जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब) शिक्षा- एम ए हिंदी , बी एड , प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । यादों की धरोहर हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह -एक संवाददाता की डायरी को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से कथा संग्रह-महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता
☆ संस्मरण ☆ स्मृति दिवस विशेष – ‘यादों की धरोहर’ में स्व. हरिशंकर परसाईं ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆
(‘यादों की धरोहर’ पुस्तक में से स्व हरिशंकर परसाई जी के साक्षात्कार के अंश)
[1] साहित्यिक हास्य : परसाई का स्नेह चार्ज
हरिशंकर परसाई ने अपनी पहली पुस्तक – हंसते हैं, रोते हैंं, न केवल स्वयं प्रकाशित की बल्कि बेची भी । उनका समर्पण भी उतना ही दिलचस्प था – ऐसे आदमी को जिसे किताब खरीदने की आदत हो और जिसकी जेब में डेढ़ रुपया हो ।
एक मित्र ने कहा – यह क्या सूखी किताब दे रहे हो ? अरे, कुछ सस्नेह, सप्रेम लिखकर तो दो ।
परसाईं ने किताब ली और लिखा – भाई मायाराम सुरजन को सस्नेह दो रुपये में ।
मित्र ने कहा – किताब तो डेढ़ रुपये की है । दो रुपये क्यों ?
परसाई का जवाब – आधा रुपया स्नेह चार्ज ।
[2] हरिशंकर परसाई कहिन
मेरी कभी कोई महत्वाकांक्षा नहीं रही । जब पूरी तरह लेखन करने लगा तब भी कोई महत्वाकांक्षा नहीं रही । मेहनत से लिखता था । बस , यही चाहता था कि लेखन सार्थक हो । पाठक कहें कि सही है ।
मुझे मान सम्मान बहुत मिले । साहित्य अकादमी, शिखर , मानद डाक्टरेट , प्रशस्ति पत्र ,,,, ये सब कुछ अलमारी में बंद । कमरे में सिर्फ गजानंद माधव मुक्तिबोध का एक चित्र । बस । सम्मान का कोई प्रदर्शन नहीं ।
[3] बुरा ही बुरा क्यों दिखता है
एक आरोप मुझ पर लगाया जाता है कि मुझे बुरा ही बुरा क्यों दिखता है ? मेरी दृष्टि नकारात्मक है ।
यह कहना उसी तरह हुआ जैसे डाँक्टर के बारे में कहा जाए कि उसे आदमी में रोग ही रोग दिखता है ।
हरिशंकर परसाईं का कहना था कि मैं उन लेखकों में से नहीं जो कला के नाम पर बीमार समाज पर रंग पोतकर उसे खूबसूरत बना कर पेश कर दें । वे लेखक गैर जिम्मेदार हैं । जिम्मेदार लेखक बुराई बताएगा ही । क्योंकि वह उसे दूर करके बेहतर जीवन चाहता है । वे मुक्तिबोध की पंक्तियां गुनगुनाने लगे
☆ “मित्रता दिवस विशेष – बचपन की यादों में स्मृति शेष अशोक…” ☆ श्री यशोवर्धन पाठक ☆
यादों में जब खो जाता है मन ,
दुनिया की सुधि बिसराता है मन
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माईं अशोक घर पर है कि स्कूल गया या फिर बुआ रंजन घर पर है कि स्कूल गया , ऐसी ही बातों से हम दोनों के दिन की शुरुआत होती थी । सुबह 7. 30 बजे स्कूल जाने के लिए जब हम दोनों तैयार हो जाते तो फिर हमलोग एक दूसरे के घर पर जाकर ऐसी ही आवाज लगाते और फिर एक दूसरे का हाथ पकड़ कर शैतानियां करते हुए स्कूल पहुंच जाते ।अशोक के पूज्य पिता हमारी अम्मा जी के ऐसे मुंह बोले भाई थे जिनको अम्मा जी ने लगभग 45 साल राखी बांधी।जबलपुर के गलगला क्षेत्र में हमारे पड़ोस में वर्मा जी के घर से बिल्कुल लगा हुआ हमारा घर याने हम दोनों दिन भर एक दूसरे के घर में धमाल चौकड़ी मचाते रहते थे । स्कूल से 12 बजे जब हम घर आते दोनों में किसी के ही घर हम लोग खाना खा लेते और फिर स्कूल का होम वर्क करने के बाद या तो हम लोग खेलते रहते या फिर आसपास घूमने निकल जाते । हम लोग घर के सदस्यों के साथ या तो कैरम खेलते या फिर अट्टू याने कन्ना दूडी खेलते रहते । अट्टू खेलने के लिए कौड़ी के लिए स्कूल के बाद जब घूमने जाते तो इमली के झूठे बीज ढूंढ कर लाते फिर उन्हें धो कर बीच से फोड़ कर अट्टू खेला करते ।बचपन बहुत प्यारा होता है । पढ़ाई और लिखाई के अलावा हमारी न तो कोई जिम्मेदारी होती है और न ही कोई तनाव । हमारी दोस्ती और हमारी मस्ती यही। हमारी रोजाना की जिंदगी होती है और बड़े होने पर यही हमारी जिंदगी के यादगार पल बन जाते हैं ।बस यही हम दोनों के साथ भी ऐसी ही बचपन की मस्ती थी जिसमें हम पूरे समय खोये रहते थे ।
बचपन का ऐसा ही ही एक मनमोहक प्रसंग हम दोनों के बीच चाहे जब बातचीत का विषय बनता था जब ज्हम दोनों एक बार स्कूल से आने के बाद बातें करते हुए घूमते निकल गये ।उस समय हम दोनों प्रायमरी स्कूल की दूसरी या तीसरी कक्षा में पढ़ते थे । रास्ता तो हम दोनों को घर के आसपास का ही याद था लेकिन घूमते हुए हम लोग दूर निकल गये और घर तक आने का रास्ता भूल गए, फिर काफी देर भटकते रहे और यहां हम दोनों की खोजबीन शुरू हो गई यहां तक कि पुलिस में भी खबर करने का सोचा जाने लगा। हम लोगों को भटकते हुए उस समय एक टेलर की पत्नी ने देख लिया । इस टेलर की पत्नी हम लोगों को पहचान गई। वह हमारे परिवार से परिचित थी । हम दोनों को वो तुरंत अपने घर ले गयी और बढ़िया नाश्ता कराया और ठंडा शरबत भी पिलाया । उसके बाद उसने हम दोनों को हमारे घर पहुंचाया । घर पहुंचने पर हम लोगों को डांट तो पड़ी ही साथ में अपने अपने घर पर पिटाई भी हुई ।
अशोक के साथ ऐसी न जाने कितनी यादें हैं कि सुनाते सुनाते भी मन न भरे । हम दोनों जब भी मिलते तो बचपन की इन्हीं यादों के आसपास घूमते रहते ।
अशोक मेरे बचपन के पहले मित्र थे। याने इस दुनिया में आने के बाद जब हमें सोचने समझने और बोलने चालने की अक्ल आई तो मित्र के रूप में हमने अशोक को सामने पाया और हमें दोस्ती का भी अर्थ समझ में आया । दिन बीतते रहे और हम भी अपने अपने परिवार के साथ अपनी जिम्मेदारियों में व्यस्त हो गए लेकिन हमारा मिलना बराबर जारी रहा और जब भी मिलते तो बचपन की तमाम बेवकूफियों को को भी याद करते और उस समय हम अपने वर्तमान को भूलकर अपने बचपन की दुनिया में खो जाते ।
अशोक के जन्म दिवस पर हम नियमित रूप से प्रतिवर्ष पहुंचते और 22 अप्रैल का मुझे बड़ी बेसब्री से इंतजार भी रहता लेकिन ये इंतजार कब तक । कभी तो इस इंतजार की घड़ियां खत्म होना थी और एक दिन वह भी खत्म हो गई ।
आज अशोक हमारे साथ नहीं है लेकिन उसकी कभी खत्म न होने वाली ढेर सारी यादें हैं और वो भी बचपन की । बस यही मेरे लिए बहुत है ।
(ई-अभिव्यक्ति में मॉरीशस के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री रामदेव धुरंधर जी के चुनिन्दा साहित्य को हम अपने प्रबुद्ध पाठकों से समय समय पर साझा करते रहते हैं। आपकी रचनाओं में गिरमिटया बन कर गए भारतीय श्रमिकों की बदलती पीढ़ी और उनकी पीड़ा का जीवंत चित्रण होता हैं। आपकी कुछ चर्चित रचनाएँ – उपन्यास – चेहरों का आदमी, छोटी मछली बड़ी मछली, पूछो इस माटी से, बनते बिगड़ते रिश्ते, पथरीला सोना। कहानी संग्रह – विष-मंथन, जन्म की एक भूल, व्यंग्य संग्रह – कलजुगी धरम, चेहरों के झमेले, पापी स्वर्ग, बंदे आगे भी देख, लघुकथा संग्रह – चेहरे मेरे तुम्हारे, यात्रा साथ-साथ, एक धरती एक आकाश, आते-जाते लोग। आपको हिंदी सेवा के लिए सातवें विश्व हिंदी सम्मेलन सूरीनाम (2003) में सम्मानित किया गया। इसके अलावा आपको विश्व भाषा हिंदी सम्मान (विश्व हिंदी सचिवालय, 2013), साहित्य शिरोमणि सम्मान (मॉरिशस भारत अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी 2015), हिंदी विदेश प्रसार सम्मान (उ.प. हिंदी संस्थान लखनऊ, 2015), श्रीलाल शुक्ल इफको साहित्य सम्मान (जनवरी 2017) सहित कई सम्मान व पुरस्कार मिले हैं।)
(ई-अभिव्यक्ति में “दस्तावेज़” श्रृंखला के माध्यम से अमूल्य और ऐतिहासिक तथ्यों को सहेजने का प्रयास है। दस्तावेज़ में ऐसे ऐतिहासिक दस्तावेजों को स्थान देने में आप सभी का सहयोग अपेक्षित है। इस शृंखला की अगली कड़ी में प्रस्तुत है मारिशस से आदरणीय श्री रामदेव धुरंधर जी का एक ऐतिहासिक दस्तावेज़ “मेरा एक विशेष संस्मरण – डाक्टर सतीश दुबे“।)
☆ दस्तावेज़ # ३१ – मारिशस से ~ मेरा एक विशेष संस्मरण – डाक्टर सतीश दुबे☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆
विद्वान मनीषियों से भेंट मुलाकात होने पर उनसे मैं प्रभावित हुआ तो उनके बारे में लिखना मेरे लिए अवश्य जरूरी हुआ। लिखने का थोड़ा गुण आने से मैं मानता हूँ यह मेरा सौभाग्य ही है जिस किसी भी प्रभावशाली व्यक्ति की मुझ पर छाप पड़ी मुझे तो उसे ध्यान में रखते हुए बस लिखना ही सूझा।
हिन्दी साहित्य के मेरे संस्मरण के बहुत से पड़ाव हैं। महादेवी वर्मा [प्रथम विश्व हिन्दी सम्मेलन 1975 नागपुर। मुझे उस सम्मेलन में भाग लेने के लिए भारत और मॉरिशस द्वय सरकारों की ओर से हवाई टिकट मिला था] डा, हजारीप्रसाद द्विवेदी, विष्णु प्रभाकर, डा. शिवमंगलसिंह सुमन, उपेन्द्रनाथ अश्क, कमलेश्वर, धर्मवीर भारती, गिरिगाज किशोर, डा. नामवरसिंह, डा. विनय, राजेन्द्र यादव, दिनमान के सह संपादक सर्वेश्वरदयाल सक्सेना [बकरी नाटक के रचनाकार] दिमान के संपादक रघुवीर सहाय …… और भी अनेकानेक।
डा. रामधारीसिंह दिनकर [मॉरिशस में –1967]
यशपाल [ मॉरिशस में 1973 ]
इन सब से जुड़े मैंने विषद संस्मरण लिखे हैं। कुछेक प्रकाशित हो चुके हैं और पूर्णरूपेण ‘कुछ पूरे, कुछ अधूरे’ शीर्षक से मेरे संस्मरण — संग्रह में शीघ्र ही प्रकाशित होने वाले हैं।
मैं जो संस्मरण यहाँ लिखना चाहता हूँ उस पर आता हूँ। मैं दिल्ली में मित्र डाक्टर राजेन्द्र मिश्र के गाजियाबाद आवास के ऊपरी कक्ष के एक कमरे में अतिथि स्वरूप एक महीने तक ठहरा था। पहले भी मैं भारत गया और बाद में भी तो डाक्टर जी ने मुझे यह सम्मान दिया है। पैसे की बात उनसे बिल्कुल न करूँ। यह हिन्दी लेखक के रूप में सौगात है जो मेरे लिए सदा अनभूला रह जाने वाला है। धन्यवाद मेरे परम मित्र डाक्टर राजेन्द्र मिश्र जी।
मैं गाजियाबाद में ही था कि मित्र श्रीधर बर्वे जी ने मुझे उनके आवास इन्दौर आने के लिए कहा था। मैं इन्दौर गया तो उन्होंने मुझे बताया लघुकथा के एक प्रबल लेखक यहाँ रहते हैं। उनका नाम सतीश दुबे है। उन्होंने प्रेमचंद साहित्य पर एम. ए. के लिए शोध पूरा किया था अतः वे डाक्टर सतीश दुबे हैं। मैं लघुकथा लिखता था इसलिए भी श्रीधर बर्वे जी को लगा था डाक्टर सतीश दुबे जी से मेरी मुलाकात सामयिक होगी। मैं सतीश दुबे जी के बारे में पहले से जानता था। वे लघुकथा आन्दोलन के प्रथम हस्ताक्षरों में से एक थे।
इस वक्त मुझे साल याद नहीं है। पर निश्चित ही यह कोरोनो से बहुत पहले की बात है और तब डा. सतीश दुबे जी अपने जीवन से थे।
श्रीधर बर्वे जी ने मुझे बताया था सतीश दुबे जी बीमार प्राणी हैं। वे लकवा पीड़ित थे। मैंने वहाँ पहुँचने पर उन्हें देखा और बात को सच ही पाया वे जीवन में निरुपाय हो कर रह गए थे। उनके मकान के प्रवेश द्वार में लिखा हुआ था — साहित्यकार
यह डा. सतीश दुबे जी के आवास का नाम था। दूसरे शब्दों में यह उनकी आकाँक्षा का शब्द था जो मैं बस महसूस कर पाता। उनकी श्रीमती उनकी सेवा में लगी रहती थी। मैंने साहित्य की आत्मा रखने वाले सतीश दुबे जी ने कहा था धर्मयुग के माध्यम से वे मुझे जानते हैं। मैंने उनके इन शब्दों को अपने लिए आशीर्वचन माना था। इंदौर में मेरा कार्यक्रम रखा गया था। सतीश दुबे जी को वहाँ मोटर में लाया गया था। उन्हें वहीं से दो शब्द कहने के लिए माइक थमाया गया था। उन्होंने कहा था हमारे अतिथि रामदेव धुरंधर हिन्दी साहित्य में यशस्वी होने के रास्ते पर हैं। बल्कि उन्होंने बहुत कमा लिया है। कमाने का यह सारस्वत यज्ञ जारी रहे।
डाक्टर सतीश दुबे जी की कलम ठहर जाने की जो दुरावस्था उन पर हावी थी वह ध्यान में रखते हुए भगवान से कह लूँ, “तुम धर्मात्मा होते हो इसके लिए तुम्हें वंदन तो कर लूँ। पर साथ ही तुम्हारे प्रति मेरी एक शिकायत भी, “कष्ट देने में बहुत नामधारी हुआ करते हो भगवन।”
☆ स्मृतिशेष प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव विदग्ध जी विशेष – अविस्मरणीय संस्मरण / अश्रुपूर्ण श्रद्धांजलि ☆
☆ साभार – स्मृतिशेष प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव विदग्ध जी के स्वजन-मित्रगण ☆
वरिष्ठ साहित्यकार, भगवतगीता, रघुवंश, मेघदूत के हिंदी काव्य अनुवादक, 40 से ज्यादा कृतियों के कवि, लेखक, आध्यात्मिक, राष्ट्र प्रेम की भावधारा के साहित्यिक रचनाकार पिताजी प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव विदग्ध का दुखद अवसान 99 वर्ष की आयु में आज 25 जुलाई को शाम 4 बजकर 50 मिनट पर हो गया है।
उन्होने शांति से अंतिम सांसे ली, और दिव्य स्थान को प्रस्थान कर गए हैं।
उन्होंने बच्चों के बच्चों के बच्चों के संग भी जीवन का भरपूर आनंद लिया। उनकी तीन पुत्रियां श्रीमती वंदना श्रीवास्तव, श्रीमती विभूति खरे, श्रीमती विभा निगम एवं एक पुत्र विवेक रंजन श्रीवास्तव हैं।
देशाटन और दुनियाँ में अनेक देशों का पर्यटन किया।
उन्हें भारतीय अनुवाद परिषद के शीर्ष सम्मान, मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी से तथा कई संस्थाओं से सम्मानित किया गया। वे केंद्रीय विद्यालय क्रमांक 1जबलपुर के संस्थापक प्राचार्य थे। उन्होंने गीता को जिया।
– विवेक रंजन श्रीवास्तव, भोपाल
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ई-अभिव्यक्ति के नियमित वरिष्ठ रचनाकार गुरुवर प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव विदग्ध जी के रूप में मैंने अपनी माध्यमिक शिक्षा के समय के अपने प्रथम प्राचार्य (केन्द्रीय विद्यालय क्रमांक १ जबलपुर) को खो दिया।
विगत ९९ वर्ष के जीवन काल के उनके स्वजन – मित्रगण भाई श्री विवेक रंजन जी के परिवार के साथ इस दुखद घडी के सहभागी हैं।
जैसे ही भाई श्री विवेक रंजन जी द्वारा उनके अवसान की सूचना फेसबुक सहित सोशल मीडिया पर डाली गई तो 300 से अधिक लोगों ने प्रतिक्रिया में संवेदनाये व्यक्त की। अनेक लोगों ने व्हाट्सअप पर सीधे प्रतिक्रिया की। सोशल मीडिया से प्राप्त कुछ प्रतिक्रियाएं हम आपसे साझा करने का प्रयास कर रहे हैं।
हेमन्त बावनकर, पुणे
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आपसे एक माह पूर्व आशीर्वाद प्राप्त किया था, प्रो0 साहब आपको विनम्र श्रद्धांजलि एवं सादर नमन।
– इंजी ब्रिजेंद्र शंखवार
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वेमिशाल जीवनचर्या पूर्ण कर देवलोक गमन हेतु सादर श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं आपके साहित्य में छिपे संदेशों से बहुत कुछ सीखने को मिला है। आपकी स्मृति सदा जीवंत रहेगी।
प्रभा विश्वकर्मा शील
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अत्यंत दुःखद समाचार.
ईश्वर से प्रार्थना करता हूँ कि दिवंगत आत्मा को मोक्ष प्रदान करें व श्री चरणों में स्थान दें तथा परिजनों को इस महान दुख को सहने की शक्ति प्रदान करें. ॐ शांति ॐ शांति 🙏
इंजी रवींद्र गर्ग
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अत्यंत दुखद सूचना है।
दादा जी
एक ऐसे व्यक्तित्व रहे, जिनका मन निर्मल और जीवन पारदर्शी रहा। सादर विनम्र श्रद्धांजलि 🙏
राजेश पाठक प्रवीण
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अत्यंत दुःखद समाचार है। ईश्वर उनकी आत्मा को शांति प्रदान करें। दुख की इस गहन घड़ी में परिजनों को संबल प्रदान करें। विनम्र श्रद्धांजलि. ओम शांति शांति शांति। 🙏
लक्ष्मी सिंग
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यह दुखद समाचार जानकर मन व्यथित हो गया। मैंने भी बाबूजी को बहुत करीब से देखा है। बहुत अच्छे साहित्यकार थे। लेकिन ईश्वर के विधान के सामने हम कुछ नहीं कर सकते। प्रभु से प्रार्थना है कि आप लोगों को सब्र और हौसला दे और दिवंगत आत्मा को शांति
सलमा खान
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बहुत दुखद समाचार 🙏 मेरी ओर से सादर नमन 🙏 हम ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि उन्हें अपने श्री चरणों में स्थान दें और परिवार को यह गहन दुःख की घड़ी में संबल प्रदान करें 🙏 ओम शांति शांति शांति 🙏
संजय वर्मा
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ओह्ह! 😢 विनम्र श्रद्धांजलि 💐
नईदुनिया जबलपुर में रहते उनका साक्षात्कार करने का अवसर मिला था। वो स्मृतियां हमेशा जीवित रहेंगी। ईश्वर पुण्यात्मा को श्रीचरणों में स्थान दें। 🙏🌺
राम कृष्ण गौतम
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ओह अत्यंत दुखद समाचार। अंकल को विनम्र श्रद्धांजलि। ॐ शांति 🙏
समीक्षा तैलंग
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दुखद समाचार है, पर शरीर की अपनी यात्रा होती है, लेकिन उस यात्रा में जो महान कार्य किया है उन्होंने वो सदा याद किया जाता रहेगा,
एक साहित्यकार ही नहीं थे बल्कि एक आध्यात्मिक व्यक्तित्व के भी धनी थे वो, एक वटवृक्ष की भांति उन्होंने दोनों को संरक्षण दिया था, ऐसे महान व्यक्तित्व को भाव भरी श्रद्धांजलि, भगवान उन्हें अपनी शरण में लेकर उच्च आसन प्रदान करें, तथा शोकाकुल परिवार को उनके विछोह के दुख को सहन करने की शक्ति प्रदान करें, विनम्र श्रद्धांजलि, ॐ शान्ति
अशोक श्रीवास्तव
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जो अंत्येष्टि में शामिल होगा,
वही पुण्य कमाऐगा!*
सतत् साधना में रत कविवर
की गंगा में नहाऐगा!!
मेरी उपस्थिति स्वीकारिऐगा
विदग्ध जी ॐ शाँति ॐ
ध्रुव कुमार गुप्ता
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एक शानदार मिलनसार व्यक्तित्व का अवसान बहुत दुखद है..विनम्र श्रद्धांजलि
युनुस अदीब
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अत्यंत दुःखद। पूज्य बाबूजी को विनम्र श्रद्धांजलि। ओम शांति 😔
हम अत्यंत सौभाग्यशाली हैं कि उनके द्वारा रचित नर्मदाजी की स्तुति को रिकॉर्ड करने का अवसर मिला। उनका आशीर्वाद सदैव अनुभव करते हैं, करते रहेंगे। 🙏🏼
प्रशांत सेठ
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भावपूर्ण विनम्र श्रद्धांजलि। बाबू जी का जीवन सादगी एवं विद्वत्ता की मिसाल था। शिक्षक पिता एवं कवि लेखक के रूप में उनकी यादें सदैव हृदय पटेल पर अंकित रहेगी। ईश्वर उनकी आत्मा को परम गति प्रदान करे। एक युग का अंत हुआ।
पीयूष खरे
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अत्यंत दुःखद समाचार!
हम परमपिता परमेश्वर से प्रार्थना करते हैं कि वह श्रद्धेय सर की दिवंगत आत्मा को जन्म मृत्यु के बन्धन से मुक्ति दे और अपनी शरण में लें तथा परिवार के सभी सदस्यों को इस असीम दु:ख को सहन करने की सामर्थ्य प्रदान करे।
ॐशांति ॐशांति ॐशांति
निखिलेश निगम
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बेहद दुखद संस्कारधानी जबलपुर भी उनकी साहित्यिक कर्म भूमि रही है ऐसे ऊर्जावान साहित्य मनीषी का देवलोकगमन सभी के लिए व्यथित करने वाला समाचार है प्रभु से कामना है कि विवेकरजंन जी और परिजनों को इस गहन दुःख को सहन करने की शक्ति प्रदान करें। श्रीजानकीरमण परिवार की ओर से सादर श्रद्धा-सुमन। ऊं शान्ति शान्ति शान्ति
डॉ अभिजात कृष्ण त्रिपाठी
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दुखद समाचार। आपके परिवार के विशिष्ट व्यक्तित्व का जाना आप सबके लिए बहुत कष्ट दायक है। ऐसे विद्वान का अवसान समाज के लिए भी बड़ी क्षति है। ईश्वर उनकी आत्मा को शांति प्रदान करे और पूरे परिवार को इस दुख को सहन करने की शक्ति दे। ओम शांति शांति 🙏
शक्ति तिवारी
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हम खुशकिस्मत हैं आदरणीय बाबूजी का सानिध्य मिला। सदैव ऊर्जा, सकारात्मक विचारों और रचनात्मकता से ओत-प्रोत रहे। भावपूर्ण श्रद्धांजलि, ईश्वर पूज्यनीय बाबूजी की दिवंगत दिवंगत आत्मा को अपने श्रीचरणों में स्थान दें और शोक-संतप्त् परिजनों को यह गहन दुःख सहन करने की शक्ति दे। 🙏🏼🌹 ॐ शांति 🌹🙏🏼
दीपक मालवीय
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अत्यंत दुखद खबर! भोपाल में होता तो आपके निवास पर पैदल चला आता! उन्हें सादर श्रद्धांजलि! उन्होंने पूरी जिंदगी स्वस्थ और सक्रिय रहकर जी, सादर नमन!
हरी जोशी
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अत्यंत शोक का विषय है, बाबूजी का सानिध्य मुझे भी मिला है. जब विवेक सर एम पी ई बी रामपुर मे बॉलीबाल ग्राउंड के सामने रहते थे, मैं सुबह टाइम कल्याण भवन के सामने से ऑफिस जाता था औऱ रास्ते मे उनके दर्शन हो जाते थे तो मैं स्कूटर रोककर उनके चरण छू लेता था. मैं घर भी जाता था. दुःखद समाचार है. ईश्वर उनकी आत्मा को अपने चरणों मे स्थान देवें. ॐ शांति… शांति… शांति…
मोहन श्रीवास
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अत्यंत ही दुखद समाचार है।
ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि उनकी आत्मा को अपने श्री चरणों में उचित स्थान प्रदान करने की कृपा करें और विवेक श्रीवास्तव के पूरे परिवार को इस गहन आघात सहन करने की शक्ति दें।
ईश्वर उनकी पुण्यात्मा को अपने श्री चरणों में स्थान प्रदान करें और परिवार जनों को इस भीषण आघात सहन करने की शक्ति दें।
विनम्र श्रद्धांजलि। ॥ॐशांतिः॥
अनिल कुमार लखेरा
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कष्टदायक जीवन से बहुत श्रेष्ठ है भवसागर पार कर शांतिपूर्ण देहावसान कर परमेश्वर की प्राप्ति। जब सी बी साहब लगभग चालीस वर्ष के रहे होंगे तब से उनसे परिचय हुआ था नितांत शांत व्यक्तित्व सदा रचनात्मक कार्य में लगे रहना। जबलपुर के प्रांतीय शिक्षण महाविद्यालय से जब वे शनिवार रविवार अपने आवास पर मंडला आते तो सौभाग्य वश हम सामने ही रहते तो उन्हें प्रति बागवानी में व्यस्त देखते। अपने बच्चों के साथ मेरी बेटियों से भी अत्यंत मधुर और शिक्षाप्रद व्यवहार रहता था। सच मुच एक एक पल भीष्म पितामह का जीवन जीकर सार्थक किया उन्होंने। परिवार भी उनका उनके ही सम था। उनकी माताजी उनकी पत्नी स्व.दयावती जी हमारी शाला की प्राचार्य पुत्रियां उनकी बहू कल्पनाजी सभी परिचित अपने मधुर व्यवहार से ह्रदय जीतने वाले। पुत्र श्री विवेक रंजनजी को तो समस्त साहित्य जगत बहुत अच्छे से जानता ही है मैं क्या कहूं। एक सुपुत्र जिसकी जगत आकांक्षा करपताहै वे हैं। आदरणीय भाई को हार्दिक भावांजली। पूरे परिवार को सहानुभूतिपूर्वक सहनशक्ति की कामना। ॐ 🙏शांति। 🙏
नीलम भटनागर
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श्री विदग्ध जी का जन्म सन छब्बीस है निश्चय ही उन्नीस सौ। क्योंकि क्रूर काल ने दो हजार का छब्बीस तो आने नहीं दिया। तो उनकी माताजी बताती थीं कि उस साल मंडला जो कि उनका जन्मस्थान है में नर्मदा मैया में भयानक बाढ आई थी। आमजन जीवन अत्यंत त्रस्त था। रहने और भोजन का बहुत अभाव ऐसे में कुछ दयालु जन ने अपने निवास पर लोगों को आश्रय दिया। उनमें से विदग्ध जी के पिता और दादा ने भी यह उपकारी कार्य किया। बादमें उन सभी घरों को तत्कालीन कलेक्टर साहब ने महलात नाम दिया जो इनके घर पर पट्टिका के रूप में लगा था। एक महलात औरतो मैं जानती हूं वह वल्लभजी ओझा का घर था जो मंडला के बडे दानदाता और विधायक रहे। बाद में उनकी सुयोग्य बहू श्रीमती नारायणी देवी झा शायद तीन चार टर्म की विधायिका रहीं। वे भी अत्यंत लोकप्रिय थीं। मंडला आदिवासी बहुत पुरातन जिला क्षेत्र फल के हिसाब से बहुत विस्तृत जिला था। अमर कंटक से आती मांनर्मदा ने इसे तीन ओर से घेरा हुआ है। अतिप्रसिद्ध तीर्थ स्थल है।
जो आज कायस्थ जन को चित्रांश नाम से नया नाम कहते हैं वे समझ लें कि इनका नाम तब श्री चित्र भूषण श्रीवास्तव रखा गया जिसे उनने सार्थक किया अगाध साहित्य के रचयिता और अनुवादक रहे सी बी साहब की एक सहज सरल भूषण पर लिखी कविता यहां उनको भावाजलि के रूप में प्रस्तुत कर रही हूं जो उनके राष्ट्र प्रेम को व्यक्त करती है। –
यही हमारी .भारत माता।
जिसका. प्यार हमें हर्षाता।।
बडे सुहाने सांझ सकारे।
सूरजचांद चमकते तारे।।
कषक श्रमिकसैनिक व्यापारी।
कलाकार रक्षक व्यापारी।।
सब धार्मिक निश्छलसद्ज्ञानी।
ज्यों निर्मल गंगा का पानी।
युग युगे है इनका नारा।
प्रेम आपसी भाई चारा। ।
नील गगन धरती कल्याणी।
सुफल उर्वरा अनुपम दानी।।
जनता अधिक गांव में बसती।
उत्सव प्रिय संस्कृति जिनकी।।
शहरों मेंपर रोज़गार है।
दिल्लीदिल है कण्ठ हार है।।
विश्व गगन का उज्वलतारा।
ऐसा अनुपम देह हमारा।।
यह कविता उनके स्वच्छ पावन हृदय का दर्पण है। शायद अपने विद्यार्थी जीवन में लिखी थी जो मंडला के जनजीवन में बहुत लोकप्रिय थी। उन के संगी साथी जो अब बहुत कम ही होंगे उनके विषय में बहुत कुछ लिखेंगे पर मेरी जानकारी एक और महत्वपूर्ण घटना है वह है अंग्रेजों द्वारा स्वाधीनता सैनानियों पर बीच चौक पर गोली चालन है जिसमें प्रसिद्ध श्री उदयचंद जी की मृत्यु हुई उस समूह में जो छात्र गण थे उसमें भी श्री सी. बी. भाई साहब थे। मेरा तात्पर्य महज यह याद दिलाना है कि उदयचंदजी भी शायद तब न मारे जाते तो अभी भी अपने परिवार में होते। अभी इत्यलम। पुनः भाई साहब को हार्दिक श्रद्धांजली। ईश्वर उन्हें अपने चरणों में स्थान। दें। । 🙏🙏
मीना जौहरी
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भावपूर्ण श्रद्धांजलि आज उनके लिए जो लिखा है उसे पढ़कर बहुत सी यादें ताजा हो गई वे एक बार स्काउट गाइड का और एक बार फनीचर का आडिट करने आये थे तो देखते हुए बोले अरे तुम्हारा क्या देखे ठीक होगा लाओ साइन कर देते हैं सब याद आ रहा है विवेक का फोन नंबर देना बहुत पहले था अब कब से सम्पर्क नहीं हुआ है
रंजना मिश्रा
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प्रिय साथियों
आज आ. विवेक रंजन जी के पिताजी के असामयिक निधन पर मंच पर अवकाश रखा गया था।
इस दुखद घड़ी में हम सब विवेक रंजन जी के साथ हैं।
ईश्वर पिताजी की आत्मा को शांति प्रदान करें। 🙏 ऊँ शांति ॐ 🙏
मधूलिका श्रीवास्तव, गद्य प्रवाह मंच
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दुखद समाचार है। श्री विदग्ध जी की एक पुस्तक ईश आराधना जो मंडला में उन्होंने मुझे सप्रेम भेंट की थी, आज भी मेरी बुक शेल्फ में सुरक्षित रखी हैं। ईश्वर ऐसी महान विभूति को अपने श्रीचरणों में स्थान दें। सभी परिजनों को इस अपार दुःख सहने की शक्ति प्रदान करें। 🌹विनम्र श्रद्धांजलि 🌹
कमल चंद्रा
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प्रणाम
आज आपका जन्मदिन है हमें पूर्ण विश्वास है कि पूजनीय पापा जी बैकुंठ धाम से आपको देखकर गर्वित महसूस कर रहे होंगे कि उन्हें इस कलयुग में भी आपके जैसा श्रवण कुमार प्राप्त हुआ। आप और सुषमा दीदी परिवार के उच्च संस्कारों के उत्तम उदाहरण है।
इस कठिन समय में आपको जन्मदिन की शुभकामनाएं।
ईश्वर आपको हिम्मत और शक्ति प्रदान करें। सादर
श्वेता और तरुण
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विवेक भाई, आदरणीय अंकलजी के देहावसान का दुखद समाचार आज ही देखा। आपके परिवार की इस घड़ी में मुझे अपने साथ ही समझो। मैं जानता हूं कि पिताजी का आशीर्वाद आपके लिए एक आदर्श संबल रहा है। ईश्वर से प्रार्थना है कि दिवंगत आत्मा को अपने चरणों में स्थान दें एवं आप सभी परिजनों को यह आघात सहन करने की शक्ति प्रदान करें। ओम् शांति।
हर्ष वर्धन व्यास
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विवेक जी !
आप सचमुच भाग्यशाली हैं। इतने वर्षों तक पिता की छत्र छाया जिसे नसीब हो उस पर साक्षात् प्रभु की अनुकम्पा ही बरसती है।
अपनों का बिछोह कष्टदायी होता है। मनुष्य बड़ा ही स्वार्थी जीव है। बिछुड़ना नहीं चाहता किन्तु यही शाश्वत सत्य है।
ईश्वर हमेशा आपके साथ रहे आप भी पिता श्री के सिखाए आदर्शों पर चल कर शिखर तक पहुँचें, यही ईश्वर से प्रार्थना है।
शतायु से कुछ समय पूर्व निधन शतायु होने का ही संकेत है। विनम्र श्रद्धांजलि 🙏
दुर्गा सिन्हा
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आप के पूरे परिवार पर ईश्वर की असीम अनुकंपा रही है, आप सभी भाई बहनों को ऐसे विद्वान विदूषी, कर्मठ और ईमानदार माता पिता प्राप्त हुए। पिता का निधन अपूरणीय क्षति है। शिक्षा और साहित्य के क्षेत्र में उन्हें सदा याद किया जाएगा।
मेरी विनम्र श्रद्धांजलि। प्रभु आप सभी को इस दुख को सहन करने की शक्ति प्रदान करें।🙏🙇♂️
राजीव कर्महे
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प्रिय भाई विवेक, आपके पिताजी के अवसान की जानकारी से बहुत दुःख हुआ। इश्वर् उन्हें अपने लोक में स्थान दे। परिवार में सब को यह दुःख सहन करने की शक्ति दे.
परमानंद सिंहा
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श्री विवेक रंजन जी,
प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव जी हमारे प्रथम प्रधान अध्यापक थे। उनके निधन से मैंने एक गुरू, पथ प्रर्दशक और एक अभिभावक को खो दिया। मैं उनके श्री चरणों में अपना प्रणाम अर्पित करता हूं और ईश्वर से प्रार्थना करता हूं कि वे उनकी आत्मा को चिर शांति प्रदान करे। साथ ही आप सभी को इस दुःख के समय संबल प्रदान करें। ॐ शान्ति शान्ति शान्ति।
अनूप बोस
1969 पास आउट केंद्रीय विद्यालय क्रमांक एक जबलपुर
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Dear Mr Vivek Ranjan Shrivastava ji…Very Sad to know about the demise of Respected Guru Ji Professor C B Shrivastava Ji.
Our deep heartfelt Condolences to you & all the family members with the prayers to almighty God to give eternal peace to the departed Soul. God may give enough strength to all the family members to bear this loss. 🕉 SHANTI 🕉
Avinash Goel & Family, Bangalore
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अत्यंत दुःखद साहित्य जगत की अपूरणीय क्षति।
ॐ शांतिः शांतिः शांतिः
अशोक सिंहासने, बालाघाट
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..Babbaji lived 99 years with dignity, curiosity, a sharp and beautiful mind. But the quality of his life, the peace he had in his final days and the love he left with all of that was because of you. Your devotion, your patience and the way you put his needs above your own every single day is something I will carry with me forever.
Both of you have dedicated your lives to honouring him. He was truly a fortunate man.
In the quiet, often unseen moments adjusting his body, preparing his food, anticipating even the smallest needs you gave him a kind of care that few people in this world ever receive. And even at the very end, he wasn’t alone. He left in peace, held by the love of the two people who never left his side.
We will carry the lessons he gave us within us and pass them on to the generations that follow. He was endlessly curious, always eager to learn more about the world. He had clarity of thought, emotional control, and a deep hunger for knowledge. These are truly rare traits that I aspire to take forward from him.
Thank you for giving him such a beautiful life. And thank you for showing me what it truly selfless service means. I can’t imagine another soul as lucky as him or other children as self-sacrificing and noble as you both.
I love you both so much.
Anubha, London
ब्रम्हलीन आदरणीय प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव का देवलोक गमन शिक्षा और साहित्य के क्षेत्र की अपूरणीय क्षति है। गरिमामय और सम्माननीय जीवन यात्रा पूरी कर अत्यंत सक्रिय और क्रियाशील स्थिति में स्वर्गारोहण भाग्यशाली व्यक्तियों को ही मिलता है। आदरणीय श्रीवास्तव साहब ऐसे ही परम भाग्यशाली थे।
अपनी साहित्यिक और सांस्कृतिक विरासत के रूप में प्रख्यात साहित्यकार अपने पुत्र श्री विवेक रंजन जी श्रीवास्तव को अपना उत्तराधिकार सौंप गए है। ऐसे महामना को ईश्वर मोक्ष प्रदान कर अपने चरणों में स्थान दे और श्रीवास्तव परिवार को इस दारुण दुख को सहन करने की शक्ति प्रदान करें।
डॉ प्रो जे सी श्रीवास्तव
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२५ जुलाई २०२५
प्रिय विवेक रंजन, स्नेह
आप भाग्यशाली बेटे हैं कि आपको आपके पिताश्री पूजनीय चित्र भूषण जी अपनी उम्र के ९९ वर्ष तक रोज आशीर्वाद देते रहे. उनके मार्गदर्शन के umbrella में आपने उत्कृष्ट उपलब्धियां प्राप्त की. उनके निधन से अब एक बड़ा vaccume create हो गया है. मुझे लगता है – आप आज से बड़े हो गए हैं. पिता के रहते हम बड़े होते नहीं हैं. उनके दुलार प्रेम अनुशासन में बच्चे ही बने रहते हैं.
आदरणीय भाई साहब श्री चित्र भूषण जी से मेरा परिचय आधी सदी का है, मैंने उन्हें विभिन्न पदों पर निष्ठा, ईमानदारी, कर्मठता, एवं पारदर्शी कार्य प्रणाली से कार्य करते देखा है, मैं DPI Office में रहा. वे भोपाल आने पर पहले मुझसे मिलने मेरे घर आते रहे हैं. मुझे उनका स्नेह मिलता रहा. हम साहित्यिक विषयों पर भी चर्चा करते थे. विलक्षण प्रतिभा से उन्होंने हिंदी साहित्य जगत में प्राय सभी विधाओं पर लेखन कर प्रतिष्ठा प्राप्त की. मैं उनकी स्मृति को प्रणाम करता हूँ.
महेश सक्सेना
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ई-अभिव्यक्ति परिवार की ओर से स्मृति शेष स्मृतिशेष प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव विदग्ध जी को विनम्र श्रद्धांजलि
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≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर / सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈
(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही गंभीर लेखन। शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं। हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)
संजय दृष्टि – अब तक 2192 !.✍️
(दैनिक लेखन का सातवाँ वर्ष)
(ई-अभिव्यक्ति की ओर से इस साहित्यिक यात्रा के सहयात्री श्री संजय भारद्वाज जी को २१९२ साहित्यिक रचनाओं के सहयोग के लिए हृदय से आभार. यह इस यात्रा के मील का एक पत्थर है. इस कीर्तिमान के लिए — अभिनन्दन 💐🙏)
आज 25 जुलाई है। इस दिनांक के साथ मेरे लेखकीय जीवन का एक महत्वपूर्ण प्रसंग भी जुड़ा हुआ है।
प्रसंग यह है कि लेखन करते हुए लगभग चार दशक से अधिक बीत चुके। उसमें गत आठ-नौ वर्ष से लिखना नियमित-सा रहा। कविता, लघुकथा, आलेख, संस्मरण, व्यंग्य और ‘उवाच’ के रूप में अभिव्यक्ति जन्म लेती रही। 15 जून 2019 से ‘ई-अभिव्यक्ति’ ने ‘संजय उवाच’ को साप्ताहिक रूप से प्रकाशित करना आरम्भ किया।
फिर संपादक आदरणीय बावनकर जी का एक पत्र मिला। पत्र में उन्होंने लिखा था, “आपकी रचनाएँ इतनी हृदयस्पर्शी हैं कि मैं प्रतिदिन उदधृत करना चाहूँगा। जीवन के महाभारत में ‘संजय उवाच’ साप्ताहिक कैसे हो सकता है?”
‘संजयकोश’ में यूँ भी लिखना और जीना पर्यायवाची हैं। फलत: इस पत्र की निष्पत्तिस्वरूप 25 जुलाई 2019 से सोमवार से शनिवार ‘संजय दृष्टि’ के अंतर्गत ‘ई-अभिव्यक्ति’ ने इस अकिंचन के ललित साहित्य को दैनिक रूप से प्रकाशित करना आरम्भ किया। रविवार को ‘संजय उवाच’ प्रकाशित होता रहा।
इस दैनिक यात्रा ने आज सातवें वर्ष में चरण रखा है।
आज पीछे मुड़कर देखने पर पाता हूँ कि इन वर्षों ने बहुत कुछ दिया। ‘नियमित-सा’ को नियमित होना पड़ा। अलबत्ता नियमित दैनिक लेखन की अपनी चुनौतियाँ और संभावनाएँ भी होती हैं। नियमित होना अविराम होता है। हर दिन शिल्प और विधा की नई संभावना बनती है तो पाठक को प्रतिदिन कुछ नया देने की चुनौती भी मुँह बाए खड़ी रहती है। अनेक बार पारिवारिक, दैहिक, भावनात्मक कठिनाइयाँ भी होती हैं जो शब्दों के उद्गम पर कुंडली मारकर बैठ जाती हैं। विनम्रता से कहना चाहता हूँ कि यह कुंडली, भीतर की कुंडलिनी को कभी प्रभावित नहीं कर पाई। माँ शारदा की अनुकम्पा ऐसी रही कि लेखनी हाथ में आते ही पथ दिखने लगा और शब्द पथिक बन गए।
अनेक बार यात्रा के बीच पोस्ट लिखी और भेजी। कभी किसी आयोजन में मंच पर बैठे-बैठे रचना भीतर किल्लोल करने लगी, तभी लिखी और भेजी। ड्राइविंग में कुछ रचनाओं ने जन्म पाया तो कुछ ट्रैफिक के चलते प्रसूत ही नहीं हो पाईं।
तब भी जो कुछ जन्मा, पाठकों ने उसे अनन्य नेह और अगाध ममत्व प्रदान किया। कुछ टिप्पणियाँ तो ऐसी मिलीं कि लेखक नतमस्तक हो गया।
नतमस्तक भाव से ही कहना चाहूँगा कि लेखन का प्रभाव रचनाकार मित्रों पर भी देखने को मिला। अपनी रचना के अंत में दिनांक और समय लिखने का आरम्भ से स्वभाव रहा। आज प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से जुड़े 90 प्रतिशत से अधिक रचनाकारों ने अपनी रचना का समय और दिनांक लिखना आरम्भ कर दिया है। अनेक मित्रों ने इसका श्रेय दिया तो अनेक कंजूसी भी बरत गए। इतना अवश्य है कि रेकॉर्डकीपिंग की यह आदत भविष्य में मित्रों को अपनी रचनाधर्मिता के पड़ाव खंगालने में सहायक सिद्ध होगी।
विनम्रता से एक और आयाम की चर्चा करना चाहूँगा। लेखन की इस नियमितता से प्रेरणा लेकर अनेक मित्र नियमित रूप से लिखने लगे। किसी लेखक के लिए यह अनन्य और अद्भुत पारितोषिक है।
आदरणीय भाई हेमंत बावनकर जी इस नियमितता के प्रथम कारण और कारक बने। ‘दक्षिण भारत राष्ट्रमत’ के सम्पादक श्रीकांत पाराशर जी विगत पाँच चार वर्ष से साप्ताहिक उवाच को बैंगलुरू और चेन्नई दोनों संस्करणों में स्थान दे रहे हैं। भिवानी से दैनिक ‘चेतना’ के सम्पादक श्रीभगवान वसिष्ठ जी भी साढ़े चार वर्ष से ‘उवाच’ और ‘दृष्टि’ दोनों स्तम्भ नियमित रूप से प्रकाशित कर रहे हैं। आप तीनों महानुभावों को हृदय की गहराइयों से अनेकानेक धन्यवाद। नियमित रूप से मेरे लेखन को पढ़नेवाले और अपनी प्रतिक्रिया देनेवाले पाठकों के प्रति आभारी हूँ। ‘आप हैं सो मैं हूँ।’ मेरा अस्तित्व आपका ऋणी है।
अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆
मोबाइल– 9890122603
संजयउवाच@डाटामेल.भारत
writersanjay@gmail.com
☆ आपदां अपहर्तारं ☆
श्रावण साधना रविवार ११ जुलाई 2025 से रक्षाबंधन तदनुसार शनिवार 9 अगस्त तक चलेगी।
इस साधना में ॐ नमः शिवाय का मालाजप होगासाथ ही गोस्वामी तुलसीदास रचित रुद्राष्टकम् का पाठ भी करेंगे।
101 से अधिक मालाजप करने वाले महासाधक कहलाएंगे
संभव हो तो परिवार के अन्य सदस्यों को भी इससे जोड़ें
अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं।
≈ संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈
☆ गुरु पूर्णिमा विशेष – संस्मरण – अविस्मरणीय बरसात☆ प्रो. (डॉ.) शरद नारायण खरे ☆
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मैंने शासकीय महाविद्यालय गुना में बीएससी प्रथम वर्ष में 1976 में प्रवेश लिया था। चूंकि मैं छोटी जगह से ज़िला मुख्यालय पर पहुंचा था, तो काफी डरा हुआ था, और संकोच में भी था। पर मैं पढ़ाई में बहुत अच्छा था, और अच्छे संस्कारों में पला था इसलिए मुझमें एक आत्मविश्वास भी था।
महाविद्यालय में प्रवेश होने के बाद मैं पैदल ही महाविद्यालय जाने लगा। उन दिनों स्कूटर/मोटर साइकिल की तो बात छोड़ ही दीजिए साइकिल से भी बहुत कम लोग महाविद्यालय जाते थे। यहां तक कि बहुत सारे प्राध्यापक भी पैदल ही महाविद्यालय जाते थे।
जब मैं जुलाई में महाविद्यालय पढ़ने जाने लगा, तो बरसात शुरू हो गई। तो मैं छाता लेकर महाविद्यालय जाने लगा। ऐसे ही एक दिन मैं महाविद्यालय जा रहा था कि पानी बरसना शुरु हो गया, तो मैंने छाता खोल लिया। तभी मैंने देखा कि हमें केमिस्ट्री पढ़ाने वाले पटेल साब भीगते हुए जा रहे हैं, उनके पास छाता नहीं था, तो मैंने उन्हें अपने छाते में आने के लिए कहा, पर उन्होंने संकोचवश मना कर दिया। पर मुझे यह अच्छा नहीं लगा कि गुरू भीगते हुए जाएं और शिष्य छाते में। इस पर मैंने उनसे निवेदन किया कि सर आप छाता ले लीजिए, मैं तो ऐसे ही ठीक हूं। पर इस प्रस्ताव को भी उन्होंने अस्वीकार कर दिया।
तो मैं बहुत ही पशोपेश में पड़ गया कि मैं छाते में जाऊँ, और गुरू बिना छाते के। यह भी सही नहीं। फलस्वरूप मैंने अपना छाता बंद किया और मैं भी भीगता हुआ चलने लगा। तो उन्होंने मुझे छाता लगाने के लिए कहा, मैं नहीं माना तो उन्होंने बहुत समझाया पर मैं नहीं माना। अंततः वे और मैं दोनों ही भीगते हुए महाविद्यालय पहुंचे।
वहां पहुंचकर सर ने मुझे स्नेह से देखा और बस इतना ही कहा कि बेटे तुम में जो संस्कार हैं वे तुम्हें बहुत ऊँचाई तक ले जाएंगे।
आज मैं महाविद्यालय में स्वयं प्राध्यापक (अब प्राचार्य) हूँ । सोचता हूँ कि पटेल साब के उसी आशीर्वाद की बदौलत ही हूँ । उस दिन की अविस्मरणीय बरसात को मैं कभी भी नहीं भूल सकता।
(ई-अभिव्यक्ति में प्रत्येक सोमवार प्रस्तुत है नया साप्ताहिक स्तम्भ कहाँ गए वे लोग के अंतर्गत इतिहास में गुम हो गई विशिष्ट विभूतियों के बारे में अविस्मरणीय एवं ऐतिहासिक जानकारियाँ । इस कड़ी में आज प्रस्तुत है एक बहुआयामी व्यक्तित्व “बहुमुखी प्रतिभा के धनी – स्व. प्रोफेसर एन. बी.गोस्वामी” के संदर्भ में अविस्मरणीय ऐतिहासिक जानकारियाँ।)
स्व. प्रोफेसर एन. बी.गोस्वामी
☆ कहाँ गए वे लोग # ५५ ☆
☆ “बहुमुखी प्रतिभा के धनी – स्व. प्रोफेसर एन. बी.गोस्वामी” ☆ श्री यशोवर्धन पाठक ☆
यूं तो तुम मशहूर बहुत थे,
पर प्रचार से दूर बहुत थे।
तुम निश्छल थे बहुत सरल थे
सिद्धांतों पर सदा अटल थे।
निर्भीक और निष्पक्ष बहुत थे।
शिक्षण में तुम दक्ष बहुत थे
————
उपरोक्त पंक्तियों की सार्थकता सिद्ध करने वाले श्रद्धेय श्री एन. बी . गोस्वामी जी के अनुपम व्यक्तित्व और प्रेरक कृतित्व के विषय में जब कुछ लिखने बैठा हूं तो मैं समझता हूं कि गोस्वामी जी शिक्षाविद तो थे ही साथ में आध्यात्मिक, सांस्कृतिक, राजनैतिक, सामाजिक क्षेत्र के काफी अच्छे जानकार याने एक ऐसे चिंतक जिनके स्पष्ट और निष्पक्ष दृष्टिकोण से काफी लोग प्रभावित भी थे। गोस्वामी जी को हम सभी दादा कहकर संबोधित और सम्मानित करते थे और वे भी सभी से बड़े भाई जैसा ही निश्चल प्यार करते। चूंकि दादा को संगीत, बागवानी इत्यादि का काफी शौक था। जन कल्याण के लिए होम्योपैथी को उन्होंने अपने जीवन का पावन उद्देश्य बनाकर रखा था। बहुमुखी प्रतिभा के धनी और कल्याणकारी गतिविधियों के लिए समर्पित गोस्वामी दादा सामाजिक और शैक्षणिक क्षेत्र में यशस्वी, मनस्वी और तपस्वी व्यक्तित्व के रूप में चर्चित थे।
प्रोफेसर श्री एन. बी. गोस्वामी जी का वैसे तो पूरा नाम श्री नीरद बरन गोस्वामी था लेकिन शैक्षणिक और सामाजिक में क्षेत्र वे प्रोफेसर एन. बी . गोस्वामी के रूप में ही प्रतिष्ठित थे। पिता श्री नरेन्द्र नाथ गोस्वामी और माता श्रीमती देवयानी गोस्वामी के ज्येष्ठ पुत्र प्रोफेसर गोस्वामी जी का जन्म 22 .05.1935 को हुआ था। अपनी कर्म भूमि जबलपुर से ही उन्होंने क्रिश्चियन बायस स्कूल और तत्कालीन राॅबर्टसन कालेज से शिक्षा अर्जित की और एम. एस. सी. इन एप्लाइड फिजिक्स की डिग्री प्राप्त करने के बाद प्रारंभ में चार वर्ष तक राॅबर्टसन कालेज में ही प्राध्यापक के रूप में सेवायें दी और बाद में गवर्नमेंट इंजीनियरिंग कॉलेज जबलपुर में प्राध्यापक के रूप में कुशलता और सफलता के साथ कार्य किया। अपने सेवा काल के दौरान श्री गोस्वामी जी ने फिजिक्स विषय को लेकर एक शोध परक पुस्तक भी लिखी जो कि छात्रों के लिए पठनीय और उपयोगी सिद्ध हुई। गोस्वामी जी गवर्नमेंट इंजीनियरिंग कॉलेज जबलपुर से अपनी गरिमामयी शिक्षण सेवाओं के बाद 1995 में सेवा निवृत्त हुए। उनके छात्र बताते हैं कि कालेज में उनके व्याख्प्यान अत्यंत ज्ञानवर्धक और प्रभावी हुआ करते थे। उनके छात्र उनके प्रति विशेष श्रद्धा रखते थे। गोस्वामी जी भी अपने छात्रों के लिए गुरु और संरक्षक दोनों की ही भूमिका का निर्वाह करते थे। यही कारण था कि सेवा निवृत्ति के बाद भी उनके छात्र उनके निऱंतर संपर्क में रहते थे। यह गोस्वामी जी की समर्पित और सक्रिय सेवाओं का ही प्रतिफल था।
अपने अध्ययन काल के दौरान इलेक्ट्रॉनिक्स में विशेष रुचि और दक्षता होने के कारण उन्होंने अपने जीवन का पहला आविष्कार किया। उन्होंने काफी प्रयास और परिश्रम के बाद रेडियो का निर्माण किया। वर्षों से कोलकाता ऑल इंडिया रेडियो से पितृमोक्ष अमावस्या के दिन सुबह चार बजे दुर्गा जी का मंत्रों और भक्तिमय संगीत के आव्हान का प्रसारण किया जाता था। उस समय सिर्फ गोस्वामी जी घर में रेडियो होने के कारण मुहल्ले के सभी बंगाली परिवार सुबह सुबह घर में एकत्रित होकर इस प्रसारण का आनंद लेते थे जो कि उस समय परिवार के लोगों के लिए यह अति हर्ष और गौरव का विषय था।
जीवन जीने की कला की सीख देने वाले हम सभी के प्रेरणास्रोत प्रोफेसर श्री एन. बी. गोस्वामी जी 6. 5.2021 को हम सबको छोड़ कर अनंत में विलीन हो गए लेकिन उनके साथ बिताए गए पल हमारे जीवन की अनमोल धरोहर रहेंगे और यह बात भी सही है कि दादा जाते जाते हमें राष्ट्र कवि स्व. श्री मैथिलीशरण गुप्त की इन पंक्तियों में सार्थक जीवन का एक ऐसा प्रेरक संदेश भी दे गए जो कि किसी भी व्यक्ति की विकास यात्रा का मूल मंत्र भी सिद्ध हो सकता है —
(ई-अभिव्यक्ति में प्रत्येक सोमवार प्रस्तुत है नया साप्ताहिक स्तम्भ कहाँ गए वे लोग के अंतर्गत इतिहास में गुम हो गई विशिष्ट विभूतियों के बारे में अविस्मरणीय एवं ऐतिहासिक जानकारियाँ । इस कड़ी में आज प्रस्तुत है एक बहुआयामी व्यक्तित्व “माडल हाई स्कूल के पूज्य शिक्षक स्मृति शेष रमेश कुमार पांडेय जी” के संदर्भ में अविस्मरणीय ऐतिहासिक जानकारियाँ।)
स्व. रमेश कुमार पांडेय
☆ कहाँ गए वे लोग # ५४ ☆
☆ “माडल हाई स्कूल के पूज्य शिक्षक स्मृति शेष रमेश कुमार पांडेय जी” ☆ श्री यशोवर्धन पाठक (माडेलियन 74) ☆
माडल हाई स्कूल के भूतपूर्व छात्रों को पिछले दिनों एक वर्ष में ही तीसरी बार दुखदायी ख़बरों का सामना करना पड़ा। इसी वर्ष स्कूल के भूतपूर्व शिक्षक श्रद्धेय श्री ईश्वरी प्रसाद तिवारी जी, श्रद्धेय श्री एल. के. श्रीवास्तव जी के स्वर्गवास की दुखद घटना से अभी उनके छात्र संभल ही नहीं पाये थे कि पिछले दिनों स्कूल के एक और प्रिय एवं पूज्य शिक्षक श्री आर. के. पांडेयसर भी हमें हमेशा के लिए छोड़कर अंनत में विलीन हो गये।
स्व. रमेश कुमार पांडेय सर जिन्हें हम सभी स्कूल में श्री आर. के पांडेय सर के रुप में ही जानते थे, अपने अनुशासन और प्रभावी शिक्षण के लिए छात्रों के बीच लोकप्रिय थे। छात्रों के बीच पांडेय जी पारिवारिक आत्मीयता के साथ बात करते थे। उनका पितृ तुल्य अपनापन छात्रों के लिए चर्चा का विषय रहता। उनका कहना था कि ये अपनापन शिक्षक और शिष्य की अनावश्यक दूरी को कम करता है और छात्रों को अपनी सभी कठिनाइयों को कहने में सुविधा होती है। आदरणीय पांडेय जी के सुपुत्र श्री राकेश पाण्डेय भी माडेलियन 74 के हमारे प्रिय साथी रहे हैं और उनसे मेरी काफी निकटता भी थे। इसी निकटता के कारण पांडेय जी भी मुझे पुत्र तुल स्नेह देते थे। स्कूली पढ़ाई के दौरान ही दुर्भाग्य वश भाई श्री राकेश पाण्डेय का आकस्मिक निधन हो गया। यह हम सभी के लिए अत्यंत दुखद घटना थी जिसने सभी को झकझोर के रख दिया। आदरणीय पांडेय जी के प्रति गहरी संवेदना और पारिवारिक आत्मीयता के चलते बाद में उनकी बेटियों से भी मेरे राखी के संबंध बने।
यह वह समय था जब मैंने पांडेय जी में गुरु और संरक्षक दोनों के ही समन्वय स्वरुप को बड़े गहरे तक महसूस किया।
जबलपुर के माडल हाई स्कूल के शिक्षक दिवस का गरिमामय आयोजन अपने समय में राज्य स्तर पर एक अनूठा कार्यक्रम होता था। इस कार्यक्रम की शुरुआत स्कूल के तत्कालीन प्राचार्य एवं सुप्रसिद्ध शिक्षाविद श्री एस. पी. निगम साहब के सूझबूझ से ही की गई थी। इस आयोजन में भूतपूर्व छात्रों के द्वारा भूतपूर्व शिक्षकों का सम्मान जैसा कार्यक्रम शिक्षा जगत में सभी को अत्यंत प्रेरित और प्रभावित करता था। इस कार्यक्रम की चर्चा मैं पांडेय जी के इस लेख के साथ इसलिए कर रहा हूं क्योंकि सेवा निवृत्ति के बाद प्रतिवर्ष इस आयोजन में शामिल होने वाले पूज्य गुरुजनों में श्री आर. के. पांडेय सर भी शामिल थे। एक बार उन्होंने कहा था कि ऐसे तो अपने प्रिय शिष्यों से मिलना हो नहीं पाता लेकिन शिक्षक दिवस के इस आयोजन में अपने स्कूली छात्रों से भी मिलना हो जाता है और अपने शिक्षक साथियों से भी। इसी पावन उद्देश्य से पांडेय जी शिक्षक दिवस पर प्रतिवर्ष आया करता।
पांडेय सर से वैसे तो मेरी मुलाकात चाहे जब होती रहती थी लेकिन उनसे अंतिम भेंट मेरी 5 सितंबर 2024 को मंच दीप और गढ़ा रामलीला समिति के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित शिक्षक दिवस के आयोजन में हुई थी। इस कार्यक्रम में जिन सेवानिवृत्त श्रेष्ठ और श्रद्धेय शिक्षकों को सम्मानित किया गया उनमें माडल हाई स्कूल जबलपुर के सेवा निवृत्त शिक्षक श्री आर. के. पांडेय सर भी शामिल थे। कार्यक्रम में उस दिन देश के सुप्रसिद्ध कवि आचार्य श्री भगवत दुबे जी, श्री अशोक मनोध्या जी, मंच दीप से श्री मथुरा जैन उत्साही जी, श्री मनीष तिवारी,पाथेय से संयोजक श्री राजेश पाठक प्रवीण, वर्तिका से श्री विजय नेमा ‘अनुज’, आचार्य विजय तिवारी ‘किसलय’, सृजन पथ से श्री दीपक तिवारी इत्यादि शामिल थे और इन सभी सम्मानित जनों की गरिमामयी उपस्थिति में अपने प्रिय व पूज्य गुरुदेव को अभिनंदित होते हुए देखकर मैं भी गौरवान्वित हो रहा था।
अपने शिक्षकीय जीवन में गुरुवर श्री आर. के. पांडेय सर ने वास्तव में एक राष्ट्र निर्माता की प्रभावी भूमिका का निर्वाह किया था। सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रद्धेय डा. राजकुमार सुमित्र जी ने एक बार कहा था कि- “व्यक्ति बीत जाता है और समय भी लेकिन कुछ स्मृतियां ऐसी होती हैं जिससे स्मृति कोष सार्थक हो जाया करता है।”
पांडेय सर भी ऐसे ही महान शिक्षक थे जिनकी प्रेरक शिक्षा और कल्याणकारी गतिविधियों के कारण वे सदा हमारे आस पास अपने होने का अहसास दिलाते रहेंगे।
(हमारे आग्रह पर श्री अजीत सिंह जी (पूर्व समाचार निदेशक, दूरदर्शन)हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए विचारणीय आलेख, वार्ताएं, संस्मरण साझा करते रहते हैं। इसके लिए हम उनकेहृदय से आभारी हैं। आज प्रस्तुत है पितृ दिवस पर विशेष ‘तीन लकीरें , तीन वचन; पिता के नाम……’।)
☆ पितृ दिवस विशेष – तीन लकीरें , तीन वचन; पिता के नाम… ☆ श्री अजीत सिंह ☆
वे जेब खर्ची देने वाले पिता नहीं थे। वे उन पिताओं जैसे भी नहीं थे जो अपने बच्चों के बस्ते आप उठाकर उन्हे स्कूल बस में चढ़ाने जाते हैं। न ही वे हमें किसी आधुनिक पिता जैसा लाड़ प्यार करते थे। वे सख्त किस्म के पिता थे। उनका मानना था कि लाड़ प्यार से बच्चे बिगड़ते हैं अत: जहां वे मामूली गलती भी करें, उनकी पिटाई होती रहनी चाहिए। मार पीट के मामले में हम बचपन से ही ढीठ बन चुके थे।।
जीवन मूल्यों व संघर्ष की स्वयं अपनी शिक्षा के लिए पिताजी ने स्कूल वगैरा को कभी बीच में आने नहीं दिया। कोई लिखना पढ़ना नहीं। कोई थिअरी नहीं। सब कुछ प्रैक्टिकल। यही कुछ वे हमें सिखाना चाहते थे। 1947 में गांव में आ बसे पंजाबी परिवारों की सोभत में उन्होंने अपने पुत्रों को स्कूल भेजना तो शुरू किया पर जीवन कौशल की सख्त प्रैक्टिकल ट्रेनिंग में कोई रियायत नहीं की।
इस सब के बावजूद पिता सही मायने में हमारे शुभचिंतक व संरक्षक थे। संतान प्राप्ति के लिए ही तो उन्होंने एक के बाद एक, चार शादियां की थी।
हमारे गांव में स्कूल नहीं था। पास के गांव पूंडरी में था। पहली क्लास में हमारा दाखिला वहीं हुआ।
हम कापियों पर पेंसिल या पैन से नहीं, तख्तियों पर स्याही और कलम से सुलेख लिखते थे। मुल्तानी मिट्टी से तख्ती पोची जाती थी।
तख्ती लड़ने के काम भी आती थी। कई बच्चे तो तलवार की तरह घुमाकर तख्ती चलाते थे। एक दिन दो बच्चों में ऐसा तख्ती युद्ध हुआ कि एक बच्चे के सिर से खून बहने लगा। एक अध्यापक ने उसकी मरहम पट्टी की। स्कूल में फर्स्ट एड बॉक्स था।
फिर सभी बच्चों को इकट्ठा किया और अध्यापक ने गुस्से से सभी को धमकाया कि अगर वे लड़ाई करेंगे तो उन्हे स्कूल से निकाल दिया जाएगा। जो पढ़ना नहीं चाहता वह स्कूल में न आए।
आखरी बात मुझे बड़ी अच्छी लगी। जब दोबारा कक्षाएं शुरू हुईं तो मैं अपना थैलानुमा बस्ता और तख्ती उठाकर अध्यापक के पास गया और उनसे कहा कि मैं नहीं पढ़ना चाहता। यहां बच्चे लड़ाई करते हैं। मैं घर जाना चाहता हूं।
“अबे जा उल्लू के पट्ठे। तुझे कौन बुलाने गया था कि तू स्कूल में आ!”
मैं डर कर पीछे हटा। हैरान था कि कुछ देर पहले यह कहने वाला अध्यापक कि जो पढ़ना नहीं चाहता, अपने घर जाए, अब क्यूं गुस्सा हो रहा था। खैर, मैं अपना तख्ती बस्ता लेकर त्यागी चौपाल में चल रहे स्कूल से वापिस अपने गांव और घर की ओर निकल गया।
गांव पहुंचा तो गली में ही चंद्रभान बनिए की दुकान पर बापू को बैठे पाया और ठिठक कर वहीं रुक गया। उन्होंने पूछा कि जल्दी कैसे आ गया तो मैंने साफ़ साफ़ सारा किस्सा सुना दिया यह कहते हुए कि मैं स्कूल में नहीं पढ़ना चाहता।
अच्छा तू नहीं पढ़ना चाहता… यह कहते हुए बापू ने अपने पैर की जूती उठाई और ज़ोर से मेरी तरफ फेंकी। उनका निशाना कुछ चूक गया और उन्हें अपनी तरफ आता देख मैं वहां से भाग लिया।
मैं आगे और बापू पीछे, गांव की फिरनी का पूरा चक्कर काट लिया। घूम कर स्कूल के रास्ते पर जब मैं मुड़ा तो बापू ने मेरा पीछा करना छोड़ा।
मैं बापू के गुस्से को समझ नहीं पाया पर पिटाई से बचने के लिए वापिस स्कूल की तरफ हो लिया। मन में एक और डर था कि अध्यापक भी पिटाई करेगा।
स्कूल की तरफ कुछ ही दूर गया था कि पंजाबी लड़का अविनाश ग्रोवर वापिस आता मिल गया। कहने लगा, आगे कोई लंबा सांप निकला है और उसने सांप के रास्ते से गुजरने के निशान देखे हैं।
मैं और डर गया। अकेला आगे कैसे जाऊं? रास्ते में सांप आ गया तो?
मैं वापिस अविनाश के साथ गांव की तरफ ही मुड़ लिया। पिता का भी डर था। मुझे दोनों तरफ सांप नज़र आने लगे। गांव की तरफ ही चलता गया यह सोच कर कि बापू तब तक दुकान से जा चुका होगा।
पर वो तो वहीं बैठा मिला ।
फिर वापिस आ गया तू? वह गुस्से से बोला। मैंने हकलाते हुए कहा, रास्ते में सांप था।
चन्द्रभान बनिए ने कुछ बीच बचाव किया। ….चाचा, बच्चा डर गया है, अब की बार माफ़ कर। आगे से यह स्कूल से नहीं भागेगा…
मैंने बगैर पूछे ही बार बार हामी भरते हुए गर्दन हिलाई।
“क्यों, फिर भागेगा”, बापू ने पूछा। वह पूरी तसल्ली करना चाहता था। मैंने दोनों कान पकड़ कर गर्दन दाएं बाएं हिलाते हुए ना कहा।
ऐसे काम नहीं चलेगा। नाक से तीन लकीरें निकाल कि तू फिर स्कूल से नहीं भागेगा।
मैंने तुरंत नाक से तीन लकीरें निकाली और कहा कि फिर कभी स्कूल से नहीं भागूंगा।
बापू ने कहा, जा घर जा।
आज माफ़ कर दिया, फिर नहीं करूंगा।
बस वो दिन और आज का दिन। मैं कभी स्कूल तो क्या कॉलेज या फिर दफ्तर की ड्यूटी से भी नहीं भागा। तीन लकीरें जो निकाली थीं नाक से।
तीन लकीरें सहज ही मेरे लिए बापू को दिए तीन वचन बन गईं : पहला वचन कि कभी किसी काम से नहीं भागना भले ही कश्मीर के आतंकवाद में ड्यूटी करनी हो;
दूसरा वचन कि पूरे मन से काम करना, इसी से ज्ञान व कौशल मिलेगा और मान सम्मान प्राप्त होगा तथा आखरी व तीसरा वचन यह कि जिस काम की दिल गवाही न दे, उसे करने से बचना।
पितृ दिवस पर नमन मेरे पिता को और उन जैसे सभी पिताओं को।
(ई-अभिव्यक्ति के “दस्तावेज़” श्रृंखला के माध्यम से पुरानी अमूल्य और ऐतिहासिक यादें सहेजने का प्रयास है। श्री जगत सिंह बिष्ट जी (Master Teacher: Happiness & Well-Being, Laughter Yoga Master Trainer, Author, Blogger, Educator, and Speaker) के शब्दों में “वर्तमान तो किसी न किसी रूप में इंटरनेट पर दर्ज हो रहा है। लेकिन कुछ पहले की बातें, माता पिता, दादा दादी, नाना नानी, उनके जीवनकाल से जुड़ी बातें धीमे धीमे लुप्त और विस्मृत होती जा रही हैं। इनका दस्तावेज़ समय रहते तैयार करने का दायित्व हमारा है। हमारी पीढ़ी यह कर सकती है। फिर किसी को कुछ पता नहीं होगा। सब कुछ भूल जाएंगे।”
दस्तावेज़ में ऐसी ऐतिहासिक दास्तानों को स्थान देने में आप सभी का सहयोग अपेक्षित है। इस शृंखला की अगली कड़ी में प्रस्तुत है श्री जगत सिंह बिष्ट जी का एक ऐतिहासिक दस्तावेज़ “दादा-दादी और नाना-नानी के गांव“।)
☆ दस्तावेज़ # 29 – दादा-दादी और नाना-नानी के गांव☆ श्री जगत सिंह बिष्ट ☆
यह मेरे जीवन की प्रथम यात्रा की कहानी है। यात्रा भी कोई छोटी-मोटी नहीं, लगभग एक हज़ार तीन सौ किलोमीटर लंबी यात्रा। वो भी धीमी पैसेंजर गाड़ी से, जो मार्ग के प्रत्येक स्टेशन पर रुकती थी। गर्मियों का समय था, ठसाठस भरी जनरल बोगी, न कोई आरक्षण, न कोई स्लीपर बर्थ। माताजी और पिताजी के अलावा हम सभी छोटे बच्चे थे।
इस यात्रा में एक सप्ताह तक का समय लगने की संभावना थी और इसके चार प्रमुख चरण थे। पहला चरण, जबलपुर से इलाहाबाद तक, लगभग 300 किलोमीटर। दूसरा, इलाहाबाद से लखनऊ, लगभग 400 किलोमीटर, और तीसरा लखनऊ से रामनगर (जिला नैनीताल), लगभग 500 किलोमीटर। धीमी रेलगाड़ी द्वारा इनमें लगने वाला समय अनिश्चित था। स्टेशन मास्टर भी नहीं बता सकता था कि रेलगाड़ी अपने गंतव्य पर कब पहुंचेगी। रामनगर से पर्वतमाला शुरू हो जाती है। वहां से घुमावदार पहाड़ी मार्ग पर लगभग 100 किलोमीटर का बस का सफ़र। इसमें पूरा दिन लगता था।
इतने पराक्रम के पश्चात्, हम अपने पिताश्री के गांव नौला, पट्टी वाला नया, तहसील रानीखेत, जिला अल्मोड़ा पहुंचते थे। नानी का गांव मासी तो और भी आगे है। ये जगह पहले उत्तर प्रदेश का हिस्सा थीं, अब उत्तराखंड में हैं।
मैं तब छठवीं कक्षा का छात्र था। यह सन् 1966 की बात होगी। हम लोग रिक्शों में बैठकर, सामान सहित, जबलपुर रेलवे स्टेशन पहुंचे। पिताश्री ने कतार में लगकर टिकट ली। हम धीमी पैसेंजर की जनरल बोगी के अंदर दाखिल हुए। मुझे खिड़की के पास बैठना था। मेरे हाथ में एक नोटबुक और पेंसिल थी। मैं रास्ते में आने वाले हर स्टेशन का नाम उसमें नोट करना चाहता था। गाड़ी, अपने समय से दो घंटे विलंब से, खुली। तब तक मुझ नन्हे-मुन्ने बालक को नींद आ चुकी थी। नोटबुक कोरी ही रह गई।
कुछ देर बाद मुझे जगाया गया तो सामने घर की बनी पूरियां और आलू की सब्जी थी, साथ में अचार। अब तक अंधेरा हो चुका था और बाहर कुछ नज़र नहीं आ रहा था। फिर कब नींद आ गई, पता ही नहीं चला।
सुबह इलाहाबाद स्टेशन पर हम गाड़ी से उतरे। क्लोकरूम में सामान जमा करवाया और त्रिवेणी संगम घाट की तरफ रुख किया। पिताश्री धार्मिक प्रवृत्ति के थे और यहां पर सपरिवार स्नान का उनके लिए बहुत महत्त्व था। उन्होंने हमें बताया कि कुंभ के अवसर पर वो जब यहां आए थे तो कितना अपार जनसमूह इस घाट पर था।
शाम को अगली धीमी पैसेंजर से हम लखनऊ के लिए रवाना हुए। फिर वहां से दूसरी गाड़ी में रामनगर। यह पहाड़ों के लिए एक प्रवेशद्वार है। वहां हम एक-दो दिन रुके। कुछ सामान वहां से खरीदकर गांव लेकर जाना था। उसमें गुड़ की भेली, शक्कर के कुंज, चायपत्ती, नमक, दाल और मिठाई शामिल थे। रामनगर का बाजार कुछ अलग है। यह आधी रात के बाद ही खुल जाता है। बहुत सवेरे यात्रीगण सामान खरीदकर, मुंह अंधेरे ही बसों में सवार हो जाते हैं, पहाड़ों की ओर जाने के लिए।
हम भी सुबह-सबेरे बस में सवार होकर, गर्जिया माता को प्रणाम करते हुए रवाना हुए। दस-ग्यारह बजे के लगभग बस का स्टॉप भतरोंजखान में खाने के लिए हुआ। वहां हमने आलू के गुटके और खीरे का स्वादिष्ट रायता खाया जिसका खूब नाम सुना था। कुछ देर में बस रवाना हुई। अभी तक हम घुमावदार चढ़ाई चढ़ते हुए ऊपर की ओर आ रहे थे, अब ढलान में नीचे की ओर जाना था। भिक्यासैन पहुंचते ही हमारी धड़कन बढ़ने लगी। अब हमारा गांव ज़्यादा दूर नहीं था। हमने जैनल को पार किया तो दूर से गांव के शिवालय के दर्शन होने लगे। रोड के एक तरफ रामगंगा नदी बह रही थी और चारों तरफ ऊंचे-ऊंचे पहाड़ थे।
हमने कंडक्टर को कहा कि नौला में पोस्टऑफिस पर बस रोक देना। यह अच्छी बात है कि हमारा गांव सड़क के किनारे ही है। कुछ सामान लेकर हम घर की ओर बढ़े, बाकी सामान वहीं दुकानों पर रख दिया, बाद में ले जाने के लिए। अपना मकान देखकर मन प्रफुल्लित हो गया। बिल्कुल नया बना था, दोमंजिला। नीचे रसोई और मवेशियों को रखने के लिए कमरे। ऊपर आवास।
हमारा गांव वाकई सुन्दर है। सामने ही रामगंगा नदी बहती है। पास ही पानी का प्राकृतिक स्रोत है, जिसे नौला कहते हैं। अत्यंत मीठे और ठंडे पानी का निरन्तर प्रवाह मन को मोहित कर लेता है। गांव में देवी का मंदिर है और पंचायत भवन भी। तब हमारे काका सरपंच हुआ करते थे, अच्छा-खासा रुतबा था उनका। शाम को गांव के लोग आंगन में बैठते तो काका शान से हुक्का गुड़गुड़ाते। घर में दो जोड़ी तगड़े बैल थे और गाय भी।
घर के आगे काफी बड़ा आंगन है। इस आंगन में एक अनोखी शिला है, जिस पर हमें बहुत गर्व है। यह एक चौकोर पत्थर का बहुत बड़ा खंड है, लगभग छः फुट × छह फुट। कहते हैं, इसे हमारे लकड़-दादा (परदादा के पूर्ववर्ती) दूर पहाड़ी के ऊपर जंगल से कंधे पर लेकर आए थे। इसे आंगन में स्थापित कर, वो सुबह-शाम इस पर बैठकर ध्यान और ईश्वर का स्मरण करते थे। गांव के लोग आज भी इस शिला को श्रद्धाभाव से सम्मान देते हैं।
अगले दिन, काका बैलों के साथ-साथ हमें भी नहलाने के लिए नदी पर अपने साथ ले गए और तैराकी का पहला पाठ सिखाया। यह हमारे लिए बहुत ही आनंद का समय था। हम रोज़ाना नहाने के लिए नदी पर ही जाते। घर पर, काकी मंडुवे की रोटी, झुंगरा का भात और गौहत की दाल भोजन के लिए तैयार रखती। हमने इन्हें पहली बार ही चखा था। कच्चे आम, हरी मिर्च, गुड़ और प्याज़ की चटनी के तो कहने ही क्या!
ऊपर पहाड़ पर घना जंगल था। काकी सुबह उठकर वहां घास काटने जाती थी। एक दिन हम भी ऊपर तक गए। उन दिनों, वहां से एक छोटी सी नहर नीचे गांव तक सिंचाई के लिए आती थी।
गांव में बहुत अपनापन था। हर कोई बिल्कुल अपना लगता था। कोई काका, कोई ताऊ, कोई दादी, कोई भाभी। पूरा गांव एक विशाल कुटुंब था। वहां सबकुछ अपना लगता था – खेत, फसल, आम का बगीचा, मंदिर, नदी, पहाड़, सभी। यह अपनापन का भाव शहर में महसूस नहीं होता। गांव का हर व्यक्ति मिलने आता, कोई दूध लेकर, कोई फल लेकर। घर पर दिन भर चाय की केतली चूल्हे पर चढ़ी रहती। वहां से कोई भी बिना चाय पिए नहीं जा सकता था।
एक दिन, दोपहर के खाने के बाद, हम बस में सवार होकर नानी के गांव के लिए निकले। मासी पर बस से उतरे। थोड़ा आगे, पनचक्की के पास से नदी पार की और नानी के गांव बसोली की चढ़ाई पर चढ़ने लगे। थोड़ी देर में अंधेरा हो गया। बीच में एक गांव में हम पानी पीने के लिए रुके। वहां रिवाज है कि आप से पूछेंगे कि किनके घर जा रहे हो। वहां भी उन्होंने पूछा और पेड़ से एक कटहल तोड़कर हमें दिया। नानी के घर पहुंचने तक रात हो चुकी थी। हमारे वहां पहुंचते ही, मामी फुर्ती से खेत से हरे प्याज लेकर आई। ताज़े प्याज की सब्जी का वो स्वाद अब तक जेहन में बसा हुआ है।
ये बातें आज से लगभग साठ साल पहले की हैं। अब समय बहुत बदल चुका है। अब न माता-पिता रहे, न काका-काकी, न नाना-नानी और न मामा-मामी। तब मैं एक नन्हा-मुन्ना बालक था। ज़्यादा समझ नहीं थी। बहुत कम बातें ही याद हैं, अधिकतर का बोध ही नहीं था। मेरा जन्म मैदानों में हुआ लेकिन हमारे पूर्वज पहाड़ों में बसते थे। वहां तब पहली बार जाना हुआ। एक अलग ही भाव जागा मन में। इसके बाद भी अनेक बार वहां जाना हुआ लेकिन पहली यात्रा की कुछ स्मृतियां अब भी ताजा हैं। उनकी मिठास और उनमें अपनापन कुछ अलग ही है। आज भी वो स्मृतियां विभोर करती हैं।
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≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈