हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ रचना संसार #८६ – नवगीत – गुरुवर वंदना… ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ☆

सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’

(संस्कारधानी जबलपुर की सुप्रसिद्ध साहित्यकार सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ ‘जी सेवा निवृत्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश, डिविजनल विजिलेंस कमेटी जबलपुर की पूर्व चेअर पर्सन हैं। आपकी प्रकाशित पुस्तकों में पंचतंत्र में नारी, पंख पसारे पंछी, निहिरा (गीत संग्रह) एहसास के मोती, ख़याल -ए-मीना (ग़ज़ल संग्रह), मीना के सवैया (सवैया संग्रह) नैनिका (कुण्डलिया संग्रह) हैं। आप कई साहित्यिक संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत एवं सम्मानित हैं। आप प्रत्येक शुक्रवार सुश्री मीना भट्ट सिद्धार्थ जी की अप्रतिम रचनाओं को उनके साप्ताहिक स्तम्भ – रचना संसार के अंतर्गत आत्मसात कर सकेंगे। आज इस कड़ी में प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम गीत – गुरुवर वंदना…।

? रचना संसार # ८६ – गीत – गुरुवर वंदना…  ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ? ?

☆

अंतस में विश्वास भरो गुरु,

तामस को चीर।

प्रेम भाव से जीवन बीते,

दूर हो सब पीर।।

 

मान प्रतिष्ठा मिले जगत में,

उर यही है आस।

शीतल पावन निर्मल तन हो,

सुखद हो आभास।।

कोई मैं विधा नहीं जानूँ

गुरु सुनो भगवान।

भरदो शिक्षा से तुम झोली,

दो ज्ञान वरदान।।

शिष्य बना लो अर्जुन जैसा,

धनुषधारी वीर ।

 

बैर द्वेष तज दूँ मैं सारी,

खोलो प्रभो द्वार।

न्याय धर्म पर चलूँ सदा मैं,

टूटे नहीं तार।।

आप कृपा के हो सागर,

प्रभो जीवन सार।

रज चरणों की अपने देदो,

गुरु सुनो आधार।।

सेवा में दिनरात करूँ प्रभु,

रहूँ नहीं अधीर।

 

एकलव्य सा शिष्य बनूँ मैं,

रचूँ फिर इतिहास।

सत्य मार्ग पर चलता जाऊँ,

हो जग उजास।।

ब्रह्मा हो गुरु आप विष्णु हो,

कहें तीरथ धाम।

रसधार बहादो अमरित की,

जपूँ आठों याम।।

दीपक ज्ञान का अब जला दो,

गुरुवर दानवीर।

☆

© सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’

(सेवा निवृत्त जिला न्यायाधीश)

संपर्क –1308 कृष्णा हाइट्स, ग्वारीघाट रोड़, जबलपुर (म:प्र:) पिन – 482008 मो नं – 9424669722, वाट्सएप – 7974160268

ई मेल नं- meenabhatt18547@gmail.com, mbhatt.judge@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ साहित्य निकुंज #३१४ ☆ भावना के दोहे – नवसंवत्सर ☆ डॉ. भावना शुक्ल ☆

डॉ भावना शुक्ल

(डॉ भावना शुक्ल जी  (सह संपादक ‘प्राची‘) को जो कुछ साहित्यिक विरासत में मिला है उसे उन्होने मात्र सँजोया ही नहीं अपितु , उस विरासत को गति प्रदान  किया है। हम ईश्वर से  प्रार्थना करते हैं कि माँ सरस्वती का वरद हस्त उन पर ऐसा ही बना रहे। आज प्रस्तुत हैं – भावना के दोहे – नवसंवत्सर।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  # ३१४ – साहित्य निकुंज ☆

☆ भावना के दोहे – नवसंवत्सर ☆ डॉ भावना शुक्ल ☆

☆

नवसंवत्सर आ गया, खुशियाँ लेकर आज।

चैत्र मास का आगमन, हर्षित हुआ समाज।।

* 

माँ का स्वागत कर रहे, नवराते त्योहार।

माँ नौ रूपों में सजी, उत्सुक सब घर द्वार।।

 *

महिमा तेरी खूब है, करती हो कल्याण।

सबकी विपदा तुम हरो, करते माँ हम ध्यान।।

 *

करते  माँ  से याचना, आओ सबके द्वार।

नव दुर्गा का आगमन, नौ दिन का त्योहार।।

☆

© डॉ भावना शुक्ल

सहसंपादक… प्राची

प्रतीक लॉरेल, J-1504, नोएडा सेक्टर – 120,  नोएडा (यू.पी )- 201307

मोब. 9278720311 ईमेल : bhavanasharma30@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ इंद्रधनुष #२९६ ☆ मानवता अब हार रही है… ☆ श्री संतोष नेमा “संतोष” ☆

श्री संतोष नेमा “संतोष”

(आदरणीय श्री संतोष नेमा जी  कवितायें, व्यंग्य, गजल, दोहे, मुक्तक आदि विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं. धार्मिक एवं सामाजिक संस्कार आपको विरासत में मिले हैं. आपके पिताजी स्वर्गीय देवी चरण नेमा जी ने कई भजन और आरतियाँ लिखीं थीं, जिनका प्रकाशन भी हुआ है. आप डाक विभाग से सेवानिवृत्त हैं. आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होती रहती हैं। आप  कई सम्मानों / पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत हैं. “साप्ताहिक स्तम्भ – इंद्रधनुष” की अगली कड़ी में आज प्रस्तुत है आपकी  भावप्रवण कविता – मानवता अब हार रही है… । आप  श्री संतोष नेमा जी  की रचनाएँ प्रत्येक शुक्रवार आत्मसात कर सकते हैं।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ – इंद्रधनुष # २९६ ☆

☆ कविता – मानवता अब हार रही है… ☆ श्री संतोष नेमा ☆

☆

मानवता अब  हार  रही  है  |

होकर द्रवित  पुकार रही है  ||

बेटा करता कत्ल  बाप  का |

जाने   कैसी   रार   रही   है ||

कैसे  बदला वक्त आज का |

रिश्ते सभी  बिसार रही  है ||

*

खूब बँटे हम  जाति धर्म  पर |

रखा न बिल्कुल ध्यान कर्म पर ||

रखा ताक  पर मानवता  को |

दिखें  न कितने दाग मर्म पर ||

भेद-भाव   दीवार  रही   है |

मानवता  अब  हार   रही  है

*

हथियारों  की   जंग  देख  लो |

बारूदों   के    रंग   देख   लो ||

रखें  अहम  को   सबसे  आगे |

अब   देशों  के  ढंग   देख  लो ||

झूठी शान अकड़ वालों को|

अब दुनिया धिक्कार  रही है  ||

मानवता   अब  हार   रही   है  |

*

चौराहों   पर   खड़े    दुशासन |

भूखे   दानव   नोच   रहे   तन ||

बदली चाल समय  की देखो |

अब   नारी  के  टूट   रहे   मन ||

कब   आयेंगे   कृष्ण   कन्हैया |

अबला   क्यों  लाचार  रही  है ||

मानवता   अब  हार   रही   है  |

*

भय परमाणु  सामरिकता   का |

बढ़ती नित्य पाशविकता  का ||

मची   होड़   है   हथियारों  की |

काम  नहीं अब नैतिकता   का ||

अब  ‘संतोष’  शांति की  खातिर |

सबकी   यही   पुकार   रही   है |

मानवता   अब   हार   रही    है  |

☆

© संतोष  कुमार नेमा “संतोष”

वरिष्ठ लेखक एवं साहित्यकार

आलोकनगर, जबलपुर (म. प्र.) मो 7000361983, 9300101799

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ शशि साहित्य # १६ – कविता – नदिया की धार… ☆ श्रीमती शशि सराफ ☆

श्रीमती शशि सराफ

(श्रीमती शशिसुरेश सराफ जी सागर विश्वविद्यालय से हिंदी एवं दर्शन शास्त्र से स्नातक हैं. आपने लायंस क्लब और स्वर्णकार समाज की अध्यक्षा पद का भी निर्वहन किया. आपका “लेबल शशि” नाम से बुटीक है और कई फैशन शोज में पुरस्कार प्राप्त किये हैं. आपका साहित्य और दर्शन से अत्यधिक लगाव है. आप प्रत्येक शुक्रवार श्रीमती शशि सराफ जी की रचनाएँ आत्मसात कर सेंगे. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता ‘नदिया की धार…‘।)

☆ शशि साहित्य # १६ ☆

? कविता – नदिया की धार…  ☆ श्रीमती शशि सुरेश सराफ  ? ?

🫟🫟🫟🫟🫟

मस्त मगन वो बहती धार,

फूलों ने थमने, प्यार से लिया पुकार…

मदमाती वो हंसती रही,

मंद गति वो चलती रही…

खेत खलिहानों को,

वन और उपवनों को…

जीवनदान, जो लिया है ठान,

यही तो है उसके अस्तित्व का सार…

पूजनीय वह वंदिता,

महिमा उसकी अपरंपार…

रुकना उसके वश में नहीं,

मोह में पड़ना ,ठीक नहीं,

रुकी जलधार, होगा प्रकृति प्रहार…

थमना राह का रोड़ा है,

फिर समुद्र मिलन भी होना है…

तन्मय हो वो बह चली…

बन रसवंती धार….

☆

© श्रीमती शशि सराफ

जबलपुर, मध्यप्रदेश 

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ विजय साहित्य # २८६ – गंध‌ पिसारा…! ☆ कविराज विजय यशवंत सातपुते ☆

कविराज विजय यशवंत सातपुते

? कवितेचा उत्सव # २८६ – विजय साहित्य ?

☆ गंध‌ पिसारा…! ☆

☆

चला‌ वेचूया, अंगणातल्या

शुभ्र केशरी, गंध चांदण्या.

*

नाजूक पुष्पें, जरा वेचना

ओंजळीतले, शब्द ऐकना

*

साथ क्षणांची, फुले‌ सुगंधी 

स्पर्श तयाचा, करी आनंदी.

*

उमलताना , ठेऊन जाते

आठवणींच्या, कुपीत नाते.

*

आजी‌ वाहते, लक्ष फुलांचा

जाई‌ वेचण्या, थवा फुलांचा.

*

फूल प्राजक्ती,‌मनात राही

गंध मनी या, मावत नाही.

*

वहात येता, पहाट वारा

फुले अंगणी, गंध पिसारा.

☆

© कविराज विजय यशवंत सातपुते

सहकारनगर नंबर दोन, दशभुजा गणपती रोड, पुणे.  411 009.

मोबाईल  8530234892/ 9371319798.

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – विविधा ☆ मला समजलेली संत तुकारामांची गाथा…भाग – १२ ☆ सुश्री अरुणा मुल्हेरकर ☆

सुश्री अरुणा मुल्हेरकर

? विविधा ?

☆ मला समजलेली संत तुकारामांची गाथा… भाग – १२ ☆ सुश्री अरुणा मुल्हेरकर ☆

गाथेतून उमजणारी गीता (२)

सध्या आपण गाथेतून उमजणाऱ्या गीता तत्वाचे चिंतन करीत आहोत.

भगवंतांनी अर्जुनाला सांगितले की “करणारा तू कोण? नियतकर्माचे पालन करून तू ते कर्म कृष्णार्पण कर. कर्ता करविता हा एक भगवंतच आहे. हेच गीतेतले तत्त्व तुकाराम महाराज त्यांच्या अभंगातून भक्त जनांना सांगत आहेत. ते म्हणतात, “माझ्या वाणीतून अभंगांच्या रूपात जे बाहेर येते, ते सर्व बोल पांडुरंगाचेच आहेत. बोलविता धनी तोची आहे.”

ते म्हणतात,

झाली माझी वैखरी/ विश्वंभरी व्यापक/

मोकलीने जावे बाणे/ भाता जेने वाहिला/

आता येथे कैचा तुका/ बोले सिक्का स्वामींचा/

हे जे काही शब्द माझ्या मुखावाटे बाहेर पडत आहेत, ते माझे नसून मी तर स्वामींचा शिक्का आहे. ते माझ्याकडून वदवून घेत आहेत. भात्यातून बाण जसे बाहेर पडतात, त्याचप्रमाणे माझ्या मुखावाटे शब्द बाहेर पडतात इतकेच!

पिडलेती भ्रमे/ वाटा नकळती वर्मी/

 तुका म्हणे भार/ माथा टाका अहंकार//

हरीच्या भेटीची आस लागलेल्या भक्तांना

तुकाराम महाराज सांगतात की तुमच्या मनातील देहाच्या अहंकाराचा भार जेव्हा तुम्ही टाकाल, तेव्हाच तुम्हाला हरी भेटेल.

संत तुकारामांनी खालील अभंगात गीतेतून होणारा बोध भक्तांच्या निदर्शनास आणून दिला आहे.

काय दरा करील वन/ समाधान नाही जव/

(जोपर्यंत अंतःकरणात समाधान नाही, ते वासना शून्य झालेले नाही, तोपर्यंत रानात, गिरीकंदरात जाऊन तपश्चर्या करण्याचा काहीही उपयोग नाही.)

रीधता धावा पेवा मधी/ जोडे सिद्धी ते ठायी/

(धान्य काढण्याकरता पेवामध्ये घाईघाईने शिरले, तरी लगेच अन्न मिळेल का? )

काय भस्म करील राख/ अंतर पाख नाही तो/

(मुळात अंतकरण जर शुद्ध नसेल, तर अंगाला नुसती राख फासून काय उपयोग? )

वर्ण आश्रमाचे धर्म / जाती श्रम झालिया/

(वर्णाश्रम-धर्मानुसार विहित कर्म करण्याचा कंटाळा केला, तर ते कर्म वाया जाईल)

सर्व संतांना हेच सांगायचे आहे की कोणतेही कर्म उच्च किंवा नीच नसते. समाजाची घडी व्यवस्थित राहण्यासाठी खरंतर वर्णाश्रम धर्म रचना केली गेली. परंतु पुढे मात्र ब्राह्मण म्हणजे उच्च आणि शूद्र म्हणजे नीच अशी भावना लोकांच्या मनात विनाकारण निर्माण केली गेली.

गीतेत भगवंतांनी अर्जुनाला सांगितलेला कर्म संबंध विच्छेद या ठिकाणी तुकाराम महाराज साधकांना सांगत आहेत.

तेही नव्हे जे करिता काही/ ध्याता धाई तेही नव्हे/

तेही नव्हे जे जानवी जना/ वाटे मना तेही नव्हे/

त्रास मानिजे कांटाळा/ अशुभ वाचाळा तेही नव्हे/

तेही नव्हे जे भोवती भोववे/ नागवे धावे तेही नव्हे/

तुका म्हणे एकची आहे/ सहजी पाहे सहज/

 याचा अर्थ असा की, हे साधका तू जे काही करशील ती भक्ती नाही, कारण त्याचा कर्तेपणा तू तुझ्याकडे घेशील. ध्यान करणाऱ्याने मूर्ती समोर ठेवून जरी ध्यान केले, तरी ती भक्ती नाही, कारण त्यात तुझा अहंकार असेल. लोकांना परमार्थ समजावणे, मनाला जे वाटेल तीही भक्ती नव्हे. एकच तत्व महत्त्वाचे आहे, मुद्दाम ठरवून काहीही कर्म करण्याचा अभिमान स्वतःकडे न ठेवता तू जर सहजपणे पाहशील तर तीच खरी भक्ती होईल.

 हेच तत्व अधिक स्पष्ट करण्यासाठी तुकाराम महाराज दुसऱ्या अभंगात काय सांगतात ते आपण पाहू.

 जे जे जेथे पावे/ तेथे समर्पावे सेवे/

 सहज पूजा याची नावे/ गणित अभिमान/

 अवघे भोगिता गोसावी/ आधी अवसानि जीवी/

 तुका म्हणे सीण /न धरिता नवे भिन्न//

 जीवाने जर मी करणारा आणि मी भोगणारा

 असा अभिमान बाळगला नाही तर भगवंताशी द्वैत राहत नाही.

 

 विचारा वाचून/ न पाविजे समाधान/

 देह त्रिगुणांचा बांधा/ माजी नाही गुण सुधा

 देवाचिये चाडे/ देवा द्यावे जेजे घडे/

 तुका म्हणे होते/ बहु गोमटे उचिते//

 या ठिकाणी विवेकाविषयी महाराज जनसामान्यांना सांगत आहेत. ज्या ठिकाणी विचार नसेल, विवेक नसेल, त्या ठिकाणी समाधान प्राप्त होणार नाही. प्रपंच असार आहे आणि आत्माच सार तत्व आहे, असा विवेक झाल्याशिवाय संतोष तेथे नाही. त्रिगुणात्मक अशा या शरीरात कोणताच गुण परिपूर्ण नाही. म्हणून आपण केलेले कर्म हे कोणत्याही गुणांनी(सत्व, रज, तम) युक्त असले तरी ते देवालाच अर्पण करणे आवश्यक आहे. गीतेत भगवान हेच सांगतात की पार्थ, सर्व कर्म तू मला अर्पण कर.

क्रमशः… १ 

© सुश्री अरुणा मुल्हेरकर 

डेट्राॅईट (मिशिगन) यू.एस्.ए.

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर ≈

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मराठी साहित्य – इंद्रधनुष्य ☆ ।। श्री नारद उवाच ।। – नारद भक्ति सूत्रे —सूत्र ५४, ५५, ५६ ☆ श्री संदीप रामचंद्र सुंकले ☆

श्री संदीप रामचंद्र सुंकले

? इंद्रधनुष्य ?

☆ ।। श्री नारद उवाच ।। – नारद भक्ति सूत्रे — सूत्र ५४, ५५, ५६ ☆ श्री संदीप रामचंद्र सुंकले ☆

।। श्री नारद उवाच ।। 

नारद भक्तिसूत्र ५४

“गुणरहितं कामनारहितं प्रतिक्षणवर्धमानं|

अविच्छिन्नं सूक्ष्मतरं अनुभवरूपम् ||”

अर्थ: भगवंतावरील या प्रेमाला कोणतेही गुण नाहीत, त्यामध्ये कोणतीही वासना नाही, ते अखंड, अतिसूक्ष्म, प्रत्येक क्षणी वाढणारे, आणि केवळ अनुभवरूप आहे.

विवेचन:

नारद मुनी इथे आपला अनुभव सांगत आहेत. आपण इथे असे समजू की नारद मुनींनी भगवंतावर कसे प्रेम केलं असेल…

इथे नारद महर्षी आपल्याला सहा गुण अथवा प्रकार सांगत आहेत. त्यातील तीन हे थोडे नकारात्मक आणि तीन सकारात्मक आहेत. आधी नकारात्मक पाहू.

१. गुणरहित: 

सर्वसाधारण मनुष्य प्रेम करतो ते स्वार्थासाठी. स्वार्थाचा रंग वेगवेगळा असू शकतो. पण खरे अर्थात भगवंतावरील प्रेम हे निःस्वार्थ असते. त्याला सत्व, रज अथवा तम असा कोणताही गुणदोष चिकटत नाही. एका अर्थाने ते निर्गुण असते.

२. कामनारहितं: 

सामान्यतः कोणतीही गोष्ट करताना प्रत्येक मनुष्याच्या मनात काही विशिष्ट असा उद्देश असतो, कामना असते. कधी ती लौकिक असते तर कधी अलौकिक. कधी सकाम असते तर कधी निष्काम. पण खरा भक्त भगवंतावर अकारण प्रेम करीत असतो. अमुक व्हावे किंवा अमुक होऊ नये म्हणून तो काहीही करीत नसतो. तो फक्त प्रेम करीत असतो.

समर्थ रामदास याचे वर्णन पुढील प्रमाणे करतात – – 

“देवाचें जें मनोगत । तेंचि आपुलें उचित।

इच्छेसाठीं भगवंत । अंतरूं नये कीं ॥”

(दासबोध ०४. ०८. २२)

– – – जो भक्त आपल्या सर्व कामना /इच्छा भगवंताच्या इच्छेत मिसळतो तो खऱ्या अर्थाने मुक्त होतो.

३. अविच्छिन्नं:

आपण सर्वांनी आपल्या लहानपणी आईकडे हट्ट करून तेलाच्या डब्यातून तेल ओतून पाहण्याचा प्रयोग नक्की केला असेल. आपल्या एक गोष्ट लक्षात आली असेल की ती तैलधार अखंड असते. देवावर प्रेम करण्याची सवय लावून घ्यावी. सवय झाली की ज्याप्रमाणे वाहन चालवताना गप्पा मारता येतात, गाणी म्हणता येतात, तसे प्रपंच करता करता, प्रपंचाची स्थिती कशीही असली भगवंतावर त्याचे स्मरण ठेवून अखंड प्रेम करता येते.

४. अनुभवरूपम् 

आपण अनेक वेळा एक वाक्य ऐकतो. अमक्या मनुष्याचा मी चांगलाच अनुभव घेतला आहे. याचा व्यावहारीक अर्थ असा आहे की त्या माणसाने याला वाईट अनुभव दिला आहे. भगवंताच्या प्रेमाचा अनुभव अर्थात भगवंताचा अनुभव. त्याचा अनुभव घ्यायचा असेल तर त्याच्यासारखे व्हावं लागेल. किंवा त्याच्याशी तादात्म्य पावावे लागेल. संत तुकाराम महाराज आपल्या एका अभंगात म्हणतात,

“अणुरेणिया थोकडा | तुका आकाशा एवढा ||”

संत सोयराबाई म्हणतात,

“अवघा रंग एक झाला । रंगि रंगला श्रीरंग ॥”

५. सूक्ष्मतरं :

प्रेम जात्याच सूक्ष्म आहे. इथे नारदमहाराज सूक्ष्मतरं असे म्हणतात. आपली सूक्ष्मतेची व्याख्या आपल्या देहबुद्धीप्रमाणे असते. प्रेमाची अनुभूती सुद्धा अधिक सूक्ष्म असते. अशी अनेक उदाहरणे आहेत की भक्ताला कोणीतरी शारीरिक त्रास दिला आणि त्याचे वळ मात्र भगवंताच्या पाठीवर उठले. ज्ञाना नावाच्या रेड्याला पैठण येथे लोकांनी मारले आणि त्याचे वळ माउलींच्या अंगावर उठले. उदा. म्हणून आपण याचा आधार घ्यावा.

६. प्रतिक्षणवर्धमानं :

एखाद्या व्यक्तीवरील एखाद्या मनुष्याचे प्रेम ती व्यक्ती जिवंत असेपर्यंत किंवा त्या व्यक्तीचे सौंदर्य टिकेल तोपर्यंत असते, असे आपल्या लक्षात येते. भगवंत अमर आहे, त्यामुळे त्याच्यावरील केलेले प्रेम हे सुद्धा अमर होते. मीरा प्रेमात एवढी तल्लीन होऊन गेली (अर्थात तिचे प्रेम इतके वाढत गेले..) की समोर आणलेला विषाचा प्याला ठाकूरजींचा प्रसाद समजून तिने प्यायला आणि ती अमर झाली.

जय जय रघुवीर समर्थ 

– – – – 

नारद भक्ति सूत्रे ५५

“तत्प्राप्य तदेवावलोकयति तदेव श्रृणोति

तदेव भाषयति तदेव चिंतयति ||”

अर्थ: या प्रेमाचा, अर्थात भागवतांच्या प्रेमाचा लाभ झाल्यावर तो सर्वत्र ते प्रेमच पाहतो. सर्वत्र ते प्रेमच ऐकतो. त्या प्रेमाबद्दलच बोलता आणि सर्वकाळ त्या प्रेमाचेच चिंतन करतो.

विवेचन: संत नामदेव महाराजांचा एक अभंग आहे. माझ्यामते तो या सूत्रांचे स्पष्टीकरण अधिक सुलभतेने करू शकेल…

“तीर्थ विठ्ठल । क्षेत्र विठ्ठल ॥ देव विठ्ठल । देवपूजा विठ्ठल ॥१॥ माता विठ्ठल । पिता विठ्ठल ॥ बंधु विठ्ठल । गोत्र विठ्ठल ॥२॥ गुरू विठ्ठल । गुरूदेवता विठ्ठल ॥ निधान विठ्ठल । निरंतर विठ्ठल ॥३॥ नामा म्हणे मज । विठ्ठल सापडला ॥ म्हणूनी कळीकाळा । पाड नाही ॥४॥”

– – भक्तिरसाने ओतप्रोत भरलेला हा अभंग म्हणजे नामदेवांच्या “नामभक्तिचे” एक उत्कृष्ट उदाहरणच म्हणावे लागेल. “चक्रवाक पक्षी वियोगे बाहती । जाहले मज प्रती तैसे आता ॥” असे म्हणणाऱ्या नामदेवांना जेव्हा विठ्ठल सापडला तेव्हा त्यांना जळी, स्थळी, काष्ठी, पाषाणी विठ्ठल दिसू लागला. खरं तर “तीर्थ” म्हणजे पाण्याने भरलेली अशी जागा जी सहज ओलांडता येईल. म्हणून चंद्रभागा नदी हे “तीर्थ” आणि त्याकाठी वसलेलं “पंढरपूर” हे “क्षेत्र” म्हणजे स्थान! नामदेवांसाठी हे तीर्थक्षेत्र विठ्ठलमय झाले. ह्या विठ्ठल नामाच्या गजरात “माझी भक्ती तुझी शक्ती एकरूप झाली” आणि म्हणून “देव विठ्ठल । देवपूजा विठ्ठल ॥. ” पुढे नामदेवांना माय, बाप, आप्त, इष्ट, गण, गोत, गुरू ह्या सगळ्यातच विठ्ठल दिसू लागतो आणि अखेर ते सुखाच्या परमोच्च बिंदूला जाऊन मिळतात, ते सुख जे ह्या मायिक विश्वाच्या अतीत आहे, जे कालातीत आहे आणि निरंतर आहे म्हणजेच “नामा म्हणे मज । विठ्ठल सापडला ॥”. त्या सुखाचं “निधान” म्हणजे साठाही विठ्ठलच आहे असे ते सांगतात. आता ह्या जागेला पोचल्यावर, विठ्ठलाशी एकरूप झाल्यावर मला मृत्यू जरी आला तरी त्याचे भय नाही.

नारद मुनी जी स्थिती सांगतात की भक्ति मार्गातील परमोच्च स्थिती आहे असे मला तर्काने वाटते. यानंतर काही मिळवायचे असेल किंवा मिळवायची इच्छा राहील असे वाटतं नाही.

संतांचे आपल्यावर उपकार आहेत की त्यांनी ही स्थिती अनुभवली आणि स्वतःचे अवतरण करून ती अभंगाच्या रूपात आपल्या समोर ठेवली, अन्यथा त्याची शाब्दिक अनुभूति आपल्याला घेणं शक्य झालं नसतं…!

जय जय रघुवीर समर्थ 

– – – 

नारद भक्ति सूत्रे ५६ 

“गौणी त्रिधा गुण भेदादार्तादिभेदाद्वा||५६||”

अर्थ:  सत्त्व, रज आणि तम या तीन प्रकारांच्या भेदांमुळे किंवा आर्त, जिज्ञासू आणि अर्थार्थी या तीन प्रकारच्या भेदांमुळे गौण भक्तीचे तीन प्रकार होतात, करता येतात.

विवेचन: भक्तीचे प्रामुख्याने दोन भाग केलेले आढळतात. एक मुख्य भक्ति आणि दुसरी गौणी भक्ति. सर्वसाधारण मनुष्य बरेच वेळेस अपघाताने या भक्तिमार्गात खेचला जातो, असे म्हटले तर वावगे होऊ नये. कधी हा अपघात सुखद असतोझ तर बरेच वेळेस तो वेदनेचा असतो, असे आपल्या लक्षात येईल. जन्माला आला आणि भक्तिमार्गाला लागला असा जीव सापडणे म्हणजे वाळवंटात पाणी सापडण्यास सारखे म्हणता येईल..!

प्रत्येक मनुष्यच नव्हे तर सारी सृष्टि त्रिगुणाची बनलेली आहे असे आपल्या लक्षात येईल. सत्व, रज आणि तम. प्रत्येक मनुष्यात या तिन्ही गुणांचे प्रमाण कमीअधिक प्रमाणात असते. ज्याप्रमाणे ते त्या त्या मनुष्याचा अंगी हे तीन गुण असतात, त्यानुसार तो करीत असलेली भक्ति सात्विक, राजस किंवा तामस स्वरूपात प्रकट होत असते. भक्ति न करणाऱ्यापेक्षा तामस भक्ति करणारा बरा. तामस भक्ति करता करता कालांतराने बदल होऊन मनुष्य राजस भक्ति करू लागतो आणि अशी राजस भक्ति वृद्धिंगत होत गेली हा मनुष्य सात्विक भक्ति करू लागतो. या तिन्ही भक्ती चढत्याक्रमाने उत्तम मानल्या जातात.

समर्थ रामदास स्वामी या त्रिगुणांचे वर्णन पुढील प्रमाणे करतात – –

“मुळीं देह त्रिगुणाचा । सत्त्वरजतमाचा ।

त्यामध्यें सत्त्वाचा । उत्तम गुण ॥ १ ॥

सत्वगुणें भगवद्भवक्ती । रजोगुणें पुनरावृत्ती ।

तमोगुणें अधोगती । पावति प्राणी ॥ २ ॥”

(दासबोध दशक २, समास ५)

आता मुख्य भक्ति कशी असते हे सुद्धा आपण अभ्यासले पाहिजे. एकूण चार प्रकारचे भक्त सांगितले जातात. याचे वर्णन गीताई मध्ये पुढील प्रमाणे आले आहे – – 

“भक्त चौघे सदाचारी भजती मज अर्जुना|

ज्ञानी तसे चि जिज्ञासू हितार्थी आणि विहृ़ल||”

(गीताई ०७:१६)

– – – सात्विक भक्ति फळास येते तेव्हा तो भक्त सिद्ध स्थितीस पोहोचतो.

मी आहे, हे भक्तिमार्गातील पहिली पायरी. मी आहे आणि देव आहे ही दुसरी पायरी म्हणता येईल आणि देहबुद्धीचा लय होऊन देव आहे आणि मी नाही अशी स्थिती येणे ही भक्तिमार्गातील सर्वोच्च पायरी म्हणता येईल. थोडक्यात काम्य भक्तीतून निष्काम भक्तीकडे वाटचाल होणे म्हणजे भक्तिमार्गात प्रगती होणे असे म्हणता येईल.

जय जय रघुवीर समर्थ 

नारद महाराज की जय!!!

– भक्ती सूत्र क्र. ५४ / ५५ / ५६ 

© श्री संदीप रामचंद्र सुंकले (दास चैतन्य)

थळ, अलिबाग. 

८३८००१९६७६

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ.उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # २८२ ☆ नवदुर्गा का आगमन: नारी सृजनधर्मिता का उत्सव… ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ ☆

श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की  प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं  में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना “नवदुर्गा का आगमन: नारी सृजनधर्मिता का उत्सव…”। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  – कविता # २८२ ☆ नवदुर्गा का आगमन: नारी सृजनधर्मिता का उत्सव… ☆

शारदीय आकाश की कोमल आभा के साथ ही मन में एक दिव्य अनुभूति जाग उठती है—माँ के आगमन की। नवरात्रि केवल पर्व नहीं, बल्कि शक्ति, श्रद्धा और सृजन का उत्सव है, जहाँ सम्पूर्ण सृष्टि अपनी जननी के स्वागत में नत होती है।

इस पावन आरंभ में जवारे बोने की परंपरा विशेष महत्व रखती है। मिट्टी में डाले गए ये बीज केवल अन्न नहीं, बल्कि आशा, उर्वरता और नवजीवन के प्रतीक होते हैं—मानो माँ के आशीष से जीवन हरा-भरा हो उठे।

“पूजन करते भक्त, जवारे बो कर मैया,

खुशहाली चहुँओर, मिले हम सब को छैया।”

इन पंक्तियों में जनमानस की वही प्रार्थना है, जो हर हृदय में धड़कती है।

भारतीय संस्कृति में नारी को सदा “शक्ति” माना गया है। नवदुर्गा के नौ स्वरूप हमें याद दिलाते हैं कि नारी केवल सृजन ही नहीं, बल्कि संरक्षण और परिवर्तन की आधारशिला भी है। आज की नारी हर क्षेत्र में अपने सामर्थ्य का परिचय देते हुए अपने भीतर की दुर्गा को जागृत कर रही है।

जब एक स्त्री घर, समाज और अपने स्वप्नों को संवारती है, तब वह केवल जीवन नहीं जीती—वह सृजन करती है। यही उसकी सच्ची “सृजनधर्मिता” है, जिसे नवरात्रि का यह पर्व और अधिक उजागर करता है।

“हरीभरी हो गोद, यही माँगे जन सारे,

शेर सवारी दिव्य, मातु वर दायक धारे।”

इन भावों में माँ के प्रति विश्वास, सुरक्षा और समृद्धि की कामना सहज ही झलकती है।

नवरात्रि हमें यह भी सिखाती है कि शक्ति की पूजा केवल अनुष्ठानों में नहीं, बल्कि हर नारी के सम्मान में होनी चाहिए। यही सच्ची आराधना है।

माँ दुर्गा का यह पावन पर्व हम सभी के जीवन में सुख, शांति और नवसृजन का प्रकाश भर दे—

जय माता दी।

**

©  श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

माँ नर्मदे नगर, म.न. -12, फेज- 1, बिलहरी, जबलपुर ( म. प्र.) 482020

मो. 7024285788, chhayasaxena2508@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक साहित्य # ४०५ ☆ आलेख – ईरान की संस्कृति  ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ४०५ ☆

?  आलेख – ईरान की संस्कृति ? श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

ईरान की संस्कृति विश्व की सबसे प्राचीन और समृद्ध संस्कृतियों में से एक है। इसे ‘फारसी संस्कृति’ के रूप में भी जाना जाता है, जिसने न केवल मध्य पूर्व बल्कि मध्य एशिया और भारतीय उपमहाद्वीप के साहित्य, कला और दर्शन पर भी गहरा प्रभाव डाला है।

ईरानी संस्कृति की आत्मा उसकी कविता में बसती है। फारसी साहित्य दुनिया के गौरवशाली साहित्य में गिना जाता है।

महान कवि: फिरदौसी, हाफ़िज़, रूमी और सादी जैसे कवियों की रचनाएँ आज भी विश्वभर में पढ़ी जाती हैं।

शाहनामा: फिरदौसी द्वारा रचित ‘शाहनामा’ ईरान का राष्ट्रीय महाकाव्य है, जो प्राचीन फारस के इतिहास और मिथकों को संजोए हुए है।

कला और वास्तुकला

ईरानी वास्तुकला अपनी भव्यता, ज्यामितीय सटीकता और नीले रंग की टाइलों के काम के लिए प्रसिद्ध है।

इस्फहान की मस्जिदें: इस्फहान शहर को ‘निसफ-ए-जहाँ’ (आधी दुनिया) कहा जाता है, जहाँ की ‘मस्जिद-ए-शाह’ और ‘शेख लुतफुल्ला मस्जिद’ वास्तुकला के बेजोड़ नमूने हैं।

कालीन : ईरानी कालीन दुनिया भर में अपनी बुनाई, रंगों और जटिल डिजाइनों के लिए मशहूर हैं। यह ईरान की एक प्राचीन हस्तकला है।

त्यौहार और परंपराएँ

ईरानी संस्कृति में कई ऐसे त्यौहार हैं जो इस्लाम के आगमन से पहले के हैं और आज भी उतनी ही धूमधाम से मनाए जाते हैं।

नौरोज़ : यह फारसी नव वर्ष है, जो वसंत ऋतु के आगमन पर मनाया जाता है। यह प्रकृति के पुनर्जन्म का प्रतीक है।

शब-ए-यल्द: साल की सबसे लंबी रात  को परिवार के साथ मिलकर फल (विशेषकर अनार और तरबूज) खाकर और कविताएँ पढ़कर मनाया जाता है।

खान-पान

ईरानी भोजन अपने संतुलित स्वाद और सुगंध के लिए जाना जाता है। इसमें केसर, सूखे मेवे, गुलाब जल और अनार का भरपूर उपयोग होता है।

चेलो कबाब: यह ईरान का राष्ट्रीय व्यंजन है, जिसमें सुगंधित चावल (बेरेंज) के साथ ग्रिल्ड कबाब परोसा जाता है।

सब्जी खोरेश: विभिन्न प्रकार की हरी सब्जियों और मांस से बना स्टू भी यहाँ काफी लोकप्रिय है।

शिष्टाचार: ‘तारोफ़’

ईरानी संस्कृति में ‘तारोफ़’ एक अनूठी सामाजिक शिष्टाचार पद्धति है। यह अत्यधिक विनम्रता और सम्मान दिखाने की कला है, जिसमें अक्सर दुकानदार या मेजबान पहली बार में पैसे लेने से मना कर देते हैं या मेहमान को अत्यधिक सम्मान देते हैं। यह आपसी रिश्तों में कोमलता और सम्मान बनाए रखने का एक तरीका है।

ईरान की संस्कृति प्राचीन परंपराओं और आधुनिकता का एक अनूठा संगम है, जो मनुष्य को सौंदर्य, प्रेम और दर्शन की ओर प्रेरित करती है।

☆

© श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव

समीक्षक, लेखक, व्यंगयकार

ए २३३, ओल्ड मीनाल रेसीडेंसी, भोपाल, ४६२०२३, मो ७०००३७५७९८

readerswriteback@gmail.कॉम, apniabhivyakti@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # ८६ – व्यंग्य – हवालात-ए-हुस्न ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)

जीवन के कुछ अनमोल क्षण 

  1. तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से  ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित। 
  2. मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
  3. ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी  से भेंट करते हुए। 
  4. बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
  5. विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए। 

आप प्रत्येक गुरुवार डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपकी विचारणीय व्यंग्य – हवालात-ए-हुस्न।)  

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # ८६ – व्यंग्य – हवालात-ए-हुस्न ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)

जैसे ही मैंने थाने के हवालात-ए-हुस्न में कदम रखा, वहां की आबोहवा में न्याय की खुशबू कम और थर्ड डिग्री की महक ज्यादा थी। दरोगा जी अपनी कुर्सी पर ऐसे विराजमान थे जैसे किसी सल्तनत के आखिरी वारिस हों और मैं उनकी प्रजा का सबसे फर्जी फरियादी। मैंने जैसे ही हांफते हुए कहा कि “सर, लूट हो गई,” उन्होंने अपनी मूंछों को कड़क चाय के भाप से सहलाया और बोले, “अबे ओ केस डायरी के फटे हुए पन्ने, ये जो तू सांसें उखाड़कर ‘मुलजिम’ जैसी शक्ल बना रहा है, इसके लिए कोई अलग से ‘धारा’ लगवाऊं या सीधे ‘रोजनामचा’ में तेरी किस्मत का एनकाउंटर कर दूँ?” मैंने दलील दी कि सर चार नामालूम बदमाशों ने मेरा रास्ता रोका, तो उन्होंने बगल में खड़े सिपाही को इशारा किया, “देख हवलदार, प्रार्थी को वारदात से ज्यादा अपनी स्टोरी की चिंता है। लिखो इसमें—मजकूर शख्स अपनी लापरवाही की नुमाइश कर रहा था और बदमाशों ने इसे सरकारी माल समझकर कुर्क कर लिया।” उनके चेहरे पर वो दफा-302 वाली गंभीरता थी, जिससे लग रहा था कि एफआईआर दर्ज होने से पहले मेरा ‘पंचनामा’ पक्का है।

​मुंशी जी ने अपना वो खानदानी रजिस्टर ऐसे निकाला जैसे वो किसी मुजरिम की हिस्ट्रीशीट हो। दरोगा जी ने पेन की निब से मेज पर दस्तक देते हुए कहा, “बेटा, ये जो तूने बैग छिनने की दास्तान सुनाई है, इसमें ‘सबूत’ कम और ‘सिनेमा’ ज्यादा है। बैग में क्या था? कोई ‘खुफिया दस्तावेज’ या बस तेरी ‘बेरोजगारी’ का कच्चा चिट्ठा?” मैंने जैसे ही लैपटॉप और गैजेट्स की लिस्ट गिनानी शुरू की, उन्होंने हाथ उठाकर मुझे बरामदगी के पहले ही खामोश कर दिया। बोले, “इतना तामझाम लेकर तू इस गली में ‘गश्त’ कर रहा था जैसे तू इस इलाके का ‘बीट ऑफिसर’ हो? ये तो वही बात हुई कि ‘माल-ए-मुफ्त, दिल-ए-बेरहम’। चोरों ने तो तुझ पर एहसान किया है कि तुझे बोझ से आजाद कर दिया, वरना तू तो ताजीरात-ए-हिंद की किताब बनकर ही घूमता रहता।” वहां मौजूद स्टाफ ऐसे ठहाके लगा रहा था जैसे थाना न होकर कॉमेडी सर्कस का रिमांड रूम हो। मुंशी जी ने चुटकी ली, “साहब, लिख दो कि बैग को जमानत मिल गई है, इसलिए वो प्रार्थी के पास से फरार हो गया।”

​जब मेरी आंखों से आंसू मुलजिम की तरह टपकने ही वाले थे, तभी दरोगा जी ने एक जोर का ठहाका लगाया और मेज के नीचे से वही बैग निकाल कर मेरे सामने पटक दिया। मेरी तो जैसे शिनाख्त ही खो गई! वो मुस्कुराकर बोले, “अबे ओ ‘चश्मदीद गवाह’, ये बैग बाहर बेंच पर लावारिस पड़ा था। हम तो बस ये देख रहे थे कि अगर सच में तेरी ‘कुर्की’ हो जाए, तो तू थाने में बयान दर्ज कराएगा या सीधा सुसाइड नोट लिखेगा? ये जो अभी तूने सस्पेंस ड्रामा झेला है, ये तेरी सुरक्षा का चालान था।” मैंने कांपते हाथों से बैग उठाया, तो उन्होंने पीछे से आवाज दी, “अरे सुन, जाते-जाते इस मुठभेड़ की मिठाई तो खिलाता जा, वरना अगली बार हम तेरी एफआईआर में ‘क्लाइमेक्स’ ऐसा डालेंगे कि तू खुद को ही मुजरिम घोषित कर देगा!” मैं बैग लेकर ऐसे नौ-दो-ग्यारह हुआ जैसे कोई सजायाफ्ता कैदी जेल तोड़कर भागा हो, और पीछे से पूरा थाना ‘इंकलाब जिंदाबाद’ के बजाय ‘हाहाकार जिंदाबाद’ के नारों से गूँज रहा था।

(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)

© डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

संपर्क : चरवाणीः +91 73 8657 8657, ई-मेल : drskm786@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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