श्री सुरेश पटवा
(श्री सुरेश पटवा जी भारतीय स्टेट बैंक से सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों स्त्री-पुरुष “, गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व प्रतिसाद मिला है। अब आप प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकते हैं यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर।)
यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – भोपाल से गोवा यात्रा- १ – भाग- ५२ ☆ श्री सुरेश पटवा
- भोपाल से गोवा यात्रा
मचलती लहरों का लास्य
एक नज़दीकी मित्र विगत कुछ दिनों से गोवा में प्रतिनियुक्ति पर कार्यरत रहे हैं। वे बहुत दिनों से गोवा घूमने के लिए बुला रहे हैं। हम भोपाल में व्यस्तताओं के कारण नहीं जा पा रहे थे। बीस से छब्बीस जनवरी 2022 तक फ़ुरसत का समय था। श्रीमती को बैंक से छुट्टियाँ नहीं मिलीं इसलिए सौम्या बिटिया के साथ गोवा की पाँच दिवसीय यात्रा पर 19 जनवरी 2022 को मंगला एक्सप्रेस से गोवा के लिए निकल लिए।
पर्यटन को मौजमस्ती समझने वालों की इस दुनिया में कमी नहीं है। अकसर गोवा का नाम आते ही शराब याने नशा, सर्फ़ याने समुद्री लहर, सैंड याने रेतीला किनारा और सेक्स याने रंगीन रातों का मज़ा सैलानियों के दिलोदिमाग़ में घूमने लगता है। लेकिन पर्यटन केवल मौजमस्ती नहीं है। हाँ, मौजमस्ती पर्यटन का एक हिस्सा हो सकती है। गोवा का भूगोल, इतिहास, संस्कृति और मिलीजुली जीवन शैली जाँचना-परखना भी वहाँ के पर्यटन का हिस्सा है।
रेल्वे एप पर ट्रेन बीस मिनट देरी से बता रहा था। भोपाल स्टेशन पर ट्रेन रवानगी के नियत समय पर पहुँच गए। ट्रेन डेढ़ घंटा लेट हो गई। अक्सर जब ट्रेन लेट होती है तो लोग परेशान होने लगते हैं। जबकि प्लेटफ़ार्म पर बच्चे जवान बूढ़ों की रेलमपेल अपने आप में मनोरंजक होती है। कुलियों और बैंडरों की हरकतों एवं चुहलबाज़ी का मज़ा भी लिया जा सकता है। प्लेटफ़ार्म पर बैठे-बैठे गोवा के इतिहास को याद करने लगे। ट्रेन हज़रत निज़ामुद्दीन से चलकर एर्नाकुलम याने पुराने समय के कोचीन बंदरगाह तक जाती है। एर्नाकुलम से याद आया कि प्रसिद्ध पुर्तगाली नाविक वास्को डी गामा की तीन भारतीय यात्राओं (1497–99, 1502–03, 1524) ने पश्चिमी यूरोप से बरास्ते केप ऑफ गुड होप भारत की ओर समुद्री मार्ग खोल दिया था। उसकी मृत्यु 24 दिसंबर, 1524 को एर्नाकुलम में ही हुई थी।
दुनिया में लम्बी दूरी की समुद्री यात्राओं की शुरुआत आठवीं सदी से होती है, जब यूरोप और अमेरिका महाद्वीपों के मध्य समुद्री जहाज़ों से आवागमन आरम्भ हुआ था। समुद्री यात्राओं की तकनीक और हवा की दिशाओं की सबसे पहली जानकारी “वाइकिंग” समुद्री डाकुओं को हुई थी। उन समुद्री डाकुओं से निपटने की प्रक्रिया में अंग्रेज, पुर्तगाली, डच, फ़्रेंच, नीदरलैंड निवासी जहाज़ बनाने और समुद्री यात्राओं में पारंगत होते चले गए। उनके राजाओं ने उन्हें धन और आश्रय देकर प्रोत्साहित किया। दुनिया में साम्राज्यवाद की शुरुआत उसी समय से हुई। यूरोप में औद्योगिक क्रांति की शुरुआत हो रही थी। सभ्रांत वर्ग पनप रहा था। जिन्हें माँस पकाने हेतु भारतीय मसालों की ज़रूरत होती थी। उस समय दक्षिण भारतीय मसालों के कारोबार पर अरबी मुसलमानों का क़ब्ज़ा था।
यूरोपीय लोगों ने लंबे समय तक सिल्क रोड से दक्षिण पूर्व एशिया और चीन के लिए एक सुरक्षित भूमि मार्ग का आनंद लिया था। मुसलमानों द्वारा 1453 में कॉन्स्टेंटिनोपल में रोमन साम्राज्य के पतन के साथ सिल्क रोड ईसाई व्यापारियों के लिए बंद कर दिया गया। उन्होंने मसाला व्यापार से लाभ की उम्मीद में इंडीज (भारत) के लिए एक पश्चिमी समुद्री मार्ग की तलाश करने की योजना तैयार की। कई राज्यों में लगातार पैरवी के बाद स्पैन कैथोलिक साम्राज्ञी इसाबेला और किंग फर्डिनेंड-II कोलंबस की समुद्री यात्रा को प्रायोजित करने के लिए सहमत हुए।
कोलंबस 1492 ई. में स्पेन से सुदूर पूर्वी एशिया यानी भारत, चीन, जापान तक पहुंचने का सबसे आसान रास्ता खोजने के लिए जलमार्ग से रवाना हुआ था। कोलंबस 1492 में भारत की खोज में निकला। उसने उत्तरी अमेरिका के पूर्वी किनारे को ही इंडिया समझ कर लंगर डाल दिया। अटलांटिक महासागर में लंबे समय तक नौकायन करने के बाद उसने एक नई दुनिया अमेरिका खोज निकाली। उस समय तक दुनिया में अमेरिका की कोई खास पहचान नहीं थी। जब वास्को डी गामा 1499 में कालीकट से वापस पहुँचा तब पता चला कि कोलंबस का खोजा इंडिया असली नहीं था। पश्चिमी द्वीप समूहों को वेस्ट इंडीज़ और कोलंबस की खोजी तथाकथित इंडिया को अमेरिका नाम दिया गया।
यह सब पढ़ते-सोचते ट्रेन की बर्थ पर नींद में समा गए। 20 जनवरी 2022 की सुबह ट्रेन कल्याण पहुँच गई। कल्याण एक बहुत पुरानी बसावट है। यह भारत के पश्चिम तट पर प्राचीन काल के प्रमुख प्रायद्वीपीय व्यापारिक नगरों में से एक रहा है। इस नगर का उल्लेख ‘पेरिप्लस ऑव द एरिथ्रियन सी’ नामक ग्रंथ में कैलियाना के नाम से मिलता है। 124 ईसवी के जुन्नार अभिलेख के अनुसार कल्याण विदेशी व्यापार का महत्त्वपूर्ण बन्दरगाह एवं नगर था। छठी शताब्दी ईस्वी के एक ग्रीक लेखक के अनुसार कल्याण उस समय के छ: प्रसिद्ध व्यापारिक केन्द्रों में से एक था। कल्याण से काँसा, लकड़ी एवं वस्त्र का व्यापार होता था। 1536 ई में इस पर पुर्तगालियों ने अधिकार कर लिया।
माना जाता है कि ‘कल्याण’ नाम सद्गुरु समर्थ रामदास स्वामी के एक महान शिष्य कल्याण स्वामी से पड़ा, जो श्री दुर्गाडी किले पर दुर्गा देवी मंदिर पहुंचे थे, जिसे श्री छत्रपति शिवाजी महाराज ने जीता था और किले को नौसेना स्टेशनों के रूप में अच्छी तरह से इस्तेमाल किया गया था। मंदिर को हिंदुओं द्वारा कई बार पुनर्निर्मित किया गया है। ब्रिटिश भारत में कल्याण वर्तनी Kallian , Cullian , Callian और कभी-कभी Callianee नाम से जाना जाता रहा है। इसने पुर्तगाली और ब्रिटिश सहित विभिन्न विदेशी सेनाओं के हमले देखे हैं।
कल्याण के पूर्व में आज की बम्बई के वे सात द्वीप थे। जिन्हें मिट्टी और कचरा से पाट कर आधुनिक मुंबई महानगर बना है। जिसे पुर्तगाली राजकुमारी कैथरीन की शादी इंग्लैंड के राजशाही पुत्र फ़िलिप्स-॥ से करने के अवसर पर इंग्लैंड को दहेज में मिला था। इंग्लैंड ने उसे दस पोंड़ प्रतिवर्ष के भुगतान पर ईस्ट इंडिया कम्पनी को किराए पर दे दिया था। 1674 ई. में छत्रपती शिवाजी महाराज ने अंग्रेज़ों को यहाँ एक फैक्ट्री स्थापित करने की इजाजत दी थी। 1780 ई. में कल्याण पर अंग्रेज़ों का अधिकार हो गया। 1947 में सिंध से आए सिंधियों के एक बड़े हुजूम ने कल्याण के नज़दीक डेरा डाला और बस गया “उल्हासनगर नगर” जहां के बने माल पर “Made in USA (Ulhasnagar Sindhi association)” का ठप्पा बड़ा क़ीमती होता है। सामान की क़ीमत कई गुना बढ़ जाती है। ख़ैर हम तो वास्को डी गामा की रोचक कहानी बता रहे थे।
वास्को डी गामा ने 20 मई 1498 को मालाबार तट पर कालीकट पहुंच स्थानीय मछुआरों को जहाज पर आमंत्रित कर तुरंत कुछ भारतीय सामान खरीद लिया। उस समय वह इलाक़ा ज़मोरिन राजा के अधीन था। मछुआरों के साथ एक पुर्तगाली को बंदरगाह भेजा गया। वह एक ट्यूनीशियाई मुसलमान से मिला। जिसकी सलाह पर गामा ने अपने कुछ आदमियों को कालीकट के शासक ज़मोरिन से मिलकर कारोबारी अनुमति प्राप्त करने के लिए पोन्नानी भेजा। अरब व्यापारियों की आपत्तियों के बावजूद गामा कालीकट के शासक ज़मोरिन से व्यापारिक रियायत पत्र प्राप्त करने में कामयाब रहा। उस समय भुगतान का एकमात्र साधन सोना होता था। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा का अविष्कार नहीं हुआ था। भारतीय माल की दुनिया में खपत के कारण दुनिया भर का सोना भारतीय कारोबारियों के पास पहुँच जाता था। भारत सोने की चिड़िया कहलाता था। पुर्तगाली निर्धारित सीमा शुल्क और उसके माल की कीमत का भुगतान सोने में करने में असमर्थ थे। इसलिए कालीकट के अधिकारियों ने भुगतान के लिए सुरक्षा के तौर पर गामा के पुर्तगाली एजेंटों को अस्थायी रूप से हिरासत में ले लिया। बदले में गामा कालीकट के कुछ मूल निवासियों और सोलह मछुआरों को बलपूर्वक अपने साथ पुर्तगाल ले गया। गामा का अभियान सभी उचित अपेक्षाओं पर सफल रहा, उनकी कमाई का लाभ अभियान की लागत का साठ गुना अधिक था।
उसके बाद दूसरे अभियान के तहत पेड्रो अल्वारेस कैब्राल 13 सितंबर 1500 को कालीकट पहुंचे। तभी थोड़े दिन पहले कोझीकोड में पुर्तगाली कारखाने पर स्थानीय लोगों द्वारा हमला किया गया था। जिसके परिणामस्वरूप पचास से अधिक पुर्तगालियों की मृत्यु से माहौल बिगड़ा हुआ था। कैब्राल कारखाने पर हमले से नाराज हो गया और उसने बंदरगाह में लंगर डाले दस अरब व्यापारी जहाजों को जब्त कर लिया, छह सौ अरब चालक दल के सदस्य मारे गए और जहाजों को जलाने से पहले उनके माल को जब्त कर लिया। कैब्राल ने जहाजों को कालीकट पर पूरे दिन बमबारी करने का आदेश दिया। कोचीन और कन्नानूर में कैब्राल स्थानीय शासकों के साथ लाभकारी संधियाँ करने में सफल रहा। कैब्राल ने 16 जनवरी 1501 को वापसी यात्रा शुरू की और 23 जून 1501 को 13 में से केवल 4 जहाजों के साथ पुर्तगाल पहुंचे।
तीसरे अभियान पर वास्को डी गामा 15 जहाजों और 800 पुरुषों के साथ दूसरी बार भारत के लिए रवाना हुए, 30 अक्टूबर 1502 को कालीकट पहुंचे, जहां के शासक एक संधि पर हस्ताक्षर करने के लिए तैयार थे। गामा ने इस बार कालीकट से सभी मुसलमानों (अरबों) को भारत से निकालने का आह्वान किया, जिसे ठुकरा दिया गया। उसने शहर पर बमबारी की और कई चावल के जहाजों पर कब्जा कर लिया। वह सितंबर 1503 में पुर्तगाल लौट आया। हम रात को ग्यारह बजे सोते समय तक गोवा में मची मारकाट के इतिहास पर विचार करते रहे कि किस तरह मसालों के व्यापार को लालायित अरबी और यूरोपीय कारोबारी भारत के तटों पर आफ़त बनकर आते रहे।
सुबह सात बजे ट्रेन पनवेल पहुँची। पनवेल को रायगढ़ (महाराष्ट्र) का द्वार भी कहा जाता है क्योंकि पूर्व दिशा से रायगढ़ ज़िले में प्रवेश करने पर पहला शहर पनवेल है। पनवेल बस्ती गढ़ी नदी के तट पर स्थित है जो अरब सागर में जाकर मिलती है। गढ़ी नदी दो पहाड़ियों के बीच से एक तरफ़ से दूसरी तरफ़ निकल जाती है। पनवेल लगभग 300 साल पुराना शहर है, जो मराठा शासन के दौरान भूमि और समुद्र दोनों व्यापारिक मार्गों के केंद्र के रूप में विकसित हुआ था। शिवाजी ने रायगढ़ को राजधानी बनाकर पनवेल को सुरक्षा चौकी के रूप में उपयोग किया था। मराठों ने यहीं से मुग़लों के आधिपत्य में कल्याण क़िले पर हमला कर किलेदार को भागने को मजबूर किया। मुग़लों का ख़ज़ाना और किलेदार की अति सुंदर बीबी मराठा सेनापति के हाथ लगी। शिवाजी ने ख़ज़ाना रखकर किलेदार की बीबी को सम्मानपूर्वक उसके पति के पास पहुँचा दिया। मराठा, मुगल, ब्रिटिश और पुर्तगालियों सबने पनवेल का सैनिक उपयोग किया था।
हम मंगला एक्सप्रेस के द्वितीय श्रेणी वातानुकूलित डिब्बे में सवार हैं जो कोंकड रेल्वे ट्रैक पर पनवेल से चिपलुन के बीच वेस्टर्न घाट की घुमावदार घाटियों और झरनों से होकर गुजर रही है। यह वही इलाक़ा है जहां शिवाजी ने सेना संगठित कर प्रतापगढ़, सिंहगढ़, रायगढ़ अधिग्रहित करके हिंद स्वराज की स्थापना का स्वप्न साकार किया था।
ट्रेन उत्तर से दक्षिण दिशा में जा रही है। जिसके दाहिनी तरफ़ घाटियाँ अरब सागर तक उतरते चली गई हैं और बाईं तरफ़ कि पहाड़ियाँ खंडाला महाबलेश्वर होकर पूना तक चली गई हैं। औरंगज़ेब के हुनरमंद सेनापति राजा जयसिंह ने इन्ही पहाड़ियों में शिवाजी को घेरकर समर्पण हेतु मजबूर किया था। राजा जयसिंह की समझाईश और उनके पुत्र रामसिंह के सुरक्षा वचन पर शिवाजी आगरा दरबार गए थे। लेकिन औरंगज़ेब के दुर्व्यवहार से पीड़ित हो पुत्र संभाजी सहित आगरा क़िले से भाग निकले थे।
सह्याद्रि पहाड़ों से लेकर अरब सागर के विस्तार में सघन हरियाली है। नदी-नाले पोखर अभी भी बारिश के पानी से भरे हैं। कई स्थानों पर बने बाँधों ने पूरे क्षेत्र को सुरम्य हरित की मखमली रंगोली से रच दिया है। ट्रेन घाटियों से निकलकर अब सह्याद्रि के पठार पर पहुँच रही है। तापमान बढ़कर तीस सेंटीग्रेड हो गया है। बारिश के मौसम में पेड़ों पर चढ़ी बेलें अब कुछ सूखती सी दिखने लगी हैं।
भारत के पश्चिमी तट पर स्थित पर्वत श्रृंखला को पश्चिमी घाट या सह्याद्रि कहते हैं। दक्खिनी पठार के पश्चिमी किनारे के साथ-साथ यह पर्वतीय श्रृंखला उत्तर से दक्षिण की तरफ 1600 किलोमीटर लम्बी है। विश्व में जैविकीय विविधताओं के लिए यह बहुत महत्वपूर्ण है। यह गुजरात और महाराष्ट्र की सीमा से शुरू होती है और महाराष्ट्र, गोवा, कर्नाटक, तमिलनाडु तथा केरल से होते हुए कन्याकुमारी में समाप्त हो जाती है। वर्ष 2012 में यूनेस्को ने पश्चिमी घाट क्षेत्र के 39 स्थानों को विश्व धरोहर घोषित किया है।
पश्चिमी घाट का संस्कृत नाम सह्याद्रि पर्वत है। यह पर्वतश्रेणी महाराष्ट्र में कुंदाइबारी दर्रे से आरंभ होकर तट के समांतर, सागरतट से 30 किमी से लेकर 100 किमी के अंतराल से लगभग 4,000 फुट तक ऊँची चोटियों को दामन में संजोए दक्षिण की ओर पसरी है। यह श्रेणी कोंकण के निचले प्रदेश को लगभग 2,000 फुट ऊँचे दक्खिन के पठार से अलग करती है। इसपर कई इतिहास प्रसिद्ध किले बने हैं। कुंदाईबारी दर्रा भरुच तथा दक्खिन पठार के बीच व्यापार का मुख्य मार्ग है। कुंदाईबारी दर्रा से कई बड़ी नदियाँ निकलकर पूर्व की ओर बहती हैं। इसमें थाल घाट, भोर घाट, पाल घाट तीन प्रसिद्ध दर्रे हैं। इन्ही दर्रों से गुज़रकर शिवाजी ने सूरत पहुँच अंग्रेजों को लूटा था। थाल घाट से होकर बंबई-आगरा-मार्ग जाता है। कलसूबाई सबसे ऊँची चोटी (5,527 फुट) है। भोर घाट से बंबई-पूना मार्ग गुजरता है। इन दर्रो के अलावा जरसोपा, कोल्लुर, होसंगादी, आगुंबी, बूँध, मंजराबाद एवं विसाली आदि दर्रे हैं, जिनसे मुंबई से गोवा जाने वाली रेल गुजरती है। उन्ही का आनंद लेते पनवेल से पणजी की तरफ़ बढ़ रहे हैं। अंत में दक्षिण में जाकर यह श्रेणी पूर्वी घाट पहाड़ से नीलगिरि के पठार के रूप में मिल जाती है। इसी पठार पर पहाड़ी सैरगाह ओत्तकमंदु अर्थात् ऊँटी स्थित है, जो सागरतल से 7,000 फुट की ऊँचाई पर बसा है।
नीलगिरि पठार के दक्षिण में प्रसिद्ध दर्रा पालघाट है। यह दर्रा 25 किमी चौड़ा तथा सागरतल से 1,000 फुट ऊँचा है। केरल-मद्रास का संबंध इसी दर्रे से है। इस दर्रे के दक्षिण में यह श्रेणी पुन: ऊँची होकर अन्नामलाई पहाड़ी के रूप में चलती है। पाल घाट के दक्षिण में श्रेणी की पूर्वी पश्चिमी दोनों ढालें खड़ी हैं। पश्चिमी घाट में अति सुंदर दृश्य देखने को मिलते हैं। जंगलों में शिकार भी खेला जाता है। प्राचीन समय से यातायात की बाधा के कारण इस श्रेणी के पूर्व एवं पश्चिम के भागों के लोगों की बोली, रहन सहन आदि में बड़ा अंतर है। यहाँ कई जंगली जातियाँ भी रहती हैं। पश्चिमी घाट की सबसे ऊंची चोटी अनैमुड़ी (2695 मी.) है।
पनवेल निकलने के बाद मन खूबसूरत चिपलून के ख़्वाब देखने लगा। चितपावन ब्राह्मण याने बाज़ीराब के पिता बालाजी विश्वनाथ का जन्म स्थान वाला इलाक़ा- चिपलून। आर.एस.एस.को चलाने वालों के दिमाग़ की उपज वाला स्थान जो भौंसले के साथ नागपुर आ बसे थे। भौंसले याने शिवाजी का कुल जिसे शिंदे भी कहा जाता है।
चिपलून कोंकणस्थ या चितपावन ब्राह्मणों का आरम्भिक निवास था। स्थानीय लोककथाओं के अनुसार विष्णु के छठे अवतार परशुराम द्वारा साठ तालाब और साठ उद्यान आक्रामक उछलते समुद्र से लेकर कोंकण क्षेत्र के लोगों को प्रदान किए गए थे। परशुराम को चितपावन ब्राह्मण समुदाय का पितृपुरूष माना जाता है।
हालिया इतिहास में, जब छत्रपति शिवाजी महाराज ने कोंकण पर अधिकार किया और अपना शासन स्थापित किया, तो उन्होंने 1660 में गोवालकोट किले को जीत लिया और इसका नाम बदलकर गोविंदगढ़ कर दिया। शिवाजी महाराज रायगढ़ में अपने राज्याभिषेक के लिए जाने से पहले चिपलून के गोवालकोट किले में सशस्त्र बलों का निरीक्षण करने आए थे। बाद में छत्रपति संभाजी महाराज, तुलाजी आंग्रे, चिमाजी अप्पा और सिद्दीयों द्वारा किले चिपलून पर कब्जा कर लिया गया था। अंत में जिसे 1818 में रामोशी ने ब्रिटिश सेना के लिए छोड़ दिया था।
बाजीराव पेशवा, जो कुछ वर्षों (1812-1815) के लिए दाभोल के पास गुहागर में अपने महल का दौरा करने के लिए कुम्भरली दर्रे से नीचे आए, तब उन्होंने अपने लिए एक विश्राम गृह का निर्माण किया जो अब एक सरकारी कार्यालय के रूप में उपयोग किया जाता है। मराठा साम्राज्य अंग्रेजों द्वारा हथियाने के बाद चिपलून उनका आरामगाह हो गया था।
ट्रेन के चिपलून पहुँचने के पहले से ही सह्याद्रि पर्वतों के पेटों को खोदकर बनाए गए दर्रों की शुरुआत होती है, अनगिनत दर्रों की ख़ामोश धुप्प अंधेरी सुरंगे रत्नागिरी तक चली गई हैं। नदी, नाले, दर्रे, जंगल के बीच छोटे-मोटे स्टेशन बड़ा-पाव आवाज़ें सुनते निकलते जा रहे हैं। चिपलून में स्टेशन पर गर्मा गरम बड़ा-पाव और चटनी ने जीभ में कोंकड स्वाद घोल दिया।
वड़ा पाव उत्पत्ति की सबसे आम धारणा यह है कि इसका आविष्कार मध्य मुंबई के तत्कालीन मिल-मज़दूरों के बीच हुआ था। इसकी शुरुआत 1960 के दशक के अंत में वाज़े परिवार द्वारा की गई थी, जो सड़क के सामने अपने घर की एक खिड़की (खिड़की) से वड़ा पाव देते थे। वड़ा पाव बेचने वाले सबसे पुराने कियोस्क में से एक कल्याण में स्थित खिडकी वड़ा पाव कहा जाता है। दादर के अशोक वैद्य को अक्सर 1966 में दादर रेलवे स्टेशन के बाहर पहला वड़ा पाव स्टाल शुरू करने का श्रेय दिया जाता है।
कार्बोहाइड्रेट से भरपूर यह नाश्ता उस समय के गिरगांव के मिल मजदूरों को परोसा जाता था। एक पाव के अंदर रखा आलू वड़ा (बटाटा वड़ा) जल्दी बन जाता था। 1971 में लगभग 10-15 पैसे में बटाटा भाजी और चपाती की तुलना में बहुत सुविधाजनक था, जिसे भीड़भाड़ वाली लोकल ट्रेनों में भी खाया जा सकता था। वड़ा पाव का शिवसेना से गहरा नाता है। मध्य मुंबई में कपड़ा मिलों के बंद होने से 1970 के दशक में उथल-पुथल मच गई। इस परिवर्तनकारी समय के दौरान गठित शिवसेना ने खुद को मिल श्रमिकों के हितों वाली पार्टी के रूप में आधारित किया। पार्टी प्रमुख, बालासाहेब ठाकरे ने 1960 के दशक में मराठी लोगों को उद्यमी बनने के लिए प्रोत्साहित किया, यानी उडुपी रेस्तरां स्थापित करने वाले दक्षिण भारतीयों के समान तरीके से फूड स्टॉल शुरू करें। शिवसेना ने वड़ा पाव सम्मेलन (वड़ा पाव जंबोरी) जैसे आंदोलनों के साथ-साथ पड़ोस के कार्यक्रमों के माध्यम से सड़कों पर शारीरिक और वैचारिक रूप से दावा करने का प्रयास किया। यह विषय हाल के वर्षों में भी जारी रहा। वड़ा-पाव खाते-खाते रत्नागिरि आ गया।
बाल गंगाधर तिलक की यह जन्मस्थली रत्नागिरि महाराष्ट् के दक्षिण-पश्चिम भाग में अरब सागर के तट पर स्थित है। यहां पर एक किला भी है जिसे बीजापुर के राजपरिवार ने बनवाया था। बाद में 1670 ई. में इस किले की शिवाजी ने मरम्मत करवाई थी। यह कोंकण क्षेत्र का ही एक भाग है। यहां बहुत लंबा समुद्र तट हैं। यह क्षेत्र पश्चिम में सहयाद्रि पर्वतमाला से घिरा हुआ है। रत्नागिरि अल्फांसो आम के लिए भी प्रसिद्ध है। रत्नागिरि का मराठा इतिहास में महत्वपूर्ण स्थान है। यह 1731 ई. में सतारा के राजा के अधिकार में आ गया और यह 1818 ई. तक सतारा के कब्जे में रहा। 1818 ई. में इस पर अंग्रेजों ने कब्जा कर लिया।
रत्नागिरी में रत्नदुर्ग या भगवती दुर्ग के रूप में जाना जाने वाला एक क़िला है। रत्नागिरी मुंबई से 220 किलोमिटर दक्षिण में स्थित है। सोलहवीं सदी में बीजापुर के सुल्तानों ने इसका निर्माण करवाया था। शिवाजी ने 1670 ई. में इसका पुननिर्माण कराकर इसे मराठा नौसेना का प्रमुख केन्द्र बनाया। इस दुर्ग में तीन सुदृढ़ चोटियाँ हैं। दक्षिण की ओर स्थित सबसे बड़ी चोटी पारकोट के नाम से जानी जाती है। मध्य चोटी पर बाले नामक क़िला है, जिसमें प्रसिद्ध भगवती मंदिर आज भी सुरक्षित है। तीसरी चोटी मंदिर के पीछे ढलान पर है, जहाँ से कहा जाता है कि दंडित बंदियों को नीचे फेंककर मार दिया जाता था। चोटी के पश्चिम में कुछ पुरानी गुफाएँ भी हैं। बर्मा (म्यांमार) के अंतिम राजा थिबॉ को अंग्रेजों ने 1885 ई. में यहीं नज़रबंद करके रखा गया था। विनायक दामोदर सावरकर को भी यहीं कैद रखा गया था।
रत्नावली के बाद भी दर्रों का दौर नहीं थमा। शायद इसीलिए कोंकड रेल्वे का यह ट्रैक अभी भी सिंगल है। जिसे आज़ादी के बाद हम भारतियों ने ही बनाया है। कोंकण रेलवे भारतीय रेलवे की एक आनुषांगिक कंपनी है जो कोंकण के तटीय क्षेत्रों के लिए रेलों का परिचालन करती है। इसकी स्थापना 26 जनवरी 1998 में हुई थी। इसका मुख्यालय नवी मुंबई में स्थित है। कोंकण रेलवे भारत की वाणिज्य राजधानी मुंबई और मंगलोर को 736 कि॰मी॰ लंबी लाइन द्वारा महाराष्ट्र, गोवा और कर्नाटक राज्यों को जोड़ती है जो एक ऐसा क्षेत्र है जहां आर-पार बहती नदियां, गहरी घाटियां और आसमान छूते पहाड़ हैं।
ट्रेन सतारा ज़िले के कुछ स्थानों से गुजरती है। सातारा कृष्णा नदी और वेन्ना नदी के संगम के समीप स्थित है। इसकी स्थापना 16वीं शताब्दी में हुई थी और यह मराठा साम्राज्य के छत्रपति शाहुजी की राजधानी थी। सातारा का नाम “सात तारा” के संक्षिप्तिकरण से हुआ है, जिसमें सात तारों से अभिप्राय सतारा को घेरने वाले सात पहाड़ी दुर्ग हैं।
सतारा, अंग्रेजों की बम्बई प्रेसीडेन्सी का राज्य (रियासत) था। सतारा शाहूजी के वंशजों की राजधानी रहा। यद्यपि मराठा राज्य की सत्ता पेशवाओं के हाथों में जाने के फलस्वरूप यह उनके अधीन था। 1818 ई. में पेशवा बाजीराव द्वितीय की पराजय के उपरान्त अंग्रेज़ों ने इसे पुन:आश्रित राज्य बना दिया। 1848 ई. में गोद प्रथा की समाप्ति का सिद्धान्त लागू किये जाने के फलस्वरूप इसे अंग्रेज़ों के भारतीय ब्रिटिश साम्राज्य में मिला लिया। भारत में डीज़ल इंजन बनाने का पहला कारखाना सतारा में 1932 में खोला गया।
क्रमशः…
© श्री सुरेश पटवा
भोपाल, मध्य प्रदेश
≈ संस्थापक सम्पादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈






