श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

(संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं अग्रज साहित्यकार श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव जी  के गीत, नवगीत एवं अनुगीत अपनी मौलिकता के लिए सुप्रसिद्ध हैं। आप प्रत्येक बुधवार को साप्ताहिक स्तम्भ  “जय  प्रकाश के नवगीत ”  के अंतर्गत नवगीत आत्मसात कर सकते हैं।  आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण एवं विचारणीय नवगीत “मीलों लंबी खामोशी है” ।)       

✍ जय प्रकाश के नवगीत # १२७ ☆ मीलों लंबी खामोशी है ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

तड़क भड़क है

खुली सड़क है

मीलों लंबी खामोशी है।

 

जंगल सारा

ऊँघ रहा है

चिड़िया गाती नहीं सवेरे

नभ के नीचे

मेघ उदासी

पहने बैठे घोर अँधेरे

हवा बाँटती

घूम रही है

ठिठुरन वाली मदहोशी है।

 

रात पहरुआ

चुप्पी साधे

उढ़ा रहा है भरी रज़ाई

दरवाज़ों से

झाँका करती

सन्नाटा पहने परछाई।

भीगे भागे

लम्हे अजब सी

साँस-साँस में सरगोशी है।

 

सरपट दौड़े

यहाँ ज़िंदगी

अपनेपन से दूर भागती

वीरानों में

पड़ी अकेली

दुख-दर्दों को रही बाँचती

यंत्र चलित

बन गया आदमी

इसके लिए कौन दोषी है।

***

© श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

सम्पर्क : आई.सी. 5, सैनिक सोसायटी शक्ति नगर, जबलपुर, (म.प्र.)

मो.07869193927,

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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