( प्रो डॉ राजेश ठाकुर जी का मंतव्य उनके ही शब्दों में – “पाखण्ड, अंध विश्वास, कुरीति, विद्रूपता, विसंगति, विडंबना, अराजकता, भ्रष्टाचार के खिलाफ़ जन-समुदाय को जागृत करना ही मेरी लेखनी का मूल प्रयोजन है…l” अब आप प्रत्येक शनिवार डॉ राजेश ठाकुर जी की रचनाएँ आत्मसात कर सकते हैं. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण रचना “तो जानें…“.)
(आज प्रस्तुत है गुरुवर स्व प्रोफ. श्री चित्र भूषण श्रीवास्तव जी द्वारा रचित – “कविता – रामचरित मानस…” । हमारे प्रबुद्ध पाठकगण स्वप्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ जी काव्य रचनाओं को प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकेंगे.।)
(डा. मुक्ता जीहरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य” के माध्यम से हम आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी की मानवीय जीवन पर आधारित एक विचारणीय आलेख भीड़ में हम अकेले। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की लेखनी को इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य # २९३ ☆
☆ प्रकृति शिक्षिका के रूप में… ☆
मानव व प्रकृति का संबंध अनादि व अखंड है। प्रकृति का सामान्य अर्थ है–समस्त चराचर में स्थित सभी वनस्पति,जीव व पदार्थ, जिनके निर्माण में मानव का हाथ नहीं लगा; अपने स्वाभाविक रूप में विद्यमान हैं। इसके अंतर्गत मनुष्य भी आ जाता है, जो प्रकृति का अंग है और शेष सृष्टि उसकी रंगभूमि है। सो! उसकी अन्त:प्रकृति उससे अलग कैसे रह सकती है? मनुष्य प्रकृति को देखता व अपनी गतिविधि से उसे प्रभावित करता है और स्वयं भी उससे प्रभावित हो बदलता-संवरता है; तत्संबंधी अनुभूति को अभिव्यक्त करता है। उसी के माध्यम से वह जीवन को परिभाषित करता है। मानव प्रकृति के अस्तित्व को हृदयंगम कर उसके सौंदर्य से अभिभूत होता है और उसे चिरसंगिनी के रूप में पाकर अपने भाग्य को सराहता है और उसे मां के रूप में पाकर अपने भाग्य को सराहता है।
मानव प्रकृति के पंचतत्वों पृथ्वी,जल,वायु,अग्नि, आकाश व सत्,रज,तम तीन गुणों से निर्मित है…फिर वह प्रकृति से अलग कैसे हो सकता है? जिन पांच तत्वों से प्रकृति का रूपात्मक व बोधगम्य रूप निर्मित हुआ है,वे सब इंद्रियों के विषय हैं। इन पांच तत्वों के गुण शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गंध ही असंख्य रूपों में मानव चेतना के कोश को कर्म, चिन्तन, कल्पना, भावना, भावुकता, संकल्प, जिज्ञासा, समाधान आदि से कितना समृद्ध किया है–इसका अनुमान मानव की उपलब्धियों से लगाया जा सकता है। प्रकृति का वैभव अपरिमित एवं अपार है। उसकी पूर्णता को न दृष्टि छू सकती है, न ही उसकी सीमाओं तक कान ही पहुंच सकते हैं और न ही क्षणों की गति को मापा जा सकता है। प्रकाश व शब्द की गति के साथ कौन दौड़ लगा सकता है? प्रकृति के अद्भुत् सामर्थ्य व निरंतर गतिशीलता के कारण उसमें देवत्व की स्थापना हो गयी तथा उसकी अतिन्द्रियता, अद्भुतता, उच्चता, गहनता आदि के कारण उसे विराट की संज्ञा प्रदान की गयी है। विराट में मानव,मानवेतर प्राणी व अचेतन जगत् का समावेश है। अचेतन जगत् ही प्रकृति है और जगत् का उपादान अथवा मूल तत्व है। वह स्वयंकृत, चिरंतन व सत्य है। उसका निर्माण व विनाश कोई नहीं कर सकता। प्रकृति के अद्भुत् क्रियाकलाप व अनुशासनबद्धता को देख कर मानव में भय, विस्मय, औत्सुक्य व प्रेम आदि भावनाओं का विकास हुआ, जिनसे क्रमश: दर्शन, विज्ञान व काव्य का विकास हुआ। सो! मानव मन में आस्था, विश्वास व आदर्शवाद जीवन-मूल्यों के रूप में सुरक्षित हैं और विश्व में हमारी अलग पहचान है। सम्पूर्ण विश्व के लोग भारतीय दर्शन से प्रभावित हैं। रामायण व महाभारत अद्वितीय ग्रंथ हैं और गीता को मैनेजमेंट गुरू स्वीकारा जाता है। उसे विश्व के विभिन्न देशों में पढ़ाया जाता है। यह एक जीवन-पद्यति है; जिसे धारण कर मानव अपना जीवन सफलतापूर्वक बसर कर सकता है।
प्रकृति हमारी गुरू है, शिक्षिका है, जो जीने की सर्वोत्तम राह दर्शाती है। प्रकृति हमारी जन्मदात्री मां के समान है और हमारी प्रथम गुरू कहलाती है और जो संस्कार व शिक्षा हमें मां से प्राप्त होती हैं, वह पाठ संसार का कोई गुरू नहीं पढ़ा सकता। प्रकृति हमें सुक़ून देती है; अनगिनत आपदाएं सहन करती है और हम पर लेशमात्र भी आँच नहीं आने देती। वह हमारी सहचरी है; सुख-दु:ख की संगिनी है। दु:ख की वेला में यह ओस की बूंदों के रूप में आंसू बहाती भासती है, जो सुख में मोतियों-सम प्रतीत होते हैं। इतना ही नहीं, दु:ख में प्रकृति मां के समान धैर्य बंधाती है।
प्रकृति हमें कर्मशीलता का संदेश देती है और उसके विभिन्न उपादान निरंतर सक्रिय रहते हैं।क्षरात्रि के पश्चात् स्वर्णिम भोर, अमावस के बाद पूनम व विभिन्न मौसमों का यथासमय आगमन समय की महत्ता व गतिशीलता को दर्शाता है। नदियाँ निरंतर परहिताय प्रवाहशील रहती हैं। इसलिए वे जीवन-दायिनी कहलाती हैं। वृक्ष भी कभी अपने फलों का रसास्वादन नहीं करते तथा पथिक को शीतल छाया प्रदान करते हैं। वे हमें आपदा के लिए संचय करने को प्रेरित करती है। जैसे जल के अभाव में वह बंद बोतलों में बिकने लगा है। बूंद-बूंद से सागर भर जाता है और जल को बचा कर हम अपने भविष्य को सुरक्षित कर सकते हैं। वायु भी पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध है। परंतु मानव की बढ़ती लालसाओं ने जंगलों के स्थान पर कंक्रीट के महल बनाकर पर्यावरण-प्रदूषण में बहुत वृद्धि की है, जिसका विकराल रूप हमने कोरोना काल में आक्सीजन की कमी के रूप में देखा है; जिसके लिए लोग लाखों रुपये देने को तत्पर थे। परंतु उसकी अनुपलब्धता के कारण लाखों लोगों को अपने प्राण गंवाने पड़े। काश! हम प्रकृति के असाध्य भंडारण व असाध्यता का अनुमान लगा पाते कि वह हमें कितना देती है? हम करोड़ों-अरबों की वायु का उपयोग करते हैं; अपरिमित जल का प्रयोग करते हैं; वृक्षों का भी हम पर कितना उपकार है, जिसकी हम कल्पना भी नहीं कर सकते। वे कार्बन-डॉयोक्साईड लेकर हमें आक्सीजन देते हैं। इतना ही नहीं, वे हमें अन्न व फल-फूल देते हैं, जिससे हमें जीवन मिलता है।
मानव व प्रकृति का संबंध अटूट, चिरंतन व शाश्वत् है। प्रकृति विभिन्न रूपों में हमारे सम्मुख बिखरी पड़ी है। प्रकृति के कोमल व कमनीय सौंदर्य से प्रभावित होकर कवि उसे कल्पना व अनुभूति का विषय बनाता है, जो विभिन्न काव्य- रूपों में प्रकट होती है। यदि हम हिन्दी साहित्य पर दृष्टिपात करें, तो प्रकृति हर युग में मानव की प्रेरणा-शक्ति ही नहीं रही, उसकी चिर-संगिनी भी रही है। वैदिक-कालीन सभ्यता का उद्भव व विकास प्रकृति के उन्मुक्त प्रांगण में हुआ। मंत्रदृष्टा ऋषियों ने प्रकृति के प्रति जहां अनुराग व्यक्त किया, वहीं उसके उग्र,रम्य व मानवीकरण आदि रूपों को अपनाया। ऋग्वेद मानव सभ्यता का प्राचीनतम ग्रंथ है। प्रकृति के दिव्य सौंदर्य से अभिभूत होकर जहां मानव उसके उन्मुक्त सौंदर्य का बखान करता है; वहीं विराट के प्रति भय, विस्मय श्रद्धा आदि की अनुभूतियों में अनंत सौंदर्य का अनुभव करता है। वाल्मीकि का प्रकृति-जगत् के कौंच-वध की हृदय-विदारक घटना से उद्वेलित आक्रोश व करुणा से समन्वित शोक का प्रथम श्लोक रूप में प्रस्फुरण इस तथ्य की पुष्टि करता है कि भावातिरेक या अनुभूति की तीव्रता ही कविता की मूल संजीवनी शक्ति है। महाभारत में प्रकृति केवल पर्वत, वन, नदी आदि का सामान्य ज्ञान कराती है। नल दमयंती प्रसंग में वह प्रकृति से संवेदनात्मक संबंध स्थापित न कर, स्वयं को अकेला व नि:सहाय अनुभव करती है।
कालिदास को बाह्य-जगत् का सर्वश्रेष्ठ कवि स्वीकारा जाता है। उनका प्रकृति-चित्रण संस्कृत साहित्य में ही नहीं, विश्व साहित्य में दुर्लभ है। वे प्रकृति को मूक, चेतनहीन व निष्प्राण नहीं मानते, बल्कि वे उसमें मानव की भांति सुख- दु:ख व संवेदनशीलता अनुभव करते हैं। इस प्रकार अश्वघोष, भवभूति, भास, माघ, भारवि, बाणभट्ट आदि में प्रकृति का व्यापक रूप में वर्णन हुआ है।
हिन्दी साहित्य के आदिकाल अथवा पूर्व मध्य-कालीन काव्य में प्रकृति का उपयोग पृष्ठभूमि, उद्दीपन व उपमानों के रूप में हुआ। विद्यापति के काव्य में प्रकृति कहीं-कहीं उपदेश देती भासती है और आत्मा परमात्मा में इस क़दर लीन हो जाती है, जैसे समुद्र में लहर और भौंरों का गुंजन नायिका को मान त्यागने का संदेश देता भासता है। वियोग में उनका बारहमासा वर्णन द्रष्टव्य है।
पूर्व मध्यकालीन काव्य में प्रकृति उन्हें माया सम भासती है तथा उन्होंने भावाभिव्यक्ति के लिए प्रकृति के विभिन्न रूपों को अपनाया है। कबीरदास जी ‘माली आवत देखि के, कलियन करि पुकार/ फूलि-फलि चुनि लहि, कालहि हमारी बारि’ के माध्यम से मानव को नश्वरता का संदेश देते हैं। दूसरी ओर ‘तेरा सांई तुझ में, ज्यों पुहुपन में वास/ कस्तूरी का मृग ज्यों फिरि-फिरि ढूंढे घास’ के माध्यम से वे मानव को संदेश देते हैं कि ब्रह्म पुष्पों की सुगंध की भाति घट-घट में व्याप्त है, परंतु अज्ञान के कारण बावरा मानव उसे अनुभव नहीं कर पाता और मृग की भांति वन-वन में ढूंढता रहता है। प्रेममार्गी शाखा के प्रवर्त्तक जायसी के काव्य में प्रकृति के उपमान, उद्दीपन व रहस्यात्मक रूपों का चित्रण हुआ है। वे चराचर प्रकृति में ब्रह्म के दर्शन करते हैं। समस्त जड़-चेतन प्रकृति में प्रेमास्पद के प्रतिबिंब को निहारते व अनुभव करते हैं। ‘बूंद समुद्र जैसे होइ मेरा/ मा हिराइ जस मिले न हेरा।’ जिस प्रकार बूंद समुद्र में मिलकर नष्ट हो जाती है,उसी प्रकार आत्मा भी ब्रह्ममय हो जाती है।
रामभक्ति शाखा के कवि तुलसीदास की वृत्ति प्रकृति-चित्रण में अधिक नहीं रमी, तथापि उनका प्रकृति-चित्रण स्वाभाविक बन पड़ा है। प्रकृति उनके काव्य में उपमान व उद्दीपन रूप में नहीं आयी, बल्कि उपदेशिका के रूप में आयी है। संयोग में वर्षा व बादलों की गर्जना होने पर पशु-पक्षी व समस्त प्रकृति जगत् उल्लसित भासता है और वियोग में मन की अव्यवस्थित दशा में मेघ-गर्जन भय संचरित करते हैं। मानवीकरण में मनुष्य का शेष सृष्टि के साथ रागात्मक संबंध स्थापित हो जाता है और मानव उसमें अपनी मन:स्थिति के अनुसार उल्लास, उत्साह, आनंद व शोक की भावनाएं- क्रियाएं आरोपित करता है। राम वन के पशु-पक्षियों से सीता का पता पूछते हैं। तुलसी सदैव लोक- कल्याण की भावना में रमे रहे और प्रकृति से उपदेश-ग्रहण की भावना में उन पर श्रीमद्भागवत् का प्रभाव द्रष्टव्य है–’आन छोड़ो साथ जब, ता दिन हितु न होइ/ तुलसी अंबुज अंबु बिनु तरनि, तासु रिपु होइ।’ जब कुटुम्बी साथ छोड़ देते हैं, तो संसार में कोई भी हितकारी नहीं रह पाता। कमल का जनक जल जब सूख जाता है, तो उसका मित्र सूर्य भी उसे दु:ख पहुंचाता है।
कृष्ण भक्ति शाखा के अतर्गत सूर, नंददास, रसखान आदि को कृष्ण के कारण प्रकृति अति प्रिय थी। प्रकृति का आलंबन, उद्दीपन व आलंकारिक रूप में चित्रण हुआ है। वियोग में प्रकृति गोपियों को दु:ख पहुंचाती है और वे मधुवन को हरा-भरा देख झुंझला उठती हैं– ‘मधुबन! तुम कत रहत हरे/ विरह-वियोग स्याम सुंदर के ठाढ़ै,क्यों न जरे।’ कहीं-कहीं वे प्रकृति में उपदेशात्मकता का आभास पाते हैं और संसार के मोहजाल को भ्रमात्मक बताते हुए कहते हैं–’यह जग प्रीति सुआ, सेमर ज्यों चाखत ही उड़ि जाय।’ तोते को सेमर के फूल में रूई प्राप्त होती है और वह उड़ जाता है। सूर ने प्रकृति के व्यापारों का मानवीय व्यापारों से अतु्लनीय समन्वय किया है।
उत्तर मध्यकालीन को प्राकृतिक सौंदर्य आकर्षित नहीं कर पाता। बिहारी को गंवई गांव में गुलाब के इत्र का कोई प्रशंसक नहीं मिलता। केशव को प्राकृतिक दृश्यों के अंकन का अवसर मिला,परंतु वे अलंकारों में उलझे रहे। बिहारी सतसई में जहां मानवीकरण व आलंबनगत रूप चित्रण हुआ, वहीं पर नैतिक शिक्षा के रूप में अन्योक्तियों का आश्रय लिया गया है। इनके प्रकृति-चित्रण में हृदय-स्पर्शिता का अभाव है। सो! प्रकृति उद्दीपन व उपमान रूप में हमारे समक्ष है। ‘ नहीं पराग,नहीं मधुर मधु,नहीं विकास इहिं काल/ अलि कली ही सौं बंध्यौ,आगे कौन हवाल’ के माध्यम से राजा जयसिंह को सचेत किया गया है। ‘जिन-जिन देखे वे सुमन, गयी सो बीति बहार/ अब अलि रही गुलाब की, अपत कंटीली डार।’ यह उक्ति सम्पत्ति-विहीन व्यक्ति के लिए कही गयी है तथा भ्रमर को माध्यम बनाकर प्राचीन वैभव व वर्तमान की दरिद्रावस्था का बखूबी चित्रण किया गया है।
भारतेन्दु युग आधुनिक युग का प्रवेश-द्वार है और इसमें नवीन व प्राचीन काव्य-प्रवृत्तियों का समन्वय हुआ है। प्रकृति मानवीय भावनाओं के अनुरूप हर्ष-विषाद को अतिशयता प्रदान करती, वियोगियों को रुलाती तथा संयोगियों को उल्लसित करती है। इनका बारहमासा वर्णन विरहिणी की पीड़ा को और बढ़ा देता है तथा कहीं-कहीं प्रकृति उपदेश देती भासती है। ‘ताहि सो जहाज को पंछी सब गयो,अहो मन होई’ (भारतेन्दु ग्रंथावली)। अत:जीव जहाज़ के पक्षी की भांति पुन: ब्रह्म में मिलने का प्रयास करता है। बालमुकुंद जी के हृदय में प्रकृति के प्रति सच्चा अनुराग है, जो आलंबन, उद्दीपन व उपमान रूप में उपलब्ध है।
द्विवेदी युगीन कवियों ने प्रकृति को काव्य का वर्ण्य-विषय बनाया है तथा प्रकृति का स्वतंत्र चित्रण किया है। श्रीधर पाठक, रूपनारायण पाण्डेय, रामनरेश त्रिपाठी आदि ने आलंबनगत चित्र प्रस्तुत किए हैं तथा स्वतंत्रतावादी कवियों ने रूढ़ रूपों को नहीं अपनाया, बल्कि जीवन के विस्तृत क्षेत्र में उसके साधारण चित्रमय, सजीव व मार्मिक रूप प्रदान किए हैं। पाठक ने कश्मीर सुषमा, देहरादून आदि कविताओं में प्रकृति के मनोरम चित्र उपलब्ध हैं। शुक्ल जी ने प्रकृति के आलंबन व त्रिपाठी ने पथिक व स्वप्न खंड काव्यों में प्रकृति का मार्मिक चित्रण किया है। हरिऔध ने जहां ऐंद्रिय सुख की अनुभूति की, वहीं प्रकृति से उपादान ग्रहण कर नायिका के सौंदर्य का वर्णन किया है। मैथिलीशरण गुप्त जी के साकेत, पंचवटी, यशोधरा आदि काव्यों में मनोरम प्राकृतिक चित्रण उपलब्ध है। पंचवटी में प्रकृति की अपूर्व झांकी दिखाई देती है और प्रकृति मानव के साथ क्रिया-प्रतिक्रिया रूप में संबंध स्थापित करती है। साकेत में प्रकृति का मानव व मानवेतर जगत् से तादात्म्य स्थापित हो जाता है। वे प्रकृति को सद्गुणों से परिपूर्ण मानते हैं– ‘सर्वश्रद्धा, क्षमा व सेवा की, ममता की वह धर्म में भी प्रतिमा/ खुली गोद में जो उसकी, समता की वह प्रतिमा।’ प्रकृति ममतामयी मां है, जो समभाव से सब पर अपना प्रेम व ममत्व लुटाती है।उपदेशिका की भांति मानव में उच्च विचार व सदाशयता के भाव संचरित करती है। वे भारतीयों में राष्ट्रीय-चेतना के भाव जाग्रत करते हुए ओजपूर्ण शब्दों में कहते हैं—‘पृथ्वी, पवन, नभ, जल, अनल सब लग रहे काम में/ फिर क्यों तुम्ही खोते हो, व्यर्थ के विश्राम में।’ कवि ने सर्वभूतों को सर्वदा व्यस्त दिखाते हुए देशवासियों को आलस्य त्यागने व जाग्रत रहने का संदेश दिया है। रामनरेश त्रिपाठी के काव्य में प्रकृति के सुंदर, मधुर, मंजुल रूप प्रकट होते हैं, उग्र नहीं। वे प्रकृति से तादात्म्य स्थापित करते हुए मानव-व्यापारों व मानव- संवेदना का आभास पाते हैं।
छायावाद में प्रकृति को स्वछंद रूप प्राप्त हुआ है और उसका उपयोग आध्यात्मिक भावों के प्रकाशन के लिए हुआ है। प्रकृति कवि की चेतना, प्रेरणा व स्पंदन है। इसलिए छायावाद को प्रकृति काव्य के नाम से अभिहित किया गया है।यदि प्रकृति को छायावाद से निकाल दिया जाए, तो वह पंगु हो जाएगा। प्रसाद ने प्रकृति में चेतना का अनुभव किया और वह मधुर, कोमल व सुकुमार भावनाओं की अभिव्यक्ति का साधन बन गयी, परंतु कवि ने कामायनी में प्रकृति के भयावह, विकराल व विराट आदि रूपों का दर्शन किया है। वे प्रकृति को सचेतन व सजीव मानकर उसमें अलौकिक सत्ता का दर्शन करते हैं तथा समस्त सृष्टि के कार्य-व्यापारों को सर्वोत्तम शक्ति द्वारा अनुप्राणित स्वीकारते हैं। प्रसाद ने संसार को रंगभूमि मानते हुए कहा है कि मानव यहां अपनी शक्ति के अनुसार संसार रूपी घोंसले में अपनी शक्ति के अनुसार ठहर सकता है, ‘शक्तिशाली विजयी भव’ का संदेश देता है। पंत प्रकृति के उपासक ही नहीं, अनन्य मित्र थे। उनके काव्य में मानव और प्रकृति का एकात्म्य हो जाता है। मधुकरि का मधुर राग उन्हें मुग्ध करता है और वे ‘सिखा दो न हे मधुप कुमारि/ मुझे भी अपने मीठे गान'(पल्लविनी)। वे प्रकृति के सहचरी, देवी, सखी, जननी आदि रूपों को काव्य में चित्रित करके उनमें अलौकिक सत्ता का आभास पाते हैं और प्रकृति उन्हें प्रेरणा प्रदान करती है।
निराला के काव्य में प्रकृति के चित्र दिव्य, समृद्ध व रहस्यात्मक रूप में आए हैं। उनके काव्य में दो तत्वों की प्रधानता है-रहस्यवाद व मानवीकरण। उनके काव्य विराटता व उदात्तता की दृष्टि से सराहनीय हैं। प्रकृति उसे सजीव प्राणी की भांति अपना रूप दिखाती, हाव-भावों से मुग्ध करती, संवेदना प्रकट करती उत्साहित करती है। इस प्रकार प्रकृति व मनुष्य का तादात्म्य हो जाता है। बादल प्रकृति को हरा-भरा कर देते हैं, जिससे प्रेरित होकर प्रकृति कर्त्तव्य- पथ पर अग्रसर होने का संदेश देती है।
महादेवी वर्मा सृष्टि में सर्वत्र दु:ख देखती हैं। प्रकृति उनके लिए सप्राण है तथा वे मानव व प्रकृति के लिए एक प्रकार की अनुभूति, सजीवता, विश्रंखलता, आत्मीयता व व्यापकता का अनुभव करती हैं। वे संसार में प्रियतम को ढूंढती हैं । वे कभी प्रेम भाव में बिछ जाती हैं और जब प्रियतम अंतर्ध्यान हो जाते हैं, वे निराश होकर दु:ख-दैन्य भाव को इस प्रकार व्यक्त करती हैं—‘मैं फूलों में रोती, वे बालारुण में मुस्काते/ मैं पथ में बिछ जाती,वे सौरभ सम उड़ जाते।’ वे प्रकृति के चतुर्दिक प्रियतम के संदेश का आभास पाती हैं और प्रश्न कर उठती हैं — ‘मुस्काता प्रेम भरा नभ,अलि! क्या प्रिय आने वाले हैं?’ वे जीवन को संध्या से उपमित करती हैं ‘प्रिय सांध्य गगन मेरा जीवन’ ‘मैं नीर भरी दु:ख की बदली’ के माध्यम से वे प्रकृति से तादात्म्य स्थापित करती हैं। वेएक ओर प्रकृति में विराट की छाया देखती हैं और दूसरी ओर अपना प्रतिबिंब पाती हैं। वै छायावाद का आधार स्तंभ-मात्र नहीं हैं, रहस्य व अरूप की साधिका रही हैं।
प्रगतिवाद भौतिकवादी दर्शन है, जिस पर मार्क्सवाद का प्रभाव था। समस्त सृष्टि का विकास दो वस्तुओं के संघर्ष से होता है, जो द्वंद्व का परिणाम है। यह वैज्ञानिक दर्शन है, जिसमें भावुकता के स्थान पर बुद्धि को स्वीकारा गया है।यह यथार्थवाद पर आधारित है। इन कवियों को जीवन से अनुरक्ति है और प्रकृति से प्रेम है।उन्होंने प्रकृति के उपेक्षित तत्वों व पात्रों को महत्व दिया है और प्रकृति उनके लिए शक्ति- प्रणेता है। वे दिन-रात व ऋतु-परिवर्तन को देख जीवन के विकास के लिए परिवर्तन-शीलता को अनिवार्य मानते हैं। इनके गीतों पर लोकगीतों कि प्रभाव द्रष्टव्य है।
प्रयोगवादी कविता में प्रकृति के भावात्मक स्वरूप का ग्रहण हुआ अबोध बालक की तरह ईश्वर, प्रकृति, जीवन-सौंदर्य के विभिन्न स्तरों पर प्रश्न करता है। इन कवियों ने जहां प्रकृति के उपेक्षित व वैज्ञानिक स्वरूपों को ग्रहण किया है,
वहीं प्रकृति में दैवीय सत्ता का आभास न पाकर , भौतिकता के संदर्भ में एक शक्ति के रूप में स्वीकारा गया है। इनका दृष्टिकोण भावात्मक न होकर, बौद्धिक है और प्रकृति के उपेक्षित स्वरूप(कुत्ता, गधा,चाय की प्याली, चूड़ी का टुकड़ा, प्लेटफार्म, धूल, साइरन) को काव्य का विषय बनाया।इन्होंने असुंदर, भौंडे, भदेस आदि में सौंदर्य के दर्शन किए तथि युगबोध के अनुकूल प्रकृति का चित्रण किया। इन्होंने जहां प्रकृति को अपनी मानसिक कुंठाओं की अभिव्यक्ति का साधन बनाया, वहां नवीन उपमानों, बिम्बों को अपने काव्य में प्रतिष्ठित किया तथा मानवीकरण कर मनोरम चित्रण किया है।
नयी कविता प्रयोगवाद का विकसित चरण है तथा इसमें उपलब्ध प्रकृति चित्रण की विशेषता है–ग्राम्य चित्रपटी की अवधारणा। नयी कविता वाद मुक्त है तथा वे जो भी मन में आता है, कहते हैं। वे क्षणवादी हैं और हर पल को जी लेना चाहते हैं,क्योंकि वे भविष्य के प्रति आश्वस्त नहीं हैं। उनमें एक दर्शन का अभाव है। कई बार उन्हें प्रकृति के विभिन्न रूप स्पंदनहीन भासते हैं और उन्हें अपने अस्तित्व के बारे में शंका होने लगती है। नये कवियों की विषय-व्यापकता, नया भाव-बोध तथा नवीन दृष्टिकोण सराहनीय है। सो! प्रकृति व मानव का संबंध अनादि काल से शाश्वत् व अटूट रहा है। वह हर रूप में आराध्या रही है। परंतु जब-जब मानव ने प्रकृति का अतिक्रमण किया है, उसने अपना प्रकोप व विकराल रूप दिखाया है, जो प्राकृतिक प्रदूषण व कोरोना के रूप में हमारे समक्ष है। इन असामान्य परिस्थितियों में मानव नियति के सम्मुख विवश व असहाय भासता है।
(डॉ भावना शुक्ल जी (सह संपादक ‘प्राची‘) को जो कुछ साहित्यिक विरासत में मिला है उसे उन्होने मात्र सँजोया ही नहीं अपितु , उस विरासत को गति प्रदान किया है। हम ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि माँ सरस्वती का वरद हस्त उन पर ऐसा ही बना रहे। आज प्रस्तुत हैं एक विचारणीय कथा – प्रायश्चित।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ # २९४ – साहित्य निकुंज ☆
☆ कथा कहानी – प्रायश्चित ☆ डॉ भावना शुक्ल ☆
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रात का समय मूसलाधार बारिश जोरों पर थी। हवा में नमी और सन्नाटा घुला हुआ था। अचानक दरवाजे पर दस्तक हुई, मैं सोच में पड़ गया- इतनी रात को कौन आया होगा? मम्मी-पापा तो दो हफ्ते बाद लौटकर आने वाले हैं फिर भी दरवाजे की दस्तक की ओर चलता चला गया। दरवाज़ा डबल डोर का है, पहला डोर खोला सामने बारिश में भीगी हुई लड़की खड़ी थी।
उसने झिझकते हुए पूछा-“माफ कीजिएगा, मैंने आपको इतनी देर रात तकलीफ दी, मेरी गाड़ी रास्ते में खराब हो गई है, क्या यहाँ मैं थोड़ी देर रुक सकती हूँ? तेज बारिश हो रही है, बारिश रुकते ही मैं यहाँ से चली जाऊंगी। “
मेरा मन सोचने लगा- किसी अजनबी को भीतर बुलाना ठीक है या नहीं, फिर मन विचार करने लगा कि किसी की मदद करना ही इंसानियत है अगर इनकी जगह कहीं मेरी बहन और बेटी ऐसी स्थिति में होगी तो, अचानक यह सोचकर चेहरे में नरमी आ गई।
मेरे मन में मानवता के बीज कूट-कूटकर भरे थे, दरवाज़ा खोलते हुए मैंने कहा-“आइए, अंदर आ जाइए; बाहर तो सचमुच तेज बारिश हो रही है।
आते ही उसने पूछा, ‘वॉशरूम कहाँ है’?
मैंने उसे वॉशरूम का रास्ता बताया…, वह अपना बैग लेकर के वॉशरूम चली गई। जब वह लौट कर आई तब उसने साड़ी की जगह सूट पहन रखा था।
मैंने तुरंत ही उसके लिए गरमा-गरम चाय बनाई और कहा- इसे पीकर आपको राहत मिलेगी।
इस पर उसने-थैंक्स कहा।
कुछ देर हम लोग यूं ही चुपचाप बैठे रहे, थोड़ी देर बाद मैंने पूछा- “आप कहां से आ रही हैं, कहां जा रही हैं? “
उसने जवाब में कहा- “मैं कानपुर से लखनऊ जा रहीहूँ। “
“इतनी रात को आप अकेली कार ड्राइव कर रही हैं? ”
“नहीं, मेरे साथ मेरा ड्राइवर है, जो गाड़ी में ही है। “
अनायास ही मैंने पूछ लिया- “आपका नाम क्या है? “
वहाँ से आवाज आई- “जी, मेरा नाम नेहा है। और आपका…? ”
“जी, मेरा नाम शांतनु है। “
नेहा नाम सुनते ही मन में एक भूचाल-सा आ गया, सारे पन्ने पलटने लगे, तब मैंने दोहरया- “नेहा नाम है आपका। “
वह बोली- “क्या बात है? नेहा नाम से आपका कोई पुराना रिश्ता है क्या? “
“जी… ऐअस अहि कुछ समझ लीजिये। “
उसने कहा- “शांतनुजी! क्या बात है आप कुछ सोच में पड़ गए। “
“नेहा का मतलब स्नेह होता है नेह करना होता है, इतना बुरा भी मतलब नहीं है। “ …हा…हा…हा…। “
चाय का घूँट “पीते-पीते नेहा ने कहा-” आप ठीक तो है शांतनु जी, अनायास आपके चेहरे में उदासी आ गई जैसे कोई दर्द दबा हो आपके सीने में… कोई और बात जहन में हो और उस बात को शेयर करने से आपका मन हल्का हो सकता हो तो मैं सुनना चाहूंगी। “
चाय की भाप, मिट्टी की सौंधी खुशबू और बारिश की रिमझिम फुहार के बीच मैंने गहरी सांस ली और कहा– “नेहा जी, अब अतीत में जाने का साहस नहीं होता, मन घबरा जाता है। अतीत को मैं पीछे छोड़ आया हूँ। अतीत अब बहुत परे है लेकिन आज आपके इस नाम ने मेरे जीवन में फिर हलचल मचा दी। पता नहीं क्यों आपको सब कुछ बताने को मन हो रहा है।
उसने कहा- “आप मुझे एक दोस्त की तरह समझिए। “
“मेरे जीवन की कहानी का पहला पन्ना उस दिन प्रारंभ हुआ यानी 12 साल पहले, मेरी मामी मौसी जी के साथ शॉपिंग करने गई थे। वहीँ वे लोग एक चाट के ठेले पर चाट खाने के लिए रुक गए।
तभी वहाँ पर एक बहुत ही प्यारी खूबसूरत लड़की और उसकी माँ भी उसी ठेले पर चाट खाने आई, उसकी खूबसूरती देखकर मामी से रहा नहीं गया और उन्होंने पूछ लिया- “बेटी, क्या नाम क्या है तुम्हारा? “
उसने जवाब दिया- “नेहा। “
मामी ने कहा…”अरे वाह! बहुत ही प्यारा नाम है। “
मामी ने उसकी मम्मी से पूछा- “बिटिया की पढ़ाई-लिखाई हो गई? अब शादी भी करनी होगी। “
उसकी मम्मी ने कहा- “हाँ ज़रूर, कोई ब्राह्मण परिवार का अच्छा लड़का मिले तो सही। “
मामी ने जैसे ही यह सुना उनकी आँखों में चमक आ गई, तुरंत उनकी आँखों के सामने मेरा चेहरा झूलने लगा होगा, तभी उन्होंने कहा- “दीदी का कितना प्यारा बेटा है, जोड़ी कितनी सुंदर लगेगी? ”
तुरंत मामी ने उनसे कहा- “आप हमें अपना मोबाइल नंबर दे दीजिए, हमारी नजर में कोई लड़का होगा तो आपको फोन करेंगे, वैसे हम भी ब्राह्मण हैं। “
उन्होंने धन्यवाद कहा और बोला- “हम आपके फोन का इंतजार करेंगे। “
मामी का मन इतना खुश था, सोचा- जल्दी-जल्दी यहाँ से सीधे दीदी के घर जाते हैं और उन्हें सारी बातें बताते हैं। वह कितनी खुश होंगी, कितने दिनों से शांतनु के लिए लड़की ढूंढ रही हैं, शायद किस्मत में यही लड़की हो।
घर पहुंचकर मामी ने सारी बातें माँ को बताई तोवे बहुत खुश हुई।
उन्होंने कहा- “अब तुम लोग ही समझो, तुम्हें ही करना है। तुम ही इसके मामा-मामी हो, जो करोगे अच्छा ही करोगे। “
मामी ने कहा- “ठीक है दीदी, एक बार अभी फोन कर लेते हैं। फिर कल उनसे मिल कर बात करते हैं। “
माँ ने कहा-‘जैसा तुम ठीक समझो। ‘
मामी ने उन्हें कॉल लगाया, उन्होंने बड़ी ही विनम्रता के साथ बातचीत की, आगे मिलने का प्रोग्राम बनाया।
अगले दिन वेलोग हमारे घर आये, सारी बातें हो गई। लड़की की फोटो भी लेकर आयेथे। कुंडली के विषय में विचार किया कि अब उम्र 30 के पार हो चुकी है तो कुंडली मिलाने का कोई मतलब नहीं।
शीघ्र ही सगाई की तारीख निकाली गई।
मुझे लड़की की फोटो दिखा दी गई। मैंने लड़की को देखने या मिलने की इच्छा प्रकट नहीं की, बस इतना कहा- “जब आप लोगों को पसंद है, मामी ने देख ही रखी है तो मेरे देखने का क्या मतलब? सगाई वाले दिन ही देख लेंगे। “
मामी ने माँ से कहा- ”शांतनु का शादी से मन उचट चुका था क्योंकि इसके पहले एक जगह शांतनु की शादी तय हो चुकी थी, सगाई भी हो गयी थी। शादी वाले दिन ही शांतनु बारात लेकर गए और लड़की पीछे के दरवाजे से घर से गायब थी। बाद में पता चला कि उसके माता-पिता जबरदस्ती उसकी शादी कर रहे थे जबकि वह किसी और को प्यार करती थी। तब से शांतनु के मन में शादी करने की इच्छा नहीं थी फिर भी माता पिता की खुशी के लिए उसने हाँ कर दी है। “
एक दिन हम लोगों ने लड़की वाले के यहाँ जाने का दिन निश्चित किया दीदी को लड़की दिखाई। दीदी को लड़की बहुत पसंद आई। लड़की की माँ ने अच्छे से स्वागत-सत्कार किया। पता चला- लड़की के पिताजी नहीं हैं। एक भाई है और माँ ही सब फर्ज अदा कर रही है।
दीदी ने कहा- “आप चिंता मत करिए, सगाई और शादी का इंतजाम हम लोग करेंगे, आप तो सिर्फ़ विदाई की तैयारी रखिये। हम लोगों को दहेज में भी कुछ नहीं चाहिए, इतनी प्यारी लड़की हमें मिल रही है हमें और क्या चाहिए? ”
वह दिन भी आ गया जब सगाई होनी थी। सगाई का कार्यक्रम बहुत अच्छी तरह से संपन्न हो गया, हम सभी लड़की देख कर, मिलकर प्रसन्न हो गए।
शादी को अभी एक माह था। हम दोनों ने एक-दूसरे का फोन नंबर ले लिया।
दिन भर में रोज एक बार फ्री होकर एक-दूसरे से बात करते, एक-दूसरे को जानने-समझने की कोशिश कर रहे थे। फोन पर बात करते-करते दोनों में इतनी प्रगाढ़ता हो गई कि लगने लगा- हमको अब जल्दी ही शादी हो जाए।
एक दिन मैं अपने कुछ दोस्तों के साथ घूमने जारहा था, तभी नेहा से कहा-“अगर संभव हो तो तुम भी आ जाओ, साथ में कुछ देर रह लेंगे। “
नेहा तुरंत तैयार हो गई और हम एक गार्डन में पहुंच गए। मैंने अपने दोस्तों से नेहा को मिलवाया और आपस में बातचीत की, घूमे-फिरे, वहीं खाना खाया, मौज-मस्ती की। जब चलने का समय आया तबनेहा ने मुझसे कहा- “क्यों न हम दोनों आज की रात यहीं रुक जाए, यहाँ रुकने के लिए होटल भी है। “
यह सुनकर मैं आश्चर्य चकित रहा गया, मैंने कहा- “नहीं… नहीं…, शादी के पहले यह सही नहीं है। “
तब नेहा ने कहा, “इसमें ग़लत ही क्या है, हम दोनों की सगाई हो चुकी है, 10 दिन बाद शादी होने वाली है, क्या फर्क पड़ता है? “
इतना कहने के साथ ही वह मेरे नजदीक आने लगी। तभी मैंने उसे धक्का देकर रोकनाचाहा, और कहा- “क्या कर रही हो, यह अच्छा नहीं लगता, थोड़ा सब्र करो। सब्र का फल मीठा होता है। “
फिर मैंने अपने दोस्तों से कहा- “अब हमें चलना चाहिए, रात होने वाली है। “ रास्ते में नेहा को उसके घर के नजदीकी छोड़ दिया। नेहा भी भारी मन से बाय कह कर चली गई।
रात भर नींद नहीं आई, मैं यही सोचता रहा- यह लड़की अपने आप को रोक क्यों नहीं पा रही थी। फिर सोचा पहली बार मिले हैं, उसको मुझसे बात करते-करते इतना लगाव हो गया कि उससे रहा नहीं जा रहा। नहीं-नहीं उसकी कोई गलती नहीं है। अपने आप को दोषी ठहराते हुए अपने मन में कहा- “मैंने बहुत ग़लत तरीके से नेहा को डांटा, पता नहीं बेचारी क्या सोचती होगी। अब मैं सुबह होने का इंतजार कर रहा था, कब सुबह हो औरनेहा को कॉलकरूँ…।
आँखों ही आँखों में सुबह हो गई, सुबह होते ही नेहा को फोन किया। नेहा ने अनमने भाव से बात की। मैंने माफी मांगते हुए कहा- “बस नेहा! थोड़े ही दिन की बात और है, थोडा और इंतजार करो।
वह दिन आ ही गया जब जिसका सभी को इंतजार था। धूमधाम से बाजे-गाजे के साथ बरात गयी।
सभी ने बहुत आनंद लिया। जयमाला के समय बहुत ही आनंद आया। मेरी हाइट बहुत ज़्यादा थी और नेहा की अपेक्षाकृत कम। चार-छह लोग लड़की को उठाने में लगे। तभी दोस्तों ने मुझे और ऊपर उठा लिया। जैसे-तैसे जयमाला का कार्यक्रम हंसी-खुशी संपन्न हुआ।
रात भर शादी की रस्में चली, विदा का कार्यक्रम हुआ, सभी का मन दु:खी हो गया लेकिन मैं बहुत खुश था कि आज नेहा के रूप में कोई प्यार करने वाला मिला है, कोई समझने वाला मिला है।
घर पर बहू के आने पर सारी वैवाहिक विधियाँ संपन्न हुई और अब वह समय आ गया जिसका मुझे बेसब्री से इंतजार था। दोस्तों ने मिलकर कमरा बहुत अच्छी तरह से सजाया और ऑल द बेस्ट कहकर मुझे कमरे में धक्का दे दिया। कमरे में पहुंचते ही मैंने देखा- नेहा घूंघट में बैठी हुई है। मुझे देखते ही वह खड़ी हो गई। मैंने कहा- “अरे नेहा, तुम बैठो। “
नेहा बहुत निरीह भाव से मेरी ओर देखती रही।
मैंने कहा-“क्या हुआ इस तरह क्यों देख रही हो, अब तो मैं तुम्हारा हो गया। जिसका तुम्हें बेसब्री से इंतजार था…। “
नेहा उठी और मेरे पैर छुए, मैंने उसे उठाया तो उसका चेहरा देखते ही हैरान हो गया। वह रो रही थी।
मैंने पूछा-“नेहा! तुम रो क्यों रही हो? ”
नेहा ने कहा, “शांतनु! मैं सही कर रही हूँ या नहीं यह मैं नहीं जानती, पर मेरा मन ऐसा करने को कह रहा है…। “
“क्या हुआ, क्या कहना चाहती हो? ”
नेहा ने कहा- “उस दिन जब हम लोग घूमने गए थे तब तुमने मेरे आग्रह को ठुकरा दिया था। घर आकर मैंने खूब विचार किया, तब मैंने सोचा, तुम इतने अच्छे इंसान हो तो अच्छे इंसान को अच्छा ही इंसान मिलना चाहिए। “
मैंने कहा- “तुम कहना क्या चाहती हो नेहा? “
नेहा ने कहा- “आज मैं तुम्हें ऐसी बात बताना चाहती हूँ जो तुम्हारे हित में होगा। मैंने सोचा- मेरे सिर पर बचपन से बोझ है, जिसे मैं उतारना चाहती हूँ, अब मैं थक चुकी हूँ। अब मुझसे और बर्दाश्त नहीं होता, मुझे लगा तुम समझदार इंसान हो अगर तुम मुझे समझोगे तो बहुत अच्छा है। “
बचपन से मैंने देखा हमारे घर में पिताजी की मृत्यु के बाद माँ घर का भार उठा रही थी। हम जब छोटे थे तो मुझे पता नहीं चला लेकिन जब मैं बड़ी हुई, एक दिन घर पर एक आंटी आई, उन्होंने कहा- “तुम्हारी बिटिया भी अब बड़ी हो गई है, वह भी अब काम करने लायक हो गई है, तुम्हारा बोझ भी उठा सकेगी। बहुत प्यारी बहुत सुंदर है, तुम्हारी बिटिया किसी की नजर न लगे। ”
तब हम समझे नहीं लेकिन एक दिन मेरी माँ मुझे अपने साथ काम कर ले गई. वहाँ जाकर हमने जाना कि काम क्या है, माँ ने तब बताया-“बेटा, आज हम बरसों से तुम सब का पेट पाल रहे हैं, मैं ज़्यादा पढ़ी लिखी नहीं हूँ लेकिन शारीरिक सौंदर्य हमारे पास है जिसके लिए हमें मोटे-मोटे ग्राहक मिल जाते हैं और हमारा घर चल जाता है, मैं सोचती हूँ अगर तुम भी हमारा साथ दो-चारसाल तक दो तो तुम्हारी शादी के लिए काफी पैसा इकट्ठा हो जाएगा और फिर हम तुम्हारी शादी अच्छी जगह कर देंगे। ”
मेरी बड़ी बहन की शादी पिताजी कर गए थे, वह आज सुख से है। माँ की आदतों को जानते हुए वह हमारे घर नहीं आती।
माँ की बातें सुनकर मैं अवाक रह गई लेकिन काम की अवहेलना नहीं कर पाई, मन मारकर उस दलदल में उतरना पड़ा, मैंने माँ को इस सौदे के लिए हाँ कर दी।
तभी माँ ने मुझे एक कमरे में भेज दिया, कमरे के अंदर जाकर देखा तो एक हट्टा कट्टा आदमी था। जिसने मुझे पहली बार अपना शिकार बनाया। करीब 2 घंटे तक वह अपनी हवस मिटाता रहा। मैं कुछ बोल न पाई, उसके बाद उसने एक मोटी रकम दी और एक हफ्ते बाद आने के लिए फिर कहा। इसी तरह सिलसिला चलता रहा करीब 2 वर्षों से मैं इस कार्य में माँ के साथ संलग्न हूँ। लेकिन उस दिन जब मैं तुमसे मिली तब मुझे एहसास हुआ कि शारीरिक सम्बंध से भी बढ़कर भी कुछ और होता है। क्योंकि मुझे माँ ने बड़े होकर देह समर्पण का पाठ पढ़ाया है।
उस दिन मैंने यह निश्चय कर लिया था चाहे कुछ भी हो जाए हम अपनी आपबीती आपको ज़रूर बताएंगे। मेरी देह आपके लिए पवित्र नहीं है। माँ से शादी से पहले ही कहा था कि हम उनसे मिलकर सारी बात बता देते हैं, उन्हें धोखे में नहीं रख सकते। लेकिन मेरी माँ ने मुझे कसम दे दी और कहा अगर तूने ऐसा किया तो हम अपने आप को खत्म कर लेंगे। इस घर में जब मैंने कदम रखा तब मुझे लगा कि मैंने बहुत ग़लत किया है, अब मैं अपने आप को रोक नहीं पाई, माँ की कसम की परवाह किए बिना मैंने आपको सच बता डाला। मुझे पता है इसका अंजाम क्या होगा लेकिन अब मुझे अंजाम की परवाह नहीं, परवाह मुझे आप जैसे इंसान की है जिन्हें मैं धोखा नहीं दे सकती। अब फैसला आपके ऊपर है आपको जो उचित लगे वह आप करिए। शांतनु आप कुछ बोलिए इतने खामोश मत रहिए रात काफी हो चुकी है। “
मैंने कहा- “नेहा, अब बोलने के लिए कुछ भी शेष नहीं है। मेरी ज़िन्दगी में पहले एक भूचाल आ चुका था, मैं शादी करने को तैयार नहीं था। लेकिन दूसरा झटका मैं बर्दाश्त नहीं कर सकता। नेहा मैं तुम्हें स्वीकार नहीं कर सकता क्योंकि मेरी आत्मा इस बात को हजम करने के लिए तैयार नहीं। “
नेहा ने कहा- “अंजाम मुझे मालूम था लेकिन मैं आपके सामने वचन देती हूँ अब कभी भी किसी को भी अपनी देह समर्पित नहीं करूंगी। क्योंकि मैंने अग्नि के सात फेरे आपकी अर्धांगिनी के रूप में लिए हैं। जीवन भर आपके साथ रहूँ या न रहूँ इसका निर्वाह करूंगीक्योंकि आप ही की वजह से मैंने सही रास्ते पर चलने का निश्चय किया है या यूं कहिए कि भटके हुए राही को रास्ता मिला है। “
मैंने कहा- “नेहा! तुम यहीं कमरे में आराम करो मैं बाहर जाता हूँ। क्या करना है सुबह निश्चिय करूंगा। “
इतना कहकर मैं कमरे से बाहर निकल आया रात के 2:00 बज रहे थे मुझे कुछ भी सूझ नहीं रहा था। बाहर हॉल में आकर सोफे पर लेट गया।
सुबह जब माँ की नींद खुली तब उन्होंने देखा मैं सोफे पर सो रहा हूँ तो उन्हें हैरानी हुई, उन्होंने पूछा- “बेटा यहाँ क्यों सो रहे हो? ”
मैं उठा, मैंने कहा- “माँ, बस यूँ ही। “ और फ्रेश होने चला गया।
थोड़ी देर के बाद जब सभी लोग नाश्ता-चाय करके फुर्सत हुए तब हमने मम्मी से कहा-“मामा-मामी को फोन करके बुला लीजिए, कुछबातें करनी है। “
मेरी इस बात से मम्मी बहुत परेशान हो गई और उन्होंने फोन करके मामी को बोला-“रीता! तुम भैया के साथ जल्दी आ जाओ, पता नहीं शांतनु क्या कहना चाहता है? ”
सभी के आने के बाद हमने नेहा से कहा- “नेहा, तुम भी यहीं बैठो और माँ से कहा इनकी मम्मी को भी फोन करो वह भी यहाँ आए। “
थोड़ी देर बाद सभी लोग एकत्र हो गए। मैंने नेहा के द्वारा बताई गई सारी बातें सबके सम्मुख रख दी। इसके तुरंत बाद नेहा की मम्मी उठी और दौड़कर अपनी बेटी को मारने लगी और कहा कितना तेरे को समझाया था चुप रहना, तुम्हें सही ज़िन्दगी मिल रही है लेकिन तुम सत्यवादी हरिश्चंद्र बन गई और आज अपनी ज़िन्दगी नरक बना डाली, चुप रहती तो क्या बिगड़ जाता तेरा और इसके साथ ही दो-तीन थप्पड़ लगा दिए।
तभी मैंने कहा- “आंटी, नेहा ने सच के रास्ते पर चलने का फैसला कर लिया है, वह अपना आज सुधारना चाहती है और आप कैसी माँ हो जो उसको ग़लत राह पर चलने का संदेश दे रही हो, नेहा ने जो किया वह सही किया लेकिन हम पति-पत्नी की तरह जीवन निर्वाह नहीं कर सकते। हाँ, ज़रूरत पड़ने पर हम उसकी मदद अवश्य करेंगे। “
तभी मामी ने कहा- “आप लोगों को देखकर ऐसा बिल्कुल भी नहीं लगा कि दिखने में चेहरा अलग और चेहरे के पीछे दूसरा चेहरा अलग है। कितना घटिया लिबास पहना है आपने, हमारे लड़के की ज़िन्दगी बर्बाद कर दी। किसपर विश्वास करें किसपर न करें, हमने तो आपको और आपकी बेटी को देखकर सम्बंध तय किया था। “
तभी नेहा की मम्मी ने कहा- “चल अब यहाँ से अभी कुछ और सुनना बाकी है। “
नेहा ने अपने सास-ससुर के पैर छुए और कहा, “मुझे माफ कर देना मेरी माँ ने अगर कसम न दी होती तो हम शादी के पहले ही यह खुलासा कर देते। लेकिन मेरी अंतरात्मा मुझे कचोट रही थी इसलिए मैंने शादी की रात को ही शांतनु को यह सब बताना उचित समझा आप सबको और अपने आप को धोखा नहीं देना चाहती है। “
नेहा ने शांतनु से कहा- “मैं जा रही हूँ, पत्नी न सही अगर एक दोस्त का दर्जा दे सको तो कभी-कभार फोन पर सलाह देते रहना जिससे मैं कभी रास्ता न भटक जाऊँ। मैं जल्दी ही आपको तलाक के पेपर भिजवा दूंगी, जिससे आप अपना जीवन पुनः प्रारंभ कर सकें है। “
नेहा के जाने के बाद मैं फूट-फूट कर रोया और कहा- “माँ, मेरी किस्मत में शादी नहीं है, मैं अब जीवन भर शादी नहीं करूंगा, आप सब की सेवा और अपना काम संभालूँगा। अब आप लोग कभी भी मुझे शादी के लिए बाध्य नहीं करिएगा। “
मेरी नजर मामी पर पड़ी, मैंने उन्हें रोते हुए देखा और कहा- “मामी, आप अपने आप को दोष मत दीजिए दोष मेरी किस्मत का है, आपने तो मेरा भला चाहा था। “
तभी मैंने अपने घर के नौकर को आदेश दिया- “जल्दी ही पूरे घर से लाइटिंग और सारे बंदनवार उतर जाने चाहिए, अब आप सब लोग भी शादी के माहौल से बाहर आ जाइए और अपना जीवन अलग ढंग से शुरू कीजिए। ” इतना कहकर मैं घर से निकल गया।
दिन-महीने गुजरते गए बहुत दिन बाद मामी-मामा ने सोचा जाकर हालचाल ले लिया जाए, घर पहुँचकर देखते हैं कि मेरी बहुत बड़ी दाढ़ी बढ़ चुकी है ऐसा लग रहा था कि मैं बिल्कुल देवदास बन चुका हूँ। मेरे से बात की तो मैंने कहा- “मामी, अब शादी के विषय में बिल्कुल भी बात मत कीजिए, मैंने नेहा को देखकर नेहा से शादी करने का निश्चय किया था उसे ही अपना माना था मेरी किस्मत में उसका सुख नहीं है तो कोई बात नहीं लेकिन मैं किसी और से शादी नहीं करूंगा। “
नेहा जी यही है मेरी आपबीती जो आपके नेहा नाम ने मुझे अतीत के पृष्ठों को पुनः खोलने के लिए बाध्य कर दिया।
नेहा ने कहा- “मैं आपसे एक बात पूछना चाहती हूँ इस दौरान आपकी कभी नेहा से बात नहीं हुई। “
मैंने कहा- “जी, तीन-चार बार हुई, वह पत्थर हो चुकी है उसकी माँ का वही हाल है। माँ के बार-बार कहने पर भी वह अब कहीं नहीं जाती, न ही किसी को घर में आने देती है। उसका कहना है कि एक बार मेरी ज़िन्दगी में खुशियों का झोंका आया, मैं उसकी महक हूँ अब अपवित्र नहीं करना चाहती। आपके साथ मैं शादी के बंधन में बंधी थी। आपके नाम का सिंदूर और मंगलसूत्र अब भी मेरे शरीर पर सुशोभित है, उसे कलंकित नहीं करना चाहती। भले ही आप मेरे साथ नहीं है पर मैं कल्पना मैं आपको वरण कर चुकी हूँ। “
नेहा ने कहा- “शांतनु जी, एक बात आपसे कहना चाहती हूँ, जिस लड़की ने आपको मन से अपना मान लिया है, आपके कारण वह दलदल से निकलकर बाहर आ गई है, क्या अभी भी वह अपवित्र है, सारा जीवन उसने आपके नाम कर दिया, क्या कभी उसे अतीत से निकलने का अधिकार मिलेगा, कौन देगा उसे अधिकार, आप भी उसी की यादों में खोए रहते हैं। क्या अब भी आप उसे माफ नहीं कर सकते, गलती करने के बाद सुधरने का मौका सभी को होता है, मेरे हिसाब से तो एक मौका आप नेहा को भी दे दीजिए, आपकी और उसकी ज़िन्दगी संवर जाएगी। “
“नेहा जी, बारिश थम चुकी है, चाँद बादलों के बीच से झाँक रहा था आज ऐसा लग रहा है कि बरसों पुराने दर्द के बाद पहली बार सुकून आया है। “
“नेहा जी, आपकी बातों ने मेरे तन-बदन में हलचल-सी मचा दी, दिमाग में प्रेरणा का संचार किया है। इस विषय पर मैं विचार अवश्य करूंगा क्योंकि देवदास बनकर जीवन बर्बाद नहीं किया जा सकता। “
मैंने तुरंत फोन उठाया और नेहा को फोन लगाया। नेहा ने तुरंत फोन उठाया और कहा-“शांतनु! बहुत दिनों बाद आपको मेरी याद आई? ‘’
मैंने कहा- “नेहा! यह जीवन दोबारा नहीं मिलता, तुमने अपना प्रायश्चित कर लिया है। शायद तुम और मैं एक-दूसरे के लिए ही बने हैं, मैं तुम्हें अपना नाम देना चाहता हूँ। मैं आ रहा हूँ। “
(संस्कारधानी जबलपुर की सुप्रसिद्ध साहित्यकार सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ ‘जी सेवा निवृत्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश, डिविजनल विजिलेंस कमेटी जबलपुर की पूर्व चेअर पर्सन हैं। आपकी प्रकाशित पुस्तकों में पंचतंत्र में नारी, पंख पसारे पंछी, निहिरा (गीत संग्रह) एहसास के मोती, ख़याल -ए-मीना (ग़ज़ल संग्रह), मीना के सवैया (सवैया संग्रह) नैनिका (कुण्डलिया संग्रह) हैं। आप कई साहित्यिक संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत एवं सम्मानित हैं। आप प्रत्येक शुक्रवार सुश्री मीना भट्ट सिद्धार्थ जी की अप्रतिम रचनाओं को उनके साप्ताहिक स्तम्भ – रचना संसार के अंतर्गत आत्मसात कर सकेंगे। आज इस कड़ी में प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम गीत – सतरंगी सपने…।
रचना संसार # ६६ – गीत – सतरंगी सपने… ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’
(आदरणीय श्री संतोष नेमा जी कवितायें, व्यंग्य, गजल, दोहे, मुक्तक आदि विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं. धार्मिक एवं सामाजिक संस्कार आपको विरासत में मिले हैं. आपके पिताजी स्वर्गीय देवी चरण नेमा जी ने कई भजन और आरतियाँ लिखीं थीं, जिनका प्रकाशन भी हुआ है. आप डाक विभाग से सेवानिवृत्त हैं. आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होती रहती हैं। आप कई सम्मानों / पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत हैं.“साप्ताहिक स्तम्भ – इंद्रधनुष” की अगली कड़ी में आज प्रस्तुत है आपके – बाढ़ पर कुछ दोहे… । आप श्री संतोष नेमा जी की रचनाएँ प्रत्येक शुक्रवार आत्मसात कर सकते हैं।)
☆ “लखलख चंदेरी तेजाची न्यारी दुनिया…” ☆ श्री नंदकुमार पंडित वडेर☆
… आणि तुम्हांला सांगतो आमच्या तालुक्यात वीज आली… आमच्या गावात वीज आली… आमच्या वस्तीत वीज आली आणि आमच्या घरात वीज आली… तो तुम्हाला चित्रात दिसतोय तो वीजेचा खांब सगळ्यात पहिल्यांदा उभा राहिलेला खांब आहे बरं आमच्या गावात, वस्तीवर वीज आपल्या डोक्यावरून वाहून घेऊन येणारा… आज उणीपुरी पन्नास वर्षे झाली बरं त्या खांबाला आमच्या गावाच्या वेशीवरं वेताळाच्या झाडाजवळ उभा आहे… त्यावेळी जसा होता तो आजही तसाच उभा आहे ना भाऊ… वीज गावात खेळत राहीली त्या दिवशी सगळ्या गावकऱ्यांनी तर दिवाळीच साजरी केली… सगळ्यांच्या घराघरातले सगळ्या असल्या नसल्या खोलीतले ओट्या्वरचे, खळ्यावरचे, परसूमधले,… आणि कशा कशातले दिवे… म्हणजे पिवळे चाळीस व्होल्टचे दिवे ते दिवसरात्र ढणढणा जळत राहिले हो… सकाळच्या सूर्य प्रकाशात त्यांचं महत्त्व वाटलं नाही पण अख्खी रात्र मात्र तेजाची फुलबाज्यांची रोषणाई सांडत राहिली… आयाबाया पोरंबाळं अंगणात दारात ठिय्या मांडून फतकल मारून बसले.. वीजेची दिव्य गोष्टीचां वार्तालाप करत… बरीच रात्र उलटून गेली तरी घरात जाऊन आता झोप घ्यावी असं कुणालाही सुचलचं नाही… तर इकडे पुरूष मंडळी कट्यावर, पारावर बसून पत्याचा डाव टाकून बसले तर काही ना हा आजचा दिवसाचा आनंद घश्यात काहीतरी गरम पेयाचे चषक इत्यादी रिते कसे करता येईल याची गुत्याच्या वाटेवर हसी मजाक चालू झाला… गोठ्यातली गुरं ढोरं आनंदानं शिंगं डोलावू लागली… आणि आणि ती राॅकेलची चिमणी तो प्रभाकरचा कंदील ह्या वीजेच्या दिव्यांनी दिवे लावलेले पाहून बिचारे रुसून कोपऱ्यात अंधारात बसून गेले… निवडणूकीत पराभूत झालेल्या उमेदवाराकडे कसा अपयशाचा अंधकाराचा सन्नाटा असतो त्याच्यापेक्षा ही जास्त म्हणाना… आता आपली इथली गरज संपली गड्या तेव्हा आपला बोऱ्याबस्तरा उचलायला हवा आणि अडगळीत पथारी टाकावी अन्यथा भंगारावाल्याच्या काळ्या कभिन्न गोदामात गंजत खितपत पडावं लागेल… मग कोण कशाला वास्तपूत करतोय… गरज सरो नि… पण हि काना मागून आलेली चटक चांदणी किती दिवस.. आपलं किती रात्रं लखलखत राहीलं हे ही सांगता कसं येईल…आता हेच बघा की ते ब्रिटिशांच्या आमदनीत फक्त मोठ्या शहरात तेव्हा वीज खेळत होती आम्हाला वाटायचं हि श्रीमंतांची मिजासच आहे…ती कशाला वो तडमडयाला खेड्यापाड्यात येतेय… इथं रोजच्या रात्रीला चिमणीच्या ढणढण्या उजेडाला नि कंदिलाच्या मेणचटलेल्या प्रकाशाला अंधार लाजून मुरकून जरा दूर हटायचा… गाव शीव वालं सगळे जण त्याला सराईता सारखे चालत बोलत येत जात नि राहत होते… अगदीच नड पडली तरच रातच्याला गावाच्या बाहेर पडतं नाही तर जो तो आपल्या घरातच.. पण हि छमक छल्लू वीज आली नि गावा गावातले लोक पायात चाळ बांधल्या सारखे बघा दिवस नाही कि रात्र नाही चौवीस तास अखंड कारण असू दे वा नसूदे हिंडायला लागले कि… कोणीतरी लै शिकलेला मोठा माणूस म्हणत होता आता वीज आली पाठोपाठ गावाचा विकास पण होत जाणार म्हणून… उद्योग धंदे वाढून सुख समृद्धी लोकांच्या घरघरात पोहचणार… मग ती चिमणी आणि तो कंदील असताना काय कमी सुखं होतं का तेव्हा… खाऊन पिऊन सुखीच होतो कि आम्ही… हिच्या मुळं आणि दोनचार सुखाची साधनं वाढली इतकंच काय ते… गावातली बाया माणसं, पोरंसोरं असं बोलत बसली होती आनी तितक्याच फक्कन अंधारच झाला जिकडं तिकडं.. अरं काय झालं या वीजंला.. दिवा एकदमच का विझला.. का वीज संपली वाटतं.. रे लावा ती आपली चिमणी आणि तो कंदील.. त्याशिवाय काही आपलं जगणं काही खरं नाही गड्या हो… आता आहे तर नंतर नाही आणि दिवसा आहे तर रातच्याला नाही अशी बेभरवश्याची वीज आपल्या काय कामाची नाही.
ऐन नडीलाच हि नडणार..तेव्हा चिमणी आणि कंदील कायमचं असू द्या घरात… वीजेच्या अति झगझगीत उजेडाच्या हव्यासापायी चिमणी नि कंदील बाजूला सारले तर दारिद्र्याचा अंधार आपल्याला गिळून टाकल्या शिवाय राहणार नाही… म्हणतात ना जुनं ते सोनं.. कितीही उत्कर्षाचा काळ आला तरी ऐनवेळी सोनंच मदतीला धावून येतं तसं या चिमणी नि कंदीलाची सोबत आहे बरं… तो वीजेचा खांब जेव्हा पहिल्यांदा इथं आला तेव्हा किती कौतुक झालं होतं त्याचं पण तेच आता पन्नास वर्षे उलटल्यानंतर त्याच्यकडं कुणीही ढुंकूनही बघना झालयं…कितीतरी उन्हाळे, पावसाळे, थंडीचा कडाका खाऊन खाऊन अगदी कणखर झाला… त्याचबरोबर आता त्याच्या अंगोपा़गांवर पानाच्या पिचकाऱ्या पडून पडून तो आता लाल तांबडा नि करडा रंगाचा झालाय तर कुठे जाहिरातीचे बोर्ड, तर कुणी त्याच्याच आधार घेऊन पानाची, चहाची टपरी टाकून बसलयं.. हळूहळू त्या खांबाची गावानं ओळखच विसरून गेलयं.. आणि खांब सुध्दा आपलं खरं काम काय होतं हे विसरून दुसऱ्या कामातच गुरफटून गेलाय… त्याला या सगळ्या गोष्टींचा उबग आलाय पण सांगतो कुणाला.. आपल्या इथून कुणीतरी हलवलं तर बरं होईल असं सारखं वाटतयं…रस्ता रुंदी करणाच्या नावाखाली तरी…वादळाने तरी उन्मळून पडावं नाहीतर वीज मंडळानं तरी आपण खूपच जूने जीर्ण झालोय म्हणून तरी बदलुन टाकावं असं त्याच्य मनात येतयं… त्याच्या मनात जे येतयं ते वीज मंडळाच्या मनात कधी यावं आणि आलचं समजा पण त्यासाठी खर्चाच्या बजेटाची मंजूरी कधी मिळायची… साराच लालफितीचा कारभार…एकवेळ देवाजीच्या मनात आलं तर इकडची दुनिया तिकडं व्हायला वेळ लागायचा नाही पण या विद्युत देवतेच्या पुजाऱ्यांच्या मनात हे येणार कधी नि कसं…याच्याच प्रतिक्षेत तो खांब तसाच असिधारा व्रतस्थाप्रमाणे प्रतिक्षेत उभा आहे…
☆ ।। श्री नारद उवाच ।। – नारद भक्ति सूत्रे — लेख २१ ☆ श्री संदीप रामचंद्र सुंकले☆
।। श्री नारद उवाच ।।
यथा व्रजगोपिकानाम् ॥ २१ ॥
अर्थ: आपल्या भक्तिलक्षणाकरिता नारदमहर्षी उदाहरण देतात – जशी गोकुळातील गोपिकांची (अवस्था होती.)
विवेचन: स्वतःचे भक्तिलक्षण नारद सोदाहरण पटवून देतात. कोणतीही महत्त्वाची भावना किंवा ज्ञान हे अमूर्तच असते. त्याच्या अभिव्यक्तीकरिता एखाद्या व्यक्त उदाहरणाची अपेक्षा असते. मूर्तात प्रविष्ट झाल्यावाचून अमूर्त प्रगट होऊ शकत नाही. नारदांनी ज्या भक्तीचे स्वरूप एकोणिसाव्या सूत्रात सांगितले, ती भक्ती उत्कटतेने पूर्ण रूपाने कोठे प्रगट दिसली असेल तर ती नारदांना गोकुळात दिसली. गोकुळातील पुरुष, स्त्रिया, गोप, बालक सर्वच भगवान श्रीकृष्णावर प्रेम ठेवणारेच होते. पण नारदोक्त भक्तिलक्षणाचा पूर्ण आविष्कार गोपिकांच्याच ठिकाणी दिसला म्हणून त्यानी गोपिकांचेच उदाहरण घेतले आहे. नुसते ‘गोपिकानाम्’ म्हटले असते तर कोणत्याही मोठ्या नगरात गोप गोपिकाची वस्ती असते. पण ते भक्त नसतात. केवळ गोकुळातील व्रज भूमीतील गोपिकाच भक्त होत्या. म्हणून ‘व्रजगोपिकानां’ म्हटले आहे.
गोपिका म्हणतात, “हे दीनबन्धो, तू जन्मल्यापासून हे गोकुळ अधिक उत्कर्षाला प्राप्त झाले आहे, येथे लक्ष्मी अखंड आश्रयाला आली आहे.” मुळात ती व्रजभूमी ही पुण्यभूमीच होती. पण श्रीकृष्णअवतारामुळे तिला फार श्रेष्ठत्व प्राप्त झाले. त्या व्रजवासी ज्या गोपिका होत्या, त्यांचे उदाहरण नारद आपल्या भक्तिलक्षणाच्या पुष्टीकरिता देतात. आपल्या इंद्रियांच्याद्वारे जी श्रीकृष्णभक्तिरसाचे पान करते ती गोपी.
‘गोपायति’ इति गोपी म्हणजे आपल्या भक्तिभावनेचे जी रक्षण करते ती गोपी.
नाथ भागवतात गोपींचे वर्णन पुढील प्रमाणे आले आहे.
*”गोपिका करूनि माझी भक्ती । मी प्रसन्न केलों श्रीपती ।
रास मागीतला एकांतीं । माझी सुखप्राप्ती पावावया ॥६२॥
*
त्या जाण वेदगर्भींच्या श्रुती । श्रुतिरूपें नव्हे मत्प्राप्ती ।
तैं परतल्या म्हणोनि ‘नेति नेति’ । माझी सुखसंगती न पवेचि ॥६३॥
*
विषयबुद्धी तें मुख्य अज्ञान । तें असतां मी न भेटें जाण ।
असतां वेदोक्त जाणपण । तेणेंही संपूर्ण न भेटें मी ॥६४॥
रासक्रीडामिसें एकांतीं । माझी सुखप्राप्ती पावल्या ॥६६॥
दुसरीही एक कथा उपलब्ध होते. त्रेतायुगात श्रीरामचंद्राचा अवतार झाला. सीतास्वयंवराकरता श्रीरामचंद्र मिथिला नगरीला आले, धनुर्भंग झाला, सीतेने रामचंद्राला माळ घातली, विवाहसोहळा समारंभपूर्वक पार पडला, तेथे ज्या मिथिला नगरीतील स्त्रिया जमल्या होत्या त्याही श्रीरामचंद्राचे ते कोटिकंदर्पदर्पहारी लावण्य बघून मोहित झाल्या. त्यांचीही उत्कट इच्छा झाली की आम्हांलाही हेच पती लाभले तर किती चांगले होईल, त्याकरिता आम्ही वाटेल तो त्याग करू. त्यानी आपली उत्कट वासनाही श्रीरामापुढे प्रगट केली, पण राम अवतार हा मर्यादापुरुषोत्तम होता, एकपत्नीत्वाची मर्यादा पाळणे अवश्य होते. त्या मिथिलानिवासी स्त्रियांचा उत्कटभाव पाहून श्रीरामचंद्र त्यांना म्हणाले, ‘तुम्ही शोक करू नका.’ द्वापार युगात तुम्ही गोपी व्हाल, त्यावेळी मी आपली इच्छा पूर्ण करेन.
.गोपिका गायीच्या दुधाचे दोहन करतेवेळी, साळी इत्यादी कुटताना, सडासंमार्जन करताना, बालकाना झोके देताना, दह्याचे विरजण घालताना, बालके रडत असताना गाणी म्हणत असता सर्व व्यवहारात प्रेमपूर्ण चित्ताने, अश्रुपूर्ण नेत्रांनी श्रीकृष्णाचे गुणगान करीत असत. गोपिकांना क्षणभरही श्रीकृष्णाची विस्मृती पडत नव्हती; पण जर क्षणही त्यांना श्रीकृष्णाचा वियोग झाला तर मात्र प्राणांतापेक्षाही त्यांना अधिक दुःख होत होते.
गोपींच्या प्रेमाचे वर्णन माउलींनी आपल्या विहरणी मध्ये केले आढळते. श्रीज्ञानेश्वरमहाराजांचे अभंग पुष्कळ आहेत. त्यापैकी प्रसिद्ध म्हणजे,
धनु वाजे घुणघुणा वारा वाजे रुणझुणा ।
भवतारकू हा कान्हा वेगी भेटवा का ॥ १ ॥
चांदवो चांदणे चापे वो चंदनु ।
देवकीनंदनुविण नावडे वो ॥ २ ॥
चंदनाची चोळी माझे सर्व अंग पोळी ।
कान्ही वनमाळी वेगी भेटवा का ॥ ३ ॥
सुमनांची सेज शीतळ वो निकी ।
ओले आगीसारिखी वेगें विझवा कां ॥ ४ ॥
यावर कोणी शंका घेईल की, गोपिका श्रीकृष्णाना परमात्मा समजत होत्या का? त्या तर त्याला एक सुंदर पुरुष म्हणून मानीत होत्या व जार बुद्धीने त्याच्यावर प्रेम करीत होत्या, त्या कामासक्त होत्या, असे असता त्यांच्या त्या वैषयिक प्रेमाला भक्ती कसे म्हटले जाईल? याच शंकेचे उत्तर देण्याकरिता पुढील दोन सूत्राची रचना झाली आहे.