हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २५१ – तिल गुड़ की मिठास ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ ☆

श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है सामाजिक विमर्श पर आधारित विचारणीय लघुकथा “तिल गुड़ की मिठास”।) 

☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २५१ ☆

🌻लघु कथा🌻 तिल गुड़ की मिठास🌻

माँ रेवा के घाट पर उतरने चढ़ने वाले सीढ़ियों पर दान की आस लगाए जो बैठे रहते हैं। उनमें से एक महिला बहुत ही साफ सुथरी परंतु गंभीर सोचनीय अवस्था में माला जाप करती दिखी।

मकर संक्रांति का पर्व सभी खिचड़ी कोई तिल चाँवल, कोई चाँवल दाल, कोई गुड़ तिल, कोई एक-एक लड्डू देते चला जा रहा था। मानो सारा पुण्य कमा रहे हो।

पंडितों की पंक्तियां बड़े-बड़े लकड़ी के तख्तों पर आसन जमाए बैठे थे। थोड़ी देर बाद वहीं महिला सुंदर से एक प्लेट पर दान से मिले कुछ लड्डुओं को कपकपाते हाथ से पंडित जी के पास आकर कुछ रुपए रख संकल्प करने के लिए कहने लगी।

उसकी शालीनता को देख पंडित जी भी मुस्कुरा दिए। उसी समय सामने के लकड़ी के तख्त पर नजर पर पड़ी। बड़ी श्रद्धा के साथ जो गाँव की महिला अपने बच्चों के साथ हाथ लगाकर संकल्प कर रही थी और कोई नहीं उसके अपने बेटा बहू थी।

पंडित ने नगद नारायण अपने कब्जे में लेते हुए  बाकी कच्ची रसोई पुरी सब्जी उसी अम्मा को देते हुए कहा— ले जा रख तेरा आज का दिन अच्छा है। तुझे मकर संक्रांति मिल रही है तिल के लड्डू मिल रहे हैं। लेजा दान का सीधा आज अच्छे से भोजन करना।

उनके जाने के बाद आँचल फैला, वह दुआ देती कहने लगी जहाँ मैं हूँ, वहाँ कभी मेरे अपने बैठने ना आए।

बस यही दान की दुआ मै मांगती हूँ। बेटा बहू तिल महादान करके बड़े खुश नजर आ रहे थे। वही सर से मुँह छुपाई वह सोच रही थी– यह तिल गुड़ मिठास, या मिलने वाला त्रास।।

© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ ≈ मॉरिशस से ≈ गद्य क्षणिका# ९० – चरित्र – मंथन… – ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

श्री रामदेव धुरंधर

(ई-अभिव्यक्ति में मॉरीशस के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री रामदेव धुरंधर जी का हार्दिक स्वागत। आपकी रचनाओं में गिरमिटया बन कर गए भारतीय श्रमिकों की बदलती पीढ़ी और उनकी पीड़ा का जीवंत चित्रण होता हैं। आपकी कुछ चर्चित रचनाएँ – उपन्यास – चेहरों का आदमी, छोटी मछली बड़ी मछली, पूछो इस माटी से, बनते बिगड़ते रिश्ते, पथरीला सोना। कहानी संग्रह – विष-मंथन, जन्म की एक भूल, व्यंग्य संग्रह – कलजुगी धरम, चेहरों के झमेले, पापी स्वर्ग, बंदे आगे भी देख, लघुकथा संग्रह – चेहरे मेरे तुम्हारे, यात्रा साथ-साथ, एक धरती एक आकाश, आते-जाते लोग। आपको हिंदी सेवा के लिए सातवें विश्व हिंदी सम्मेलन सूरीनाम (2003) में सम्मानित किया गया। इसके अलावा आपको विश्व भाषा हिंदी सम्मान (विश्व हिंदी सचिवालय, 2013), साहित्य शिरोमणि सम्मान (मॉरिशस भारत अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी 2015), हिंदी विदेश प्रसार सम्मान (उ.प. हिंदी संस्थान लखनऊ, 2015), श्रीलाल शुक्ल इफको साहित्य सम्मान (जनवरी 2017) सहित कई सम्मान व पुरस्कार मिले हैं। हम श्री रामदेव  जी के चुनिन्दा साहित्य को ई अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों से समय समय पर साझा करने का प्रयास करेंगे।

आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय गद्य क्षणिका “– चरित्र – मंथन…” ।

~ मॉरिशस से ~

☆ कथा कहानी  ☆ गद्य क्षणिका # ९० — चरित्र – मंथन — ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

बिल्ली अपने सामने खड़े चूहे को मजे – मजे देख रही थी। चूहा अपनी ओर से सतर्क ही था। सहसा भूकंप आने पर चूहा और बिल्ली दोनों एक खंडहर में फँस गए। बिल्ली की साँसें उखड़ने पर आईं। जब कि चूहा तो मज़े – मज़े जी सकता था। बिल्ली तो मर ही जाती कि चूहे ने मिट्टी खोद कर बाहर निकलने का रास्ता बना दिया। खंडहर से मुक्त होने पर चूहे के प्रति कृतज्ञ होते भी बिल्ली ने उसका शिकार कर लिया। बिल्ली चूहों का शिकार करने की अपनी प्रकृति से मजबूर थी। उधर ऐसी बात नहीं कि चूहा न जानता हो कि बिल्ली उसे खा जाएगी। पर मिट्टी खोदने की अपनी प्रकृति से चूहा भी मजबूर था।

 © श्री रामदेव धुरंधर
08 – 01 – 2026

संपर्क : रायल रोड, कारोलीन बेल एर, रिविएर सेचे, मोरिशस फोन : +230 5753 7057   ईमेल : rdhoorundhur@gmail.com

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा – बाइज़्ज़त…! ☆ डॉ. रामेश्वरम तिवारी ☆

डॉ. रामेश्वरम तिवारी

संक्षिप्त परिचय

  • हिंदी-प्राध्यापक(सेवानिवृत्त) महारानी लक्ष्मीबाई शासकीय कन्या स्नातकोत्तर महाविद्यालय, भोपाल  (म.प्र).
  • नई दुनिया, दैनिक भास्कर, वीणा, हंस, धर्मयुग, कादम्बिनी आदि पत्र-पत्रिकाओं में कविता और लघुकथाएँ प्रकाशित। पुस्तकः कविता के ज़रिए,  मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी के सौजन्य से प्रकाशित।

आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – बाइज़्ज़त…!

☆ लघुकथा  बाइज़्ज़त…! ☆ डॉ. रामेश्वरम तिवारी

 

पागल पाशा दिन-दहाड़े दोपहरी के समय सर पर पाँव रखकर सड़क पर बेतहाशा भागा जा रहा था और साथ में अपनी बुलंद आवाज़ में ज़ोर-शोर से चिल्ला रहा था… ‘चल गई… चल गई…! चल गई…!’

जिसको सुनकर बाजार की दुकानों के शटर धड़ाधड़ गिरने लगे। सड़कों पर वाहनों की आवाजाही पर ब्रेक लग गए। आबादी के विस्फोट से लावे की तरह फैलते शहर में अचानक सन्नाटा छा गया।

देश के किसी जागरूक नागरिक ने अपनी देशभक्ति का परिचय देते हुए पुलिस स्टेशन को मोबाइल लगा दिया। सुना है, शहर में चल गई है… आधी-अधूरी सूचना पर पुलिस की गाड़ियाँ सड़कों पर दौड़ने लगी, सायरन बजने लगे, पर किसी भी व्यक्ति ने यह जानने की जरा भी ज़हमत उठाई, न कोशिश की, कि कहाँ और क्या चल गई है…!

पुलिस की बड़ी देर तक चली खोज-बीन और भाग-दौड़ के बाद आखिरकार पाशा पकड़ा गया। उसे पूछताछ के लिए कोतवाली लाया गया। थानेदार के पूछने पर उसने बताया कि कल उसे चलन से बाहर हो चुके चंद अठन्नी के सिक्कों से भरी थैली नाली में पड़ी मिल गई थी जिसे लेकर उसने बॉर से एक पव्वा खरीदा। बगल वाली होटल में बैठकर पीया और साथ में भर पेट बिरयानी खाई। उसके बाद उसे ऐसा नशा चढ़ा कि उसके मुँह से इतना भर निकला… चल गई… चल गई…, लेकिन शहर के दहशतज़दा लोगों ने समझ लिया… गोली चल गई…!

दूसरे दिन शहर की शाँति भंग करने के जुर्म में पुलिस ने पागल पाशा को न्यायाधीश के समक्ष पेश किया। न्यायाधीश ने भूखे पाशा की मनोदशा को ध्यान में रखते हुए सरकार को आदेश दिया कि देश में जितने भी भूखे, नंगे, बेघर हैं उनके लिए खाने, पहनने और रहने का बंदोबस्त किया जाए और पाशा को बाइज़्ज़त बरी कर दिया गया। अदालत से बाहर निकलते हुए, पाशा रहमान का शेर-

‘’वो जो एक पागल है कहते हैं जिसे पाशा,

गुल-रुख़ों की सोहबत में और भी सनकता है।’’

गुनगुनाते हुए हवा में विलुप्त हो गया।

© डॉ. रामेश्वरम तिवारी

सम्पर्क – सागर रॉयल होम्स, होशंगाबाद रोड, भोपाल-462026

मोबाईल – 8085014478

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – ऊहापोह ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – ऊहापोह ? ?

हिरण मोहित था पानी में अपनी छवि निहारने में। ‘मैं’ का मोह इतना बढ़ा कि आसपास का भान ही नहीं रहा। सुधबुध खो बैठा हिरण।

अकस्मात दबे पाँव एक लम्बी छलांग और हिरण की गरदन, शेर के जबड़ों में थी। पानी से परछाई अदृश्य हो गई।

जाने क्या हुआ है मुझे कि हिरण की जगह मनुष्य और शेर की जगह काल के जबड़े दिखते हैं।

ऊहापोह में हूँ, मुझे दृष्टिभ्रम हुआ है या सत्य दिखने लगा है?

?

© संजय भारद्वाज  

प्रातः 6:57, 28.7.2019

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️  भास्कर साधना गुरुवार 1 जनवरी 2026 से  रविवार 11 जनवरी तक चलेगी।

💥 इसका साधना मंत्र होगा- ॐ सूर्याय नम: 💥

🕉️ ग्यारह दिवसीय इस साधना में मौन साधना एवं आत्म-परिष्कार भी साथ-साथ चलेंगे।🕉️

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा # ९८ – विद्या… ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆

श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा –  गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी,  संस्मरण,  आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – विद्या।)

☆ लघुकथा # ९८ – विद्या श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

“तुम्हारा नाम क्या है?” गायत्री जी ने मुस्कुराते हुए कहा।

“दीदी हमें हमारा नाम नहीं पता, कोई काली कह देता है, कोई गुड़िया कह देता है, कोई मुनिया कह देता है, कोई कहता अरे ओ सुन, लेकिन दीदी ज्यादातर लोग कामवाली बाई कहते हैं।”

“ठीक है, ठीक है, ज्यादा बातें मत कर, सीधे काम पर लग जाओ, जल्दी से मुझे रोटी सब्जी बना दो। रसोई में राजमा भीगा पड़ा है, दोपहर में चावल बना लेना। राजमा रोटी मुझे दे दो, बच्चे स्कूल से आएंगे उन्हें खाना खिला देना। रोज के काम की लिस्ट मैं सामने टेबल पर रख चली जाऊंगी पढ़ी-लिखी हो ना।”

“जी दीदी वैसे पांचवी क्लास तक पढ़ी हूं। थोड़ा-थोड़ा जोड़ के अक्षरों को पढ़ लेती हूं आप चिंता मत करो मैं खाना अच्छा बनाती हूं। आपके यहां जो पहले काम करती थी झुमरी वह मेरी मौसी है उसी से मैंने सारा घर का काम खाना बनाना सीखा है, आप किसी बात की चिंता मत करो।”

“मेरे घर से जाते ही तुम अकेली घर में रहोगी ध्यान रखना कोई भी आए दरवाजा मत खोलना। बगल में शर्मा जी का नौकर बहुत तेज है वह जरूर आएगा। ज्यादा किसी से बात मत करना दोपहर में बच्चे आएंगे उन्हें खाना खिला देना शाम को मैं आऊंगी तब तुम्हें घर जाने की छुट्टी मिलेगी। अभी शुरू में तुम्हें ₹5000 दूंगी। काम देखूंगी, फिर पैसे बढ़ाऊंगी।”

“दीदी, स्कूल के बहार तो बहुत भीड़ लगी थी। सब लोग वोट डालने गए हैं क्या आप वोट नहीं डालते?”

“मैं ऑफिस से आते हुए वोट डालते हुए आऊंगी। चलो कोई बात नहीं मैं भी तुम्हारा वोटर आईडी बनवा दूंगी और धीरे-धीरे सारी चीज सिखा दूंगी।”

“दीदी एक बात तो सुनो  हमारे मोहल्ले में कुछ लोग आते हैं। वह हमें बड़ी सी गाड़ी में भरकर ले जाते हैं एक पर्चा देते हैं उसमें बहुत सारे चित्र बने रहते हैं, हमें एक चित्र की ओर इशारा कर देते हैं, हम उस पर ठप्पा लगा देते हैं और हमें पैसे भी मिलते हैं, दीदी साड़ी और रुपया मिलता है। खाना भी बन रहा है मैंने अपने आदमी से कहा कि शाम को घर लेते आना खाने को।”

“कोई बात नहीं अब तुम हमारे यहां काम करने लग गई हो धीरे-धीरे तुझे मैं पढ़ना लिखना और बातें सिखा दूंगी अभी मुझे ऑफिस जाने दें।”

“मैं रविवार को एक बस्ती में गरीब  महिला और बच्चों को पढ़ाने जाती हूं। तुझे भी साथ लिए चलूंगी। तब तो किसी भी कागज में क्या लिखा है खुद पढ़कर समझ सको। अब से तुम्हारा नाम विद्या और अपने विद्या नाम को सफल कर सकोगी। शाम को बढ़िया खाना बना कर रखना।”

मुस्कुराते हुए गायत्री जी अपने कर को स्टार्ट करके ऑफिस चली जाती हैं।

© श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

जबलपुर, मध्य प्रदेश मो. 7000072079

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा – “बलि” ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

श्री कमलेश भारतीय 

(जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब)  शिक्षा-  एम ए हिंदी , बी एड , प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । यादों की धरोहर हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह -एक संवाददाता की डायरी को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से  कथा संग्रह-महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता)

☆ लघुकथा – “बलि” ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

पता नहीं क्यों सब गड्ढमड्ढ सा हुआ जा रहा है। ‌वह एक राजनीतिक समारोह की कवरेज करने आया हुआ है। रोज़ का काम जो ठहरा पत्रकार का ! रोज़ कुआं खोदो, रोज़ पानी पियो ! रोज़‌‌ नयी खबर की तलाश ।

फिर भी आज सब गड्ढमड्ढ क्यों हुआ जा रहा है? क्या पहली बार किसी को दलबदल करते देख रहा है? यह तो अब आम बात हो चुकी ! इसमें क्या और किस बात की हैरानी? फिर भी दिल है कि मानता नहीं । मंच पर जिस नेता को दलबदल करवा शामिल किया जा रहा है, उसके तिलक लगाया जा रहा है और मैं हूं कि बचपन में देखे एक दृश्य को याद कर रहा हूँ। ‌किसी बहुत बड़े मंदिर में‌ पुराने जमाने के चलन के अनुसार एक बकरे को बांधकर लाया गया है और उसके माथे पर तिलक लगाया जा रहा है और‌ वह डर से थरथर कांप रहा है और यहां भी दलबदल करने वाले के चेहरे पर कोई खुशी दिखाई नहीं दे रही । बस, एक औपचारिकता पूरी की जा रही है और‌ गले में पार्टी का पटका लटका दिया गया है । चारों ओर तालियों की गूंज‌ है और मंदिर में‌ बकरा बहुत डरा सहमा हुआ है । दोनों एक साथ क्यों याद‌ आ रहे हैं ? यह मुझे क्या हुआ है? किसने धकेला पार्टी बदलने के लिए? सवाल मन ही मन उठता रह जाता है लेकिन बकरे की बेबसी सब बयान कर रही है….

© श्री कमलेश भारतीय

पूर्व उपाध्यक्ष हरियाणा ग्रंथ अकादमी

संपर्क :   1034-बी, अर्बन एस्टेट-।।, हिसार-125005 (हरियाणा) मो. 94160-47075

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # २३४ – बालकहानी – लिपि की कहानी – ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ ☆

श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

(सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” जी का  हिन्दी बाल -साहित्य  एवं  हिन्दी साहित्य  की अन्य विधाओं में विशिष्ट योगदान हैं। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में रचना सहित 145 बालकहानियाँ 8 भाषाओं में 1160 अंकों में प्रकाशित। प्रकाशित पुस्तकेँ-1- रोचक विज्ञान कथाएँ, 2-संयम की जीत, 3- कुएं को बुखार, 4- कसक, 5- हाइकु संयुक्ता, 6- चाबी वाला भूत, 7- बच्चों! सुनो कहानी, इन्द्रधनुष (बालकहानी माला-7) सहित 4 मराठी पुस्तकें प्रकाशित। मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी का श्री हरिकृष्ण देवसरे बाल साहित्य पुरस्कार-2018 51000 सहित अनेक संस्थाओं द्वारा सम्मानित व पुरस्कृत। साप्ताहिक स्तम्भ “श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य”  के अंतर्गत साहित्य आप प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकते हैं। आज प्रस्तुत है  आपकी रचना बालकहानी – लिपि की कहानी।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # २३४

☆  बालकहानी – लिपि की कहानी ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ 

मुनिया की सुबह तबीयत खराब हो गई। उसने एक प्रार्थनापत्र लिखा। अपनी सहेली के साथ स्कूल भेज दिया। प्रार्थनापत्र में उसने जो लिखा था, उसकी अध्यापिका ने उस प्रार्थनापत्र को उसी रूप में समझ लिया। और मुनिया को स्कूल से छुट्टी मिल गई।

क्या आप बता सकते है कि मुनिया ने प्रार्थनापत्र किस लिपि में लिख कर पहुंचाया था। नहीं जानते हो ? उसने प्रार्थनापत्र देवनागरी लिपि में लिख कर भेजा था।

देवनागरी लिपि उसे कहते हैं, जिसे आप इस वक्त यहाँ पढ़ रहे है। इसी तरह अंग्रेजी अक्षरों के संकेतों के समूहों से मिल कर बने शब्दों को रोमन लिपि कहते हैं।

इस पर राजू ने जानना चाहा, “क्या शुरु से ही इस तरह की लिपियां प्रचलित थीं?”

तब उस की मम्मी ने बताया कि शुरु शुरु में ज्ञान की बातें एक दूसरे को सुना कर बताई जाती थीं। गुरुकुल में गुरु शिष्य को ज्ञान की बातें कंठस्थ करा दिया करते थे। इस तरह अनुभव और ज्ञान की बातें पीढ़ी-दर-पीढ़ी जाती थीं।

मनुष्य निरंतर, विकास करता गया। इसी के साथ उस का अनुभव बढ़ता गया। तब ढेरों ज्ञान की बातें और अनुभव को सुरक्षित रखने की आवश्यकता महसूस हुई।

इसी आवश्यकता ने मनुष्य को प्रत्येक वस्तु के संकेत बनाने के लिए प्रेरित किया। तब प्रत्येक वस्तु को इंगित करने के लिए उस के संकेताक्षर या चिन्ह बनाए गए। इस तरह चित्रसंकेतों की लिपि का आविष्कार हुआ। इस लिपि को चित्रलिपि कहा गया।

आज भी विश्व में इस लिपि पर आधारित अनेक भाषाएं प्रचलित हैं। जापान और चीन की लिपि इसका प्रमुख उदाहरण है। शब्दाचित्रों पर आधारित ये लिपियों इसका श्रेष्ठ नमूना भी है।

चित्रलिपि का आशय यह है कि अपने विचारों को चित्र बना कर अभिव्यक्त किया जाए। मगर यह लिपि अपना कार्य सरल ढंग में नहीं कर पायी। क्यों कि एक तो यह लिपि सीखना कठिन था। दूसरा, इसे लिखने में बहुत मेहनत करनी पड़ती थी। तीसरा, लिखने वाला जो बात कहना चाहता था, वह चित्रलिपि द्वारा वैसी की वैसी व्यक्त नहीं हो पाती थी। चौथा, प्रत्येक व्यक्ति के लिए यह आकर्षण का केंद्र नहीं थी। और यह दुरुह थी।

तब कुछ समय बाद प्रत्येक ध्वनियों के लिए एक एक शब्द संकेत बनाए गए। जिन्हें हम वर्णमाला में पढ़ते हैं। मसलन- क, ख, ग आदि। इन्हीं अक्षरों और मात्राओं के मेल से संकेत-चिन्ह बनने लगे। जो आज तक परिष्कृत हो रहे हैं।

हरेक वस्तु के लिए एक संकेत चिन्ह बनाए गए। विशेष संकेत चिन्ह विशेष चीजों के नाम बताते हैं। इस तरह प्रत्येक वस्तु के लिए एक शब्द संकेत तय किया गया। तब लिपि का आविष्कार हुआ।

इस तरह सब से पहले जो लिपि बनी, उसे ब्राह्मी लिपि के नाम से जाना जाता है। बाद में अन्य लिपियां इसी लिपि से विकसित होती गई।

ऐसे ही धीरे धीरे विकसित होते हुए आधुनिक लिपि बनी। जिसमें अनेक विशेषताएं हैं। प्रमुख विशेषता यह है कि इसे जैसा बोला जाता है, वैसा ही लिखा भी जाता है। अर्थात् यह हमारे विचारों को वैसा ही व्यक्त करती है।

इनमें से बहुत सी लिपियों से हम परिचित हैं । ब्रिटेन में अंग्रेजी भाषा बोली जाती है। इस भाषा को रोमन लिपि में लिखते हैं। पंजाबी भाषा, गुरुमुखी लिपि में लिखी जाती है। इसी तरह तमिल, तेलगु, कन्नड़ तथा मलयालम आदि ब्राह्मी लिपि में लिखी जाती हैं।

अब यह भी जान लें कि विश्व की सबसे प्राचीन लिपियां निम्न हैं- ब्राह्मी, शारदा आदि।

© श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

16-07-2024

संपर्क – 14/198, नई आबादी, गार्डन के सामने, सामुदायिक भवन के पीछे, रतनगढ़, जिला- नीमच (मध्य प्रदेश) पिनकोड-458226

ईमेल  – opkshatriya@gmail.com मोबाइल – 9424079675 /8827985775

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – श्वेतपत्र ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – श्वेतपत्र ? ?

वर्ष बीता, गणना की हुई निर्धारित तारीखें बीतीं।  पुराना कैलेंडर अवसान के मुहाने पर खड़े दीये की लौ-सा फड़फड़ाने लगा, उसकी जगह लेने नया कैलेंडर इठलाने लगा।

वर्ष के अंतिम दिन उन संकल्पों को याद करो जो वर्ष के पहले दिन लिए थे। याद आते हैं..? यदि हाँ तो उन संकल्पों की पूर्ति की दिशा में कितनी यात्रा हुई? यदि नहीं तो कैलेंडर तो बदलोगे पर बदल कर हासिल क्या कर लोगे?

मनुष्य का अधिकांश जीवन संकल्प लेने और उसे विस्मृत कर देने का श्वेतपत्र है।

वस्तुतः जीवन के लक्ष्यों को छोटे-छोटे उप-लक्ष्यों में बाँटना चाहिए। प्रतिदिन सुबह बिस्तर छोड़ने से पहले उस दिन का उप-लक्ष्य याद करो, पूर्ति की प्रक्रिया निर्धारित करो। रात को बिस्तर पर जाने से पहले उप-लक्ष्य पूर्ति का उत्सव मना सको तो दिन सफल है।

पर्वतारोही इसी तरह चरणबद्ध यात्रा कर बेसकैम्प से एवरेस्ट तक पहुँचते हैं।

शायर लिखता है- ‘शाम तक सुबह की नज़रों से उतर जाते हैं, इतने समझौतों पर जीते हैं कि मर जाते हैं।’

मरने से पहले वास्तविक जीना शुरू करना चाहिए। जब ऐसा होता है तो तारीखें, महीने, साल, कुल मिलाकर कैलेंडर ही बौना लगने लगता है और व्यक्ति का व्यक्तित्व सार्वकालिक होकर कालगणना से बड़ा हो जाता है।

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© संजय भारद्वाज  

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ मार्गशीर्ष साधना संपन्न हुई। अगली साधना की जानकारी आपको शीघ्र दी जावेगी। 🕉️💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा # ९७ – श्रद्धा… ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆

श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा –  गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी,  संस्मरण,  आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – श्रद्धा।)

☆ लघुकथा # ९७ – श्रद्धा श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

पल्लवी क्यों ना हम लोग किटी पार्टी में हर महीने 50-50 रुपए सभी लोग इकट्ठा करें हमारे उसमें 12 मेंबर हैं और हर साल दिसंबर में उन पैसों से हम कम्बल खरीदें और किसी आश्रम या मंदिर में गरीबों को दान कर दें?

रोमा दीदी आप ठीक कह रहे हो पर क्या इसके लिए हमारे सारे सदस्य मानेंगे?

क्यों नहीं मानेंगे पल्लवी नेक काम करने में बुराई क्या है?

ठीक है दीदी आप जल्दी आ गई है, मैं थोड़ा सा नाश्ता तैयार कर लेती हूं तब तक सब महिलाएं आती है आप बात करके देख लो?

हिबा ने सभी महिलाओं से कहा कि हम सभी को जरूरतमंद की मदद करनी चाहिए?

ठीक है तो तुम करो ना मदद, हमसे क्यों मांग रही हो हर माह में हम 50-50 रुपए तुम्हारे पास क्यों जमा करें सभी महिलाओं ने एक सुर में कहा।

रीमा ने कहा – तुम लोग हमेशा मकर संक्रांति में तो एक दूसरे को उपहार देती हो सावन में हम भी एक दूसरे को उपहार देते हैं, तो क्यों ना ऐसा कुछ नेक काम भी करें।

बहन रीमा तुम्हें बहुत शौक है तो नेक काम तुम करो जीवन में हमारी बहुत उलझने हैं और हम सब अपने अनुसार दान करते हैं।

तुम्हें हमारा नेता बनकर राय देने की कोई जरूरत नहीं है?

आखिर हम सब लोग इधर-उधर घूमते फिरते हैं होटल में किटी पार्टी करते हैं कुछ लोग घर में भी कर लेते हैं इसलिए क्यों ना कुछ गरीबों को दान दें ।

तभी पल्लवी ने नाश्ता रखते हुए कहा कि रीमा दीदी आप अपने मन से दान करो ना हम सबको क्यों अपनी बात थोप रही हो।

नहीं नहीं पल्लवी हमारी छोटी सी बचत से किसी की जरूरतमंद का की मदद हो जाएगी।

दीदी आप आज की पार्टी का मजा क्यों खराब कर रही हो?

  दीदी तुम बहुत अमीर है। जीजा जी शहर के मशहूर बिजनेसमैन है। घर में नौकर चाकर है होटल में पार्टी देती हो तुम्हारे लिए पैसों का कोई मोल नहीं है पर हम लोगों की स्थिति के बारे में तो सोचो।

सभी दान पूर्ण अपनी हैसियत के हिसाब से करते हैं।

भगवान ने सबको सोचने समझने की शक्ति का दिमाग दिया है सबको अपनी श्रद्धा से कार्य करने दो ना।

© श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

जबलपुर, मध्य प्रदेश मो. 7000072079

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा – असली मालिक…! ☆ डॉ. रामेश्वरम तिवारी ☆

डॉ. रामेश्वरम तिवारी

संक्षिप्त परिचय

  • हिंदी-प्राध्यापक(सेवानिवृत्त) महारानी लक्ष्मीबाई शासकीय कन्या स्नातकोत्तर महाविद्यालय, भोपाल  (म.प्र).
  • नई दुनिया, दैनिक भास्कर, वीणा, हंस, धर्मयुग, कादम्बिनी आदि पत्र-पत्रिकाओं में कविता और लघुकथाएँ प्रकाशित। पुस्तकः कविता के ज़रिए,  मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी के सौजन्य से प्रकाशित।

आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – असली मालिक…!

☆ लघुकथा ☆ असली मालिक…! ☆ डॉ. रामेश्वरम तिवारी

  

माननीय महोदय सत्ता की कुरसी पर क्या विराजे कि अपने आपको मालिक मान बैठे, पर पुलिस और माननीय के बीच बड़ी देर तक चली लुका-छुपी के बाद आख़िरकार माननीय गिरफ्तार कर ही लिए गए।

अगली सुबह पुलिस माननीय को लेकर अदालत पहुँची और ‘माय लार्ड’ से अर्ज किया कि माननीय पर आरोप है कि इन्होंने सरकारी ख़ज़ाने का अपने हित में बेजा इस्तेमाल किया है। अतः कृपाकर माननीय पूछताछ के लिए हिरासत में रखने की अनुमति प्रदान की जाए। ‘माय लार्ड’ को मामला संगीन लगा और उन्होंने तत्काल कस्टडी प्रदान कर दी।

पुलिस पहले से ही माननीय पर ग़ुस्साए बैठी थी…! चूँकि उसको अपने विश्वसनीय और गुप्त स्रोतों से पता चल चुका था कि माननीय द्वारा डकैती की पूरी रकम डकारी जा चुकी है। अतः पुलिस के लिए माननीय के भेजे का ऑपरेशन कर उनके दिल में दफ़्न सारे राज उगलवाना ज़रूरी था।

माननीय पद और परिवार के मद में बुरी तरह अँधे हो चुके थे। वह इस सच्चाई को भूल बैठे थे कि समय सदा-सर्वदा किसी के लिए एक सा नहीं रहता है। वहीं वैसे भी, मौजूदा दौर टेक्नोलॉजी है। चोरी हो या फिर डकैती ज़्यादा समय के लिए राज़ को परदे में छुपाकर रखा जाना मुमकिन नहीं है।

चूँकि देश में लोकतांत्रिक व्यवस्था है। जिसमें सत्ता किसी के बाप की जागीर होती है, न इसमें कोई राजा-महाराजा होता है बल्कि जनता ही देश की असली मालिक होती है। उसको जब भी मौका मिलता है वह बड़े से बड़े पदाधिकारी को उसकी औक़ात दिखा देती है। जिसे वह सर-माथे पर बिठाती है, उसे समय आने पर कचरे की डस्टबीन के हवाले कर देती है।

© डॉ. रामेश्वरम तिवारी

सम्पर्क – सागर रॉयल होम्स, होशंगाबाद रोड, भोपाल-462026

मोबाईल – 8085014478

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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