श्री सुरेश पटवा

(श्री सुरेश पटवा जी भारतीय स्टेट बैंक से सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों स्त्री-पुरुष “, गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व प्रतिसाद मिला है। अब आप प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकते हैं यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर।)
यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – उत्तराखंड तराई क्षेत्र – भाग- २२ ☆ श्री सुरेश पटवा 
5.उत्तराखंड तराई क्षेत्र – हरि के द्वार से नैनों के ताल तक
किसी क्षेत्र विशेष का भौगोलिक और ऐतिहासिक अध्ययन करके वहाँ मनोरंजक रूप से घूमना पर्यटन कहलाता है और बिना अध्ययन के कहीं जाना घूमना कहलाता है। हिमालय पर्वत और हिंद महासागर स्थित विभिन्न स्थानों का पर्यटन लोगों को हमेशा से लुभाता रहा है। हिमालय पर्यटन में जम्मू-कश्मीर लद्दाख़, हिमाचल, नेपाल, सिक्किम, भूटान अब तक घूम चुके थे और उत्तराखंड के बद्रीनाथ और केदारनाथ घूम कर कुमायूँ और गढ़वाल के तराई वाले हिस्से छूटे थे। 24-31 जुलाई 2021 के बीच इनके पर्यटन को निकले।
उत्तराखंड के तराई इलाक़ों की यात्रा हेतु भोपाल से 24 जुलाई को तीन बजे शताब्दी एक्सप्रेस से रवाना हुए। ग्वालियर में सहकर्मी रहे मित्र राजीव दुबे ट्रेन पर मिलने आए और चिप्स के पैकेट एवं पेप्सी की बड़ी बोतल थमा गए। कुरकुरी नमकीन चिप्स चबाते और पेप्सी के घूँट हलक के नीचे उतारते राजीव के साथ ग्वालियर में 2006 से 2010 के बीच गुज़ारे दिन की मानसिक जुगाली में मुरेना निकल गया। मुरेना निकलते ही पुल की धड़धड़ाहट से चौंक कर नीचे देखा तो चम्बल लबालब यौवन से लकदक नवयौवना की तरह इठलाती चली जा रही थी। पेप्सी का घूँट गले के ऊपर रोककर नदी का सम बहाव निहारते वह पुल निकल गया, जिसके नीचे अप्रेल 2010 की झुलसती दोपहरी में बैंक के ऑडिटर के साथ चिल्ड बियर और मुर्ग़ मुसल्लम की दावत का लुत्फ़ उठाया था। ऑडिटर साहब को डाकू देखना था, उन्हें जयप्रकाश नारायण के समक्ष ऐच्छिक समर्पित एक बुजुर्ग डाकू से उसी पुल के नीचे मिलवाया था जिसके ऊपर से ट्रेन गुज़र रही थी।
चिप्स की कुरमुराहट के बीच धौलपुर स्टेशन निकलते ही दिमाग़ में डाकुओं के क़िस्से कुडमुँड़ाने लगे। माधौसिंह और पान सिंह तोमर के अलावा अत्याचार सहती बैंडिट क्वीन फूलन देवी और उनके पीछे भागती पुलिस के सिपाही के पैरों से रोंदे चम्बल के बीहड़ रिमझिम फुहार से नहाते नज़र आ रहे थे। सोचते-सोचते झपकी लग गई। उसके बाद घर से लाया खाना खाकर सिटिंग चेयर को पीछे झुकाकर एक हल्की नींद निकाली ही थी, तभी सवारियों की रेलमपेल में आँख खुली तो देखा रेलगाड़ी आगरा कैंट स्टेशन पर खड़ी है। एक भारी भरकम सवारी भारी भरकम सामान सहित पूरा कुनबा लेकर चढ़ी। उनकी कुर्सियाँ तो पक्की थीं परंतु सामान को ऊपर रखने को लेकर झिकझिक होने लगी। उन्होंने दूसरों का सामान हटा कर अपना सामान ज़माना शुरू किया तो आसपास की सवारियाँ भड़कने लगीं। आख़िर में सवारियों के हिसाब से सामान की जगह तय होकर व्यवस्था बनने ही जा रही थी। तभी एक जनानी सवारी ने साथ वाले से पूछा- मोटा पागल है क्या? पीछे से किसी सज्जन ने फुसफुसाती चुटकी ली कि लगता है अस्पताल से छुट्टी कराकर आए हैं। आगरा वाले भारी भरकम भाई साहब के तेज कानों ने सुन लिया। आधा घंटा हंगामेदार माहौल रहा। लोग मास्क हटाकर तुमुल युद्ध में शरीक हो गए। आगरा वाले भाई साहब बोले हाँ! हम तो ठीक होकर आ गए। आपको भर्ती कराए देते हैं। चुटकी वाले भाई साहब नींद का बहाना करते चिमाई दावे पड़े रहे। मामला ठंडा हुआ, तब सबको मास्क नाक पर चढ़ाने का ध्यान आया। तब तक मथुरा स्टेशन से वैंडरों की “मथुरा के पेड़े और आगरा का पेठा” आवाज़ें आने लगीं। फिर एक झपकी के बाद नींद खुली तो ट्रेन निज़ामुद्दीन स्टेशन से गुजर रही थी।
रात्रि को साढ़े ग्यारह बजे नई दिल्ली स्टेशन पर वेटिंग लाउंज में दस रुपए प्रति घंटे के हिसाब से भुगतान करके कमर सीधी करने लेटे परंतु यात्रियों के आने-जाने से ख़लल होता रहा, लिहाज़ा मुश्किल से दो घंटे नींद लगी। करवट बदलते छह बजे तक समय बिताया। फिर पता चला कि देहरादून शताब्दी रेलगाड़ी प्लेटफ़ार्म नम्बर एक के बजाय सोलह से रवाना होगी। प्लेटफ़ार्म नम्बर एक से सोलह तक की दो किलोमीटर की दूरी तय करके ट्रेन में जा बैठे। ट्रेन नियत समय पर चल पड़ी।
देहरादून शताब्दी की यात्रा सुखद रही। रेलगाड़ी तय समय से चली। ग़ाज़ियाबाद, मेरठ, मुज़फ़्फ़रनगर, सहारनपुर, रुड़की, हरिद्वार होते हुए देहरादून समय से पहले पहुँच गई। प्लेटफ़ार्म से बाहर निकले तो एक लम्बी क़तार कोविड की जाँच के लिए लगी थी। हम भोपाल के बंसल अस्पताल से कोविड जाँच रिपोर्ट साथ लेकर चले थे, इसलिए बिना किसी परेशानी के बाहर निकल टेक्सी में बैठ स्टेट बैंक के गेस्ट हाऊस पहुँच गए।
देहरादून में इंदिरा मार्केट, तिब्बत बाज़ार, पल्टन बाज़ार और राजपुर रोड पर दोनों तरफ़ दुकानों का जमावड़ा है। उत्तराखंड की राजधानी बनने के बाद देहरादून मैदानी इलाक़ों तरफ़ तेज़ी से बसना शुरू हो गया था। जिसकी रफ़्तार जारी है। हम शाम को शहर के हृदय स्थल घंटाघर पहुँचे। घंटाघर से लगे पल्टन बाज़ार घूमे वहाँ से एक रास्ता सीधा नगर के सबसे पुराने गुरुद्वारे पहुँचता है जहाँ गुरु रामराय ने दिल्ली से आकर डेरा रखा था। दून घाटी में डेरा रखने से यह स्थान देहरादून हो गया। वह गुरुद्वारा झण्डा गुरुद्वारा कहलाता है। वहाँ का होली पर मनाया जाने वाला रंग उत्सव प्रसिद्ध है। शाम को पल्टन बाज़ार और राजपुर रोड पर घूमते रहे। रात को देहरादून के प्रसिद्ध के सी सूप बॉर में चाइनीज़ खाना खाकर आराम किया।
25 जुलाई को रविवार का दिन था। देहरादून में लॉकडाउन था इसलिए गेस्ट हाऊस से निकलना सम्भव नहीं था। नाश्ता करके एक अच्छी नींद निकाली। दोपहर को लंच के बाद जिम कार्बेट की किताबें पढ़ते रहे। कुछ कहानियाँ साथ वालों को पढ़कर सुनाईं। शाम को अरविंद भैया की नातिन श्रद्धा सिसोदिया की बिटिया श्रुति सिसोदिया तंवर दामाद साहब सहित पधारीं। तीन घंटे उनके साथ गुज़ारे। वे जाते-जाते बहरूज की बिरयानी का ऑनलाइन आर्डर दे गईं। नौ बजे के लगभग बिरयानी की डेलिवरी प्राप्त हुई। भोजन करके आराम किया।
मसूरी धनोल्टी
26 जुलाई 2021 को सुबह आठ बजे देहरादून गेस्ट हाऊस से मसूरी के लिए रवाना हुए। देहरादून 2001 में राजधानी और टेहरी बाँध बनने के बाद से तेज़ी से जनसंख्या के दबाव में फैलना शुरू हुआ था। वहाँ एक मात्र मुख्य सड़क राजपुर मार्ग के दोनों तरफ़ प्रीमीयम और साधारण फ़्लैट की भरमार हो गई है। आगे बढ़ने पर राजपुर रोड से एक रास्ता मसूरी को कट जाता है। मसूरी के लिए रास्ता कटते ही तराई से पहाड़ियों में यात्रा शुरू होती है। एक तरफ़ ऊँचे पहाड़ और दूसरी तरफ़ गहरी खाईयों का न ख़त्म होने वाला सिलसिला आरम्भ होता है। चढ़ाई शुरू होते ही सड़क किनारे एक शिव मंदिर पड़ा। वहाँ सूचना लगी थी कि यह निजी मंदिर है इसमें कोई भी नगद या अन्य चढ़ावा न चढ़ाएँ। उल्टा आपको प्रसाद और चाय का सेवन कराया जाता है। बाजू में एक छोटा रेस्टोरेंट है जिसमें मंदिर की तरफ़ से पचास प्रतिशत अनुदान पर सामान मिलता है।
आधा घंटा चलने के बाद भट्टा जल प्रपात तक नीचे उतरने की ट्रोली सेवा की बुकिंग कुटिया आई। वहाँ से दो सौ रुपए का टिकट कटा कर ट्रोली में सवार हुए। ट्रोली का इंतज़ार कर रहे थे, तभी केंटीन वाला आया। उसकी चाय के दाम बीस रुपए था। यह सोचकर कि उनका रोज़ी रोज़गार का ज़रिया भी हम जैसे पर्यटक हैं। बीस रुपए की चाय गले के नीचे उतारी, तब तक ट्रोली का झूला आ गया। सवार होकर एक हज़ार फुट नीचे उतर चले। चारों तरफ़ बादलों से घेरे में लग रहा था कि स्वर्ग की यात्रा आरम्भ हो गई है। चिकोटी काट कर देखी तब पता चला कि पूरे होशोहवास में चीड़ चिनार देवदार के वृक्षों के बीच से हवा में तैरते चले जा रहे हैं।
रिमझिम बारिश की बूँदों के बीच भट्टा प्रपात पहुँचे तो पता चला कि मसूरी झील का पानी इस तरफ़ उतार पर झरना बनाकर एक प्रपात बनाता है। थोड़ी देर रुककर वापसी यात्रा करके टेक्सी में आ बिराजे। फिर तीखी चढ़ाई से गुज़रते हुए मसूरी पहुँच गए। परंतु हमने तय किया था कि अभी सीधे धनौल्टी जाएँगे जो मसूरी से और आगे तीस किलोमीटर ऊँचे पहाड़ों को पार करके आने वाला था। रास्ते में चार-दुकान पर्यटन स्थल आया। पता करने पर मालूम हुआ कि एक ऊँची पहाड़ी पर सचिन तेंदुलकर ने एक शाही फ़्लैट ख़रीदा था तब वे अपने दोस्तों के साथ यहाँ पधारे थे। उसी समय चार लोगों ने भीड़ की सेवा हेतु दुकान लगा ली थीं जिसमें सचिन ने साठ रुपए कप के हिसाब से दोस्तों के साथ चाय का सेवन किया था। वह स्पॉट चार-दुकान पोईंट नाम से प्रसिद्ध हो गया।
मसूरी बसावट की भी एक कहानी पता चली। देहरादून मध्य युग में औरंगज़ेब की सिक्खों में फूट डालने की नीति से बस चुका था। मसूरी बसने की राह देख रहा था। जिसे एक अंग्रेज ने शुरू किया। ईस्ट इंडिया कंपनी के लेफ्टिनेंट फ्रेडरिक यंग शिकार के लिए मसूरी आए। उन्होंने कैमल्स बैक रोड पर एक शिकार लॉज बनाया, और 1823 में दून के मजिस्ट्रेट बने। उन्होंने पहली गोरखा रेजिमेंट बनाई और घाटी में पहला आलू बोया। मसूरी में उनका कार्यकाल 1844 में समाप्त हुआ, जिसके बाद उन्होंने दीमापुर और दार्जिलिंग में सेवा की, अंत में एक जनरल के रूप में सेवानिवृत्त होकर आयरलैंड लौट आए। मसूरी में यंग का कोई स्मारक नहीं है। हालांकि, देहरादून में एक यंग रोड है जिस पर ओएनजीसी का तेल भवन खड़ा है। 1832 में, मसूरी भारत के महान त्रिकोणमितीय सर्वेक्षण का टर्मिनस था जो देश के दक्षिणी सिरे पर शुरू हुआ था। उस समय के भारत के महासर्वेक्षक जॉर्ज एवरेस्ट चाहते थे कि भारतीय सर्वेक्षण का नया कार्यालय मसूरी में स्थित हो। उसी वर्ष मसूरी में पहली बियर ब्रूवरी सर हेनरी बोहले द्वारा “द ओल्ड ब्रूवरी” के रूप में स्थापित की गई थी। 1850 में मैकिनॉन एंड कंपनी के रूप में सर जॉन मैकिनॉन द्वारा फिर से स्थापित किए जाने से पहले शराब की भठ्ठी दो बार खुली और बंद हुई। हिंद महासागर से बनकर उठे बादल पूरे देश में बारिश का मनभावन सुहावना मौसम रच कर हिमालय से रुककर तराई के इलाक़ों में अच्छी बारिश करते हुए पहाड़ों पर रुककर छाए रहते हैं। उन्ही के बीच से रास्ता गुजरता रहा।
मसूरी शांत और खूबसूरत जगह। हम समय बचाने के हिसाब से मसूरी पार करके सीधे धनौल्टी चले गए। धनौल्टी देवदार के जंगल से घिरा है। अब देवदार का जंगल ही इसकी पहचान बन चुका है। यहां रहने के लिए कुछ होटल बन गये है। गढवाल मंडल टूरिज्म का गेस्ट हाउस भी है। शहर की भीडभाड़ से दूर जाना चाहते हैं तो धनौल्टी अच्छी जगह है। मसूरी घूमने के बाद यहां ठहरा जा सकता है।
धनौल्टी काफ़ी शान्तिपूर्ण स्थल के रूप में भी जानी जाती है जिस कारण यहाँ पर्यटकों की भीड़ अधिक रहती है। लंबी जंगली ढलानें, ठंडी व शांत हवाएँ, स्थानीय लोगों द्वारा की जाने वाली मेहमान नवाजी, मनमोहक मौसम, बर्फ से ढंके पहाड़ यहाँ की ख़ास विशेषताओं में शामिल हैं, जो इस जगह को सुकूनभरी छुट्टियाँ बिताने के लिए एक आदर्श जगह बनाते हैं। देखने लायक़ जगहों में बारेहीपानी और जोरांडा फॉल्स, दशावतार मन्दिर, ईको-पार्क, सुरकंडा देवी, मन्दिर, हिमालयन वीवर्स, जैन मंदिर आदि शामिल हैं। सर्दियों में स्नो फॉल का मजा लेना चाहते हैं तो वहाँ जरूर जाएं। यहां देखने लायक कई जगह हैं। जैसे एप्पल गार्डन में घुड़सवारी का आनंद ले सकते हैं। यहां सालभर मौसम ठंडा रहता है। दिसंबर के बाद यहां बर्फबारी होना शुरू हो जाती है। धनोल्टी मै एडवेंचर से भरपूर 🏕️camping की अच्छी सुविधा है।
धनौल्टी से वापसी में मसूरी के दर्शनीय स्थल देखे। मसूरी में माल रोड प्रसिद्ध जगह है लेकिन बाज़ार बहुत महँगा है। देहरादून से माल लाकर वहाँ दुगुने-तिगुने दाम पर बेंचा जाता है। ख़रीदी के लिए देहरादून का पल्टन बाज़ार या इंदिरा मार्केट वाजिब है।
केम्पटी फाल याने जल प्रपात मसूरी से पंद्रह किलोमीटर है। एक बहुत छोटा पहाड़ी जल प्रपात चट्टानों को काटकर गिरता है। अंत में एवरेस्ट हाऊस देखने गए। यह एवरेस्ट के स्वामित्व में लगभग 11 वर्षों तक उनका निवास था। उन्होंने इसे जनरल व्हिश से खरीदा था। 1832 में बने इस घर को आज सर जॉर्ज एवरेस्ट हाउस एंड लेबोरेटरी या पार्क हाउस के नाम से जाना जाता है। यह घर पार्क एस्टेट में गांधी चौक/लाइब्रेरी बाजार (मसूरी में माल रोड के पश्चिमी छोर) से लगभग 6 किलोमीटर पश्चिम में स्थित है। इसके स्थान से एक तरफ दून घाटी और उत्तर में अगलर नदी घाटी और हिमालय श्रृंखला के मनोरम दृश्य दिखाई देते हैं। परंतु घाटियों में बादलों की जमघट होने के कारण हमें कुछ भी दिखाई नहीं दिया। अप्रेल-मई के महीनों में जब आसमान साफ़ होता है तब घाटियों का दृश्य मनोरम होता है। दिसम्बर-जनवरी में बर्फ़वारी से घाटियाँ सफ़ेद चादर ओढ़ लेती हैं। भूमिगत पानी के कुंड हैं (या शायद बर्फ के भंडारण के लिए गड्ढे, क्योंकि क्षेत्र में पानी की कमी है) जो काफी गहरे हैं और घर के बाहर सामने के यार्ड में खुले पड़े हैं, कूड़े से भरे हुए हैं और फिसलने का खतरा है।
इंटीरियर को हटा दिया गया है लेकिन फायरप्लेस, छत, और दरवाजे और खिड़की के फ्रेम अभी भी बने हुए हैं। घर स्टील ग्रिल से सुरक्षित है और इसमें प्रवेश नहीं किया जा सकता है। यह संपत्ति बेहतर रूप से जानी जाती है और पहुंच मार्ग में सुधार किया गया है, दीवारों को भित्तिचित्रों से ढक दिया गया है और समय-समय पर साफ किया जाता है। इसका पूरी तरह जीर्णोद्धार और रखरखाव वांछित है।
27 जुलाई 2021 का दिन हमने देहरादून के दर्शनीय स्थलों के लिए तय कर रखा था क्योंकि एक दिन कठिन यात्रा के बाद दूसरा दिन थोड़ा आराम भरा होना चाहिए, नहीं तो लगातार थकान से घूमने का मज़ा जाता रहता है और पर्यटक ऊब का शिकार होने लगते हैं। इस समय चारों तरफ़ से घनघोर बारिश की खबरें आ रही हैं। हालाँकि हमने जिन स्थानों को चुना है वे बारिश के मौसम में जोखिम भरी नहीं मानी जाती परंतु फिर भी मौसम का क्या भरोसा। यही बात यात्रा को रोमांचक बनाती है।
देहरादून गढ़वाल इलाक़े का प्रमुख शहर और उत्तराखंड की राजधानी है। देहरादून दून घाटी में हिमालय की तलहटी में स्थित है, जो पूर्व में गंगा की एक सहायक सोंग नदी और पश्चिम में यमुना की सहायक आसन नदी के बीच स्थित है। यह शहर अपने सुरम्य परिदृश्य और थोड़ी हल्की ठंडी जलवायु के लिए जाना जाता है और आसपास के क्षेत्र के लिए प्रवेश द्वार प्रदान करता है। शहर समुद्र तल से 2,100 फुट की ऊंचाई पर स्थित है। देहरादून गढ़वाल शासकों के लिए एक महत्वपूर्ण केंद्र रहा है जिसे अंग्रेजों ने कुमायूँ-गढ़वाल के शासन का केन्द्र बना लिया था। इस शहर को उत्तराखंड हिमालय का प्रवेश द्वार भी कहा जाता है।
स्कंद पुराण में दून का उल्लेख केदारखंड नामक क्षेत्र के एक भाग के रूप में किया गया है, जो शिव का निवास स्थान है। हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार, प्राचीन भारत में महाभारत महाकाव्य युग के दौरान, कौरवों और पांडवों के महान शिक्षक द्रोणाचार्य यहां रहते थे, इसलिए इसका नाम “द्रोणनगरी” पड़ा। शहर को देवभूमि (“देवताओं की भूमि”) के रूप में भी माना जाता है।
देहरादून उपनाम “दून वैली” का इतिहास रामायण और महाभारत की कहानी से जुड़ा है। ऐसा माना जाता है कि रावण और भगवान राम के बीच युद्ध के बाद, भगवान राम और उनके भाई लक्ष्मण ने इस स्थल का दौरा किया था। इसके अलावा, महाभारत में कौरवों और पांडवों के महान गुरु, द्रोणाचार्य के नाम पर ‘द्रोणनगरी’ के रूप में जाना जाता है। माना जाता है कि उनका जन्म और निवास देहरादून में हुआ था। देहरादून के आसपास के क्षेत्रों में प्राचीन मंदिरों और मूर्तियों से मिले साक्ष्यों को रामायण और महाभारत की पौराणिक कथाओं से जोड़ा गया है। ये अवशेष और खंडहर लगभग उतने ही पुराने माने जाते हैं। इसके अलावा, स्थान, स्थानीय परंपराएं और साहित्य महाभारत और रामायण की घटनाओं के साथ इस क्षेत्र के संबंधों को दर्शाते हैं। महाभारत की लड़ाई के बाद इस क्षेत्र पर पांडवों का प्रभाव था क्योंकि हस्तिनापुर के शासकों ने सुबाहू के वंशजों के साथ इस क्षेत्र पर सहायक के रूप में शासन किया था। इसी तरह, इतिहास के पन्नों में ऋषिकेश का उल्लेख है जब भगवान विष्णु ने संतों की प्रार्थना का जवाब दिया, राक्षसों का वध किया और संतों को भूमि सौंप दी। महाभारत के समय में चकराता नामक स्थान का ऐतिहासिक प्रभाव बताया जाता है।
सातवीं शताब्दी में, इस क्षेत्र को सुधानगर के नाम से जाना जाता था और चीनी यात्री ह्वेन त्सांग ने इसका वर्णन किया था। सुधानगर को बाद में कालसी के रूप में पहचाना जाने लगा। कालसी में यमुना नदी के किनारे के क्षेत्र में अशोक के शिलालेख पाए गए हैं जो प्राचीन भारत में इस क्षेत्र के महत्व को दर्शाते हैं। पड़ोसी क्षेत्र हरिपुर में, राजा रसला के समय से खंडहरों की खोज की गई थी जो इस क्षेत्र की समृद्धि को भी दर्शाते हैं।
ब्रिटिश राज के आरम्भिक दिनों में शहर का आधिकारिक नाम देहरा था। देहरादून दो शब्दों “देहरा” + “दून” से मिलकर बना है। देहरा शब्द “डेरा” से लिया गया है, जिसका अर्थ है शिविर और गढ़वाली भाषा में दून एक घाटी को कहते हैं। यह घाटी मध्य हिमालय और “शिवालिक” के बीच स्थित है। शहर की स्थापना तब हुई जब सातवें सिख गुरु, गुरु हर राय के पुत्र बाबा राम राय ने 1675 में इस क्षेत्र में अपना “डेरा” या शिविर लगाया। उस समय से आधुनिक देहरादून शहर का विकास शुरू हुआ। यह तब की बात है जब देहरा शब्द दून से जुड़ा और इस तरह इस शहर का नाम देहरादून पड़ा। आसपास की अन्य प्रमुख दून घाटियां कोटली दून, पाटली दून और पिंजौर दून हैं।
देहरादून के नाम का इस्तेमाल होने से पहले, जगह को पुराने नक्शों पर गुरुद्वारा (वेब द्वारा एक नक्शा, 1808) या गुरुद्वारा (जेरार्ड द्वारा एक नक्शा, 1818) के रूप में दिखाया गया है। जेरार्ड के नक्शे में उस स्थान का नाम “देहरा या गुरुद्वारा” रखा गया है। इस मूल सिख मंदिर के चारों ओर कई छोटे गाँव थे जो अब आधुनिक शहर के कुछ हिस्सों के नाम हैं।
देहरादून पर गजनी के महमूद ने 1024 में, 1368 में तैमूर लंग ने, 1757 में रोहिल्ला प्रमुख नजीबउद्दौला और 1785 में गुलाम कादिर ने आक्रमण किया था। नेपाली राजा पृथ्वी नारायण शाह ने 1806 में अल्मोड़ा, पठानकोट, कुमाऊं, गढ़वाल, सिरमुर, शिमला, कांगड़ा और देहरादून को एकजुट किया। पश्चिमी मोर्चे पर गढ़वाल और हिमाचल प्रदेश के कुछ हिस्सों में पंजाब तक और पूर्वी मोर्चे पर सिक्किम राज्य से परे दार्जिलिंग तक एक संक्षिप्त अवधि के लिए नेपाल का हिस्सा रहा आया। ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी 1814 से 1816 तक ब्रिटिश-नेपाल युद्ध से उसे भारत में मिला लिया। युद्ध सुगावली की संधि पर हस्ताक्षर के साथ समाप्त हुआ जिसमें नेपाल ने अपने नियंत्रण का लगभग एक तिहाई ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी को सौंप दिया था। अंग्रेजों ने 1816 में देहरादून प्राप्त किया और 1827-1828 में लंढौर और मसूरी का विकास किया। भारत के पहले प्रधान मंत्री जवाहरलाल नेहरू देहरादून शहर के काफी शौकीन थे और अक्सर वहाँ जाते रहते थे। 1964 में दिल्ली में निधन से पहले उन्होंने अपने अंतिम कुछ दिन यहां बिताए। स्वतंत्रता आंदोलन के एक अन्य नेता, रास बिहारी बोस, जो ग़दर षडयंत्र भारतीय राष्ट्रीय सेना के प्रमुख आयोजकों में से एक थे जिसका मुख्यालय अपने शुरुआती दिनों में देहरादून में स्थित था। जिन्हें स्वतंत्रता संग्राम जारी रखने के लिए 1915 में जापान जाने के लिए मजबूर होना पड़ा था।
देहरादून का अफगान संबंध प्रथम आंग्ल-अफगान युद्ध (1839) से जुड़ा है, जिसके बाद अफगान अमीर दोस्त मोहम्मद खान (अफगानिस्तान के अमीर) को अंग्रेजों ने देहरादून में निर्वासित कर दिया था। वह 6 साल से अधिक समय तक मसूरी में रहे। मसूरी नगरपालिका के अंतर्गत आने वाले बालाहिसर वार्ड का नाम दोस्त मोहम्मद के महल के नाम पर रखा गया है। प्रसिद्ध देहरादून बासमती को उनके साथ अफगानिस्तान के कुनार प्रांत से लाया गया था और इसे आज भी घाटी के व्यंजन के रूप में गिना जाता है।
चालीस साल बाद, दूसरे एंग्लो-अफगान युद्ध के बाद, उनके पोते, मोहम्मद याकूब खान को 1879 में निर्वासन के लिए भारत भेजा गया था। अपने दादा की तरह, उन्होंने अपने निवास के रूप में दून घाटी को चुना। याकूब औपचारिक रूप से देहरादून में बसने वाला पहला अफगान बना। वर्तमान मंगला देवी इंटर कॉलेज कभी काबुल पैलेस था जहाँ याकूब ने अपने जीवन के कुछ साल बिताए थे।
अफगान शाही परिवार ने देहरादून में उपस्थिति बनाए रखी। यह अफगानिस्तान के अंतिम से दूसरे राजा मोहम्मद नादिर शाह का जन्मस्थान था। दो विचित्र महल – देहरादून में काबुल पैलेस और मसूरी में बाला हिसार पैलेस – अफगानिस्तान के साथ इस संबंध की गवाही देते हैं। वे इन अफगान शासकों द्वारा 20 वीं शताब्दी के शुरुआती भाग में भारत में निर्वासन में बनाए गए थे। बाला हिसार पैलेस को अब मसूरी के विनबर्ग एलन स्कूल में बदल दिया गया है।
अफगानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ गनी ने उल्लेख किया है कि उनकी दादी देहरादून में पली-बढ़ी हैं। “मैं टैगोर की बात करता हूं क्योंकि मुझे टैगोर से प्रशिक्षित मेरी दादी ने पाला था जो देहरादून में रहती थीं …,” डॉ गनी ने भारत की दृष्टि और उल्लेखनीय परिवर्तन के बारे में बात करते हुए कहा।
देहरादून शहर मुख्य रूप से दून घाटी में स्थित है और क्लेमेंट टाउन 1,350 फीट की ऊंचाई पर है और मालसी 2,300 फीट से ऊपर है जो शहर से 15 किमी दूर है। मालसी लेसर हिमालयन रेंज का शुरुआती बिंदु है जो मसूरी और उससे आगे तक फैला हुआ है। देहरादून जिले में जौनसार-बावर पहाड़ियाँ समुद्र तल से 12,100 फीट ऊपर हैं। मसूरी का पहाड़ी क्षेत्र समुद्र तल से 6,135 से 6,617 फीट की ऊंचाई तक जाता है। इसकी भू-आकृति विज्ञान और मौसम संबंधी विशेषताएं इसे कई प्राकृतिक खतरों के प्रति संवेदनशील बनाती हैं। भूकंप के अलावा, यह क्षेत्र अक्सर भूस्खलन, बादल फटने, अचानक बाढ़, शीत लहरों और ओलावृष्टि से तबाह हो जाता है।
दून घाटी में रायवाला, ऋषिकेश, डोईवाला, हर्रावाला, देहरादून, हरबर्टपुर, विकासनगर, सहसपुर, सेलाकी, सुभाष नगर और क्लेमेंट टाउन सहित बस्तियां शामिल हैं। जिले में राजाजी राष्ट्रीय उद्यान है जो हाथियों का घर है, मसूरी में बेनोग वन्यजीव अभयारण्य और आसन संरक्षण रिजर्व (आसन बैराज)। दून घाटी में तराई और भाबर के जंगलों के साथ-साथ शिवालिक पहाड़ियाँ और मसूरी और चकराता जैसे हिल स्टेशन युक्त कम हिमालयी रेंज हैं। जिले की सीमा उत्तर में हिमालय, दक्षिण में शिवालिक पहाड़ियों की राजाजी रेंज, पूर्व में गंगा नदी और पश्चिम में यमुना नदी से लगती है। पर्वत श्रृंखलाओं की तलहटी में स्थित शहरों में सहस्त्रधारा, लाखमंडल, गौतम कुंड, चंद्रबनी, कालसी और डाकपत्थर शामिल हैं।
यह जिला दो प्रमुख भागों में विभाजित है: शिवालिक से घिरा मुख्य शहर देहरादून और हिमालय की तलहटी में स्थित जौनसार-बावर। उत्तर और उत्तर पश्चिम में यह उत्तरकाशी और टिहरी गढ़वाल जिले से, पूर्व और दक्षिण में पौड़ी गढ़वाल और गंगा नदी से, पश्चिम में, यह हिमाचल प्रदेश के शिमला और सिरमौर जिलों, हरियाणा के यमुनानगर जिले और टोंस और यमुना नदियाँ से घिरा है। दक्षिण में हरिद्वार और उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जिले हैं।
स्वतंत्रता के बाद देहरादून और गढ़वाल और कुमाऊं के अन्य हिस्सों को संयुक्त प्रांत में मिला दिया गया था जिसे बाद में उत्तर प्रदेश राज्य का नाम दिया गया था। उत्तर प्रदेश पुनर्गठन अधिनियम 2000 के तहत उत्तर प्रदेश के उत्तर-पश्चिमी जिलों से उत्तराखंड राज्य (जिसे पहले उत्तरांचल कहा जाता था) बनाकर देहरादून को इसकी राजधानी बनाया गया।
क्रमशः…
© श्री सुरेश पटवा
भोपाल, मध्य प्रदेश
*≈ सम्पादक श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈