़ग़ानिस्तान से पंजाब के लुधियाना में आकर बसे फिर मुस्लिम आक्रमणों से परेशान होकर गंगा-यमुना के दोआब गए वहाँ वे लुधियाना के नाम से लोधी कहलाए। ब्रिटिश स्रोतो में लोधियों को उत्तर भारत से विस्थापित होना बताया गया है,जहाँ से यह लोग मध्य भारत में आ बसे। ऐसा करने में उनके सामाजिक स्तर का उत्थान हुआ, और यह लोग ब्राह्मण, बनिया व राजपूत आदि से नीचे के स्थानीय शासक तथा जमीदार बने। इनमे से कुछ बड़े जमींदार ‘ठाकुर’ की पदवी पाने में सक्षम रहे, तथा दमोह व सागर जिलो में कुछ लोधी परिवारो को पन्ना के शासक द्वारा राजा, दीवान व लंबरदार करार दिया गया। इस तरह शक्तिशाली बने लोधियों ने बुंदेला उत्थान में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। 1857 कि क्रांति मे, लोधी भारत के विभिन्न भागो में अंग्रेज़ो के खिलाफ लड़े। हिंडोरिया रिसायत के लोधी तालुकदार जिले के मुख्य कार्यालय की तरफ कूच करने व खजाने को लूटने में शामिल थे, जबकि शरपुरा के लोधियों ने स्थानीय पुलिस को खदेड़ दिया व उन्होने घुघरी गाँव को भी लूटा। मध्य प्रदेश के नरसिंहपुर ज़िले में हीरापुर का प्राचीन राजघराना है। इसको पहले हीरागढ़ के नाम से जाना जाता था। इस वंश के पूर्वत राजा जगन्नाथ सिंह महदी माता के उपासक थे। इसीलियें ये महदेल लोधी कहलाये। हिन्डोरिया (दमोह) में लोधी वंशजों की एक प्राचीन गढ़ी है, जिसमें लोधी राजवंश के उत्तराधिकारी निवास करते हैं। इलाक़े में आज़ भी उनका मान सम्मान क़ायम है। नरसिंहपुर जिले में लोधी परिवार बहुतायत में हैं। कृषि से प्राप्त आय का बड़ाभाग कोर्ट-कचहरी वकीलों को हर साल देते आ रहे हैं।

शाम को कम्युनिस्ट विचारधारा पर प्रयास जोशी से बातचीत चल निकली, काल मार्क्स के साम्यवादी विचार से बोल्शेविक क्रांति में ज़ारशाही के अंत से बात ईसाइयत से होती हुई यहूदी और इस्लाम के मूल सिद्धांतों पर आ गई। प्रयास सहित सभी लोग बड़े तल्लीन होकर सुन रहे थे। उसी दिन बाबरी मस्जिद का निर्णय आया था अरुण भाई ने बातचीत सख़्ती से बात बंद करवा दी, उन्हें डर लगा कि कहीं कोई विडियो बनाकर दंगे  न भड़का दे। जबकि ऐसी किसी सम्भावना का दूर तक अतापता नहीं था, न तो कोई विडियो बना रहा था और न ही वहाँ मुस्लिम कम्यूनिटी थी। उसके विपरीत टेलीविजन पर और अख़बारों में निर्णय की चीरफाड़ में अधिक ख़तरनाक बहसें हो रहीं थीं, लेकिन डर का इलाज हकीम लुकमान के पास भी नहीं था। तभी चंगेज़ खान के पोते उलूग ख़ान की पच्चीस हज़ार फ़ौज ने डरे हुए बग़दाद के ख़लीफ़ा व उसकी दो लाख अजेय फ़ौज को हरा ख़लीफ़ा को बोरे में बाँधकर पटक-पटक कर मारा था क्योंकि ख़लीफ़ा का ख़ून ज़मीन पर गिरता तो क़यामत बरपा हो जाती, डर है ही ऐसी चीज़, जीतने और हारने वाले दोनों डरे रहते हैं। असल बिंदु पर बात आने वाली थी कि कम्युनिस्ट और मुस्लिम किसी देश को अपना नहीं मानते क्योंकि पूरी दुनिया में कम्यूनिज्म और इस्लाम फैलाना उनका धर्म है इसलिए उनकी ईमानदारी रूस-चीन  और मक्का से जुड़ी रहती है, कम्युनिस्ट धर्म को अफ़ीम मानते हैं लेकिन इस्लाम की कट्टर सोच  के विरुद्ध एक भी शब्द नहीं बोलते, दोनों लोकतंत्र पसंद नहीं करते एक सीरिया सी इस्लामिक स्टेट की तानाशाही तो दूसरा रुस सी सर्वहारा-वर्ग की तानाशाही की वकालत करते हैं, परंतु अरुण भाई ने बुरी तरह डाँट कर बात बंद करा दी। सब चुप हो गए, लम्बी चुप्पी के बाद बात के विषय को बदल दिया।   

रात को रामप्रसाद साहू के परिवार के साथ वाल्मीकि  रामायण, तुलसी कृत रामचरितमानस पर आधुनिक संदर्भ पर चर्चा हुई जिसमें बच्चों को शास्त्रों के शाश्वत मूल्य और सामयिक मूल्य का अंतर समझाया कि क़ुरान या बाइबिल के मानने वालों की तरह हिंदु 1500-2500 सालों पहले के सामाजिक मूल्यों से नहीं चिपके रहते, वे समाज की प्रगतिशीलता से तालमेल बिठाकर नई मानसिकता से नई सामाजिक व्यवस्था गढ़ना जानते हैं।

क्रमशः…

© श्री सुरेश पटवा 

भोपाल, मध्य प्रदेश

≈ संस्थापक सम्पादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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