मराठी साहित्य – मराठी कविता ☆ कवितेच्या प्रदेशात # २८९ ☆ पंख… ☆ सुश्री प्रभा सोनवणे ☆

सुश्री प्रभा सोनवणे

? कवितेच्या प्रदेशात # २८९ ?

☆ पंख… ☆ सुश्री प्रभा सोनवणे ☆

☆

खूप पूर्वी तू कापलेस,

माझे पंख,

मी उडू नये फार दूरवर म्हणून,

पण कुठले बळ घेऊन,

मी उडू शकले—

तुझ्या मनाविरुद्ध…माहित नाही !

 

तेव्हा ती माझी बंडखोरीच होती,

बाईला चार भिंतीत डांबून,

ठेवणाऱ्या पुरूष प्रधान

संस्कृती विरूद्ध ची!

आठवायचा कुठल्याशा

हिंदी सिनेमातला डायलॉग,

“शरीफ खानदान की औरते,

घरकी चार दिवारी को कैद नही माना करती!”

 

पण मी ओलांडून उंबरठा,

स्वतःला सिद्ध करताना,

सुखावत होते कुठेतरी,

१९७५ सालच्या,

माझ्या स्त्रीमुक्तीच्या कवितांना,

जागल्याने!

 

पण या सांजसमयी,

तू व्याधींनी ग्रस्त असताना,

तू माझे पंख नाही कापलेस…..

सक्तीचे बंदी बनण्याचे फर्मान काढून,

त्याला एक सोज्वळ नाव दिलेस,

पातिव्रत्य धर्माचे!

आता मावळले आहे माझे ही तेज,

आणि मी ही —

लावून घेतली आहेत,

घराची सर्व कवाडे आतल्या बाजूने घट्ट!

 

हे प्रायश्चित्त की पराभव  ??

स्वतःच्या स्त्रीत्वाचा !!

माहित नाही !

☆

© प्रभा सोनवणे

संपर्क – “सोनवणे हाऊस”, ३४८ सोमवार

पेठ, पंधरा ऑगस्ट चौक, विश्वेश्वर बँकेसमोर, पुणे 411011

मोबाईल-९२७०७२९५०३,  email- sonawane.prabha@gmail.com

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ.उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कादम्बरी # १२२ – मुक्तक – चिंतन के चौपाल – २२ ☆ आचार्य भगवत दुबे ☆

आचार्य भगवत दुबे

(संस्कारधानी जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर आचार्य भगवत दुबे जी को सादर चरण स्पर्श । वे आज भी हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते हैं। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया है।सीमित शब्दों में आपकी उपलब्धियों का उल्लेख अकल्पनीय है। आचार्य भगवत दुबे जी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व की विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 ☆ हिन्दी साहित्य – आलेख – ☆ आचार्य भगवत दुबे – व्यक्तित्व और कृतित्व ☆. आप निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणा स्त्रोत हैं। हमारे विशेष अनुरोध पर आपने अपना साहित्य हमारे प्रबुद्ध पाठकों से साझा करना सहर्ष स्वीकार किया है। अब आप आचार्य जी की रचनाएँ प्रत्येक मंगलवार को आत्मसात कर सकें गे। 

इस सप्ताह से प्रस्तुत हैं “चिंतन के चौपाल” के विचारणीय मुक्तक।)

✍  साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ कादम्बरी # १२२ – मुक्तक – चिंतन के चौपाल – २२ ☆ आचार्य भगवत दुबे ✍

☆

मेरे अजीज मुझ पर तोहमत लगा गये, 

जो राजदाँ थे मेरे देकर दगा गये, 

जख्मों को सुलाया था लोरी सुना-सुना 

मरहम लगाने वाले फिर से जगा गये।

0

जो अगुआ थे अलगावों के, 

ठाठ बड़े उन नेताओं के, 

उन्हें फूल-फल रही फूट है 

जो कातिल हैं सद्भावों के।

0

चाल बदली है ताजदारों की, 

याद आयी है खाकसारों की, 

आ गया है चुनाव का मौसम 

लूटना है फसल बहारों की।

0

मैं सदा इम्तिहान से गुजरा, 

आग वाली उड़ान से गुजरा, 

जलजला, छोड़कर महल सारे 

मेरे जर्जर मकान से गुजरा।

0

विपदा से मेरी यारी है, 

ठोकर दौलत को मारी है, 

अपमानों के सुख, ठुकराये 

रखी सुरक्षित खुद्दारी है।

☆

https://www.bhagwatdubey.com

© आचार्य भगवत दुबे

82, पी एन्ड टी कॉलोनी, जसूजा सिटी, पोस्ट गढ़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक साहित्य # ३८१ ☆ आलेख – “भारतीय अभियांत्रिकी परंपरा से वर्तमान” ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ३८१ ☆

?  आलेख – भारतीय अभियांत्रिकी परंपरा से वर्तमान ? श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

“योगः कर्मसु कौशलम्”

अर्थात कर्म में कौशल ही योग है

कभी कभी इतिहास स्वयं को रचने के लिए मनुष्य का सहारा नहीं लेता, बल्कि मनुष्य को अपने साधन के रूप में प्रयोग करता है। भारत की सभ्यता ने यही किया है। जब मानव ने मिट्टी को आकार देना सीखा, तो भारत ने उससे मंदिर गढ़े। जब जल को नियंत्रित करने की आवश्यकता हुई, तो भारत ने नदियों के तट पर सिंचाई की व्यवस्था बनाई। जब पत्थरों से दीवारें बनीं, तो भारत ने उन दीवारों में नक्काशी से कविता लिख दी। यह वह भूमि है जहाँ अभियंत्रण केवल तकनीकी कौशल नहीं, बल्कि जीवन-दर्शन था। यहाँ अभियंता केवल निर्माता नहीं, भगवान विश्वकर्मा के स्वरूप में सृष्टा माने गए। 

मोहनजोदड़ो और हड़प्पा की विकसित सभ्यता आज भी हमें यह सिखाती हैं कि स्वच्छता और जल-प्रबंधन केवल शहरी सुविधा नहीं, बल्कि सभ्यता की रीढ़ हैं। सिंधु घाटी का नगर नियोजन, समकोणीय गलियाँ, कुएँ, स्नानागार , ये सब हमारे पूर्वज अभियंताओं की प्रतिभा का जीवंत प्रमाण हैं। प्राचीन ग्रंथों में भगवान विश्वकर्मा का उल्लेख उसी गौरव के साथ हुआ है जिस गौरव से कवि वाल्मीकि और ऋषि व्यास का। हर वर्ष हमारी संस्कृति में हम इंजीनियरिंग संस्थानों में विश्वकर्मा पूजन के आयोजन करते आए हैं।भारतीय अभियंत्रण सदैव कला, विज्ञान और आध्यात्म के संगम पर खड़ा रहा है। हमारे मंदिरों की स्थापत्य कला, लोहे के खंभे जो सदियों से जंगरहित खड़े हैं, या फिर अजन्ता की गुफाओं में शिल्प-सौंदर्य ,  सब यह बताते हैं कि हमारे अभियंता केवल साधन बनाने वाले नहीं, जन आत्मा में बसने वाले कलाकार थे।

समय बदला, औपनिवेशिक युग आया। इंजीनियरिंग का अर्थ केवल गणितीय संरचना तक सीमित कर दिया गया। भारत में अभियंत्रण को अंग्रेज़ी पाठशालाओं के माध्यम से नए रूप में ढाला गया। किंतु भारतीय मस्तिष्क अपनी जड़ों से कट नहीं सका। स्वतंत्रता संग्राम के साथ ही एक नए अभियंत्रण युग का आरंभ हुआ , जो आत्मनिर्भरता का प्रतीक था। रेलवे, सिंचाई परियोजनाएँ, बांध, इस्पात संयंत्र, औद्योगिक नगर , ये सब नवभारत की नींव थे। पंचवर्षीय योजनाओं में अभियंताओं का स्थान उतना ही महत्वपूर्ण था जितना किसी कवि का संस्कृति के निर्माण में होता है। नेहरूजी ने कहा था ,  बड़े बांध आधुनिक भारत के मंदिर हैं। यह कथन भारतीय अभियंताओं के लिए एक आदरांजलि था।

आज भारतीय अभियंता दुनियां के प्रायः प्रत्येक देश में कही न कही महत्वपूर्ण भूमिकाओं में सक्रिय हैं।

पहले  भारत गुलाम था, फिर भी तकनीकी विचार स्वतंत्र थे। पर आज राजनीति इंजीनियरिंग के विविध क्षेत्रों सिविल, मैकेनिकल, इलेक्ट्रिकल, केमिकल, इलेक्ट्रॉनिक्स, कंप्यूटर, माइनिंग, एयरोनॉटिकल, और अनेक शाखाओं में क्षेत्रीय  विकास के नाम पर हावी दिखती है।

भारत में हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं में तकनीकी लेखन का बड़ा संकट रहा है। ज्ञान यदि भाषा की दीवारों में कैद हो जाए, तो वह सीमित हो जाता है।

हिंदी तथा क्षेत्रीय भाषाओं में तकनीक का लेखन, महत्वपूर्ण है।  यह उस भारत का प्रतीक है जो बहुभाषिक होते हुए भी एक विचार में बंधा हुआ है  ‘ज्ञान सभी के लिए’।

भारत आज चंद्रयान, अदित्य, जीआईएस, और स्वदेशी ड्रोन तकनीक के साथ अंतरिक्ष से लेकर पृथ्वी की गहराइयों तक अपनी उपस्थिति दर्ज करा चुका है। यह केवल तकनीकी वैज्ञानिक उपलब्धियाँ नहीं हैं, यह अभियंत्रण की आत्मा का उत्कर्ष है। ‘मेक इन इंडिया’ और ‘वोकल फॉर लोकल’ जैसे अभियानों में अभियंता अग्रिम पंक्ति के योद्धा हैं।

आज आवश्यकता है कि नई पीढ़ी में अभियंता केवल उपकरणों तक सीमित न रहें, बल्कि समाज की नब्ज को पहचानें। जल, ऊर्जा और कचरे का प्रबंधन केवल योजनाओं का विषय नहीं, जीवन की आवश्यकता है। अभियंत्रण यदि संवेदना से जुड़ जाए तो वह चमत्कार कर सकता है।

आज जब विश्व कृत्रिम बुद्धिमत्ता और स्वचालन के युग में प्रवेश कर रहा है

हम आशा करते हैं कि भारत का अभियंता केवल तकनीक का ज्ञाता नहीं, सृजन का साक्षी है और सृजन की गाथा है।

☆

© श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

म प्र साहित्य अकादमी से सम्मानित वरिष्ठ व्यंग्यकार

संपर्क – ए 233, ओल्ड मिनाल रेजीडेंसी भोपाल 462023

मोब 7000375798, ईमेल apniabhivyakti@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ मनोज साहित्य # १९५ – गीत – पूरब से चल रहीं हवाएँ… ☆ श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” ☆

श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं सजग अग्रज साहित्यकार श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” जी  के साप्ताहिक स्तम्भ  “मनोज साहित्य ” में आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण गीत “पूरब से चल रहीं हवाएँ…”। आप प्रत्येक मंगलवार को आपकी भावप्रवण रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे।

✍ मनोज साहित्य # १९५ – गीत – पूरब से चल रहीं हवाएँ…  ☆

(राधेश्याम छंद)

☆

पूरब से चल रहीं हवाएँ।

दीप्तिमान हो गईं दिशाएँ।।

कहलाएँ सोने की चिड़िया ।

फसलें खुशियों की लहराएँ।।

*

हर आँखों के आँसू पौंछें।

भारत के ध्वज को फहराएँ…

**

दुनिया भर के बने चहेते।

अंतरिक्ष की सैर कराते ।।

कीर्तिमान कर बढ़ते जाते।

सूर्य चाँद पर कदम बढ़ाते।।

*

दिशा दिखाएँ मानवता की ।

सबको उन्नति राह सुझाएँ…

**

क्षमताओं में कब हैं पीछे।

महाशक्तियों से हम आगे।।

जाग उठे हैं भारत वासी।

अब प्रगति के बुनेंगे धागे।।

*

बनीं पाँचवीं अर्थ व्यवस्था।

विश्व गुरू बन राह दिखाएँ…

**

दुश्मन सीमा पर है छलता।

करता नित प्रति कारिस्तानी।।

समझाने पर नहीं समझता।

कैसा है वह पाकिस्तानी।

*

मेघ गर्जना करते देखो।

अरि-मर्दन को भुजा उठाएँ….

**

दुनिया में बदनाम रहा है।

चीन हमारा बना पड़ोसी।।

करे हमेशा सीनाजोरी।

धरा हड़पने का है दोषी।।

*

बहिष्कार हो सामानों का।

उसकी आर्थिक शक्ति ढहाएँ…

**

विश्व पटल पर मान बढ़ा है।

सम्मानों का ताज गढ़ा है।।

नहीं युद्ध यह धरा बुद्ध की।

राम राज्य का पाठ पढ़ा है।।

*

हिलमिल कर सबको है रहना।

सारे जग को हमीं लुभाएँ…

☆

©  मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

30/8/24

संपर्क – 58 आशीष दीप, उत्तर मिलोनीगंज जबलपुर (मध्य प्रदेश)- 482002

मो  94258 62550

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २४४ – गोवर्धन पूजा ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ ☆

श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है सामाजिक विमर्श पर आधारित विचारणीय लघुकथा “गोवर्धन पूजा 🌻”।) 

☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २४४ ☆

🌻लघु कथा🌻 गोवर्धन पूजा 🌻

भगवान गोवर्धन की पूजा, गाय गोबर को प्रतीक बनाकर, उसे गोवर्धन गिरिराज मान पूजा करना सनातनी धर्म रीति रिवाज प्रथा चली आ रही है।

अरे मंजू कल याद से गाय का गोबर ले आना।

जी दीदी ले आऊंगी। दूसरे दिन विधि विधान से पूजन 56 प्रकार के व्यंजनों से गिरिराज जी को भोग।

अन्न कूट का प्रसाद देते मेम साहब बोली – – देख कितना सुन्दर सजाया हमने जो तुम गोबर लाई थीं।

मंजू ने कहा–जी दीदी हम तो सिर्फ गोबर लाये थे। गोवर्धन तो आपके घर बना। हमारे यहाँ तो आँगन लीपापोती।

गोबर धन आप सभी के यहाँ बनता है। हमारे यहाँ तो लीपापोती।

☆

© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # १५१ – देश-परदेश – Don’t put all your Eggs in one बास्केट ☆ श्री राकेश कुमार ☆

श्री राकेश कुमार

(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ  की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” आज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)

☆ आलेख # १५१ ☆ देश-परदेश – Don’t put all your Eggs in one basket ☆ श्री राकेश कुमार ☆

अंग्रेज़ी भाषा के इस फ्रेस को मिडिल स्कूल में पढ़ाया गया था, तो गुरुजी ने इस का तात्पर्य पूछा था ? हम शाकाहारी हैं, हमने भी कह दिया था, हमारे घर में अंडे नहीं आते हैं, इस लिए हमको इस के बारे में कुछ भी पता नहीं हैं।पूरी कक्षा खिलखिला कर खूब हंसने लगी थी।

घर आकर पिताश्री से हमने पूरी बात बताई, तब उन्होंने हमें याद दिलाया कि जब भी रेल यात्रा में जाते है, तो नगद राशि को पेंट की दोनों जेब और शर्ट के नीचे पहनने वाली बंडे की चोर पॉकेट में अलग अलग रख कर यात्रा पर जाते हैं।ये ही नियम अंडों पर भी लागू होता हैं।

विगत दिन जबलपुर स्टेशन पर एक यात्री ने प्लेटफार्म के एक वेंडर से समोसा खरीदा, मोबाइल से भुगतान पूरा ना होने पर विक्रेता ने यात्री की हाथ घड़ी निकाल ली थी।किसी सज्जन ने पूरी वारदात का वीडियो सोशल मीडिया पर प्रसारित कर दिया हैं।

मीडिया को एक काम मिल गया, विक्रेता का लाइसेंस निरस्त हो गया हैं।रेलवे पुलिस उस यात्री को खोज रही हैं, ताकि आगे की कार्यवाही की जा सकें।ये भी हो सकता है, यात्री बिना टिकट यात्रा कर रहा होगा, फिर वो क्यों सामने आएगा ? विक्रेता ने पुलिस को बताया की घड़ी को उसने ट्रेन में ही फेंक दिया था।ये सलाह उसके वकील ने दी होगी, ताकि वो निर्दोष साबित हो जाए।

यदि यात्री का मोबाइल भुगतान करने में फेल हो गया था, तो उसको कुछ धन राशि नगद भी अलग अलग जेबों में रखनी चाहिए थी, और उसकी तस्वीर भी वायरल नहीं होती।

जबलपुर शहर इस घटना से अलग बदनाम हो गया हैं।लोग नेहरू को याद कर रहें है, जिन्होंने जबलपुर को गुंडों का शहर तक कह दिया था, वो तो बाद में स्वर्गीय विनोबा भावे, भूदान आंदोलन के जनक ने जबलपुर को संस्कारधानी बताया था।

इस घटना से दो बातें सामने आई एक तो मोबाइल या बैंक कार्ड के रहते हुए भी कुछ राशि नगद में अवश्य रखें। दूसरी बात “ऊपर वाला सब देख रह है” एक दम सही है।सी सी टीवी कैमरे, मोबाइल आपकी हर हरकत पकड़ ही लेते हैं।

© श्री राकेश कुमार

संपर्क – B 508 शिवज्ञान एनक्लेव, निर्माण नगर AB ब्लॉक, जयपुर-302 019 (राजस्थान)

मोबाईल 9920832096

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ श्री अशोक भांबुरे जी यांची कविता अभिव्यक्ती #३०४ ☆ पावसा… ☆ श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे ☆

श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे

 

? अशोक भांबुरे जी यांची कविता अभिव्यक्ती # ३०४ ?

☆ पावसा… ☆ श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे ☆

☆

पावसा आता तुला कंटाळले

जा म्हणूनी हात आहे जोडले

*

काल मी आतूर होते भेटण्या

भेट पहिली छान होते नाचले

*

भंग केला तू कराराचा असा

वागणे आहे तुझे हे टोचले

*

मित्र होता आज झाला शत्रु तू

तू तुडवता शेत माझे लोळले

*

एवढ्या वर्षात नाही जाहला

वेधशाळा देत आहे दाखले

*

सांगना तू काय आता खायचे

तू बरसला पीक सारे नासले

*

गाळ हा शेतात होता साचला

वाटले मी विस्तवातुन चालले

☆

 © अशोक श्रीपाद भांबुरे

धनकवडी, पुणे ४११ ०४३.

ashokbhambure123@gmail.com

मो. ८१८००४२५०६, ९८२२८८२०२८

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ लेखनी सुमित्र की # २५६ – बुन्देली कविता – दै गई न्यौता चंदनिया… ☆ स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र” ☆

स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र”

(संस्कारधानी  जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर डॉ. राजकुमार “सुमित्र” जी  को सादर चरण स्पर्श । वे सदैव हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते थे। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया।  वे निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणास्रोत हैं। आज प्रस्तुत हैं  आपकी भावप्रवण बुन्देली कविता – दै गई न्यौता चंदनिया…।)

✍ साप्ताहिक स्तम्भ – लेखनी सुमित्र की # २५६ – बुन्देली कविता – दै गई न्यौता चंदनिया… ✍

(बढ़त जात उजयारो – (बुन्देली काव्य संकलन) से) 

☆

चाँदनिया ऐसी लगै, ऊजर उन्ना होय।

जैसे कर असमान तुम, ओखों रहीं सुखोय।।

*

दूबर पातर छरछरी, अरी भरी रस रूप।

बानबूट से दिनन में, मिली मुठी भर धूप।।

*

देखत ही गड़ जाय जो, ऐसी पाई दीठ |

तार तार बस्तर करै, निकरै नई मजीठ।।

*

दसन हँसन दूनी करै, करै दाँती काम |

अचरज मानों अधर में, अकसर करै मुकाम।।

*

गोरे मों पे फबत है, बेंदी रंग बिरंग।

ड्योड़ी पे का तिल खड़ो, देख दिवैया दंग।।

*

अधर असरफी हो गये, नैना भये गुलेल।

अब बिनकी का पूँछ नें, बिन के हाथ नकेल।।

*

सुन्दरि जल बिच फँस गई, कसी-कमल की नाल।

भृंगन दल बादल भये, कमल-कली बेहाल।।

*

धन निरधन कौ का कहौं, ऐंसे ऊ के भाग |

निधन धनी को होत है, निरधन पीबै आग।।

*

दै गई न्यौता चंदनिया, आन करौ असनान।

गोरी सें गोरी भयी, जानत सकल जहान।।

*

बेसुध सोई बाँह में, छाँह घनेरी जान।

पल में बीतत रैन जा, पल में होत भियान।।

*

आंगन अँकुरा उठ रये, भये भील के बान |

धुपछैयां सी पैर कें,तानै रैत कमान ॥

*

स्यामल सारी पैर कें,अँगना में मँडराय।

बिजुरी सी बिदकत फिरै, बादर सी बर्राया।।

☆

© डॉ. राजकुमार “सुमित्र” 

साभार : डॉ भावना शुक्ल 

112 सर्राफा वार्ड, सिटी कोतवाली के पीछे चुन्नीलाल का बाड़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ अभिनव गीत # २५६ – “साखी सारे दृष्टिवंत…” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी ☆

श्री राघवेंद्र तिवारी

(प्रतिष्ठित कवि, रेखाचित्रकार, लेखक, सम्पादक श्रद्धेय श्री राघवेंद्र तिवारी जी  हिन्दी, दूर शिक्षा, पत्रकारिता व जनसंचार,  मानवाधिकार तथा बौद्धिक सम्पदा अधिकार एवं शोध जैसे विषयों में शिक्षित एवं दीक्षित। 1970 से सतत लेखन। आपके द्वारा सृजित ‘शिक्षा का नया विकल्प : दूर शिक्षा’ (1997), ‘भारत में जनसंचार और सम्प्रेषण के मूल सिद्धांत’ (2009), ‘स्थापित होता है शब्द हर बार’ (कविता संग्रह, 2011), ‘​जहाँ दरक कर गिरा समय भी​’​ ( 2014​)​ कृतियाँ प्रकाशित एवं चर्चित हो चुकी हैं। ​आपके द्वारा स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम के लिए ‘कविता की अनुभूतिपरक जटिलता’ शीर्षक से एक श्रव्य कैसेट भी तैयार कराया जा चुका है। आज प्रस्तुत है आपका एक अभिनव गीत “साखी सारे दृष्टिवंत...”)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ # २५६ ☆।। अभिनव गीत ।। ☆

☆ “साखी सारे दृष्टिवंत...” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी ☆

चोटी जैसे कटि प्रदेश पर

लगा रही ठुमके ।

और रिझाने विवश झूमते

कानों के झुमके ॥

 

माथे की सलवटे सरल

भूगोल रहीं समझा ।

वहीं गाल पर लहराई

कुछ लट करतीं साझा ।

 

और गले से नीचे ठहरे

गोलाई पढ़ते –

कठिन वक्ष थे समझ रहे

नव रिश्ते कुमकुम के ॥

 

जहाँ नाभि तक, उदर

भंवर इतिहास बताती है ।

“साखी सारे दृष्टिवंत”

आलेख सुझाती है ।

 

एक मधुर अतिरेक भौंह से

उतर पसर जाता –

जैसे ढक्कन खुले रह गये

हों मादक रम के ॥

 

लगा पीठ की तरफ कई

दर्पण हों आतुर पर ।

रोक रहा आँचल बिम्बों को

लहरा लहरा कर ।

 

वहाँजहाँ केवल कल्पित

सहमे मुहावरे हैं –

ठीक वहाँ हाथों ने थामे

बिन्दु कई चमके ॥

☆

©  श्री राघवेन्द्र तिवारी

0 2 – 11 – 2025

 संपर्क​ ​: ई.एम. – 33, इंडस टाउन, राष्ट्रीय राजमार्ग-12, भोपाल- 462047​, ​मोब : 09424482812​

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिंदी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ प्रतुल साहित्य # १६ – हास्य-व्यंग्य – “गधा और गधत्व के सुख – दुख” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆

श्री प्रतुल श्रीवास्तव 

वरिष्ठ पत्रकार, लेखक श्री प्रतुल श्रीवास्तव, भाषा विज्ञान एवं बुन्देली लोक साहित्य के मूर्धन्य विद्वान, शिक्षाविद् स्व.डॉ.पूरनचंद श्रीवास्तव के यशस्वी पुत्र हैं। हिंदी साहित्य एवं पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रतुल श्रीवास्तव का नाम जाना पहचाना है। इन्होंने दैनिक हितवाद, ज्ञानयुग प्रभात, नवभारत, देशबंधु, स्वतंत्रमत, हरिभूमि एवं पीपुल्स समाचार पत्रों के संपादकीय विभाग में महत्वपूर्ण दायित्वों का निर्वहन किया। साहित्यिक पत्रिका “अनुमेहा” के प्रधान संपादक के रूप में इन्होंने उसे हिंदी साहित्य जगत में विशिष्ट पहचान दी। आपके सैकड़ों लेख एवं व्यंग्य देश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। आपके द्वारा रचित अनेक देवी स्तुतियाँ एवं प्रेम गीत भी चर्चित हैं। नागपुर, भोपाल एवं जबलपुर आकाशवाणी ने विभिन्न विषयों पर आपकी दर्जनों वार्ताओं का प्रसारण किया। प्रतुल जी ने भगवान रजनीश ‘ओशो’ एवं महर्षि महेश योगी सहित अनेक विभूतियों एवं समस्याओं पर डाक्यूमेंट्री फिल्मों का निर्माण भी किया। आपकी सहज-सरल चुटीली शैली पाठकों को उनकी रचनाएं एक ही बैठक में पढ़ने के लिए बाध्य करती हैं।

प्रकाशित पुस्तकें –ο यादों का मायाजाल ο अलसेट (हास्य-व्यंग्य) ο आखिरी कोना (हास्य-व्यंग्य) ο तिरछी नज़र (हास्य-व्यंग्य) ο मौन

आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय व्यंग्य  “यहां सभी भिखारी हैं”।) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ प्रतुल साहित्य # १६ ☆

☆ व्यंग्य ☆ “यहां सभी भिखारी हैं” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆

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पशु – पक्षियों में भले ही मनुष्यों के गुण न पाए जाते हों पर मनुष्यों में पशु-पक्षियों के गुणों के दर्शन अवश्य ही होते हैं। यदि कुछ लोगों के क्रियाकलापों और चाल ढाल से हमें उनमें चतुर, फुर्तीले, साहसी वनराज “शेर” के दर्शन होते हैं तो राजनीति में अथवा हमारे आसपास ऐसे भी अनेक लोग हैं जिनमें हमें गधा, कुत्ता, बंदर, उल्लू, बाज अथवा चालाक लोमड़ी के गुण कूट कूट कर भरे हुए दिखाई देते हैं। आप सभी इस तरह की वर्तमान राष्ट्रीय विभूतियों से परिचित हैं इसलिए मैं किसी का नाम नहीं लेना चाहता।

पर्यावरणविद और पशु – पक्षी प्रेमी अनेक प्रजातियों के जीव – जंतुओं की संख्या में निरंतर आ रही गिरावट के कारण चिंतित हैं। विज्ञान के माध्यम से विलुप्त हो चुके जीवों को पुनर्जीवित करने और घट रहे जीवों को बचाने के तरह – तरह के उपाय खोजे जा रहे हैं। सनातन मान्यता है कि आत्मा सभी प्राणियों में एक ही है जो कभी नहीं मरती वरन कर्मों के आधार पर क्रमशः श्रेष्ठ योनि प्राप्त करती है। मुझे तो लगता है कि विलुप्त हो रहे प्राणी मनुष्यों के रूप में जन्म ले रहे हैं तभी तो मनुष्यों की संख्या में अपार वृद्धि हो रही है। आपको ऐसा नहीं लगता जैसे धरती से बिल्कुल समाप्त हो चुके डायनासोरों का पुनर्जन्म अमेरिका, रूस और चीन के राष्ट्रपतियों के रूप में हो रहा है ?

खैर, अभी हाल ही में मैंने जब एक समाचार पढ़ा कि मध्य प्रदेश में गधों की संख्या में भारी गिरावट आई है तो गधों के प्रति मेरा हृदय पीड़ा से भर गया। जब मध्य प्रदेश जैसा सौजन्यता व शांति से भरा क्षेत्र गधों को पसंद नहीं आ रहा और उनकी संख्या घट रही है तो देश के अन्य क्षेत्रों में भी इसमें अवश्य ही गिरावट दर्ज हुई होगी। समाचार में बताया गया है कि 27 वर्ष पहले मध्य प्रदेश में 49 हजार गधे थे जो आज घटकर मात्र 3052 रह गए हैं। प्रदेश के 9 जिले तो गधा विहीन घोषित हो चुके हैं। अब यहां किसी को ढेंचू – ढेंचू की आवाज सुनाई नहीं देती। नर्मदापुरम में सर्वाधिक 335 गधे हैं जबकि संस्कारधानी जबलपुर में मात्र 4 गधे बचे हैं। “न काहू से दोस्ती न काहू से बैर” भाव से शांति पूर्वक जीवन यापन करने वाले गधों के प्रति मेरे हृदय में गहरी संवेदना है। आखिर गधा कब तक और कितना अपमान सहे ? यदि किसी महिला या पुरुष को गाय की तरह सीधा कह दो तो वह इसे अपनी प्रशंसा अथवा सम्मान समझता है किंतु अगर उसे गधा कह दिया जाए तो उसका घोर अपमान समझा जाता है। शासन-प्रशासन ने तो गधा शब्द को असंसदीय शब्दों की सूची में डाल दिया है। शिक्षकों पर प्रतिबंध है कि वह किसी विद्यार्थी को गधा न बोले वरना उसे जेल भी जाना पड़ सकता है। मैं समझता हूं कि गधे में राग – द्वेष, मान-अपमान से परे पवित्र आत्मा का वास होता है। वह ईमानदार, कर्मठ, सहनशील और अहिंसक होता है। यदि गधा मोटी चमड़ी का असंवेदनशील प्राणी नहीं होता तो इतने घनघोर अपमान से अब तक तो इसकी पूरी नस्ल ही समाप्त हो गई होती। सरकार अनेक विलुप्त हो रहे हिंसक पशु – पक्षियों तक के संरक्षण के लिए चिंतित व प्रयासरत है। मेरा सरकार सहित पशु प्रेमियों से आग्रह है कि संसार के इस सीधे साधे प्राणी को बचाने के लिए भी युद्ध स्तर पर प्रयास शुरू करें क्योंकि यदि गधा नहीं होगा तो बुद्धिमानों की पहचान करना कठिन हो जाएगा। गधों पर शोध करने वाले वैज्ञानिकों का कहना है कि गधा बलिष्ठ होता है, यह 10 किलोमीटर दूर की गंध भी सूंघ सकता है, अपने चेहरे से भाव प्रकट करने की क्षमता भी इसके पास होती है। चीन में गधे की खाल से “एजियाओ” नामक दवा बनाई जाती है जिसके कारण हर साल लाखों गधों की हत्या की जाती है।

एक बात और है, कुछ चतुर लोग स्वेच्छा से “गधत्व” अपना लेते हैं उन्हें स्वयं को गधा घोषित करने अथवा कहलाने में कोई शर्म-संकोच नहीं होता। लोगों के बीच गधा घोषित हो जाने के फायदे भी हैं। काम के जानकार चतुर लोगों या कर्मचारियों के बीच ये आराम से रहते हैं, इन्हें कभी जिम्मेदारी से भरे महत्वपूर्ण कार्य नहीं सौंपे जाते। भोंदू बने रहने वाले, सार्वजनिक रूप से “गधा” घोषित इन लोगों की उपस्थिति को हानि रहित मानकर लोग खुलकर अधिकारियों की या अन्य महत्वपूर्ण लोगों की निंदा और गोपनीय बातें करते रहते हैं। गधे की खाल ओढ़े ऐसे व्यक्ति सुनी हुई इन बातों को इधर से उधर करके मौका मिलने पर चतुरों के कान काट लेते हैं। ऐसे बने बनाए गधों को ही “पंजीरी का भोग” प्राप्त होता है। वह जमाना गया जब गधे को शेर की खाल पहनना पड़ती थी, अब लोग गधे की खाल पहन कर अपना उल्लू सीधा कर रहे हैं। शायद आपको मालूम न हो कि गधों के कल्याण की भावना से 8 मई को विश्व गधा दिवस मनाया जाता है। भाइयो गधों की उपेक्षा नहीं करें, उनसे नफरत नहीं, प्रेम करे।

© श्री प्रतुल श्रीवास्तव 

संपर्क – 473, टीचर्स कालोनी, दीक्षितपुरा, जबलपुर – पिन – 482002 मो. 9425153629

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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