हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # 190 – शिकन – ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ ☆

श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है पारिवारिक विमर्श पर आधारित एक विचारणीय लघुकथा “शिकन”।) 

☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # 190 ☆

🌻 लघुकथा 〰️ शिकन 〰️

माथे या ललाट पर पड़ने वाली मोटी पतली आडी़ रेखाओं को शिकन कहते हैं। आज से थोड़े पहले पुराने वर्षों में देखा जाए और सोचा जाए तो बुजुर्ग लोग बताया करते थे…. कि देखो वह साधु बाबा ज्ञानी ध्यानी आए हैं। उनके ललाट पर कई रेखाएं(शिकन) हैं। बहुत ही विद्वान और शास्त्र जानते हैं। कोई भी प्रश्न जिज्ञासा हो सभी का समाधान करते हैं।

सभी के बताए अनुसार अजय भी इस बात को बहुत ही ध्यान से सुनता था। दादी – दादा की बातों को बड़े गौर से मन में रख नौ वर्ष का बालक अपने ज्ञान बुद्धि विवेक से जान सकता था कि क्या अभी करना और क्या नहीं करना है।

परंतु बच्चों के मन में कई सवाल उठता है। पहले वह देखा करता था कि दादाजी बड़े ही खुश होकर उठते बगीचे की सैर करते और दिनचर्या निपटाकर अपने-अपने कामों में लगे सभी के साथ बातचीत करते अपना समय व्यतीत करते थे।

परंतु वह देख रहा था कि कुछ दिनों से दादा जी के माथे पर एक दो लकीरें  बनी हुई दिखाई दे रही हैं।

बच्चे ने  गौर से देखा और चुपचाप रहा परंतु देखते-देखते उनके माथे पर कई रेखाएँ/ शिकन बढ़ने लगी थी।

आज खाने की टेबल पर सभी भोजन कर रहे थे। दादाजी के माथे की ओर देख अजय दादी से कहने लगा… दादी – दादी देखो दादाजी अब ज्ञानी ध्यानी बनने लगे हैं। उनको भी बहुत सारी बातों का ज्ञान हो गया है। साधु संत बन जाएंगे।

दादी – दादा के चेहरे का रंग उड़ने लगा। अपने पोते की बातों का… कैसा अर्थ निकाल रहा है?

तभी दादाजी बोल उठे…. हाँ हांँ बेटा हम और तुम्हारी दादी अब साधु बनेंगे और यहाँ से दूर शहर के बाहर जो बगीचा वाला आश्रम है। वहाँ जाकर रहेंगे और वहाँ प्रभु भजन करेंगे।

बेटे बहु समझ नहीं पा रहे थे कि हमारी गुप्त योजना को मम्मी- पापा कैसे समझ गए और नन्हें अजय ने उसे जाने अनजाने ही कैसे पूरी शिद्दत  से बाहर कर दिया।

तभी अजय भौंहे चढ़ा कर बोल उठा… दादाजी मेरी भी एक लकीर बन रही है। अब मैं भी आपके साथ चलूँगा क्योंकि पता नहीं कब यह बहुत सारी बन जाए आपके माथे जैसी तो आप मुझे आगे – आगे बताते जाना मैं आपसे रोज कहानी सुना करूंगा।

मैं भी एक दिन विद्वान बन जाऊंगा। दादा ने गले लगाते हुए कहा – – – नहीं नहीं बेटे अभी तुम्हारी उम्र नहीं है। शिकन – – बुड्डे होने पर बनती है। इसके लिए बुड्ढा होना पड़ता है।

अजय जिद्दमें अड़ा रहा आपको देख – देख कर मेरे माथे में भी शिकन बन जाएगी। मैं तो आपके साथ ही चलूंगा।

दादा- दादी पोते को लेकर सीने से लगाए हंसते हुए रोने लगे। शायद बेटा बहू समझ चुके थे कि अब उनके माथे में लकीरें बनना आरंभ हो जाएगी। माथे को पोंछते वह जाकर मम्मी- पापा के चरणों पर झुक गया।

ना जाने क्या सोच वह गले से लग रो पड़ा। अजय ने कहा… देखो मैं भी साधु बन गया है ना दादाजी, बता दिया तो पापा रोने लगे।

दादा दादी की आँखों से अश्रु धार बहने लगी। माथे की शिकन मिटाते वे अपने बेटे बहु को गले से लगा लिये।

☆

© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य #167 – बाल कहानी – मोना जाग गई ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ ☆

श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

(सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” जी का  हिन्दी बाल -साहित्य  एवं  हिन्दी साहित्य  की अन्य विधाओं में विशिष्ट योगदान हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य”  के अंतर्गत उनकी मानवीय दृष्टिकोण से परिपूर्ण लघुकथाएं आप प्रत्येक गुरुवार को पढ़ सकते हैं। आज प्रस्तुत है आपकी एक “बाल कहानी – मोना जाग गई”)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # 167 ☆

☆ बाल कहानी – मोना जाग गई ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ ☆

मोना चकित थी। जिस सुंदर पक्षी को उसने देखा था वह बोल भी रहा था। एक पक्षी को मानव की भाषा बोलता देखकर मोना बहुत खुश हो गई।

उसी पक्षी ने मोना को सुबह-सवेरे यही कहा था,

“चिड़िया चहक उठी

उठ जाओ मोना।

चलो सैर को तुम

समय व्यर्थ ना खोना।।”

यह सुनकर मोना उठ बैठी। पक्षी ने अपने नीले-नीले पंख आपस में जोड़ दिए। मोना अपने को रोक न सकी। इसी के साथ वह हाथ जोड़ते हुए बोली, “नमस्ते।”

पक्षी ने भी अपने अंदाज में ‘नमस्ते’ कहा। फिर बोला,

“मंजन कर लो

कुल्ला कर लो।

जूता पहन के

उत्साह धर लो।।”

यह सुनकर मोना झटपट उठी। ब्रश लिया। मंजन किया। झट से कपड़े व जूते पहने। तब तक पक्षी उड़ता हुआ उसके आगे-आगे चलने लगा।

मोना का उत्साह जाग गया था। उसे एक अच्छा मित्र मिल गया था। वह झट से उसके पीछे चलने लगी। तभी पक्षी ने कहा,

“मेरे संग तुम दौडों

बिल्कुल धीरे सोना।

जा रहे वे दादाजी

जा रही है मोना।।”

“ओह! ये भी हमारे साथ सैर को जा रहे हैं,” मोना ने चाहते हुए कहा। फिर इधर-उधर देखा। कई लोग सैर को जा रहे थे। गाय जंगल चरने जा रही थी।

पक्षी आकाश में कलरव कर रहे थे। पूर्व दिशा में लालिमा छाने लगी थी। पहाड़ों के सुंदर दिख रहे थे। तभी पक्षी ने कहा,

“सुबह-सवेरे की

इनसे करो नमस्ते।

प्रसन्नचित हो ये

आशीष देंगे हंसते।।”

यह सुनते ही मोना जोर से बोल पड़ी, “नमस्ते दादा जी!”

तभी उधर से भी आवाज आई, “नमस्ते मोना! सदा खुश रहो।”

यह सुनकर मोना चौंक उठी। उसने आंखें मल कर देखा। वह बिस्तर पर थी। सामने दादा जी खड़े थे। वे मुस्कुरा रहे थे, “हमारी मोना जाग गई!”

“हां दादा जी,” कहते हुए मोना झट से बिस्तर से उठी, “दादा जी, मैं भी आपके साथ सैर को चलूंगी,” कह कर वह मंजन करके तैयार होने लगी।

“हां क्यों नहीं!” दादा जी ने कहा।

यह देख सुनकर उसकी मम्मी खुश हो गई।

 –0000–

 © ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

17-01-2022

संपर्क – पोस्ट ऑफिस के पास, रतनगढ़-४५८२२६ (नीमच) म प्र

ईमेल  – opkshatriya@gmail.com मोबाइल – 9424079675

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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Select हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा – 20 – भीख ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆

श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा –  गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी,  संस्मरण,  आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – भीख।)

☆ लघुकथा – भीख ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆

ऑफिस जाने की बहुत जल्दी मैं गोपाल ने चौराहे पर लाल बत्ती देखे कर  बहुत जोर से गुस्सा मैं बड़बड़ने लगा  पता नहीं क्यों लोग चौराहे पर खड़े हो जाते हैं।

10 वर्ष का लड़का उसके स्कूटर को पूछने लगा और उसने कहा कि साहब   ₹50 देकर पुण्य कमा लो।

गोपाल ने कहा मुझे अगर पुण्य कमाने का शौक होता तो मैं मंदिर में जाता यहां नहीं आता?

हरी बत्ती जलती हुई और वह गाड़ी स्टार्ट किया तभी उसके कान में एक संवाद सुनाई दिया तू भी धंधा में नया नया आया है स्कूटी की तरफ नहीं जाते हैं कार,बड़ी गाड़ी की तरफ जाते हैं वह लोग ही पैसे देते हैं यह लोग तो बस ऐसा ही ज्ञान देते हैं।

गोपाल को अपमानित सामाजिक श्रेष्ठता बौद्ध का दर्द ज्यादा दरिया दिल दिखाते हुए उसने उस लड़के को बुलाकर ₹100 दिए।

उस लड़के ने कहा बाबूजी आप ही अपना रुपया रख लो शायद आप के काम आए ऐसा कह कर जेब में डाल दिया।

अपनी भी विवशता थी और अपमान से हृदय छलनी हो गया था और उन्होंने तुरंत स्कूटर स्टार्ट करके अपने ऑफिस की ओर कूच किया।

गोपाल  ने सोचा-  पहले लोग भीख देने पर दुआ देते थे पर अब भिखारियों की भी तरक्की हो गई है उनका भी स्तर और ठाट बाट बढ़ गया है यह नौकरी से अच्छा  धंधा है…..।

तभी उसे बॉस ने अपने केबिन में बुलाया – ऑफिस आने का यही समय है क्या?

गोपाल -दोनों हाथ जोड़कर अपने बॉस से माफी की भीख मांगने लगा  सर मुझे कुछ आवश्यक कार्य के कारण आज ऑफिस आने में देर हो गई…..।

© श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

जबलपुर, मध्य प्रदेश मो. 7000072079

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # 189 – भरतांश – ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ ☆

श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है स्त्री विमर्श पर आधारित एक विचारणीय लघुकथा “भरतांश”।) 

☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # 189 ☆

🌻 लघुकथा 🙏भरतांश🙏

आज त्रेता युग बीते बरसों हो गए हैं। परंतु राम भरत मिलाप की कथा जहाँ भी होती है। सभी के मन को भाव विभोर कर देता है।

द्वेष, अहंकार, घृणा, जलन, बिना वजह बुराई सब अवगुण आदमी के बहुत जल्दी उजागर होते हैं। परन्तु ममता, करुणा, दया, प्रेम, सहानुभूति, क्षमा, श्रद्धा, आदि सभी गुण मानव उभरने नहीं देता।

रथी और देव का विवाह बड़े ही धूमधाम और पारिवारिक माहौल में संपन्न हुआ। कहते हैं परिवार में सभी सदस्यों को खुश नहीं रखा जा सकता। कहीं ना कहीं चूक हो ही जाती है और यदि नहीं हुआ तो समझो उस विवाह का प्रचार जोर-शोर  से नहीं होता। 

रथी के भैया राघव ने कहीं कोई कसर नहीं छोड़ा था। अपनी बहन के विवाह की तैयारी में।

विवाह बहुत ही सुंदर और सादगी से संपन्न हुआ, परंतु किसी बात से असंतुष्ट रथी का पति ‘देव’ अपने ससुराल से इस कदर नफरत करने लगा कि उसने रथी का आना – जाना, बात-चीत और यहाँ तक के की राखी के पवित्र बंधन को भेजने से भी मना कर दिया।

समय बिता गया। राघव भी अपने आप में खुद्दार था। घर परिवार के लिए कहीं ना कहीं से रथी की सलामती का पता लगा लेता था, परंतु कभी कोई संबंध नहीं रखा। ताकि उसकी बहन सुखी रह सके ।

आज एक भागवत कथा पारिवारिक माहौल में संपन्न हो रहा था। सभी परिजन सुनने पहुंचे थे।ऊँचे आसन पर विराजमान पंडित आचार्य जी, भगवान ठाकुर जी की मूर्ति और भव्य पंडाल।

कथा चल रही थी… भगवान राम और भरत के मिलन की। कथा को पंडित जी ने ऐसा शमां बांध रखा था कि सभी नर नारी भाव- विभोर हो उनकी कथा श्रवण कर रहे थे।

रथी ने देखा की भैया तो कभी आगे बढ़कर कोई बात नहीं करेंगे और देव उसे कभी करने नहीं देगा। आज उसके मन में अजीब सा सवाल और भरत मिलाप की कथा का अंश हृदय में हिलोरे ले रहा था।

भरत मिलाप की कथा सुनाते पंडित जी स्वयं रो रहे थे और सारा पंडाल आँसुओं से तरबतर था।

इतनी भावपूर्ण कथा सभी शांति पूर्वक बैठे सुन रहे थे। अचानक रथी सामने से उठकर पीछे अपने भैया की ओर “भैयायययययययया” कहते हुए दौड़ पड़ी।

आँसुओं की धार से वह डूबी दौड़कर अपने भैया राघव के गले से जा लिपटी। राघव शुन्य सा ताकता रहा।  कुछ बात नहीं कर पाया और कुछ बात बिगड़ न जाए। चुपचाप खड़ा रहा।

आस-पास सभी रिश्तेदारों, परिवार वालों ने रथी के इस काम को अपने-अपने तरीके से बोलना सुनना आरंभ कर दिया। परंतु रथी और राघव समझ रहे थे कि बरसों का प्यार आज भरत- मिलाप की कथा सुनकर उमड़ पड़ा। कितना भी मनुष्य कठोर क्यों न हो उसे भी पिघला देता है।

दूर खड़े देव ने देखा भाई – बहन का प्यार निश्चल। बिना कसूर के वह उसे सजा दे रहा था। कई वर्षों बाद आज उसे राम – भरत मिलाप लगने लगा।

राघव ने दूर से देखा दोनों बाहें फैला दिया। चुपचाप देव आकर उसमें समा गया। बाकी चारों तरफ पुष्प वर्षा हो रही थी। कुछ अपने इसका फायदा लेते रथी देव और  राघव पर भी पुष्प वर्षा कर आनंद मना रहे थे।

आज भी मानव के मन में भरत जैसा ही करुणा प्रेम का अंश छुपा है। बस उसे समझने की जरूरत है।

बड़े बूढ़े अत्यंत प्रसन्नता पूर्वक बात करने लगे। पंडित जी ने भी जयकारा लगाने में कोई कसर नहीं छोड़ी ।

☆

© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा-कहानी ☆ लघुकथा – रिश्ता ☆ श्री हरभगवान चावला ☆

श्री हरभगवान चावला

(सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री हरभगवान चावला जी की अब तक पांच कविता संग्रह प्रकाशित। कई स्तरीय पत्र पत्रिकाओं  में रचनाएँ प्रकाशित। कथादेश द्वारा  लघुकथा एवं कहानी के लिए पुरस्कृत । हरियाणा साहित्य अकादमी द्वारा श्रेष्ठ कृति सम्मान। प्राचार्य पद से सेवानिवृत्ति के पश्चात स्वतंत्र लेखन।) 

आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा  – रिश्ता)

☆ लघुकथा – रिश्ता ☆ श्री हरभगवान चावला ☆

एक परिवार के मुखिया का नाम गुरदित्त सिंह था, दूसरे परिवार के मुखिया का नाम हरदित्त सिंह था। दोनों परिवारों के मुखिया एक ही दादा की संतान थे। दोनों परिवारों में अनबन हुई, अनबन मनमुटाव में बदली और मनमुटाव एक तरह की दुश्मनी में। इस दुश्मनी में एक-दूसरे के ख़ून की प्यास नहीं थी, बहिष्कार था। दोनों परिवारों के बीच अब कोई रिश्ता नहीं रहा था। गुरदित्त सिंह अपने परिवार के साथ ‘अ’ ज़िले के अपने पैतृक गाँव अलीपुर में रह रहा था, जबकि हरदित्त सिंह अपने परिवार के साथ ‘ब’ ज़िले के एक गाँव दरियापुर में जा बसा था। हरदित्त सिंह के पोते संदीप सिंह का चयन बतौर गणित अध्यापक हो गया और उसकी पहली नियुक्ति अलीपुर के निकटवर्ती गाँव शेखूपुर के स्कूल में हुई। अब संदीप सिंह ‘अ’ ज़िले के शेखूपुर के निकटवर्ती एक क़स्बे में रह रहा था। यहाँ से उस समेत चार अध्यापक एक कार में एक साथ शेखूपुर जाते थे। शेखूपुर वाली सड़क अलीपुर के खेतों से होकर गुज़रती थी। सड़क के साथ लगते अपने खेत में गुरदित्त सिंह अक्सर काम करते दिखाई देता। संदीप सिंह वहाँ गाड़ी रुकवाता और झुककर रिश्ते के दादा के पाँव छुते हुए ‘पैरी पोना’ कहता। दादा भी उसे आशीर्वाद दे देता।

एक दिन जब उसने हमेशा की तरह पाँव छूकर ‘पैरी पोना’ किया तो गुरदित्त सिंह ने कहा, “सुन भई संदीपे, इस महीने की चौबीस तारीख़ को मेरे पोते सुरजीत सिंह का ब्याह है। न तो मैं तेरे घर कोई कार्ड भेजूँगा, न तेरे परिवार को बुलाऊँगा, पर तू शादी में आ जाणा।” यह बात उसने इतने सहज और सरल तरीक़े से कही कि संदीप के साथी अध्यापक हैरान रह गए। रास्ते में एक साथी अध्यापक ने छेड़ा, “यह कैसा रिश्ता है संदीप कि मैं बुलाऊँगा नहीं, पर तू आ जाणा?”

दूसरे अध्यापक ने कहा, “यह इसके पैरी पोना का इनाम है।”

“वैसे बात अगले ने मुँह पर दे मारी। कमाल है, कोई ऐसे भी कर सकता है कि ख़ुद जिसको शादी में बुला रहा है, उसी के सामने उसके परिवार का अपमान कर रहा है।” तीसरे ने कहा।

“आज मौक़ा है, बनाओ मज़ाक मेरा, पर एक बात कहूँ, ज़माना बेशक बहुत बदल गया है, लेकिन मेरे यह दादा अब भी पुराने ज़माने के खरे किसान ही हैं। बातें गढ़ना नहीं सीखा। इसलिए न उनकी दुश्मनी में कोई खोट है और न प्यार में।”

©  हरभगवान चावला

सम्पर्क – 406, सेक्टर-20, हुडा,  सिरसा- 125055 (हरियाणा) फोन : 9354545440

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ ≈ मॉरिशस से ≈ – बागडोर – ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

श्री रामदेव धुरंधर

(ई-अभिव्यक्ति में मॉरीशस के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री रामदेव धुरंधर जी का हार्दिक स्वागत। आपकी रचनाओं में गिरमिटया बन कर गए भारतीय श्रमिकों की बदलती पीढ़ी और उनकी पीड़ा का जीवंत चित्रण होता हैं। आपकी कुछ चर्चित रचनाएँ – उपन्यास – चेहरों का आदमी, छोटी मछली बड़ी मछली, पूछो इस माटी से, बनते बिगड़ते रिश्ते, पथरीला सोना। कहानी संग्रह – विष-मंथन, जन्म की एक भूल, व्यंग्य संग्रह – कलजुगी धरम, चेहरों के झमेले, पापी स्वर्ग, बंदे आगे भी देख, लघुकथा संग्रह – चेहरे मेरे तुम्हारे, यात्रा साथ-साथ, एक धरती एक आकाश, आते-जाते लोग। आपको हिंदी सेवा के लिए सातवें विश्व हिंदी सम्मेलन सूरीनाम (2003) में सम्मानित किया गया। इसके अलावा आपको विश्व भाषा हिंदी सम्मान (विश्व हिंदी सचिवालय, 2013), साहित्य शिरोमणि सम्मान (मॉरिशस भारत अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी 2015), हिंदी विदेश प्रसार सम्मान (उ.प. हिंदी संस्थान लखनऊ, 2015), श्रीलाल शुक्ल इफको साहित्य सम्मान (जनवरी 2017) सहित कई सम्मान व पुरस्कार मिले हैं। हम श्री रामदेव  जी के चुनिन्दा साहित्य को ई अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों से समय समय पर साझा करने का प्रयास करेंगे। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा  “– बागडोर –”।) 

~ मॉरिशस से ~

☆  कथा कहानी ☆ – बागडोर – ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

युद्ध में पराजय का लक्षण देख कर राजा ने भागते – भागते अपने सैनिकों से कहा, “जयी हो कर लौटना।” राजा अपने महल में छिप कर युद्ध का हाल जानने की कोशिश करता रहा। पराजय की सूचना पर वह देश छोड़ कर भागने वाला था। उसकी सेना जयी हो कर लौटी। पर सैनिकों ने अपना राजा चुन लिया था। वह जमाना ही ऐसा था कायर और अवसरवादी के हाथ में भूल से भी सत्ता की बागडोर छोड़ी नहीं जाती थी।
***

© श्री रामदेव धुरंधर

17– 04 – 2024

संपर्क : रायल रोड, कारोलीन बेल एर, रिविएर सेचे, मोरिशस फोन : +230 5753 7057   ईमेल : rdhoorundhur@gmail.com

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य #166 – बाल कहानी – जादू से उबला दूध ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ ☆

श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

(सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” जी का  हिन्दी बाल -साहित्य  एवं  हिन्दी साहित्य  की अन्य विधाओं में विशिष्ट योगदान हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य”  के अंतर्गत उनकी मानवीय दृष्टिकोण से परिपूर्ण लघुकथाएं आप प्रत्येक गुरुवार को पढ़ सकते हैं। आज प्रस्तुत है आपकी एक “बाल कहानी – जादू से उबला दूध”)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # 166 ☆

☆ बाल कहानी – जादू से उबला दूध ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ ☆

“आओ रमेश,” विकास ने रमेश को बुलाते हुए कहा, “मैं जादू से दूध उबाल रहा हूँ। तुम भी देख लो।”

“हाँ, क्यों नहीं?, में भी तो देखें कि जादू से दूध कैसे उबाला जाता है?” रमेश ने बैठते हुए कहा।

” भाइयों, आपे से मेरा एक निवेदन है कि आप लोग मैं जिधर देखें उधर मेत देखना। इस से जादू का असर चला जायेगा और आकाश से आने वाली बिजली से यह दूध गरम नहीं होगा। “विकास ने कहा और एक कटोरी में बोतल से दूध उँडेल दिया।

“अब मैं मंत्र पढूँगा। आप लोग इस दूध की कटोरी की ओर देखना।” यह कहकर विकास ने आसमान की ओर मुँह करके अपना एक हाथ आकाश की और बढ़ाया, ” ऐ मेरे हुक्म की गुलाम बिजली !  चल जल्दी आ! और इस दूध की कटोरी में उतर जा।”

विकास एक दो बार हाथ को झटक कर दूध की कटोरी के पास लाया, “झट आ जा। लो वो आई,”  कहने के साथ विकास ने दूध की कटोरी की ओर निगाहें डाली। उस दूध की कटोरी में गरमागरम भाप उठ रही थी। देखते ही देखते वह दूध उबलने लगा। विकास ने दूध की कटोरी उठा कर दो चार दोस्तों को छूने के लिए हाथ में दी, ” देख लो, यह दूध गरम है?”

” हाँ,” नीतिन ने कहा,  “मैंने पहले भी कटोरी को छू कर देखा था। वह ठंडी थी और दूध भी ठंड था।”

अब विकास ने कटोरी का दूध बाहर फेंक दिया। तब बोला, ” यह दूध जादू से नहीं उबला था।”

“फिर?” रमेश ने पूछा।

“मैं ने मंतर पढ़ने और बिजली को बुलाने के लिए ढोंग के बहाने इस दूध में चूने का डल्ला डाल दिया था। इससे दूध गरम हो कर उबलने लगा। यह कोई जादू नहीं है।”

“यह एक रासायनिक क्रिया है इसमें चूना दूध में उपस्थित पानी से क्रिया करके ऊष्मा उत्पन्न करता है। जिससे दूध गरम हो कर उबलने लगता है।” विकास ने यह कहा तो सबने तालियां बजा दी।

” लेकिन ऐसे दूध को खानेपीने में उपयोग न करें दोस्तों!” विकास ने सचेत किया।

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 © ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

14-12-2022

संपर्क – पोस्ट ऑफिस के पास, रतनगढ़-४५८२२६ (नीमच) म प्र

ईमेल  – opkshatriya@gmail.com मोबाइल – 9424079675

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा – 19 – अफवाह ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆

श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा –  गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी,  संस्मरण,  आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – अफवाह।)

☆ लघुकथा – अफवाह ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆

“अरे तुमने सुना कमला वो तुम्हारे पड़ोसी  सिंह साहब का बेटा विदेश जा रहा है माँ बाप को वृद्धाश्रम भेज कर कितना आज्ञाकारी बनता था, भई लानत है ऐसी औलाद पर इससे तो ईश्वर बच्चा ही न दे” एक सांस में पूरे मोहल्ले की खबर सुना दी  रेखा भाभी ने कमला को ।

कमला धीरे से बोली “आपको किसने कहा किससे पता चली ये बात”।

“बस तुम्हें ही खबर नहीं सारा मोहल्ला थू थू कर रहा है अभी तो सुनकर आ रही हूँ”।

भाभी सुनी हुई बात हमेशा सच हो जरूरी नहीं।

अभी  थोड़ी देर पहले फोन पर सिंह आंटी से मेरी बात हुई है उन्होंने बताया कि उनका बेटा ट्रेनिंग के लिए विदेश जा रहा है।

सिंह आंटी अपनी बिटिया के पास रहने के लिए जा रही हैं।

आप स्वयं समझदार हैं आपके बहू और बेटे के बारे में भी तो लोग जाने क्या क्या कहते हैं…।

अफवाहों पर यकीन ना करें आप…

अच्छा चलो यह सब बात छोड़ दें हैं कमला एक कप चाय तो पिला आज श्राद्ध अमावस्या में तूने खाने के लिए क्या बनाया है वह लेकर आ….।

© श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

जबलपुर, मध्य प्रदेश मो. 7000072079

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # 188 – प्रतिस्पर्धा – ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ ☆

श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है स्त्री विमर्श पर आधारित एक विचारणीय लघुकथा “प्रतिस्पर्धा”।) 

☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # 188 ☆

🌻 लघुकथा 🌻प्रतिस्पर्धा 🌻

आज के इस भाग दौड़ की जिंदगी में हर जगह प्रतिस्पर्धा की होड़ लगी है। जिसे देखो केवल दिखावा, ऊपरी मुखौटा लगाए हुए चारों तरफ घूम रहा है।

मकान, समान, दुकान, पकवान, पढ़ाई, लिखाई, घर, बंगला, गाड़ी, नेता- अभिनेता, कमाई, ऐश्वर्या, आराम आदि – – – यहाँ तक कि यदि पारिवारिक जीवन का तालमेल भी प्रतिस्पर्धा में टिका हुआ है।

घूम रही है सारी सृष्टि प्रतिस्पर्धा के इस चक्र में। किसी में कोई व्यक्तिगत योग्यता है तो सारा समाज टूट पड़ता है कि कैसे उसे नीचे किया जाए।

अपने को ऊपर उठाने की बजाय उसके कमियों को कुरेदने और निकालने लग जाते हैं। अपना रुतबा मान सम्मान  उससे ज्यादा करके दिखाएं – – इस प्रतिस्पर्धा की दौड़ में वह इस कदर गिर जाता है कि आज के संस्कार भी भूल जाता है कि जीवन में क्या लेना और क्या देना है।

सिर्फ वही एक काम आएगा जो उसका  अपना व्यक्तिगत होगा। ऑफिस में बाबू का काम करते-करते जीवन यापन करते सुंदरलाल और उसकी धर्मपत्नी अपने तीनों पुत्रियों का लालन-पालन बहुत ही सीधे – साधे ढंग से किया। उनकी हर जरूरत का सामान, उनकी आवश्यकता अनुसार ही लेकर देना। माँ भी उन्हें घर गृहस्थी से लेकर जीवन की सच्चाई का बोध कराते संस्कार देते चली थी।

बचपन में मोहल्ले में तानाकशी और सब जगह  यही सुनाई देने वाली बात होती कि अब तीन लड़कियां हैं बेचारी क्या करें?

किसी एक को ही अच्छा बना लेगी तो बहुत बड़ी बात है। सुनते-सुनते बच्चियाँ समझौता करते-करते कब बड़ी होकर अपनी-अपनी योग्यता का परचम लहराने लगी किसी को पता ही नहीं चला।

डाॅक्टर, इंजीनियर और स्कूल शिक्षिका। विद्या, धन और निर्भयता की देवी, आज तीनों बच्चियाँ अपने मम्मी- पापा का नाम शहर में रोशन कर रही थी।

उन्होंने मम्मी – पापा के साथ शहर में एक ऐसी संस्था का निर्माण किया। जिसमें कोई भी, किसी भी समाज की बेटी आकर शिक्षा ग्रहण कर सकती है।

एक वर्ष तक तो सभी ने उनका इतना मजाक बनाया कि बेटियाँ और कर भी क्या सकती है। परंतु आज पूरे न्यूज पेपर, टीवी न्यूज़ चैनलों में खबर फैला हुआ था कि इस शहर से तीन  बेटियाँ जिन्होंने सारा जीवन अपना उन बेटी बच्चियों को समर्पित किया… जो कुछ बनकर इस देश की सेवा इस गाँव  की सेवा और अपने आसपास की सेवा करना चाहती हैं। उन्हें सभी प्रकार की सहायता और सुविधा प्रदान की जाएगी।

समाचार लगते ही नेता, व्यापारी संगठन, समाज, संस्था सभी अपना- अपना बैनर पोस्टर लेकर उनके घर के सामने फूल माला गुलदस्ते सहित खड़े थे।

प्रतिस्पर्धा की होड़ में वह यह भी भूल गए थे की.. कभी किसी ने उन्हें उन बेटियों के मान- सम्मान में ठेस पहुंचाई है। जय माता के नारों, बेटी ही शक्ति है, से पूरा मोहल्ला गूँज रहा था। और कह रहे थे बेटियाँ किसी से कम थोड़े होती है।

बेटियाँ सब कुछ कर सकती हैं। सभी अपनी-अपनी सुनने में लगे थे। प्रतिस्पर्धा किस में नहीं होती यह बात उन तीन बेटियों को अच्छी तरह मालूम था।

☆

© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ ≈ मॉरिशस से ≈ – रोने वाला पेड़ – ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

श्री रामदेव धुरंधर

(ई-अभिव्यक्ति में मॉरीशस के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री रामदेव धुरंधर जी का हार्दिक स्वागत। आपकी रचनाओं में गिरमिटया बन कर गए भारतीय श्रमिकों की बदलती पीढ़ी और उनकी पीड़ा का जीवंत चित्रण होता हैं। आपकी कुछ चर्चित रचनाएँ – उपन्यास – चेहरों का आदमी, छोटी मछली बड़ी मछली, पूछो इस माटी से, बनते बिगड़ते रिश्ते, पथरीला सोना। कहानी संग्रह – विष-मंथन, जन्म की एक भूल, व्यंग्य संग्रह – कलजुगी धरम, चेहरों के झमेले, पापी स्वर्ग, बंदे आगे भी देख, लघुकथा संग्रह – चेहरे मेरे तुम्हारे, यात्रा साथ-साथ, एक धरती एक आकाश, आते-जाते लोग। आपको हिंदी सेवा के लिए सातवें विश्व हिंदी सम्मेलन सूरीनाम (2003) में सम्मानित किया गया। इसके अलावा आपको विश्व भाषा हिंदी सम्मान (विश्व हिंदी सचिवालय, 2013), साहित्य शिरोमणि सम्मान (मॉरिशस भारत अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी 2015), हिंदी विदेश प्रसार सम्मान (उ.प. हिंदी संस्थान लखनऊ, 2015), श्रीलाल शुक्ल इफको साहित्य सम्मान (जनवरी 2017) सहित कई सम्मान व पुरस्कार मिले हैं। हम श्री रामदेव  जी के चुनिन्दा साहित्य को ई अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों से समय समय पर साझा करने का प्रयास करेंगे। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा  “– रोने वाला पेड़ –”।) 

~ मॉरिशस से ~

☆  कथा कहानी ☆ – रोने वाला पेड़ – ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

लोग कहते थे जंगल में एक पेड़ है जो बहुत रोता है। आश्चर्य ही था रोने वाला पेड़ अपरिचित रहने के बावजूद उसके गान के लिए एक जाति पैदा हो गई थी। पेड़ का परिचय तो अब भी खुलता नहीं था, लेकिन उसके गान के लिए सन्नद्ध जाति ने अपना वजूद नहीं खोया। इस जाति की उम्मीद इस अर्थ में बनी रही उस पेड़ के रोने का प्रसंग फिर कहीं छिड़ता और इस जाति के वाद्य सक्रिय हो जाते।
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© श्री रामदेव धुरंधर

04 – 04 – 2024

संपर्क : रायल रोड, कारोलीन बेल एर, रिविएर सेचे, मोरिशस फोन : +230 5753 7057   ईमेल : rdhoorundhur@gmail.com

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈

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