श्री यशोवर्धन पाठक
(ई-अभिव्यक्ति में प्रत्येक सोमवार प्रस्तुत है नया साप्ताहिक स्तम्भ कहाँ गए वे लोग के अंतर्गत इतिहास में गुम हो गई विशिष्ट विभूतियों के बारे में अविस्मरणीय एवं ऐतिहासिक जानकारियाँ । इस कड़ी में आज प्रस्तुत है एक बहुआयामी व्यक्तित्व “प्रखर पत्रकार और स्वतंत्रता सेनानी – स्व. पं. कुंजबिहारी जी पाठक” के संदर्भ में अविस्मरणीय ऐतिहासिक जानकारियाँ।)
स्व. पं. कुंजबिहारी जी पाठक
☆ कहाँ गए वे लोग # ५३ ☆
☆ “प्रखर पत्रकार और स्वतंत्रता सेनानी – स्व. पं. कुंजबिहारी जी पाठक” ☆ श्री यशोवर्धन पाठक ☆
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जो कलम सरीखे टूट गये, पर झुके नहीं
उनके आगे यह दुनिया शीश झुकाती है।
जो कलम किसी कीमत पर बेची नहीं गयी
वह तो मशाल की तरह उठाई जाती है।
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अपने समय के सुप्रसिद्ध कवि स्व. श्री रामकृष्ण श्रीवास्तव जी की इन काव्य पंक्तियों की सार्थकता सिद्ध की थी सुप्रतिष्ठित पत्रकार, लेखक, चिंतक और स्वतंत्रता संग्राम सेनानी श्रद्धेय स्व. पं. कुंजबिहारी जी पाठक ने जो एक प्रखर पत्रकार के रूप में नैतिक मूल्यों पर पत्रकारिता कार्य करते रहे और जिन्होंने अपने सिद्धान्तों से कभी समझौता नहीं किया। उन्होंने कलम को सचमुच मशाल की तरह उठाया था और जब दैनिक प्रदीप का उन्होंने संपादन किया तो यह अखबार भी उन्होंने निर्भीकता और निष्पक्षता के साथ निकाला और पत्रकारिता के नये मापदंड स्थापित किए जो कि पत्रकारिता की नयी पीढ़ी के लिए प्रेरणा का विषय बनीं। स्पष्टवादिता उनकी लेखनी में दृष्टिगोचर होती थी। उनके द्वारा प्रकाशित चार पैसे का अखबार प्रदीप तत्कालीन परिस्थितियों में जन चेतना का प्रतीक बन गया था। पाठक जी उस समय हज़रत भाभी जार नाम से प्रदीप में कालम लिखते थे और लोग उस कालम को पढ़ने के लिए ही बड़ी आतुरता से यह अखबार खरीदते थे। यह अखबार उस समय पत्रकारिता के क्षेत्र में जन चर्चा का विषय था। पाठक जी की भाषा शैली इतनी अनोखी थी कि लोग शब्दों के अर्थ के लिए डिक्शनरी पढ़ते थे। उनके कालम के शीर्षक बड़े दिलचस्प और गहरे अर्थ से भरे होते थे – तस्वीर उम्मीदों की, आईना मलालों का, , इंसा जिसे कहते हैं, महशर है सवालों का आदि ।
पाठक जी एक प्रखर पत्रकार होने के साथ ही एक विद्वान लेखक भी थे। वर्ष 1964 में उनकी प्रकाशित कृति क्या जो देखा ख्वाब था?, राजनीति और समाज के लिए एक दर्पण सिद्ध हुई थी। इस पुस्तक में उनकी कलम का तीखापन तलवार से भी ज्यादा पैना था। पाठक जी की कविताओं को लोग बड़े ध्यान से पढ़ते थे और समझने की कोशिश करते थे क्योंकि वे कविता में अपनी बात अनोखे और असरदार अंदाज में कहते थे।
पाठक जी ने जागृति के लिए पत्रकारिता और लेखन धर्म का निर्वाह जितनी ईमानदारी से किया उतनी ही ईमानदारी से उन्होंने मां भारती की सेवा भी की। राष्ट्र भक्ति का यह गुण उन्हें विरासत में अपने पूज्य पिता श्री बेनी माधव से मिला था। वे झंडा सत्याग्रही थे। राष्ट्र भक्ति का जो वातावरण उन्होंने परिवार में देखा तो आजादी की चाहत पाठक जी के मन में भी जागी और राष्ट्र पिता के आव्हान पर वे आजादी की लड़ाई में कूद पड़े। उस समय राष्ट् पिता के आव्हान को उन्होंने गांधी की आंधी का नाम दिया था। पाठक जी ने गांधी की आंधी के दौरान 2 बार 7 और 6 माह की जेल यात्राएं की। जेल में भी वे अन्य स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों का नेतृत्व करते और आंदोलन करते हुए अंग्रेजों की नाक में ऐसा दम भरते कि उन्हें अलग कोठरी में रखना पड़ता। उस समय भी लोग पाठक जी की शेरो शायरी और लेखनी की काफी चर्चा करते। आजादी मिलने तक तो पाठक जी का उत्साह देखते ही बनता था लेकिन आजादी के बाद देश की हालत से वे दुखी भी बहुत थे और यह कहने को विवश भी हो गए थे कि गांधी युग में मिट्टी से शेर गढ़े गए लेकिन आज शेर मिट्टी के होते जा रहे हैं।
पाठक जी स्वतंत्रता सेनानी और पत्रकार होने के साथ ही कमजोर वर्ग की समस्यायों के समाधान के लिए भी समर्पित थे। समाज के आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के लोगों की कठिनाइयों और उनकी जीवन प्रणाली पर उनका चिंतन अन्य वर्ग के लिए प्रेरणा का विषय था। जबलपुर के लेबर चौक में घर के पास रहने वाले श्रमिकों को चाहे जब घर पर बुलाकर चाय पिलाना और उनके घर पर पहुंच कर उनकी समस्याओं को सुनना पाठक जी की नित्य क्रिया भी थी और शौक भी था तभी तो उनके स्वर्गवास पर उनके घर के पास रहने वाले एक श्रमिक की प्रतिक्रिया थी कि दादा इंसान नहीं भगवान थे।
© श्री यशोवर्धन पाठक
पूर्व प्राचार्य, राज्य सहकारी प्रशिक्षण, संस्थान, जबलपुर
संकलन – श्री प्रतुल श्रीवास्तव
संपर्क – 473, टीचर्स कालोनी, दीक्षितपुरा, जबलपुर – पिन – 482002 मो. 9425153629
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≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈




















