हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # ६४ – और रिश्तों की असली दूरी ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार, बाल साहित्य लेखक, और कवि हैं। उन्होंने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज, और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने, और समन्वय करने में महत्वपूर्ण कार्य किया है। उनके ऑनलाइन संपादन में आचार्य रामचंद्र शुक्ला के कामों के ऑनलाइन संस्करणों का संपादन शामिल है। व्यंग्यकार डॉ. सुरेश कुमार मिश्र ने शिक्षक की मौत पर साहित्य आजतक चैनल पर आठ लाख से अधिक पढ़े, देखे और सुने गई प्रसिद्ध व्यंग्यकार के रूप में अपनी पहचान स्थापित की है। तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (तेलंगाना, भारत, के मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से), व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान (आदरणीय सूर्यबाला जी, प्रेम जनमेजय जी, प्रताप सहगल जी, कमल किशोर गोयनका जी के करकमलों से), साहित्य सृजन सम्मान, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के करकमलों से और अन्य कई महत्वपूर्ण प्रतिष्ठात्मक सम्मान प्राप्त हुए हैं।

जीवन के कुछ अनमोल क्षण 

  1. तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से  ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित। 
  2. मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
  3. ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी  से भेंट करते हुए। 
  4. बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
  5. विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए। 

आप प्रत्येक गुरुवार डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपकी विचारणीय व्यंग्य रचना और रिश्तों की असली दूरी।)  

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # ६४ – और रिश्तों की असली दूरी ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)

कभी-कभी लगता है कि हमने जन्मपत्री गलत जगह से बनवा ली। थोड़ी-सी गड़बड़ी होती तो हम उस जमाने में पैदा होते जब चिट्ठी लिखने में स्याही सुखाने का सब्र चाहिए था, और जवाब आने में इतनी देर कि आदमी अपनी दाढ़ी को कर्जदार समझकर काटना भूल जाए। तब लोग समझाते थे—“धैर्य रखो।” आज वही बगुला-भगत व्हाट्सऐप पर ‘सीन’ दिखते ही ऐसे तमतमाते हैं जैसे संसद में घूस खाते पकड़े गए हों। तब जवाब में महीनों का सांप-सीढ़ी खेल होता था, अब घंटों का। फर्क बस इतना कि तब इंसान ‘मुलाक़ात’ करता था और अब ‘निगाहबानी की नीली टिक’ करता है। पुराना जमाना एक लंबी प्रतीक्षा-यात्रा था, और आज का जमाना ‘तुरंत खाओ और डकार लो’। धैर्य अब शब्दकोश में बंद पड़ा है, उतना ही अनुपयोगी जितना सरकारी दफ्तर में रखी इन्वेस्टमेंट गाइडलाइन।

बचपन की अलमारी याद आती है—जिसकी चाबी माँ के पास और जिज्ञासा हमारे पास। उस ताले की खटाखट से हमें लगता था मानो किसी ऐतिहासिक किला-कुंडली का रहस्य खुल गया हो। ऊपर सरकारी आदेशों जैसी सुनहरी लकीरों से भरी नोटबुकें, और नीचे दबा-छिपा शक्करपारे का लोकतांत्रिक खज़ाना। वह अलमारी किसी ‘म्यूज़ियम’ नहीं, बल्कि घर का लघु संसद थी—जहाँ मिठाई और ज्ञान दोनों पर ‘माँ की एकल पार्टी’ का कब्ज़ा था। आज की आधुनिक अलमारियाँ क्या हैं? अमेज़न के ‘कार्ट’ जैसी—हमेशा भरी हुई लेकिन रहस्य शून्य। अब अलमारी खोलकर रस नहीं मिलता, बस डिलीवरी बॉक्स खोलकर प्लास्टिक का झुनझुना मिलता है। सच कहें तो पुरानी अलमारी के भीतर इतना रोमांच था कि इंडियाना जोन्स भी शर्म से इस्तीफा दे देता। अब तो पूरी ‘रहस्यमयी दुनिया’ उस जगह दफ़न है, जहाँ लोग पासवर्ड भूल जाते हैं और कंपनी ईमेल पर चिल्लाती है—“पासवर्ड रीसेट करिए।”

पुराने ज़माने की छुट्टियाँ रिश्तेदारों की भीड़ से शुरू होती थीं। घर किसी संसद की तरह गरम हो जाता था और पंखे के पंखों को घुमाने का अधिकार किसी ‘कैबिनेट मिनिस्टर’ जितना महत्वपूर्ण काम होता। बढ़िया लोकतंत्र था—झोंके के लिए झगड़ा और संतुलन बैठाने को दिलासा। आज हर कमरे में एसी है, हर हाथ में रिमोट है, पर माहौल फिर भी गरमाया हुआ रहता है, क्योंकि रिश्ते अब स्क्रीन पर इमोजी निकालते हैं। तब गले लगने में पसीना आता था और मोहल्ले में खबर फैलती थी कि ‘रिश्ता आया है’। अब सिर्फ़ एक कमेन्ट आता है—“बहुत अच्छे लग रहे हो।” बिना आलिंगन वाली प्रशंसा उतनी ही बेकार है जितनी बिना घी की जलेबी। तब की चख-चख वाली गर्माहट भी मीठी थी, आज की खामोशी वाली ठंडक भी कड़वी है। परिवार का ‘संस्थागत ढाँचा’ अब लाइक-बटन की सरकारी मुहर से चलता है।

“बड़ों का पैर छूने से ज्ञान मिलता है”—ये वाक्य हमें बचपन से ठोंक-पीटकर पढ़ाया गया। हमने न जाने कितने पैर छुए, और बदले में सिर्फ़ यही ज्ञान मिला कि “पैरों से बदबू आती है।” अब नई पीढ़ी ने इस परंपरा को चाय की प्याली की तरह हल्के से रख दिया है। वे पैर क्या छुएँगे, उन्होंने फ़ॉन्ट साइज इतना बड़ा कर दिया है कि बड़ों की धुँधली आँखें भी इन्फ्लेशन का चार्ट पढ़ सकें। आशीर्वाद? वो अब व्हाट्सऐप पर ‘जय श्री रैम’ का फॉरवर्ड बन चुका है। पहले कहते थे—“बड़ों का स्पर्श आत्मा को पवित्र करता है।” आज आत्मा नहीं, फेसबुक प्रोफ़ाइल पिक्चर पवित्र करनी की ज़रूरत है। तब पैर छूने में रीढ़ की हड्डी झुकती थी, अब मोबाइल झुकाकर ‘लाइक’ दे दिया जाता है। फर्क बस इतना है कि तब आशीर्वाद महँगा था और अब मुफ्त ‘गुड मॉर्निंग’ मैसेज सारे सवेरे में फैलता है।

पुराना रेडियो याद है? जब ‘समाचार’ सुनाने वाला खुद बोलने से पहले तौलता था, जैसे कोई वकील अदालत में बयान देता है। अखबार में ‘संपादकीय’ ऐसे छपता था जैसे ईश्वर के उपदेश हों। तब हमें सच आधा मिलता था, मगर उसमें शांति थी, क्योंकि आवाज़ें कम थीं। आज? अब तूफानी चैनल आधा सच भी पूरे दहाड़कर परोसते हैं, और बाद में कहते हैं—“घटना हुई ही नहीं।” यही प्रगति है—झूठ भी उसी जोश से बोला जाता है जैसे पहले सच। पहले संपादक धूल झाड़ता था, अब एंकर लार झाड़ता है। फर्क इतना है कि तब समाचार शांत बाण था, और अब पाँच पंडित मिलकर वही अधूरा सच “ब्रेकिंग” करके परोसते हैं। ब्रेकिंग आमतौर पर खबर कम और चायपत्ती ज़्यादा होती है। आज समाचार वो है जिसमें शोर इतना हो कि मक्खी की भनभन भी चुनाव का मुद्दा बन जाए।

स्कूल की बात करें तो मास्टरजी की तख्ती पर चाक की लकीरें और उनकी धूल ने बच्चों के छल-छिपे ज्ञान को गढ़ा था। वे चाक इतने ईमानदार होते थे कि हर सवाल पर धूल झाड़ते-झाड़ते अपनी सफेदी इतनी बढ़ा देते थे कि सफाई कर्मचारी संघ ने हड़ताल की सोच ली थी। पर वह सफेदी ही असली थी—तख्ती पर लिखावट ज्यों की त्यों छोड़ती अक्स वाली। आज के स्मार्ट क्लास में प्रोजेक्टर और टचपेन भले हों, पर बच्चों की बुद्धि से तेज़ तो पिक्सेल ही रहती हैं। इस विकास का सच ये है कि बचपन की मासूमियत ने “एप के नये वर्ज़न” का स्वागत किया है लेकिन अभी भी समझ नहीं पाया कि इस नवाचार से न तो ज्ञान बढ़ा, न ही शिक्षक के माथे की शिकन कम हुई। पढ़ाई का खेल अब लुकाछिपी नहीं, बस नोटिफिकेशन के बीच का युद्ध है, जिसमें बच्चे ‘डिस्टर्ब’ पाए बिना फोन छीनने की कला में पारंगत हो रहे हैं।

*

गली-मोहल्ले की याद आ रही है? शाम को गोलगप्पे वालों की ठेलियाँ चलती थीं, बच्चे दौड़ते थे जैसे नोबेल इनाम के लिए आवेदन कर रहे हों। चटकारे होते थे स्वाद के और झगड़े थे ठेला को लेकर—“मेरे में ज्यादा आलू, तेरे में कम पानी।” दुकानदार बापू बहुत धीरज के साथ कहते—“बेटा, सबका बराबर मिलेगा।” यह तब का बड़ा lesson था—सबको बराबर हो सकता है। अब तो ग्राहक एक सितारा दे देता है ‘कस्टमर टू साल्टी’, और दुकानदार भी ऐप की रेटिंग देखता है। वहां से रोज़ चरस टपकती रहती है और मोहल्ला सोशल मीडिया की तरह आगंतुकों की निंदा करता रहता है। आज का गोलगप्पा वाला ऐप चला रहा है, क्रिकेट के स्कोर के साथ लेन-देन, और बच्चे घर बैठे टेक्स्ट पर लड़ाई कर रहे हैं। यहीं है असली विकास—गोलगप्पा पर झगड़ा ऐप पर, और ठेले पर एक-दूसरे को म्यूट।

सिनेमा हॉल का जमाना भी बड़ा मज़ेदार था। बीच-बीच में फिल्म रुकती थी, ऑपरेटर धुआँ छुपाने का बहाना करता, और दर्शक सीट से उठकर कुर्सी भगाते। लेकिन जैसे ही फिल्म वापस चलती, सब अपने पुराने मोह में डूब जाते। वहीं खत्म होता मनोरंजन का असली नशा। आज का युग नेटफ्लिक्स और यूट्यूब का है, जहां अगर पचास सेकंड का एड भी आ जाए तो लोग अंतर्निहित संविधान तक संशोधन के लिए तैयार हो जाते हैं। रिलैक्सेशनशून्य, सब्र सून्य। पिछली पीढ़ी की वो लंबी प्रतीक्षा और धीरज अब इंस्टाग्राम स्टोरी में ‘गोल्डन एरा’ बन गई है, जहाँ उनकी निराशाएँ भी फिल्टर होकर गुलाबी सी नजर आती हैं। और वही नॉस्टैल्जिया एक बिज़नेस मॉडल बन चुका है—जो कष्ट हमने झेले, वही अब #ओल्डइज़गोल्ड के नाम से सस्ते में बिकता है।

होली-दीवाली की पुरानी रौनक भी अब डिजिटल हो चुकी है। तब दीवाली लड्डू और पटाख़ों के संग आती थी, अब सेल का ऑफर लेकर आती है—“लड्डू बाद में, अभी ऑफ़र्स ग्रैब करो।” पटाखों का धुआँ अब रेटिंग और रिव्यू के रूप में उड़ता है। होली पर पिचकारी में पानी भरने की मेहनत अब कागज़ी संदेश में बदल गई—“गुलाल की जगह मुस्कान भेज रहा हूँ, अपनापन बनाए रखना।” रंग खिलाड़ियों से हटकर इमोजी खिलाड़ियों में बदल गए हैं। ऐसा लगता है जैसे जमीनी रंगों ने डिजिटल फिल्टर ठोक दिया हो। लेकिन यह बदलाव भी व्यंग्य से खाली नहीं है, क्योंकि रंग अब ऑनलाइन होते हैं और जश्न केवल टेक्स्ट में। खूब खूब हूँई है तो, पर त्योहारों की रौनक कहीं ‘पेंडिंग’ की तरह छुट्टी पर है।

सबसे बड़ा व्यंग्य यह है कि पहले मोहल्ले का सम्मान ‘तीन कुर्सियों वाला आदमी’ होता था, जिसकी मेहमाननवाज़ी से पूरा मोहल्ला खिलखिलाता था। अब सम्मान बन गया है डिलीवरी बॉय का। रोज़ ‘पैंट आ गई, शर्ट अलग आएगी।’ रिश्तों की डिलीवरी भी अब सिस्टम में ‘पेंडिंग’ है। कोई पूछता नहीं कि हे डिलिवरी बॉय, तुम्हारी सेल्फी कब आएगी? रिश्ते इतने डिजिटल हो गए हैं कि अब उनका ‘मोड’ और ‘सेटिंग’ ही चलन है। कहीं भी संपर्क हो, लेकिन संपर्क जैसा नहीं। इंसानी रिश्ता अब ‘डेटा’ में सिमट गया है, जहां झूठ की फाइलें पहले भी होती थीं पर आकड़ों की तेजी ने इन्हें ‘डाटा सेव्ड सक्सेसफुली’ कर दिया है।

अख़बार का स्वरूप पहले भजन की तरह होता था, जिसे लोग भक्तिभाव से पढ़ते थे। शब्दों की ताकत ऐसी होती थी कि वह आत्मा को गुदगुदा देती थी। आज के समय में वही ताकत मेम और मीम के रूप में फैल रही है, जो दिमाग को चकरा देती है। पहले संपादकीय इतने गंभीर होते थे कि लेखक की हाजिरी तक लगती थी, अब तो सोशल मीडिया पर एक मज़ेदार मीम ही संपादकीय बन जाता है। शब्दों के लिए दिल की जगह अब ‘लाइक्स’ और ‘शेयर’ की तंगी है। पहले लोग सोचते थे, अब लोग बस रिएक्ट करते हैं। खबरों की धार इतनी तेज हो गई है कि असली तथ्य कहीं खो गए हैं, और अफवाहें चमचमाती हेडलाइन बनकर इंटरनेट की गलियों में नाचती हैं। यही डिजिटल युग का व्यंग्य है जहाँ शब्द अपनी आत्मा खो बैठे हैं पर फिर भी इंटरनेट पर वायरल हो रहे हैं।

क्या सचमुच पुराना समय स्वर्णिम था? या हमारी स्मृतियाँ उस जमाने की कमी को गुलाबी फिल्टर की तरह छुपा देती हैं? पुराना जमाना भी संकटों से भरा था, पर तब रोशनी कम थी इसलिए अंधेरा कम दिखता था। नॉस्टैल्जिया हमें एक ऐसा आईना दिखाता है जिसमें हर बीता वक्त बेहतर नजर आता है और आने वाला वक्त हमेशा खराब। आज जो हम वर्तमान कहते हैं, वही कल का नॉस्टैल्जिया बनेगा। जैसे अगली पीढ़ी कहेगी—“क्या जमाना था, जब लोग रील्स देखते-देखते अकाउंट डिलीट कर देते थे। कितना प्योअर टाइम था।” यह घमंड और विडंबना का मेल है कि हम हमेशा बीते वक्त को परफेक्ट मानते हैं और वर्तमान को दोष देते हैं। यही नॉस्टैल्जिया की सबसे बड़ी फंदाकशी है—वह हमारी आंखों को वह गुलाबी चश्मा देता है जिससे हम भूल जाते हैं कि असली ज़िंदगी हमेशा त्रासदी और कॉमेडी का मिश्रण होती है।

सच यह है कि नॉस्टैल्जिया हमारी आत्मा की सांत्वना है और व्यंग्य उसका सर्वांग दुखी पक्ष। हमें ग़म के साथ हँसी भी दी जाती है, लेकिन फर्क इतना है कि पहले यह थाली पीतल की थी—उसकी चमक जरा कम भी होती तो उसमें गरिमा थी। अब वही थाली प्लास्टिक की है, चमकदार लेकिन टूटने वाली। इस इशारे में समाई है हमारी आधुनिक ज़िंदगी की सच्चाई—जहां हंसी कम और कटुता ज्यादा है, और जहां यादें भी ज्यों-ज्यों पुरानी होती हैं, व्यंग्य भी मित्र की तरह करीब आता जाता है। इसलिए हम लिखते जाते हैं, सोचते हैं, और हंसते हैं, कभी-कभी खुद पर, तो कभी यादों पर। आखिरकार, यही वह ज़िंदगी है जो हमें मिली है—पीतल की चमक से घिरी हुई, मगर प्लास्टिक की मजबूती में दम तोड़ रही। इसी में छुपा है सबसे तीखा व्यंग्य।

© डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

संपर्क : चरवाणीः +91 73 8657 8657, ई-मेल : drskm786@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # २५८ ☆ भाव भक्ति के साथ: पूजन… ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ ☆

श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की  प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं  में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना “भाव भक्ति के साथ: पूजन…”। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  – आलेख  # २५८ ☆ भाव भक्ति के साथ: पूजन… ☆

*

मातु सरस्वती पूजन कीन्हा ।

विद्या ज्ञान आप वर दीन्हा ।।

श्वेत वस्त्र पुस्तक वर धारी ।

कमल आसनी आन पधारी।।

*

मंगलकाज हुए सब जाते ।

मूढ़ मती के भाग्य जगाते।।

वीणा वादिन हंस वाहिनी ।

सप्त सुरों की आप दायिनी।।

*

कई बार अनजाने ही बहुत से ऐसे कार्य हो जाते हैं, जिनको कोई करना नहीं चाहता , सब कुछ पूर्व निर्धारित तरीके से नहीं हो सकता ।  केवल प्रयास आपके द्वारा हो ऐसा करते रहें परन्तु परिणाम क्या होगा इसकी  चिन्ता न करें । आप कर्म के अधिकारी हैं  कर्ता नहीं ।

सारे दुःख का कारण यही होता है कि हम स्वयं को कर्ता समझने की भूल कर बैठते हैं और अनजाने ही उन गलतियों के जिम्मेदार बन जाते हैं जो  की ही नहीं गयी ।

इसे इस दृष्टि से  देखें, जो होगा अच्छा होगा  इसमें ही सबका कल्याण है । हर पल को भगवान का उपहार समझते हुए आनन्द के साथ जियें और जीने दें।

**

©  श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

माँ नर्मदे नगर, म.न. -12, फेज- 1, बिलहरी, जबलपुर ( म. प्र.) 482020

मो. 7024285788, chhayasaxena2508@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक साहित्य # ३७२ ☆ ललित निबंध – “हीरे की तलाश” ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ३७२ ☆

?  ललित निबंध – हीरे की तलाश ? श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

नर्मदा का हर कंकड़ शंकर कहा गया है तो पन्ना जिले की मिट्टी में हीरे की भौतिक तलाश की जाती है, जहां प्रकृति ने अपने अद्वितीय उपहार को छिपा रखा है। पर जीवन भौतिकता से बढ़कर जीवंत चेतना है, जो हमें एक गहन और व्यापक दृष्टिकोण देती है। यह दृष्टिकोण हमें हीरक व्यक्तित्व की तलाश करने को प्रेरित करता है , स्वयं को हीरे जैसा मूल्यवान और आभामय बनाने को प्रेरित करता है।  व्यक्ति की आंतरिक चमक, उसकी चेतना, और उसके मानवीय गुण एक अद्वितीय हीरे की तरह भीड़ में भी अलग चमकते हैं।

रत्नों में हीरे अपनी दुर्लभता और सौंदर्य के लिए प्रसिद्ध हैं,  मानव जीवन में भी व्यक्ति का व्यक्तित्व, उसकी आत्मा, और उसकी चेतना ऐसी ही हीरक होती है। व्यक्ति की ईमानदारी , हजार मनकों की माला में उसे अलग चमकता हीरे जैसा मनका बना कर प्रस्तुत करती है। जैसे  मिट्टी को खोदकर हीरा निकाला जाता है, वैसे ही जीवन के अनुभवों और संघर्षों के माध्यम से व्यक्ति अपने भीतर के हीरक गुणों को निखारता है। यह सतत प्रक्रिया है । जहां व्यक्ति अपने आंतरिक संसाधनों को पहचानता है और उन्हें निरन्तर बेहतर बनाते हुए विकसित करता है। व्यक्ति के गुरु , परिवार, समाज किसी जौहरी की भांति व्यक्ति को निरंतर जीवन पर्यंत गढ़ते रहते हैं।

हीरक व्यक्तित्व की यह तलाश हमें भीड़ के कंकडो में हीरे की खोज का  व्यापक दृष्टिकोण देती है ।  व्यक्ति को उसके समग्र स्वरूप में आकलित किया जाता हैं, न कि केवल उसके बाहरी आवरण या उपलब्धियों से। जैसे एक हीरा अपनी आंतरिक संरचना और सतरंगी चमक से मूल्यवान होता है, वह किस आभूषण के कैसे डब्बे में रखा गया है वह उतना महत्व नहीं रखता जितना हीरे की मौलिकता । पारखी पल भर में कृत्रिम हीरे और वास्तविक प्राकृतिक हीरे में अंतर समझ लेता है। प्रकृति कोयले को करोड़ों वर्षों के उच्च तापमान में गलाकर , भारी दबाव में दबाकर उसे हीरा बनाती है। उस कच्चे हीरे को चमकदार  रूप में तराशे जाने के लिए  जौहरी उसे काटते  छांटते हैं। वैसे ही एक व्यक्ति अपने आंतरिक गुणों सहानुभूति, करुणा, साहस, और ज्ञान को तराशने  से महान बनता है। यह दृष्टिकोण हमें जीवन को  गहन और अर्थपूर्ण यात्रा के रूप में देखने को प्रेरित करता है। व्यक्ति को  हीरा बनाने में उसका परिवेश , उसके शिक्षक, उसकी परिस्थितियां अहम भूमिका निभाते हैं।

हर व्यक्ति में एक अद्वितीय हीरा छिपा होता है, जिसे पहचानने और तराशने की जरूरत होती है। जैसे  हीरा तराशने से उसकी चमक और सौंदर्य बढ़ता है, वैसे ही व्यक्ति के गुणों को विकसित करने से उसका व्यक्तित्व निखरता है। व्यक्ति अपने अनुभवों, सीखने की प्रक्रिया, और आत्म-विश्लेषण के माध्यम से अपने भीतर के आभामय हीरे को प्रकट कर सकता  है।

इस तलाश में हम पाते हैं कि जीवन एक सतत विकास और परिवर्तन की प्रक्रिया है। जैसे एक हीरा अपनी आंतरिक संरचना से चमकता है, वैसे ही व्यक्ति अपने आंतरिक गुणों और चेतना से महान बनता है। यह प्रक्रिया एक गहन आत्म अनुसंधान है।  हीरक व्यक्तित्व की तलाश एक गहन और व्यापक यात्रा है, जो हमें जीवन के हर पहलू में एक अद्वितीय सौंदर्य और अर्थ खोजने को प्रेरित करती है। यह यात्रा हमें अपने भीतर की संभावनाओं को पहचानने, उन्हें विकसित करने, और जीवन को एक गहन और अर्थपूर्ण अनुभव बनाने के लिए प्रोत्साहित करती है। जीवन को भीड़ में कंकड़ सा खो देना है या हीरा बनाकर अमर कर दें, यह स्वयं हमारे ही हाथों तथा सोच से संभव है।

☆

© श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

म प्र साहित्य अकादमी से सम्मानित वरिष्ठ व्यंग्यकार

संपर्क – ए 233, ओल्ड मिनाल रेजीडेंसी भोपाल 462023

मोब 7000375798, ईमेल apniabhivyakti@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ समय चक्र # २६६ ☆ नवगीत – नया अंदाज… ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’ ☆

डॉ राकेश ‘चक्र’

(हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी  की अब तक लगभग तेरह दर्जन से अधिक मौलिक पुस्तकें ( बाल साहित्य व प्रौढ़ साहित्य ) तथा लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन।लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन। कई कृतियां पंजाबी, उड़िया, तेलुगु, अंग्रेजी आदि भाषाओँ में अनूदित । कई सम्मान/पुरस्कारों  से  सम्मानित/अलंकृत।  भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय द्वारा बाल साहित्य के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य श्री सम्मान’ और उत्तर प्रदेश सरकार के हिंदी संस्थान द्वारा बाल साहित्य की दीर्घकालीन सेवाओं के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य भारती’ सम्मान, अमृत लाल नागर सम्मान, बाबू श्याम सुंदर दास सम्मान तथा उत्तर प्रदेश राज्य कर्मचारी संस्थान  के सर्वोच्च सम्मान सुमित्रानंदन पंत, उत्तर प्रदेश रत्न सम्मान सहित बारह दर्जन से अधिक राजकीय प्रतिष्ठित साहित्यिक एवं गैर साहित्यिक संस्थाओं से सम्मानित एवं पुरुस्कृत। 

आदरणीय डॉ राकेश चक्र जी के बारे में विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 संक्षिप्त परिचय – डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी।

आप  “साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र” के माध्यम से  उनका साहित्य प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र – # २६६ ☆ 

☆ नवगीत – नया अंदाज… ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’☆

☆

जो नहीं कल हो सका

वह आज कर लो।

जिंदगी में

कुछ नया अंदाज भर लो।।

 

सोचना वह बंद कर दो

हो गया जो भी बुरा है।

जिंदगी में आज तक जो

मिली अपयश की सुरा है।

 

श्रेष्ठ सोचो

श्रेष्ठ कर लो

यूँ स्वयं पर नाज कर लो।।

जो नहीं कल हो सका

वह आज कर लो।।

 

कौन है , जिससे न कोई

भूल जीवन मे हुई हो।

कौन-सी है डाल ऊँची

जो धरा पर अनुछुई हो।

 

बंद खिड़की

खोल दो अब

कुछ नया आगाज कर लो।

जो नहीं कल हो सका

वह आज कर लो।।

☆

© डॉ राकेश चक्र

(एमडी,एक्यूप्रेशर एवं योग विशेषज्ञ)

90 बी, शिवपुरी, मुरादाबाद 244001 उ.प्र.  मो.  9456201857

Rakeshchakra00@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ तन्मय साहित्य #२९४ – लघुकथा – ☆ प्रभाव… ☆ श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ ☆

श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’

(सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ जी द्वारा गीत-नवगीत, बाल कविता, दोहे, हाइकु, लघुकथा आदि विधाओं में सतत लेखन। प्रकाशित कृतियाँ – एक लोकभाषा निमाड़ी काव्य संग्रह 3 हिंदी गीत संग्रह, 2 बाल कविता संग्रह, 1 लघुकथा संग्रह, 1 कारगिल शहीद राजेन्द्र यादव पर खंडकाव्य, तथा 1 दोहा संग्रह सहित 9 साहित्यिक पुस्तकें प्रकाशित। प्रकाशनार्थ पांडुलिपि – गीत व हाइकु संग्रह। विभिन्न साझा संग्रहों सहित पत्र पत्रिकाओं में रचना तथा आकाशवाणी / दूरदर्शन भोपाल से हिंदी एवं लोकभाषा निमाड़ी में प्रकाशन-प्रसारण, संवेदना (पथिकृत मानव सेवा संघ की पत्रिका का संपादन), साहित्य संपादक- रंग संस्कृति त्रैमासिक, भोपाल, 3 वर्ष पूर्व तक साहित्य संपादक- रुचिर संस्कार मासिक, जबलपुर, विशेष—  सन 2017 से महाराष्ट्र शासन के शैक्षणिक पाठ्यक्रम कक्षा 9th की  “हिंदी लोक भारती” पाठ्यपुस्तक में एक लघुकथा ” रात का चौकीदार” सम्मिलित। सम्मान : विद्या वाचस्पति सम्मान, कादम्बिनी सम्मान, कादम्बरी सम्मान, निमाड़ी लोक साहित्य सम्मान एवं लघुकथा यश अर्चन, दोहा रत्न अलंकरण, प्रज्ञा रत्न सम्मान, पद्य कृति पवैया सम्मान, साहित्य भूषण सहित अर्ध शताधिक सम्मान। संप्रति : भारत हैवी इलेक्ट्रिकल्स प्रतिष्ठान भोपाल के नगर प्रशासन विभाग से जनवरी 2010 में सेवा निवृत्ति। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा  “प्रभाव…” ।)

☆ तन्मय साहित्य  #२९४ ☆

☆ प्रभाव… ☆ श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ ☆

☆

“सार्वजनिक मंचों पर तो औपचारिकता के नाते किसी की प्रशंसा करना बनता है पर ऐसी क्या विशेषता है उनके लेखन में जो हरदम, हर कहीं मुक्त कंठ से उनका गुणगान करते रहते हो तुम?”

शेखर दत्त ने कुछ उबाऊ अंदाज में प्रश्न किया अपने साथी विनय अनुरागी से।

“विशेषता उनके लेखन में तो है ही मित्रवर, पर इससे कहीं अधिक प्रभावित हूँ मैं उनके सहज सरल व सौम्य व्यक्तित्व से। उनके गंभीर, शांत व निर्मल निश्छल व्यक्तित्व का ही असर है कि उनकी सभी रचनाओं को मैं किसी तपोनिष्ठ ऋषि मुख से निःसृत मंत्र समझ कर पढ़ता हूँ, और मित्रों के बीच उनका गुणगान करते हुए उन्हें अपनी स्मृति में बनाये रखता हूँ।”

“अरे वाह, सचमुच में धन्य हो मित्र! जो तुम्हें आज के समय में ऐसे सतोगुणी सत्य निष्ठ साधक का सानिध्य मिला है।”

“और मुझे तुम्हारे जैसा आत्मीय अनुरागी सरलमना पारखी मित्र।”

व्यक्तित्व और कृतित्व की एकरूपता ही किसी के प्रति श्रद्धा भाव जगाती है।

☆ ☆ ☆ ☆ ☆

© सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’

जबलपुर/भोपाल, मध्यप्रदेश, अलीगढ उत्तरप्रदेश  

मो. 9893266014

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ जय प्रकाश के नवगीत # ११८ ☆ दास्ताने ज़िन्दगी… ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव ☆

श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

(संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं अग्रज साहित्यकार श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव जी  के गीत, नवगीत एवं अनुगीत अपनी मौलिकता के लिए सुप्रसिद्ध हैं। आप प्रत्येक बुधवार को साप्ताहिक स्तम्भ  “जय  प्रकाश के नवगीत ”  के अंतर्गत नवगीत आत्मसात कर सकते हैं।  आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण एवं विचारणीय नवगीत “दास्ताने ज़िन्दगी…”।)

✍ जय प्रकाश के नवगीत # ११८ ☆ दास्ताने ज़िन्दगी… ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव ☆

☆

हम चले थे आज़माने ज़िंदगी

कह न पाए दास्ताने ज़िन्दगी ।

*

अब कहाँ से लाएँ ऐसा हौसला

फिर लगे जो मुस्कुराने ज़िंदगी ।

*

बद से बदतर हो रहे हालात में

कहाँ खोजें आशियाने ज़िंदगी ।

*

देखकर दहशतज़दा माहौल में

सब लगे हैं अब चुराने ज़िंदगी

*

अब सुलगती रात भूखे पेट में

लूटती है हुक्मराने ज़िंदगी ।

***

© श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

सम्पर्क : आई.सी. 5, सैनिक सोसायटी शक्ति नगर, जबलपुर, (म.प्र.)

मो.07869193927,

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ ग़ज़ल # १२० ☆ चाह है निर्वाण की तो… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे ☆

श्री अरुण कुमार दुबे

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री अरुण कुमार दुबे जी, उप पुलिस अधीक्षक पद से मध्य प्रदेश पुलिस विभाग से सेवा निवृत्त हुए हैं । संक्षिप्त परिचय ->> शिक्षा – एम. एस .सी. प्राणी शास्त्र। साहित्य – काव्य विधा गीत, ग़ज़ल, छंद लेखन में विशेष अभिरुचि। आज प्रस्तुत है, आपकी एक भाव प्रवण रचना “चाह है निर्वाण की तो…“)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ कविता # १२० ☆

✍ चाह है निर्वाण की तो… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे  ☆

☆

जब जलाया दीप मैंने आँधियों के गांव में

तेज हलचल हो गई है बिजलियों के गाँव में

 *

मूर्खता है या दिलेरी आप ही ये तय करें

घर बनाया मूषकों ने बिल्लियों के गाँव में

 *

गर कोई आँखों को  भाने लग गया तो पेशतर

दोस्त रहना सीख ले रुसवाइयों के गाँव में

 *

सामने तारीफ़ करता पीठ पीछे गालियाँ

आदमी क्या रह रहा सरगोशियों के गांव  में

 *

बोलने की थी मनाही हुक्म था सरकार का

है अजूबा शोरगुल खामोशियों के गाँव में

 *

टूटता उसका बदी से जा रहा है वास्ता

आना जाना हो रहा क्या नेकियों के गाँव में

 *

ज़हन में हैवानियत जिसके है तारी हो रही

भेज दो बसने उसे तुम तितलियों के गाँव में

 *

पेट खुद अपना नहीं भर पा रहा है आजकल

कौन भूके आ गए हैं रोटियों के गाँव में

 *

चाह है निर्वाण की तो राह पकड़ो बुद्ध की

भूलकर मत पैर रखना ढोंगियों के गाँव में

 *

आ गया कोई शिकारी जाल रख बन रहनुमा

छटपटाहट है अरुण जो पंक्षियों के गाँव में

☆

© श्री अरुण कुमार दुबे

सम्पर्क : 5, सिविल लाइन्स सागर मध्य प्रदेश

सिरThanks मोबाइल : 9425172009 Email : arunkdubeynidhi@gmail. com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ ग़ज़ल # २७ – वो इन दिनों गुमसुम सा है… ☆ श्री हेमंत तारे ☆

श्री हेमंत तारे 

श्री हेमन्त तारे जी भारतीय स्टेट बैंक से वर्ष 2014 में सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृत्ति उपरान्त अपने उर्दू भाषा से प्रेम को जी रहे हैं। विगत 10 वर्षों से उर्दू अदब की ख़िदमत आपका प्रिय शग़ल है। यदा- कदा हिन्दी भाषा की अतुकांत कविता के माध्यम से भी अपनी संवेदनाएँ व्यक्त किया करते हैं। “जो सीखा अब तक,  चंद कविताएं चंद अशआर”  शीर्षक से आपका एक काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुका है। आज प्रस्तुत है आपकी एक कविता – वो इन दिनों गुमसुम सा है…।)

✍ वो इन दिनों गुमसुम सा है… ☆ श्री हेमंत तारे  ☆

☆

मैं खुद से   बेखबर हूँ,  इबादत करूं तो क्या

रोजा नमाज़ और दीन का असरे हयात क्या

*

मेरा खुदा मुहब्बत, इंसानियत और सादगी

बेगाना-ए-अलम हूँ, वो काफ़िर कहे तो क्या

*

वो इन दिनों गुमसुम सा है रूठा हुआ भी है

मौसम सुहाना, हर खुशी चारों तरफ तो क्या

*

कुछ लोग दग़ा देंगे, ये तिजारत का उसूल है

मलाल करना छोड़िए, ख़सारा हुआ तो क्या

*

वाल्देन का एहितराम, जो कभी न कर सका

गैरों की खिदमत रात- दिन करता रहे तो क्या

*

सदाक़त की राह “हेमंत” कभी भी न छोडना

ख़ार मिलते रहेंगे तुझको ग़ुल ना मिले तो क्या

☆

© श्री हेमंत तारे

मो.  8989792935

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ३५ ☆ लघुकथा – कब्जा… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

डॉ सत्येंद्र सिंह

(वरिष्ठ साहित्यकार डॉ सत्येंद्र सिंह जी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत। मध्य रेलवे के राजभाषा विभाग में 40 वर्ष राजभाषा हिंदी के शिक्षण, अनुवाद व भारत सरकार की राजभाषा नीति का कार्यान्वयन करते हुए झांसी, जबलपुर, मुंबई, कोल्हापुर सोलापुर घूमते हुए पुणे में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी के पद से 2009 में सेवानिवृत्त। 10 विभागीय पत्रिकाओं का संपादन, एक साझा कहानी संग्रह, दो साझा लघुकथा संग्रह तथा 3 कविता संग्रह प्रकाशित, आकाशवाणी झांसी, जबलपुर, छतरपुर, सांगली व पुणे महाराष्ट्र से रचनाओं का प्रसारण। जबलपुर में वे प्रोफेसर ज्ञानरंजन के साथ प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े रहे और झाँसी में जनवादी लेखक संघ से जुड़े रहे। पुणे में भी कई साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। वे मानवता के प्रति समर्पित चिंतक व लेखक हैं। अप प्रत्येक बुधवार उनके साहित्य को आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय लघुकथा – “कब्जा… “।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ३५ ☆

✍ लघुकथा – कब्जा… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

राम बिहारी त्रिपाठी जब से अधिकारी वर्ग में प्रमोट हुए तभी से वे और अधिक विनम्र हो गए।  उनमें लेशमात्र भी परिवर्तन नहीं आया। साथ के लोग कहते कि त्रिपाठी जी अब अधिकारी बन गए हो तो उसी हिसाब से रहा कीजिए। वे कहते,  रहने का कौन सा हिसाब किताब होता है। ईश्वर ने काम करने का अवसर प्रदान किया है तो पूरे मन से काम करना चाहिए, यही मेरा हिसाब किताब है और कुछ नहीं। वैसे सभी उनकी ईमानदारी, मेहनत और व्यवहार को पसंद करते थे। हर जगह और हर वर्ग में कुछ न कुछ संगठन के नाम पर भी कुछ होता रहता है। वहां भी एक अधिकारी एसोसिएशन था। एसोसिएशन के अध्यक्ष उपाध्यक्ष सचिव सहायक सचिव जैसे पदों पर अधिकारी लोग आसीन थे पर कोई काम नहीं करता था।  एक दिन लंच के समय कुछ अधिकारी बैठे हुए थे जिनमें त्रिपाठी जी भी थे।  एसोसिएशन के अध्यक्ष चौधरी साहब ने कहा, त्रिपाठी जी अब आप अधिकारी बन गए हैं तो एसोसिएशन में भी थोड़ी रुचि रखा कीजिए।  उन्होंने कहा कि जी कहिए क्या करना है। चौधरी साहब ने कहा कि आप एसोसिएशन के सचिव का काम संभाल लीजिए। बस हर महीने की आखरी तारीख को सभी अधिकारियों को फोन करके मीटिंग करना है।

त्रिपाठी जी एसोसिएशन के सचिव के रूप में काम देखने लगे। उच्च अधिकारियों के साथ बैठक में उपस्थित रहते और हैडक्वार्टर स्तर  पर भी बैठकों में रहते। समयानुसार अपनी राय देते।  वे सभी अधिकारियों के संपर्क में रहते और बैठकों के निर्णय सभी से साझा करते। सब ठीक चल रहा था। अध्यक्ष चौधरी साहब रिटायर होने वाले थे। कई अधिकारी अध्यक्ष बनना चाहते थे पर उनके पास एसोसिएशन के लिए समय नहीं था। एक अधिकारी त्रिपाठी जी के प्रति कुछ अधिक ही अच्छा व्यवहार करने लगे और उनके हर काम में सहयोग का वादा करने लगे। दोनों साथ साथ चाय पीते। त्रिपाठी जी उनसे बहुत प्रभावित हो गए और सोचने लगे कि अध्यक्ष के चुनाव में उनके नाम का प्रस्ताव रखेंगे तो ठीक रहेगा।

महीने के आखिरी दिन बैठक के साथ साथ एसोसिएशन का वार्षिक अधिवेशन भी हुआ जिसमें त्रिपाठी जी ने चौधरी साहब की जगह अध्यक्ष पद के लिए उक्त अधिकारी के नाम का प्रस्ताव रखा और सभी ने उनके प्रस्ताव का समर्थन किया और अध्यक्ष का मनोनयन हो गया।  महीने की आखरी तारीख को त्रिपाठी जी महाप्रबंधक के चैंबर के आगे से निकल रहे थे तो उन्होंने चैंबर से निकलते हुए नवनिर्वाचित अध्यक्ष को देखा तो वे बोले कि आज आखिरी तारीख है शाम को एसोसिएशन की बैठक के लिए सभी को फोन कर दिया है। नवनिर्वाचित अध्यक्ष थोडे मुस्कुराए और बोले, काहे की बैठक। मैं महाप्रबंधक के साथ बैठक करके ही आ रहा हूँ। सबको क्यों परेशान करते हैं। यह सुनकर त्रिपाठी जी स्तब्ध रह गए और एक संस्था पर एक व्यक्ति का कब्जा होते हुए देखते रहे।

☆

© डॉ सत्येंद्र सिंह

सम्पर्क : सप्तगिरी सोसायटी, जांभुलवाडी रोड, आंबेगांव खुर्द, पुणे 411046

मोबाइल : 99229 93647

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कथा-कहानी # # १२८ – सबसे खास: हमारे बॉस – भाग – २ ☆ श्री अरुण श्रीवास्तव ☆

श्री अरुण श्रीवास्तव

(श्री अरुण श्रीवास्तव जी भारतीय स्टेट बैंक से वरिष्ठ सेवानिवृत्त अधिकारी हैं। बैंक की सेवाओं में अक्सर हमें सार्वजनिक एवं कार्यालयीन जीवन में कई लोगों से मिलना   जुलना होता है। ऐसे में कोई संवेदनशील साहित्यकार ही उन चरित्रों को लेखनी से साकार कर सकता है। श्री अरुण श्रीवास्तव जी ने संभवतः अपने जीवन में ऐसे कई चरित्रों में से कुछ पात्र अपनी साहित्यिक रचनाओं में चुने होंगे। उन्होंने ऐसे ही कुछ पात्रों के इर्द गिर्द अपनी कथाओं का ताना बाना बुना है। प्रस्तुत है एक अप्रतिम श्रृंखला “सबसे खास: हमारे बॉस”।) 

☆ कथा-कहानी # १२७ – सबसे खास: हमारे बॉस – भाग – २ ☆ श्री अरुण श्रीवास्तव ☆

(मेरी यह लेखन श्रंखला किसी “विशेष व्यक्तिनुमा बॉस”की आलोचना के उद्देश्य से नहीं लिखी जा रही है, बल्कि इस पद से जुड़ी भ्रांतियों के उल्लेख से जुड़ी हैं।”समालोचना”ही सही जीवनशैली होती है, अभी यह श्रंखला लंबी चलेगी और इसमें हर तरह के रंग मिलेंगे, क्योंकि लोग शौक से, ध्यान से पढ़ रहे हैं और चाहते हैं कि ये सिलसिला जल्दी समाप्त न हो। उनकी राय मुझे व्यक्तिगत रूप से भी मिल रही है। अगर इन पोस्ट को पढ़कर हम सभी आनंदित हों तो समझिए कि गाड़ी सही दिशा में चल रही है और हम सेवाकाल रूपी नदी को पार कर दूसरे किनारे पर उतरकर खड़े हैं। हमारे सामाजिक जीवन में घटित या घट रही विसंगतियों पर चुटकी लेना, हर ईमानदार व्यंग्य लेखन का धर्म होता है। सुप्रसिद्ध व्यंग्यकार स्वर्गीय हरिशंकर परसाई जी की कलम की धार ने कभी समझौता नहीं किया, साहित्यिक संस्थाओं का सम्मान तो स्वीकारा पर शासकीय पुरस्कारों को हमेशा ही ठुकराया। इसलिए ही उनका स्थान साहित्य जगत और उनके पाठकों के दिलों में अविस्मरणीय बन गया है।)

इंग्लिश ग्रामर पढ़ाई जाती रही उस वक्त जब अंग्रेजी भाषा की पढ़ाई शुरु होती थी, और यह पुण्य कार्य वे किया करते थे जिनका दिवस हम प्रतिवर्ष पांच सितंबर को मनाते हैं अर्थात शिक्षक दिवस। छात्र इस विधा में कितना प्रवीण हो पाये ये उनकी छड़ी,डांट,कलम बतलाती थी,पढ़ाना उनका दायित्व तो था पर एंड रिजल्ट उनके बस में नहीं था। उनके छात्र साल दर साल इस शिक्षण में क्या याद रख पाये और कितना भूल पाये ये उस वक्त उनके सामने आता है  जब उनका पारा अपने बॉस से पड़ता है और ग्रामर सुधारने के नाम पर उनके बॉस का कर्तव्य बोध अक्सर जाग जाता है।

To change ‘has to have, may be to might be, will be to would be’ or vice versa is the favorite task of many Bosses however there are some good examples where some minor changes and rearrangement of sentences have glorified the draft letter. This talent should be compulsory to be a good Boss.

ड्राफ्टिंग ऐसा विषय है जिसकी कोई पढ़ाई नहीं होती, डिग्री नहीं होती,अत: यह एक जन्मजात प्रतिभा ही मान ली जाती है।लोग ये मान लेते हैं कि भाई ये तो इस काम में या सिर्फ इसी काम में मास्टर है तो क्यों न इसको काम पर लगाया जाये।लीव एप्लिकेशन ही ऐसी विधा है जो अपनी जरूरतों के कारण अपने आप सीखी जाती है। बैंक ने अपने सैनिकों की ड्राफ्टिंग के इस वीक पाइंट को समझते हुए ,और उनकी रणनीतिक क्षमता को वरीयता प्रदान बहुत से “फिल अप द ब्लेंक” वाले फार्मेट प्रचलन में लायें जिन्हें लोग आसानी से भरकर अपना और बैंक का भी काम कर सकें। “ऑब्जेक्टिव टेस्ट” जैसे खूबसूरत प्रतियोगिता प्रश्न पत्र अस्तित्व में आये जहां परीक्षार्थी को ए,बी, सी डी और none of the above में से किसी एक पर टिक लगा कर अपना ज्ञान कसौटी पर कसना पड़ता है।उनके लिये ये युद्ध क्षेत्र उनके मनमुताबिक बना जो लीव एप्लिकेशन के अलावा हर पत्र लिखने के दुरूह कार्य से कन्नी काटते रहे।

वाट्स एप की ईज़ाद भी ऐसे ही किसी सिद्धहस्त “वैज्ञानिक संत” ने की जो यह अच्छी तरह जानता था कि जिम्मेदारियां खिसकाने में हम लोगों का कोई मुकाबला नहीं है।”फारवर्डेड मैसेज” के दम पर दुकान सजाने और प्राप्त ज्ञान को जल्द से जल्द “खुद से दूर कर सही या सभी मित्रों और कलीग्स, रिश्तेदारों को भेजने की” जन्मजात प्रतिभा ने वाट्स अप को ऐसी ख्याति दी जिसका पृथ्वी के अस्तित्व में आने के बाद कोई दूसरा उदाहरण नहीं है।

आज बस इतना ही क्योंकि मेरे मित्रों कलीग्स और रिश्तेदारों से अब मुझे डर लग रहा है कि कहीं ये मेरी वाट या क्लास न लगा दें।अगली किश्त, स्थितियां तनावपूर्ण पर शांत होने पर आयेगी। अंतराल लंबा नहीं होगा यह पक्का है।

© अरुण श्रीवास्तव

संपर्क – 301,अमृत अपार्टमेंट, नर्मदा रोड जबलपुर 

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈

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