हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संजय उवाच # ३११ – संघे शक्ति ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के  लेखक  श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है। साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ  हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको  पाठकों का  आशातीत  प्रतिसाद मिला है।”

हम  प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है  इस शृंखला की अगली कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों  के माध्यम से  हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)

☆  संजय उवाच # ३११ संघे शक्ति… ?

कुछ घटनाएँ ऐसी घटती हैं जो नेत्रों को खारी बूँदों से भर देती हैं। उस सुबह भी कुछ ऐसा ही हुआ। कलेवर में छोटी पर प्रभाव में बड़ी घटना का साक्षी बना।

प्रात:कालीन भ्रमण से लौट रहा था। बस स्टॉप के पास वाले फुटपाथ पर एक पेड़ के नीचे दो-तीन वर्ष से एक फ़कीर का बसेरा है। फुटपाथ के एक ओर पार्क की दीवार है, दूसरी ओर सड़क और सड़क के उस पार चाय की छोटी-सी गुमटी। आते-जाते लोगों से फ़कीर की कभी चाय की मांग हो तो केवल पैसे देकर काम नहीं चलता। सड़क पार से एक प्याला चाय लाकर देना पड़ता है। शायद पैरों से लाचार से हैं यह वृद्ध क्योंकि उन्हें कभी चलते नहीं देखा।

सहसा दृष्टि पड़ी कि वृद्ध को घेरकर पास के उर्दू माध्यम के विद्यालय में पढ़नेवाली आठ-दस छात्राएँ खड़ी हैं। सिर पर स्कार्फ बाँधे, छठी-सातवीं में पढ़नेवाली बच्चियाँ। उत्सुकता के शमन के लिए अवलोकन किया तो नेत्र सजल हो उठे। भिक्षुक को पीने के लिए पानी चाहिए था और हर बच्ची अपनी वॉटर बॉटल में से थोड़ा-थोड़ा पानी फ़कीर के जलपात्र में डाल रही थी। अद्भुत, अलौकिक दृश्य! देखता ही रह गया मैं!

इच्छा हुई दौड़कर जाऊँ और इनके माथे पर हाथ रखकर कहूँ, “वेल डन बेटियो! सबाब का काम किया।” फिर लगा इस कच्ची उम्र को पाप-पुण्य के जटिल समीकरण से मुक्त ही रहने दूँ, रहने दूँ इन्हें सहज। सहजता जो जानती है कि प्यास है तो पानी की व्यवस्था करनी चाहिए।

फ़कीर की पानी की ज़रूरत पूरी करने के लिए एक साथ बढ़े इन नन्हे हाथों ने एक बात और सिखाई कि प्रयास सामूहिक हों तो पानी का पात्र ही नहीं, सूखी नदियाँ और रूठी बावड़ियाँ भी भरी जा सकती हैं।

© संजय भारद्वाज 

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

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अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं।

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा – “आज का रांझा” ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

श्री कमलेश भारतीय 

(जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब)  शिक्षा-  एम ए हिंदी , बी एड , प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । यादों की धरोहर हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह -एक संवाददाता की डायरी को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से  कथा संग्रह-महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता)

☆ लघुकथा – “आज का रांझा” ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

उन दोनों ने एक दूसरे को देख लिया था और मुस्कुरा दिए थे। करीब आते ही लड़की ने इशारा किया था और क्वार्टरों की ओर बढ़ चली। लड़का पीछे पीछे चलने लगा।

लड़के ने कहा -तुम्हारी आंखें झील सी गहरी हैं।

– हूं।

लड़की ने तेज तेज कदम रखते इतना ही कहा।

– तुम्हारे बाल काले बादल हैं।

– हूं।

लड़की तेज चलती गयी।

बाद में लड़का उसकी गर्दन , उंगलियों, गोलाइयों और कसाव की उपमाएं देता रहा। लड़की ने हूं भी नहीं की।

क्वार्टर खोलते ही लड़की ने पूछा -तुम्हारे लिए चाय बनाऊं?

चाय कह देना ही उसकी कमजोर नस पर हाथ रख देने के समान है , दूसरा वह बनाये। लड़के ने हां कह दी। लड़की चाय चली गयी औ, लड़का सपने बुनने लगा। दोनों नौकरी करते हैं। एक दूसरे को चाहते हैं। बस। ज़िंदगी कटेगी।

पर्दा हटा और ,,,,

लड़का सोफे में धंस गया। उसे लगा जैसे लड़की के हाथ में चाय का प्याला न होकर कोई रायफल हो , जिसकी नली उसकी तरफ हो। जो अभी गोली उगल देगी।

– चाय नहीं लोगे?

लड़का चुप बैठा रहा।

लड़की से, बोली -मेरा चेहरा देखते हो? स्टोव के ऊपर अचानक आने से झुलस गया। तुम्हें चाय तो पिलानी ही थी। सो दर्द पिये चुपचाप बना लाई।

लड़के ने कुछ नहीं कहा। उठा और दरवाजे तक पहुंच गया।

– चाय नहीं लोगे?

लड़की ने पूछा।

– फिर कब आओगे?

– अब नहीं आऊंगा।

– क्यों? मैं सुंदर नहीं रही?

और वह खिलखिला कर हंस दी।

लड़के ने पलट कर देखा,,,

लड़की के हाथ में एक सड़ा हुआ चेहरा था और वह पहले की तरह सुंदर थी।

लड़का मुस्कुरा कर करीब आने लगा तो उसने सड़ा हुआ चेहरा उसके मुंह पर फेंकते कहा -मुझे मुंह मत दिखाओ।

लड़के में हिम्मत नहीं थी कि उसकी अवज्ञा करता।

© श्री कमलेश भारतीय

पूर्व उपाध्यक्ष हरियाणा ग्रंथ अकादमी

संपर्क :   1034-बी, अर्बन एस्टेट-।।, हिसार-125005 (हरियाणा) मो. 94160-47075

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रेयस साहित्य # ३१ – लघुकथा – माँ – बेटी ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆

श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्रेयस साहित्य # ३१ ☆

☆ लघुकथा ☆ ~ माँ – बेटी ~ ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆ 

वह चौराहे पर पहुंच चुका था। मां बेटी को एक साथ खड़ा देखकर उसने अपनी गाड़ी किनारे लगायी। वह मां बेटी के बीच के प्यार को पढ़ना चाह रहा था। बेटी को दुलारती पुचकारती मां, न जाने क्या सोच रही थी। वह बायें -दाएँ गर्दन घुमाते हुए आरत दृष्टि से कुछ देख रही थी। कभी-कभी वह वह अपने दोनों वाह्य कर्ण को अलग-अलग दिशाओं में घुमा आने वाले संभावित खतरे के आहट को जानने और उससे सतर्क रहने का प्रयास कर रही थी। उसकी मूकभाव भंगिमा और एकटक ताकती नजरे शायद आने जाने वालों से कुछ कहना चाह रही थी।

 मां की गर्दन की ललरियों के नीचे बाल भाव में खड़ी बिटिया माँ के पास खड़ी होकर स्वयं को सुरक्षित महसूस कर रही थी। वह भी अपनी माँ की ही तरह रह रहकर वह अपनी पलके मुद लेती। उसकी माँ जिधऱ देखती वह भी उसी तरफ देखती। मानो वह अपनी माँ की नक़ल कर रही हो। यह सब न जाने उसका अत्यधिक खुशी का भाव था या किसी अंतरवेदना का प्रभाव। जो भी हो माँ – बेटी के प्रेम की मूक परिभाषा समझने के लिए लेखक के पास एक सुन्दर अवसर था।

एक बड़े वाहन के कर्कश आवाज में बजे हॉर्न ने उसको एक बार पुनः डरा दिया। अब माँ आगे दूसरी तरफ बढ़ गयी। बिटिया ने भी उसके पीछे पीछे जाने का निर्णय किया। यह उसका सामान्य एवं एक व्यावहारिक स्वभाव था जिसके अनुसार हर छोटा बच्चा अपने माँ के पल्लू को पकड़कर स्वयं को सबसे अधिक सुरक्षित महसूस करता है। शायद यही मनोदशा उस नन्हे बिटिया बच्चे के साथ रही होगी। बछीया बिटिया के मंद गति से बढ़ते पाँव को देखकर लेखक नज़रें ठहर सी गयीं। बिटिया बच्चा अपना एक पैर जमीन पर रख ही नहीं रही थी। उसके एक पैर में गहरी चोट लगी थी,जिसके चलते वह अपने तीन पैरों पर ही चल रही थी। चौथे पैर को जमीन पर रखने की उसकी कुबत नहीं रह गई थी। शायद चौराहे पर खड़ी वह बछिया बिटिया किसी वाहन से चोटिल हो गई थी।

 मानवता को समभाव में रहते हुए मनुष्य और पशु में भेद नहीं करना चाहिए। दोनों के प्यार को यदि आप समझ सकते हैं तो उनकी पीड़ा को भी आपको समझना चाहिए।

♥♥♥♥

© श्री राजेश कुमार सिंह “श्रेयस”

लखनऊ, उप्र, (भारत )

दिनांक 22-02-2025

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – शाश्वत ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – शाश्वत ? ?

लेखक ने लिखा सत्य।लेखक ने लिखा सिद्धांत। लेखक ने लिखा निष्ठा। लेखक ने लिखा स्वाभिमान। लेखक ने लिखा ध्येय।

समय बीतता रहा। सारे शब्द, लेखक के अस्तित्व में गहरे उतर गए। वह जिया सत्य के लिए, वह जिया सिद्धांत के लिए, वह जिया निष्ठा के लिए, वह जिया स्वाभिमान के लिए, वह जिया ध्येय के लिए।

फिर एक दिन लेखक की देह चिता पर चढ़ी। नश्वर थी, सो जलकर राख हो गई। सत्य, सिद्धांत, निष्ठा, स्वाभिमान, ध्येय चिता की आँच में तपे, निखरे, अदाह्य, अकाट्य, अशोष्य बने, शाश्वत हो गए।

 ?

© संजय भारद्वाज  

रात्रि 1:59 बजे, 10.11.2025

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

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संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा # ९० – देवदूत… ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆

श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा –  गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी,  संस्मरण,  आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – देवदूत।)

☆ लघुकथा # ९० – देवदूत श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

झाड़ू लगाने वाली झुमरी जोर-जोर से  घंटी  बजा रही है।

अंदर से एक आवाज – “आई कौन है, जोर-जोर से घंटी क्यों बजा रहा है और सुबह सुबह मेरी नींद क्यों खराब कर दी, कोई चैन से मुझे सोने नहीं देता?”

राम किशोर ने गेट का ताला खोला।

“तुम कौन हो और यहाँ क्यों आई हो?”

बाबा काकी से कह दो कि चाय पिला दे ठंड बहुत लग रही है?

रामकिशोर ने कहा – “काकी की तबीयत बहुत खराब हो गई है, उससे शहर के बड़े अस्पताल में भर्ती कराया गया है, मैं कृष्णकांत का दोस्त हूं।”

झुमरी ने गहरी सांस लेते हुए कहा – “बाबूजी एक ग्लास पानी तो पिला देना।”

रामकिशोर ने कहा- “बेटा अंदर आकर पानी पी लो और चाय बनाओ तुम भी पियो और मुझे भी पिलाओ।”

“अरे बाबू जी आपने सुबह से कुछ नहीं खाया क्या?आपको तो बहुत जोर से खांसी आ रही है?”

“माजी मुझे रसोई नहीं छूने देती, मैं बाहर  झाड़ू लगाती थी और कभी-कभी घर को भी झाड़ू पोछा लगा देती थी।”

रामकिशोर ने कहा- “कोई बात नहीं बेटा अगर तुम्हारे पास समय हो तो चाय हम तुम दोनों पीते हैं और रोटी सब्जी बना दो तो मैं खा लूंगा क्योंकि मुझे खाना बनाना नहीं आता और यहाँ किसी के टिफिन वाले को ढूंढने जा रहा था इस उम्र में घर का खाना ठीक रहता है पर क्या करूं मुझे कोई खाना देने वाला नहीं है।”

“बाबूजी आप मेरे हाथ का छुआ हुआ खाना खाएंगे क्या?” झुमरी ने धीमे स्वर में कहा।

रामकिशोर जी ने कहा – “हां क्यों तेरे हाथ में क्या खराबी है? बाहर होटल में और टिफिन वाले कौन हैं और उनकी जात क्या पता?”

“ठीक है बेटा तू मेरे लिए भगवान बन कर आई हो।”

“बाबा, क्या आप अपने घर में भी अकेले रहते हो?” झुमरी ने उत्सुकता में पूछा।

हां क्या करूं बेटा, मेरे बेटा बहू बाहर विदेश में रहते हैं और मैं अकेला अपने घर में रहता हूं।”

“बाबा मैं आपके लिए अडूसा के पत्ते लेकर आती हूं। आपकी खांसी,बलगम, ज्वार और घुटनों का दर्द सब ठीक हो जाएगा।” 

“भगवान काकी को जल्दी अच्छा कर दे।”

झुमरी और काका दोनों की आंखों से आंसू निकल गए।

“भगवान अच्छे लोगों को इतनी तकलीफ क्यों देता है?” झुमरी कहती कहती रसोई में खाना बनाने लगती है।

राम किशोर मन ही मन सोचते हैं कि भगवान सबको सहारा देता है इस बच्ची के कारण मेरी खांसी भी ठीक हो जाएगी। यह तो सचमुच देवदूत है।

© श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

जबलपुर, मध्य प्रदेश मो. 7000072079

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २४५ – रिटायरमेंट ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ ☆

श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है सामाजिक विमर्श पर आधारित विचारणीय लघुकथा “रिटायरमेंट”।) 

☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २४५ ☆

🌻लघु कथा🌻 रिटायरर्मेंट 🌻

(पुरस्कृत लघुकथा)

अभी घनश्याम बाबू रिटायरर्मेंट होकर घर पहुंच भी नहीं पाये थे। आलमारी में सहेजे गये मेगजीन, पुराने अखबार को बाहर दालान पर ढेर लगा दिया गया था।

हँसते मुस्कुराते चेहरे का रंग अचानक श्वेत होता चला,

सच तो है अब उन पुरानेअखबारों को कौन देखेगा, जिसमें कभी परीक्षा परिणाम देखने की होड़ लगी होती थी।

पापाजी अच्छे दामों से ले रहा कवाड वाला। अब अलमारी में सोनू अपनी किक्रेट मैच का सामान रख लेगा।

शायद अखबार भी रिटायर हो चला।

© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ ≈ मॉरिशस से ≈ गद्य क्षणिका# ८२ – संस्मरण… – ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

श्री रामदेव धुरंधर

(ई-अभिव्यक्ति में मॉरीशस के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री रामदेव धुरंधर जी का हार्दिक स्वागत। आपकी रचनाओं में गिरमिटया बन कर गए भारतीय श्रमिकों की बदलती पीढ़ी और उनकी पीड़ा का जीवंत चित्रण होता हैं। आपकी कुछ चर्चित रचनाएँ – उपन्यास – चेहरों का आदमी, छोटी मछली बड़ी मछली, पूछो इस माटी से, बनते बिगड़ते रिश्ते, पथरीला सोना। कहानी संग्रह – विष-मंथन, जन्म की एक भूल, व्यंग्य संग्रह – कलजुगी धरम, चेहरों के झमेले, पापी स्वर्ग, बंदे आगे भी देख, लघुकथा संग्रह – चेहरे मेरे तुम्हारे, यात्रा साथ-साथ, एक धरती एक आकाश, आते-जाते लोग। आपको हिंदी सेवा के लिए सातवें विश्व हिंदी सम्मेलन सूरीनाम (2003) में सम्मानित किया गया। इसके अलावा आपको विश्व भाषा हिंदी सम्मान (विश्व हिंदी सचिवालय, 2013), साहित्य शिरोमणि सम्मान (मॉरिशस भारत अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी 2015), हिंदी विदेश प्रसार सम्मान (उ.प. हिंदी संस्थान लखनऊ, 2015), श्रीलाल शुक्ल इफको साहित्य सम्मान (जनवरी 2017) सहित कई सम्मान व पुरस्कार मिले हैं। हम श्री रामदेव  जी के चुनिन्दा साहित्य को ई अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों से समय समय पर साझा करने का प्रयास करेंगे।

आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय गद्य क्षणिका “– संस्मरण…” ।

~ मॉरिशस से ~

☆ कथा कहानी  ☆ गद्य क्षणिका # ८२ — संस्मरण — ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

साठ उपन्यासों का ख्यातिलब्ध लेखक आज शर्म और आत्मताप से इस कदर व्यथित था कि उसे लगता था अपने गले में फाँसी की रस्सी डाल कर मर जाए। बात यह थी संस्मरणों की उसकी नवीनतम कृति को विश्व पुरस्कार मिला था। पर उसका अपना तो एक भी संस्मरण नहीं था। अपने संस्मरण दमदार और खास न होने से उसने तीन चार अनपढ़ कर्मठ बूढ़ों से साठ तक संस्मरण सुन कर अपने संस्मरणों के नाम से अपनी कृति तैयार की थी।

© श्री रामदेव धुरंधर

08 – 11 – 2025

संपर्क : रायल रोड, कारोलीन बेल एर, रिविएर सेचे, मोरिशस फोन : +230 5753 7057   ईमेल : rdhoorundhur@gmail.com

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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English Literature – Short Story ☆ ~ Setting Sun and the Earthen Lamp… ~ / अस्ताचल का सूर्य और मिट्टी का दीपक (भावानुवाद) ☆ Captain Pravin Raghuvanshi, NM ☆

Captain Pravin Raghuvanshi, NM

(Captain Pravin Raghuvanshi —an ex Naval Officer, possesses a multifaceted personality. He served as a Senior Advisor in prestigious Supercomputer organisation C-DAC, Pune. He was involved in various Artificial Intelligence and High-Performance Computing projects of national and international repute. He has got a long experience in the field of ‘Natural Language Processing’, especially, in the domain of Machine Translation. He has taken the mantle of translating the timeless beauties of Indian literature upon himself so that it reaches across the globe. He has also undertaken translation work for Shri Narendra Modi, the Hon’ble Prime Minister of India, which was highly appreciated by him. He is also a member of ‘Bombay Film Writer Association’.

We present Capt. Pravin Raghuvanshi ji’s amazing Short Story “~ Setting Sun and the Earthen Lamp ~.  We extend our heartiest thanks to the learned author Captain Pravin Raghuvanshi Ji (who is very well conversant with Hindi, Sanskrit, English and Urdu languages) and his artwork.) 

? Short Story ~ Setting Sun and the Earthen Lamp… ??

As the setting sun, draped in fiery splendour, whispered to the world,

‘Who shall now inherit my radiant duty?’

A reverent hush fell upon the universe— mountains bowed in respect, oceans stilled their tides, and even the winds held their breath…

Then, from a solitary threshold, a tremulous voice arose— the gentle flame of a humble diya, an earthen lamp, its glow quivering yet resolute:

‘I shall, my Lord… as much as this small heart can bear!’

And in that moment, the setting sun bestowed a warm smile upon the earth, knowing that light is eternal, merely passing from one beacon to another!

~Pravin Raghuvanshi

? ~ अस्ताचल का सूर्य और मिट्टी का दीपक ??

जब अस्ताचल का सूर्य अरुणिमा ओढ़े गगन से बोला — अब मेरे प्रकाश का उत्तराधिकारी कौन होगा?”

क्षण भर को थम गई सारी सृष्टि — पहाड़ झुक गए, सागर शांत हो गए, यहाँ तक कि पवन भी थम गई श्रद्धा में।

तभी किसी दहलीज़ से एक कोमल स्वर उठा — मिट्टी के छोटे से दीपक ने, थरथराती लौ में विनम्रता भरकर कहा — मैं करूँगा, प्रभु… जितना मुझसे संभव होगा।

और उस क्षण, डूबते सूर्य ने मुस्कराकर भूमि पर निहारा — जानता था, प्रकाश शाश्वत है, वह तो बस हस्तांतरित होता है…!

 ~प्रवीन रघुवंशी ‘आफ़ताब’

 © Captain Pravin Raghuvanshi, NM

Pune

 © Captain Pravin Raghuvanshi, NM

Pune

≈ Editor – Shri Hemant Bawankar/Editor (English) – Captain Pravin Raghuvanshi, NM ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा – “पहचान” ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

श्री कमलेश भारतीय 

(जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब)  शिक्षा-  एम ए हिंदी , बी एड , प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । यादों की धरोहर हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह -एक संवाददाता की डायरी को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से  कथा संग्रह-महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता)

☆ लघुकथा – “पहचान” ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

कंडक्टर टिकट काट कर सुख की सांस लेता अपनी सीट तक लौटा तो हैरान रह गया। वहां एक आदमी पूरी शान से जमा हुआ था। कोई विनती का भाव नहीं। कोई कृतज्ञता नहीं। आंखों में उसकी खिल्ली उड़ाने जैसा भाव था।

कंडक्टर ने शुरू से आखिर तक मुआयना किया। कोई सीट खाली नहीं थी। बस ठसाठस भरी थी। वह टिकट काटते अब तक दम लेने के मूड में आ चुका था।

– जरा सरकिए,,,

उसने शान से जमे आदमी से कहा।

– क्यों?

– मुझे बैठना है।

– किसी और के साथ बैठो। मैं क्यों सिकुड़ सिमट कर तंग होता फिरुं?

– कृपया आप सरकने की बजाय खड़े हो जाइए सीट से। कंडक्टर ने सख्ती से कहा।

जमा हुआ आदमी थोड़ा सकपकाया , फिर संभलते हुए क्यों उछाल दिया।

– क्योंकि यह सीट मेरी है।

– कहां लिखा है?

जमे हुए आदमी ने गुस्से में भर कर कहा।

– हुजूर , आपकी पीठ पीछे लिखा है। पढ़ लें।

सचमुच जमे हुए आदमी ने देखा, वहां साफ साफ लिखा था। अब उसने जमे रहने का दूसरा तरीका अपनाया। बजाय उठ कर खड़े होने के डांटते हुए बोला- मुझे पहचानते हो मैं कौन हूं? लाओ कम्पलेंट बुक। तुम्हारे अभद्र व्यवहार की शिकायत करुं।

– वाह। तू होगा कोई सडा अफसर और क्या? तभी न रौब गालिब कर रहा है कि मुझे पहचानो कौन हूं मैं। बता आज तक कोई मजदूर किसान भी इस मुल्क में इतने रौब से अपनी पहचान पूछता बताता है? चल, उठ खड़ा हो जा और कंडक्टर की सीट खाली कर। बड़ा आया पहचान बताने वाला। कम्पलेंट बुक मांगने वाला। कम्पलेंट बुक का पता है, कंडक्टर सीट का पता नहीं तेरे को?

उसने बांह पकड़ कर उसे खड़ा कर दिया। अफसर अपनी पहचान बताये बगैर खिड़की से लटक कर रह गया!

© श्री कमलेश भारतीय

पूर्व उपाध्यक्ष हरियाणा ग्रंथ अकादमी

संपर्क :   1034-बी, अर्बन एस्टेट-।।, हिसार-125005 (हरियाणा) मो. 94160-47075

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – कथा कहानी ☆ निष्ठा का अचार ☆ सुश्री इन्दिरा किसलय ☆

सुश्री इन्दिरा किसलय

☆ लघुकथा ☆ निष्ठा का अचार ☆ सुश्री इन्दिरा किसलय ☆

एक युवा बेरोजगार से किसी ने पूछा –एक सवाल का जवाब दोगे !

–हां पूछिए

–मान लो आप राजनीति में हो और चुनाव जीत गये। बड़ी पार्टी ने तुम्हें 100 करोड़ ऑफर किये कि तुम्हें उनकी पार्टी में विलय करना होगा अपने विजयी साथियों के साथ तो तुम क्या करोगे !

 –ये भी कोई पूछने की बात है ?

मतलब बड़ी शान से विलय कर लूंगा।

और तुम्हारी अपनी पार्टी के प्रति निष्ठा का क्या होगा ?

 –निष्ठा का अचार डालना है ! निष्ठा को आजकल पूछता कौन है।

—ठीक है लेकिन इतने पैसों का करोगे क्या ?

दुनिया घूमूंगा। गरीबों की मदद करुंगा। आखिर पैसा ही तो सब कुछ है।

—गांधीजी कहते थे साध्य ही नहीं साधन भी पवित्र होना चाहिए।

— गांधीजी—!   उन्हें तो मैं ही नहीं सारा देश जेब में लेकर घूमता है।

©  सुश्री इंदिरा किसलय 

नागपुर

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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