(आदरणीय अग्रज एवं वरिष्ठ व्यंग्यकार श्री शांतिलाल जैन जी विगत दो दशक से भी अधिक समय से व्यंग्य विधा के सशक्त हस्ताक्षर हैं। आपकी पुस्तक ‘न जाना इस देश’ को साहित्य अकादमी के राजेंद्र अनुरागी पुरस्कार से नवाजा गया है। इसके अतिरिक्त आप कई ख्यातिनाम पुरस्कारों से अलंकृत किए गए हैं। इनमें हरिकृष्ण तेलंग स्मृति सम्मान एवं डॉ ज्ञान चतुर्वेदी पुरस्कार प्रमुख हैं। श्री शांतिलाल जैन जी के स्थायी स्तम्भ – शेष कुशल में आज प्रस्तुत है उनका एक अप्रतिम और विचारणीय व्यंग्य “सोनम (गुप्ता नहीं): बावफ़ा से बेवफ़ा तक…” ।)
☆ शेष कुशल # ५६ ☆
☆ व्यंग्य – “सोनम (गुप्ता नहीं): बावफ़ा से बेवफ़ा तक…”– शांतिलाल जैन ☆
वफ़ा का तो ऐसा है जनाब कि एक अनचाहा कदम उठा और आप बावफ़ा से बेवफ़ा हुए. 2016 की नोटबंदी में दस रूपए के नोट से मशहूर हुई सोनम गुप्ता के बेवफ़ा होने की कहानी की असलियत का तो अभी तक पता नहीं चला मगर सोनम के बेवफ़ा होने की चर्चा फिर से एकबार आम हो चली है. लेह के अवाम ने मनचाहा कदम उठाना चाहा तो मुल्क के निज़ाम ने अनचाहा फील किया और ‘सोनम(टू) बावफ़ा से बेवफ़ा’ हो गई. दस का नोट बच गया. लिखकर मुनादी कराने की जरूरत भी ना पड़ी.
अह्द आसान है पर उसकी वफ़ा मुश्किल है. सूबे को आईन की छठी अनुसूची में जोड़ेंगे. वादा किया था निज़ाम ने. निभाया तो नहीं और बेवफ़ाई का इल्ज़ाम अलबत्ता सोनम के नाम जड़ दिया. कसूर बस इतना ही कि वे दो-तीन बरस से मुक़ाबिल थे निज़ाम के, दाग़ देहलवी का शेर दोहरा रहे थे – ‘वफ़ा करेंगे निबाहेंगे बात मानेंगे, तुम्हें भी याद है कुछ ये कलाम किस का था.’
स्टीरियो टाईप जवाब निज़ाम का – ‘क्यूँ पशेमाँ हो अगर वअ’दा वफ़ा हो न सका, कहीं वादे भी निभाने के लिए होते हैं.’
अब अवाम के इस भोलेपन पर क्या ही कहें – आदतन तुमने कर लिए वादे और आदतन हमने ए’तिबार कर लिया. वादा तो पूर्ण राज्य का दर्ज़ा देने का भी था. ’सादगी तो हमारी ज़रा देखिए ए’तिबार आपके वादे पर कर लिया.’ इंतिज़ार लंबा खिंचा तो इधर सूबे का अवाम सड़कों पर उतर आया, उधर निज़ाम की आँखों में खून उतर आया. यूँ तो निज़ाम की बेवफ़ाई के दर्ज़नों किस्से हवा में तैरते रहते हैं मगर आँखों में इतनी तेज़ी से खून उतर आए ऐसा कम ही हुआ होगा. खून जो निज़ाम की आँखों में उतरता है वो अवाम की छाती चीर कर बहने लगता है. चार निर्दोष जवान सीने चाक् कर दिए गए. वफ़ादार नायक कल तक निज़ाम की आँख का तारा हुआ करे था, फलक से टूटा तो सीधे जेल में लेंड कर गया. पुलिस भी तेरी, अदालत भी तेरी, गवाह भी तू ही रहा. वफ़ा खुद से नहीं होती ख़फ़ा अवाम पर होते हो!!
निज़ाम के पास सतह से लेकर समंदर और आसमां को तक को चीरने के लिए सेना मौजूद थी. मगर उसकी सबसे मज़बूत सेना वर्चुअल दुनियाँ में थी – ट्रोल आर्मी. पुलिसिया कार्रवाई के सामानांतर चलते ट्रोल, कीचड़ फैंकने, कालिख पोतने में प्राम्प्ट भी और प्रवीण भी. बेवफ़ा का ख़िताब नवाजने तक सीमित नहीं रही ट्रोल आर्मी. ‘थ्री ईडियट्स’ का प्रेरणा-नायक, शिक्षाविद, दुनिया के सौ सबसे प्रभावशाली टाइम क्लाईमेट लीडर्स में शामिल एक खरा-खरा पर्यावरण संरक्षक, देशभक्त को गद्दार, पाकिस्तानी एजेंट जैसे कारतूस चला-चला कर लहू-लुहान कर दिया उसने. गंगोत्रियाँ झूठ की भी तो होती हैं जनाब. सोनम को बेवफ़ा का ख़िताब नवाजने की मैली-धारा आईटी सेल की गंगोत्री से निकली और मीडिया में बह चली. ‘बेवफ़ा’ से ‘बदनाम हुई’ तक सोनम(टू) सलाखों के पीछे है, उसका सवाल है –
’मुझ से क्या हो सका वफ़ा के सिवा,
मुझ को मिलता भी क्या सज़ा के सिवा.’
मुनासिब जवाब किसी के पास नहीं, अपन के पास तो बिलकुल नहीं.
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(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)
(प्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक साहित्य ” में हम श्री विवेक जी की चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं। श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी , जबलपुर ) से सेवानिवृत्त हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। आपको वैचारिक व सामाजिक लेखन हेतु अनेक पुरस्कारो से सम्मानित किया जा चुका है।आज प्रस्तुत है एक विचारणीय व्यंग्य – “व्यंग्य – काँपटेबिलिटी सॉफ्टवेयर अपडेट करो भगवान” ।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ३८३ ☆
व्यंग्य – काँपटेबिलिटी सॉफ्टवेयर अपडेट करो भगवान श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆
कहा जाता है जोड़ियां स्वर्ग में बनती हैं, लेकिन लगता है भगवान को अपनी “मैचमेकिंग सिस्टम” की फाइलें फिर से स्कैन करनी होंगी। शायद उनके कंप्यूटर में “ विवाह सॉफ्टवेयर 1.0” अब बग से भर गया है। वरना धरती पर इतने असंगत युगल हर दिन “कम्पैटिबिलिटी एरर” क्यों दिखा रहे हैं।
शर्मा जी और उनकी पत्नी संगीता जी को ही ले लीजिए। शर्मा जी सुबह छह बजे उठकर योग और प्राणायाम करते हैं, और संगीता जी सुबह आठ बजे उठकर योगा नहीं बल्कि “जोगाड़” शुरू कर देती हैं कि आज खाना बाजार से किस तरह बुलवाया जाए । शर्मा जी नमक की मात्रा नाप-नापकर कम से कम खाते हैं और संगीता जी का सिद्धांत है कि “स्वाद, मूड से ज्यादा, भरपूर नमक से आता है।”
गुप्ता दंपति का हाल देखिए , गुप्ता जी को टीवी पर न्यूज़ देखना सबसे प्रिय लगता है, वो भी वो न्यूज़ जहां एंकर चीख-चीख कर बहस कर रहे हों। वहीं उनकी पत्नी सीमा जी को लगता है कि टीवी का उपयोग केवल “सास बहू सीरियल” के लिए है। नतीजा यह कि हर शाम गुप्ता जी और सीमा जी के बीच रिमोट वैसा ही मुद्दा बन जाता है जैसा संसद में बजट बिल। एक तरफ चीखता एंकर, दूसरी ओर रोती सास , घर में दोनों ही कार्यक्रम बराबर चलते हैं।
राजेश और कविता की जोड़ी में तो और भी दिलचस्प मेल है। राजेश को सुबह की सैर इतनी प्रिय है कि वो बिना घूमे दिन शुरू ही नहीं कर सकते। कविता के लिए सुबह की सैर का मतलब है,नींद में करवट बदल लेना। राजेश पार्क से लौटकर कहते हैं “तुम्हें भी चलना चाहिए था,” तो कविता तकिया पलटकर कहती हैं “तुम घूम आए न, कितने चैन से सोई मै पिछले एक घंटे।”
वर्मा जी को लगता है कि छुट्टी का दिन घर की डीप क्लीनिंग के लिए होता है, पंखा खोलो, बल्ब बदलो, स्क्रू कसो। और उनकी पत्नी मंजू जी मानती हैं कि छुट्टी का मतलब है “शॉपिंग डे”। नया कुकर, नई साड़ी, नई डील। सुबह से दोनों अपनी-अपनी दिशा में निकल पड़ते हैं, एक औजारों के साथ, दूसरी ऑफरों के साथ। शाम को थके हुए होते हैं, पर भगवान की राम मिलाई अपनी जोड़ी पर हंसते हैं।
कपड़ों पर भी मतभेद किसी राष्ट्रीय मुद्दे से कम नहीं। राठौर साहब की पत्नी को चटख रंग इतने पसंद है कि लगता है जैसे हर त्योहार होली ही हो। वहीं राठौर साहब को सफेद इतना प्रिय है कि लोग उन्हें देखकर पूछते हैं “क्या आप किसी फॉर्मल सम्मेलन से आ रहे हैं?” दोनों एक साथ बाजार जाते हैं, पत्नी कहती हैं “यह लाल साड़ी कितनी प्यारी है,” और पति सोचते हैं “अब घर में ट्रैफिक सिग्नल लगेगा क्या?”
भोजन पर बात छिड़े तो हर जोड़ा किसी कुकिंग शो का प्रतियोगी लगता है। मिस्टर तिवारी नॉनवेज के शौकीन हैं और मैडम तिवारी प्याज तक नहीं खाती। पति के हाथों में चिकन टिक्का और पत्नी के हाथों में तुलसीपत्र, किचन और पूजा घर के बीच दो विचारधाराएं टकराती हैं। पर प्रेम देखिए, दोनों साथ बैठकर खाते हैं, शायद एक स्वाद से, दूसरा सहनशीलता से।
घूमने का मामला तो और भी मजेदार है। मिश्रा जी कहते हैं “कश्मीर चलो, ठंड में मज़ा है।” और उनकी पत्नी कहती हैं “गोवा चलो, धूप में मज़ा है।” नतीजा यह कि दोनों समझौते में शिमला के रास्ते निकलते हैं और मनाली पहुंचकर भी एक दूसरे के शारीरिक थर्मोस्टेट को दोष देते हैं।
फिटनेस का भी अपना संघर्ष है। श्रीमती अग्रवाल जीरो फिगर के लिए डाइट पर हैं सलाद, सूप, स्मूदी। और अग्रवाल जी कहते हैं “भई जीवन में स्वाद न रहे तो सेहत का क्या फायदा।” जब वो परांठे खाते हैं तो श्रीमती जी उसे देख कर कहती हैं “तुम्हें अपने दिल की चिंता नहीं?” अग्रवाल जी हंसते हुए कहते हैं “दिल की ही सुनता हूं, दिल को खुशी चाहिए।”
एक और वर्ग है, सेल्फी बनाम सन्नाटा। पत्नी को हर मौके पर फोटो चाहिए। खाना खाया, फोटो। मंदिर गए, फोटो। झगड़ा हुआ, तब भी फोटो, ताकि बाद में दिखा सकें। बल्कि झगड़ा ही इस बात पर शुरू होता है। श्रीमान जी को कैमरा देखकर ही तनाव हो जाता है, लगता है हर क्लिक के साथ उनके निजी जीवन की पिक्सल घटती जा रही है।
तो क्या अब समय आ चुका है कि भगवान जोड़ियां बनाने वाला अपना सॉफ्टवेयर अपडेट कर ले।
शायद ये सारे पति-पत्नी एक जैसे सोचने लगें तो क्या बच जाएगा? न बहस, न नोक झोंक वाली मुस्कान, “तुम हमेशा ऐसे ही क्यों करते हो ? वाला ताना, फब्ती।” विवाह तब वैसा हो जाएगा जैसे बिना नमक की खिचड़ी या बिना विज्ञापन का टीवी ।
इसलिए कहा जा सकता है कि भगवान ने जो जोड़ियां बनाईं, वे असंगति नहीं, रोचकता से भरी हैं। भगवान ने प्रेम के कोड में जानबूझकर थोड़ा “कन्फ्यूजन” डाला है, ताकि रिश्ते नीरस न हों। वरना शर्मा जी और संगीता जी अगर दोनों योगी बन जाएं, तो कौन ठहाके लगाएगा? गुप्ता जी अगर सीरियल देखने लगें, तो न्यूज चैनल बंद ना हो जाएंगे।
भगवान को सॉफ्टवेयर बदलने की जरूरत नहीं, बस उसमें एक नया अपडेट डालना चाहिए “विवाह वर्जन 2.0 बस इतना कि श्रीमती श्रीवास्तव के 20 डिग्री ऐ सी के चलते मिस्टर श्रीवास्तव को रात में दूसरे बेड रूम में शिफ्ट न होना पड़े।”
जहां हंसी है, वहीं रिश्ता स्वस्थ है, और जहां रिमोट की छीना-झपटी चल रही है, वहां प्रेम जिंदा है। आखिर मीठा विरोध ही तो विवाह की ऑक्सीजन है। थोड़ी ठंड, थोड़ी गर्मी, पर दोनों साथ में, हमेशा “स्वर्गिक संगति” में।
वरिष्ठ पत्रकार, लेखक श्री प्रतुल श्रीवास्तव, भाषा विज्ञान एवं बुन्देली लोक साहित्य के मूर्धन्य विद्वान, शिक्षाविद् स्व.डॉ.पूरनचंद श्रीवास्तव के यशस्वी पुत्र हैं। हिंदी साहित्य एवं पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रतुल श्रीवास्तव का नाम जाना पहचाना है। इन्होंने दैनिक हितवाद, ज्ञानयुग प्रभात, नवभारत, देशबंधु, स्वतंत्रमत, हरिभूमि एवं पीपुल्स समाचार पत्रों के संपादकीय विभाग में महत्वपूर्ण दायित्वों का निर्वहन किया। साहित्यिक पत्रिका “अनुमेहा” के प्रधान संपादक के रूप में इन्होंने उसे हिंदी साहित्य जगत में विशिष्ट पहचान दी। आपके सैकड़ों लेख एवं व्यंग्य देश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। आपके द्वारा रचित अनेक देवी स्तुतियाँ एवं प्रेम गीत भी चर्चित हैं। नागपुर, भोपाल एवं जबलपुर आकाशवाणी ने विभिन्न विषयों पर आपकी दर्जनों वार्ताओं का प्रसारण किया। प्रतुल जी ने भगवान रजनीश ‘ओशो’ एवं महर्षि महेश योगी सहित अनेक विभूतियों एवं समस्याओं पर डाक्यूमेंट्री फिल्मों का निर्माण भी किया। आपकी सहज-सरल चुटीली शैली पाठकों को उनकी रचनाएं एक ही बैठक में पढ़ने के लिए बाध्य करती हैं।
प्रकाशित पुस्तकें –ο यादों का मायाजाल ο अलसेट (हास्य-व्यंग्य) ο आखिरी कोना (हास्य-व्यंग्य) ο तिरछी नज़र (हास्य-व्यंग्य) ο मौन
आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय व्यंग्य “नेता याने अगुआ”।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ प्रतुल साहित्य # १७ ☆
☆ व्यंग्य ☆ “नेता याने अगुआ” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆
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प्रायमरी शाला में पढ़ाया गया था “नेता याने अगुआ”। पहले अगुआ कम ही हुआ करते थे, पिछलग्गू अधिक होते थे। अगुआ ने जो कहा पिछलग्गुओं ने उसे मान कर उसका अनुसरण करना शुरू कर दिया, किंतु अब नई पीढ़ी में देखा जा रहा है कि पिछलग्गू बनने कोई तैयार नहीं। सब अगुआ याने नेता बनना चाहते हैं।
पुराने अगुआ नए अगुओं से परेशान हैं। वे चाहते हैं, अच्छे ठोस किस्म के पिछलग्गू, लेकिन आज का पिछलग्गू केवल पिछलग्गू ही नहीं बना रहना चाहता, बड़े अगुओं के साथ चलना तो चाहता है, किंतु छोटा अगुआ बनकर। इसी तरह की चेन ऊपर से नीचे तक बन गई है।
इसे यों भी कहा जा सकता है कि हमारे देश में – “सारे एक समान” के मूल संदेश को कितने अच्छे ढंग से आत्मसात किया गया है कि अब यहां न तो कोई अकेला अगुआ है और न तो कोई मात्र पिछलग्गू। जो अगुआ है वह किसी न किसी का पिछलग्गू अवश्य है और जो पिछलग्गू है वह कहीं न कहीं किसी न किसी का अगुआ भी है।
हमारे शहर के लिए यह गौरव की बात है कि हमने इस क्षेत्र में भी देश के किसी अन्य शहर, कस्बे अथवा गांव से हेटी नहीं खाई। जबलपुर की साहित्यिक चेतना पर कुछ लोग व्यंग्य करते हुए कहते हैं कि यदि कोई यहां पत्थर उठा कर फेंके तो वह कवि के घर गिरता है। यह सच है – भले ही लोग इस बात पर हमारा मजाक उड़ाएं, लेकिन इस सच पर हमें नाज है। उसी तरह अब हम सीना ठोक कर कह सकते हैं कि हमारे शहर में नेताओं की स्थिति भी कुछ ऐसी ही है बल्कि इससे कहीं ज्यादा सुदृढ़। आने वाले समय में हमें कम से कम यह नहीं कहना पड़ेगा कि नेतृत्व के अभाव में हमारे शहर का विकास नहीं हुआ है। हां, नेतृत्व की अधिकता में विकास अवरुद्ध हुआ यह कहना पड़ जाए तो बात अलग है।
अभी तक लोग कहा करते थे कि नेताओं के मामले में उत्तर प्रदेश धनी है। अब हम मध्यप्रदेश की वर्तमान स्थिति को देख कर कह सकते हैं कि आने वाले समय में नेताओं के मामले में हमारा प्रदेश और विशेष रूप से हमारा नगर जबलपुर किसी से कम नहीं रहेगा, बल्कि कई प्रदेशों के रिकॉर्ड तोड़ेगा। यहां के अधिकांश नवयुवकों में नेतागिरी के प्रति असीम उत्साह और लगन को देखते हुए कहा जा सकता है कि शीघ्र ही यहां से देश को नए नेताओं की बड़ी खेप मिलेगी।
अनेक युवक और छात्र इन दिनों पूर्णकालिक नेतागिरी के कार्य में रत हैं। सुबह से शाम तक एक ही कोशिश में लगे रहते हैं, कैसे अगुआ बनें, कहां नेतागिरी पकाएं। कौन सी समस्या पर चका जाम, धरना, प्रदर्शन किया जाए, किसे काले झंडे दिखाए जाएं ? कौनसा आंदोलन शुरू किया जाए अथवा किसे खत्म कराया जाए। अखबारों में विज्ञप्तियां भेजने के लिए विषयों की खोज करना भी कोई इन नए नेताओं से सीखे।
कोई बड़े नेता आ रहे हैं, फटाफट सैकड़ों की संख्या में स्वागत अथवा विरोध संबंधी विज्ञप्तियां भेज देंगे। कोई दुर्घटना हुई नहीं कि विज्ञप्तियां जारी। सहयोगी की उपलब्धि पर विज्ञप्ति, सड़क, पानी, बिजली पर विज्ञप्ति। रेलों, बसों, हवाई जहाजों पर विज्ञप्ति। स्कूलों – कॉलेजों, विश्वविद्यालयों पर विज्ञप्तियां। कचरे के ढेरों, आवारा जानवरों पर विज्ञप्ति, पेशाब घरों पर विज्ञप्ति। पुलिस की ज्यादती पर विज्ञप्ति, पुलिस की कमजोरी पर विज्ञप्ति।
कहने का अर्थ आप समझ ही गए होंगे। नेता बनना है तो अखबार में नाम छपना जरूरी है, और नाम छपवाना है तो कोई न कोई बहाना तो होना ही चाहिए। अगुआ याने नेता, नेतृत्व करता है। ध्यान आकर्षित करता – कराता है। कार्य करना कर्मचारियों का अथवा उनका काम है जो नेता अथवा पिछलग्गू नहीं हैं। सब महसूस कर रहे हैं कि इन दिनों काम नहीं हो रहे अथवा मंद गति से हो रहे हैं। इसके पीछे क्या कारण हैं आप समझ गए होंगे। सब अगुआ अथवा पिछलग्गू बनकर ध्यान आकर्षित करा रहे हैं, विज्ञप्तियां दे रहे हैं, काम कौन करे ? कुछ यही हाल सरकारी दफ्तरों के भी हैं यहां का अगुआ अधिकारी अथवा बॉस कहलाता है फिर उससे छोटे अधिकारी होते हैं जो बॉस के पिछलग्गू लेकिन बाबुओं के लिए तो बॉस ही होते हैं। बड़ा अधिकारी याने बॉस याने ऑफिस का अगुआ आदेश निकलता है। छोटे बॉस उसे पूर्ण करने कर्मचारियों को प्रसारित करते हैं और कितना काम होता है यह सभी जानते हैं।
नेताओं की नई खेप में ज्यादातर वर्तमान नेताओं के भाई, भतीजे, पुत्र हैं तो कुछ अन्य संपन्न परिवारों के महत्वाकांक्षी युवा भी हैं जो नेतागिरी को व्यवसाय के रूप में अपना कर यश कीर्ति और धन अर्जित करना चाहते हैं पर जिनसे न तो दो शब्द बोलते बनते हैं, न लिखते – विज्ञप्ति किस विषय पर बनाई जाए यह सोचते भी नहीं बनता, लेकिन अगुआ बनने की आकांक्षा है। नेतागिरी के गुर और बोलना बताना सिखाने के लिए भी अब कोचिंग स्कूलों की जरूरत महसूस की जा रही है। ठीक है व्यक्ति को महत्वाकांक्षी व असंतुष्ट होना चाहिए, तभी तरक्की संभव है। अरस्तू ने कहा है कि संतुष्ट मनुष्य से अच्छा असंतुष्ट सुअर होता है।
(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय डॉ कुन्दन सिंह परिहार जी का साहित्य विशेषकर व्यंग्य एवं लघुकथाएं ई-अभिव्यक्ति के माध्यम से काफी पढ़ी एवं सराही जाती रही हैं। हम प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहते हैं। डॉ कुंदन सिंह परिहार जी की रचनाओं के पात्र हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं। उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपका एक अप्रतिम विचारणीय कथा – ‘समाज में बाहुबलियों की अहमियत’। इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार # ३१० ☆
☆ व्यंग्य ☆ समाज में बाहुबलियों की अहमियत ☆
हाल ही में एक घटना ऐसी हुई जिसने बहुत भावुक कर दिया। बरेली में एक अभिनेत्री की बहन के घर पर एक बाहुबली के आदेश पर गोलियां चल गयीं। बाहुबली की नाराज़ी का कारण यह था कि अभिनेत्री की बहन ने एक कथावाचक के द्वारा स्त्रियों के विरुद्ध दिये गये बयान पर अपना रोष व्यक्त किया था। बाहुबली ने अभिनेत्री की बहन की टिप्पणी को सनातन का अपमान बताया था और उन्हें दंडित करने का निश्चय जताया था ।बाहुबली ने यह भी चेतावनी दी कि सनातन का अपमान करने वाले किसी भी व्यक्ति को बख्शा नहीं जाएगा।
खबर सुनकर भावुकता से मेरा दिल भर आया। दो दिन तक कंठावरोध रहा। जहां सनातन के इतने बलशाली रक्षक हों वहां सनातन को हानि पहुंचाने की जुरअत भला कौन कर सकता है? अब सनातन पूर्णतया सुरक्षित है। हमारा संत समाज अब निश्चिन्त हो सकता है। अब सनातन को हल्के में लेने की मूर्खता भला कौन करेगा? ‘जब जब होय धरम की हानी, बाढ़ैं असुर अधम अभिमानी; तब तब धरि प्रभु विविध शरीरा, हरहिं कृपानिधि सज्जन पीरा।’ प्रभु कौन सा रूप धरकर धर्म की रक्षा के लिए अवतरित हो जाएंगे, कौन कह सकता है? कथावाचकों का पक्ष लेते हुए बाहुबली ने स्पष्ट कर दिया है कि ‘इनहिं कुदृष्टि बिलोकै जोई, ताहि वधे कछु पाप न होई।’ अब कथावाचक निश्चिंत होकर बीस फीट दूर से प्रेतग्रस्त आदमी को थप्पड़ लगा सकते हैं या छात्रों को बिना पढ़े पास होने के नुस्खे बता सकते हैं।
बाहुबली की धमकी के बाद कथावाचकों पर जब तब फब्तियां कसने वालों को सांप सूंघ गया है। उन पर गुस्सा दिखाने वाले कलमधारी अब चुपचाप अपनी कलम चबा रहे हैं। उनके शब्द डर के मारे कागज पर उतरने से इनकार कर रहे हैं।
सनातन के रक्षक एक वकील साहब सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की टिप्पणी से ऐसे नाराज़ हुए कि उन्होंने उसे सनातन का अपमान माना और मुख्य न्यायाधीश की तरफ जूता उछाल दिया। इस पराक्रम के साथ उन्होंने नारा दिया—‘सनातन का अपमान, नहीं सहेगा हिंदुस्तान ।’ दुष्यंत कुमार ने लिखा था ‘एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारो।’ वकील साहब को कोर्ट के चेंबर में कोई पत्थर नज़र नहीं आया तो जूता उछाल दिया। बहादुरी के इस काम से वकील साहब ने बता दिया कि कि वे देश की न्याय व्यवस्था को जूते की नोक पर रखते हैं। वकील साहब ने यह नहीं बताया कि उन्हें पूरे हिंदुस्तान का वकील बनने के लिए किसने वकालतनामा सौंपा था।
बाहुबली की धमकी से जो सन्नाटा खिंचा उससे धर्म की रक्षा के मामले में एक नया आयाम उद्घाटित हुआ। हमारे देश में धर्मस्थलों की सुरक्षा पर सरकार का बहुत धन व्यय होता है। नये राम मंदिर की सुरक्षा के इंतज़ाम पर नज़र डालें तो दिमाग चक्कर खा जाता है। तीन प्रकार के बल वहां सुरक्षा में लगाये गये हैं, कैमरों और ड्रोन की तैनाती है, मंदिर को घेरती चार किलोमीटर की दीवार है। कई दूसरे धर्मस्थलों पर भी सुरक्षा बल तैनात हैं। गरज़ यह कि जो संसार की रक्षा करते हैं उनकी रक्षा आदमी कर रहा है। कई धर्मगुरुओं को भी सरकार के खर्चे पर सुरक्षा दी गयी है, जो सवाल पैदा करती है कि अपने को भगवान का कृपापात्र मानने वालों और मृत्यु का दिन पूर्व निर्धारित मानने वालों को आदमी की दी हुई सुरक्षा की ज़रूरत क्यों पड़ती है?
तो दिमाग में यह विचार आता है कि अगर पीपीपी अर्थात पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप के अंतर्गत सरकार धर्म की रक्षा हेतु बाहुबलियों का सहयोग लेने लगे तो मामला ‘कम कीमत बालानशीं’ वाला हो जाएगा। बाहुबली की एक चेतावनी आएगी और धर्म के कार्यों में गड़बड़ी करने वाले सभी उपद्रवियों के औसान ढीले हो जाएंगे। फिर धर्मगुरुओं को भी सुरक्षा की ज़रूरत नहीं रहेगी।
देश के कई क्षेत्रों में बाहुबलियों की तूती बोलती है, उनकी अदालतें लगती हैं, लेकिन अफसोस है कि सरकार ने उनकी ताकत और क्षमताओं का समुचित उपयोग नहीं किया। जो काम सरकार द्वारा लाखों रुपया खर्च करने पर भी नहीं होता वह बाहुबली के एक निर्देश पर हो सकता है।
राहत की बात है कि कुछ राज्यों ने अपने बाहुबलियों की संभावनाओं को पहचाना है और उनका सहयोग लेने में रुचि दिखायी है। बिहार के आसन्न चुनाव के लिए एक दल ने तीन बाहुबलियों को मैदान में उतारा है, जब कि दूसरे दल ने एक पूर्व बाहुबली के संभावना-संपन्न पुत्र और एक ऐसे बाहुबली की पुत्री को टिकट दिया है जो फिलहाल संगीन अपराध में जेल में बन्द हैं और जनता की सेवा करने की स्थिति में नहीं हैं। पुत्री ने साफ घोषणा की है कि वे अपने यशस्वी पिता को जेल से बाहर लाने के लिए ही चुनाव लड़ना चाहती हैं। एक और बाहुबली की पत्नी को भी टिकट से नवाज़ा गया है। कुछ दिन पूर्व सुशासन बाबू ने कानून में परिवर्तन करके एक बाहुबली को उनकी उपयोगिता को देखते हुए जेल से मुक्त कराया था। अब उनके पुत्र को टिकट दिया गया है ताकि पिताजी पुत्र के पीछे बैठकर ‘बैक सीट ड्राइविंग’ कर सकें। इस तरह जब बाहुबली कानून के शिकंजे में आ जाते हैं तो उनकी पत्नी या पुत्र को टिकट दे दिया जाता है ताकि समाज की सेवा में अवरोध न हो।
यह संतोष की बात है कि अपराधी प्रवृत्ति के लोगों की हमेशा धर्म में रुचि रही है। देश के दस्यु अक्सर मंदिरों में घंटे चढ़ाते रहे हैं। जो पिंडारी कहलाते थे वे काली के उपासक होते थे। वाल्मीकि की डाकू से महर्षि बनने की कथा सर्वविदित है।
मेरे ख़याल से बाहुबलियों की उपयोगिता और उनकी क्षमता के मद्देनज़र सरकार को चाहिए कि संकोच त्याग कर समाज के कल्याण में उनकी भागीदारी सुनिश्चित करे। ‘साफ छिपते भी नहीं, सामने आते भी नहीं’ वाली नीति की अब कोई ज़रूरत नहीं है।
ताज़ा समाचार यह है कि बिहार के चुनाव में करीब दो दर्ज़न बाहुबली मैदान में उतर रहे हैं। अब मेरी चिन्ता यह है कि कहीं ऐसा न हो कि धीरे-धीरे विधानसभा की सारी सीटों पर बाहुबली विराज जाएं और बिहार प्रगति के मार्ग पर ऐसा सरपट दौड़े कि पूरा देश देखता रह जाए।
(सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” जीका हिन्दी बाल -साहित्य एवं हिन्दी साहित्य की अन्य विधाओं में विशिष्ट योगदान हैं। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में रचना सहित 145 बालकहानियाँ 8 भाषाओं में 1160 अंकों में प्रकाशित। प्रकाशित पुस्तकेँ-1- रोचक विज्ञान कथाएँ, 2-संयम की जीत, 3- कुएं को बुखार, 4- कसक, 5- हाइकु संयुक्ता, 6- चाबी वाला भूत, 7- बच्चों! सुनो कहानी, इन्द्रधनुष (बालकहानी माला-7) सहित 4 मराठी पुस्तकें प्रकाशित। मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी का श्री हरिकृष्ण देवसरे बाल साहित्य पुरस्कार-2018 ₹51000 सहित अनेक संस्थाओं द्वारा सम्मानित व पुरस्कृत। साप्ताहिक स्तम्भ “श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य” के अंतर्गत साहित्य आप प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकते हैं। आज प्रस्तुत है आपका व्यंग्य – “बने रहो पगला”।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # २२७ ☆
☆ व्यंग्य – बने रहो पगला☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ ☆
“वह पागल है!” जैसे ही उसने कहा. मैं बोला, “भाई! इतना समझदार आदमी पागल कैसे हैं?” तब मेरे उसे मित्र ने मुझे ही पूछ लिया, “भाई! पागल किसे कहते हैं?”
मैं उसकी और यह प्रश्न समझ नहीं पाया. इसलिए मैंने पूछ लिया, “तू ही बता दे. पागल किसे कहते हैं?”
वह हंसा. तब मैंने जवाब दिया, “जो अपना काम ढंग से ना करें, वही पागल है.”
यह अचानक मेरे मुंह से निकल गया था.
“यह तो बहुत अच्छी परिभाषा है. तभी हम व्यवहार में कह देते हैं. क्या तुझ से यह भी काम ठीक से नहीं होता है. क्या तू पागल है?”
इस तरह एक सामान्य व्यक्ति को पागल कहना पागल की तौहीन है. इसका आशय तो यह है कि आप पागल को पागल नहीं कह रहे हैं, एक सामान्य व्यक्ति को पागल कह रहे हैं जो बहुत ही समझदार हैं. तब पागल को क्या कहेंगे?
मेरे लिए बहुत ही गहन प्रश्न था. जिसका चिंतन मैं मन ही मन करता रहा. मगर पागल की परिभाषा मेरे समझ से परे थी. इसी उधेड़बुन में मैं बैठा था कि तभी वरिष्ठ कार्यालय से एक ‘अर्जेंट डॉक’ आ गई. क्योंकि मैं काम में व्यस्त था इसलिए एक सहकर्मी से कहा, “भाई साहब! यह डाक बना दीजिए. बहुत ही अर्जेंट है. अभी पहुंचाना है.”
बड़े साहब ने मेरा समर्थन किया. तब वह सहकर्मी बोला, “आप प्रारूप बना दीजिए. मैं डाक भर दूंगा.” यह सुनकर मैं एक बार झलाया. कैसा पागल है? साला! मैं इसे डाक बनाने की कह रहा हूं. और यह मुझे ही प्रारूप बनाने की कह रहा है. मगर साहब के आदेश देने पर मैंने उसे प्रारूप बना दिया.
उसने प्रारूप में जानकारी भरी. दो और तीन की जोड़ छह लिख दी. फिर मेरे सामने आकर बोला, “अरे भाई! गलती हो गई.” फिर दो-तीन साथ बोलते हुए छह को काटकर सात कर दिए.
उसकी यह हरकत देखकर मुझ पर पागलपन का दौरा पड़ गया. मैंने कहा, “अरे भाई! यह क्या करते हो? दो और तीन पांच होते हैं.” मेरा यह जवाब सुनते उसने कहा, “अरे भाई! माफ करना. जल्दी में था. अभी दो और तीन पांच कर देता हूं.” और उसने वापस छह को काटकर पांच कर दिया.
पांच उसने इतनी बार काटा था कि वह नजर ही नहीं आ रहा था. वह छह, सात है या पांच है. इसी तरह उसने दूसरे कॉलम में भी बहुत कांटपिट की थी. यानी पूरा प्रारूप खराब कर दिया था.
यह देखकर वास्तव में मुझ में पागलपन का दौरा पड़ गया. मैं मन ही मन भड़क पड़ा, “साला! पागल! फोकट की तनख्वाह लेता है. एक अक्षर ठीक से लिखना नहीं आता. कामचोर कहानी का.”
मगर मैं प्रत्यक्ष में कुछ नहीं बोला. उससे कहा, “साहब के पास ले जाकर साइन करा दीजिए. तब उसने तपाक से जवाब दिया, “साहब के पास तो आप ही जाइए,” कहते हुए उसने कागज वहीं पटक दिया.
आखिर कागज साहब के पास मुझे ले जाना पड़ा. फिर वही हुआ जिसका मुझे अंदेशा था. साहब ने मुझे कागज दिखाते हुए कहा, “यह क्या है? यह कागज अधिकारी को भेजूंगा तो मुझे पागल समझेंगे. इसे दोबारा बनाओ.”
तब मेरे इस सहकर्मी ने कहा, “आप प्रारूप बना दीजिए. इस बार में अच्छी तरह भर दूंगा. मैंने दोबारा प्रारूप बनाकर उसे दिया. फिर उसने वही गलती दोहरा दीं. तब मजबूर होकर तीसरी बार मैंने प्रारूप बनाकर स्वयं ही भर दिया. मैं नहीं चाहता था कि चौथी बार मुझे प्रारूप बनाना पड़े.
इसके बाद मैंने सहकर्मी को कभी काम करने को नहीं कहा. क्योंकि मुझे पता था एक बार उससे काम कराया तो दोबारा मुझे ही करना पड़ेगा. इसलिए स्वयं ही काम करने में अपनी भलाई थी. ताकि एक बार में वह काम हो जाए.
मगर, वह वास्तव में वह पागल था या मुझे पागल बना रहा था. वह मुझे जल्दी ही पता चल गया. उसकी एक बस चलती थी. जिसमें वह सुबह शाम पैसे कलेक्ट किया करता था. उसी बस से मुझे एक बार गांव जाने पड़ा.
मैं बस में पीछे बैठा था. सहकर्मी कंडक्टर से एक सीट पर हिसाब लिख रहा था. तब उसकी गणित देखकर मैं दंग रह गया. यहां पर वह रूपए पैसे का हिसाब बिल्कुल एक्यूरेट लिख रहा था. चाहे जितना भी बड़ा अमाउंट हो, उससे वह गलत नहीं हो रहा था.”
यह देखकर मुझे बहुत ताजुब हुआ. वास्तव में वह पागल नहीं था. वह मुझे पागल बना रहा था. ताकि मैं पागल बनकर उसका और मेरा काम करता रहूं. तभी मुझे मालूम हुआ कि यह मंत्र कितना अच्छा है~ बने रहो पगला, काम करेगा अगला.
अब मुझे समझ आया था कि पागल बनने के कितने फायदे हैं. एक तो आपको काम नहीं करना पड़ता. दूसरा, एक ही काम को बार-बार करने से आप व्यस्त दिखते हो. लोगों को लगता है कि आप बहुत काम करते हो. आपके पास समय नहीं है. यदि आपसे काम करवाना है तो फुर्सत में मिलना पड़ेगा.
दूसरा, कोई व्यक्ति बेवजह आपके पास नहीं आता है. जिसको भी काम होगा वह आपको चाय की कैंटीन में ले जाएगा. साहब जी चाय पीकर आते हैं. आप बहुत काम कर रहे हो. इसलिए थोड़ा थक गए होंगे. थोड़ा आराम कर लीजिए.
तीसरा, काम करते हुए साहब भी आपको डिस्टर्ब करना पसंद नहीं करते हैं. वे सोचते हैं कि यह व्यक्ति तो काम करता रहता है. किसी दूसरे व्यक्ति को काम देना चाहिए. इसलिए उल्टा सीधा लिखने का, यह तीसरा सबसे बड़ा फायदा है.
चौथा फायदा मेरे मित्र ने बताया था. उसने कहा था, “यदि आपको सभी के बीच बहुत ही मेहनती और वर्कर बना रहना है तो आपको एक मंत्र अपनाना होगा.”
तब मैंने तपाक से पूछा, “आप भी बता दीजिए.”
तब उसने कहा कि वह मंत्र है कि काम की फिक्र करो. काम का जिक्र करो. बार-बार जोर-जोर से कहो. मगर काम मत करो.
यह फायदा सुनकर मेरे मुंह से निकल गया, “वाह मित्र! बहुत ही बेहतरीन नुस्खा बताया है. शायद मैं अमल में ला सकूं. इसकी कोशिश करूंगा.” मैंने यह अपनाने की कोशिश भी की. पर मेरा पागल मन इसे अपने को तैयार नहीं हुआ. वह कहने लगा तू इतना भी पागल नहीं है कि पागल बनने का ढोंग कर सके.
मगर, जब धीरे-धीरे मैंने अपने आसपास निगाहें दौड़ना शुरू किया तब मालूम हुआ कि इतने कामगारों की बीच में ही अकेला पागल हूं. जो अपना काम पूरे पागलपन से करता हूं. वे सब समझदार व बुद्धिमान लोग, मुझे हिकारत की नजर से देखते हैं.
मेरे एक तीसरे मित्र को देखा. वह अपने आसपास फाइलों का ढेर लगा लेता है. बीच में अपना कागज निकाल कर अपना निजी काम करता है. जब भी कोई साहब आए, झट से फाइल में लिखना शुरू कर देता है. तब अपना कागज नीचे दबा देता है.
मैं कई दिनों से उसे देख रहा था. तब मुझे लगा कि वास्तव में इस जैसा समझदार कोई नहीं है. तब मुझे एक नई परिभाषा सूझ गई. जो दूसरे को पागल बना दे वह सबसे बड़ा समझदार है. इस परिभाषा के मद्देनजर मैं ही दूसरों को सबसे बड़ा पागल दिखाई दे रहा था.
मैं अभी यही सोच रहा था कि उसे सहकर्मी के पास एक व्यक्ति आकर सामने बैठ गया. उसने झट से उसकी तरफ देखा. वह कुछ बोलना चाहता था कि सहकर्मी ने रोक दिया. अभी एक मिनट रुक जाइए. मुझे बहुत अर्जेंट काम है. उसके बाद में आपका काम सुनता हूं.
यह इशारा कर के वह फाइल में अपना काम करने लगा. सामने वाला आधे घंटे तक उसके सामने बैठा रहा. उसके बाद मजबूरन में उसे कहना पड़ा, “साहब! मेरी सुन लीजिए मुझे बहुत जरूरी काम है. दुकान छोड़कर आया हूं.”
“ठीक है. बताइए,” कहकर सहकर्मी मित्र ने उसकी बात सुनी. और हां~ हूं करते हुए फाइल को देखता रहा. जिससे लगे कि वह सबसे व्यस्ततम सहकर्मी है. उसे सांस लेने तक की फुर्सत नहीं है.
यह देखकर संक्षिप्त में उसे मित्र ने कुछ बात कही और मेरे सहकर्मी को एक लिफाफा पकड़ कर चल दिया. यह देखकर मुझे लगा कि वास्तव में लिफाफा कमाना हो और अपने को व्यस्त दिखाना जरूरी हैं. नहीं तो इस पागलपन से बढ़कर कोई दूसरा चारा नहीं.
तब मैं ने भी सोचा कि मैं भी इस मंत्र को अपनाने की कोशिश करूं. बने रहो पगला, काम करेगा अगला. मगर, जब इसमें कामयाब नहीं हुआ तो मैं दूसरे मंत्र को अपनाने की कोशिश की. काम की फिक्र करो, काम का जिक्र करो, उसकी खूब चर्चा करो, पर काम ना करो. मगर मैं उसमें अभी तक कामयाब नहीं हुआ हूं. लगता है कभी ना कभी तो कामयाब होऊंगा.
यदि आप भी चाहे तो इसका उपयोग करके अपना जीवन सफल बना सकते हैं.
वरिष्ठ पत्रकार, लेखक श्री प्रतुल श्रीवास्तव, भाषा विज्ञान एवं बुन्देली लोक साहित्य के मूर्धन्य विद्वान, शिक्षाविद् स्व.डॉ.पूरनचंद श्रीवास्तव के यशस्वी पुत्र हैं। हिंदी साहित्य एवं पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रतुल श्रीवास्तव का नाम जाना पहचाना है। इन्होंने दैनिक हितवाद, ज्ञानयुग प्रभात, नवभारत, देशबंधु, स्वतंत्रमत, हरिभूमि एवं पीपुल्स समाचार पत्रों के संपादकीय विभाग में महत्वपूर्ण दायित्वों का निर्वहन किया। साहित्यिक पत्रिका “अनुमेहा” के प्रधान संपादक के रूप में इन्होंने उसे हिंदी साहित्य जगत में विशिष्ट पहचान दी। आपके सैकड़ों लेख एवं व्यंग्य देश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। आपके द्वारा रचित अनेक देवी स्तुतियाँ एवं प्रेम गीत भी चर्चित हैं। नागपुर, भोपाल एवं जबलपुर आकाशवाणी ने विभिन्न विषयों पर आपकी दर्जनों वार्ताओं का प्रसारण किया। प्रतुल जी ने भगवान रजनीश ‘ओशो’ एवं महर्षि महेश योगी सहित अनेक विभूतियों एवं समस्याओं पर डाक्यूमेंट्री फिल्मों का निर्माण भी किया। आपकी सहज-सरल चुटीली शैली पाठकों को उनकी रचनाएं एक ही बैठक में पढ़ने के लिए बाध्य करती हैं।
प्रकाशित पुस्तकें –ο यादों का मायाजाल ο अलसेट (हास्य-व्यंग्य) ο आखिरी कोना (हास्य-व्यंग्य) ο तिरछी नज़र (हास्य-व्यंग्य) ο मौन
आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय व्यंग्य “यहां सभी भिखारी हैं”।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ प्रतुल साहित्य # १६ ☆
☆ व्यंग्य ☆ “यहां सभी भिखारी हैं” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆
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पशु – पक्षियों में भले ही मनुष्यों के गुण न पाए जाते हों पर मनुष्यों में पशु-पक्षियों के गुणों के दर्शन अवश्य ही होते हैं। यदि कुछ लोगों के क्रियाकलापों और चाल ढाल से हमें उनमें चतुर, फुर्तीले, साहसी वनराज “शेर” के दर्शन होते हैं तो राजनीति में अथवा हमारे आसपास ऐसे भी अनेक लोग हैं जिनमें हमें गधा, कुत्ता, बंदर, उल्लू, बाज अथवा चालाक लोमड़ी के गुण कूट कूट कर भरे हुए दिखाई देते हैं। आप सभी इस तरह की वर्तमान राष्ट्रीय विभूतियों से परिचित हैं इसलिए मैं किसी का नाम नहीं लेना चाहता।
पर्यावरणविद और पशु – पक्षी प्रेमी अनेक प्रजातियों के जीव – जंतुओं की संख्या में निरंतर आ रही गिरावट के कारण चिंतित हैं। विज्ञान के माध्यम से विलुप्त हो चुके जीवों को पुनर्जीवित करने और घट रहे जीवों को बचाने के तरह – तरह के उपाय खोजे जा रहे हैं। सनातन मान्यता है कि आत्मा सभी प्राणियों में एक ही है जो कभी नहीं मरती वरन कर्मों के आधार पर क्रमशः श्रेष्ठ योनि प्राप्त करती है। मुझे तो लगता है कि विलुप्त हो रहे प्राणी मनुष्यों के रूप में जन्म ले रहे हैं तभी तो मनुष्यों की संख्या में अपार वृद्धि हो रही है। आपको ऐसा नहीं लगता जैसे धरती से बिल्कुल समाप्त हो चुके डायनासोरों का पुनर्जन्म अमेरिका, रूस और चीन के राष्ट्रपतियों के रूप में हो रहा है ?
खैर, अभी हाल ही में मैंने जब एक समाचार पढ़ा कि मध्य प्रदेश में गधों की संख्या में भारी गिरावट आई है तो गधों के प्रति मेरा हृदय पीड़ा से भर गया। जब मध्य प्रदेश जैसा सौजन्यता व शांति से भरा क्षेत्र गधों को पसंद नहीं आ रहा और उनकी संख्या घट रही है तो देश के अन्य क्षेत्रों में भी इसमें अवश्य ही गिरावट दर्ज हुई होगी। समाचार में बताया गया है कि 27 वर्ष पहले मध्य प्रदेश में 49 हजार गधे थे जो आज घटकर मात्र 3052 रह गए हैं। प्रदेश के 9 जिले तो गधा विहीन घोषित हो चुके हैं। अब यहां किसी को ढेंचू – ढेंचू की आवाज सुनाई नहीं देती। नर्मदापुरम में सर्वाधिक 335 गधे हैं जबकि संस्कारधानी जबलपुर में मात्र 4 गधे बचे हैं। “न काहू से दोस्ती न काहू से बैर” भाव से शांति पूर्वक जीवन यापन करने वाले गधों के प्रति मेरे हृदय में गहरी संवेदना है। आखिर गधा कब तक और कितना अपमान सहे ? यदि किसी महिला या पुरुष को गाय की तरह सीधा कह दो तो वह इसे अपनी प्रशंसा अथवा सम्मान समझता है किंतु अगर उसे गधा कह दिया जाए तो उसका घोर अपमान समझा जाता है। शासन-प्रशासन ने तो गधा शब्द को असंसदीय शब्दों की सूची में डाल दिया है। शिक्षकों पर प्रतिबंध है कि वह किसी विद्यार्थी को गधा न बोले वरना उसे जेल भी जाना पड़ सकता है। मैं समझता हूं कि गधे में राग – द्वेष, मान-अपमान से परे पवित्र आत्मा का वास होता है। वह ईमानदार, कर्मठ, सहनशील और अहिंसक होता है। यदि गधा मोटी चमड़ी का असंवेदनशील प्राणी नहीं होता तो इतने घनघोर अपमान से अब तक तो इसकी पूरी नस्ल ही समाप्त हो गई होती। सरकार अनेक विलुप्त हो रहे हिंसक पशु – पक्षियों तक के संरक्षण के लिए चिंतित व प्रयासरत है। मेरा सरकार सहित पशु प्रेमियों से आग्रह है कि संसार के इस सीधे साधे प्राणी को बचाने के लिए भी युद्ध स्तर पर प्रयास शुरू करें क्योंकि यदि गधा नहीं होगा तो बुद्धिमानों की पहचान करना कठिन हो जाएगा। गधों पर शोध करने वाले वैज्ञानिकों का कहना है कि गधा बलिष्ठ होता है, यह 10 किलोमीटर दूर की गंध भी सूंघ सकता है, अपने चेहरे से भाव प्रकट करने की क्षमता भी इसके पास होती है। चीन में गधे की खाल से “एजियाओ” नामक दवा बनाई जाती है जिसके कारण हर साल लाखों गधों की हत्या की जाती है।
एक बात और है, कुछ चतुर लोग स्वेच्छा से “गधत्व” अपना लेते हैं उन्हें स्वयं को गधा घोषित करने अथवा कहलाने में कोई शर्म-संकोच नहीं होता। लोगों के बीच गधा घोषित हो जाने के फायदे भी हैं। काम के जानकार चतुर लोगों या कर्मचारियों के बीच ये आराम से रहते हैं, इन्हें कभी जिम्मेदारी से भरे महत्वपूर्ण कार्य नहीं सौंपे जाते। भोंदू बने रहने वाले, सार्वजनिक रूप से “गधा” घोषित इन लोगों की उपस्थिति को हानि रहित मानकर लोग खुलकर अधिकारियों की या अन्य महत्वपूर्ण लोगों की निंदा और गोपनीय बातें करते रहते हैं। गधे की खाल ओढ़े ऐसे व्यक्ति सुनी हुई इन बातों को इधर से उधर करके मौका मिलने पर चतुरों के कान काट लेते हैं। ऐसे बने बनाए गधों को ही “पंजीरी का भोग” प्राप्त होता है। वह जमाना गया जब गधे को शेर की खाल पहनना पड़ती थी, अब लोग गधे की खाल पहन कर अपना उल्लू सीधा कर रहे हैं। शायद आपको मालूम न हो कि गधों के कल्याण की भावना से 8 मई को विश्व गधा दिवस मनाया जाता है। भाइयो गधों की उपेक्षा नहीं करें, उनसे नफरत नहीं, प्रेम करे।
(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय डॉ कुन्दन सिंह परिहार जी का साहित्य विशेषकर व्यंग्य एवं लघुकथाएं ई-अभिव्यक्ति के माध्यम से काफी पढ़ी एवं सराही जाती रही हैं। हम प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहते हैं। डॉ कुंदन सिंह परिहार जी की रचनाओं के पात्र हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं। उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपका एक अप्रतिम विचारणीय व्यंग्य – ‘मानव शरीर के फालतू अंग ‘। इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार # ३०९ ☆
☆ व्यंग्य ☆ मानव शरीर के फालतू अंग ☆
कुछ दिनों से ख़बर गर्म थी कि बाबा जी ने परलोक के साथ ‘हॉटलाइन’ स्थापित कर ली है और देवताओं से उनकी रोज़ बातचीत होती है। उनका कहना है कि चित्रगुप्त जी से उनका हंसी- मज़ाक भी हो जाता है और अगर कोई भक्त चाहे तो वे स्वर्ग में ‘रिज़र्वेशन’ के लिए उसकी सिफारिश कर सकते हैं।
ऊपर वालों के साथ बाबा के रसूख के बारे में सुनकर उनके दरबार में भक्तों की संख्या दिन दूनी रात चौगुनी बढ़ रही थी। इसी क्रम में एक दिन पांच छः लोग कुछ शिकायतें और सुझाव लेकर बाबा के दरबार में हाज़िर हुए। वे बाबा के मार्फत अपनी शिकायतें और सुझाव ऊपर पहुंचाने की मुराद लेकर आये थे।
समूह के लोगों ने बाबा को बताया कि वे देश की एक बड़ी संख्या की भावनाएं लेकर आये हैं। उन्होंने कहा कि देश के बहुत से लोग इस बात को लेकर व्यथित हैं कि आदमी को जन्म के समय अनेक ऐसे अंग दे दिये जाते हैं जिनका उसके जीवन में कोई उपयोग नहीं होता। इस तरह बहुमूल्य कच्चा माल ‘वेस्ट’ होता है, उसका दुरुपयोग होता है। लोगों की भावना है कि अगर उपयोग में न आने वाले अंगों की पूर्ति सीमित कर दी जाए तो बड़ी बचत हो सकती है। अंग उन्हीं को दिये जाएं जिन्हें उनकी ज़रूरत है।
समूह की बात सुनकर बाबा विस्मित हुए। पूछा कि कौन से अंग आदमी के लिए फालतू हैं। समूह के लोगों ने बाबा को बताया कि बहुत से लोगों को अपने दिमाग का इस्तेमाल करने की ज़रूरत नहीं होती। पॉलिटिक्स में यही हो रहा है। जहां पार्टी कहे वहीं हाथ उठाना पड़ता है। ऐसा ही कई संगठनों में भी होता है। वहां भी अनुयायियों को अपना दिमाग अलमारी में रख देना होता है। धर्मगुरुओं के शिष्यों को भी अपने दिमाग के इस्तेमाल की मुमानियत होती है। ‘महाजनो येन गतः स पंथाः’ का सिद्धान्त चलता है। गुरू जो रास्ता दिखाये उसी पर चलो।
वही बात आंखों पर भी लागू होती है। पहले बताये गये सभी संगठनों में छुटभैये या अनुयायी को नेता या गुरू की आंखों से ही देखना पड़ता है। इसलिए अपनी आंखें फालतू हो जाती हैं।
समूह ने बाबा जी को बताया कि एक और अंग जो फालतू और असुविधाजनक साबित हुआ है आदमी की रीढ़ है। राजनीति समेत सभी संगठनों में रीढ़ बड़ी अड़चन पैदा करती है। समूह ने बताया कि बहुत से लोगों ने उन्हें जानकारी दी कि किसी बड़के आदमी के सामने झुकते वक्त उनकी रीढ़ उनके आड़े आ गयी और उन्हें शर्मिन्दगी उठानी पड़ी। लोगों का मत है कि वैसे भी रीढ़ शरीर में छिपी रहती है, इसलिए उसे आसानी से हटाया जा सकता है।
समूह ने बताया कि एक और अड़चन पैदा करने वाली चीज़ अंतरात्मा या ज़मीर है जो शरीर में पता नहीं कहां रहती है, लेकिन आदमी जब भी कोई दो नंबर का काम करना चाहता है आत्मा उसे कोंचने लगती है। कुछ लोग अंतरात्मा को सुलाने में सफल होते हैं, लेकिन कई लोग आत्मा के द्वारा बार-बार कोंचे जाने से परेशान रहते हैं। कई लोग आत्मा के कोंचने से परेशान होकर आत्महत्या की सोचने लगते हैं। इसलिए अंतरात्मा नाम की चीज़ से मुक्ति ज़रूरी है।
समूह ने बाबा जी को बताया कि बहुत से लोग इन अंगों से तो मुक्त होना चाहते हैं, लेकिन वे एक अंग की वापसी भी चाहते हैं। लोगों का कहना है कि वानर की औलाद होने के कारण कभी मनुष्य के भी दुम थी, लेकिन वह कालांतर में झड़ गयी। शायद पहले का आदमी ख़ुद्दार रहा होगा, इसलिए उसे दुम हिलाने की ज़रूरत नहीं पड़ती होगी और इसीलिए वह धीरे-धीरे गायब हो गयी। लेकिन अब आदमी को एक अदद दुम की सख्त ज़रूरत है क्योंकि जो काम खुशामद के दस जुमलों से नहीं होता वह एक बार दुम हिलाने से हो जाता है। इसलिए ज़रूरतमंद लोगों के लिए तत्काल दुम की व्यवस्था करके उन्हें राहत दी जाए।
अन्त में एक और बात समूह ने बाबा को बतायी कि कुछ लोग चाहते हैं कि उनकी ज़बान बीच से काट दी जाए, जैसी सांप या मेंढक की होती है, जिसे अंग्रेजी में ‘फ़ोर्क्ड टंग’ कहते हैं। इससे उन्हें एक ही समय दो तरह की बात कहने में आसानी होगी। यह राजनीतिज्ञों के लिए बड़े काम की सिद्ध होगी।
बाबा ने समूह की बात सुनकर उन्हें आश्वस्त किया कि उनकी भावनाएं बाबा की सिफारिश के साथ वायु-वेग से ऊपर पहुंचा दी जाएंगीं। समूह बाबा के चरणों में पर्याप्त दक्षिणा अर्पित कर विदा हुआ।
(प्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक साहित्य ” में हम श्री विवेक जी की चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं। श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी , जबलपुर ) से सेवानिवृत्त हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। आपको वैचारिक व सामाजिक लेखन हेतु अनेक पुरस्कारो से सम्मानित किया जा चुका है।आज प्रस्तुत है एक ज्ञानवर्धक आलेख – “कैसे और क्यों व्यंग्यकार बने परसाई?” ।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ३८० ☆
व्यंग्य – पहचाना आप ने? श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆
पहचाना आप ने? अरे कैसी बात करते हैं, आप भी! संकोच में ऐसा कह चुकने के बाद, वे बातों बातों में वह सूत्र ढूंढते हैं कि किसी तरह मिलने वाले का नाम याद आ जाए? दरअसल, नाम आदमी की पहचान है, पर याददाश्त के साथ उसका रिश्ता हमेशा लुका-छुपी का ही रहा है। चेहरा तो लोग पहचान लेते हैं, पर नाम जैसे हमारी स्मृति से सबसे पहले पलायन कर जाता है। किसी को फोन करना हो तो याद ही नहीं आता कि बंदे का नंबर किस नाम से सेव किया था।
एक विवेक ढूंढो तो तीन निकल आते हैं, इसलिए रिफरेंस या शहर का नाम साथ लिखना पड़ता है।
किसी पार्टी या सभा में मिलते समय नाम स्मरण की यह समस्या सबसे अधिक होती है। सामने वाला मुस्कराते हुए “कैसे हैं आप” कहता है और हम भी उतनी ही आत्मीयता से “अरे आप!” कह देते हैं। इस “आप” के पीछे कितनी मजबूरी और कितना अपराध बोध छुपा होता है, यह वही समझ सकता है जिसने मिलने वाले का नाम दिमाग की हार्ड डिस्क से डिलीट कर ‘रीसायकल बिन’ में पहुंचा दिया होता है। और रिसाइकिल बिन क्लीन कर दी होती है। दिमाग को सारे खाए हुए बादाम की कसम देते रहो पर नाम याद ही नहीं आते, तब सभ्यता के नाते दिमाग से काम लेना पड़ता है, और पहचानने की एक्टिंग करनी पड़ती है।
शशि कपूर साहब ने इस विसंगति का हल खोज निकाला था। वे मिलते ही सामने वाले से कहते, “हाय, आई एम शशि कपूर। ” सामने वाला भी शिष्टाचार निभाने के चक्कर में अपना परिचय दे देता। यह फार्मूला कलाकारों और सेलिब्रिटीज के लिए तो ठीक है, पर अगर मोहल्ले का गजोधर प्रसाद या हरिप्रसाद यही तरीका अपनाए तो सामने वाला शक करने लगेगा कि कहीं यह बीमा बेचने वाला एजेंट तो नहीं।
कुछ लोग इस समस्या को छिपाने के लिए ऐसे रचनात्मक वाक्य गढ़ते हैं कि सुनकर हंसी भी आए और दया भी। जैसे कोई कहे “भाई साहब, आप तो बिल्कुल नहीं बदले!” अब सामने वाला सोचता है कि मैं पचास साल से यही हूँ, बदली तो तुम्हारी याददाश्त है। या फिर लोग बचने के लिए रिश्तों का सहारा लेते हैं “भाभी जी”, “भाई साहब”, “चाचा जी”। यही तो भारतीय संस्कृति का अद्भुत चमत्कार है। जब नाम याद न आए तो रिश्ते का लेबल चिपका दो, सामने वाला खुद ही नाम बता देगा।
हमारे एक अंकल ने इस समस्या को सीधे ईमानदारी से हल किया। वे मिलते ही कहते, “बेटा, याददाश्त कमजोर हो चुकी है, बातें करने से पहले नाम और पता बता दीजिए। ” अब उनकी इस सादगी में न दिखावा है, न शिष्टाचार का जाल। सामने वाला झट से नाम बता देता है, जैसे परीक्षा हॉल में अपना एडमिशन कार्ड दिखा रहा हो।
नाम भूलने की समस्या अक्सर हास्यास्पद हालात पैदा कर देती है। शादी ब्याह में रिश्तेदार एक-दूसरे से टकराते हैं, पर नाम भूलने का अपराधबोध दोनों ओर इतना गहरा होता है कि बातचीत का सारांश यही रह जाता है “अरे आप!” और “जी, वही!”
ऑफिस पार्टियों में तो यह विसंगति और भी दिलचस्प हो जाती है। कोई पूरे आत्मविश्वास से पांच मिनट तक बतियाता रहता है और फिर पूछ बैठता है “वैसे आपने मेरा नाम तो नहीं भुलाया?” तब तक नाम सचमुच स्मृति की फाइलों से प्रसंगवश रिकवर हो गया तो हम पूरे आत्मीय भाव से मुस्कराते हुए कहते हैं, अरे फलां जी कैसी बात करते हैं आप भी।
वरना बाद में सिर खुजाते मिलने वाले का नाम स्मृति पटल पर खोजना होता है।
सच यह है कि नाम भूलना कोई व्यक्तिगत कमजोरी नहीं है, यह भीड़ में घुल जाने की कला है। हम रोज़ इतने चेहरों से मिलते हैं कि दिमाग भी कभी-कभी ‘सिस्टम हैंग’ कर देता है। और तब “अरे आप” या “भाई साहब” जैसे संबोधन जीवनरक्षक ऐप साबित होते हैं।
अब समय आ गया है कि सरकार आधार कार्ड में एक नया फीचर जोड़ दे। जैसे ही हम किसी से मिलें, दोनों के मोबाइल पास लाते ही ब्लूटूथ से स्क्रीन पर स्वयं ही नाम चमक उठे। पर तब तक हमें अंकल की ही ईमानदार शैली अपनानी होगी कहना होगा “ओ मिलने वाले, जरा अपना नाम तो बता। ” क्योंकि बिना नाम का संदर्भ समझे बातचीत करना वैसा ही है जैसे अंधेरे में रेडियो सुनना। आवाज तो आती है, मज़ा भी आता है, लेकिन यह समझ ही नहीं पड़ता कि प्रसारण किस स्टेशन से चल रहा है।
मैं एक सज्जन के यहां, रात्रि भोज पर निमंत्रित था, भोजन कर आया। उनकी पत्नी से यह पहली भेंट थी। सभ्यता से भाभी जी की ओर बहुत ध्यान से देखा भी नहीं। अगले दिन जब बाजार में जब एक महिला मेरी ओर देख कर मुस्करा रही थी, तो मुझे समझ ही नहीं आया कि यह क्या और क्यों हो रहा है। मुझे अजनबी सा देखते पा कर देवी जी बोली, अरे खाना खाकर भी आपने पहचाना नही, झेंपने के सिवा क्या कर सकता था मैं। दरअसल महिलाएं हेयर स्टाइल बदल दें, या देसी परिधान की जगह पाश्चात्य ड्रेस पहन लें तो उन्हें पहचानना मेरे लिए वैसे भी कठिन हो जाता है। सच तो यह है कि एक नग अपनी पत्नी के मूड तक को भी अब तक कभी पहचान नहीं पाया।
(सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” जीका हिन्दी बाल -साहित्य एवं हिन्दी साहित्य की अन्य विधाओं में विशिष्ट योगदान हैं। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में रचना सहित 145 बालकहानियाँ 8 भाषाओं में 1160 अंकों में प्रकाशित। प्रकाशित पुस्तकेँ-1- रोचक विज्ञान कथाएँ, 2-संयम की जीत, 3- कुएं को बुखार, 4- कसक, 5- हाइकु संयुक्ता, 6- चाबी वाला भूत, 7- बच्चों! सुनो कहानी, इन्द्रधनुष (बालकहानी माला-7) सहित 4 मराठी पुस्तकें प्रकाशित। मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी का श्री हरिकृष्ण देवसरे बाल साहित्य पुरस्कार-2018 ₹51000 सहित अनेक संस्थाओं द्वारा सम्मानित व पुरस्कृत। साप्ताहिक स्तम्भ “श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य” के अंतर्गत साहित्य आप प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकते हैं। आज प्रस्तुत है आपका व्यंग्य – आतंक केवल अपनों का होता है।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # २२६ ☆
☆ व्यंग्य – आतंक केवल अपनों का होता है ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ ☆
(कभी आपको महसूस हुआ है डर का आतंकवाद)
जब भी मैं आतंकवाद का नाम सुनता हूँ, तब अंदर तक काँप जाता हूँ। मुझे अपने साथ हुए आतंकवादी हादसे याद आ जाते हैं। भले ही सेना के एक नायक ने कहा है कि यह ताजुब नहीं है कि तीन आतंकवादियों ने सीधे 26 लोगों को गोली से खून कर मार डाला! कारण स्पष्ट है कि हम कोई प्रतिकार नहीं करते हैं।
वे कहते हैं कि कई सैनिक लड़ाई में जब साफ टारगेट नहीं होते हैं तब वे प्रतिरोध के कारण 20-25 गोलियां खाने (लगने) के बावजूद जिंदा बच जाते हैं। उनकी यह बात याद आते ही मुझे मोहम्मद गौरी का आक्रमण याद आ जाता है। जिसने कुछ लोगों के बल पर हमारे मंदिरों को लूट लिया था। जबकि उसे देखने वाले यदि उसके सैनिकों पर कूद पड़ते तो सबके सब मारे जाते।
मगर तभी मुझे अपनी स्थिति का स्मरण हो आता है। भले ही सेनानायक ने उक्त बात कही हो, मगर मैं स्वयं भी इस आतंकवाद का शिकार रहा हूँ। चाहकर भी कुछ नहीं कर पाया हूँ। क्योंकि मेरी मानसिकता ही ऐसी बनी हुई है। चाहूँ तो भी कुछ नहीं कर पाता हूँ। इस बात को मेरा लड़का अच्छी तरह जानता था।
उसे पता था कि पापा को आतंकवाद कब दिखाना है? इस कारण वह अपनी एक माँग को हमेशा तैयार रखना था। जब कभी घर में कोई मेहमान आते वह इस एक माँग को पूरी करने की जिद करने लगता। मैं मना करता तो वह उन मेहमानों के सामने धूल मिट्टी में लौटने लगता। इस कारण मेहमानों को आगे मैं उसके आतंकवाद से हमेशा त्रस्त हो जाता। फलस्वरुप उसकी माँग पूरी करना पड़ती।
मगर एक दिन मैंने सोच लिया था कि उसके आतंकवाद को अब चलने नहीं दूंगा। इससे मुक्त होकर रहूँगा। इसलिए अपने एक खास मित्र को मैंने मेहमान के तौर पर आमंत्रित किया। लड़के ने फिर आतंकवाद मचाया। मगर, मैंने सोच लिया था कि उसके आतंकवाद से मुक्ति पाकर रहूँगा। इसलिए मैं जमीन पर बैठकर उसको मारने की कोशिश करने लगा। ताकि उसके गाल पर थप्पड़ लगा सकूं।
मगर, शायद उसने सेनानायक का उक्त कथन पढ़ रखा होगा। वह तीव्र गति से इधर-उधर लौटकर रोने लगा। मैं थप्पड़ लगाने के लिए गाल ढूंढ रहा था। मगर उसका शरीर व गाल स्थिर नहीं था। इस कारण गाल पर मारने की कोशिश करता तो थप्पड़ कभी पांव पर लग जाता, कभी हाथ पर। यह देखकर मैं समझ गया कि इस फुर्तीले लड़के को मैं गाल पर थप्पड़ नहीं मार सकता। तब यह सोचकर मैंने उसके पैर पकड़कर उसे धर दबोचा कि इसकी मरम्मत करके रहूँगा।
जैसे ही मैंने उसे घर दबोचा, मित्र आ पहुंचा। वह आतंकवादी पुत्र मेरे काबू में आ गया था। यह देखकर मेरा शेर दिल कलेजा फूलकर कूंपा हो गया। मगर, तभी मेरी पत्नी यानि शेरनी आ पहुंची। वह आते ही बोली कि यह क्या करते हो? मेरे लाडले को मार डालोगे क्या?
यह सुनते ही वह लाडला फिर आतंकवादी बन गया। यह देखकर मेरे हाथ पांव फूल गए। मैं समझ गया कि शेर, शेरनी के सामने, मोर, मोरनी के सामने, बड़े से बड़ा डाकू, अपनी पत्नी के सामने, क्यों नाचने लगता है? तब मुझे लगा कि काश मैं भी अपनी पत्नी और बच्चों से कुछ गुर सीख पाता। ताकि इस आतंकवाद से मुक्त हो सकता।
तभी मुझे एक घटना याद आ गई। जब मुझे शिक्षक ने प्रेरित किया था। उन्होंने कहा था कि बोलने वाले की गुठली बिक जाती है, नहीं बोलने वालों के आम पड़े रह जाते हैं। इसलिए तुम्हें मंच पर बोलना पड़ेगा। तब मैं उनका आदेश पाकर रटा रटाया, पूरा भाषण याद करके मैं मंच पर चला गया। मगर जब हाल में हजारों लोगों की भीड़ देखी तो मुझ पर डर का आतंकवाद हावी हो गया। मेरी बोलती बंद हो गई। थरथर कांपने लगा। सब रटा रटाया दिमाग से गायब हो गया। मैं चुपचाप मंच से वापस भाग कर आ गया।
तब पहली बार मुझे पता चला की डर का आतंकवाद क्या होता है? यह हर एक व्यक्ति को सताता है। इसमें आपको भी सताया होता। इसका उपचार आपने भी ढूंढा होगा। यदि आपको इसका उपचार मिल जाए या मालूम हो जाए तो मुझे अवश्य बताइएगा। ताकि मैं भी अपने डर के आतंकवाद से मुक्त हो सकूं।
वरिष्ठ पत्रकार, लेखक श्री प्रतुल श्रीवास्तव, भाषा विज्ञान एवं बुन्देली लोक साहित्य के मूर्धन्य विद्वान, शिक्षाविद् स्व.डॉ.पूरनचंद श्रीवास्तव के यशस्वी पुत्र हैं। हिंदी साहित्य एवं पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रतुल श्रीवास्तव का नाम जाना पहचाना है। इन्होंने दैनिक हितवाद, ज्ञानयुग प्रभात, नवभारत, देशबंधु, स्वतंत्रमत, हरिभूमि एवं पीपुल्स समाचार पत्रों के संपादकीय विभाग में महत्वपूर्ण दायित्वों का निर्वहन किया। साहित्यिक पत्रिका “अनुमेहा” के प्रधान संपादक के रूप में इन्होंने उसे हिंदी साहित्य जगत में विशिष्ट पहचान दी। आपके सैकड़ों लेख एवं व्यंग्य देश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। आपके द्वारा रचित अनेक देवी स्तुतियाँ एवं प्रेम गीत भी चर्चित हैं। नागपुर, भोपाल एवं जबलपुर आकाशवाणी ने विभिन्न विषयों पर आपकी दर्जनों वार्ताओं का प्रसारण किया। प्रतुल जी ने भगवान रजनीश ‘ओशो’ एवं महर्षि महेश योगी सहित अनेक विभूतियों एवं समस्याओं पर डाक्यूमेंट्री फिल्मों का निर्माण भी किया। आपकी सहज-सरल चुटीली शैली पाठकों को उनकी रचनाएं एक ही बैठक में पढ़ने के लिए बाध्य करती हैं।
प्रकाशित पुस्तकें –ο यादों का मायाजाल ο अलसेट (हास्य-व्यंग्य) ο आखिरी कोना (हास्य-व्यंग्य) ο तिरछी नज़र (हास्य-व्यंग्य) ο मौन
आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय व्यंग्य “कैसे कैसे मकान मालिक और किरायेदार”।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ प्रतुल साहित्य # १५ ☆
☆ व्यंग्य ☆ “कैसे कैसे मकान मालिक और किरायेदार” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆
मैं सुबह अपने कम्पाउन्ड में टहलता हुआ टी वी पर दिखाए जाने वाले विज्ञापनों की भांति अपने दांतों पर टूथब्रश रगड़ रहा था। अचानक मुझे अपने पड़ोसी वर्मा जी का दरवाजा खुलने की आवाज सुनाई दी। वे जल्दी में अपना स्कूटर बाहर निकल रहे थे। मैने उन्हें जोरदार नमस्कार ठोंकते हुए कहा “भाई जी आज रविवार को छुट्टी के दिन इतनी सुबह कहां की सैर पर निकल पड़े ?” स्कूटर में किक मारने को तैयार वर्मा जी मेरी बात सुनकर रुक गए, बोले “भैया क्यों मजाक उड़ा रहे हो ? आपको तो मालूम है कि इसी माह मुझे यह मकान खाली करना है अतः किराए के नए मकान की तलाश में निकल रहा हूं। ” उनकी बात सुनकर मैंने आश्चर्य से कहा – अरे, अभी सूरज भी नहीं उग पाया है, आदमी की संगत और शहरी आबोहवा में बिगड़ चुके पशु – पक्षी भी अभी सो कर नहीं उठे हैं, सड़क पर झाड़ू मारने वाला और दूध वाला भी अभी नहीं आ पाया है, सामने लगे सरकारी नल पर पानी का इंतजार करने वाली भीड़ भी अभी इकट्ठी नहीं हुई है, रेडियो का प्रसारण भी अभी शुरू नहीं हो पाया है और आप किराए का मकान ढूंढने निकल पड़े!
वे मेरे निकट आते हुए बोले – आप ठीक कहते हैं बड़े भाई, अभी सूरज भले ही नहीं उगा और सरकारी नल से दूध वाले तक जो भी आपने गिनाए हैं वे भी नहीं आए, लेकिन मेरे घर समाचार पत्र आ चुका है और मैं उसमें छपे किराए के मकानों संबंधी सभी विज्ञापन पढ़ कर नोट कर चुका हूं। अब यदि आपने अपनी बातों के जाल में फंसा कर मुझे निकलने में देर करवा दी तो निराशा ही हाथ लगेगी, इसलिए मेरा नमस्कार स्वीकार करें और मुझे जाने दें।
मैं फुर्सत में था अतः बात को आगे बढ़ाता हुआ बोला – “प्यारे भाई मैं आपको कहां रोक रहा हूं ? आप जाएं और आज किराये का मकान ढूंढने में अवश्य सफल हों ऐसी मेरी कामना है, लेकिन अनुरोध केवल इतना है कि मेरे साथ एक प्याली चाय पीने से इंकार न करें। ” चाय प्रेमी वर्मा जी मेरा अनुरोध नहीं ठुकरा पाए और स्कूटर में ताला मारते हुए बोले – ” चलिए, लेकिन चाय के बाद सिगरेट भी पियूंगा। ” मैंने कहा – ऐसी भी क्या बात है भाई जी आप थोड़ा रुकें तो आपको नाश्ता भी करवाता हूं। नाश्ते के आग्रह से उन्हें मकान ढूंढने का काम फिर याद आ गया। वे चिंतामग्न होकर बोले – बड़े भाई नाश्ता भले ही न कराएं , किराए का मकान दिलवा दें। मैंने कहा चिंता न करें किराए का मकान आपको अवश्य मिलेगा और वर्तमान मकान से अच्छा मिलेगा। जब खाली मकानों की सूची आपकी जेब में है तो चिंता किस बात की ? वर्मा जी से इतना कहते हुए मैंने अपने कम्पाउन्ड में लगे नल से मुंह धोया और चेहरे पर तौलिया फिराता हुआ पुनः उनकी ओर घूमा। वर्मा जी वहीं पड़ी कुर्सी पर बैठ चुके थे और मेरी पत्नी के हाथों से चाय का प्याला ग्रहण करते हुए उनसे किराए के मकानों की समस्याओं पर चर्चा कर रहे थे। मैंने भी चाय का प्याला उठाया और चुस्की मारता हुआ अपनी पत्नी से बोला – देखो तो इन्हें, ये किराए के मकानों की सूची जेब में रखकर भी इतना परेशान हो रहे हैं। मेरी बात सुनकर वर्मा जी झुंझला उठे, कहने लगे बड़े भाई – चूंकि आप स्वयं अपने मकान के मालिक हैं अतः आपको किरायेदारों की तकलीफें, खासकर जिन्हें शीघ्र ही नया मकान खोजना हो समझ में नहीं आ सकतीं।
मैंने कहा, यार मेरे ही घर में मेरी ही चाय पीते हुए मेरी “समझ” पर शक कर रहे हो जबकि तुम्हें अभी मुझसे मांगकर सिगरेट भी पीना है। मेरी बात पर उन्होंने हें – हें करते हुए खाली प्याला नीचे रखा और मेरे द्वारा बढ़ाई गई सिगरेट झटकते हुए बोले – बड़े भाई, किराए के खाली मकानों की सूची अवश्य मेरी जेब में है और मैं उन्हें देखने भी जा रहा हूं, लेकिन उम्मीद नहीं है कि उनमें से मुझे कोई मकान मिलेगा।
मैंने माथे पर बल डालते हुए, आँखें सिकोड़ कर आश्चर्य मिश्रित स्वर में कहा – भाई जी कार्य शुरू करने के पहले ही आप निराशा में जकड़े जा रहे हैं, यह तो अच्छी बात नहीं है। हौसला रखकर जाइए कि आपको मकान मिलेगा। वे बोले – जा तो हौसले से ही रहा हूं लेकिन बात यह है कि सामान्यतः अखबारों में छपे किराए के खाली मकानों के विज्ञापन बैंक, एल आई सी तथा सरकारी कर्मचारियों के लिए होते हैं और मैं सिर्फ कर्मचारी हूं, सरकारी कर्मचारी नहीं। मैंने कहा, भाई जी गजब करते हैं आप भी! क्या आम आदमी को किराए का मकान मिलता ही नहीं है ? आखिर अभी तक भी आप किराए के मकानों में ही रह रहे हैं। वर्मा जी बोले – आपने सही फरमाया भाई साहब, लेकिन क्या आप जानते हैं कि मुझे मात्र तीन माह में यह मकान क्यों छोड़ना पड़ रहा है और पिछले 10 वर्षों में मुझे 12 मकान क्यों बदलना पड़े ?
मैंने कहा, भाई मुझे कैसे मालूम होगा। न कभी मैंने आपसे आपके किराए के मकानों का इतिहास पूछा और न ही आपने बताया। न तो मुझे किसी किरायेदार का मकान मालिक होने का अनुभव है न ही किसी मकान मालिक के किरायेदार होने का। पिछले किसी जनम का पुण्य रहा होगा सो पिताजी मकान बनवा गए। मेरी वर्मा जी से हो रही रोचक बातचीत में रुचि लेते हुए न जाने कब मेरे पीछे मेरी पत्नी भी आकर खड़ी हो गई, अचानक वो बीच में बोल उठी – भाई साहब ये इतना अच्छा मकान आप क्यों छोड़ रहे हैं। इसके तो मकान मालिक भी यहां नहीं रहते, किसी से कोई ख़िटखिट नहीं। वर्मा जी ने कहा – ये मकान मालिक भी अजीब होते हैं भाभी जी! आज तक इनके नियम – कानून, धाराएं, इच्छाएं कोई किरायेदार नहीं समझ सका फिर मैं क्या चीज हूं। आप मेरे वर्तमान मकान छोड़ने का कारण सुनेंगी तो आश्चर्य करेंगी। अगर मकान मालिक पहले ही अपनी मंशा प्रगट कर देता तो मैं यह मकान किराए पर लेता ही क्यों ? अपने मकान मालिक के प्रति वर्मा जी की बातें यद्यपि मेरी उत्सुकता बढ़ा रही थीं तथापि मैंने उसे प्रगट न करते हुए कहा – ऐसी क्या विशेष बात हो गई वर्मा जी, किरायेदारों के लिए तो सभी मकान मालिकों के नियम एक जैसे होते हैं जो अनुबंध पत्र के साथ – साथ किराए की मासिक रसीद के पीछे भी छपे रहते हैं। जैसे किरायेदार सुबह 8 के पहले और रात्रि 9 बजे के बाद रेडियो – टी वी नहीं चलाएगा। ज्यादा बिजली – पानी खर्च नहीं करेगा। घर में ऊंची आवाज में बात नहीं करेगा। किराएदार के बच्चे शोर नहीं करेंगे। उसके घर अक्सर और अधिक मेहमान नहीं आएंगे। वह घर की दीवारों पर कील नहीं ठोकेगा। ठीक समय पर किराया देगा। जब कहा जाएगा तब मकान खाली कर देगा आदि आदि। एक अलिखित नियम भी रहता है – मौका आने पर अकेली विवाहित/अविवाहित महिला को मकान किराए पर दिया जा सकता है किंतु अविवाहित अथवा अकेले पुरुष को नहीं। आपने अपने मकान मालिक के इसी तरह के किसी कानून को ठेंगा दिखा दिया होगा अथवा उसकी धज्जियां उड़ा दी होंगी, बस हो गई मकान मालिक की भृकुटि टेढ़ी और आप निकल पड़े नए मकान की तलाश में। भाई मेरी समझ में तो मकान मालिक – किरायेदार का सम्बन्ध भी सास – बहू या ननद – भौजाई की तरह ही है जिनमें ज्यादा देर नहीं पटती।
वर्मा जी पूरी शांति से मेरी बात सुन रहे थे। मेरी बात में विराम लगता देख वे फुर्ती से बोल पड़े – बड़े भाई यदि आपकी बात पूरी हो गई हो तो अब मैं अर्ज करूं। मैंने कहा, जरूर करिए। आप जितने विस्तार से अर्ज करेंगे, मेरा मकान मालिक – किरायेदार सम्बन्धी ज्ञान उतना ही बढ़ेगा। वर्मा जी मुस्कुराते हुए बोले – भाई साहब वास्तव में अभी आप मकान मालिकों की नियमावली व चरित्र से आंशिक रूप से ही परिचित हैं। मेरी पत्नी ने वर्मा जी की बात में हस्तक्षेप करते हुए कहा – ठीक है भाई साहब आप ही उनकी नियमावली पूरी करते हुए उनके विविध चरित्रों पर प्रकाश डाल दीजिए। बताइए आप यह मकान इतनी जल्दी क्यों छोड़ रहे हैं, कौन किससे और किस कारण से अलसेट में आ गया। वर्मा जी बोले – भाभी जी अलसेट में तो आमतौर पर किरायेदार को ही आना पड़ता है, उदाहरण के रूप में मैं आपके सामने हूं। मेरे मकान मालिक अभी 15 दिन पहले तक मुझसे शुद्ध घी में तली और शक्कर में पगी वाणी में बोलते थे। कारण था मेरा छोटा भाई, जिससे वे अपनी बेडौल और मंदबुद्धि लड़की की शादी करना चाहते थे। उनका प्रस्ताव था कि वे यह मकान भी छोटे भाई के नाम लिख देंगे। उनका बार बार का यह प्रस्ताव जब मैंने ठुकरा दिया तभी उन्होंने मुझसे कह दिया कि अब आप जल्दी ही दूसरा मकान ढूंढ लें। इसके पहले वाला मकान भी मुझे मकान मालिक की लड़की से भाई की शादी न करने के कारण ही छोड़ना पड़ा था। उसके पहले मैं जिस मकान में रहता था वहां के मालिक ने मुझे इसलिए निकाल दिया कि वे टेलीफोन वाले किरायेदार को रखना चाहते थे, मैं टेलीफोन नहीं लगवा सका। एक मकान सिर्फ इसलिए छूटा की मैंने मकान मालिक की बूढ़ी माता जी को रामायण सुनाने में नागा करना शुरू कर दिया था और उन्हें प्रतिदिन रात्रि में रामायण सुनना मकान मालिक की शर्त थी। इसके पहले तो एक मकान केवल इसलिए छोड़ना पड़ा कि मकान मालिक के कुत्ते को मैं पसंद नहीं आया। वहां रहते हुए महीनों हो जाने के बाद भी वह मुझे देखकर दुश्मनों की भांति भोंकता और मौका मिलते ही दौड़ा भी देता था। मुझे कुत्ते से डरता देख कर मकान मालिक की बीबी व बच्चे हंसते और ताली बजाते, किंतु मुझे गुस्सा आता। जब मैंने कुत्ते वाला मकान छोड़ने का फैसला किया तब मकान मालिक ने अपनी बीबी – बच्चों और अपने कुत्ते की खुशी के लिए किराया कम करने का लालच देकर मुझे रोकने का प्रयास भी किया था, लेकिन मैं भयभीत था। वर्मा जी की बात सुनकर मैं ठहाका लगाकर हंस पड़ा। मुझे हंसता देख कर वर्मा जी नाराज होकर जाने के लिए उठ खड़े हुए, किंतु उसी समय मेरी पत्नी नाश्ता लेकर प्रगट हुई। गर्म नाश्ते की खुशबू ने वर्मा जी का गुस्सा दूर कर दिया वे पुनः कुर्सी पर बैठ गए और एक पकौड़ा मुँह में डालते हुए बोले – भाई साहब, 5/6 वर्ष पूर्व मुझे एक मकान सिर्फ इसलिए छोड़ना पड़ा कि मेरे लिए मेरी मकान मालकिन की मुस्कानें बढ़ती जा रहीं थीं यह बात मेरी बीबी को बिल्कुल पसंद नहीं आई। इससे भी पहले वाले मकान में हम किरायेदार के साथ – साथ मकान मालिक के बच्चों की देखरेख करने वाले नौकर भी हो गए थे। मकान मालिक एक जवान जोड़ा था जो अपने दो छोटे बच्चों को रोज हमें थमा कर घूमने – फिरने या सिनेमा देखने चला जाता था। वर्मा जी की प्लेट के पकौड़े खत्म हो गए थे अतः उन्हें याद आ गया कि वे अखबार में छपे किराए के खाली मकानों की सूची साथ लेकर मकान खोजने निकले हैं। उन्होंने घड़ी देखते हुए मुझसे नमस्कार किया और निकल पड़े नए मकान की खोज में।