(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के लेखक श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही गंभीर लेखन। शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है। साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको पाठकों का आशातीत प्रतिसाद मिला है।”
हम प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है इस शृंखला की अगली कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों के माध्यम से हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)
☆ संजय उवाच # ३५० ☆ चमत्कार…
कभी किसी को कहते सुनते हैं कि आज तो चमत्कार हो गया! क्या है चमत्कार होना? स्थूल रूप से विचार करें तो मनुष्य के लिए जो अकल्पनीय है, ‘लार्जर देन लाइफ’ है, वही चमत्कार है। चमत्कार की विशेषता है कि वे सुनने में आते हैं पर दिखते नहीं। यद्यपि प्रकृति इसका अपवाद है। वहाँ हर क्षण चमत्कार उद्घाटित हो रहे होते हैं, बशर्ते हम उन्हें देखना चाहें।
लौटते हैं मूल विषय पर। चमत्कार एक अलग ही प्रकार की विडंबना का शिकार है। यदि वह आँखों से प्रत्यक्ष दिख गया तो फिर उसे चाहे जो नाम दें पर चमत्कार नहीं रह पाता। चमत्कार का दर्शन ही चमत्कार का विसर्जन है। इस संदर्भ में चमत्कार अभागा है, इस संदर्भ में चमत्कार एकमेवाद्वितीय है।
वस्तुत: चमत्कार कोई वाह्य बल या एक्सटर्नल फोर्स नहीं है। अपनी विसंगतियों से जूझते मनुष्य के भीतर कुछ ऐसा कर गुज़रने की इच्छा होती है जो उसे सारी कठिनाइयों से पार कर ऊँचे, बहुत ऊँचे स्थापित कर दे। कभी विवशता के क्षणों में मनुष्य कल्पना करता है कि कुछ ऐसा हो जाए कि सारी समस्याएँ क्षण भर में अदृश्य हो जाएँ। कभी चाहता है कि परेशानियों का सामना किए बिना वे छू-मंतर हो जाएँ। प्राय: कामना करता है कि परिश्रम किए बिना ही रातों-रात उसकी आर्थिक स्थिति बेहतर हो जाए। अपनी सारी वांछनाओं को पलक झपकते ही पाने का मानसिक माध्यम होता है चमत्कार।
ब्रह्मांड में चमत्कार होते हैं या नहीं, यह हमारी चर्चा का विषय नहीं है। तथापि मनन करें तो मनुष्य का अस्तित्व अपने आप में चमत्कार उत्पन्न करने का बहुत बड़ा साधन है। दर्शन की एक धारा देह में ब्रह्मांड का दर्शन करती है। ब्रह्मांड समस्त अस्तित्व का समुच्चय है। इसमें पदार्थ एवं ऊर्जा के सभी रूप तथा उनके द्वारा निर्मित लघुत्तम से महत्तम सभी संरचनाएँ सम्मिलित हैं।
ब्रह्मांड का लघु रूप पिंड या देह है। देह का विस्तार ब्रह्मांड है। एक तरह से देह, ब्रह्मांड का मॉडल है, छोटे आकार की रेपलिका है। मन, प्राण और देह मिलकर संभावनाओं का समुच्चय बनता है।
प्राण को परिभाषित करते हुए शाखायान आरण्यक कहता है,
यो व प्राणः सा प्रज्ञा, या वा प्रज्ञा स प्राणः।
अर्थात जो प्राण है, वही प्रज्ञा है। जो प्रज्ञा है वही प्राण है।
प्रज्ञा मनुष्य में अस्तित्व फूँक देती है। व्यष्टि को समष्टि की व्यापकता प्रदान करने की प्रकृति है प्रज्ञा। प्रकृति ब्रह्मांड का एक अंग है। जैसाकि ऊपर उल्लेख किया जा चुका है, प्रकृति में निरंतर चमत्कार देखने को मिलते हैं। स्वाभाविक है कि प्रकृति के अंश मनुष्य में भी चमत्कार उद्घाटित करने की क्षमता अंतर्निहित है।
चमत्कार फलीभूत करने के लिए कार्य करना होगा। कार्य को परिभाषित करते हुए विज्ञान कहता है कि जब किसी वस्तु पर कोई बल लगाया जाता है और वस्तु उस बल की दिशा में विस्थापित होती है तो इसे बल द्वारा किया गया कार्य कहा जाता है। कार्य के लिए संकल्प, कर्मनिष्ठा और कठोर परिश्रम आवश्यक हैं।
अतः चमत्कार की प्रतीक्षा मत करो। चमत्कार के घटने का माध्यम बनो। मनुज की देह मिली है, प्रज्ञा मिली है। अपार संभावनाएँ तुम्हारे पास हैं।
जैसे रीछपति जामवंत ने हनुमान जी उनकी क्षमताओं का स्मरण कराया था, वैसे ही आवश्यकता है अपनी क्षमताओं को स्मरण करने की, उनके अनुसार अपना समुद्र पार करने की।
‘चमत्कार’ शीर्षक की अपनी एक कविता स्मरण आ रही है-
चमत्कार,
चमत्कार,
चमत्कार..!
चमत्कार के किस्से
सुने सदा,
चमत्कार घटित होते
देखा नहीं कभी,
अपनी क्षमताओं का
चमत्कार
उद्घाटित करो,
फिर चमत्कार को
अपनी आँख के आगे
घटित होते देखा करो..!।
‘स्मरण करने’ इसलिए कहा कि कोई दूसरा स्मरण नहीं कराएगा। अतः स्मरण रहे कि
जांबवंत तुम्हारे भीतर हैं, और हनुमान जी भी।
अब भी किसी चमत्कार की प्रतीक्षा करने की आवश्यकता है क्या?
रात्रि 12:37 बजे, 18.08.2026 (इसी विचार के साथ नींद खुली।)
अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆
मोबाइल– 9890122603
संजयउवाच@डाटामेल.भारत
writersanjay@gmail.com
☆ आपदां अपहर्तारं ☆
श्रावण साधना संपन्न हुई। अगली साधना की जानकारी आपको शीघ्र ही दी जावेगी।
≈≈
≈ संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈
(आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ जी संस्कारधानी जबलपुर के सुप्रसिद्ध साहित्यकार हैं। आपको आपकी बुआ श्री महीयसी महादेवी वर्मा जी से साहित्यिक विधा विरासत में प्राप्त हुई है । आपके द्वारा रचित साहित्य में प्रमुख हैं पुस्तकें- कलम के देव, लोकतंत्र का मकबरा, मीत मेरे, भूकंप के साथ जीना सीखें, समय्जयी साहित्यकार भगवत प्रसाद मिश्रा ‘नियाज़’, काल है संक्रांति का, सड़क पर आदि। संपादन -८ पुस्तकें ६ पत्रिकाएँ अनेक संकलन। आप प्रत्येक सप्ताह रविवार को “साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह” के अंतर्गत आपकी रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है – सम सामयिक गीत – शालाएँ हैं जीर्ण-शीर्ण…।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह # २९१ ☆
☆ सम सामयिक गीत – शालाएँ हैं जीर्ण-शीर्ण…☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆
☆
कहती हैं उज्ज्वल भविष्य पर, शिक्षक ही उपलब्ध नहीं।
जो हैं द्रोणाचार्य, एकलव्यों सा है प्रारब्ध यहीं।।
विश्वमित्र-संदीपनी गायब, राम-कृष्ण होंगे कैसे?
शोषित-पीड़ित शिक्षक जीवन बिता रहा जैसे-तैसे।।
धृतराष्ट्रों के वंशज पैलेट साध निशाना दे मारें।
शालाएँ हैं जीर्ण-शीर्ण पर नहीं सुधारें सरकारें।।
.
गुरुकुल पूँजीपति के हाथों बेच, किया है बंटाढार।
सरकारी शालाएँ बंजर, छलें दिखा भोजन उपहार।।
हैं नियुक्ति में घपलेबाजी, ट्रांसफर में नीलामी है।
विज्ञान की अन्य विधाओं में भारतीय ज्योतिष शास्त्र का अपना विशेष स्थान है। हम अक्सर शुभ कार्यों के लिए शुभ मुहूर्त, शुभ विवाह के लिए सर्वोत्तम कुंडली मिलान आदि करते हैं। साथ ही हम इसकी स्वीकार्यता सुहृदय पाठकों के विवेक पर छोड़ते हैं। हमें प्रसन्नता है कि ज्योतिषाचार्य पं अनिल पाण्डेय जी ने ई-अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों के विशेष अनुरोध पर साप्ताहिक राशिफल प्रत्येक शनिवार को साझा करना स्वीकार किया है। इसके लिए हम सभी आपके हृदयतल से आभारी हैं। साथ ही हम अपने पाठकों से भी जानना चाहेंगे कि इस स्तम्भ के बारे में उनकी क्या राय है ?
☆ ज्योतिष साहित्य ☆ साप्ताहिक राशिफल (31 अगस्त से 6 सितंबर 2026) ☆ ज्योतिषाचार्य पं अनिल कुमार पाण्डेय ☆
जय श्री राम। अगर आप श्री राम जी के भक्त हैं और उनकी कृपा आपको मिल रही है तो श्री हनुमान जी की कृपा आपको स्वयं ही प्राप्त हो जाएगी। जिस व्यक्ति पर श्री हनुमान जी की कृपा होती है उसको कोई भी व्यक्ति, विपत्ति, संकट पीड़ा, व्याधि आदि सता नहीं सकता है। हम सभी श्री हनुमान जी से अष्ट सिद्धि और नव निधि के अलावा मोक्ष भी प्राप्त कर सकते हैं। श्री हनुमान जी की सेवा करके हम सभी प्रकार के सुख अर्थात आंतरिक और बाह्य दोनों प्रकार के सुख प्राप्त कर सकते हैं। श्री हनुमान जी की कृपा पाने के लिए सबसे अच्छी पुस्तक श्री हनुमान चालीसा है और श्री हनुमान चालीसा की आज की चौपाई है –
और देवता चित्त न धरई |
हनुमत सेइ सर्ब सुख करई ||
इस चौपाई के संपुट पाठ करने से सभी प्रकार के संकट स्वयं ही दूर हो जाएंगे। इस प्रकार श्री हनुमान जी के कृपा से आपके सभी संकट दूर हो जाएंगे। अतः किसी और देवता की आराधना करने की आपको आवश्यकता नहीं रहेगी।
“नासे रोग हरे सब पीरा” नाम की पुस्तक में श्रीहनुमान चालीसा की चौपाइयों से संबंधित सभी उपायों का विस्तृत विवरण दिया हुआ है। इस पुस्तक को आप हमारे यहां से प्राप्त कर सकते हैं।
अब मैं पंडित अनिल पाण्डेय आपको इस सप्ताह अर्थात 31 अगस्त से 6 सितंबर 2026 तक के सप्ताह के साप्ताहिक राशिफल के बारे में बताऊंगा। परंतु राशिफल के पहले मैं आपको इस सप्ताह में ग्रहों के गोचर के बारे में पूरी जानकारी दूंगा। इस सप्ताह सूर्य और बुध सिंह राशि में, मंगल मिथुन राशि में, गुरु कर्क राशि में, शनि वक्री होकर मीन राशि में तथा राहु कुंभ राशि में गोचर करेंगे।
शुक्र प्रारंभ में कन्या राशि में रहेंगे तथा 1 तारीख के 4:55 रात अंत से तुला राशि में प्रवेश करेंगे। आइये अब राशिवार राशिफल की चर्चा करते हैं।
मेष राशि
यह सप्ताह आपके संतान के लिए काफी अच्छा रहेगा। उनको सफलताएं प्राप्त होंगी। संतान का बहुत अच्छा सहयोग भी आपको प्राप्त हो सकता है। छात्रों की पढ़ाई ठीक चलेगी। उनको परीक्षाओं में सफलता प्राप्त होगी। आपकी प्रतिष्ठा उत्तम रहेगी। माता जी और जीवनसाथी का स्वास्थ्य अच्छा रहेगा। अविवाहित जातकों के लिए यह सप्ताह अच्छा रहेगा। विवाह के बहुत अच्छे प्रस्ताव आएंगे। नए-नए प्रेम संबंध बन सकते हैं। पुराने प्रेम संबंधों में मजबूती आएगी। भाग्य इस सप्ताह आपका साथ दे सकता है। भाई बहनों के साथ संबंधों में तनाव होगा। इस सप्ताह आपके लिए एक और दो सितंबर अच्छे परिणाम दायक हैं। तीन और चार सितंबर को आपको धन की प्राप्ति हो सकती है। 31 अगस्त को आपको सावधान रहना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन राम रक्षा स्त्रोत का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन मंगलवार है।
वृष राशि
इस सप्ताह आपके प्रतिष्ठा में वृद्धि की उम्मीद की जा सकती है। जनप्रतिनिधियों के लिए यह सप्ताह अच्छा रहेगा। आपके पराक्रम में वृद्धि होगी। कर्मचारी और अधिकारियों को इस सप्ताह थोड़ा सावधान रहकर कार्यों को करना चाहिए। धन आने के मार्ग में कुछ बाधा हैं। भाग्य से सामान्य मदद मिलेगी। विशेष मदद की उम्मीद ना करें। अपने कर्मों पर विश्वास करें। आपके संतान को थोड़ा कष्ट हो सकता है। आपके शत्रु इस सप्ताह शांत रहेंगे। इस सप्ताह आपके लिए 3 और 4 सितंबर सफलता दायक है। एक और दो सितंबर को आपको सावधानी पूर्वक कार्यों को करना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन शुक्रवार है।
मिथुन राशि
इस सप्ताह भी आपके पास धन आने की उम्मीद है। यह सप्ताह आपके भाई बहनों के लिए काफी अच्छा रहेगा। उनको तरक्की मिल सकती है। आपके पराक्रम में वृद्धि होगी। आपको अपने संतान से अच्छा सहयोग प्राप्त हो सकता है। संतान के सुख में वृद्धि होगी। भाग्य से इस सप्ताह आप कोई भी उम्मीद ना करें। आपको अपने कर्मों पर विश्वास करना चाहिए। जीवनसाथी का स्वास्थ्य ठीक रहेगा। इस सप्ताह आपके लिए 31 अगस्त और 5 तथा 6 सितंबर विभिन्न प्रकार के कार्यों में सफलता दिलाने वाले हैं। तीन और चार सितंबर को आपको थोड़ा सावधान रहकर अपने कार्यों को होशियारी के साथ करना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन काले कुत्ते को तंदूर की रोटी खिलाएं। सप्ताह का शुभ दिन रविवार है।
कर्क राशि
इस सप्ताह आपको धन और प्रतिष्ठा दोनों मिल सकती है। आपके व्यापार में वृद्धि होगी। इस सप्ताह आपका और आपके माता जी का स्वास्थ्य अच्छा रहेगा। भाई बहनों के साथ संबंध सामान्य रहेंगे अर्थात जैसे पहले थे वैसे ही रहेंगे। कर्मचारी और अधिकारियों को सावधान रहकर कार्यों को करना चाहिए। जनप्रतिनिधियों के लिए यह सप्ताह ठीक है। भाग्य से सामान्य मदद प्राप्त होगी। इस सप्ताह आपके लिए एक और दो सितंबर उपयोगी हैं। पांच और छह सितंबर को आपको सावधान रहकर के अपने कार्यों को अंजाम देना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन हनुमान चालीसा का पाठ करें और शनिवार को दक्षिण मुखी हनुमान जी के मंदिर में जाकर कम से कम तीन बार हनुमान चालीसा का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन सोमवार है।
सिंह राशि
इस सप्ताह आपका आत्मविश्वास उच्च कोटि का रहेगा। आपके व्यापार में वृद्धि होगी। भाई बहनों के साथ संबंध नरम और गरम रहेंगे। कचहरी के कार्यों में सावधान रहकर कार्य करें। आपके माता जी और पिताजी का स्वास्थ्य ठीक रहेगा। कर्मचारी और अधिकारियों के लिए यह सप्ताह सामान्य रूप से उपयोगी है। धन लाभ में कमी हो सकती है। इस सप्ताह आपके लिए तीन और चार तारीख विशेष रूप से लाभदायक है। 31 अगस्त को आपको सचेत रहकर अपने कार्यों को करना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन लाल मसूर की दाल का दान करें और मंगलवार को हनुमान जी के मंदिर में जाकर कम से कम तीन बार हनुमान चालीसा का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन बृहस्पतिवार है।
कन्या राशि
कचहरी के कार्यों में प्रयास करने पर और धन खर्च करने पर सफलता प्राप्त होगी। इस सप्ताह आपके पास धन आने की अच्छी संभावना है। धन प्राप्ति का पूर्ण प्रयास करें। अधिकारी और कर्मचारियों को इस सप्ताह थोड़ा सावधान रहकर करके कार्य करना चाहिए। आपका और आपके माता जी का स्वास्थ्य अच्छा रहेगा। भाई बहनों के साथ भी संबंध ठीक रहेंगे। दुर्घटनाओं से सावधान रहें। इस सप्ताह आपके लिए 31 अगस्त तथा 5 और 6 सितंबर फलदायक है। एक और दो सितंबर को आपको सचेत रहना चाहिए। तीन और चार सितंबर को आपको भाग्य से विशेष मदद प्राप्त हो सकती है। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन काले उड़द की दाल का दान करें और शनिवार को शनि मंदिर में जाकर शनि देव का पूजन करें। सप्ताह का शुभ दिन रविवार है।
तुला राशि
अविवाहित जातकों के लिए यह सप्ताह काफी अच्छा रहेगा। विवाह के अच्छे-अच्छे प्रस्ताव आएंगे। इस सप्ताह आपके पास धन आने का अच्छा योग है। धन प्राप्त करने का पूर्ण प्रयास करें। अधिकारीयों और कर्मचारियों के लिए भी यह सप्ताह बहुत अच्छा रहेगा। भाग्य के स्थान पर इस सप्ताह आप अपने कर्म पर विश्वास करें। आपको अपने संतान से इस सप्ताह सहयोग प्राप्त नहीं हो पाएगा। छात्रों के पढ़ाई में बाधा पड़ेगी। इस सप्ताह आपके लिए एक और दो सितंबर अनुकूल है। 31 अगस्त, तीन और 9 सितंबर को आपको होशियारी पूर्वक कार्यों को करना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन रुद्राष्टक का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन बुधवार है।
वृश्चिक राशि
कचहरी के कार्यों में सफलता का योग है। । पूर्ण प्रयास करने पड़ेंगे। कर्मचारी और अधिकारियों के लिए यह सप्ताह उत्तम रहेगा। कार्यालय में उनको सम्मान प्राप्त होगा। पिछले सप्ताह की भांति इस सप्ताह भी भाग्य आपकी मदद करेगा। दुर्घटनाओं से आपको सावधान रहना चाहिए। भाई बहनों के साथ संबंध ठीक रहेंगे। अगर खराब है तो उनमें सुधार आएगा। आपको अपने संतान से इस सप्ताह कोई विशेष सहयोग प्राप्त नहीं हो पाएगा। इस सप्ताह आपके लिए तीन और चार सितंबर परिणाम दायक है। सप्ताह के बाकी दिनों में आपको सावधानी पूर्वक अपने कार्यों को अंजाम देना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन शिव पंचाक्षर मंत्र का जाप करें। सप्ताह का शुभ दिन बृहस्पतिवार है।
धनु राशि
इस सप्ताह आपको भाग्य से भरपूर मदद मिलेगी। आपके कई कार्य आपके थोड़े से प्रयास से ही पूर्ण हो जाएंगे। धन आने का अच्छा योग है। धन प्राप्ति हेतु पूर्ण प्रयास करें। कर्मचारी और अधिकारियों के लिए यह सप्ताह सामान्य रूप से ठीक रहेगा। आपका स्वास्थ्य उत्तम रहेगा। इस सप्ताह आपके लिए 31 अगस्त तथा 5 और 6 सितंबर लाभप्रद हैं। तीन और चार सितंबर को आपको सावधानी पूर्वक अपने कार्य करना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन शिव पंचाक्षर स्त्रोत का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन रविवार है।
मकर राशि
यह सप्ताह आपके जीवनसाथी के लिए अच्छा है। अधिकारी और कर्मचारियों के लिए यह सप्ताह उत्तम है। उनको सफलताएं प्राप्त हो सकती हैं। भाग्य से मामूली मदद मिल सकती है। आप अपने शत्रुओं को थोड़े से प्रयास से परास्त कर सकते हैं। आपका स्वास्थ्य सामान्य रहेगा। भाई बहनों के साथ भी संबंध पहले जैसे ही रहेंगे। गलत रास्ते से धन आ सकता है। इस सप्ताह आपके लिए एक और दो सितंबर कार्यों को करने के लिए उचित है। तीन और चार सितंबर को आपके संतान को लाभ हो सकता है। छात्रों को परीक्षाओं में सफलता मिल सकती है। पांच और छह सितंबर को आपको सचेत रहना चाहिए। इस सप्ताह आपको प्रतिदिन गणेश अथर्वशीर्ष का पाठ करना चाहिए। सप्ताह का शुभ दिन शुक्रवार है।
कुंभ राशि
यह सप्ताह आपके जीवनसाथी के लिए काफी अच्छा रहेगा। उनको सफलताएं प्राप्त होगी। व्यापारियों के लिए भी यह सप्ताह अच्छा रहेगा। उनके व्यापार में उन्नति होगी। धन भी प्राप्त होगा। भाग्य आपका साथ देगा। आप जितना कार्य करेंगे उससे बेहतर परिणाम प्राप्त होंगे। आपके माता जी का स्वास्थ्य उत्तम रहेगा। पिताजी का स्वास्थ्य भी ठीक रहेगा। कर्मचारियों अधिकारियों के लिए सप्ताह सामान्य है। तीन और चार सितंबर कार्यों को करने के लिए उपयुक्त हैं। तीन और चार सितंबर को ही आपको प्रतिष्ठा मिल सकती है। अधिकारी और कर्मचारियों को तीन और चार सितंबर को थोड़ा सावधान रहकर अपने मनोस्थिति को ठीक रखना चाहिए। सप्ताह के बाकी दिन ठीक-ठाक है। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन गायत्री मंत्र का जाप करें। सप्ताह का शुभ दिन शुक्रवार है।
मीन राशि
इस सप्ताह आपको अपने शत्रुओं पर विजय प्राप्त हो सकती है। आपकी संतान के लिए भी यह सप्ताह अच्छा रहेगा। छात्रों को इस सप्ताह परीक्षाओं में सफलता प्राप्त हो सकती है। दुर्घटनाओं में आपको कष्ट नहीं होगा। आपको अपने प्रतिष्ठा के प्रति सतर्क रहना चाहिए। जनप्रतिनिधियों को इस सप्ताह सावधान रहकर कार्यों को करना चाहिए। अधिकारी और कर्मचारियों के लिए यह सप्ताह ठीक-ठाक रहेगा। इस सप्ताह 31 अगस्त और पांच तथा 6 सितंबर आपके लिए प्रभावशाली है। सप्ताह के बाकी दिन भी ठीक-ठाक है। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन भगवान शिव का दूध और जल से अभिषेक करें। सप्ताह का शुभ दिन रविवार है।
ध्यान दें कि यह सामान्य भविष्यवाणी है। अगर आप व्यक्तिगत और सटीक भविष्वाणी जानना चाहते हैं तो आपको मुझसे दूरभाष पर या व्यक्तिगत रूप से संपर्क कर अपनी कुंडली का विश्लेषण करवाना चाहिए। मां शारदा से प्रार्थना है या आप सदैव स्वस्थ सुखी और संपन्न रहें। जय मां शारदा।
☆ आलेख ☆ ~ धरती की वेदना ~ ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆
(भीषण त्रासदी के कारक )
☆
आसमान से उतर रहे देवताओं को देखकर धरती माँ चिल्लाई,
नहीं नही…भाई अभी इसकी जरूरत नहीं है l अभी मुझ पर उतना अत्याचार नहीं है जितना कहा जा रहा है l अभी भी मै अनेकानेक, नेक इंसानों को लोंगो की मदद करते देख रही हूँ। सब कुछ ठीक-ठाक चल रहा है l बस पीड़ा एक बात की है कि क्या सड़क, क्या बाजार, क्या स्कूल, क्या अस्पताल सब धक्कम – रेल हो रही है,
मैं हिलती जा रही हूँ
मै बुरी तरह से काँप रही हूँ
आने वाले खतरे को भाँप रही हूँ।
कॉलोनी में गाड़ियों का रेला, रेल बनता जा रहा है। मोहल्ले की लड़ाई, किचन बर्तन से उतरकर, गाड़ियों की पार्किंग तक चली आयी है। रोडवेज की एक बस निकली नहीं कि दूसरी भर जा रही है। जहाँ देखो भीड़ ही भीड़।
राशन की लाइन में भीड़,
मॉल- वाटर पार्क में भींड,
ऑफिस दफ्तरों की भींड,
रोडवेज रेलवे स्टेशनो में भींड,
शेर सपाटा-तीर्थ यात्रा करने वालों की भीड़
टूरिस्ट हैं या तथाकथित तीर्थ यात्रियों
मै नही जानता लेकिन लगी हुई है भीड़,
भीड़ ही भीड़, भीड़ इतनी कि मैं खुद अपनी नीड ढूढ़ रही हूँ। रोज बा रोज नए-नए अस्पतालों के खुलने के बावजूद भी अस्पतालों में भीड़ ही भीड़ है। ओ.पी.डी. से ओ.टी. तक की भीड़, एक्स रे -अल्ट्रासाउंड सेंटर की भीड़, पैथोलॉजी में खून निकलवाने वालों की भीड़, अस्पताल के अगल बगल खून चूसने वाले दलालों की भीड़।
इतना ही नहीं टूरिज्म की आड़ में सभी जा रहे हैं झुंड के झुंड पहाड़ों पर। वहाँ भी अब शांति नहीं, क्योंकि ये सारे पदयात्री नहीं।
गाड़ी, घोड़ा, मोटर बग्गी सब कुछ लेकर जाना है। इन लोगों के सुख सुविधा में कोई कमी न हो, वोट बैंक बरकरार रहे इसलिए विकास की आड़ में, काटते चले जा रहे हैं पहाड़ों को। बना रहे हैं रोज एक से एक बड़ी सड़के। मेरे पहाड़ों को तोड़ने के लिए जब आती है इनकी भारी भरकम मशीने, तब शांत पहाड़ चिघाड़ उठते हैं। रोने लगती है उनकी आत्माएं। काट -काट कर गिरा देते हैं देवदार और चीड़ के वृक्षो को। ये वृक्ष जो कि जकड़े रहते हैं अपनी जड़ों से इन पहाड़ों को। पहाड़ों पर पहुंचकर बनाते हैं आलीशान होटल। पहुँच जाती है ढेर सारी गाड़ियाँ। इनके धुओं से बढ़ जाता है यहाँ का टेंपरेचर। टूट के गिर पड़ते हैं, विशाल और विशाल ग्लेशियर। टूट जाती है प्रकृति की बनाई हुई झील की दीवारें और बहता हुआ निकल पड़ता है जानलेवा शैलाब। तब होती केदारनाथ और नेपाल जैसी भीषण त्रासदी
मारी जाती है ढेर सारी मानवता। अनाथ हो जाते हैं छोटे-छोटे बच्चे, बेसहारा हो जाते हैं बुजुर्ग माँ बाप।
यह सब देखकर मैं हिल उठती हूँ। फूट फूट कर रोती हूँ। आखिर मै करूँ तो क्या करूँ, ये तो मानते नहीं है।
पर यह सब होता ही भी है इन्हीं के कारण। इन लोगों ने तो एकदम हलचल बचा कर रख दी है। क्या धरती क्या आसमान, सब जगह भीड़ बेकाबू है, इनकी मनमानी जारी है। एक दिन आसमान भी मुझे रो कर कह रहा था कि तेरे बेटों ने यहां भी गंदगी बचा कर रख दी है। ढेर सारे रॉकेट, ढेर सारे उपग्रह क्या बोलते हैं, सैटेलाइट.. मेरे स्वच्छ शांत नीले आँगन में छोड़ रखा है l मैं बिलख रही हूँ। वायुयानों की तो बात ही छोड़ो, ये लाखों फतिंगो की तरह से इधर से उधर फुदक कर रहे हैं l इन्होने मेरा जीवन हराम कर दिया है।
हे देवगण ! मैं सिर्फ अपने बच्चों को बड़े प्यार से अपने गोद में पालना चाहती हूँ, और पालती भी हूँ। लेकिन इनके लिए शेष कार्य तो आप लोग ही करते हो l आप में से कोई धन के देवता हो, कोई ऐश्वर्या और यश के देवता हो, कोई जल के देवता हो, कोई ऊर्जा के देवता हो, कोई बुद्धि विवेक के देवता हो तो बस इतनी दया करो इन्हें इन्हे धन -दौलत सबकुछ दो पर बुद्धि विवेक कुछ ज्यादा ही दो, कि मेरे संकट में पड़े प्राण बच सके।
है देवगण ! मेरी पीड़ा के दो बड़े मूल कारण है, जो मुझे पीड़ित कर रहे हैं, मैं इसी विषय पर सोचती रहती हूं और आपसे कहती हूँ..
आप लोग मेरे इन पुत्रों से कहो कि-
ये लोग बढ़ती जनसंख्या पर नियंत्रण रखें।
प्रकृति और पर्यावरण का संरक्षण करें।
अगर ये लोग आपकी बात मानकर ऐसा करते हैं तब जाकर मेरी खुशी वापस लौटेगी.
(श्री सुरेश पटवा जी भारतीय स्टेट बैंक से सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों स्त्री-पुरुष “, गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व प्रतिसाद मिला है। अब आप प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकते हैं यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर।)
यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – पग-पग नर्मदा यात्रा – भाग- ४६ ☆ श्री सुरेश पटवा
7.पग-पग नर्मदा यात्रा
नर्मदा परिक्रमा:दूसरा चरण
पिपरहा से सतधारा 14 नवम्बर 2019
पिपरहा में नर्मदा का एक रेतीला किनारा है। आश्रम व्यवस्था बहुत अच्छी है रात को स्वामी जी के सेवक ने स्वादिष्ट खिचड़ी खिलाई। रास्ते में गन्ने और तुअर की खड़ी फ़सल के अलावा कुछ न दिखता था। गुड़ की चरखी सक्रिय होने लगीं। तीन बड़े कड़ाह लाइन से बनाए, उनके नीचे आग जलाने हेतु ख़ाली जगह आगे तक चली गई है, आख़िर में धुँआ निकलने की चिमनी है जिनसे धुँआ निकल रहा था। पूरे भारत में करेली मंडी का गुड़ मशहूर है। गुड़ की दो और मंडी श्रीधाम और नरसिंहपुर में चालु हो गईं हैं। मंडी में किसान का गुड़ तीस-पेंतीस रुपए किलो बिकता है वह लोगों तक पहुँचते-पहुँचते सौ रुपए किलो हो जाता है। एक सहयात्री मुंशीलाल भाई ने एक किलो गुड़ और एक किलो तुअर दाल ख़रीदी, दूसरे जगमोहन भाई ने बीज रहित हल्के हरे रंग के भटे लेकर पिट्ठु बेग में रख लिए।
रास्ते में बहुत से परिक्रमा वासी मिले वे सब के सब कहार, ढीमर, नाई, विश्वकर्मा या पिछड़े वर्ग के थे। कोई भी ब्राह्मण, वैश्य, क्षत्रि, ठाकुर यहाँ तक कि कोई लोधी परिक्रमा शुरू करता या यात्रा करता नहीं मिला। परिक्रमा किसी मन्नत या जन्नत की कामना से की जाती है इसलिए नर्मदा के प्रति अगाध आस्था उनका अवलंबन होता है, उनकी प्रेरणा होती है। वे लट्ठा कपड़े की दो आधी लुंग्गी, दो आधी बाँह के कुर्ते के साथ उसी कपड़े से सिला दो तरफ़ा लटकन झोला काँधे पर लटकाते हैं, जिसमें दो शीशियों में नर्मदा जल और पूजा का सामान रखा रहता है। एक लोटा और गिलास होना ज़रूरी होता है। हाथ में एक छड़ी जिसे वे सुखनाथ कहते हैं उनका आभूषण है। कई नंगे पैर, कुछ चप्पल और कुछ प्लास्टिक जूते पहने मिले।
नर्मदा की छाती को छलनी करते रेत माफ़िया के कारिंदे दिखे उनसे बातें करने पर रेत माफ़िया कारोबार समझ आया। बीच नदी से रेत निकालने वाले को 250 रुपए, नाव से डंपर में भरने वाले को 200 रुपए मिलते हैं। एक डंपर के माफ़िया किंग को बाज़ार से 5000 रुपए मिलते हैं। 450 की लागत में 350 का डीज़ल जोड़ लें तो 4200 रुपयों का लाभ एक डंपर पर होता है। ऐसे पाँच फेरों पर 21000 रोज़ाना का धंधा है। पकड़े जाने का कोई डर नहीं क्योंकि पूरा काम दूसरों से कराया जाता है। यदि कारिंदे पकड़े भी गए तो पुलिस, प्रशासन, नेता विधायक किसी को गवाह नहीं बनने देते, कोई अड़ा तो उसकी लाश नर्मदा जी की भेंट चढ़ जाती है, अब प्रेस के लोग भी सक्रिय भागीदार हैं। इस महान देशभक्ति पूर्ण राष्ट्रवाद में दोनों राजनैतिक दलों के नेताओं और कार्यकर्ताओं में आपसी समझ से मिलीभगत विकसित होकर एक तंत्र का रूप ले चुकी है। नेता, पुलिस, अधिकारी, मिडिया इन सभी के परिजन, चंगु-मंगू सरकारी ठेकेदार या बिल्डर-कालोनाइजर्स, इन सभी को मुफ्त के भाव की रेत-गिट्टी-पत्थर-लकड़ी-जमीन मिलती है। इन दबंगों पर हाथ डालने की हिम्मत कौन करे, जो करे वो पिटे, मंत्री का दर्जा प्राप्त कम्प्यूटर बाबा भी नाकाम हैं। छोटी नदियों की बर्बादी के बारे में सोचा भी नहीं जा सकता। चम्बल इलाके में ठाकुर मूंछ पर ताव देकर चम्बल में उत्खनन कर रहे हैं, सालों से रोकने की घोषणाएं हो रही हैं लेकिन होता कुछ नहीं, जो रोकने की हिमाकत करता है उस पर ट्राली चढ़ा दी जाती है। कई पुलिस, सरकारी अधिकारी जान गँवा चुके हैं। सभी नदियों की यही दुर्दशा है। स्वार्थ में अंधे लोग धरती माँ की छाती का सारा दूध निचोड़ कर उसे मरने के लिए छोड़ देंगे। स्थिति वाकई भयावह हैl गर्मियों में जगह जगह नर्मदा जी का प्रवाह रुक जाता है। बरगी डेम से अमावस्या/पूर्णिमा पर स्नान के लिए पानी छोड़ा जाता हैl अत्यधिक उत्खनन के कारण नर्मदा जी की जल धारण क्षमता कम हो गई है। सहायक नदियों का बारिश के बाद सूख जाना, जंगल की अत्यधिक कटाई जैसे कारक इसके लिए प्रमुख रूप से जिम्मेदार है।
शेर नदी अब तक नरसिंघपुर करकबेल के बीच ट्रेन से घरघराते हुए देखी थी जो लखनादौन के दक्षिणी पूर्वी जंगल में बटका से निकलती है हर्रई जागीर का घेर लगाकर नर्मदा से मिलने नीचे भागती है। रातीकटार गाँव के निकट नर्मदा में मिलती है। उसे नज़दीक से देखा, शेर नदी को नाव से पार किया। जहाँ मिलन होता है वहाँ ऐसा लगा मानो नर्मदा भी उत्तरी तट से दौड़कर शेर को गले लगाने भागती आई है, प्रेम की गहराई का नाप नहीं होता। नर्मदा-शेर मिलन स्थल का संगम बहुत गहरा था। वहाँ से बरमान राजमार्ग पुल दिखने लगा तो यात्रियों में ऊर्जा का संचार होकर क़दम तेज़ हो गए और बारह किलोमीटर की रुकरूक कर यात्रा पाँच घंटों में पूरी करके तीन बजे सतधारा पहुँच गए। जब सारे साथी नहाकर पूजा कर रहे थे, मन-मस्तिष्क में कुछ ऐसे विचार उभर आए।
हमारा धर्म हमें समग्रता में प्रकृति के प्रति कृतज्ञता प्रकट करना सिखाता है। वैदिक सभ्यता हमें प्रकृति के चर यथा पृथ्वी, अग्नि, अरुण, वरुण, आकाश और इंद्रियों के रूप में हमारे शरीर में मौजूद इन तत्वों के स्वामी मन स्वरुप इंद्र के प्रति यज्ञों से “तेरा तुझको अर्पण” करना सिखाता है। उपनिषद हमें आत्मा-परमात्मा से मिलाकर आध्यात्मिकता की रहस्यमयी दुनिया की दार्शनिक सैर कराते हैं। षठ दर्शन के निचोड़ स्वरुप वेदान्त दर्शन के आधार पर रचे पुराण जन साधारण को यज्ञों की कठिन दुरुह प्रक्रिया से हटाकर और आध्यात्मिकता की तर्क-वितर्क सघनता से बचाकर आश्चर्य जनक क़िस्से कहानियों के माध्यम से कर्म-अकर्म, धर्म-अधर्म, जन्म-पुनर्जन्म और निष्काम कर्म का अभ्यास कराते हुए वेदों के अरुण, वरुण, अग्नि, पृथ्वी, पेड़-पौधों, पशु-पक्षियों और नदियों की पूजा का पाठ पढ़ाते हैं। इसीलिए नर्मदा को देवी मानकर पूजना प्रकृति के प्रसाद जल तत्व जो 70% परिमाण में हमारे शरीर में जीवन की नैया खेता है, के प्रति कृतज्ञता प्रकट करना है। वेदों में वर्णित प्रकृति याने प्रथम-कृति के स्वामी रुद्र पुराणों में शिव हो गए हैं। नर्मदा का हरेक कंकड़ शंकर की तरह पूजनीय हो गया। लोकआस्था के पक्ष में इससे बड़ा कौन सा तर्क हो सकता है। नर्मदा के प्रति पूज्य भावना जीवन के प्रति आस्था की प्रतीक है। हिंदू धर्म कृतज्ञता पर टिका है, कृतघ्नता पर नहीं। सेमेटिक धर्म के अहमन्य कृतघ्न लोगों ने प्रकृति चरों की उपेक्षा से अपने देशों को सुलगते रेगिस्तान बना लिए हैं, भारत अभी भी सुजलाम-सुफलाम है।
( प्रो डॉ राजेश ठाकुर जी का मंतव्य उनके ही शब्दों में – “पाखण्ड, अंध विश्वास, कुरीति, विद्रूपता, विसंगति, विडंबना, अराजकता, भ्रष्टाचार के खिलाफ़ जन-समुदाय को जागृत करना ही मेरी लेखनी का मूल प्रयोजन है…l” अब आप प्रत्येक शनिवार डॉ राजेश ठाकुर जी की रचनाएँ आत्मसात कर सकते हैं. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण रचना “राखी…“.)
(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)
जीवन के कुछ अनमोल क्षण
तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित।
मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी से भेंट करते हुए।
बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए।
आप डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपका विचारणीय व्यंग्य – सोसायटी का जिम और मिश्रा जी की कमर।)
☆ चुभते तीर # १३० – व्यंग्य – सोसायटी का जिम और मिश्रा जी की कमर☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’☆
(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार
ग्रीन पार्क सोसायटी में नया जिम खुलना किसी साधारण घटना की तरह नहीं था। यह उस मोहल्ले के मध्यवर्गीय सपनों के पंख लगने जैसा था, जहाँ लोग शक्कर की बोरी उठाने में कमर पकड़ लेते थे, लेकिन मुफ़्त के ट्रॉयल के नाम पर पहाड़ चढ़ने को तैयार रहते थे। जिम के उद्घाटन के दिन सोसायटी के सबसे बुजुर्ग और भारी-भरकम सदस्य मिश्रा जी भी टी-शर्ट पहनकर पहुँचे। उनका मुख्य उद्देश्य सेहत बनाना नहीं, बल्कि गुप्ता जी को यह दिखाना था कि साठ की उम्र में भी उनके डोले किसी से कम नहीं हैं।
जिम के ट्रेनर रोहन ने सबको कसरत के नियम समझाने शुरू किए। मिश्रा जी ने ट्रेडमिल पर नज़र दौड़ाई और बोले, “रोहन बेटा, यह मशीन तो मेरे घर के पंखे से भी धीमी चलती है। इसे ज़रा पूरी रफ्तार पर चलाओ।”
रोहन ने मना किया, लेकिन मिश्रा जी की ज़िद्द के आगे किसकी चली है। उन्होंने मशीन पर पैर रखा और रफ्तार बढ़ते ही उनकी टांगें इस तरह भागने लगीं जैसे दफ़्तर में छुट्टी का सायरन बजते ही कर्मचारी घर की तरफ भागते हैं। दो मिनट में मिश्रा जी के माथे से पसीने की धारा ऐसे बही जैसे पहली बारिश में छज्जे से पानी टपकता है।
अचानक ट्रेडमिल से एक कड़क की आवाज़ आई। मिश्रा जी ने पेट पकड़ लिया और ज़मीन पर बैठ गए। पूरा जिम सन्नाटे में डूब गया। लोग भागे-भागे आए। गुप्ता जी ने चुटकी लेते हुए कहा, “कहा था मिश्रा जी, उम्र के हिसाब से चला करो, अब बैठो दो महीने बिस्तर पर।”
मिश्रा जी का चेहरा पीला पड़ चुका था। वे कुछ बोल नहीं पा रहे थे, बस अपनी जेब की तरफ इशारा कर रहे थे। सबको लगा कि मिश्रा जी को दिल का दौरा पड़ा है या कमर की हड्डी खिसक गई है। तुरंत एम्बुलेंस को फोन घुमाया गया। पूरी सोसायटी जमा हो गई। गुप्ता जी मन ही मन अपनी जीत का जश्न मनाने लगे कि अब कम से कम छह महीने मिश्रा जी पार्क में टहलने नहीं आएंगे।
तभी मिश्रा जी ने बहुत मुश्किल से अपनी जेब से अपना हाथ निकाला। उनके हाथ में एक मुड़ा हुआ कागज़ और बीस रुपये का नोट था। उन्होंने हांफते हुए ट्रेनर रोहन को कागज़ थमाया। रोहन ने कागज़ खोलकर पढ़ा, उसमें लिखा था, “ट्रेडमिल के नीचे मेरा तीन साल पुराना छुपाया हुआ बीस का नोट गिर गया था, वही उठाने के चक्कर में पैर फिसल गया। एम्बुलेंस रद्द करो, मुझे सिर्फ एक कड़क चाय पिलाओ।”
सारे लोग हैरान होकर एक-दूसरे का मुंह देखने लगे। गुप्ता जी का मुंह खुला का खुला रह गया। मिश्रा जी तुरंत खड़े हुए, अपनी टी-शर्ट सीधी की और मुस्कुराकर बोले, “सेहत तो बनती रहेगी, लेकिन अपने खून-पसीने की कमाई का बीस रुपया गंवाना हमारी डिक्शनरी में नहीं लिखा।”
पूरे जिम में ठहाके गूंज उठे और सबने मिश्रा जी की इस बेमिसाल फुर्ती और कंजूसी के मेल पर ज़ोरदार तालियां बजाईं।
(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)
☆ मनाचे श्लोक – एक सार्वकालिक ‘मनोपनिषद’… – श्लोक ९९ आणि १०० ☆ श्री विश्वास देशपांडे ☆
श्लोक क्र. ९९ – –
जगी धन्य वाराणसी पुण्यरासी ।
तयेमाजि जाता गती पूर्वजांसी ।
मुखे रामनामावळी नित्यकाळी ।
जिवा हीत सांगे सदा चंद्रमौळी ।।९९।।
अर्थ : वाराणसी अर्थात काशीक्षेत्र पुण्याने परिपूर्ण असल्याने खरोखरच जगात धन्य आहे. तिथे गेल्यानंतर तेथील पुण्यप्रभावामुळे आपल्यासह आपल्या पूर्वजांना गती मिळते. मुखाने सदैव श्रीरामांचे नाम घ्यावे असा उपदेश भगवान शंकर तिथे आपल्या कानात करतात.
(पुण्यरासी – पुण्याने परिपूर्ण/भरलेले, गती – मृत्यूनंतर सद्गती अथवा मुक्ती मिळणे)
विवेचन : या श्लोकात रामनामाचे महत्व स्पष्ट करताना समर्थांनी काशीक्षेत्राचे उदाहरण दिले आहे. आपल्याकडे काशीक्षेत्र सर्व तीर्थांमध्ये अत्यंत पवित्र मानले जाते. त्यावरून ‘ काशीस जावे नित्य वदावे ‘ अशी म्हण आपल्याकडे पडली आहे. म्हणजे प्रत्यक्ष काशीला जायला जमले नाही तरी मला काशीला जायचे आहे असे नेहमी म्हणत राहावे. यावरून काशीक्षेत्राचे महत्व आपल्या लक्षात येईल. आपल्याकडे भाविकांमध्ये अशी समजूत आहे की काशीला गेल्यानंतर आपल्याला आपल्या अंतकाळी उत्तम गती प्राप्त होते. केवळ आपल्यालाच नव्हे तर आपल्या पूर्वजांना देखील उत्तम गती मिळते. म्हणून ईश्वरावर श्रद्धा असणाऱ्या प्रत्येक व्यक्तीची आपण आयुष्यात एकदा तरी काशीला जावे अशी इच्छा असते. पूर्वीच्या काळी तर वृद्ध माणसे काशीला जात असताना तिकडेच देह ठेवला तर मुक्ती मिळाली असे समजत असत. तशी इच्छा मनात धरून बरीचशी मंडळी काशीला जात असत. आजही बऱ्याच भाविकांची तशी श्रद्धा आहे.
वरील श्लोकात दुसऱ्या ओळीत आलेला ‘ जाता ‘ हा शब्द दोन अर्थांनी घेता येतो. पहिला अर्थ म्हणजे काशीला गेल्यानंतर असा घेता येतो तर दुसरा अर्थ काशीला देह ठेवल्यानंतर असा घेता येतो. कोणताही अर्थ घेतला तरी काशी क्षेत्राचा महिमा अपरंपार आहे हे लक्षात येते. काशीला भगवान शंकरांचे मंदिर ‘ काशी विश्वनाथ ‘ म्हणून प्रसिद्ध आहे. देवाधिदेव महादेवाचे हे स्थान द्वादश ज्योतिर्लिंगांपैकी एक आहे असे मानले जाते. इथे येणाऱ्या प्रत्येक जीवाला भगवान शंकर स्वतः ‘ मुखाने सतत रामनाम घ्या ‘ ही आपल्या हिताची गोष्ट तेथे कानात सांगतात असे म्हटले जाते.
थोडक्यात म्हणजे समर्थांनी या ठिकाणी पुन्हा एकदा भगवान शंकरांचे उदाहरण देऊन रामनामाचे महत्व स्पष्ट केले आहे. ज्या काशी विश्वनाथाचे दर्शन घेतल्याने मोक्ष प्राप्ती होते असे आपण मानतो, ते भगवान शंकर स्वतः रामनाम घेतात आणि आपल्यालाही रामनाम घेण्याचा उपदेश करतात. तुम्ही काशीला जा किंवा जाऊ नका. पण मुखाने सतत रामनाम घ्या. तेच तुमच्या हिताचे आहे ही गोष्ट समर्थांनी इथे आपल्या मनावर ठसवली आहे. सातत्याने आपण रामनाम घेत गेलो तर आपला देह, आपले मन पवित्र, शुद्ध आणि स्वच्छ होईल. तेच काशीक्षेत्र होईल.
स्वसंवाद
१. भौतिकदृष्ट्या ‘काशीला’ जाण्याची ओढ असण्यासोबतच, मी माझ्या अंतःकरणात रामनामाची ‘पुण्यरासी’ (काशी क्षेत्र) निर्माण करण्याचा प्रयत्न करतो का?
२. जीवाला उत्तम गती प्राप्त होणे म्हणजे केवळ मृत्यूनंतर मिळणारे सुख नसून, चालू आयुष्यात रामनामाच्या अनुसंधानात राहून जन्माचे सार्थक करणे आहे, हे मला पटते आहे का?
३. “काशी विश्वनाथ स्वतः प्रत्येक जीवाच्या कानात रामनामाचा उपदेश करतात, ” हे ऐकल्यावर माझ्या दैनंदिन जीवनात रामनाम आदराने घेण्याची माझी वृत्ती अधिक दृढ झाली आहे का?
४. ‘पूर्वजांना गती मिळणे’ आणि स्वतःचा उद्धार करणे यासाठी विनामूल्य आणि अत्यंत सोपे असणारे रामनाम घेण्यासाठी मी रोज किती वेळ शांत चित्ताने देतो?
=====
श्लोक क्र. १०० – –
यथासांग रे कर्म ते हि घडेना ।
घडे धर्म ते पुण्य गांठी पडेना ।
दया पाहता सर्वभूती असेना ।
फुकाचे मुखी नाम ते हि वसेना ।।१००।।
अर्थ :पुण्य प्राप्तीसाठी आपण जे कर्म करतो, ते यथासांग घडत नाही. जे काही कर्म आपण त्यासाठी करतो, त्यात काहीतरी उणीव राहिली तरी पुण्य पदरी पडत नाही. सर्व प्राणिमात्रांबद्दल मनात दयेचा भावही उपजत नाही. हे सगळे समजण्यासारखे असले तरी फुकटचे असलेले भगवंताचे नाम देखील मुखात येत नाही.
विवेचन : समर्थांनी लिहिलेला हा शंभरावा श्लोक विशेष आहे. मानवी प्रवृत्तीवर समर्थांनी अचूक बोट ठेवले आहे. माणूस सगळेच साध्य करण्याच्या मागे लागतो. संसार करता करता पुण्यप्राप्ती व्हावी काही धर्मकार्य करतो. परंतु धार्मिक कार्य करताना त्यात बऱ्याच वेळा काहीतरी उणीव राहून जाण्याची शक्यता असते. ते यथासांग, यथाविधी पार पडेलच असे सांगता येत नाही. त्यामुळे त्यातून आपल्या गाठी काही पुण्याचा संचय होईल अशी अपेक्षा करणाऱ्या यजमानाच्या पदरी फारसे काही पडत नाही. त्यातच अलीकडच्या काळात धार्मिक कार्ये विधिवत करण्यापेक्षा त्यात ते जास्त देखणे आणि भव्य कसे होईल याकडे लक्ष असते. त्यातून अमाप खर्च केला जातो. आलेली पाहुणे मंडळी, त्यांचे आहेर इत्यादी गोष्टींकडे जास्त लक्ष द्यावे लागते. ही कोणाला अतिशयोक्ती वाटली तरी वस्तुस्थिती आहे. अशा परिस्थितीत यजमानांचे लक्ष धार्मिक कार्यात कमी आणि इतर ठिकाणीच जास्त अशी अवस्था होते.
सर्वाभूती ईश्वर असे आपण मानतो. ज्ञानेश्वरीत तर ज्ञानेश्वर माउली ‘ जे जे भेटे भूत, ते ते मानिजे भगवंत ‘असे म्हणतात. असे केले तरी त्या त्या रूपातील असणाऱ्या ईश्वराचीच पूजा आपल्या हातून घडते. सगळ्या संतांची चरित्रे या दृष्टीने आदर्श आहेत. संत एकनाथांनी तृषार्त गाढवाला पाणी पाजून त्याचा आत्मा शांत केला. ज्ञानदेवांनी सर्वांभूती एकच ईश्वर आहे हे नुसते सांगितले नाही तर रेड्याच्या मुखी वेद वदवून ते सिद्ध केले. पण आपण सामान्य माणसे. आपल्याकडून ‘ सर्वभूती दया ‘ हे तत्व देखील नीट पाळले जात नाही. प्राणिमात्रांचे तर सोडून द्या पण घरातील नोकर, मोलकरीण यांच्याशी तरी आपण समभावाने वागतो का ही विचार करण्यासारखी गोष्ट आहे.
समर्थ म्हणतात, इथपर्यंतही ठीक आहे. समजण्यासारखे आहे. पण हे मना, अरे रामनाम किंवा भगवंताचे नाम घेण्यासाठी तर काही खर्च करावा लागत नाही ना? त्यासाठी कोणतेही धार्मिक विधी किंवा खर्च करावा लागत नाही. त्यात काही न्यून किंवा उणीव राहील अशी शक्यता देखील नाही. असे असूनही हे जीवा तू फुकटचे असे भगवंताचे नाम का घेत नाही? संत सोयराबाई म्हणतात, ‘ सुखाचे हे नाम आवडीने गावे, वाचे आळवावे विठोबासी. ‘ हेच आपणही करायला हवे.
स्वसंवाद ::
१. माझ्या हातून होणारी धार्मिक कृत्ये ही केवळ बाह्य प्रदर्शनासाठी होतात की त्यात अंतःकरणाची खरी शुद्धता आणि विधीवरील निष्ठा असते?
२. ज्ञानेश्वर माऊलींच्या “जे जे भेटे भूत” या वचनाचा आदर मी माझ्या दैनंदिन जीवनात माझ्या हाताखाली काम करणाऱ्या माणसांशी आदराने वागून करतो का?
३. धार्मिक विधीत काहीतरी उणीव राहून जाण्याची भीती असते; पण ज्या नामात कोणतीही उणीव राहण्याची शक्यता नाही, ते विनामूल्य असणारे रामनाम मी आवडीने घेतो का?
(डा. मुक्ता जीहरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य” के माध्यम से हम आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी की मानवीय जीवन पर आधारित एक विचारणीय आलेख ज़िंदगी…लम्हों की किताब। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की लेखनी को इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें।)
(डॉ मुक्ता जी द्वारा रचित एक भजन – इंसान मिट्टी से उपजा / स्वर- विकास यशकीर्ति, सौजन्य – तरूनम चैनल)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य # ३३६ ☆
☆ ज़िंदगी…लम्हों की किताब… ☆ डॉ. मुक्ता ☆
‘लम्हों की किताब है ज़िंदगी/ सांसों व ख्यालों का हिसाब है ज़िंदगी/ कुछ ज़रूरतें पूरी, कुछ ख्वाहिशें अधूरी/ बस इन्हीं सवालों का/ जवाब है जिंदगी।’ प्रश्न उठता है–ज़िंदगी क्या है? ज़िंदगी एक सवाल है; लम्हों की किताब है; सांसों व ख्यालों का हिसाब है; कुछ अधूरी व कुछ पूरी ख्वाहिशों का सवाल है। सच ही तो है, स्वयं को पढ़ना सबसे अधिक कठिन कार्य है। जब हम ख़ुद के बारे में नहीं जानते; अनजान हैं ख़ुद से… फिर ज़िंदगी को समझना कैसे संभव है? ‘जिंदगी लम्हों की सौग़ात है/ अनबूझ पहेली है/ किसी को बहुत लगती लम्बी/ किसी को लगती सहेली है।’ ज़िंदगी सांसों का एक सिलसिला है। जब कुछ ख्वाहिशें पूरी हो जाती हैं, तो इंसान प्रसन्न हो जाता है; फूला नहीं समाता है– मानो उसकी ज़िंदगी में चिर-बसंत का आगमन हो जाता है और जो ख्वाहिशें अधूरी रह जाती हैं; टीस बन जाती हैं; नासूर बन हर पल सालती हैं, तो ज़िंदगी अज़ाब बन जाती है। इस स्थिति के लिए दोषी कौन? शायद! हम…क्योंकि ख्वाहिशें हम ही मन में पालते हैं और यह सिलसिला अनवरत चलता रहता है। एक के बाद दूसरी प्रकट हो जाती है और ये चाहतें हमें चैन से नहीं बैठने देतीं। अक्सर हमारी जीवन-नौका भंवर में इस क़दर फंस जाती है कि हम चाह कर भी उस चक्रवात से बाहर नहीं निकल पाते। परंतु इसके लिए दोषी हम स्वयं हैं, परंंतु उस ओर हमारी दृष्टि जाती ही नहीं और न ही हम यह जानते हैं कि हम कौन हैं? कहाँ से आए हैं और इस संसार में आने का हमारा प्रयोजन क्या है? संसार व समस्त प्राणी-जगत् नश्वर है और माया के कारण सत्य भासता है। यह सब जानते हुए भी हम आजीवन इस मायाजाल से मुक्त नहीं हो पाते।
सो! आइए, खुद को पढ़ें और ज़िंदगी के मक़सद को जानें; अपनी इच्छाओं पर नियंत्रण रखें और बेवजह ख्वाहिशों को मन में विकसित न होने दे। ख्वाहिशों अथवा आकांक्षाओं को ज़रूरतों-आवश्यकताओं तक सीमित कर दें, क्योंकि आवश्यकताओं की पूर्ति तो सहज रूप में संभव है; इच्छाओं की नहीं, क्योंकि वे तो सुरसा के मुख की भांति बढ़ती चली जाती हैं और उनका अंत कभी नहीं होता। जिस दिन हम इच्छा व आवश्यकता के गणित को समझ जाएंगे; ज़िंदगी आसान हो जाएगी। आवश्यकता के बिना तो ज़िंदगी की कल्पना ही बेमानी है, असंभव है। परमात्मा ने प्रचुर मात्रा में पृथ्वी, वायु, जल आदि प्राकृतिक संसाधन जुटाए हैं… भले ही मानव के बढ़ते लालच के कारण हम उनका मूल्य चुकाने को विवश हैं। सो! इसमें दोष हमारी बढ़ती इच्छाओं का है। इसलिए इच्छाओं पर अंकुश लगाकर उन्हें सीमित कर तनाव-रहित जीवन जीना श्रेयस्कर है।
ख्वाहिशें कभी पूरी नहीं होती और कई बार हम पहले ही घुटने टेक कर पराजय स्वीकार लेते हैं; उन्हें पूरा करने के निमित्त जी-जान से प्रयत्न भी नहीं करते और स्वयं को झोंक देते हैं– चिंता, तनाव, निराशा व अवसाद के गहन सागर में; जिसके चंगुल से बच निकलना असंभव होता है। वास्तव में ज़िंदगी साँसों का सिलसिला है। वैसे भी ‘जब तक साँस, तब तक आस’ रहती है और जिस दिन साँस थम जाती है, धरा का, सब धरा पर, धरा ही रह जाता है। मानव शरीर पंच-तत्वों से निर्मित है…सो! मानव अंत में पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि तथा आकाश में विलीन हो जाता है।
‘आदमी की औक़ात/ बस! एक मुट्ठी भर राख’ यही है जीवन का शाश्वत सत्य। मृत्यु निश्चित व अवश्यंभावी है; भले ही समय व स्थान निर्धारित नहीं है। इंसान इस जहान में खाली हाथ आया था और उसे सब कुछ यहीं छोड़, खाली हाथ लौट जाना है। परंतु फिर भी वह आखिरी सांस तक इसी उधेड़बुन में लगा रहता है और अपनों की चिंता में लिप्त रहता है। वह अपने आत्मजों व प्रियजनों के लिए आजीवन उचित-अनुचित कार्यों को अंजाम देता है…उनकी खुशी के लिए; जबकि पापों का फल उसे अकेले ही भुगतना पड़ता है, क्योंकि ‘सुख के सब साथी, दु:ख में न कोय’ अर्थात् सुख-सुविधाओं का आनंद तो सभी लेते हैं, परंतु वे पाप के प्रतिभागी नहीं होते। आइए! हम इससे निज़ात पाने की चेष्टा करें और हर पल को अंतिम पल स्वीकार कर निष्काम कर्म करें। कबीरदास जी का यह दोहा समय की सार्थकता पर प्रकाश डालता है–’ काल करे सो आज कर, आज करे सो अब/ पल में प्रलय हो जाएगी, बहुरि करेगा कब?’ जी हां! कल अर्थात् भविष्य अनिश्चित है; केवल वर्तमान ही सत्य है। इसलिए जो भी करना है; आज ही नहीं, अभी करना बेहतर है। क़ुदरत ने तो हमें आनंद ही आनंद दिया है, दु:ख तो हमारी स्वयं की खोज है। इससे तात्पर्य है कि प्रकृति दयालु है; मां की भांति मानव की हर आवश्यकता की पूर्ति करती है। परंतु मानव स्वार्थी है; उसका अनावश्यक दोहन करता है; जिसके कारण अपेक्षित संतुलन व सामाजिक-व्यवस्था बिगड़ जाती है तथा उसके कार्य-व्यवहार में अनावश्यक हस्तक्षेप करने का परिणाम है सुनामी, अत्यधिक वर्षा, दुर्भिक्ष, अकाल, महामारी आदि…जिनका सामना आज पूरा विश्व कर रहा है। मुझे स्मरण हो रहा हो रहा है… भगवान महावीर द्वारा निर्दिष्ट–’जियो और जीने दो’ का सिद्धांत, जो अधिकार को त्याग कर्त्तव्य-पालन व संचय की प्रवृत्ति को त्यागने का संदेश देता है। सृष्टि का नियम है कि ‘एक साँस लेने के लिए मानव को पहली सांस को छोड़ना पड़ता है।’ सो! जीवन में ज़रूरतों की पूर्ति करो; व्यर्थ की ख्वाहिशें मत पनपने दो, क्योंकि वे कभी पूरी नहीं होतीं और उनके जंजाल में फंसा मानव कभी भी मुक्त नहीं हो पाता। इसलिए सदैव अपनी चादर देख कर पांव पसारने अर्थात् संतोष से जीने की सीख दी गयी है… यही अनमोल धन है अर्थात् जो मिला है, उसी में संतोष कीजिए, क्योंकि परमात्मा वही देता है, जो हमारे लिए आवश्यक व शुभ होता है। सो! ‘सपने देखिए! मगर खुली आंख से’… और उन्हें साकार करने की भरपूर चेष्टा कीजिए; परंतु अपनी सीमाओं में रहते हुए, ताकि उससे दूसरों के अधिकारों का हनन न हो।
संसार अद्भुत स्थान है। आप दूसरे के दिल में, विचारों में, दुआओं में रहिए। परंतु यह तभी संभव है, जब आप किसी के लिए अच्छा करते हैं; उसका मंगल चाहते हैं; उसके प्रति मनोमालिन्य का दूषित भाव नहीं रखते। सो! ‘सब हमारे, हम सभी के’ –इस सिद्धांत को जीवन में अपना लीजिए… यही आत्मोन्नति का सोपान है। ‘कर भला, हो भला’ तथा ‘सबका मंगल होय’ अर्थात् इस संसार में हम जैसा करते हैं; वही लौटकर हमारे पास आता है। इसीलिए कहा गया है कि ‘रूठे हुए को हंसाना; असहाय की सहायता करना; सुपात्र को दान देना’ आदि सब प्रतिदान रूप में लौट कर आता है। वक्त सदा एक-सा नहीं रहता। ‘कौन जाने, किस घड़ी, वक्त का बदले मिज़ाज’ तथा ‘कल चमन था, आज एक सह़रा हुआ/ देखते ही देखते यह क्या हुआ’– यह हक़ीक़त है। पल-भर में रंक राजा व राजा रंक बन सकता है। क़ुदरत के खेल अजब हैं; न्यारे हैं; विचित्र हैं। सुनामी के सम्मुख बड़ी-बड़ी इमारतें ढह जाती हैं और वह सब बहाकर ले जाता है। उसी प्रकार घर में आग लगने पर कुछ भी शेष नहीं बचता। कोरोना जैसी महामारी का उदाहरण आप सबके समक्ष है। आप घर की चारदीवारी में क़ैद हैं… आपके पास धन-दौलत है; आप उसे खर्च नहीं कर सकते; अपनों की खोज-खबर नहीं ले सकते। कोरोना से पीड़ित व्यक्ति राजकीय संपत्ति बन जाता है। यदि बच गया, तो लौट आएगा, अन्यथा उसका दाह-संस्कार भी सरकार द्वारा किया जाएगा। हां! आपको सूचना अवश्य दे दी जाएगी।
लॉकडाउन में सब बंद है। जीवन थम-सा गया है। सब कुछ मालिक के हाथ है; उसकी रज़ा के बिना तो एक पत्ता भी नहीं हिल पाता…फिर यह भागदौड़ क्यों? अधिकाधिक धन कमाने के लिए अपनों से छल क्यों? दूसरों की भावनाओं को रौंद कर महल बनाने की इच्छा क्यों? सो! सदा प्रसन्न रहिए। ‘कुछ परेशानियों को हंस कर टाल दो, कुछ को वक्त पर टाल दो।’ समय सबसे बलवान् है; सबसे बड़ी शक्ति है; सबसे बड़ी नियामत है। जो ठीक अर्थात् आपके लिए उपयुक्त व कारग़र होगा, आपको अवश्य मिल जाएगा। चिंता मत करो। जिसे तुम अपना कहते हो; तुम्हें यहीं से मिला है और तुम्हें यहीं पर सब छोड़ कर जाना है। फिर चिंता और शोक क्यों?
रोते हुए को हंसाना सबसे बड़ी इबादत है; पूजा है; भक्ति है; जिससे प्रभु प्रसन्न होते हैं। सो! मुट्ठी खुली रखना सीखें, क्योंकि तुम्हें इस संसार से खाली हाथ लौटना है। अपने हाथों से गरीबों की मदद करें; उनके सुख में अपना सुख स्वीकारें, क्योंकि ‘क़द बढ़ा नहीं करते, एड़ियां उठाने से/ ऊंचाइयां तो मिलती है, सर को झुकाने से।’ विनम्रता मानव का सबसे बड़ा गुण है। इससे बाह्य धन-संपदा ही नहीं मिलती; आंतरिक सुख, शांति व आत्म-संतोष भी प्राप्त होता है और मानव की दुष्प्रवृत्तियों का स्वत: अंत हो जाता है। वह संसार उसे अपना व खुशहाल नज़र आता है। सो! ज़िंदगी उसे दु:खालय नहीं भासती; उत्सव प्रतीत होती है, जिसमें रंजोग़म का स्थान नहीं; खुशियाँ ही खुशियाँ हैं; जो देने से, बाँटने से विद्या रूपी दान की भांति बढ़ती चली जाती हैं। इसलिए कहा जाता है–’जिसे इस जहान में आंसुओं को पीना आ गया/ समझो! उसे जीना आ गया।’ सो! जो मिला है, उसे प्रभु-कृपा समझ कर प्रसन्नता से स्वीकार करें, और ग़िला-शिक़वा कभी मत करें। कल अर्थात् भविष्य अनिश्चित है; कभी आएगा नहीं…उसकी चिंता में वर्तमान को नष्ट मत करें… यही ज़िंदगी है और यही है लम्हों की सौग़ात।