हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # २६४ ☆ अक्षय दान पुण्य का पर्व: आँवला नवमी… ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ ☆

श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की  प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं  में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना “अक्षय दान पुण्य का पर्व: आँवला नवमी…”। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  – आलेख  # २६४ ☆ अक्षय दान पुण्य का पर्व: आँवला नवमी… ☆

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कीजे सदा कुछ पुण्य ऐसे,जो हमें अक्षय करें।

डोरी थामें प्रीत संग तो, धर्म पालन से रहें।।

पूजा करते दोनों हाथों, दान देते आँवला।

राधा रानी सारी सखियाँ,ढूंढ़ती प्रिय साँवला।।

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पर्यावरण की रक्षा का संकल्प सनातन संस्कृति का मूल मंत्र है। वसुधैव कुटुम्बकम की भावना को समेटे हुए आँवला नवमी जो कार्तिक शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को मनाई जाती है। इस दिन विष्णु भगवान के स्वरूप कृष्ण जी की पूजा अर्चना करके आँवले का दान किया जाता है। क्योंकि इस दिन का पुण्य अक्षय (कभी नहीं नष्ट होने वाला) माना जाता है, इसलिए इसे अक्षय नवमी भी कहते हैं।

महिलाएँ और पुरुष इस दिन आँवला वृक्ष की पूजा करते हैं, व्रत रखते हैं और दान-पुण्य करते हैं।

मान्यता है कि इस दिन आँवला वृक्ष पूजन करने से दीर्घायु, स्वास्थ्य और समृद्धि मिलती है।

आइए सपरिवार इस दिन वनभोज करें, अपने संग संस्कृति और संस्कारों को जोड़ना हम सबका दायित्व है।

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©  श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

माँ नर्मदे नगर, म.न. -12, फेज- 1, बिलहरी, जबलपुर ( म. प्र.) 482020

मो. 7024285788, chhayasaxena2508@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # ७० – लघुकथा – मकान, मार्केटिंग और मार्मिकता ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)

जीवन के कुछ अनमोल क्षण 

  1. तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से  ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित। 
  2. मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
  3. ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी  से भेंट करते हुए। 
  4. बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
  5. विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए। 

आप प्रत्येक गुरुवार डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपकी विचारणीय लघुकथा – मकान, मार्केटिंग और मार्मिकता।)  

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # ७० – लघुकथा – मकान, मार्केटिंग और मार्मिकता ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)

शहर के “मजबूरी नगर” में रहते हुए मुझे वो पुराना सरकारी क्वार्टर छोड़ना पड़ा, जिस पर चिड़ियों से लेकर बिल्ली-बिल्लों तक, सबका कानूनी हक था। मेरा बेटा बहादुर “बंटी” अब यू-ट्यूबिया एंटरप्रेन्योर बन गया था—घर से लाखों की कमाई का दावा करता, लेकिन बिल के समय अजीब गूंगी मछली बन जाता। बेशक, मैंने भी कभी पायलट बनने का सपना देखा था, मगर सरकारी दफ्तर की फाइलें उड़ाते-उड़ाते बाल सफेद हो गए। इन दिनों बैंक बैलेंस की ‘डोंगी’ कंटीले बजरे जैसी हिल रही थी। मजबूरी ने मुझे संकटमोचन बना दिया—अब या तो लोन लेकर बुढ़ापा फाइनेंस करूं, या पुराने घर के खूंटे खोल दूँ। उसी उहापोह में मेरी बेटी डिजिटल-दीदी “रीता” का कॉल आया—”पापा, कभी घर आओ, हम सब मिलकर मूँग की दाल के पकोड़े खाएँगे।” मोबाइल के वीडियो कॉल पर रिश्ते अब रेसिपी से ज्यादा लुभावने लगते हैं। दीदी-बाकी मुद्दों पे कभी बोलती ही नहीं, बस वही चुटकुले—”घर बेचो… लोन मत लो… एक सुपरहिट आईडिया दूँगी!”

शाम को बहू-बेटे को बुलाया—”सवाल पेंचीदा है, राय मशविरे दो।” बेटा बोला—”पापा, लोन छोड़िए, घर बेचिए, ईएमआई की औकात नहीं बची, मार्केटिंग के मामले में दीदी टॉप पर है।” दीदी के बैंकर पति—जिनका नाम सुनते ही मोहल्ले वाले बचे हुए क्रेडिट कार्ड छुपाने लगते हैं—मुस्कुराए, “घर का ग्राहक मैं हूं! रजिस्ट्री से बैंक तक सब देख लूंगा।” बंटू हैरान—”दीदी! ये तो अपना ही घर ख़रीद रही है!” दीदी बोली—”पापा, तुम्हें बुढ़ापे में अकेला नहीं छोड़ेंगे। अब हम किरायेदार नहीं, मकान मालिक हैं—लेकिन किराया मांगेंगे नहीं!” हॉल में चुप्पी छा गई… मैंने खिड़की से बाहर झांककर उस गुलमोहर को देखा जिसे कभी माँ ने लगाया था। यादें आंखों की कोर तर कर गईं। फिर दीदी बोली—”पापा, इस घर में बचपन की किलकारियां थीं, अब इसमें आपकी साँझ ढलेगी—बैंक के नए कॉम्प्लेक्स की आकांक्षा साथ में है, और मीठे पकोड़े भी!” मैं कुछ कह न सका। सिर्फ इतना कर पाया कि दोनों बच्चों को अपने डबडबाए गले से लगा लिया—मन ही मन सोचा—घर, रिश्ते और बाज़ार… सबसे बड़े फाइनेंसियल इंस्ट्रूमेंट हैं— ईएमआई  और आंसू किस्तों में ही निकलते हैं!

© डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

संपर्क : चरवाणीः +91 73 8657 8657, ई-मेल : drskm786@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # २२७ – व्यंग्य- बने रहो पगला – ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ ☆

श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

(सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” जी का  हिन्दी बाल -साहित्य  एवं  हिन्दी साहित्य  की अन्य विधाओं में विशिष्ट योगदान हैं। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में रचना सहित 145 बालकहानियाँ 8 भाषाओं में 1160 अंकों में प्रकाशित। प्रकाशित पुस्तकेँ-1- रोचक विज्ञान कथाएँ, 2-संयम की जीत, 3- कुएं को बुखार, 4- कसक, 5- हाइकु संयुक्ता, 6- चाबी वाला भूत, 7- बच्चों! सुनो कहानी, इन्द्रधनुष (बालकहानी माला-7) सहित 4 मराठी पुस्तकें प्रकाशित। मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी का श्री हरिकृष्ण देवसरे बाल साहित्य पुरस्कार-2018 ₹51000 सहित अनेक संस्थाओं द्वारा सम्मानित व पुरस्कृत। साप्ताहिक स्तम्भ “श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य”  के अंतर्गत साहित्य आप प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकते हैं। आज प्रस्तुत है आपका व्यंग्य – “बने रहो पगला”।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # २२७ ☆

☆ व्यंग्य – बने रहो पगला ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ ☆

“वह पागल है!” जैसे ही उसने कहा. मैं बोला, “भाई! इतना समझदार आदमी पागल कैसे हैं?” तब मेरे उसे मित्र ने मुझे ही पूछ लिया, “भाई! पागल किसे कहते हैं?”

मैं उसकी और यह प्रश्न समझ नहीं पाया. इसलिए मैंने पूछ लिया, “तू ही बता दे. पागल किसे कहते हैं?”

वह हंसा. तब मैंने जवाब दिया, “जो अपना काम ढंग से ना करें, वही पागल है.”

यह अचानक मेरे मुंह से निकल गया था. 

“यह तो बहुत अच्छी परिभाषा है. तभी हम व्यवहार में कह देते हैं. क्या तुझ से यह भी काम ठीक से नहीं होता है. क्या तू पागल है?”

इस तरह एक सामान्य व्यक्ति को पागल कहना पागल की तौहीन है. इसका आशय तो यह है कि आप पागल को पागल नहीं कह रहे हैं, एक सामान्य व्यक्ति को पागल कह रहे हैं जो बहुत ही समझदार हैं. तब पागल को क्या कहेंगे?

मेरे लिए बहुत ही गहन प्रश्न था. जिसका चिंतन मैं मन ही मन करता रहा. मगर पागल की परिभाषा मेरे समझ से परे थी. इसी उधेड़बुन में मैं बैठा था कि तभी वरिष्ठ कार्यालय से एक ‘अर्जेंट डॉक’ आ गई. क्योंकि मैं काम में व्यस्त था इसलिए एक सहकर्मी से कहा, “भाई साहब! यह डाक बना दीजिए. बहुत ही अर्जेंट है. अभी पहुंचाना है.”

बड़े साहब ने मेरा समर्थन किया. तब वह सहकर्मी बोला, “आप प्रारूप बना दीजिए. मैं डाक भर दूंगा.” यह सुनकर मैं एक बार झलाया. कैसा पागल है? साला! मैं इसे डाक बनाने की कह रहा हूं. और यह मुझे ही प्रारूप बनाने की कह रहा है. मगर साहब के आदेश देने पर मैंने उसे प्रारूप बना दिया.

उसने प्रारूप में जानकारी भरी. दो और तीन की जोड़ छह लिख दी. फिर मेरे सामने आकर बोला, “अरे भाई! गलती हो गई.” फिर दो-तीन साथ बोलते हुए छह को काटकर सात कर दिए.

उसकी यह हरकत देखकर मुझ पर पागलपन का दौरा पड़ गया. मैंने कहा, “अरे भाई! यह क्या करते हो? दो और तीन पांच होते हैं.” मेरा यह जवाब सुनते उसने कहा, “अरे भाई! माफ करना. जल्दी में था. अभी दो और तीन पांच कर देता हूं.” और उसने वापस छह को काटकर पांच कर दिया.

पांच उसने इतनी बार काटा था कि वह नजर ही नहीं आ रहा था. वह छह, सात है या पांच है. इसी तरह उसने दूसरे कॉलम में भी बहुत कांटपिट की थी. यानी पूरा प्रारूप खराब कर दिया था.

यह देखकर वास्तव में मुझ में पागलपन का दौरा पड़ गया. मैं मन ही मन भड़क पड़ा, “साला! पागल! फोकट की तनख्वाह लेता है. एक अक्षर ठीक से लिखना नहीं आता. कामचोर कहानी का.”

मगर मैं प्रत्यक्ष में कुछ नहीं बोला. उससे कहा, “साहब के पास ले जाकर साइन करा दीजिए. तब उसने तपाक से जवाब दिया, “साहब के पास तो आप ही जाइए,” कहते हुए उसने कागज वहीं पटक दिया.

आखिर कागज साहब के पास मुझे ले जाना पड़ा. फिर वही हुआ जिसका मुझे अंदेशा था. साहब ने मुझे कागज दिखाते हुए कहा, “यह क्या है? यह कागज अधिकारी को भेजूंगा तो मुझे पागल समझेंगे. इसे दोबारा बनाओ.”

तब मेरे इस सहकर्मी ने कहा, “आप प्रारूप बना दीजिए. इस बार में अच्छी तरह भर दूंगा. मैंने दोबारा प्रारूप बनाकर उसे दिया. फिर उसने वही गलती दोहरा दीं. तब मजबूर होकर तीसरी बार मैंने प्रारूप बनाकर स्वयं ही भर दिया. मैं नहीं चाहता था कि चौथी बार मुझे प्रारूप बनाना पड़े.

इसके बाद मैंने सहकर्मी को कभी काम करने को नहीं कहा. क्योंकि मुझे पता था एक बार उससे काम कराया तो दोबारा मुझे ही करना पड़ेगा. इसलिए स्वयं ही काम करने में अपनी भलाई थी. ताकि एक बार में वह काम हो जाए.

मगर, वह वास्तव में वह पागल था या मुझे पागल बना रहा था. वह मुझे जल्दी ही पता चल गया. उसकी एक बस चलती थी. जिसमें वह सुबह शाम पैसे कलेक्ट किया करता था. उसी बस से मुझे एक बार गांव जाने पड़ा.

मैं बस में पीछे बैठा था. सहकर्मी कंडक्टर से एक सीट पर हिसाब लिख रहा था. तब उसकी गणित देखकर मैं दंग रह गया. यहां पर वह रूपए पैसे का हिसाब बिल्कुल एक्यूरेट लिख रहा था. चाहे जितना भी बड़ा अमाउंट हो, उससे वह गलत नहीं हो रहा था.”

यह देखकर मुझे बहुत ताजुब हुआ. वास्तव में वह पागल नहीं था. वह मुझे पागल बना रहा था. ताकि मैं पागल बनकर उसका और मेरा काम करता रहूं. तभी मुझे मालूम हुआ कि यह मंत्र कितना अच्छा है~ बने रहो पगला, काम करेगा अगला.

अब मुझे समझ आया था कि पागल बनने के कितने फायदे हैं. एक तो आपको काम नहीं करना पड़ता. दूसरा, एक ही काम को बार-बार करने से आप व्यस्त दिखते हो. लोगों को लगता है कि आप बहुत काम करते हो. आपके पास समय नहीं है. यदि आपसे काम करवाना है तो फुर्सत में मिलना पड़ेगा.

दूसरा, कोई व्यक्ति बेवजह आपके पास नहीं आता है. जिसको भी काम होगा वह आपको चाय की कैंटीन में ले जाएगा. साहब जी चाय पीकर आते हैं. आप बहुत काम कर रहे हो. इसलिए थोड़ा थक गए होंगे. थोड़ा आराम कर लीजिए.

तीसरा, काम करते हुए साहब भी आपको डिस्टर्ब करना पसंद नहीं करते हैं. वे सोचते हैं कि यह व्यक्ति तो काम करता रहता है. किसी दूसरे व्यक्ति को काम देना चाहिए. इसलिए उल्टा सीधा लिखने का, यह तीसरा सबसे बड़ा फायदा है.

चौथा फायदा मेरे मित्र ने बताया था. उसने कहा था, “यदि आपको सभी के बीच बहुत ही मेहनती और वर्कर बना रहना है तो आपको एक मंत्र अपनाना होगा.”

तब मैंने तपाक से पूछा, “आप भी बता दीजिए.”

तब उसने कहा कि वह मंत्र है कि काम की फिक्र करो. काम का जिक्र करो. बार-बार जोर-जोर से कहो. मगर काम मत करो.

यह फायदा सुनकर मेरे मुंह से निकल गया, “वाह मित्र! बहुत ही बेहतरीन नुस्खा बताया है. शायद मैं अमल में ला सकूं. इसकी कोशिश करूंगा.” मैंने यह अपनाने की कोशिश भी की. पर मेरा पागल मन इसे अपने को तैयार नहीं हुआ. वह कहने लगा तू इतना भी पागल नहीं है कि पागल बनने का ढोंग कर सके.

मगर, जब धीरे-धीरे मैंने अपने आसपास निगाहें दौड़ना शुरू किया तब मालूम हुआ कि इतने कामगारों की बीच में ही अकेला पागल हूं. जो अपना काम पूरे पागलपन से करता हूं. वे सब समझदार व बुद्धिमान लोग, मुझे हिकारत की नजर से देखते हैं.

मेरे एक तीसरे मित्र को देखा. वह अपने आसपास फाइलों का ढेर लगा लेता है. बीच में अपना कागज निकाल कर अपना निजी काम करता है. जब भी कोई साहब आए, झट से फाइल में लिखना शुरू कर देता है. तब अपना कागज नीचे दबा देता है.

मैं कई दिनों से उसे देख रहा था. तब मुझे लगा कि वास्तव में इस जैसा समझदार कोई नहीं है. तब मुझे एक नई परिभाषा सूझ गई. जो दूसरे को पागल बना दे वह सबसे बड़ा समझदार है. इस परिभाषा के मद्देनजर मैं ही  दूसरों को सबसे बड़ा पागल दिखाई दे रहा था.

मैं अभी यही सोच रहा था कि उसे सहकर्मी के पास एक व्यक्ति आकर सामने बैठ गया. उसने झट से उसकी तरफ देखा. वह कुछ बोलना चाहता था कि सहकर्मी ने रोक दिया. अभी एक मिनट रुक जाइए. मुझे बहुत अर्जेंट काम है. उसके बाद में आपका काम सुनता हूं.

यह  इशारा कर के वह फाइल में अपना काम करने लगा. सामने वाला आधे घंटे तक उसके सामने बैठा रहा. उसके बाद मजबूरन में उसे कहना पड़ा, “साहब! मेरी सुन लीजिए मुझे बहुत जरूरी काम है. दुकान छोड़कर आया हूं.”

“ठीक है. बताइए,” कहकर सहकर्मी मित्र ने उसकी बात सुनी. और हां~ हूं करते हुए फाइल को देखता रहा. जिससे लगे कि वह सबसे व्यस्ततम सहकर्मी है. उसे सांस लेने तक की फुर्सत नहीं है.

यह देखकर संक्षिप्त में उसे मित्र ने कुछ बात कही और मेरे सहकर्मी को एक लिफाफा पकड़ कर चल दिया. यह देखकर मुझे लगा कि वास्तव में लिफाफा कमाना हो और अपने को व्यस्त दिखाना जरूरी हैं. नहीं तो इस पागलपन से बढ़कर कोई दूसरा चारा नहीं.

तब मैं ने भी सोचा कि मैं भी इस मंत्र को अपनाने की कोशिश करूं. बने रहो पगला, काम करेगा अगला. मगर, जब इसमें कामयाब नहीं हुआ तो मैं दूसरे मंत्र को अपनाने की कोशिश की. काम की फिक्र करो, काम का जिक्र करो, उसकी खूब चर्चा करो, पर काम ना करो. मगर मैं उसमें अभी तक कामयाब नहीं हुआ हूं. लगता है कभी ना कभी तो कामयाब होऊंगा.

यदि आप भी चाहे तो इसका उपयोग करके अपना जीवन सफल बना सकते हैं.

© श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

20/07/2024

संपर्क – 14/198, नई आबादी, गार्डन के सामने, सामुदायिक भवन के पीछे, रतनगढ़, जिला- नीमच (मध्य प्रदेश) पिनकोड-458226

ईमेल  – opkshatriya@gmail.com मोबाइल – 9424079675 /8827985775

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – विविधा ☆ तो आणि मी…! – भाग ७७ ☆ श्री अरविंद लिमये ☆

श्री अरविंद लिमये

? विविधा ?

☆ तो आणि मी…! – भाग ७७ ☆ श्री अरविंद लिमये ☆

(पूर्वसूत्र- आज माझ्यासाठी सहस्त्रबुद्धे आजोबांच्या मनाची दारं थोडी कां होईना किलकिली झालेली होती. त्यामुळेच त्यांच्या घरून बाहेर पडताना फारसं काही हाती लागलेलं नसतानाही बरंच कांही गवसल्याचं समाधान माझ्या मनात भरून राहिलं होतं..!)

 पण ते समाधान अल्पजीविच ठरलं. याला निमित्त झालं ते ज्यांच्याविरुद्ध ही तक्रार होती त्या आमच्या ब्रॅंच-मॅनेजर प्रभुदेसाईंचंच. या संदर्भात आम्हा दोघांचं बोलणं झालं होतं, तेव्हा तोवर त्यांच्या मनात कोंडून राहिलेला सहस्त्रबुध्देंबद्दलचा संताप त्यांच्या शब्दाशब्दांतून पाझरत होता. नेमकं काय घडलं होतं ते सगळं प्रभूदेसाई झपाटल्यासारखं सांगत राहिले होते. त्यातून आपोआपच ‘तक्रारदार सहस्त्रबुद्धे’ या व्यक्तीची एक नकारात्मक प्रतिमा माझ्या मनात कोरली गेली होती! म्हणूनच एका अतिशय हेकट, संतापी आणि आतयायी अशा म्हाताऱ्या माणसाला मी भेटायला जातोय याचं भान काल सकाळी त्यांच्या दाराची बेल वाजवताना मी घट्ट धरूनच ठेवलं होतं. या सगळ्या पार्श्वभूमीवर मी अपेक्षित केलेला आक्रस्ताळेपणा त्यांनी दाखवलेला नव्हता हे आश्चर्य वाटावं असंच होतं. शिवाय ते दत्तभक्त आहेत हे त्यांच्या गुरुचरित्र वाचनाच्या संदर्भामुळे माझ्या लक्षात आल्यामुळे निघताना मी कांहीसा समाधानी होतो हे खरं पण ते समाधान मनात सुरू झालेल्या त्या आजोबांबद्दलच्याच उलटसुलट विचारांमुळे जवळजवळ नाहीसंच झालं होतं. मनात गर्दी करू लागलेल्या त्या विचारांमधे मला तीव्रतेनं त्रास देत राहिला तो माझ्या मनात आधीच ठाण मांडून बसलेला सहस्त्रबुद्धे आजोबांचा तो नकारात्मक ठसाच! ती संपूर्ण रात्र या विचारांच्या गदारोळात अधांतरीच गेली. या माणसाकडून फार कांही अपेक्षा करण्यात अर्थ नाही ही स्पष्ट जाणीव मग सकाळपर्यंत अधिकाधिक दृढ होत गेलेली होती!

 अर्थातच अशा मन:स्थितीत निर्माण झालेले विचारतरंग माझी उमेद आणि उत्साह प्रदूषित करणारेच ठरले. ‘त्यांनी प्रभूदेसाईंविरूध्द केलेली ती लेखी तक्रार, सातत्याने त्याचा केलेला शिस्तबध्द पाठपुरावा आणि प्रभूदेसाईंना कठोर शिक्षा होण्यासाठीचा यांचा टोकाचा आग्रह हे सगळं विचारपूर्वक रचलेल्या षडयंत्राचाच एक भाग नसेल कशावरून?’ हा प्रश्न तर माझी पाठच सोडेना. आता ठरल्याप्रमाणं त्यांना भेटायचं तर लगेचच निघायला हवं होतं पण जाऊन करायचं काय?सहस्त्रबुध्दे आजोबांना त्यांचं काय आणि कसं चुकलंय हे सांगायचं कसं? कांही करून त्यांना ती तक्रार मागं घ्यायला लावायचीच ही माझ्यावरची मुख्य जबाबदारी पार पाडणं आणि तेही दोन-चार दिवसांच्या अत्यल्प मुदतीत हे अशक्य कोटीतलंच होतं हे लख्ख जाणवलं आणि मी निराश झालो. अशा बिकट वाटेवर याच अस्वस्थ मनानं मी त्या सकाळी टाकलेलं पहिलं पाऊल म्हणूनच आत्मविश्वास हरवल्यासारखं लटपटत होतं आणि नंतर सहस्त्रबुद्धेंच्या दारावरची बेल वाजवताना माझा हातही थरथरत होता!

 ” या..” माझं स्वागत केलं ते दस्तुरखुद्द सहस्त्रबुध्दे आजोबांनीच. त्यांच्या चेहऱ्यावर ना हसू होतं ना मी आल्याचं समाधान. तरीही त्यांचा चेहरा शांत होता आणि माझ्यासाठी तेच खूप होतं.

 “आज लवकर आवरलं कां गुरुचरित्र वाचन?” मी सहजच विचारलं.

 “नाही. हीच माझी रोजची वेळ. काल अध्याय मोठा होता म्हणून थोडा उशीर झाला होता ” ते म्हणाले. त्यांचा मूड कसा आहे याची एवढी चाचपणी पुरेशी होती.

 “तुम्ही केलेल्या तक्रारी बद्दल मी आवर्जून बोलायला आलोय याचं आश्चर्य वाटलं असेल ना तुम्हाला?” मी फार वेळ न दवडता मुद्यालाच हात घातला.

 “नाही.” माझ्याकडे रोखून पहात ते ठामपणे म्हणाले. “तसंच काही कारण असल्याशिवाय बँक तुम्हाला पाठवणार नाही हे ठाऊक आहे मला.”

 हे ऐकून मी भांबावलोच.हे यांना कसं समजलं? मला प्रश्न पडला. ‘आपल्या ऑफिस मधल्याच कुणाशी संपर्क, साटंलोटं नसेल ना यांचं?’ या विचाराने क्षणभर अस्वस्थही झालो आणि तीच अस्वस्थता लपवण्यासाठी मी मोकळेपणानं हसलो. तसं कांही असण्याची शक्यता नाही हे माहित असूनही ती शक्यता गृहित धरूनच मी सहज हसण्यासारखी प्रतिक्रिया देणं आवश्यकच होतं. संवादाची सुरूवात अशी निसरड्या वाटेवरूनच झाली त्यामुळे पुढची पावलं मला हुशारीनेच टाकायला हवी होती.यांना मी इथं येण्यामागचं खरं कारण सांगणं योग्य नव्हतं हे खरं पण त्यासाठी खोटं बोलणंही मला योग्य वाटेना. आजोबा मी कांही बोलेन त्याची वाट पहात माझंच निरीक्षण करीत होते.

 “तसंच काहीतरी कारण आहे हे खरं आहे आजोबा, पण मला बँकेनं पाठवलेलं नाहीय. तुम्हाला आवर्जून भेटावं आणि या विषयावर तुमच्याशी बोलावं असं मलाच मनापासून वाटलं आणि मी तसं सांगितल्यावर डीजीएम्. साहेबांनी मला परवानगी दिली एवढंच.”

 ” कमालच आहे. मला आवर्जून भेटावं असं कां वाटलं तुम्हाला?”

 “या सर्व प्रकरणात ‘ह्युमन रिलेशन्स आस्पेक्ट’ कडं जाणीवपूर्वक नसेल पण थोडं दुर्लक्ष झालंय हे मला जाणवलं म्हणून तुमची भेट घ्यावी असं वाटलं.”

 “यासाठी त्या मॅनेजरशीच बोलायचंत ना?वाट वाकडी करून इथं कशाला यायचं?”

 ” मी त्यांच्याशीही बोललोय ना. त्यांनी त्यांची बाजू सांगितली, पण ती त्यांच्या दृष्टिकोनातून. हा प्रश्न योग्यरितीने सोडवण्यासाठी कुणावरही अन्याय होऊ नये याची काळजी मीच घ्यायला हवी ना?”

 “तो प्रभूदेसाई काय म्हणाला ते कळू दे तरी मला एकदा. माझ्या तक्रारखोर स्वभावावर ताशेरे ओढले असतील त्यानं. मी इतर कस्टमर्ससमोर त्याचा अपमान केला असंही तो म्हणाला असेल. स्वतःची कातडी बचावण्यासाठी तो यापेक्षा वेगळं करूच काय शकतोs..? ” संतापाने थरथरत ते ओरडले. त्यांचा आवाज ऐकून कानोसा घेत आत उभी असल्यासारखी त्यांची मुलगी धावत बाहेर आली.

 ” बाबाss, मी काय सांगितलं होतं तुम्हाला? जे बोलायचंय ते शांतपणे बोला. तेव्हासारखं आताही बीपी शूट झालं, तर त्रास बँकेला नाहीs तुम्हालाच होणाराय…” सात्विक संतापाने तिचा आवाज भरून आला.

 आजोबा वरमले.

 ” हो गं बाई, शांतपणे बोलतो. मग तर झालं? तू आत जा बरं. यांच्यासाठी चहा टाक.” ते म्हणाले. ती क्षणभर घुटमळली न् आत निघून गेली..

 “त्या दिवशी बी.पी. शूट झालं होतं?’त्या’ दिवशी म्हणजे कधी…?”

 “या तक्रारीमागचं रामायण घडलं त्या दिवशी. तुमच्या बँकेतच. त्या प्रभूदेसाईच्या केबिनमधे…” बोलतानाही त्या आठवणींनी आजोबांचा आवाज थरथरत होता. ” प्रभूदेसाई बोलला असेलच ना तुम्हाला त्याबद्दल?” त्यांनी कडवटपणे विचारलं.

 प्रभुदेसाई मला खूप कांही बोलले होते. ते सगळं त्यांच्याच शब्दांत यांना सांगणं मला शक्यच होणार नव्हतं. हे सहस्त्रबुध्दे एक रेल्वे पेन्शनर. प्रभूदेसाईंच्या ब्रॅंचमधे यांचा पेन्शन अकाऊंट होता. एक तारखेच्या पेन्शनसाठी होणाऱ्या गर्दीच्या वेळी, किंवा एरवीही इतर पेन्शनर्सच्या बाबतीतले कांही प्रश्न असले तरी हे केबिनमधे येऊन तावातवाने भांडायचे. बँकेत मॅनेजरशी किंवा स्टाफशी कसं बोलावं याचा त्यांना कांही विधिनिषेधच नसायचा. असं बरंच कांही

प्रभूदेसाई बोलले होते. सतत तक्रार करणारे कस्टमर्स सहसा बॅंकस्टाफच्या दृष्टीने अप्रिय असतात हे ओघानं आलंच. हे सगळं सांगून त्यादिवशी नेमकं काय झालं हे सांगताना प्रभूदेसाईना स्वतःच्या रागावर ताबा ठेवणंही मुश्किल झालं होतं.

 “हवं तर माझ्याआधी त्या ब्रँचला काम केलेल्या इतर मॅनेजरना विचारा. ते हेच सांगतील. आजपर्यंत मी इतक्या ब्रॅंचेसमधे मॅनेजर म्हणून काम केलंय, तिथं एकाही ठिकाणी माझ्याबद्दल तक्रार आहे कां ते बघा.” प्रभुदेसाई जीव तोडून सांगत होते…..

 ” त्यादिवशी मी सकाळी नुकताच केबिनमधे गेलो असताना आपले एक चांगले डिपॉझिटर सपत्नीक केबिनमधे आले. त्यांची प्रॉपर्टी विकल्यानंतर येणारी ह्यूज अमाऊंट आपल्या बँकेत डिपाॅझीट करण्याबाबत त्यांना माझा सल्ला हवा होता. आमचं बोलणं सुरू असतानाच हे महाशय माझ्या केबिनमधे घुसले. मी त्यांना पाच मिनिटं बाहेर बसायची विनंती केली. हातातलं काम संपलं की तुम्हाला बोलावतो असं सांगितलं. त्यांना तो त्यांचा अपमान वाटला. डोकं फिरल्यासारखं ते चिडून मला अद्वातद्वा बोलू लागले. त्यांची समजूत घालून त्यांना शांत करायचे सगळे प्रयत्न व्यर्थ ठरले तेव्हा आमचे अकौंटंट पुढे झाले. यांना केबिनमधून बाहेर घेऊन गेले, स्वत: त्यांचं काम करून दिलं. मी त्यांच्याविरूध्द तक्रार करेन या भितीपोटी माझ्याविरुद्धच खोटी तक्रार करून स्वतः साळसूद असल्याचा आव आणतायत ते.” प्रभूदेसाई म्हणाले होते.

 बँक म्हटलं की अशी वेगवेगळ्या स्वभावाची असंख्य माणसं ग्राहकरूपांत संपर्कात येणं ही तशी माझ्यासाठी इतकी वर्षं नित्याचीच बाब होती. हे असं चिघळलेलं प्रकरण मात्र मी प्रथमच अनुभवत होतो.

 प्रभूदेसाईंनी सांगितलेलं हे असंच सगळं मनात भिरभिरत असताना आजोबांच्या शब्दांनी मी भानावर आलो.

 “त्यादिवशी नेमकं काय घडलं ते तो प्रभूदेसाई बोलला असेलच ना तुम्हाला..?” आजोबांनी पुन्हा विचारलं.

 त्यांना काय उत्तर द्यावं तेच मला कळेना.

 “हो, सांगितल़य ना…” मी कसेबसे शब्द जुळवू लागलो. ” पण त्यांनी जे सांगितलंय ते त्यांच्या स्वतःच्या वागण्याचं समर्थनही असू शकतं ना? रूजवात न करता मला ते खरं मानून नाही ना चालणार?” मी म्हणालो. ते समाधानाने हसले. सहस्त्रबुद्धे आजोबांना असं प्रसन्न हसताना मी प्रथमच पहात होतो. त्यांच्या चेहऱ्यावरचं ते स्मित क्षणभरच टिकलं. दुसऱ्याच क्षणी ते विरून गेलं. तो प्रसंग पुन्हा जगत असल्यासारखे ते एकटक समोर पहात राहिले. पहाता पहाता त्यांचा चेहरा विदीर्ण झाला. मनाला झालेल्या खोलवर जखमेला नकळत धक्का लागल्यासारखी ती जखम भळभळून वहात राहिली ….!

क्रमश:…  (प्रत्येक गुरूवारी)

©️ अरविंद लिमये

सांगली (९८२३७३८२८८)

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ.उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ.मंजुषा मुळे/सौ.गौरी गाडेकर≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ तन्मय साहित्य # ३०० – कविता – ☆ चलो बुहारें… ☆ श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ ☆

श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’

(सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ जी द्वारा गीत-नवगीत, बाल कविता, दोहे, हाइकु, लघुकथा आदि विधाओं में सतत लेखन। प्रकाशित कृतियाँ – एक लोकभाषा निमाड़ी काव्य संग्रह 3 हिंदी गीत संग्रह, 2 बाल कविता संग्रह, 1 लघुकथा संग्रह, 1 कारगिल शहीद राजेन्द्र यादव पर खंडकाव्य, तथा 1 दोहा संग्रह सहित 9 साहित्यिक पुस्तकें प्रकाशित। प्रकाशनार्थ पांडुलिपि – गीत व हाइकु संग्रह। विभिन्न साझा संग्रहों सहित पत्र पत्रिकाओं में रचना तथा आकाशवाणी / दूरदर्शन भोपाल से हिंदी एवं लोकभाषा निमाड़ी में प्रकाशन-प्रसारण, संवेदना (पथिकृत मानव सेवा संघ की पत्रिका का संपादन), साहित्य संपादक- रंग संस्कृति त्रैमासिक, भोपाल, 3 वर्ष पूर्व तक साहित्य संपादक- रुचिर संस्कार मासिक, जबलपुर, विशेष—  सन 2017 से महाराष्ट्र शासन के शैक्षणिक पाठ्यक्रम कक्षा 9th की  “हिंदी लोक भारती” पाठ्यपुस्तक में एक लघुकथा ” रात का चौकीदार” सम्मिलित। सम्मान : विद्या वाचस्पति सम्मान, कादम्बिनी सम्मान, कादम्बरी सम्मान, निमाड़ी लोक साहित्य सम्मान एवं लघुकथा यश अर्चन, दोहा रत्न अलंकरण, प्रज्ञा रत्न सम्मान, पद्य कृति पवैया सम्मान, साहित्य भूषण सहित अर्ध शताधिक सम्मान। संप्रति : भारत हैवी इलेक्ट्रिकल्स प्रतिष्ठान भोपाल के नगर प्रशासन विभाग से जनवरी 2010 में सेवा निवृत्ति। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय कविता “चलो बुहारें…” ।)

☆ तन्मय साहित्य  # ३०० ☆

☆ चलो बुहारें… ☆ श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ ☆

☆

चलो जरा कुछ देर स्वयं के

अंतर में मुखरित हो जाएं

अपने मन को मौन सिखाएं।

*

जीवन को अभिव्यक्ति देना

शुष्क रेत में नौका खेना

दूर क्षितिज के स्वप्न सजाए

पंखहीन पिंजरे की मैना,

बधिर शब्द बौने से अक्षर

वाणी की होती सीमाएं।

अपने मन को…..

*

बिन जाने सर्वज्ञ हो गए

बिन अध्यन, मर्मज्ञ हो गए

भावशून्य, धुंधुआते अक्षर

बिन आहुति के यज्ञ हो गए,

समिधा बने, शब्द अंतस के

गीत समर्पण के तब गायें।

अपने मन को…..

*

तर्क वितर्क किये आजीवन

करता रहा जुगाली ये मन

रहे सदा अनभिज्ञ स्वयं से

पतझड़ सा यह है मन उपवन,

महक उठें महकाएं जग को

क्यों न हम बसन्त बन जाएं।

अपने मन को…..

*

कब तक भटकेंगे दर-दर को

पहचानें सांसों के स्वर को

खाली हों कल्मष कषाय से

चलो बुहारें अपने घर को

करें किवाड़ बन्द, बाहर के

फिर भीतर, एक दीप जलाएं।

अपने मन को….

☆ ☆ ☆ ☆ ☆

© सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’

जबलपुर/भोपाल, मध्यप्रदेश, अलीगढ उत्तरप्रदेश  

मो. 9893266014

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ जय प्रकाश के नवगीत # १२१ ☆ साँझ आई ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव ☆

श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

(संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं अग्रज साहित्यकार श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव जी  के गीत, नवगीत एवं अनुगीत अपनी मौलिकता के लिए सुप्रसिद्ध हैं। आप प्रत्येक बुधवार को साप्ताहिक स्तम्भ  “जय  प्रकाश के नवगीत ”  के अंतर्गत नवगीत आत्मसात कर सकते हैं।  आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण एवं विचारणीय नवगीत “साँझ आई”।)       

✍ जय प्रकाश के नवगीत # १२१ ☆ साँझ आई ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव ☆

☆

साँझ आई

बाल दो बाती

नई यादों के सँग फिर

साँझ आई ।

 

धूप से जलकर

हुआ है ख़ाक मन

उम्र से कट कह रहा

फिर एक दिन

ज़मीं काई

पीट लो छाती

सुधि के आँगन में

ज़मीं काई।

 

चुरा लाई कहीं से

सन्नाटा हवा

चुप्पियों के स्वर सजे

ये क्या हुआ

एक परछाईं

विश्वासघाती

हँस रही पर्दों में

एक परछाई ।

***

© श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

सम्पर्क : आई.सी. 5, सैनिक सोसायटी शक्ति नगर, जबलपुर, (म.प्र.)

मो.07869193927,

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ ग़ज़ल # १२५ ☆ सजल – तोड़कर फूल को नहीं फेंको… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे ☆

श्री अरुण कुमार दुबे

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री अरुण कुमार दुबे जी, उप पुलिस अधीक्षक पद से मध्य प्रदेश पुलिस विभाग से सेवा निवृत्त हुए हैं । संक्षिप्त परिचय ->> शिक्षा – एम. एस .सी. प्राणी शास्त्र। साहित्य – काव्य विधा गीत, ग़ज़ल, छंद लेखन में विशेष अभिरुचि। आज प्रस्तुत है, आपकी एक भाव प्रवण रचना “तोड़कर फूल को नहीं फेंको…“)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ कविता # १२५ ☆

✍ सजल – तोड़कर फूल को नहीं फेंको… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे  ☆

((तुकांत – आने, पदांत – में, गालगागा लगालगा  गागा, मात्रा भार – 17)

☆

क्या मिला आँख है दिखाने में

माल लगता न मुस्कराने में

 *

भूल जाओ बड़ा सरल कहना

साल लगते कई भुलाने में

 *

दाम मँहगे किसान तब मांगे

खून बहता फसल उगाने में

 *

तोड़कर फूल को नहीं फेंको

वृक्ष कितना सहा खिलाने में

 *

राह सच की कठिन मगर चलिए

साथ मत ढूढिये जमाने में

 *

आचरण नेक खींचता सबको

सज सँवर क्यों लगा रिझाने में

 *

प्यार फैला अरुण घृणा मेटो

कुछ लगे लोग बरगलाने में

☆

© श्री अरुण कुमार दुबे

सम्पर्क : 5, सिविल लाइन्स सागर मध्य प्रदेश

सिरThanks मोबाइल : 9425172009 Email : arunkdubeynidhi@gmail. com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ ग़ज़ल # ३२ – शब को आने का वादा किया है तूने… ☆ श्री हेमंत तारे ☆

श्री हेमंत तारे 

श्री हेमन्त तारे जी भारतीय स्टेट बैंक से वर्ष 2014 में सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृत्ति उपरान्त अपने उर्दू भाषा से प्रेम को जी रहे हैं। विगत 10 वर्षों से उर्दू अदब की ख़िदमत आपका प्रिय शग़ल है। यदा- कदा हिन्दी भाषा की अतुकांत कविता के माध्यम से भी अपनी संवेदनाएँ व्यक्त किया करते हैं। “जो सीखा अब तक,  चंद कविताएं चंद अशआर”  शीर्षक से आपका एक काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुका है। आज प्रस्तुत है आपकी एक कविता – शब को आने का वादा किया है तूने…।)

✍ शब को आने का वादा किया है तूने… ☆ श्री हेमंत तारे  ☆

☆

बारहा समझाईश, ख़ता होती रहे, ये मंजूर न होगा

मेरा अपना मुझे अपना न कहे, ये  मंजूर न होगा

हक़ है तुझको भी के तू मुझसे सवालात करे

पर जीस्त मेरी और तू ज़ब्त करे,  ये मंजूर न होगा

 *

वो रवादार है, बर्दाश्त कर रहा है सितम अब तक

पर ज़ुल्म की इंतेहा होती रहे, ये मंजूर न होगा

 *

मुमकिन है के पता ही न हो के मर्ज़ क्या है

पर जान कर भी तू ख़ामोश रहे, ये मंजूर न होगा

 *

तेरी हर क़ामयाबी पर ग़ुरूर है मुझको

पर शिकस्त हो और तू बिखर जाये, ये मंजूर न होगा

 *

शब को आने का वादा किया है तूने

तूने वादा बेवजह न निभाया तो, ये मंजूर न होगा

 *

मेरी कोशिश होगी ‘हेमंत’ के तल्ख़ियां न बढे

पर मैं ख़ामोश रहूं, और वो बदज़बानी करे, ये मंजूर न होगा

(बारहा = बावजूद, जीस्त = जिंदगी, ज़ब्त = नियंत्रित करना, रवादार = सहिष्णु)

☆

© श्री हेमंत तारे

मो.  8989792935

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ४० ☆ लघुकथा – प्रभाव… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

डॉ सत्येंद्र सिंह

(वरिष्ठ साहित्यकार डॉ सत्येंद्र सिंह जी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत। मध्य रेलवे के राजभाषा विभाग में 40 वर्ष राजभाषा हिंदी के शिक्षण, अनुवाद व भारत सरकार की राजभाषा नीति का कार्यान्वयन करते हुए झांसी, जबलपुर, मुंबई, कोल्हापुर सोलापुर घूमते हुए पुणे में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी के पद से 2009 में सेवानिवृत्त। 10 विभागीय पत्रिकाओं का संपादन, एक साझा कहानी संग्रह, दो साझा लघुकथा संग्रह तथा 3 कविता संग्रह प्रकाशित, आकाशवाणी झांसी, जबलपुर, छतरपुर, सांगली व पुणे महाराष्ट्र से रचनाओं का प्रसारण। जबलपुर में वे प्रोफेसर ज्ञानरंजन के साथ प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े रहे और झाँसी में जनवादी लेखक संघ से जुड़े रहे। पुणे में भी कई साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। वे मानवता के प्रति समर्पित चिंतक व लेखक हैं। अप प्रत्येक बुधवार उनके साहित्य को आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय आलेख  – “प्रभाव… “।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ४० ☆

✍ लघुकथा – प्रभाव… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

सीताराम जी बचपन से नियम के पाबंद रहे हैं और आज भी हैं। नियम व न्याय उन्हें बेहद पसंद है। अब किराने की दूकान बेटों ने संभाल ली है, परंतु जब वे दूकान पर बैठते थे तब भी नियम से चलते थे, न कम तौलते न ज्यादा देते। परिचित गरीब को उधार दे दिया करते, यह सोचकर कि प्रभु ने उन्हें यह अवसर दिया है कि किसी की मदद कर सकें, इसलिए करते रहते। उधारी वे लोग चुकाते भी थे पर उनके पास पैसा आने पर। लेकिन उधारी का पैसा आ जाता। सीताराम जी पैसे के पीछे ज्यादा भागने वाले इंसान नहीं थे। पुश्तैनी घर था रहने के लिए। उनकी पत्नी ईश्वर भक्ति में डूबी रहतीं और घर में आने वालों की मन से आवभगत करतीं। बच्चों को शिक्षा देना लाजमी था तो वे इसके लिए पीछे नहीं हटे।

दोनों बेटों और बेटियों को अच्छे स्कूलों में अच्छी शिक्षा दिलवाई। पढ़ लिख कर वे योग्य भी बने। बेटियों का विवाह भी अच्छे घरों में हुआ और उन्होंने अपनी मां की ससुराल में भी अच्छी तरह गृहस्थी संभाली। दोनों बेटे उनकी तरह परिश्रमी निकले और माता पिता की सेवा को ही ईश्वर सेवा मानते। एक ने पुश्तैनी किराने की दूकान संभाल ली तो दूसरे ने कपड़े की दूकान खोल ली परन्तु हिसाब किताब अलग होते हुए भी एक था। संयुक्त परिवार। शाम को भेजन के समय दोनों भाई सीताराम जी को अपनी अपनी दूकान के बारे में बताते। कोई समस्या आती तो मिल कर सामना करते। सभी बहुत संतुष्ट और खुश थे।

दोनों बेटों के दो दो बेटे थे। वे जवान हो रहे थे। सीताराम जी उनकी बातों को कुछ समझते और कुछ नहीं। पूछने पर सुनने को मिलता कि दादा जी, “अब जमाना बदल गया है, वह नहीं रहा जो आपके युवा काल में था।अब जमाना एआई का है। आप तो बस आराम से रहिए। ” सीताराम जी चुप रह जाते परंतु सोचते अवश्य कि यह कौन सी शिक्षा है जो आदमी से ऊपर है। इस शिक्षा से क्या आदमी के जीने पर भी असर पड़ेगा।

अखबार पढ़ने में उनका काफी समय व्यतीत होता। अखबार में सब तरह की खबरें रहती हैं और वे बड़े मन से पढ़ते। एआई और आधुनिक ज्ञान-विज्ञान व तकनीक के बारे में भी समाचार पढ़ते। समझने में उन्हें कोई दिक्कत नहीं होती। पर जब बच्चे कहते हैं कि आप नहीं समझेंगे तो उन्हें हैरानी होती। बच्चे ऐसा क्यों सोचते हैं। वे बच्चों की व्यस्तता, सोचने का ढंग और बातचीत से अनुमान लगाते कि क्या वह समय आ गया है जब युवाओं का जीवन एक कृत्रिम जीवन बन जाएगा जैसा कि वे लोगों से सुनते आ रहे हैं। मनुष्य ही तो सृष्टि का ऐसा प्राणी है जिसमें सोचने की क्षमता है। इस क्षमता पर भी प्रभाव पड़ सकता है? यही सोचते विचारते उनकी आंख लग गईं।

☆

© डॉ सत्येंद्र सिंह

सम्पर्क : सप्तगिरी सोसायटी, जांभुलवाडी रोड, आंबेगांव खुर्द, पुणे 411046

मोबाइल : 99229 93647

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा # ८९ – लाजवंती… ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆

श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा –  गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी,  संस्मरण,  आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – लाजवंती।)

☆ लघुकथा # ८९- लाजवंती ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆

हमारी कॉलोनी के लोगों ने एक गेट टूगेदर ग्रुप बनाकर रखा था।

व्हाट्सएप पर रोज गुड मॉर्निंग तो चलती थी 15 दिन में या हम यूं भी कह सकते हैं कि महीने में दो बार सभी कॉलोनी के लोग एक-एक करके सभी के घरों में इसी बहाने आते जाते मिलते थे। एक दूसरे का दुख-सुख भी बाँटते थे। कुछ दिन तो यह सब ठीक चला पर अब तो जाने का मन नहीं करता। पुष्पा जी मन ही मन बड़बड़ा रही थी। तभी अचानक उनके घर उनकी सखी जूही आ गई।

क्या बात है बहन बड़ी उदास दिख रही हो? दरवाजा भी खोल कर बैठी थी क्या मेरा इंतजार कर रही थी?

हां सखी, तुम्हारे आने से फूलों की तरह महक इस कमरे में भर गई, जैसे तुम्हारा जूही नाम है इस तरह तुम जूही हो।

वह तो मैं हूं।

पर अब तुम कहो आज तो हम सभी को मिसेज शर्मा के यहां जाना है। क्या पहन कर जाओगी अच्छे से थोड़ा क्लासी लुक में जाना है वे अमीर तो नहीं है लेकिन  दिखावा बहुत करती हैं।

हां हां बहन सखी दिखावा क्यों ना करें उनका बेटा अमेरिका में काम करता है।

पति का क्या ? जो दूसरी औरत के साथ चला गया ।

जूही लेकिन क्या हुआ?

इन्हें भी तो ₹50,000 महीने के फ्री में देता है बढ़िया फ्लैट है अपने मन से जी रही है।

ठीक है बहन जाने दो चलो इसी बहाने थोड़ा सा हम घूम फिर लेंगे पुष्पा ने कहा।

जूही ने कहा- लेकिन कल अचानक कुछ आवाज तुम्हारे पड़ोस से आ रही थी लोग तरह-तरह की बातें कर रहे हैं।

कैसी बातें कर रहे हैं लोग?

लोगों को कंफ्यूजन है कि तुम्हारे घर में झगड़ा हो रहा था या पड़ोस में।

मैंने सुना मुझे रहा नहीं गया मेरा जी मुंह को आ गया इसलिए मैं चली आई।

ठीक किया सखी जूही ने कहा।

कल मेरी बहू आई थी पोती को लेकर। एक तो कभी  हाल-चाल नहीं पूछते। मुझे 15000 पेंशन मिलती है।

उसमें भी इन लोगों को कुछ पैसे चाहिए थे। वही जोर-जोर से झगड़ा कर रही थी। घर परिवार में उसने ऐसी गुट बाजी कर ली है कि सबको अपनी तरफ कर लिया है और मुझे बुरा बना दिया है। जिसको जैसा दिखती है वैसे ही बात करती है बहुत ही चालाक औरत है और आजकल यह मोबाइल क्या आ गया है पहले तो मुझे गुस्सा दिलाती है फिर मेरी सारी बातें चुपचाप रिकॉर्ड कर लेती है और जाकर मेरे बेटे अमित को सुना देती है अपने अनुसार और पता नहीं क्या-क्या एडिटिंग भी कर लेती है।

इसी शर्म के मारे तो मैं लाजवंती के पुष्प की तरह हो गई हूं लाजवंती हां कभी छुआ है तुमने उसे छूकर देखना तो मेरे मन की दशा को अपने आप तुम समझ जाओगे चलो शाम को मिलते हैं।

© श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

जबलपुर, मध्य प्रदेश मो. 7000072079

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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