(आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ जी संस्कारधानी जबलपुर के सुप्रसिद्ध साहित्यकार हैं। आपको आपकी बुआ श्री महीयसी महादेवी वर्मा जी से साहित्यिक विधा विरासत में प्राप्त हुई है । आपके द्वारा रचित साहित्य में प्रमुख हैं पुस्तकें- कलम के देव, लोकतंत्र का मकबरा, मीत मेरे, भूकंप के साथ जीना सीखें, समय्जयी साहित्यकार भगवत प्रसाद मिश्रा ‘नियाज़’, काल है संक्रांति का, सड़क पर आदि। संपादन -८ पुस्तकें ६ पत्रिकाएँ अनेक संकलन। आप प्रत्येक सप्ताह रविवार को “साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह” के अंतर्गत आपकी रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है – दोहा ग़ज़ल।)
विज्ञान की अन्य विधाओं में भारतीय ज्योतिष शास्त्र का अपना विशेष स्थान है। हम अक्सर शुभ कार्यों के लिए शुभ मुहूर्त, शुभ विवाह के लिए सर्वोत्तम कुंडली मिलान आदि करते हैं। साथ ही हम इसकी स्वीकार्यता सुहृदय पाठकों के विवेक पर छोड़ते हैं। हमें प्रसन्नता है कि ज्योतिषाचार्य पं अनिल पाण्डेय जी ने ई-अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों के विशेष अनुरोध पर साप्ताहिक राशिफल प्रत्येक शनिवार को साझा करना स्वीकार किया है। इसके लिए हम सभी आपके हृदयतल से आभारी हैं। साथ ही हम अपने पाठकों से भी जानना चाहेंगे कि इस स्तम्भ के बारे में उनकी क्या राय है ?
☆ ज्योतिष साहित्य ☆ साप्ताहिक राशिफल (28 सितंबर से 04 अक्टूबर 2026) ☆ ज्योतिषाचार्य पं अनिल कुमार पाण्डेय ☆
28 सितंबर से 04 अक्टूबर 2026 तक के सप्ताह का साप्ताहिक राशिफल
जय श्री राम! इस सप्ताह 2 अक्टूबर को हमारे राष्ट्र के राष्ट्रपिता महात्मा गांधी जी का जन्मदिन है। महात्मा गांधी जी अक्सर श्री राम जी का नाम लिया करते थे। रघुपति राघव राजा राम उनका सर्वप्रिय भजन था। हम यह भी जानते हैं कि श्री रामचंद्र जी को याद करने के पहले श्री हनुमान जी को याद करना आवश्यक है। श्री हनुमान जी को याद करने के लिए श्री हनुमान चालीसा का पठन पाठन भी जरूरी। इसी तारतम्य में इस सप्ताह की श्री हनुमान चालीसा की चौपाई है –
जो यह पढ़ै हनुमान चालीसा |
होय सिद्धि साखी गौरीसा ||
इस चौपाई के संपुट पाठ करने से भगवान शिव और मां पार्वती जी की कृपा होती है।
नाशे रोग हरे सब पीरा” नाम की पुस्तक में श्रीहनुमान चालीसा की चौपाइयों से संबंधित सभी उपायों का विस्तृत विवरण दिया हुआ है। इस पुस्तक को आप हमारे यहां से प्राप्त कर सकते हैं।
अब मैं पंडित अनिल पाण्डेय आपको इस सप्ताह अर्थात 28 सितंबर से 4 अक्टूबर 2026 तक के सप्ताह के साप्ताहिक राशिफल के बारे में बताऊंगा। मगर इस राशिफल के पहले इस सप्ताह के ग्रहों के गोचर पर नजर डाल लें।
इस सप्ताह सूर्य कन्या राशि में, मंगल और गुरु कर्क राशि में, बुध तुला राशि में, वक्री शनि मीन राशि में और राहु कुंभ राशि में गोचर करेंगे। शुक्र प्रारंभ में तुला राशि में रहेंगे तथा 3 तारीख के 8:37 रात से वे तुला राशि में वक्री हो जाएंगे। आईये अब राशिवार राशिफल की चर्चा करते हैं।
मेष राशि
यह सप्ताह अविवाहित जातकों के लिए उत्तम रहेगा। विवाह के नए-नए प्रस्ताव आ सकते हैं। इस सप्ताह आपको धन लाभ का योग भी बन रहा है। गलत रास्ते से धन आने का भी संयोग भी हो सकता है। व्यापारियों का व्यापार उत्तम गति से चलेगा। आपके शत्रु शांत रहेंगे। अगर आप उनको समाप्त करने के लिए प्रयास करेंगे तो आप उनको समाप्त भी कर सकते हैं। इस सप्ताह 28, 29 और 30 तारीख को आपके सम्मान में वृद्धि हो सकती है। आपको अपने संतान का सहयोग प्राप्त होगा। इस सप्ताह आपके लिए 28 को दोपहर के बाद से लेकर 29 और 30 तारीख विभिन्न प्रकार के कार्यों को करने के लिए उपयोगी है। 28 की दोपहर तक आपको सावधान रहना चाहिए। सप्ताह के बाकी दिन ठीक-ठाक है। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन राम रक्षा स्त्रोत का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन मंगलवार है।
वृष राशि
इस सप्ताह आप को अपने संतान से सहयोग प्राप्त होगा। व्यापारियों का व्यापार ठीक चलेगा। आपके दुश्मन इस सप्ताह शांत रहेंगे। आपका और आपके जीवनसाथी का स्वास्थ्य उत्तम रहेगा। कर्मचारी और अधिकारियों को इस सप्ताह बाद विवाद में कम पड़ना चाहिए। आपको अपने सहयोगियों और अधिकारियों से इस सप्ताह सावधान रहना चाहिए। इस सप्ताह आपके लिए 30 की दोपहर के बाद से लेकर एक और दो तारीख विभिन्न कार्यों को संपन्न करने के लिए उचित हैं। 28, 29 और 30 की दोपहर तक का समय सचेत रहने का है। सप्ताह के बाकी दिन सामान्य है। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन बुधवार है।
मिथुन राशि
इस सप्ताह आपका और आपके जीवनसाथी का स्वास्थ्य उत्तम रहेगा। आपके माताजी और पिताजी का स्वास्थ्य भी सामान्य रहेगा। अर्थात जैसे पहले था वैसा ही रहेगा। आपको अपने संतान से सहयोग प्राप्त होगा। छात्रों को परीक्षा में सफलता प्राप्त होगी। छात्रों की पढ़ाई ठीक-ठाक चलेगी। इस सप्ताह आपके लिए 3 और 4 अक्टूबर उपयोगी है। 30 सितंबर तथा एक और दो अक्टूबर को आपको सावधानी से कार्यों को करना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन काले कुत्ते को तंदूर की रोटी खिलाएं। सप्ताह का शुभ दिन रविवार है।
कर्क राशि
इस सप्ताह आपके प्रतिष्ठा में वृद्धि होगी। जनप्रतिनिधियों के लिए यह सप्ताह अच्छा है। भाग्य से इस सप्ताह आपको सहयोग प्राप्त होगा। आपके माता जी का स्वास्थ्य ठीक रहेगा। भाई बहनों के साथ संबंध सामान्य रहेंगे अर्थात जैसे पहले थे वैसे ही रहेंगे। आपके माता जी को खून संबंधी कोई रोग जैसे ब्लड प्रेशर डायबिटीज आदि हो सकता है। इस सप्ताह आपके लिए 28, 29 और 30 सितंबर कार्यों को करने के लिए प्रभावशाली हैं। 30 सितंबर 1 और 2 को अक्टूबर को आपको धन लाभ हो सकता है। तीन और चार अक्टूबर को आपको सावधान रहकर अपने कार्यों को निपटाना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन हनुमान चालीसा का पाठ करें एवं शनिवार को दक्षिण मुखी हनुमान जी के मंदिर में जाकर हनुमान चालीसा का तीन बार पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन सोमवार है।
सिंह राशि
इस सप्ताह प्रयास करने पर कचहरी के कार्यों में आपको सफलता मिल सकती है। आप अपने शत्रुओं को इस सप्ताह बड़े आसानी के साथ, थोड़े से प्रयास से पराजित कर सकते हैं। धन प्राप्ति का योग बन रहा है। भाई बहनों के साथ अच्छे संबंध रहेंगे। कर्मचारी और अधिकारियों के लिए यह सप्ताह ठीक ठाक रहेगा। उनको अपने कार्यालय में प्रतिष्ठा प्राप्त होगी। इस सप्ताह आपके लिए 30 सितंबर की दोपहर के बाद से लेकर एक और दो तारीख विभिन्न प्रकार के कार्यों के लिए मददगार हैं। 28 की दोपहर तक का समय आपको सावधान रहकर कार्यों को करना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन काले उड़द की दाल का दान करें और शनिवार को शनि मंदिर में जाकर शनि देव का पूजन करें। सप्ताह का शुभ दिन बृहस्पतिवार है।
कन्या राशि
इस सप्ताह आपके पास धन आने का उत्तम योग बन रहा है। व्यापारियों के लिए यह सप्ताह अच्छा रहेगा। उनको व्यापार में लाभ होगा। भाग्य भी इस सप्ताह आपका साथ देगा। इस सप्ताह आपके शत्रु शांत रहेंगे। आपके माता-पिता जी का स्वास्थ्य अच्छा रहेगा। इस सप्ताह आपके लिए 30 सितंबर एक और दो अक्टूबर को भाग्य से मदद मिलने की उम्मीद है। 3 और 4 अक्टूबर को आपको अपने कार्यों में सफलता प्राप्त होगी। 28, 29 और 30 सितंबर को आपको कार्यों को करने में बड़ी सावधानी बरतना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन आदित्य हृदय स्त्रोत का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन रविवार है।
तुला राशि
अविवाहित जातकों के लिए यह सप्ताह अच्छा है। विवाह के प्रस्ताव आ सकते हैं। प्रेम संबंधों में वृद्धि होगी। नए प्रेम संबंध बन सकते हैं। कर्मचारी और अधिकारियों के लिए यह सप्ताह सामान्य है। मगर उनको अपने अधिकारियों से सावधान रहना चाहिए। इस सप्ताह आपको अपने संतान से कम सहयोग प्राप्त होगा। कचहरी के कार्यों में कोई रिस्क नहीं लेना चाहिए। इस सप्ताह आपके शत्रु शांत रहेंगे परन्तु समाप्त नहीं होंगे। इस सप्ताह आपके लिए 28 की दोपहर के बाद से लेकर 29 और 30 तारीख की दोपहर तक का समय विभिन्न प्रकार के कार्यों को करने के लिए परिणाम दायक है। सप्ताह के बाकी दिनों में आपको सावधान रहकर के कार्य करना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन भगवान शिव का दूध और जल से अभिषेक करें। सप्ताह का शुभ दिन शनिवार है।
वृश्चिक राशि
कचहरी के कार्यों में प्रयास करने पर आपको सफलता प्राप्त हो सकती है। धन प्राप्त करने का भी योग है। भाग्य से आपको थोड़ी मदद मिल सकती है परंतु भाग्य के भरोसे इस सप्ताह आप ना रहे। आपको अपने कर्मों पर विश्वास करना चाहिए। आपको अपने संतान से सहयोग प्राप्त हो सकता है। आपका अपने भाई बहनों के साथ संबंध इस सप्ताह सामान्य रहेगा अर्थात जैसा पहले था वैसा ही रहेगा। इस सप्ताह आपके लिए 30 की दोपहर के बाद से लेकर एक और दो अक्टूबर कार्यों को करने के लिए उपयुक्त है। सप्ताह के बाकी दिनों में आपको अपने कार्यों को अत्यंत सावधानी से निपटाना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन लाल मसूर की दाल का दान करें और मंगलवार को हनुमान जी के मंदिर में जाकर कम से कम तीन बार हनुमान चालीसा का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन बृहस्पतिवार है।
धनु राशि
इस सप्ताह आपको धन लाभ की उम्मीद है। व्यापारियों को इस सप्ताह अपने व्यापार में लाभ होगा। कर्मचारी एवं अधिकारियों को भी धन लाभ हो सकता है। इस सप्ताह आपको दुर्घटनाओं से सावधान रहने चाहिए। लंबी यात्रा का योग है। आपका और आपके जीवनसाथी का स्वास्थ्य अच्छा रहेगा। माताजी और पिताजी का स्वास्थ्य पहले जैसा ही रहेगा। इस सप्ताह आपके लिए 3 और 4 अक्टूबर लाभप्रद हैं। 30 सितंबर 1 और 2 अक्टूबर को आपको सावधान रहकर के अपने कार्यों को अंजाम देना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन रुद्राष्टक का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन रविवार है।
मकर राशि
यह सप्ताह कर्मचारियों अधिकारियों के लिए अच्छा है। उनको अपने कार्यालय में प्रशंसा प्राप्त हो सकती है। भाग्य से भी इस सप्ताह आपको थोड़ा बहुत मदद मिल सकता है। परंतु भाग्य के स्थान पर अपने कर्म पर विश्वास करना उचित रहेगा। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप अपने सहकर्मियों और अधिकारियों से किसी प्रकार की लड़ाई ना करें। इस सप्ताह आपको अपने संतान से सहयोग प्राप्त होगा। इस सप्ताह आपके लिए 28, 29 और 30 सितंबर विभिन्न प्रकार के कार्यों के लिए फलदाई है। 30 सितंबर एक और दो अक्टूबर को आपको अपने संतान से अच्छा सहयोग प्राप्त हो सकता है। अगर इस दिन किसी परीक्षा का रिजल्ट निकलता है तो उसमें आपको सफलता प्राप्त होगी। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप तीन और चार अक्टूबर को सावधान रहकर अपने कार्यों को करें। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन शिव पंचाक्षर स्त्रोत का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन बुधवार है।
कुंभ राशि
इस सप्ताह भाग्य आपकी अपनी पूर्ण शक्ति से मदद करेगा। आपको कार्यों को करने का प्रयास करना है। ईश्वर की कृपा से आपको सफलताएं मिल सकती हैं। आप अपने शत्रुओं को इस सप्ताह बड़े आसानी से थोड़े से प्रयासों से ही समाप्त कर सकते हैं। दुर्घटनाओं से आपको इस सप्ताह सावधान रहने की आवश्यकता है। इस सप्ताह आपके माता जी का स्वास्थ्य ठीक रहेगा। इस सप्ताह आपके लिए 30 सितंबर, एक और दो अक्टूबर कार्यों को करने के लिए प्रभावशाली हैं। सप्ताह के बाकी दिन भी ठीक-ठाक है। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन शिव पंचाक्षर मंत्र का जाप करें। सप्ताह का शुभ दिन शुक्रवार है।
मीन राशि
इस सप्ताह आपका अपने भाई बहनों के साथ संबंध सामान्य रहेगा अर्थात जैसा चल रहा था वैसा ही रहेगा। संतान से आपको थोड़ा बहुत सहयोग मिल सकता है। इस सप्ताह आपको किसी भी तरह के दुर्घटना की आशंका नहीं है। दुर्घटनाएं आपसे पूरे सप्ताह भर दूर रहेंगी। इस सप्ताह आपके लिए तीन और चार सितंबर शुभ है। तीन और चार सितंबर को आपके द्वारा किए गए अधिकांश कार्य सफल रहेंगे। 30 सितंबर, 1 अक्टूबर और 2 अक्टूबर को आपको भाग्य के स्थान पर अपने कर्म पर विश्वास करना चाहिए। सप्ताह के बाकी दिन ठीक-ठाक हैं। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन गायत्री मंत्र का जाप करें। सप्ताह का शुभ दिन रविवार है।
ध्यान दें कि यह सामान्य भविष्यवाणी है। अगर आप व्यक्तिगत और सटीक भविष्वाणी जानना चाहते हैं तो आपको मुझसे दूरभाष पर या व्यक्तिगत रूप से संपर्क कर अपनी कुंडली का विश्लेषण करवाना चाहिए। मां शारदा से प्रार्थना है या आप सदैव स्वस्थ सुखी और संपन्न रहें। जय मां शारदा।
☆ मनाचे श्लोक – एक सार्वकालिक ‘मनोपनिषद’… – श्लोक ११३ आणि ११४ ☆ श्री विश्वास देशपांडे ☆
श्लोक क्र. ११३ – –
जनीं हीत पंडित सांडीत गेले ।
अहंतागुणे ब्रह्मराक्षेस झाले ।
तयाहूनि वित्पन्न तो कोण आहे ।
मना सर्व जाणीव सांडूनि राहे ।।११३।।
अर्थ : मोठमोठया पंडितांनी आत्महिताचा जो योग्य मार्ग होता, तो सोडून दिला. त्यांच्यामध्ये (आपल्या ज्ञानाचा) अहंकार निर्माण झाल्याने ते मृत्यूनंतर ब्रह्मराक्षस झाले. खरे तर अशा लोकांपेक्षा विद्वान कोण असू शकेल? तेव्हा हे मना, आपल्या ज्ञानाचा अहंकार बाळगू नकोस.
(हीत सांडीत गेले – आत्मकल्याणाचा श्रेयस्कर मार्ग सोडला, अहंता- गर्व/अभिमान, वित्पन्न – विद्वान, जाणीव – अहंकार)
विवेचन : आपल्या ज्ञानाचा व्यर्थ अहंकार बाळगणाऱ्या विद्वान किंवा पंडितांची मरणोत्तर कशी अवस्था होते ते समर्थांनी या श्लोकात सांगितले आहे. समर्थांच्या या सांगण्याला त्यांच्या आणि त्यांच्या काळातील परिस्थिती कारणीभूत होती. १३ व्या शतकापासून ते अगदी समर्थांच्या काळापर्यंत बऱ्याच शास्त्री पंडितांना आपल्या ज्ञानाचा अतिशय अहंकार होता. काही ग्रंथांचे अध्ययन केले म्हणजे ते स्वतःला प्रकांड पंडित समजत. आपल्यापेक्षा अधिक ज्ञानी कोणी नाही असा अहंकार त्यांना होई. असे पंडित मग आपल्या विद्वत्तेचे प्रदर्शन करण्यासाठी देशोदेशी फिरत. तेथील विद्वानांना चर्चेत हरवून आपण श्रेष्ठ असल्याचे प्रशस्तिपत्रक मिळवीत आणि अभिमानाने ते मिरवीत. अशाच अभिमानी पंडितांनी साधुसंतांना त्रास दिला आहे. आयुष्यभर त्यांचा हाच विद्वत्तेचा अहंकार कायम राहिल्याने अंतकाळी देखील आपण वादात दुसऱ्याला हरवतो आहोत असे दृश्य त्यांना दिसत असे. ‘ अंते मती सा गती ‘ असे म्हटले जाते. असे विद्वान साहजिकच मृत्यूनंतर ब्रह्मराक्षस होत असत. आपल्याकडे अशी समजूत होती की अशा अभिमानी पंडितांना मृत्यूनंतर ब्रह्मराक्षसाची पिशाच्च योनी प्राप्त होते. समर्थ म्हणतात की खरं तर यांच्यापेक्षा विद्वान कोण असू शकत होतं? पण त्यांनी आपल्या ज्ञानाचा सदुपयोग आत्मकल्याणासाठी न करता आपले पांडित्य मिरवण्यासाठी केला.
संत ज्ञानेश्वरांनी आपल्या ग्रंथरचनेचे श्रेय आपले गुरु आणि ज्येष्ठ बंधू निवृत्तीनाथ यांना दिले. स्वामी विवेकानंदांनी आपल्या ज्ञानाचे श्रेय रामकृष्ण परमहंसांना दिले. समर्थ तर स्वतःला रामाचे दास म्हणवून घेत. कोणीही आपल्या ज्ञानाचा अहंकार बाळगला नाही किंवा श्रेय आपल्याकडे घेतले नाही. तुकाराम महाराज तर ‘ फोडिले भांडार, धन्याचा हा माल । मी तंव हमाल भारवाही । असे म्हणतात. एवढी नम्रता संतांकडे असते.
समर्थांच्या चरित्रात एक मजेशीर घटना वाचायला मिळते. समर्थांच्या काळी वामन पंडित म्हणून एक विद्वान होऊन गेले. त्यांचे संस्कृतवर प्रभुत्व होते आणि त्यांनी संस्कृतात ग्रंथरचना केली होती. परंतु सर्वसामान्यांना संस्कृत ग्रंथ वाचणे शक्य नसल्याने त्यांना समर्थांनी मराठीत लिहा म्हणून सांगितले. पण झाले उलटच! हे वामन पंडित समर्थांनाच नावे ठेवू लागले आणि तुम्हीच उलट संस्कृतमध्ये लिहा असे त्यांनी समर्थांना सांगू लागले. एक दिवस प्रवास करीत असताना वामन पंडितांना अंधार झाल्याने एका मोठया झाडाखाली मुक्कामासाठी थांबावे लागले.
त्या झाडाच्या एका फांदीवर एक ब्रह्मराक्षस बसला होता. थोड्याच वेळात तिथे एक दुसरा ब्रह्मराक्षस आला. तो पहिल्या ब्रह्मराक्षसाला म्हणाला, ” मी या शेजारच्या फांदीवर राहू शकतो का? ” तेव्हा तो ब्रह्मराक्षस म्हणाला, ” तू दुसरी जागा शोध. ही जागा मी वामन पंडितांसाठी राखून ठेवली आहे. ” हे ऐकताच वामन पंडितांना दरदरून घाम फुटला. पुढील जन्मी आपण ब्रह्मराक्षस होऊ या भीतीने त्यांची बोबडी वळली. सकाळी धावतच जाऊन त्यांनी समर्थांचे पाय धरले आणि क्षमा मागितली. त्यावेळी समर्थांची प्रशंसा करताना त्यांच्या मुखातून पुढील रचना बाहेर पडली जी आजही समर्थ संप्रदायात म्हटली जाते.
शुकासारिखे पूर्ण वैराग्य ज्याचे । वसिष्ठापरी ज्ञान योगेश्वराचे ।
कवी वाल्मिकीसारिखा मान्य ऐसा ।नमस्कार माझा तया रामदासा ।।
– तेव्हा आपल्या ज्ञानाचा अहंकार बाळगून आत्मकल्याणाचा हितकारक मार्ग सोडू नये, आपल्या ज्ञानाचा उपयोग लोककल्याणासाठी व्हावा हेच समर्थांना येथे सांगायचे आहे.
स्वसंवाद
१. माझ्याकडे असलेल्या पदव्या, ज्ञान किंवा माहितीचा मला वामन पंडितांसारखा ‘व्यर्थ अहंकार’ तर झालेला नाही ना?
२. मी माझ्या ज्ञानाचा उपयोग संतांसारखा समाजाच्या ‘आत्मकल्याणासाठी’ आणि हितासाठी करतो, की केवळ चर्चेत दुसऱ्याला हरवून स्वतःचे ‘पांडित्य मिरवण्यासाठी’ करतो?
३. तुकाराम महाराजांच्या उक्तीप्रमाणे, “मी केवळ एक हमाल असून हे सर्व ज्ञान त्या भगवंताचे आहे” अशी नम्रता माझ्या ठायी आहे का?
४. मृत्यूच्या अंतापर्यंत जर मी माझा ज्ञानाचा किंवा पदाचा अहंकार सोडला नाही, तर माझ्याही वाट्याला वैचारिक किंवा शापयुक्त ‘ब्रह्मराक्षसाचे’ जिणे तर येणार नाही ना?
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श्लोक क्र. ११४ – –
फुकाचे मुखीं बोलता काय वेचे ।
दिसेंदीस अभ्यंतरी गर्व सांचे ।
क्रियेवीण वाचाळता वेर्थ आहे ।
विचारे तुझा तूंचि शोधून पाहें ।।११४।।
अर्थ : उगीचच बडबड करून व्यर्थ ज्ञान पाजळल्याने काहीच साधत नाही. मनातील अहंकार मात्र दिवसेंदिवस वाढतो. आचरण न करता केलेली बडबड व्यर्थ आहे. म्हणून हे मना, ही गोष्ट खरी आहे की नाही हे तू स्वतः शोधून काढ.
(काय वेचे – काही साधत नाही, अभ्यंतरीं – अंतरात, साचे – साठत जातो)
विवेचन : आधीच्या श्लोकात आपल्या ज्ञानाचा अहंकार बाळगणाऱ्या विद्वानांची अंती काय गत होते ते समर्थांनी आपल्याला सांगितले. या श्लोकात ते व्यर्थ पोकळ बडबड करून आपल्या ज्ञानाचे प्रदर्शन करणाऱ्या दांभिक लोकांवर कोरडे ओढतात. ‘ उथळ पाण्याला खळखळाट फार ‘ अशी आपल्याकडे म्हण आहे. थोडाफार अभ्यास केलेली माणसे आपल्याला फार कळते म्हणून व्यर्थ बडबड करीत असतात. कीर्तन, प्रवचने किंवा सभा संमेलनात अशी अनेक माणसे आपण पाहतो. त्यांच्याजवळ उत्तम वक्तृत्व असते. आपल्या वक्तृत्व कौशल्याच्या जोरावर ते श्रोत्यांवर प्रभाव टाकण्यात यशस्वी होतात. त्यातून त्यांचा अहंकार फुलत जातो. त्यांना कोणी काही सांगितले तरी त्यांची ऐकून घेण्याची तयारी नसते. आपल्या पांडित्याच्या जोरावर आपलेच म्हणणे कसे बरोबर आहे हे ते दुसऱ्यांना पटवून देण्याचा प्रयत्न करतात.
आजकाल ज्ञान देणारी खूप साधने उपलब्ध झाली आहेत. दूरदर्शन, वृत्तपत्रे, समाजमाध्यमे यातून दररोज निरनिराळी माहिती आपल्यापर्यंत पोहोचत असते. पण त्यातील खरी किती आहे, त्याला खरोखर अनुभवाची जोड आहे का हे पारखून घेणे महत्त्वाचे असते. जो तो माझेच म्हणणे कसे बरोबर असे सांगून आपले मत लोकांच्या माथी मारण्याचा प्रयत्न करीत असतो.
व्यवहारात आपण अशी अनेक माणसे पाहतो की जी व्यासपीठावरून बोलतात एक आणि करतात वेगळेच. वैयक्तिक जीवनात त्यांच्या वागण्यात विसंगती आढळते. हा शुद्ध दांभिकपणा आहे. आपण जे काही सांगतो, त्यामागे काही एक तपश्चर्या किंवा साधना असणे आवश्यक असते. जे ज्ञान आपण प्राप्त केलेले असते, ते आचरणात आणणे ही पहिली पायरी आहे. नंतरच ती गोष्ट लोकांना सांगण्याचा अधिकार आपल्याला प्राप्त होतो. ‘अभ्यासोनि प्रकटावे ‘असे समर्थांचे सांगणे आहे. एखादी गोष्ट केवळ आपल्याला माहीत आहे पण आपण स्वतः ती कधी आचरणात आणली नाही अशी गोष्ट दुसऱ्यांना सांगू नये. आपल्या बोलण्याला तेव्हाच वजन प्राप्त होते, जेव्हा आपण ती गोष्ट आचरणात आणतो. नाहीतर ती केलेली बडबड व्यर्थ आहे. म्हणूनच समर्थ म्हणतात, ‘ क्रियेवीण वाचाळता व्यर्थ आहे. ‘
स्वतःचे मन हा आपले प्रतिबिंब पाहण्याचा एक उत्तम आरसा आहे. आपण बोललो आहे ते कितपत बरोबर आहे, आपण स्वतः ते आचरणात आणतो का हे आपले मन आपल्याला सांगत असते. म्हणून प्रत्येकाने आत्मपरीक्षण करून आपल्या वागण्याबोलण्याविषयी विचार करावा. म्हणूनच समर्थ या श्लोकातील शेवटच्या चरणात म्हणतात, ‘ विचारे तुझा तूंचि शोधूनि पाहे. ‘ प्रत्येक श्लोकाच्या शेवटी दिलेले स्वसंवादाचे प्रश्न देखील असेच आत्मपरीक्षण आपल्याकडून व्हावे यासाठी आहेत.
स्वसंवाद :
१. मी चारचौघांत किंवा समाजमाध्यमांवर जे मोठे विचार मांडतो, ते मी केवळ ‘वक्तृत्वाचा प्रभाव’ पाडण्यासाठी मांडतो की प्रत्यक्षात आचरणातही आणतो?
२. संतांनी सांगितल्याप्रमाणे, माझ्या व्यर्थ बडबडीतून किंवा वाद घालण्यातून माझ्या अंतरात केवळ ‘गर्व’ साठत चालला आहे का?
३. माझ्याकडे येणारी कोणतीही माहिती किंवा ज्ञान पुढे सांगण्याआधी मी ‘अभ्यासोनि प्रकटावे’ या सूत्राचा अवलंब करतो का?
४. ‘क्रियेवीण वाचाळता व्यर्थ आहे’ हे ओळखून, मी माझ्या स्वतःच्या मनालाच आरसा बनवून माझ्या ‘कथनी आणि करणीतील’ फरकाचे आत्मपरीक्षण करण्यास तयार आहे का?
☆ लघुकथा ☆ ~ दादी~ ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆
कमर पर हाथ रखे हुए लगभग ८० वर्ष की दादी ने जब अपनी नजर ऊपर की तरफ उठाई, तो एक सुंदर सा स्मार्ट बालक उनकी नजरों के सामने था।
दादी ! आपके किस पैर में दर्द है? आप बैठ जाइए, मैं इसे देखता हूँ।
तुम कौन हो बेटा? तुम्हें किसने भेजा है?.. उस वृद्ध महिला ने उस नौजवान से पूछा .
दादी, दादी मैं आपका पोता हूँ ? अरे.. अरे हाँ, नहीं दादी ! मैं कृष हूँ , आपका फिजियोथैरेपिस्ट। बुआ जी ने भेजा है दादी।
हाँ..बुआ जी ने मुझसे कहा है कि मैं आपके यहाँ प्रतिदिन आऊँ और आपकी एक्सरसाइज कराऊँ।
दादी तखत पर लेट गयीं। कृष ने उनकी एक्सरसाइज करानी शुरू कर दी। वह प्रतिदिन आता, दादी..दादी कहते हुए, कमरे में प्रवेश करता और दादी की एक्सरसाइज कराता। कृष के रूप में दादी को उनका पोता मिल चुका था तो वहीं कृष जिसकी आँखों ने न दादी और न ही नानी किसी को देखा था, उसे एक नई दादी और नानी मिल गयी थी।
उसकी स्वयं की दादी और नानी, उसके जन्म से बरसों पहले ईश्वर को प्यारी हो गयी थीं।
शायद इसी कारण, ईश्वर ने उसपर कृपा की और उसे उस वृद्ध महिला के रूप में उसकी दादी मिल गई थी। दादी का दर्द न जाने फिजियोथैरेपिस्ट के फिजियो करने से कम हुआ या पौत्र के रूप में कृष के मिलने से कम हुआ, यह हम नहीं कर सकते हैं, लेकिन दर्द तो पहले से बहुत कम था। अब कृष, दादी के घर में बेरोक -टोक आया करता था। दादी के घर में जब कुछ खास चीजें बनती, दादी उसे सहेज कर, अपने कृष के लिए अवश्य रखती। दादी का दुर्भाग्य था कि उनका इकलौता बेटा और एकलौता पौत्र दोनों ही उनके पास रहकर भी दूर थे।
वे सभी दादी के घर से तीन चार मकान आगे,उसी गली रहते थे, लेकिन बीबी की धमक, स्वयं बुजुर्ग हो रहे, पुत्र पर काफी भारी पड़ रही थी। उसकी हिम्मत इतनी नहीं थी कि वह खुले आम जाकर अपनी माँ को देख ले, उनका हाल-चाल पूछ ले।
हालाँकि उसकी यह बंदिश उतनी बड़ी रही थी जितनी कहानी में कहीं जा रही थी। स्वभावत: अब दादी का यह बुजुर्ग बेटा, अपनी माँ से मिलना नहीं चाहता था। निराशा भाव में भीग चुका दादी का यह बेटा! शुरुआती दौर में मजबूरी के कारण, लेकिन बाद में अपने बदले हुए स्वभाव के कारण, अपनी माँ से नहीं मिलता था।
उसकी माँ भी अब उससे घृणा करने लगी थी। वह अपने ऐसे मनहूस -नीरस पुत्र से बिल्कुल बात नहीं करना चाहती थी, जिसने उनकी जिंदगी में कष्ट के कांटे रोप दिए थे।
इधर कृष की कितनी भी व्यस्तता में हो, वह फिजियो- एक्सरसाइज कराने के लिए दादी के यहाँ तो अवश्य जाता था। दादी और उनका यह पोता, नि:स्वार्थ भाव से एक दूसरे से मिलते थे। दादी अपने इस फिजियोथैरेपिस्ट पोते को जब तक देखती नहीं थीं, उन्हें चैन ही नहीं मिलता था। हालाँकि दादी की इकलौती बेटी, यानि बुआ जी, समय से कृष को उनकी एक्सरसाइज का चार्ज दे दिया करती थी। दादी की एक्सरसाइज करते हुए दो वर्षों से अधिक हो गए थे। अक्सर कृष सोचता कि आखिर बुआ जी, दादी की एक्सरसाइज पर इतने पैसे क्यों खर्च करती हैं। यह तो बस बुढ़ापे वाली एक ऐसी पीड़ा का एक छोटा सा उपाय है, जिसमें कुछ समय के लिए दर्द से आराम मिलता है, पर दर्द बिल्कुल चला जाए ऐसा नहीं होता है। जीवन में अपना सब कुछ खो चुकी, बुआ जी, अपनी ८० वर्षीय माँ के इस पौत्र प्रेम की खुशी को छिनना नहीं चाहती थीं।
एक दिन कृष दादी की फिजियोथैरेपी करने, दादी के घर पहुँचा तो वहाँ सन्नाटा पसरा हुआ था। दो, चार, दस लोग दादी के शव के पास बिल्कुल शांत मुद्रा में बैठे हुए थे।
इधर दादी अपनी आँखों को बंद कर चिर निद्रा में सो चुकी थीं। इस मार्मिक दृश्य को देखकर कृष की आँखों से आँसू के दो बून्द छलक पड़े, मानो आँसू के ये दो बूँद, दादी के चरणों में श्रद्धा सुमन के रूप में गिरे हो रहे हों।
वहीं शव से दूर अकेले में बैठे एक शख्स, जिससे कोई भी बात नहीं कर रहा था, उसकी आँखें न जाने अतीत की किन यादों में खोयी हुईं थी, यह पता नहीं चल पा रहा था। शायद पश्चाताप की अग्नि में जलकर उसके आँशु अब स्वाहा हो गये थे।
मृत्यु के तीसरे दिन शांति पाठ के दिन भी कृष दादी के घर पहुँचा था। उसके हाथों में श्रद्धा के पुष्प थे, जिसे वह दादी के चित्र पर अर्पित करते हुए मन ही मन कह रहा था,दादी, अब मैं किसे दादी कहूँगा और किसकी फिजियोथैरेपी करूँगा।
आप बहुत याद आएँगी.. दादी।
नोट :- इस लघु कथा की कहानी के पात्र के नाम काल्पनिक है। लेखक के मन में उपजे हुए भाव के आधार पर यह कहानी लिखी गई है। यदि कहानी किसी व्यक्ति चरित्र से मेल खाती है तो इसे मात्र संयोग समझाया जाए।
( प्रो डॉ राजेश ठाकुर जी का मंतव्य उनके ही शब्दों में – “पाखण्ड, अंध विश्वास, कुरीति, विद्रूपता, विसंगति, विडंबना, अराजकता, भ्रष्टाचार के खिलाफ़ जन-समुदाय को जागृत करना ही मेरी लेखनी का मूल प्रयोजन है…l” अब आप प्रत्येक शनिवार डॉ राजेश ठाकुर जी की रचनाएँ आत्मसात कर सकते हैं. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण रचना “तो जानें…“.)
(श्री सुरेश पटवा जी भारतीय स्टेट बैंक से सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों स्त्री-पुरुष “, गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व प्रतिसाद मिला है। अब आप प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकते हैं यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर।)
यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – गढ़चिरौली यात्रा – भाग- ४९ ☆ श्री सुरेश पटवा
8.गढ़चिरौली यात्रा
गढ़चिरौली
सुबह उठकर गढ़चिरौली ज़िले की अहेरी तहसील में स्थित सघन सागौन वन की सैर को निकल गए। गढ़चिरौली जिले का गठन 26 अगस्त 1982 को चंद्रपुर से गढ़चिरौली और सिरोंचा तहसीलों को अलग करके किया गया था। गढ़चिरौली जिला महाराष्ट्र के उत्तरी-पूर्वी कोने में स्थित है। यह पश्चिम में चंद्रपुर, उत्तर में गोंदिया, पूर्व में छत्तीसगढ़ राज्य के दुर्ग, राजनांदगाँव, बस्तर और जगदलपुर ज़िले और दक्षिण पश्चिम में तेलंगाना राज्य के करीमनगर और आदिलाबाद जिलों से घिरा है। गढ़चिरौली आदिवासी ज़िला है। मुख्य निवासी गोंड और माडिया समुदाय के लोग है। एक खास बात यहाँ 1972 से बंगाली समुदाय के शरणार्थी विस्थापित किए गए हैं।
मध्य भारत के गोंडवाना साम्राज्य का इतिहास बहुत प्राचीन एवं समृद्ध रहा है। यहां अनेक गोंड राजाओं ने शासन किया है। सर्वाधिक समय तक राजा यादवराय के 62 वंशजों (यादवराय से लेकर सुमेदशाह तक) ने शासन किया। इस वंश में महान प्रतापी राजा संग्राम शाह (48वें) हुए। इन्होने युद्ध करके अनेक राजाओं को हराया और 52 गढ़ स्थापित किये। गोंडों के 36 राज्य उत्तर में रायगढ़ से दक्षिण में गढ़चिरोली तक और 16 राज्य गढ़ मंडला से मकड़ाई रियासत तक, इस प्रकार कुल 52 राज्यों का समूह गोंडवाना साम्राज्य कहलाता था। महाराजा संग्राम शाह का विशाल साम्राज्य जिन 52 गढ़ों तक फैला था, जिनकी सीमा पश्चिम में गिन्नौर गढ़ भोपाल, पूरब में लाफागढ़ बिलासपुर, उत्तर में सिंगोरगढ़, दमोह और दक्षिण में टीपागढ़ (गढ़चिरोली) महाराष्ट्र तक फैला था। इस तरह राजा संग्राम सिंह ने 52 गढ स्थापित करके दिल्ली के सुल्तान इब्राहीम लोदी से 1480 ई० में महाराजा और शाह की उपाधि धारण की थी।
प्राचीन काल में इस क्षेत्र पर राष्ट्रकूट, चालुक्य, देवगिरि के यादव और बाद में गढ़चिरौली के गोंडों का शासन था। 13 वीं शताब्दी में खांडक बल्लाल शाह ने चंद्रपुर की स्थापना की और इसे अपनी राजधानी बनाया। चंद्रपुर बाद में मराठा शासन में आया। 1853 में, बरार जिसमें चंद्रपुर (जिसे चंदा कहा जाता था) का हिस्सा भी था, ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी को सौंप दिया गया था। 1854 में चंद्रपुर सेंट्रल प्रांत एंड बेरार का एक स्वतंत्र जिला बन गया।
लॉर्ड कर्ज़न की राज्य पुनर्गठन योजना के अंतर्गत 1905 में अंग्रेजों ने चंद्रपुर और ब्रम्हपुरी से एक-एक जमींदारी संपत्ति का हस्तांतरण करके गढ़चिरौली तहसील बनाई। यह 1956 तक सेंट्रल प्रांत का हिस्सा था, जब राज्यों के पुनर्गठन के साथ, चंद्रपुर को बॉम्बे राज्य में स्थानांतरित कर दिया गया था। 1960 में, जब महाराष्ट्र बनाया गया, चंद्रपुर नए राज्य का एक जिला बन गया। 26 अगस्त 1982 को चंद्रपुर का विभाजन हुआ, जिसमें गढ़चिरौली तहसील एक स्वतंत्र जिला बन गया। गढ़चिरौली में नक्सलवाद की जड़ें जमी हैं। छापामार लड़ाके पहाड़ियों और घने जंगलों में रहते हैं और इसे रेड कॉरिडोर के हिस्से के रूप में नामित किया गया है।
गढ़चिरौली से तेलंगाना राज्य की सीमा पर दक्षिण दिशा में अल्लापल्ली नाम का वन आच्छादित गाँव है। अल्लापल्ली आमतौर पर गोंडवाना गांव है, लेकिन अब, कई लोग शिक्षा, व्यवसाय और जीविका कमाने के उद्देश्य से वहां आ बसे हैं। अल्लापल्ली के जंगल विश्व प्रसिद्ध सागौन की लकड़ी के ख़ज़ाने हैं। अल्लापल्ली से परमिली- भामरागढ़ रोड पर 07 किलोमीटर दूर 100 साल पहले वैज्ञानिक प्रबंधन के तहत मूल जंगल के रूप में संरक्षित ‘ग्लोरी ऑफ अल्लापल्ली’ वन पारिस्थितिकी के एक जीवित संग्रहालय के रूप में प्रसिद्ध है। जहाँ पर 500 वर्ष पुराने सागौन के 120 फ़ुट ऊँचे पेड़ मौजूद हैं। जिसे सागौन कहा जाता है वह साग का पेड़ है, एक जगह पर बहुत अधिक संख्या में साग के पेड़ होने से उसे सागवन पुकारा जाने लगा, वही सागवन कालांतर में सागौन हो गया।
पहले अल्लापल्ली हैदराबाद के निज़ाम के नियंत्रण में था। बाज़ीराव ने मराठवाड़ा को जीतकर नियंत्रण में लिया तब इस इलाक़े को नागपुर के राघोजी भोसले के अधीन रख दिया। इसलिए अल्लापल्ली तहसील की जनसंख्या मुख्यतः तेलुगु भाषी है लेकिन गावों में गोड़ों की बसावट है। वर्तमान में अल्लापल्ली महाराष्ट्र के गढ़चिरौली ज़िले की तहसील ऐटापल्ली का एक ब्लॉक है।
रेंज फ़ारेस्ट आफ़िसर गणेश लाँड़गे ने बताया कि जिस गेस्ट हाऊस में हम रुके हैं वह अंग्रेजों द्वारा 1910 में बनाया गया था। अल्लापल्ली से 130 किलोमीटर दक्षिण दिशा में हत्थी केम्प बनाया गया है। लकड़ी उठाने और ढ़ोने के लिए कुछ हाथी आसाम के काज़ीरंगा पार्क से लाए गए थे। मशीनीकरण से बेरोज़गार हाथियों को सेवानिवृत्त करके एक पहाड़ी इलाक़े में रखा गया है। जहाँ उन्हें सप्ताह में दो बार चावल गुड घी और केलों का भोजन कराने हेतु एक तालाब के बीच बने हत्थी केम्प में लाया जाता है। उनके पैरों में लोहे की मोटी ज़ंजीर बांधी है जिनके घिसटने से भूमि पर बनने वाले निशानों से वनरक्षक उनकी गतिविधियों पर नज़र रखते हैं और भोजन के दिन उन्हें हाँका लगाकर हत्थी केम्प लाते हैं।
सबसे वयोवृद्ध हथिनी का नाम रूपा है, उसकी उम्र अस्सी साल बतायी जाती है। अल्लापल्ली की पुरानी हथिनी बसंती वहाँ के सबसे पुराने हाथी महालिंगा के संसर्ग से बच्चा नहीं दे रही थी इसलिए एक अन्य जवान हथिनी रूपा को हाथियों की संख्या बढ़ाने हेतु नागझिरा से अल्लापल्ली लाया गया। रूपा के पहुँचने से बसंती के कान खड़े हो गए। उसने महालिंगा पर कड़ी नज़र रखना शुरू कर दिया। दूसरी तरफ़ बसंती रूपा को चिंघाड़ कर चुनौतीपूर्ण धमकी देने लगी। एक दिन महलिंगा नज़र बचाकर रूपा के नज़दीक पहुँच सूँड़ से प्रेम का इज़हार करने लगा तो बसंती क्रोध से उफनते हुए रूपा पर टूट पड़ी और उसे धमकाकर घने जंगल में पहुँचा कर दम लिया। इस घटना के बाद वन अधिकारियों ने रूपा को तालाब की दूसरी तरफ़ आधे किलोमीटर लम्बी ज़ंजीरों से बांधकर वहीं उसके भोजन का इंतज़ाम कर दिया ताकि बसंती के दाम्पत्य जीवन में व्यवधान उत्पन्न न हो।
रूपा को अल्लापल्ली जंगल में बच्चे पैदा करके हाथियों की वंशवृद्धि का उद्देश्य पूरा न होते देख वन अधिकारियों ने केरल और आसाम से पशु विशेषज्ञ बुलाकर बसंती को एक साल तक कुछ इंजेक्शन दिए तो वह गर्भवती हुई और उसने बीस महीनों के बाद एक बच्चा जना, जिसका नाम प्रसिद्ध फ़िल्मी खलनायक अजीत के नाम पर रखा गया। बदली हुई परिस्थितियों में यह विचार करके कि शायद माँ बनने के बाद बसंती अब महालिंगा से रूपा को गर्भवती होने देगी। रूपा को उसके नज़दीक लाने की कोशिश की लेकिन बसंती ने अपनी मातृ सत्तात्मक पकड़ ज़रा सी भी ढ़ीली नहीं की। रूपा फिर एक बार मायूस हुई।
कुछ सालों बाद अजीत जवान हो गया। रूपा की निगाह अजीत पर पड़ी। उसे भरोसा था कि बसंती अपने बच्चे अजीत के समागम से प्रजनन नहीं करेगी तो अजीत अंततोगत्वा उससे संसर्ग करेगा क्योंकि इलाक़े में उसके अलावा कोई और मादा नहीं है। बसंती को रूपा के इरादे भाँपते देर न लगी। अजीत भी अकसर भागकर रूपा के आसपास मँडराने लगा। जब अजीत उठाव पर आया तो बसंती ने उसके संसर्ग से एक और बच्चा दिया जिसका नाम एक अन्य फ़िल्मी विलेन रंजीत के नाम पर रखा गया। रूपा फिर एकबार मायूस हुई। बसंती का पुराना साथी महालिंगा उम्रदराज़ होकर मरा तब रूपा बसंती के परिवार को शान्तवना जताने आई परंतु बसंती ने उसे आते देख मुँह फेर लिया। अब रूपा ने हालात से समझौता करके जीना शुरू कर दिया है वह अकेली रहती है। हत्थी केम्प पहले आकर और भोजन करके चली जाती है। उसके जाने के बाद बसंती अपने परिवार को लेकर भोजन कराने आती है। मनुष्यों की तरह पशुओं में भी सौंतिया डाह के संघर्ष होते हैं।
हत्थी केम्प से लौटते समय मस्तिष्क में विचार आया कि पुरानी बाइबिल में लिखी, अब्राहम, साराह और हागार की कहानी के पात्र महालिंगा, बसंती और रूपा के रूप में साक्षात देखकर वापस लौट रहे हैं। अब्राहम पत्नी साराह और सेविका हागार के साथ दजला-फ़रात के मैदान में बसे कन्नान में रहते थे। साराह को बच्चे नहीं हो रहे थे इसलिए उसने अब्राहम से परिवार बढ़ाने के लिए सेविका हागार से बच्चा पैदा करने को कहा। अब्राहम और हागार से इस्माइल का जन्म हुआ। उसके बाद अब्राहम और साराह का भी एक बच्चा इशाक नाम का हुआ। सुंदर सेविका हागार का बच्चा बड़ा होने से साराह में सौंतिया डाह विकसित हुआ तो वह हागार और इस्माइल पर अत्याचार करने लगी। हागार पीड़ित होकर इस्माइल को लेकर अरब देश में मक्का पहुँची जहाँ इस्माइल के वंश में मुहम्मद का जन्म हुआ था जिन्होंने इस्लाम धर्म चलाया।
हत्थी केम्प से वापस अल्लापल्ली जंगल विभाग के गेस्ट हाऊस में रेंज आफ़िसर दोपहर का भोजन बनवाकर इंतज़ार कर रहे थे। भोजन करने के दौरान पता चला की टेक्सी ड्राईवर दारू से टुन्न होकर बकवास कर रहा है। फ़ारेस्ट गार्ड ने हमारे कहने पर उससे गाड़ी की चाबी छुड़ाकर हमें दे दी। रेंज फ़ारेस्ट आफ़िसर गणेश लाँड़गे से एक ड्राईवर का इंतज़ाम करवा कर हम भामरागढ़ की अगली यात्रा पर निकले।
अल्लापल्ली से 60 किलोमीटर की दूरी पर सिरोंजा डिविज़न का भामरागढ़ ब्लाक स्थित है। अल्लापल्ली से सात किलोमीटर पर वन विभाग का एक सौ वर्ष से प्राकृतिक अवस्था में आरक्षित वन है जिसमें किसी भी प्रकार की छेड़खानी नहीं की गई है। उसे “अल्लापल्ली का गौरव” वन नाम दिया है। उसमें पाँच सौ से अधिक वर्ष के पेड़ पाँच मीटर घेरे के हैं। वन विभाग के अधिकारियों ने बताया कि वह असंख्य जड़ीबूटियों का ख़ज़ाना है। भामरागढ़ के अंतर्गत कमलापुर रेंज है जो कि नक्सलवादियों का मायका माना जाता है। वहाँ महाराष्ट्र से पलकोटा और वेडिया नदियाँ छत्तीसगढ़ से आकर इंद्रावती नदी में मिलती हैं। त्रिवेणी संगम पवित्र स्थान माना जाता है। उन तीनों नदियों का जल इकट्ठा होकर इंद्रावती नदी के रूप में सिवनी ज़िले से निकली पेंच नदी वैनगंगा में मिलकर आगे वर्धा नदी से मिलकर प्राणहिता नदी कहलाने लगती है जो आगे तेलंगाना के कालेश्वरम में गोदावरी से मिलती है। इस स्थान को “दक्षिण त्रिवेणी संगम” भी माना जाता है, क्योंकि यहाँ गोदावरी अपनी सहायक नदी प्रणाहिता से मिलती है, तीसरी नदी, हमेशा की तरह अदृश्य नदी सरस्वती है। हालाँकि सरस्वती हजारों साल पहले सूख गई थी, लेकिन यह यहाँ और कभी-कभी अदृश्य नदी के रूप में, कभी इलाहाबाद में, कभी श्रीशैलम, कालेश्वरम में, पॉप-अप होती रहती है, यह पता लगाना दिलचस्प होगा कि ये आस्था मान्यता कैसे विकसित हुई। जैसे ही आप गोदावरी के तट पर खड़े होते हैं, नदी आपके सामने जहाँ तक आप देख सकते हैं वहाँ तक फैल जाती है और दूसरे किनारे पर महाराष्ट्र का सिरोंचा जिला स्थित है! गोदावरी आंध्र प्रदेश और महाराष्ट्र के बीच प्राकृतिक सीमा बनाती है।
नक्सलियों के मायके अर्थात कमलापुर पहुँचते-पहुँचते शाम के छः बज चुके थे। फ़ारेस्ट गार्ड तुषार गौंड़ और वाहन चालक हमारे साथ थे। सबसे पहले बाबा आमटे के आश्रम हेमलकसा गए। उसके बाद त्रिवेणी संगम दर्शन किए। वहाँ तीन-चार युवक आ गए। संभवतः वे नक्सलियों के ख़बरी होंगे। उन्हें हमारे सुबह से उस इलाक़े में घूमने की जानकारी हो गई थी इसलिए वे टोह लेने आए थे। बातों-बातों में एक युवा जिसके चेहरे से बौद्धिकता झलक रही थी, उसने अंग्रेज़ी साहित्य पढ़ा था। अतः उससे घनिष्ठ बातें होने लगीं। उसने बताया कि 1984 में इस कमालपुर रेंज से सैंकड़ों की संख्या में युवा लड़के-लड़कियाँ नक्सली बने थे इसलिए इसे नक्सलियों का मायका कहा जाता है और वे इस इलाक़े में वारदात नहीं करते अपितु इंद्रावती नदी के उस पार छत्तीसगढ़ का भोपालपत्तनम रेंज लगता है वहाँ कोंटा से बचेली तक के इलाक़े में क्रियाशील होते हैं। उसने बताया कि आंदोलन के बड़े नेताओं ने हैदराबाद, नागपुर और मुंबई में बड़े कारोबार स्थापित कर लिए हैं और छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र व तेलंगाना की सरकारों ने प्रतिभावान आदिवासियों को वन विभाग, पुलिस व अन्य सरकारी विभागों में ऊँचे पदों पर नियुक्त करके नक्सलियों के बीच नेतृत्व का संकट पैदा कर दिया है।
गढ़चिरोली में पता चला कि ब्रह्मपुरी, भंडारा, गोंदिया, बालाघाट होते हुए दो रास्ते, एक लालबर्रा-बरघाट और दूसरा वारासिवनी-कटंगी से सिवनी पहुँचते हैं जहाँ से पेंच अभयारण्य पहुँचा जा सकता है।
हम हेमलकसा आश्रम पहुँचे। वहाँ एक प्रेरक कहानी हाथ लगी। एक हिंदू ब्राह्मण परिवार में 26 दिसंबर 1914 को हिंगनघाट, वर्धा में देवीदास के घर एक बच्चे का जन्म हुआ था। उसका नाम मुरलीधर रखा गया। देवीदास ब्रिटिश भारत के जिला प्रशासन और राजस्व विभाग में अधिकारी थे। मुरलीधर को अंग्रेज़ी तौर तरीक़ों की तर्ज़ पर बचपन में बाबा करके पुकारा जाता था। वह आठ बच्चों में सबसे बड़ा था। उसका बचपन एक अच्छी हैसियत के ब्रिटिश नौकरशाह के सबसे बड़े बेटे के रूप में शिकार खेलों से भरा रोमांचक घटनाओं के बीच बीता था। वह चौदह वर्ष की उम्र में बंदूक लेकर भालू और हिरण का शिकार करता था। जब वह गाड़ी चलाने योग्य हुआ तो पिता ने उसे पैंथर की खाल से बनी कुशन की गद्दियों वाली स्पोर्ट्स कार भेंट की थी। यद्यपि वह एक धनी परिवार में पैदा हुआ था, लेकिन हमेशा भारतीय समाज में व्याप्त असमानता के बारे में सोचता रहता था। वह अपने पिता की नाराज़गी के बावजूद नौकरों के बच्चों के साथ नियमित रूप से खेलता था। दीवाली के दिन जब पूर शहर जगमगा रहा था दोस्तों के साथ बाज़ार में मटरगश्ती करते हुए उसका एक अंधे भिखारी से सामना हुआ। उसने मौज में आकर अपनी सिक्कों से भरी जेब को भीख के कटोरे में खाली कर दी। भिखारी को कटोरे का भार और बहुत सारे सिक्कों की खनक से महसूस हुआ कि उसे मूर्ख बनाया जा रहा है, वह बोला “मै एक मजबूर भिखारी हूं, मेरे कटोरे में पत्थर मत डालो, बाबा”, लड़के ने जवाब दिया “ये चोखे सिक्के हैं, पत्थर नहीं। आप चाहें तो कुछ ख़रीद कर इन्हें परख लें।”
इस घटना ने लड़के के मस्तिष्क पर गहरा प्रभाव छोड़ा कि इस तरह के दुःखी इंसान उसकी ज़िंदगी के बिलकुल करीब मौजूद हैं, जिनकी जिंदगियों में आशा और विश्वास सिरे से नदारत हो चुके हैं। उसे अपने पिता की विलासिता से भरी दुनिया में ग़रीबों के प्रति मौजूद उपेक्षापूर्ण निर्दयता से चिड़ होती थी, कि लोग इतने बेरहम कैसे हो सकते हैं कि आसपास बजबजाती ग़रीबी और भुखमरी से अनजान बने रहकर गुलछर्रे उड़ाते रहें।
मुरलीधर एक डॉक्टर बनने की इच्छा रखता था, लेकिन उसके पिता ने उसे वकील बनने के लिए मजबूर किया। वह चाहते थे कि उनका बेटा बड़ा वकील बनकर परिवार की मिल्कियत को संभाले। लड़के ने धनाढ्य वातावरण के जीवन को बहुत अच्छी तरह से अपना लिया। अपने दिन घुड़सवारी, शिकार, क्लब में तास के पत्तों और टेनिस खेलने में बिताता था। वह अमीरों का एक समृद्ध जीवन जी रहा था जो मानते हैं कि पैतृक विशेषाधिकार केवल भाग्यशाली को जीने का मौका देते हैं और उनका ग़रीबों के भाग्य के प्रति कोई दायित्व नहीं है। इस विलासिता पूर्ण जीवन के बीच वह बेचैन रहता था। एक दिन उसे लगा जैसे उसे दुनिया में एक बड़ा उद्देश्य पूरा करना है।
मुरलीधर कानून में प्रशिक्षित होकर वर्धा में वकालत शुरू करके एक सफल वकील बन गया। वह महात्मा गांधी और बिनोवा भावे से प्रभावित होकर भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में शामिल हो गया। 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन में शामिल होने के कारण अंग्रेजों द्वारा कैद किया गया। उन्होंने भारतीय नेताओं के लिए एक बचाव वकील के रूप में काम करना शुरू किया। महात्मा गांधी द्वारा शुरू किए गए सेवाग्राम आश्रम में कुछ समय बिताया और गांधीवाद के अनुयायी बन गए। उन्होंने चरखे से बनाई खादी पहनकर गांधीवाद का अभ्यास व प्रचार किया। जब गांधी को पता चला कि उस लड़के ने एक एक ब्रिटिश अफ़सर के अत्याचार व उत्पीड़न से एक भारतीय लड़की को बचाया है, तब गांधी जी ने उसे “सत्य का निडर साधक” नाम दिया था।
उन दिनों कुष्ठ रोग से पीड़ित लोगों को एक सामाजिक कलंक माना जाता था और ऐसे रोगी समाज की मुख्य धारा से कटकर उपेक्षित जीवन जीने को अभिशप्त होते थे। मुरलीधर ने कोढ़ जैसे संक्रामक छुआछूत रोग को दूर करने का प्रयास किया। यहां तक कि उन्होंने एक कोढ़ी को साथ रहने की अनुमति दी, यह साबित करने के उद्देश्य से एक प्रयोग के हिस्से के रूप में उन्हें इंजेक्शन लेने पड़े थे। तुलसीराम नाम के कुष्ठ पीड़ित व्यक्ति के साथ मुलाक़ात ने उनकी आत्म-छवि को चकनाचूर कर दिया। कुष्ठ रोग के अंतिम चरण में वह एक मांस के टुकड़ों के साथ उंगलियों या पैर की उंगलियों के बिना कीड़े और घावों के साथ वास्तव में एक जीवित लाश है। वह संक्रमण से घबरा गया। उसने खुद को निडर बनाने के बारे में सोचा। अगले 6 महीनों के लिए वह इस संकट की बेदर्द पीड़ा में रहा। उसने सोचा “जहाँ भय है वहाँ प्रेम नहीं है, और जहाँ प्रेम नहीं वहाँ कोई भगवान नहीं है।” भय और घृणा से घिरे कोढ़ियों की इस समस्या पर काबू पाने का केवल एक ही तरीका लग रहा था। उसे कुष्ठ पीड़ित लोगों के साथ रहना और काम करना होगा। उसने निश्चय किया।
“मुझे किसी भी चीज़ से कभी डर नहीं लगा जब मैंने एक भारतीय महिला का सम्मान बचाने के लिए ब्रिटिश ठोकरों से लड़ाई लड़ी, गांधी जी ने मुझे ‘अभय साधक’ कहा, जो सत्य का निर्भीक साधक था। जब वरोरा के सफाईकर्मियों ने मुझे नाले की सफाई के लिए चुनौती दी, तो मैंने ऐसा किया, लेकिन जब मैंने तुलसीराम की जीवित लाश देखी मैं डर गया। मुझे इस डर पर क़ाबू पाकर इसे कुष्ठ पीड़ितों के प्रति प्रेम में बदलना होगा।”
मुरलीधर ने कुष्ठ रोगियों की सेवा करने का निर्णय इस कारण लिया कि उन्हें एक ऐसे समाज का हिस्सा बनने में घृणा महसूस होती थी जो ऐसे दलित मनुष्यों की दुर्दशा के प्रति बहुत ही उदासीन था। उन्होंने इस उदासीनता को ‘मानसिक कुष्ठ’ के रूप में माना, जो कि सबसे भयावह बीमारी है जो किसी के अंगों को नहीं खो रही है, लेकिन अन्य मनुष्यों के लिए दया और करुणा महसूस करने के लिए प्रेम की ताकत खो रही है। उन्होंने लिखा:-
मैंने भगवान से अपनी आत्मा मांगी,
लेकिन मेरी आत्मा नदारत थी।
मैंने अपने में भगवान की तलाश की,
लेकिन मेरे भीतर भगवान भी नदारत था।
तब मैंने सेवा हेतु भाई-बहनों की मांग की।
मुझे उनमें आत्मा, भगवान और जीवन लक्ष्य मिल गया।
उन्होंने 1949 में 4 रुपये, 6 कुष्ठ रोगियों और एक लंगड़ी गाय के साथ वरोरा में महाराष्ट्र में अपना काम फैलाया है। कई संगठनों ने बाबा के कार्यों से प्रेरणा ली है और देश भर में और यहां तक कि पूरी दुनिया में काम कर रहे हैं। दुनिया भर में मुरलीधर ने जो प्रभाव डाला, वह अचूक है और उनकी आत्मा एक दुर्लभ रत्न है जिसे दुनिया भाग्यशाली मानती थी।
मुरलीधर जानते थे कि बीमारी का इलाज करना ही पर्याप्त नहीं है बल्कि लोगों को इन सामाजिक प्रकोपों से निजात दिलाकर आत्मनिर्भर, उत्पादक समाज का निर्माण करना महत्वपूर्ण है। कृषि से शुरू होकर वस्त्र उद्योग से लेकर लकड़ी के काम तक विभिन्न लघु और मध्यम स्तर के उद्योगों तक विस्तार एवं महारोगी सेवा समिति, वरोरा उत्पादक क्षेत्र में उनके सपनों का साकार स्वरुप था।
मुरलीधर ने महाराष्ट्र में कुष्ठ रोगियों, विकलांगों और समाज के हाशिये पर पड़े लोगों के इलाज और पुनर्वास के लिए तीन आश्रमों की स्थापना की। महारोगी सेवा समिति, वरोरा (कुष्ठ सेवा समाज) कुष्ठ रोगियों के इलाज और मानसिक कुष्ठ रोग से पीड़ित समाज के उद्धार के उद्देश्य से स्थापित किया गया था, जिसे बाबा ने ‘आनंदवन’ कहा जाता है, जिसका अर्थ है ‘फ़ारेस्ट ऑफ ब्लिस’। उन्होंने और उनकी पत्नी साधना ने 15 अगस्त 1949 को एक पेड़ के नीचे आनंदवन में एक कुष्ठ अस्पताल शुरू किया। 1973 में गढ़चिरौली जिले के माडिया गोंड आदिवासी लोगों के लिए काम करने के लिए लोक बिरादरी प्रचारक की स्थापना की। उन्होंने अपने जीवन को कई अन्य सामाजिक कार्यों के लिए समर्पित किया, विशेष रूप से भारत छोड़ो आंदोलन, वन्यजीव संरक्षण और नर्मदा बचाओ आंदोलन के महत्व पर सार्वजनिक जागरूकता बढ़ाने के लिए अनथक प्रयास किए। भारत सरकार ने 1971 में उनको पद्मश्री से सम्मानित किया।
उनके दो बेटे, विकास आमटे और प्रकाश आमटे, और पुत्रवधू, मंदाकिनी और भारती, डॉक्टर हैं। इन चारों ने अपना जीवन सामाजिक कार्यों के लिए समर्पित कर दिया है। प्रकाश और उनकी पत्नी मंदाकिनी महाराष्ट्र के गढ़चिरौली जिले के माड़िया गोंड जनजाति के हेमलकसा गाँव में स्कूल और अस्पताल चलाते हैं, साथ ही एक शेर और कुछ तेंदुओं सहित घायल जंगली जानवरों के लिए एक अनाथालय है। उनके दो बेटों, डॉ. दिगंत और अनिकेत ने भी उन्हीं कार्यों को अपना जीवन समर्पित किया। प्रकाश और मंदाकिनी को 2008 में सामुदायिक नेतृत्व के लिए मैगसेसे पुरस्कार मिला।
बाबा आमटे के बड़े बेटे विकास और उनकी पत्नी भारती आनंदवन में अस्पताल चलाते हैं और कई कल्याणकारी परियोजनाओं के साथ समन्वय करते हैं। आनंदवन में एक विश्वविद्यालय है, एक अनाथालय है, और अंधे और बधिरों के लिए स्कूल हैं। आनंदवन आश्रम आत्मनिर्भर है और इसके 5,000 से अधिक निवासी हैं। कुष्ठ रोग से पीड़ित लोगों के लिए “सोमनाथ” और “अशोकवन” आश्रमों की स्थापना की है।
(लेखन-प्रकाशन – गत 2022 से छंद लेखन, एकल प्रकाशन– कलम के नवांकुर, अनुग्रह नवप्रस्तारित छंद पर लेखन (मैजिक बुक ऑफ रिकॉर्ड), साझा संकलन – तकरीबन 10, द्वादश ज्योतिर्लिंग (लंदन बुक आफ रिकार्ड), अनेकता में एकता (एशिया बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड), छंदावली – (मैजिक बुक ऑफ रिकॉर्ड), महाकाल साहित्य सम्मान से सम्मानित। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता !!जग के आधार राम !)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सविता साहित्य # १८ ☆
☆ !! जग के आधार राम !! ☆ सुश्री सविता खण्डेलवाल “भानु” ☆
☆ मनाचे श्लोक – एक सार्वकालिक ‘मनोपनिषद’… – श्लोक १११ आणि ११२ ☆ श्री विश्वास देशपांडे ☆
श्लोक क्र. १११ – –
हिताकारणे बोलणे सत्य आहे ।
हिताकारणे सर्व शोधूनि पाहे ।
हिताकारणे बंड पाषांड वारी ।
तुटे वाद संवाद तो हीतकारी ।।१११।।
अर्थ : समर्थ म्हणतात, ” हितासाठी जे सत्य आहे ते मी तुला सांगतो. आपल्या हितासाठी तू स्वतःच हितकारक गोष्टींचा शोध घे. धर्माच्या विरुद्ध असणारे पाखंडी किंवा नास्तिक विचार बाजूला सार. ज्या चर्चेतून शंकांचे निरसन होते अशी चर्चा किंवा संवाद हितकारक असतो. “
(हिताकारणे – आत्महितासाठी, बंड – विचारातील विरोध, पाषांड – देव व धर्म विरोधी वागणे किंवा नास्तिकता, वारणे – दूर सारणे)
विवेचन : आत्मतत्वाचा शोध घेणे किंवा आत्मसाक्षात्कार करून घेणे हे प्रत्येक मनुष्याचे ध्येय असले पाहिजे असे समर्थांचे सांगणे होते. हेच आपल्या हिताकरिता त्यांनी सांगितलेले सत्य. परंतु काही लोक हे खरोखरच आपल्या हिताचे आहे यावर विश्वास ठेवायला तयार नसतात. म्हणून समर्थ म्हणतात की या गोष्टीचा तू स्वतःच शोध घे. त्यासाठी सर्व मार्गांचा वापर कर. साधू संत काय सांगतात किंवा ग्रंथांमध्ये काय म्हटले आहे हे तपासून पहा. एखादी गोष्ट माणूस जेव्हा स्वतः समजून घेतो, तेव्हा त्यावर त्याचा जास्त विश्वास बसतो. म्हणून समर्थांनी मी सांगतो तेवढेच खरे असे न मानता तुम्ही स्वतःच सत्याचा शोध घ्या असा कळकळीने उपदेश केला आहे.
राम लक्ष्मणादि भावंडांचे गुरु वसिष्ठांच्या आश्रमातील शिक्षण जेव्हा पूर्ण झाले, तेव्हा त्यांना निरोप देताना ते म्हणाले, ” मी माझ्याजवळ असणारे सर्व ज्ञान तुम्हाला दिले आहे. परंतु तरीसुद्धा तुम्ही आपल्या आयुष्यात मी सांगितलेले तेवढेच खरे असे मानून चालू नका. तुमच्या विचारांना आणि विवेकबुद्धीला जे योग्य वाटेल त्याप्रमाणे वागा. ” वसिष्ठांसारखी किंवा समर्थांसारखी अधिकारी व्यक्ती जेव्हा असे म्हणते, तेव्हा आपण तर सामान्य माणसे! आपल्या ज्ञानाचा उगीच गर्व करण्यात काय अर्थ आहे? त्यामुळे अशा व्यक्ती जे सांगतात त्यामागे त्यांची साधना असते. सांगण्याचा अधिकार असतो. ‘ आधी केले मग सांगितले ‘ अशा या व्यक्ती असतात.
सत्याची एक वेगळी व्याख्या महाभारतात फार छान आहे. जे हितकारक आहे, ते सत्य असे त्यात म्हटले आहे. एखादी गोष्ट आपल्या मुलाच्या आरोग्यासाठी घातक आहे असे जेव्हा आईला वाटते, तेव्हा ती त्याला ते देत नाही. तुझे पोट दुखेल, दात किडतील असे सांगून त्याला ती तो पदार्थ देत नाही. इथे तिचे बोलणे असत्य जरी असले तरी तिच्या मुलासाठी ते हितकारक आहे. काही वेळा कटू बोलणे आपल्या हितासाठी असते. परंतु आजच्या काळात जेव्हा गोड बोलून किंवा वेगळ्या प्रकारे ट्विस्ट करून एखादी गोष्ट सांगितली जाते तेव्हा मात्र ती आपल्या हिताची असेलच असे नाही. टीव्ही वरील मालिकांतून नको त्या गोष्टी नकळत आपल्या गळी उतरवण्याचा प्रयत्न केला जातो. म्हणूनच सत्य काय आहे हे आपणच तपासून घ्यायला हवे.
आपण सामान्य माणसे मात्र व्यवहारात बुद्धिभेद करणाऱ्या माणसांच्या वक्तृत्वाला भुलून आपल्या साधुसंतांनी सांगितलेल्या मौल्यवान गोष्टींकडे दुर्लक्ष करतो. अशा माणसांच्या नास्तिक, पाखंडी विचारांचा स्वीकार करतो. आपल्याच चांगल्या गोष्टींवर टीका करू लागतो. त्यातून द्वेष तयार होतो. माणूस आपले नीतीधर्माचे आचरण सोडून देतो. क्षुद्र विकार, वासनांना बळी पडतो. काही रूढी, परंपरा कालबाह्य झाल्या असतील, काही गोष्टी चुकीच्याही असतील. पण सगळ्याच गोष्टी कालबाह्य किंवा टाकाऊ झालेल्या नसतात. अर्थात प्रत्येकाला आपले विचार मांडण्याचे, लिहिण्याचे स्वातंत्र्य आहे. परंतु त्यामुळे सामान्य माणसांची मात्र दिशाभूल होते, गोंधळ उडतो. म्हणूनच समर्थांनी आपल्या हितासाठी अशा विचारांना दूर सारून सत्य काय आहे ते जाणून घ्या असे सांगितले आहे.
स्वसंवाद
१. संतांनी किंवा गुरूंनी सांगितले म्हणून मी आंधळेपणाने विश्वास ठेवतो, की समर्थांनी सांगितल्याप्रमाणे स्वतःच्या विवेकबुद्धीने ‘हितकारक गोष्टींचा शोध’ घेण्याचा प्रयत्न करतो?
२. महाभारतातील सूत्राप्रमाणे, माझे बोलणे केवळ वरवरचे ‘गोड’ असते की ते समोरच्या व्यक्तीच्या आणि माझ्या स्वतःच्या ‘परम हिताचे’ (सत्य) असते?
३. टीव्ही, मोबाईल किंवा समाजमाध्यमांवरील आकर्षक वक्तृत्वाला भुलून, मी माझ्या संस्कृतीतील चांगल्या आणि सात्त्विक विचारांकडे दुर्लक्ष तर करत नाहीये ना?
४. मनातल्या शंका दूर करून निःशंक होण्यासाठी मी व्यर्थ वाद घालतो, की एखाद्या अधिकारी व्यक्तीशी माझ्या आत्महितासाठी ‘हितकारक संवाद’ साधतो?
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श्लोक क्र. ११२ – –
जनीं सांगता ऐकता जन्म गेला ।
परी वाद वेवाद तैसा चि ठेला ।
उठे संशयो वाद हा दंभधारी ।
तुटे वाद संवाद तो हीतकारी ।।११२।।
अर्थ : अनेक वर्षांपासून जगात हिताच्या गोष्टी सांगितल्या आणि ऐकल्या जातात. पण एवढे होऊनही वादविवाद निर्माण करणारे मतभेद कायमच आहेत. संशयापोटी निर्माण होणारा वाद हा अहंकार वाढवणारा असतो. ज्या संवादातून शंका फिटून काही तत्व हाती लागते असा संवाद हितकारक असतो.
(ठेला – तसाच राहिला, दंभ – व्यर्थ अहंकार/अभिमान)
विवेचन : या श्लोकात मानवी स्वभाव आणि प्रवृत्तीवर समर्थांनी अचूक बोट ठेवले आहे. आपण अनेक वर्षांपासून चांगल्या हितकारक गोष्टी ऐकत आलो आणि सांगतही आलो. संतांनी समाजाच्या आणि आपल्या हितासाठी आपले सारे आयुष्य झिजवले. ग्रंथातून, प्रवचनातून आपले विचार आपल्यापर्यंत पोचवले. परंतु दुर्दैव हे आहे की एवढया सगळ्या खटाटोपानंतर देखील आपल्या शंका आणि वादाचे विषय कायम राहिले. भगवद्गीता, ज्ञानेश्वरी, दासबोध, मनाचे श्लोक, तुकाराम गाथा यासारख्या अनेक ग्रंथांना शेकडो वर्षांची परंपरा आहे. हे अक्षर वाङ्मय आहे. या ग्रंथांमध्ये एवढे ज्ञान आहे की खरे तर कोणत्याही शंकाच शिल्लक राहायला नको.
खरी ज्ञानी माणसे नम्र असतात पण मी विद्वान आहे या जाणिवेतून अहंकार जन्मतो. मला सगळेच माहिती आहे या जाणिवेतून संतांनी जे काही हितकारक सांगितले त्याबद्दल संशय निर्माण होतो. ईश्वर आहे हे कशावरून, पुनर्जन्माचा काही पुरावा आहे का, ईश्वराला कोणी पाहिले आहे का… वगैरे वगैरे अनंत गोष्टींबद्दल मानवी मनात संशय अनंत काळापासून आहे आणि तो तसाच राहणार आहे. शंका असणे रास्त आहे, चांगली गोष्ट आहे. पण एखाद्या अधिकारी माणसाकडून किंवा वर उल्लेख केलेल्या ग्रंथातून जेव्हा आपल्याला आपल्या प्रश्नाचे उत्तर मिळते, त्यावेळी निःशंक मनाने ‘ राघवाच्या अनंत पंथावर ‘ चालण्यास सुरुवात करावी.
बऱ्याच माणसांची प्रवृत्ती अशी असते की संतांनी सांगितलेल्या गोष्टींवर विश्वास ठेवण्यापेक्षा एखादी संशयाची सुई त्यांच्या मनात जास्त घर करून बसते. मग आपल्या हिताचे कळूनही त्यांना त्या मार्गाने जाण्याची बुद्धी होत नाही. अशा लोकांच्या बाबतीत ‘ पालथ्या घड्यावर पाणी ‘ ही म्हण सार्थ ठरते. सगळे समजते आहे पण पोकळ दंभ किंवा अहंकार त्यांना या मार्गावर जाण्यापासून परावृत्त करतो. “मी जप करू? कीर्तनाला जाऊ? छे! छे! मी एवढा विद्वान! मला इतकी माहिती आहे! मग लोक काय म्हणतील? ” यासारख्या खोट्या प्रतिष्ठेच्या कल्पना अशा व्यक्तींना परमार्थ मार्गावर चालण्यासाठी प्रतिबंध करतात.
परंतु समाजमान्यता असणाऱ्या काही विद्वानांनी बुद्धिभेद केला की सर्वसामान्य माणसे देखील गोंधळतात. मग अशी माणसे राम आणि कृष्ण यासारख्या वंदनीय महापुरुषांच्या चरित्रात देखील दोष दाखवतात. राम आणि कृष्णासारख्या महापुरुषांनी आपल्या जीवनकार्यातून कोणता महत्वाचा संदेश दिला आहे याकडे मात्र त्यांचे दुर्लक्ष होते. या सगळ्या गोंधळात आपल्याला आपल्या आत्मतत्वाचा शोध घ्यायचा आहे ही मूळ गोष्ट ते विसरतात. वादविवाद कुठे होत नाहीत असे नाही पण जिथे मूळ तत्वाचा शोध घेण्यापेक्षा आपल्या अहंकाराला जास्त जोपासले जाते असा वाद काय कामाचा? ज्यातून काही जीवनोपयोगी तत्व गवसते आणि मन परमार्थ मार्गाकडे ओढ घेते असा सुखसंवाद महत्वाचा असेच समर्थांना यातून सांगायचे आहे.
स्वसंवाद
१. अनेक वर्षांपासून संतांचे विचार, ग्रंथ आणि निरूपण ‘ऐकून व वाचूनही’ माझे आयुष्य ‘पालथ्या घड्यावर पाणी’ या म्हणीसारखेच कोरडे राहिले आहे का?
२. “मी एवढा शिकलेला, मी नाम कसे घेऊ? ” अशा प्रकारच्या कुठल्यातरी पोकळ दंभामुळे (अहंकारामुळे) किंवा खोट्या प्रतिष्ठेमुळे मी स्वतःला आत्महितापासून दूर ठेवत नाहीये ना?
३. महापुरुषांच्या किंवा संतांच्या चरित्रातील आणि विचारांमधील केवळ ‘दोष’ शोधण्यात मी माझी बौद्धिक ऊर्जा वाया घालवतो, की त्यांच्याकडून ‘जीवनोपयोगी तत्त्व’ शिकण्याचा प्रयत्न करतो?
४. मनात शंका असणे स्वाभाविक आहे, पण ग्रंथांच्या वाचनातून किंवा अधिकारी व्यक्तींच्या ‘सुखसंवादातून’ उत्तर मिळाल्यावर, मी निःशंक मनाने भक्तीच्या मार्गावर चालण्यास सुरुवात करतो का?
(डा. मुक्ता जीहरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य” के माध्यम से हम आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी की मानवीय जीवन पर आधारित एक विचारणीय आलेख महाभारत नहीं रामायण। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की लेखनी को इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण लेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें।)
(डॉ मुक्ता जी द्वारा रचित एक भजन – इंसाप्नरभु मिलन की आस / योगाश्रम प्रस्तुति , सौजन्य – तरूनम चैनल)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य # ३३९ ☆
☆ महाभारत नहीं रामायण… ☆ डॉ. मुक्ता ☆
‘जब तक सहने की चरम सीमा रहेगी, रामायण लिखी जाएगी। मांगा हक़, जो अपने हित में महाभारत हो जाएगी।’ जी हाँ! यही सत्य है जीवन का, जो सदियों से धरोहर के रूप में सुरक्षित है। इसलिए नारी को सहन करने की शिक्षा दी जाती है, क्योंकि मौन सर्वश्रेष्ठ व सर्वोत्तम निधि है। वैसे तो यह सबके लिए वरदान है। बड़े-बड़े ऋषि-मुनियों ने मौन रहकर व चित्त को एकाग्र कर अपने अभीष्ठ को प्राप्त किया है और जीव-जगत् व आत्मा-परमात्मा के रहस्य को जाना है। जब तक आप में सहन करने की शक्ति व त्याग करने का सामर्थ्य है; परिवारजन व संसार के लोग आपको सहन करते हैं, अन्यथा जीवन से बेदखल करने में पल-भर भी नहीं लगाते। विशेष रूप से नारी को तो बचपन से यह शिक्षा दी जाती है, ‘तुम्हें सहना है, कहना नहीं’ और वह धीरे-धीरे उसे जीने का मूलमंत्र बना लेती है तथा पिता, पति व पुत्र के आश्रय में सदैव मौन रहकर अपना जीवन बसर करती है।
वास्तव में नारी धरा की भांति क्षमाशील व सहनशील है; गंगा की भांति निर्मल व निरंतर गतिशील है; पापियों के पाप धोती है; पर्वत की भांति अटल है, परंतु कभी उफ़् नहीं करती। इसी प्रकार नारी भी ता-उम्र सबके व्यंग्य-बाणों के असंख्य भीषण प्रहार व ज़ुल्म हंसते-हंसते सहन करती है… यहां तक कि वह कभी भी अपना पक्ष रखने का साहस नहीं जुटा पाती। वैसे तो पुरुष वर्ग द्वारा यह अधिकार नारी-प्रदत्त हैं ही नहीं। सो! वह दोयम दर्जे की प्राणी समझी जाती है– एक हाड़-मांस की जीवित प्रतिमा, जिसे दु:ख-दर्द होता ही नहीं, क्योंकि उसका मान-सम्मान नहीं होता। इसलिए आजीवन कठपुतली की भांति दूसरों के इशारों पर नाचना उसकी नियति बन जाती है। वह आजीवन समस्त दायित्व-वहन करती है; उसी आबोहवा में स्वयं को ढाल लेती है; दिन-भर घर को सजाती-संवारती व व्यवस्थित करती है और वह उस अहाते में स्वयं को सुरक्षित अनुभव करती है। बच्चों को जन्म देकर ब्रह्मा व उनकी परवरिश कर विष्णु का दायित्व निभाती है और उसके एवज़ में उसे उस घर में रहने का अधिकार प्राप्त होता है; जिसे वह कभी अपना कह ही नहीं सकती। यदि वह संतान को जन्म देने में असमर्थ रहती है, तो बाँझ कहलाती है और उससे उस घर में रहने का अधिकार भी छीन लिया जाता है, क्योंकि वह वंश-वृद्धि नहीं कर पाती। परिणाम-स्वरूप पति के पुनः विवाह की तैयारियां प्रारंभ की जाती हैं। इस स्थिति में साक्षर-निरक्षर का भेद नहीं किया जाता है… भले ही वह अपने पति से अधिक धन कमा रही हो; अपने सभी दायित्वों को सहर्ष वहन कर रही हो। मुझे स्मरण हो रही है ऐसी ही एक घटना…जहां एक शिक्षित नौकरीशुदा महिला को केवल बाँझ कह कर ही तिरस्कृत नहीं किया गया; उसे पति के विवाह में जाने को भी विवश कर लिया गया, ताकि उसकी मांग में सिंदूर व गले में मंगलसूत्र धारण करने का अधिकार कायम रह सके और उसे विवाहिता के रूप में उस छत के नीचे रहने का अधिकार प्राप्त हो सके। परंतु एक अंतराल के पश्चात् घर में बच्चों की किलकारियां गूंजने के पश्चात् घर- आँगन महक उठा और वह खुशी से अपना पूरा वेतन घर में खर्च करती रही। धीरे-धीरे उसकी उपस्थिति नव-ब्याहता को अखरने लगी और वह उस घर छोड़ने को विवश हो गयी। परंतु फिर भी वह मांग में सिंदूर धारण कर पतिव्रता नारी होने का स्वांग रचती रही। है न यह उसके प्रति अन्याय…. परंतु उस पीड़िता को सब मूर्ख समझते हैं, जिसने घर फूंक कर तमाशा देखा है। इसलिए उसके पक्ष में कोई भी आवाज़ नहीं उठाता।
सो! जब तक सहनशक्ति है, आपकी प्रशंसा होगी और रामायण लिखी जाएगी। परंतु जब आपने अपने हित में हक़ मांग लिया, तो महाभारत होना निश्चित है। वैसे भी अधिकारों की मांग करना–संघर्ष का आह्वान करना है और संघर्ष से महाभारत हो जाता है और जीवन का कोई भी पक्ष इससे अछूता नहीं रहता। राजनीति हो या धर्म; घर-परिवार हो या समाज; हर जगह इसका दबदबा कायम है। राजनीति तो सबसे बड़ा अखाड़ा है, परंतु आजकल तो सबसे अधिक झगड़े धर्म के नाम पर होते हैं।
घर-परिवार में भी अब इसका पूर्ण हस्तक्षेप है। पिता-पुत्र, भाई-भाई व पति-पत्नी के जीवन से स्नेह-सौहार्द इस प्रकार नदारद है, जैसे चील के घोंसले से माँस। जहां तक पति-पत्नी का संबंध है, उनमें समन्वय व सामंजस्य है ही नहीं… वे दोनों एक-दूसरे के प्रतिद्वंद्वी के रूप में अपना क़िरदार निभाते हैं, जिसका मूल कारण है अहं; जो मानव का सबसे बड़ा शत्रु है। इसी कारण वे आजकल एक-दूसरे के अस्तित्व को भी नहीं स्वीकारते; जिसका परिणाम अलगाव व तलाक़ के रूप में हमारे समक्ष है। वैसे भी आजकल संयुक्त परिवार-व्यवस्था का स्थान एकल परिवार- व्यवस्था ने ले लिया है, परंतु फिर भी पति-पत्नी आपस में प्रसन्नता से अपना जीवन बसर नहीं कर पाते और एक-दूसरे से निज़ात पाने में लेशमात्र भी संकोच नहीं करते। वैसे भी आजकल ‘तू नहीं, और सही’ का बोलबाला है। लोग संबंधों को वस्त्रों की भांति बदलने लगे हैं, जिसका मूल कारण ‘लिव-इन व प्रेम विवाह’ है। अक्सर बच्चे भावावेश में संबंध तो स्थापित कर लेते हैं और चंद दिन साथ रहने के पश्चात् एक-दूसरे की कमियाँ-ख़ामियाँ उजागर होने लगती हैं; जिन्हें वे स्वीकार नहीं पाते और परिणाम होता है तलाक़–जिसका सबसे अधिक खामियाज़ा बच्चों को भुगतना पड़ता है। वैसे आजकल सिंगल पेरेंट का प्रचलन भी बहुत बढ़ गया है। सो! इन विषम परिस्थितियों में बच्चों का सर्वांगीण विकास कैसे संभव है? एकांत की त्रासदी झेलते बच्चों का भविष्य अंधकारमय हो जाता है। वे असामान्य हो जाते हैं; सहज नहीं रह पाते और वह सब दोहराते हुए अपना जीवन नरक-तुल्य बना लेते हैं।
ग़लत लोगों से अच्छी बातों की अपेक्षा कर हम आधे ग़मों को प्राप्त करते हैं और आधी मुसीबतें हम अच्छे लोगों में दोष ढूंढ कर प्राप्त करते हैं। ग़लत साथी का चुनाव करके हम अपने जीवन के सुख-चैन को दाँव पर लगा देते हैं और दोष-दर्शन हमारा स्वभाव बन जाता है, जिसके परिणाम- स्वरूप हमारा जीवन जहन्नुम बन जाता है। आजकल लोग भाग्य व नियति पर कहाँ विश्वास करते हैं? वे तो स्वयं को भाग्य-विधाता समझते हैं और यही सोचते हैं कि उनसे अधिक बुद्धिमान संसार में कोई दूसरा है ही नहीं। इस प्रकार वे अहंनिष्ठ प्राणी पूरे परिवार की जीवन भर की खुशियों को लील जाते हैं। संदेह व अविश्वास इसके मूल कारक होते हैं। सो! समाज में शांति कैसे व्याप्त रह सकती है? इसलिए बीते हुए कल को याद करके उससे प्राप्त सबक़ को स्मरण रखना श्रेयस्कर है। मानव को अतीत का स्मरण कर अपने वर्तमान को दु:खमय नहीं बनाना चाहिए, बल्कि उससे सीख लेकर अपने भविष्य को उज्ज्वल बनाना चाहिए। जीवन में सफलता पाने का मूलमंत्र यह है कि ‘उस लम्हे को बुरा मत कहो, जो आपको ठोकर पहुँचाता है; बल्कि उस लम्हे की कद्र करो, क्योंकि वह आपको जीने का अंदाज़ सिखाता है। दूसरे शब्दों में अपनी हर ग़लती से सीख गहण करें, क्योंकि आपदाएं आपके धैर्य की परीक्षा लेती हैं और मज़बूत बनाती हैं। सो! ग़लती को दोहराओ मत। जो मिला है, उन परिस्थितियों को उत्तम बनाने की चेष्टा करो; न कि भाग्य को कोसने की। हर रात के पश्चात् सूर्योदय अवश्य होता है और अमावस के पश्चात् पूनम का आगमन भी निश्चित है। जीवन में आशा का दामन कभी मत छोड़ें, क्योंकि गया वक्त लौटकर कभी नहीं आता। हर पल को सुंदर बनाने का प्रयास करें। जीवन में सहन करना व त्याग करना सीखें, क्योंकि अगली सांस लेने के लिए मानव को पहली सांस का त्याग करना पड़ता है। संचय की प्रवृत्ति का त्याग करें। इंसान खाली हाथ आया है और उसे खाली हाथ ही इस संसार से लौट जाना है। सो! सदाशयता को अपनाएं और दूसरों के प्रति कर्तव्यनिष्ठता का भाव रखें, क्योंकि कर्त्तव्य व अधिकार अन्योन्याश्रित हैं। अधिकार-स्थापत्य अशांति- प्रदाता है, जो हृदय का सुक़ून छीन लेता है। इसलिए उसे अपने जीवन से बाहर का रास्ता दिखा दें, ताकि हर घर में रामायण की रचना हो सके। पारस्परिक ईर्ष्या-द्वेष व संघर्ष को जीवन में पदार्पण मत करने दें, क्योंकि ये महाभारत के जनक हैं, प्रणेता हैं। सो! अलौकिक आनंद से अपना जीवन बसर कर लें।