ज्योतिष साहित्य ☆ साप्ताहिक राशिफल (29 जून से 5 जुलाई 2026) ☆ ज्योतिषाचार्य पं अनिल कुमार पाण्डेय ☆

ज्योतिषाचार्य पं अनिल कुमार पाण्डेय

विज्ञान की अन्य विधाओं में भारतीय ज्योतिष शास्त्र का अपना विशेष स्थान है। हम अक्सर शुभ कार्यों के लिए शुभ मुहूर्त, शुभ विवाह के लिए सर्वोत्तम कुंडली मिलान आदि करते हैं। साथ ही हम इसकी स्वीकार्यता सुहृदय पाठकों के विवेक पर छोड़ते हैं। हमें प्रसन्नता है कि ज्योतिषाचार्य पं अनिल पाण्डेय जी ने ई-अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों के विशेष अनुरोध पर साप्ताहिक राशिफल प्रत्येक शनिवार को साझा करना स्वीकार किया है। इसके लिए हम सभी आपके हृदयतल से आभारी हैं। साथ ही हम अपने पाठकों से भी जानना चाहेंगे कि इस स्तम्भ के बारे में उनकी क्या राय है ? 

☆ ज्योतिष साहित्य ☆ साप्ताहिक राशिफल (29 जून से 5 जुलाई 2026) ☆ ज्योतिषाचार्य पं अनिल कुमार पाण्डेय ☆

जय श्री राम। कुछ लोग कहते हैं कि मुंह में राम बगल में छुरी परंतु हम श्री हनुमान जी के भक्त कहते हैं अगर मुख में राम हैं तो बगल में हनुमान हैं। श्री हनुमान जी के भक्त श्री हनुमान चालीसा को अपना आधार मानते हैं। हमारा विश्वास है कि श्री हनुमान चालीसा की चौपाइयां हमारे सभी कष्टों को दूर कर सकती है। आज कि श्री हनुमान चालीसा की चौपाई है –

संकट तें हनुमान छुड़ावै | मन क्रम बचन ध्यान जो लावै ||

 इस चौपाई का संपुट पाठ करने से जातक को सभी प्रकार के संकटों से मुक्त रहता है।

“नासे रोग हरे सब पीरा” नाम की पुस्तक में श्रीहनुमान चालीसा की चौपाइयों से संबंधित सभी उपायों का विस्तृत विवरण दिया हुआ है। इस पुस्तक को आप हमारे यहां से प्राप्त कर सकते हैं।

आइये अब मैं पंडित अनिल पाण्डेय आपको इस सप्ताह अर्थात 29 जून से 5 जुलाई 2026 तक के सप्ताह के, ग्रहों के विचरण की जानकारी दे रहा हूं।

इस सप्ताह सूर्य मिथुन राशि में, मंगल वृष राशि में, गुरु कर्क राशि में, शनि मीन राशि में और राहु कुंभ राशि में गोचर करेंगे।

प्रारंभ में बुध कर्क राशि में मार्गी रहेगा परंतु 30 जून के 12:30 दिन से वह कर्क राशि में ही वक्री गति से भ्रमण करेगा। इसी प्रकार शुक्र प्रारंभ में कर्क राशि में रहेगा और 4 तारीख के 3:53 दिन से सिंह राशि में प्रवेश करेगा।

आईये अब हम राशिवार राशिफल की चर्चा करते हैं।

मेष राशि

इस सप्ताह आपका और आपके जीवनसाथी का स्वास्थ्य ठीक रहेगा। भाई बहनों से संबंध सामान्य रहेंगे। आपके प्रतिष्ठा में वृद्धि होगी परंतु प्रतिष्ठा मैं वृद्धि के लिए आपको विशेष प्रयास भी करना पड़ेगा। कर्मचारियों और अधिकारियों के लिए यह सप्ताह सावधान रहने का है। उनको कोई भी कार्य सावधानी पूर्वक करना चाहिए। इस सप्ताह आपके लिए 1 तारीख की दोपहर से लेकर दो और तीन तारीख विभिन्न प्रकार के कार्यों के लिए उपयोगी है। सप्ताह के बाकी दिन भी ठीक-ठाक हैं। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन चावल का दान करें तथा शुक्रवार को मंदिर में जाकर विशेष रूप से सफेद वस्त्रो का या चावल का दान करें। सप्ताह का शुभ दिन बृहस्पतिवार है।

वृष राशि

इस सप्ताह आपके पास धन आने का योग है। धन प्राप्त के लिए प्रयास भी करना पड़ेगा। भाई बहनों के साथ नरम संबंध रहेंगे। कर्मचारी और अधिकारियों को अपने वाणी पर नियंत्रण करना चाहिए। आपके स्वास्थ्य में थोड़ी परेशानी आ सकती है। जीवनसाथी का स्वास्थ्य उत्तम रहेगा। जनप्रतिनिधियों के प्रतिष्ठा में वृद्धि होगी। भाग्य से कभी-कभी मदद मिल जाएगी। परंतु भाग्य पर बहुत ज्यादा विश्वास ना करें। कर्म पर विश्वास करें। इस सप्ताह आपके लिए चार और पांच जुलाई परिणाम दायक हैं। 29, 30 और 1 तारीख को आपको सावधानी पूर्वक कार्यों को निपटाना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन गाय को हरा चारा खिलाएं। सप्ताह का शुभ दिन शनिवार है।

मिथुन राशि

इस सप्ताह आपके आत्मविश्वास में वृद्धि होगी। आपका और आपके जीवन साथी का स्वास्थ्य उत्तम रहेगा। कचहरी के कार्यों में सावधानी बरतें। धन आने का योग है। भाग्य से इस सप्ताह आपको मदद नहीं मिल पाएगी। भाग्य के सहारे बिल्कुल ना बैठे। अपने कर्मों पर विश्वास करें और कुछ भी प्राप्त करने के लिए अपने कर्म का सहारा लें। इस सप्ताह आपके लिए 29, 30 और 1 तारीख की दोपहर तक का समय अनुकूल है। 1 तारीख की दोपहर के बाद से लेकर दो और तीन तारीख को आपको सावधान रहकर कार्यों को करना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन काले कुत्ते को तंदूर की रोटी खिलाएं। सप्ताह का शुभ दिन बुधवार है।

कर्क राशि

यह वर्ष कर्क राशि वालों के लिए उत्तम है। उनके लग्न में उच्च के गुरु विराजमान है जो की सभी प्रकार की बाधाओं को दूर करने में सक्षम है। अविवाहित जातकों के लिए यह सप्ताह अच्छा रहेगा। विवाह के नए-नए प्रस्ताव आ सकते हैं। कचहरी के कार्यों में अगर आप सावधानी बरतेंगे तो विजय मिल सकती है। भाग्य से सामान्य सहयोग प्राप्त होगा। इस सप्ताह आपके लिए 1 तारीख के दोपहर के से लेकर दो और तीन तारीख विभिन्न रूप से परिणाम दायक हैं। सप्ताह के बाकी दिनों में आपको सावधान रहना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन हनुमान चालीसा का पाठ करें तथा शनिवार को दक्षिण मुखी हनुमान जी के मंदिर में जाकर कम से कम तीन बार हनुमान चालीसा का वाचन करें। सप्ताह का शुभ दिन बुधवार है।

सिंह राशि

इस सप्ताह आपके पास धन आने का अद्भुत योग है। आपके थोड़े प्रयास से ही आपके पास अधिक धन आ सकता है। कचहरी के कार्यों में सावधान रहें। आप किसी अच्छे काम जैसे विवाह, शादी, जमीन खरीदना आदि कार्यों में धन व्यय कर सकते हैं। दुर्घटनाओं से थोड़ा सावधान रहने का प्रयास करें। वाहन चलाने में किसी प्रकार का रिस्क ना लें। अधिकारी और कर्मचारियों को अपने कार्यालय में सतर्कतापूर्वक कार्यौ को करना चाहिए। प्रतिष्ठा में वृद्धि का योग है। इस सप्ताह आपके लिए चार और 5 जुलाई प्रतिष्ठा दायक है। 1 तारीख के दोपहर से लेकर दो और तीन तारीख को आपको सावधान रहकर कार्यों को करना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन लाल मसूर की दाल का दान करें और मंगलवार को हनुमान जी के मंदिर में जाकर हनुमान चालीसा का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन रविवार है।

कन्या राशि

अधिकारियों एवं कर्मचारियों के लिए यह सप्ताह अच्छा रहेगा। उनको अपने कार्यालय में प्रतिष्ठा प्राप्त होगी। धन आने का भी योग है। जनप्रतिनिधियों के लिए भी यह सप्ताह ठीक रहेगा। उनको अपने क्षेत्र में प्रतिष्ठा मिलेगी। इस सप्ताह आपके शत्रु शांत रहेंगे, परंतु समाप्त नहीं होंगे। भाई बहनों के साथ नरम संबंध रहेंगे। इस सप्ताह आपको अपने संतान से विशेष सहयोग प्राप्त नहीं हो पाएगा। इस सप्ताह आपके लिए 29, 30 और 1 तारीख की दोपहर तक का समय फलदायक है। चार और पांच तारीख को आपको सचेत रहकर कार्यों को करना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन काले उड़द की दाल का दान करें और शनिवार को शनि मंदिर में जाकर शनि देव का पूजन करें। सप्ताह का शुभ दिन बुधवार है।

तुला राशि

इस सप्ताह भाग्य आपका सामान्य रूप से साथ देगा। भाग्य से आपके कई कार्य निपट सकते हैं। परंतु फिर भी भाग्य पर बहुत ज्यादा भरोसा ना करें। अपने कर्म पर भरोसा करें। अधिकारी एवं कर्मचारियों को अपने कार्यालय में सतर्कता पूर्वक कार्यों को करना चाहिए। इस सप्ताह आपको अपने संतान से सहयोग नहीं मिल पाएगा। छात्रों की पढ़ाई में परेशानी आ सकती है। इस सप्ताह आपके शत्रु शांत रहेंगे। दुर्घटनाओं से इस सप्ताह आपको सावधान रहना चाहिए। इस सप्ताह आपके लिए 1 तारीख की दोपहर के बाद से लेकर दो और तीन तारीख परिणाम मूलक हैं। सप्ताह के बाकी दिन भी ठीक-ठाक हैं। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन रुद्राष्टक का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन शुक्रवार है।

वृश्चिक राशि

इस सप्ताह आपका स्वास्थ्य उत्तम रहेगा। आपके आत्मविश्वास मैं वृद्धि होगी। कार्यालय में आपकी प्रतिष्ठा ठीक-ठाक रहेगी। भाग्य से थोड़ी बहुत मदद मिलेगी। धन आने का भी योग है। आपके माताजी या पिताजी को कष्ट हो सकता है। भाई बहनों के साथ संबंध सामान्य रहेंगे। आपके संतान से आपको मामूली सहयोग प्राप्त होगा। छात्रों की पढ़ाई ठीक चलेगी। इस सप्ताह आपके लिए चार और पांच जुलाई उत्तम है। सप्ताह के बाकी दिन भी ठीक-ठाक हैं। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन शिव पंचाक्षरी मंत्र का जाप करें। सप्ताह का शुभ दिन रविवार है।

धनु राशि

इस सप्ताह आपका और आपके जीवनसाथी का स्वास्थ्य उत्तम रहेगा। लंबी यात्रा का योग बन सकता है। । भाग्य से आपको मदद मिल सकती है। अगर आप विशेष प्रयास करेंगे तो आप अपने शत्रुओं को पराजित कर सकते हैं। परंतु इस सप्ताह आपको शत्रुओं से सतर्क रहना चाहिए। भाई बहनों के साथ संबंधों में तनाव आ सकता है। सामाजिक प्रतिष्ठा सामान्य रहेगी। जनप्रतिनिधियों के लिए यह सप्ताह सामान्य है। इस सप्ताह आपके लिए 29, 30 और 1 तारीख लाभप्रद है। सप्ताह के बाकी के दिन भी ठीक-ठाक हैं। अपने कार्यों को सफल बनाने के लिए इस सप्ताह का भरपूर उपयोग करें। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन शिव पंचाक्षरी स्त्रोत का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन मंगलवार है।

मकर राशि

अविवाहित जातकों के लिए यह सप्ताह ठीक रहेगा। विवाह के नए प्रस्ताव सकते हैं। प्रेम संबंधों में वृद्धि संभव है। नए प्रेम संबंध भी बन सकते हैं। इस सप्ताह आप अपने संतान के प्रति थोड़ा सतर्क रहें। उनको कुछ कष्ट हो सकता है। छात्रों की पढ़ाई में बाधा पड़ सकती है। भाई बहनों के साथ संबंध ठीक-ठाक रहेंगे। धन आने की थोड़ी सी उम्मीद की जा सकती है। कचहरी के कार्यों में सावधानी बरतें। सफलता मिल सकती है। इस सप्ताह आपके लिए 1 तारीख की दोपहर से लेकर दो और तीन तारीख आत्मविश्वास से भरपूर रहेंगे। इस दिन आपके कई कार्य संपन्न हो सकते हैं। इन तिथियां का पूरा उपयोग करें। 29, 30 और 1 तारीख की दोपहर तक का समय जागरूक और सचेत रहने का है। कोई भी कार्य बगैर सोचे समझे ना करें। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन गायत्री मंत्र का जाप करें। सप्ताह का शुभ दिन शुक्रवार है।

कुंभ राशि

अधिकारियों एवं कर्मचारियों के लिए सप्ताह अच्छा रहेगा। उनके कामों के प्रशंसा होगी। आपको अपने संतान से भी अच्छा सहयोग प्राप्त होगा। छात्र पढ़ाई में सफल रहेंगे। इस सप्ताह आपको अपने शत्रुओं से सावधान रहना चाहिए। धन आने की उम्मीद की जा सकती है। आपके या आपके जीवनसाथी के स्वास्थ्य में थोड़ी समस्या हो सकती है। इस सप्ताह आपके लिए चार और पांच तारीख आपके लिए विभिन्न प्रकार से प्रभावशाली है। अच्छे कामों में इन तारीखों का उपयोग करें। 1 तारीख के दोपहर से लेकर दो और तीन तारीख को आपको सावधान रहना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन भगवान शिव दूध और जल से अभिषेक करें। सप्ताह का शुभ दिन शनिवार है।

मीन राशि

इस सप्ताह आपके प्रतिष्ठा में वृद्धि हो सकती है। छात्रों की पढ़ाई ठीक चलेगी। आपको अपने संतान से मदद प्राप्त हो सकती है। भाग्य भी आपका साथ दे सकता है परंतु कर्म पर ज्यादा विश्वास करें। भाई बहनों के साथ संबंधों में तनाव आ सकता है। कर्मचारी एवं अधिकारियों के लिए सप्ताह ठीक रहेगा। उनके कामों को प्रशंसा मिल सकती है। इस सप्ताह आपके लिए 29, 30 और 1 तारीख की दोपहर तक का समय परिणाम दायक है। चार और पांच तारीख को आपको सावधान रहकर अपने कार्यों को निपटाना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन गणेश अथर्वशीर्ष का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन मंगलवार है।

ध्यान दें कि यह सामान्य भविष्यवाणी है। अगर आप व्यक्तिगत और सटीक भविष्वाणी जानना चाहते हैं तो आपको मुझसे दूरभाष पर या व्यक्तिगत रूप से संपर्क कर अपनी कुंडली का विश्लेषण करवाना चाहिए। मां शारदा से प्रार्थना है या आप सदैव स्वस्थ सुखी और संपन्न रहें।

 

जय मां शारदा।

 राशि चिन्ह साभार – List Of Zodiac Signs In Marathi | बारा राशी नावे व चिन्हे (lovequotesking.com)

निवेदक:-

ज्योतिषाचार्य पं अनिल कुमार पाण्डेय

(प्रश्न कुंडली विशेषज्ञ और वास्तु शास्त्री)

सेवानिवृत्त मुख्य अभियंता, मध्यप्रदेश विद्युत् मंडल 

संपर्क – साकेत धाम कॉलोनी, मकरोनिया, सागर- 470004 मध्यप्रदेश 

मो – 8959594400

ईमेल – 

यूट्यूब चैनल >> आसरा ज्योतिष 

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – इंद्रधनुष्य ☆ मनाचे श्लोक – एक सार्वकालिक ‘मनोपनिषद’… – श्लोक श्लोक ६५ आणि ६६ ☆ श्री विश्वास देशपांडे ☆

श्री विश्वास देशपांडे

? इंद्रधनुष्य ?

☆ मनाचे श्लोक – एक सार्वकालिक ‘मनोपनिषद’… – श्लोक ६५ आणि ६६ ☆ श्री विश्वास देशपांडे ☆

श्लोक क्र. ६५ – – 

नको दैन्यवाणे जिणे भक्तिऊणे ।

अती मूर्ख त्या सर्वदा दुःख दूणे ।

धरी रे मना आदरे प्रीती रामी । 

नको वासना हेमधामी विरामी ।६५।

अर्थ :: भक्तीविना जीवन म्हणजे दीनवाणे जगणे. ज्या मुर्खांना हे कळत नाही, त्यांचे दुःख वाढतच जाते. म्हणून हे मना, आदरपूर्वक रामावर प्रेम करायला शीक. सोन्याचे घर जरी असले पण त्यात रामाचा निवास नसला तर त्याची कामना काही उपयोगाची नाही.

(भक्तिऊणे – भक्तीशिवाय, जिणे – जगणे, दूणे – दुप्पट, हेमधामी – सोन्याचे घर, विरामी – ज्यात राम नाही असे)

विवेचन :: आधीच्या श्लोकात समर्थांनी अति काम किंवा अति लोभामुळे काय होते ते सांगितले. या श्लोकामध्ये ते आपल्याला भक्ती विना जीवन म्हणजे काय हे सांगत आहेत. ज्याप्रमाणे अति काम आणि क्रोध यांच्यामुळे व्यक्तीचे जगणे लाचारीचे होते, त्याप्रमाणेच भक्तीशिवाय जीवन म्हणजे दैन्यवाणे जगणे. भक्ती म्हणजे शक्ती! ती दिसत नाही पण जो ती मनापासून करतो, त्याला ती जाणवते. सुदामा हा श्रीकृष्णाचा मित्र जरी असला तरी प्रामुख्याने तो त्याचा भक्त होता. जवळ पैसा, वैभव नव्हते पण भक्तीचे तेज होते, शक्ती होती. अनेक संतांना विपरीत परिस्थितीत दिवस कंठावे लागले. त्यांच्याजवळ सत्ता, संपत्ती, वैभव यांचा अभाव होता. पण भक्तीची दौलत अपार होती. या भक्तीचे तेज त्यांच्या मुखावर विलसत होते. कोणत्याही परिस्थितीत आनंदी आणि समाधानी राहण्याची त्यांची वृत्ती होती.

पण ज्यांची भगवंतावर श्रद्धा नाही, असे लोक भक्तीविना जगतात. अशा लोकांचा कोणीही सहज बुद्धिभेद करू शकतो. देव कुठे आहे? उगाचच त्यावर श्रद्धा ठेवून कशाला जगायचे? जीवन आहे तोपर्यंत मौजमजा करून घ्या. असे सांगणारे लोक भेटतात. आपल्याला अशा गोष्टी लवकर पटतात. त्यामुळे भगवंतावरील श्रद्धा विसर्जित करून आपण ऐहिक जीवनाचा आनंद घेण्याचा प्रयत्न करतो. पण ऐहिक जीवनात जेव्हा पदोपदी अपयशाचे, अपमानाचे प्रसंग येतात, संकटे येतात तेव्हा माणूस खचतो. कारण कुठेही श्रद्धा नसते. कुठलाही आधार नसतो. ‘ Faith can move mountains ‘ अशी एक इंग्रजी म्हण आहे. श्रद्धेचे सामर्थ्य अपार असते. श्रद्धा तारक आहे. प्रल्हादाची भगवंतावर श्रद्धा होती. या श्रद्धेनेच त्याला सर्व प्रसंगातून तारून नेले. परंतु श्रद्धाहीन माणसाच्या जीवनात दुःखाचा गुणाकार होतो. म्हणूनच समर्थ तळमळीने आपल्याला आदरपूर्वक रामावर श्रद्धा ठेवायला, प्रेम करायला सांगतात.

हेमधामी आणि विरामी ही दोन विशेषणे समर्थांनी फार सुंदर योजली आहेत. हेमधामी म्हणजे सोन्याचं घर, राजवाडा. विरामी म्हणजे रामाशिवाय. हल्ली काही घरांमध्ये ‘ हे घर श्री महाराजांचे आहे ‘ अशी पाटी लावलेली आढळते. म्हणजे राहणाऱ्यांची अशी श्रद्धा असते की या घरात महाराज किंवा भगवंत राहतो. हे त्याच्याच मालकीचे आहे. म्हणजे भगवंताच्या छत्रछायेत आपण राहत असतो. आणि इथे भगवंत आहे ही भावनाच किती सुंदर! असे घर म्हणजे मंदिरच! हीच कल्पना थोडी आणखी विस्तारली तर आपला देह म्हणजे सुद्धा भगवंताचे निवासस्थान असेही आपल्याला म्हणता येते. त्याच्या श्रद्धेविना असलेला देह म्हणजे फक्त हाडामांसाचे शरीर!

घर सोन्याचे असले तरी घरात राहणाऱ्यांची जर भगवंतावर श्रद्धा नसेल, तर असे घर म्हणजे चार भिंतींचा एक तुरुंग! सोन्याचे घर म्हणजे राजवाडा, वैभव! पण जिथे राम नाही त्या घराची किंमत शून्य. ज्या दगडांवर रामनाम लिहिले जाते, ते दगड सुद्धा तरतात. रामावर म्हणजे भगवंतावर श्रद्धा नसलेली व्यक्ती म्हणजे मूढ पाषाणच! या संसार सागरात ती बुडणारच हे ठरलेले आहे! महाभारत युद्धाच्या प्रसंगी अर्जुन आणि दुर्योधन श्रीकृष्णाकडे मदत मागण्यासाठी जातात. भगवंत म्हणतात, ” एका बाजूला निःशस्त्र असलेला मी आहे आणि दुसऱ्या बाजूला माझी नारायणी सेना. त्यातून ज्याला जे हवे ते त्याने मागून घ्यावे. ” या प्रसंगी दुर्योधन नारायणी सेना मागून घेतो आणि अर्जुन भगवंताला. ही कथा आपल्या सगळ्यांना माहिती आहे. पण अर्जुनाची भगवंतावर दृढ श्रद्धा होती. म्हणून मला भगवंतच हवा असे त्याला ज्या तीव्रतेने वाटले तसे दुर्योधनास वाटणे शक्यच नव्हते. नारायणाशिवाय नारायणी सेना काय कामाची? म्हणून अर्जुनाला जसे तीव्रतेने वाटले की मला भगवंतच हवा तसे आपल्यालाही वाटले पाहिजे. तेव्हा हे मना, आदरपूर्वक रामरायावर प्रेम करायला शीक हेच समर्थांचे सांगणे आहे.

स्वसंवाद :: 

१) माझ्या जीवनात श्रद्धेचा आधार किती आहे? संकटाच्या वेळी मी खचतो की स्थिर राहतो?

२) मी ‘नारायणी सेना’ (संपत्ती, साधने) निवडतो की ‘नारायणाची ‘ निवड करतो?

३) माझे घर ‘हेमधामी’ आहे की ‘रामधामी’?

४) माझ्या आनंदाचा स्रोत बाह्य गोष्टींमध्ये आहे की अंतर्मनातील भक्तीत?

– – – – 

श्लोक क्र. ६६ – – 

नव्हे सार संसार हा घोर आहे ।

मना सज्जना सत्य शोधूनि पाहे ।

जनीं वीष खाता पुढे सूख कैचें?

करी रे मना ध्यान या राघवाचे ।६६।

अर्थ :: हे मना, हा संसार अनित्य आणि असार आहे. घोर म्हणजे भयंकर आहे. तूच याचा जरा विचार करून सत्य शोधून काढ. एखाद्याने विष भक्षण केले तर ते वाईट परिणाम केल्यावाचून कसे राहील? तेव्हा तू भगवंताची भक्ती कर.

विवेचन :: 

या श्लोकामध्ये संसाराचा फोलपणा समर्थ आपल्याला पटवून देत आहेत. हा संसार असार आहे. विनाशी आहे. संसारात सुखी झाला आणि सुखदुःखे भोगावी लागली नाही असा मनुष्य आढळणे कठीण! त्यातून संसार घोर म्हणजे भयंकर आहे. संत या सगळ्यातून गेले आहेत. संत तुकारामांना भयंकर असा दुष्काळाचा सामना करावा लागला. त्यात मुलेबाळे, पत्नी यांची आहुती गेली. पण संसाराचा फोलपणा त्यांच्या लक्षात आला होता. त्यामुळेच त्यातून बाहेर काढणारी एकच गोष्ट त्यांना माहित होती. ती सारभूत गोष्ट म्हणजे विठ्ठल. त्याचाच ध्यास त्यांनी घेतला होता. सर्वच संतांनी संसाराचा हा फोलपणा लक्षात घेऊन जनसामान्यांना ईश्वरभक्तीचा उपदेश केला. आम्हाला संतांचे सांगणे समजत नाही असे नाही. पण त्यातील फोलपणा ध्यानी घेऊनही आम्ही या विषाचा अनुभव घ्यायला तयारच असतो. विष खाल्ले की ते त्याचे परिणाम दाखवणारच! विष खाल्ले आणि चांगला अनुभव आला असे कधी होऊच शकत नाही. ते त्याचा प्रभाव दाखवणारच. इथे विष म्हणजे विषयासक्ती असाही अर्थ घेता येईल.

म्हणून समर्थ या श्लोकात म्हणतात, ” हे मना, दुसऱ्यांचे सांगणे तुला पटत नसेल तर तू स्वतः अनुभव घेऊन बघ. तू स्वतः त्यातील सत्य शोधून काढ. कधी कधी माणसे दुसऱ्याच्या अनुभवाने शहाणे होत नाहीत. म्हणून स्वतःला जो अनुभव येतो, त्यावर सारासार विचार करून त्यातून तरी योग्य निष्कर्ष आपल्याला काढता आला पाहिजे. समर्थ आपल्याला संसाराचा त्याग करा असं सांगत नाहीत तर त्यातील फोलपणा ध्यानी घेऊन त्यातील आसक्ती कमी करा असेच त्यांचे सांगणे आहे. संसाराकडे साक्षीभावाने आपल्याला पाहता आले पाहिजे. पाण्यात आणि चिखलात राहूनही जसे कमळ त्यापासून अलिप्त असते तसेच आसक्तिरहित आपल्याला संसारात राहता आले पाहिजे.

एकदा सत्य लक्षात आल्यानंतर मग त्यातून बाहेर पडण्याचा उपाय करता येतो. संसार करताना आपल्या लक्षात येतं की आपल्याला समजायला लागल्यापासून आपण या प्रपंचात किती गुंतत चाललो आहोत. सगळ्यांची मने सांभाळताना आपली किती ओढाताण होते आहे! किती दिवस ही लटकी नाती जपायची? कोणाकोणाचा अहंकार जपायचा? पैसा कमवायचा तरी किती? किती पैसा मिळवला म्हणजे तो पुरे झाला असे होते? ही संपत्ती, हे घरदार मी कोणासाठी कमावतो आहे? हे सगळे तर इथेच ठेऊन जावे लागणार आहे. आपल्यापुढे दोनच पर्याय असतात. एकतर ठेऊन जा, नाहीतर देऊन जा. बरोबर घेऊन जाण्याचा पर्याय आपल्याला परमेश्वराने दिलेला नाही. बरं, ज्यांच्यासाठी हे सर्व करावं, ती पोरंबाळं तरी नंतर आपल्याला विचारतील याची काय खात्री आहे? गेल्यानंतर काही दिवस आपली तसबीर भिंतीवर लागेल. तिची पूजा होईल. काही दिवसांनी तीही निघून जाईल. हे जगच अनित्य आणि मर्त्य आहे. आधीच्या श्लोकांत समर्थांनी सांगितल्यानुसार ‘ मरे एक त्याचा दुजा शोक वाहे, अकस्मात तोही पुढे जात आहे. ‘ अशी परिस्थिती असते. तरी आपल्याला केवढा गर्व असतो, आपल्या पैशाचा, रूपाचा, सत्तेचा!

हा सगळा विचार कदाचित कोणाला निराशावादी वाटण्याची शक्यता आहे. पण वस्तुस्थितीकडे डोळेझाक केली तरी वस्तुस्थिती थोडीच बदलते! उलट वस्तुस्थिती समजली तर त्यातून बाहेर पडण्याचा उपाय करता येतो. यावर एकच उपाय आहे. असार संसाराला बाजूला सारून जे सार म्हणजे रामनाम आहे, तेच जीवी धरावे. धान्य पाखडण्याचे सूप आपल्याला माहिती असेल. धान्य पाखडताना ते त्यातील असार म्हणजे खडे, केरकचरा आदी बाहेर टाकून देते. आणि सार म्हणजे जे धान्य आहे ते धरून ठेवते. आपणही सुपाची भूमिका करावी. असार सर्व सोडून द्यावे आणि सार म्हणजे भगवंत त्यालाच घट्ट धरून ठेवावे. रामरायाचे ध्यान सर्व सुख देणारे आहे. ते ‘ मंगल दर्शन पूर्णविराम ‘ असे आहे. ” म्हणून हे मना, या राघवाचे ध्यान कर “असे समर्थ तळमळीने आपल्याला सांगत आहेत.

स्वसंवाद :: 

१) मी संसार करताना त्यात अडकतो आहे का, की त्याकडे साक्षीभावाने पाहतो आहे?

२) “विष” म्हणून सांगितलेली विषयासक्ती माझ्या जीवनात कोणत्या रूपात आहे?

३) मी इतरांच्या अनुभवातून शिकतो का, की स्वतः धडपडूनच शिकतो?

४) माझ्या आयुष्यात “सार” आणि “असार” यातील फरक मला स्पष्टपणे कळतो का?

५) मी रोजच्या जीवनात भगवंताच्या स्मरणासाठी वेळ काढतो का, की तो पुढे ढकलतो?

– क्रमशः श्लोक श्लोक ६५ आणि ६६.

© श्री विश्वास देशपांडे

चाळीसगाव

प्रतिक्रियेसाठी ९४०३७४९९३२

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # १०६ – कथा कहानी – पारो दादी ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)

जीवन के कुछ अनमोल क्षण 

  1. तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से  ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित। 
  2. मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
  3. ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी  से भेंट करते हुए। 
  4. बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
  5. विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए। 

आप  डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपका विचारणीय कथा – पारो दादी)  

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # १०६ – कथा कहानी – पारो दादी ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ 

(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)

बरगद का वह बूढ़ा पेड़ गाँव के उस इकलौते सरकारी दफ्तर जैसा था, जिसकी जटाएँ ज़मीन छूने को बेताब थीं, पर फाइलें कभी आगे नहीं बढ़ती थीं। पारो दादी उसी पेड़ के चबूतरे पर जमी थीं। उनके माथे पर खिंची झुर्रियों का नक्शा भारत सरकार के किसी अधूरे हाइवे जैसा था, गड्ढे ही गड्ढे, पर टोल टैक्स हर सांस को चुकाना पड़ रहा था। उनके हाथ में थमी वह डायरी किसी परमाणु बम के रिमोट कंट्रोल की तरह रहस्यमयी लग रही थी, जिस पर गाँव भर की नजरें टिकी थीं।

गाँव के चौराहे पर बैठे ‘व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी’ के वीसी यानी रामखिलावन ने बीड़ी का कश खींचते हुए कहा, “अरे भाई, बूढ़ी इस उम्र में इतिहास लिख रही है या भूगोल? कहीं अपनी दो बीघा जमीन सरकार के ‘स्मार्ट सिटी’ प्रोजेक्ट के नाम तो नहीं कर रही?” हमारे देश में जब तक कोई मर न जाए, लोग उसके जीने की वजह ढूंढते रहते हैं। लोग तंज कस रहे थे, और दादी अपनी टूटी रीढ़ की हड्डी को सीधा करने की नाकाम कोशिश कर रही थीं।

उनका बेटा? अरे, वह तो देश की जीडीपी बढ़ा रहा था। बैंगलोर के किसी शीशे वाले कॉर्पोरेट पिंजरे में बैठकर ‘वर्क फ्रॉम होम’ करता था। विडंबना देखिए, जो बेटा अपनी कंपनी की वेबसाइट पर चौबीस घंटे ‘वी आर अवेलेबल फॉर यू’ का पॉप-अप लाइव रखता था, वह अपनी माँ की आखिरी सांसों के लिए हमेशा ‘नॉट रीचेबल’ रहता था। महीने की एक तारीख को उसके अकाउंट से दादी के खाते में जो ‘पेंशन रूपी खैरात’ गिरती थी, उसका मैसेज आते ही दादी का पुराना नोकिया फोन ऐसे थरथराता था मानो कह रहा हो, “लो, इस महीने भी बेटे ने अपनी जिम्मेदारी का कफ़न खरीद लिया।”

बगल में रखा मिट्टी का घड़ा किसी ईमानदार अफसर की कुर्सी की तरह खाली और सूखा था। चारों तरफ खिले वो रंग-बिरंगे फूल इस बात का तीखा उपहास उड़ा रहे थे कि बाहर चाहे कितनी भी बहार आ जाए, अगर अंदर का आंगन बंजर हो, तो हर रंग बेगाना लगता है। दीये की वह कांपती हुई लौ किसी मिडिल क्लास आदमी की बची हुई सेविंग्स जैसी थी, जो कभी भी बुझ सकती थी। दादी की कलम कागज़ पर ऐसे रेंग रही थी, मानो कोई अंधा आदमी अंधेरी रात में अपनी खोई हुई लाठी ढूंढ रहा हो। रहस्य का मीटर सौ की स्पीड पार कर चुका था। आखिर क्या था उस डायरी में? क्या वह कोई ऐसा सच उगलने वाली थीं जिससे बड़े-बड़े रसूखदारों के मुखौटे उतर जाएं?

तभी धूल के गुबार को चीरती हुई एक चमचमाती सफारी गाड़ी आकर रुकी। उसमें से एक युवा लड़का उतरा, जिसके गले में लाखों का कैमरा लटका था। वह ‘रूरल इंडिया’ की कंगाली बेचकर यूट्यूब पर व्यूज बटोरने वाला आधुनिक ‘डिजिटल भिखारी’ था। उसने रील्स बनाने के लिए दादी के करीब जाकर कैमरा ऑन किया और एकदम इमोशनल टोन में पूछा, “अरे दादी माँ! इस डिजिटल युग में यह कागज़-कलम? क्या आप समाज की इस बेरुखी पर कोई तीखा व्यंग्य लिख रही हैं? क्या आपका बेटा आपको प्रताड़ित करता है? बताइए दादी, आज आपका यह वीडियो ट्रेंडिंग में नंबर वन जाएगा!”

दादी ने अपनी पथराई आँखों से उस लड़के को देखा। उनकी आँखों में कोई आंसू नहीं था, बल्कि एक ऐसा सन्नाटा था जो कैमरे के लेंस को भी पिघला दे। उन्होंने अपनी डायरी बंद की, उसे लड़के की तरफ बढ़ाया, और उनके सिर से पल्लू ऐसे सरक गया जैसे किसी मंदिर का पर्दा अचानक हट गया हो। उसी पल दादी की गर्दन एक तरफ झुक गई। उनकी आत्मा उस कॉर्पोरेट दुनिया को लात मारकर इस शरीर से ‘अर्ली एग्जिट’ ले चुकी थी।

लड़के ने कांपते हाथों से कैमरे को ऑन रखते हुए डायरी का पहला पन्ना पलटा। उसे लगा कि अंदर ‘मदर्स डे’ पर कोई तगड़ी स्क्रिप्ट मिलेगी जिससे लाखों लाइक्स मिलेंगे। लेकिन पन्ने पर जो लिखा था, उसने उसके कैमरे का सारा ऑटो-फोकस बिगाड़ दिया।

पूरी डायरी के हर पन्ने पर, हर लाइन में, केवल एक ही वाक्य बार-बार लिखा हुआ था, “मेरे बेटे की कंपनी वाले उसे छुट्टी नहीं देते, वह बहुत बड़ा आदमी बन गया है। उसकी कोई गलती नहीं है। हे भगवान, इस डायरी को सरकारी रिकॉर्ड में मत डालना, वरना मेरे बेटे की नौकरी चली जाएगी।” और आज की तारीख वाले आखिरी पन्ने पर स्याही से कम, पानी से ज्यादा लिखा था—”आज मैंने अपनी आखिरी सांस भी उसके नाम ट्रांसफर कर दी है, अब वह चैन से मीटिंग कर सकेगा।”

लड़के का कैमरा उसके हाथ से छूटकर उसी धूल में गिर गया जहाँ दादी के नंगे पैर टिके थे। जो लड़का दुनिया को रोता हुआ दिखाकर अपनी दुकान चलाता था, आज उसकी अपनी आह भी हलक में फंस गई थी। पूरी प्रकृति इस आधुनिक विकास पर थू-थू कर रही थी। एक माँ ने मरते-मरते भी उस ‘सिस्टम’ और ‘बेटे’ का बीमा कर दिया था, जिसने उसे जीते जी एक लावारिस लाश बना दिया था। वाह रे आधुनिक समाज, और धन्य है वह माँ जो अपने हत्यारे को ही कफ़न का कपड़ा तोहफे में दे गई!

(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)

© डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

संपर्क : चरवाणीः +91 73 8657 8657, ई-मेल : drskm786@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिंदी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रेयस साहित्य # ५७ – लघुकथा – फरिश्ता ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆

श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्रेयस साहित्य # ५७ ☆

☆ लघुकथा ☆ ~ फरिश्ता ~ ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆ 

बेशर्म गर्मी को इतनी भी शर्म नहीं कि किसी की रोजी-रोटी और पेट पर लात मार न दे। रोड के किनारे पड़ी मौरंग की बोरियों को तीसरे माले तक ले जा रहे अचल का पसीना सिर से एड़ी की तरफ उतर रहा था। इतनी गर्मी में बेचारे अचल को लगातार चलना ही पड़ रहा था। और चले भी क्यों नहीं। घर के लिए तेल- नमक का जुगाड़ करने के साथ साथ, छोटे बेटे सोमेश के दवाई के लिए पैसे का इंतजाम करना उसकी मजबूरी थी।

आज अचल जब घर से चला, तो सोमेश ने धीरे से कहा था बाबूजी ! आज जल्दी घर आना। मुझे आज किसी डॉक्टर के पास जरूर ले चलो। सोमेश की ये बातें अचल के मजबूर कानों में बार-बार गूंज रही थी।

डॉ. प्रवीण अपने निर्माणाधीन कोठी को देखने के लिए आए हुए थे। सारे मिस्त्री मजदूर उनके पास जमा हो गए थे। शायद आज डॉ. प्रवीण में मजदूरों के लिए कोका कोला वाला कोल्ड ड्रिंक का इंतजाम करके लाए थे। इस प्रकार चिलचिलाती गर्मी में इस कोठी के मालिक ने अपने मजदूरों के लिए कुछ राहत का इंतजाम किया था।

सारे मजदूर ठंडी कोल्ड ड्रिंक का मजा ले रहे थे। ठीक उसी वक्त अचल धूप में किनारे खड़ा चंदन के फोन से अपने बेटे सोमेश से बातें कर रहा था। बात करते-करते वह रो पड़ा।

बेटा मैं अभी आता हूँ, मेरे लाल ! अब मत रोवो, मैं आ ही रहा हूँ।

ऐसा कहते हुए उसने छोटे वाले की पैड फोन को अचल को चंदन को पकड़ाते हुए कहा। भाई चंदन! मैं घर जा रहा हूँ। मेरे बेटे की तबीयत बहुत खराब है। अब मुझसे बर्दाश्त नहीं हो रहा है। तुम्हारे जेब में क्या दो – तीन सौ रूपये पड़े हैं। यदि पड़े हो तो भईया मुझे दे दो। मैं मेहनत मजदूरी करके मय ब्याज तुमको चुकता कर दूंगा। मुझे अपने भैया को डॉक्टर से दिखाना जरूरी है।

चंदन ने जब अपना जेब टटोला तो मुश्किल से उसकी जेब में डेढ -पौने दो सौ रुपए पड़े थे। उसने उन रूपयो को अचल को पकड़ाते हुए, कहां भाई यह पकड़ो, आज भईया को हर हाल में डॉक्टर के पास ले जाओ। अचल के चेहरे की रंगत बदल गयी, थोड़ी सी खुशी तो चेहरे पर झलक पड़ी थी।

उसने सुपरवाइजर राकेश से घर जाने के लिए छुट्टी मांगी। एकाएक एक कड़कती आवाज में सबका ध्यान उसकी तरफ खींच लिया।

कहाँ बे कहाँ जाएगा ?

तुम्हें कहीं नहीं जाना है, शाम को जाना है ?

मुझे इससे लेना देना नहीं कि तुम्हारा बेटा बीमार है या मर..%%

अचल को जैसे लकवा मार गया हो, वह भरभरा कर जमीन पर गिर पड़ा। सारे मजदूर उसकी तरफ दौड़े।

डॉ. प्रवीण दूर से इस पूरे घटनाक्रम को देख रहे थे। उन्होंने अचल और चंदन की बात को भी सुन लिया था। उन्हें इस बात का पता भी लग गया था कि सुपरवाइजर तेज आवाज में सिर्फ इसलिए बोल रहा है की मालिक डॉक्टर प्रवीण यह जान जाए कि वह अपने दायित्वों के प्रति कितना जागरुक है।

डॉ. प्रवीण अचल की ओर बढ़े। बड़े ही प्रेम से बिना इस बात की फिक्र किया कि उनके कपड़े गंदे हो जाएंगे, उन्होंने अचल को अपनी बाहों में उठा लिया और बोले चाचा! आप बिल्कुल परेशान न हो। आप मेरे साथ चलिए। मैं आपको आपके घर ले चलता हूँ। मैं आपके बच्चे को ले आऊंगा और आपके बच्चे का इलाज कोई दूसरा नहीं करेगा, मैं स्वयं करूंगा। रूपए पैसे की चिंता बिल्कुल छोड़िए और आपने ये जो थोड़े से पैसे उस लड़के से उधार लिए है उसे वापस कर दीजिए।

ऐसा कहते हुए डॉ.प्रवीण ने अचल को अपनी कार में बैठाया, और अचल के घर की तरफ चल दिए।

कुछ ही घंटे बाद अचल का बेटा सोमेश डॉ प्रवीण की क्लीनिक पहुंच चुका था। उसने दवा खा ली थी। उसका बुखार उतर गया था। ए सी की ठंडी ठंडी हवाएं, उसके बदन को राहत पहुंचा रही थी। अचल स्तब्ध होकर डॉ प्रवीण को निहार रहा था। वह उन्हें ऐसे देख रहा था कि मानो कोई फरिश्ता उसके सामने बैठा हो।

डॉ. प्रवीण भी सामने बैठे अचल को एकटक निहार रहे थे। वे अतीत के उन दिनों की यादों खो गए थे, जब बचपन में वे एक बार बहुत बीमार थे। उनका भी शरीर तेज ज्वर से जल रहा था। उस समय उनके पिताजी जो नोएडा के एक छोटे से कारखाने में बतौर मजदूर काम करते थे, वे भी अपने सुपरवाइजर के डांट की परवाह किए बगैर अपने प्रवीण के लिए दोपहर में काम छोड़कर वापस घर आ गए थे।

♥♥♥♥

© श्री राजेश कुमार सिंह “श्रेयस”

लखनऊ, उप्र, (भारत )

दिनांक : 26-06-2026

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – पग-पग नर्मदा यात्रा – भाग – ३८ ☆ श्री सुरेश पटवा ☆

श्री सुरेश पटवा

(श्री सुरेश पटवा जी  भारतीय स्टेट बैंक से  सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों  स्त्री-पुरुष “गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की  (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं  तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व  प्रतिसाद मिला है। अब आप प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकते हैं यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर)

? यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – पग-पग नर्मदा यात्रा – भाग- ३८ ☆ श्री सुरेश पटवा ?

7.पग-पग नर्मदा यात्रा

नर्मदा परिक्रमा:दूसरा चरण

झाँसी घाट से सतधारा घाट

नर्मदा अमरकण्टक से निकलकर डिंडोरी-मंडला से आगे बढ़कर पहाड़ों को छोड़ दो पर्वत ऋंखलाओं दक्षिण में सतपुड़ा और उत्तर में कैमोर से आते विंध्य के पहाड़ों के समानांतर दस से बीस किलोमीटर की औसत दूरी बनाकर अरब सागर की तरफ़ कहीं उछलती-कूदती, कहीं गांभीर्यता लिए हुए, कहीं पसर के और कहीं-कहीं सिकुड़ कर बहती है। उसके अलौकिक सौंदर्य और आँचल में स्निग्ध जीवन के स्पंदन की अनुभूति के लिए पैदल यात्रा पर निकलना भाग्यशाली को नसीब होता है। यह यात्रा कुछ समय के वानप्रस्थ प्रवास द्वारा सभ्रांत मोह से मुक्ति का अभ्यास भी है। जिस नश्वर संसार को एक दिन अचानक या रोगग्रस्त होकर छोड़ना है क्यों न उस मोह को धीरे-धीरे प्रकृति के बीच नर्मदा के तटों पर बिखरे अद्भुत प्राकृतिक सौंदर्य का अवलोकन करते हुए छोड़ना सीख लें।

पीछे टाँगने वाले हल्के बैग में एक जींस या पैंट के साथ फ़ुल बाहों की तीन शर्ट, एक शाल, तोलिया और अंडरवेयर, साबुन तेल रखकर, वैसे तो आश्रम और धर्मशालाओं में भोजन की व्यवस्था हो जाती है फिर भी रास्ते में ज़रूरत के लिए समुचित मात्रा में खजूर, भूनी मूँगफली, भुना चना और ड्राई फ़्रूट, पानी की बोतल और एक स्टील लोटा-गिलास के साथ एक छोटा चाक़ू भी रख समर में उतर पड़े। कहीं कुछ न मिले तो परिक्रमा वासियों का मूलमंत्र “करतल भिक्षु-तरुतल वास” आज़माना जीवन का एक विलक्षण अनुभव है।

हमारा नर्मदा परिक्रमा समूह एक अनौपचारिक समूह है जो नर्मदा परिक्रमा शुरू करने के आसपास मिलता है और बिखर जाता है। हम लोग समूह-गतिशीलता (Group Dynamic) के आधारभूत सिद्धांत पर अमल करते हुए स्वाभाविक रूप से एक दूसरे का ध्यान रखते हैं। समूह में सदस्यों की भूमिका सहज ही विकसित हो गई है कि कौन क्या करेगा जैसे निधि कोष बनाकर ख़र्च करने की ज़िम्मेदारी अरुण भाई की निर्धारित हो गई है, अविनाश भाई फ़ोटो खान-पींन, मुंशीलाल भाई जुगाड़ु कार्य अच्छी तरह कर लेते हैं। प्रयास भाई और मुंशीलाल भाई वरिष्ठ यात्री जगमोहन अग्रवाल का ध्यान रखते चलते हैं। जगमोहन भाई पूजा-पाठ करते हैं।

समूह-गतिशीलता (Group Dynamic) की मनोवैज्ञानिक अवधारणा आपसी व्यवहार और व्यवहार पैटर्न से संबंधित है। समूह की गतिशीलता चिंता करती है कि समूह कैसे बनते हैं, उनकी संरचना क्या है और उनके कामकाज में किन प्रक्रियाओं का पालन किया जाता है। इस प्रकार, यह समूहों के बीच संचालित होने वाली बातचीत और भूमिका से संबंधित है। एक समूह दो या दो से अधिक लोगों से मिलकर बनता है। जो सामान्य उद्देश्य अर्थात हमारे मामले में नर्मदा परिक्रमा साझा करते हैं और स्वयं का मूल्यांकन करते हैं और सामान्य लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए एक साथ आते हैं। दूसरे शब्दों में, एक समूह उन लोगों का इकट्ठा होना है जो एक दूसरे के साथ बातचीत करते हैं; अधिकारों और दायित्वों को सदस्यों के रूप में स्वीकार करके एक समान पहचान साझा करते हैं। समूह विकास चार चरणों की एक गतिशील प्रक्रिया है। समूह कैसे विकसित होते हैं? यह एक प्रक्रिया है जिसके माध्यम से समूह गुजरते हैं। प्रक्रिया में चार चरण शामिल हैं: गठन, तूफान, सामान्यीकरण, प्रदर्शन।

समूह के जीवन में पहला चरण एक समूह बनाने से संबंधित है। इस चरण में सदस्यों को या तो कार्य आवंटन या अन्य लाभ, जैसे स्थिति, संबद्धता, शक्ति, भूमिका आदि की तलाश होती है। इस स्तर पर सदस्य या तो किसी प्रकार की गतिविधि में संलग्न होते हैं या उदासीनता दिखाते हैं। कुछ सक्रिय, कुछ बहुत सक्रिय और कुछ उदासीन रहते हैं।

समूह में अगला चरण विगठन के लक्षण प्रदर्शित करना है। सदस्य आपस में परिचित या समान व्यक्तियों की तलाश करते हैं और स्वयं की गहन साझेदारी शुरू करके समूह के अंदर उपसमूह का निर्माण करते हैं। उपसमूह, समूह में एक भेदभाव पैदा करता है और तनाव दिखाई दे सकता है। पेयरिंग एक सामान्य घटना है। समूह को नियंत्रित करने के बारे में संघर्ष होगा।

हर समूह को परिपक्वता प्राप्त करने के लिए तूफ़ान से गुज़रना होता है। तूफ़ान के दौर में अक्सर सदस्य समूह से अलग होने की सोचने लगते हैं। समूह बिखराव का अंदेशा इसी समय अधिक होता है। हमारे समूह में भी तूफ़ान पैदा हुआ जब अरुण-अविनाश का उपसमूह अविनाश का उनके रिश्तेदार होने से बन गया, दूसरा उपसमूह जगमोहन-प्रयास का इसलिए बना कि प्रयास जगमोहन को बैग टाँगने और पैदल चलने में सहयोग कर उनके साथ चल रहे थे। समूह में हम और मुंशीलाल अकेले बचे लेकिन जब समूह में उपसमूह बनते हैं तब अकेले रह गए लोगों का स्वभाविक समूह बन जाता है। थकान और भूख की झुँझलाहट कई रूप में निकलती है। ऐसे में दो उपसमूह द्वारा मुंशीलाल पर आक्रामक होने लगे, अविनाश, प्रयास और जगमोहन कई बार उनसे तेज़ स्वर में पेश आने लगे। अविनाश भाई ने उन्हें चाय बनाने के लिए सामान निकालने में पोलीथीन की आवाज़ करने पर दो-तीन बार टोंका जबकि वे सबके लिए चाय बनाने की तैयारी कर रहे थे। प्रयास भाई ने फ़ोटो निकालते समय दो बार झिड़का। जगमोहन भाई ने समनापुर में भोजन के लिए बैठने को लेकर मुंशीलाल भाई को बुरी तरह डाँटा। तब हमने मुंशीलाल जी को शांत रहने का मशवरा दिया क्योंकि समूह बिखरने का अंदेशा उसी समय सबसे अधिक था। उपसमूह बनने पर सदस्य अपनी कुंठा अकेले पड़ गए सदस्य पर उतारने लगते हैं।

समूह के विकास का तीसरा चरण कार्य प्रदर्शन के बारे में अधिक गंभीर चिंता से चिह्नित होता है। अनौपचारिक समूह में नेतृत्व उभर कर समूह में अन्य सदस्यों को खोलना शुरू कर देते हैं। कार्य प्रदर्शन के लिए विभिन्न मानदंडों को स्थापित करने का प्रयास किया जाता है। सदस्य अपने स्वयं के समूह और संबंधों के लिए अधिक जिम्मेदारी लेना शुरू करते हैं, एक बार यह चरण पूरा हो जाने के बाद, नेतृत्व पदानुक्रम के बारे में एक स्पष्ट तस्वीर सामने आएगी। समूह संरचना के ठोसकरण और समूह की पहचान और दूरदर्शिता की भावना के साथ होती है।

प्रदर्शन पूरी तरह कार्यात्मक समूह का एक चरण है जहां सदस्य खुद को एक समूह के रूप में देखते हैं और कार्य में शामिल होते हैं। प्रत्येक व्यक्ति योगदान देता है, समूह की प्रक्रिया सुनिश्चित करने के लिए समूह के मानदंडों का पालन किया जाता है और सामूहिक दबाव डाला जाता है। अब समूह में एक दूसरे की भावनाओं का आदर करते हुए दूसरों के साथ वह व्यवहार न करें जैसा आप अपने लिए पसंद नहीं करते, सिद्धांत का पालन होने लगता है। समूह अपने लक्ष्यों को पुनर्परिभाषित कर सकता है बाहरी वातावरण से जानकारी के प्रकाश में और उन लक्ष्यों को आगे बढ़ाने के लिए एक स्वायत्त इच्छाशक्ति दिखाएगा तब ही समूह की दीर्घकालिक व्यवहार्यता स्थापित और पोषित हो सकती है। समूह के सदस्यों की जानकारी बहुत काम की होती है।

अनौपचारिक समूह हमेशा विजातीय (heterogeneous) ही होते हैं। अमेरिका में  Deniel Goleman के Emotional Intelligence सिद्धांत प्रतिपादन उपरांत “व्यवहार-विज्ञान” से समूह गतिशीलता पर अनेकों खोज, सर्वे और अनुसंधान हुए तदानुसार मुख्यतः चार प्रकार के व्यवहार पहचाने गए।

मौलिक व्यवहार (Natural Behaviour)

अंगिकृत व्यवहार (Adopted Behaviour)

पारदर्शी व्यवहार (Transparent Behaviour)

नकारात्मक व्यवहार (Negative Behaviour)

दिल में अंदर कुछ है लेकिन कुछ और प्रदर्शित किया जा रहा है। एक ग़ज़ल के मुखड़े से इसे समझ सकते हैं।

तुम इतना जो मुस्कुरा रहे हो

क्या ग़म है जिसको छुपा रहे हो।

*

ओंठों पे हँसी आँखों में नमी

क्या हाल है क्या दिखा रहे हो।

यह अंगिकृत व्यवहार है, जिसे हम से हर कोई बैंक या आफिस पहुँचते ही ओढ़ लेते हैं। अकसर लोग अंगिकृत व्यवहार के आदी हो जाते हैं, सेवनिवृत्ति के बाद भी अपने स्वभाविक व्यवहार में नहीं आते। स्वभाविक व्यवहार में आने के लिए दोस्तों की खुली महफ़िल दरकार होती है और जब उसमें गांधी-सावरकर जैसे विवाद बीच में आ जाते हैं तब दोनों तरफ़ से नकारात्मक व्यवहार शुरू होता है, एक चुप नकारात्मकता के साथ बातचीत स्थगित हो जाती है। जगमोहन भाई और अरुण भाई के व्यवहार  पारदर्शी स्वभाव के उदाहरण हैं, जो दिमाग़ में होता है वह सहजता से प्रदर्शित करते हैं। इससे बचना समूह के अच्छे परिचालन के पक्ष में होशियारी होगी। दो यात्राओं में सदस्यों के आधारभूत व्यक्तित्व ज्ञात हो गए हैं अब समूह मज़बूती ग्रहण करेगा। इसकी क्या गारंटी है कि किसी सदस्य की जगह कोई नया आएगा वह इनसे अच्छा होगा। समूह में अच्छा या बुरा होता भी नहीं है। हर व्यक्ति कुछ विलक्षणता और कुछ ख़ामियाँ जन्मजात लिए होता है, पाँच साल की उम्र तक इदम (Id) में और 18 साल की उम्र तक अहम (Ego) में विकसित होते हैं, जिन्हें बाद में बदला नहीं जा सकता है। अतः मनुष्य जैसा है वैसा ही स्वीकार्य करने से समूह गतिशीलता (Group Dynamic) ठीक तरह काम करती है।

हम सभी परिक्रमा वासियों में जगमोहन अग्रवाल सबसे वरिष्ठ हैं, लेकिन वे सबसे ज़्यादा मज़बूती और जूझारूपन से यात्रा में भाग लेते हैं। उनके पैरों में तकलीफ़ है इसलिए घुटने ज़मीन पर टेककर पंद्रह किलो का भार सहित खड़े हो पाते हैं। अन्य शारीरिक दिक़्क़तों के बावजूद वे निरंतर यात्रा करते रहे। उन्होंने कभी भी नहीं कहा कि वे परेशानी में हैं, नर्मदा जी में उनकी आस्था प्रबल है। नरसिंहपुर जिले की गाड़रवाडा तहसील के कौंडिया ग्राम के मूल निवासी हैं। जहाँ कभी कौंड़िल्य ऋषि का आश्रम हुआ करता था। जीवंतता, जीवटता और जूझारूपन उनकी सबसे बड़ी पूँजी है। जगनमोहन जी ट्रेकिंग के बहुत ही शौकीन रहे हैं। बैंक नौकरी में भी यूथ क्लब की ओर से अकसर जाते रहते थे।

अरुण दनायक के पिताजी का नाम रेवाशंकर है, वे पुत्री रेवा और पिता शंकर दोनों का आशीर्वाद  लेकर चलते हैं। उनके पिताजी रेल्वे में अधिकारी थे। उनकी माताजी 1930-40 के दशक की सुशिक्षित महिला थीं, वे गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टेगोर और महात्मा गांधी  के विचारों से प्रभावित होकर स्त्री शिक्षा और कलात्मक अभिरुचि की गतिविधियों से जीवन भर जुड़ी रहीं। वे रोज़ मोतीदाना अक्षरों में डायरी लिखती थीं। इन्होंने वे डायरियाँ संभाल कर रखीं हैं जिनमे तीस से साठ के दशक का इतिहास और मुख्य-मुख्य घटनाओं का विवरण मिलता है। अरुण दनायक को लेखन के संस्कार माताजी से मिले हैं। वे गांधी जी  से भावनात्मक स्तर पर गहराई से प्रभावित है। किसी काम को सौम्यता से पूरा करने की ज़िद उन्हें अच्छा परिक्रमा वासी बनाती है।

अविनाश दवे सेंट्रल बैंक  से सेवानिवृत्त हैं, जबलपुर सेवानिवृत्त संघ की गतिविधियों से जुड़े हैं। अविनाश स्वादिष्ट भोजन प्रेमी हैं। यह गुण उन्हें उनके माता व पिता से विरासत में मिला है। अविनाश के बैग का एक खंड खाद्य सामग्री से भरा है। उसके पास चाय काफी से लेकर पोहा, नमकीन, अचार, मैगी मसाला लड्डू सब मिल जायेगा। अविनाश शौक़ीन फ़ोटोग्राफ़र हैं उनके केमरा से उतारीं गईं फ़ोटो की गुणवत्ता कलात्मक होती है। 

मुंशीलाल पाटकर पेशे से वक़ील हैं लेकिन मिज़ाज  से यायावर प्रकृति के हैं, हर दो-तीन महीनों में पर्यटन पर निकल जाते हैं। वे बहुमुखी जुगाड़ प्रतिभा के धनी हैं, बीच जंगल में चाय की जुगाड़ जैसी कई जुगाड़  से वाक़िफ़ हैं। समूह के ये त्यागी पुरुष पूरी यात्रा में गरम कपड़े दरी टोपा मोज़े सब दान करते आए। ख़ाली बैग में करेली से एक-एक किलो गुड़ और तुअर दाल भर लाए।

प्रयास जोशी एक संवेदनशील कवि और कला जगत से जुड़ाव रखने वाले दार्शनिक क़िस्म के शांत इंसान हैं। कार्तिक पूर्णिमा की खिली चाँदनी में गराऊ घाट पर उनकी रचनाओं का रसपान किया। वे ट्रैकर हैं, यूथ होस्टल की गतिविधियों से जुड़े हैं।       

नर्मदा परिक्रमा दुनिया की सबसे कठिन यात्राओं में से दुरुह यात्रा है। हिंदू हज़ारों सालों से इस यात्रा को करते आ रहे हैं। इस यात्रा के सामने डिस्कवरी चैनल की नक़ली साहसिक यात्राएँ कहीं नहीं लगतीं क्योंकि उनमें ड्रोन केमरा, सैटलायट इमेज, फ़ोटो ग्राफ़र दल और सपोर्ट के रूप में मेडिकल टीम साथ चलते हैं, उनके पास बेहतरीन जीवन रक्षक दवाएँ और आकस्मिक जोखिम से निपटने के अस्त्र होते हैं। नर्मदा यात्रा का कोई तैयार रास्ता नहीं होता क्योंकि प्रत्येक वर्ष नर्मदा के भीषण प्रवाह में सारे किनारे कट कर रास्तों को धो डालते हैं। नर्मदा तेज़ बहाव से कहीं किनारों को तोड़ डालती है, कहीं कँपा छोड़ जाती है, कहीं किसान कछारी खेतों को बखर कर पैदल चलना दूभर कर देते हैं, कहीं स्प्रिंकलर की सिंचाई के कारण कीचड़ से सने खेतों में क़दम रखने से ऐडी तक पैर गंपते हैं, कहीं नुकीली धारदार पहाड़ी पर चलना ठीक वैसा ही है जैसे खड़ी दीवार पर छिपकली जैसे पैर जमाकर खिसकना, कहीं पहाड़ी नालों की गहराई को फिसल कर पार करना। परिक्रमा पथ पर पड़ने वाले स्थानों की दूरी का किताबों में लिखी दूरियों से कोई मेल नहीं हैं। इसका कारण यह है कि इनको नाप कर नहीं अपितु अन्दाज़ से कोस, मील या किलोमीटर में बताया गया है जो कि भ्रामक है। वे किलोमीटर मील भी हो सकते हैं या कोस भी हो सकते हैं। हम आई-फ़ोन से नाप कर सही दूरियाँ लिखते गए हैं। भोजन और ठहरने की व्यवस्था का कोई ठिकाना नहीं, ऐसी विषम परिस्थितियों में नौ दिनों में 104 किलोमीटर की पदयात्रा शरीर को मरोड़ कर और मन के सारे अहंकार तोड़ कर रख देती है। इसके सामने यूथ होस्टल की ट्रैकिंग बच्चों का मन बहलाव है। इस 9 दिवसीय कमरतोड़ 163571 क़दम की यात्रा के दौरान जिन आश्रमों और उनके स्वामियों संचालकों ने आश्रय और भोजन दिया वे साधुवाद के पात्र हैं।

क्रमशः…

© श्री सुरेश पटवा 

भोपाल, मध्य प्रदेश

संस्थापक सम्पादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कविता # ३६ – कविता – पिता… ☆ प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर ☆

डॉ.राजेश ठाकुर

( प्रो डॉ राजेश ठाकुर जी का  मंतव्य उनके ही शब्दों में –पाखण्ड, अंध विश्वास, कुरीति, विद्रूपता, विसंगति, विडंबना, अराजकता, भ्रष्टाचार के खिलाफ़ जन-समुदाय को जागृत करना ही मेरी लेखनी का मूल प्रयोजन है…l” अब आप प्रत्येक शनिवार डॉ राजेश ठाकुर जी की रचनाएँ आत्मसात कर सकते हैं. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण रचना “पिता“.)  

? साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कविता # ३६ ?

? कविता – पिता… ☆ प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर  ? ?

?

= 1 =

संतान के स्वप्नों का

संवाहक पिता।

परिवार की ख़ुशियों का

गुण-ग्राहक पिता।।

= 2 =

घर के विधि-विधान का

विधायक पिता।

कुटुम्ब की समृद्धि का

प्रस्तावक पिता।।

= 3 =

औलाद बे-उसूल तो

आक्रामक पिता।

धन-संसाधन जुटाए

सुख-दायक पिता।।

= 4 =

तात जनक बाप पापा

नायक पिता।

पालक वालिद परम

अभिभावक पिता।।

= 5 =

सिखाये आचरण-नियम

नियामक पिता।

आशीर्वाद-स्नेह का

परिचायक पिता।।

= 6 =

शुभकामनाएँ लाये सदा

लायक पिता।

करे जीवन लय-तालबद्ध

गायक पिता।।

= 7 =

सुखद स्वर्णिम बचपन

स्मारक पिता।

हर ज़ख़्म घाव दर्द का

निवारक पिता।।

= 8 =

कभी शीतल हिम तो कभी

पावक पिता।

हमारे यश-गौरव का

प्रचारक पिता।।

= 9 =

संतति के प्रारब्ध का

उन्नायक पिता।

पुत्र-पुत्री के भविष्य का,

उद्धारक पिता।।

= 10 =

संस्कार-कर्म प्रति सजग

विचारक पिता।

‘ राजेश ‘ प्रथम पूज्य है

विनायक पिता।।

© प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर

शासकीय कॉलेज़ केवलारी

संपर्क — ग्राम -धतूरा, पोस्ट – जामगाँव, तहसील -नैनपुर, जिला -मण्डला (म.प्र.) मोबा. 9424316071

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सविता साहित्य # ८ – !!वक्त!! ☆ सुश्री सविता खण्डेलवाल “भानु” ☆

सुश्री सविता खण्डेलवाल ‘भानु’

(लेखन-प्रकाशन – गत 2022 से छंद लेखन, एकल प्रकाशन– कलम के नवांकुर, अनुग्रह नवप्रस्तारित छंद पर लेखन (मैजिक बुक ऑफ रिकॉर्ड), साझा संकलन – तकरीबन 10, द्वादश ज्योतिर्लिंग (लंदन बुक आफ रिकार्ड), अनेकता में एकता (एशिया बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड), छंदावली – (मैजिक बुक ऑफ रिकॉर्ड), महाकाल साहित्य सम्मान से सम्मानित। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता !!वक्त!!)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सविता साहित्य # ८ ☆

☆ !! वक्त !! ☆ सुश्री सविता खण्डेलवाल “भानु” ☆

सृष्टि आरंभ से जो चला आ रहा, वो चला जा रहा नित्य ही साथ में।

 बिन रुके बिन झुके बिन थके वो चले, बैठता भी नहीं वो कहीं पाथ में।

 आदि में अंत में हर्ष में दर्द में, वो अकेला रहे सर्वदा साथ में।

वक्त होता सभी के सदा संग में, एक साथी नहीं वक्त के हाथ में।।

*

नित्य संसार को वो निहारा करे, रोकता भी नहीं टोकता भी नहीं।

प्रेम को दर्द को राग को द्वेष को, जानता है मगर बोलता भी नहीं।

लोग बोले भला या बुरा बोल दे, ले तराजू कभी तोलता भी नहीं।

भोर में रात में धूप में छांँव में, कर्म को टाल दे सोचता भी नहीं।।

*

बांधता वक्त सारे युगों को सदा, वक्त को बांध दे डोर ऐसी कहाँ।

 राम भी कृष्ण भी वक्त को मान दें, जन्म ले वक्त से देख छोड़ें जहाँ।

 वो बिना भेद के नित्य ही बाँटता, ज्ञान भी एक जैसा सभी को यहाँ।

 कर्म को धर्म मानो चलो धर्म से, दंड भी मोक्ष भी ईश देते वहाँ।।

© सुश्री सविता खण्डेलवाल “भानु”

झालरापाटन राजस्थान

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ “श्री हंस” साहित्य # २०९ ☆ गीत – ।। कोई हम में रहता तो कोई अहम में रहता है ।। ☆ श्री एस के कपूर “श्री हंस” ☆

श्री एस के कपूर “श्री हंस”

 

☆ “श्री हंस” साहित्य # २०९ ☆

☆ गीत ।। कोई हम में रहता तो कोई अहम में रहता है ।। ☆ श्री एस के कपूर “श्री हंस” ☆

कोई हम में रहता है तो कोई अहम में रहता है।

कोई मैं ही मैं में रहता कोई बस वहम में रहता है।।

***

अपनेपन का  अहसास ही ताकत की दवा देता है।

मत रहो सदा ही क्रोध में यह घृणा को हवा देता है।।

भटक जाता आदमी जब द्वेष ही कहन में रहता है।

कोई हम में रहता है तो कोई अहम में रहता है।।

***

खाक हो जाता बदन पर रंजिश खत्म नहीं होती है।

शत्रुता में कोई भी नीति  सफल  यत्न नहीं होती है।।

आगे बढ़ता नहीं जो अभिमान बोझ जहन में रहता है।

कोई हम में रहता है तो कोई अहम में रहता है।।

****

जो संबंध जोड़ता और निभाता वही सफल होता है।

जो स्पर्धा नहीं ईर्ष्या करता वह सफलता भी खोता है।।

दिल में घृणा आग तो मन मस्तिष्क भी दहन में रहता है।

कोई हम में रहता है तो कोई अहम में रहता है।।

© एस के कपूर “श्री हंस”

बरेली ईमेल – Skkapoor5067@ gmail.com, मोब  – 9897071046, 8218685464

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ काव्य धारा #२७२ ☆ कविता – सरदार वल्लभ भाई पटेल… ☆ स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ ☆

स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

(आज प्रस्तुत है गुरुवर स्व  प्रोफ. श्री चित्र भूषण श्रीवास्तव जी  द्वारा रचित – “कविता  – सरदार वल्लभ भाई पटेल…। हमारे प्रबुद्ध पाठकगण स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ जी  काव्य रचनाओं को प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकेंगे.।) 

☆ काव्य धारा # २७२

☆ सरदार वल्लभ भाई पटेल…  स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

हे देशभक्त, कर्तव्यनिष्ठ, दृढ़व्रती अनूठे सेनानी

वल्लभ भाई पटेल तुम थे एक सच्चे नेता पर दानी।

*

तब दूरदृष्टि शासन क्षमता हम सब में गर्व जगाती है

हर अग्नि परीक्षा के अवसर हमें पावन याद दिलाती है।।

*

तुमने थी निभाई प्रमुख भूमिका देश को एक बनाने में

बिखरे छोटे रजवाड़ों को भारत के साथ मिलाने में।।

*

नक्शे में भरने नया रंग एक अनुपम काम तुम्हारा है

इस कठिन काम हित सच मन से आभारी भारत सारा है।।

*

तुम आजादी के बाद शीघ्र ही छोड़ हमें जो चले गए

कितने ही नए जंजालों में फंस हम औरों से छले गए।।

*

जो काम रह गया, तब तुमसे वह काम आज भी बाकी है

पाने को किनारा तैर रहे पर हार रही तैराकी है।।

*

दो अपनी सी दृढ़ता हमको हर उलझन को सुलझाने को

नई नई समस्याओं से लड़कर उन्हें सहज निपटाने को।।

*

तुम अडिग रहे, डरा न सका न कोई जीवन संग्राम तुम्हें

करते हैं हे सरदार सभी हम बारम्बार प्रणाम तुम्हें।।

© स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव विदग्ध

साभार – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

ए २३३ , ओल्ड मीनाल रेजीडेंसी  भोपाल ४६२०२३

मो. 9425484452

vivek1959@yahoo.co.in

≈  संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – इंद्रधनुष्य ☆ मनाचे श्लोक – एक सार्वकालिक ‘मनोपनिषद’… – श्लोक श्लोक ६३ आणि ६४ ☆ श्री विश्वास देशपांडे ☆

श्री विश्वास देशपांडे

? इंद्रधनुष्य ?

☆ मनाचे श्लोक – एक सार्वकालिक ‘मनोपनिषद’… – श्लोक ६३ आणि ६४ ☆ श्री विश्वास देशपांडे ☆

श्लोक क्र. ६३ – – 

घरी कामधेनू पुढे ताक मागे ।

हरीबोध सांडूनि वेवाद लागे ।

करी सार चिंतामणी काचखंडे ।

तया मागता देत आहे उदंडे । ६३ ।

अर्थ :: एखाद्याच्या घरी कामधेनू आहे. पण तो दुसऱ्याच्या घरी ताक मागू लागला तर ही हास्यास्पद गोष्ट ठरते. त्याप्रमाणे आपल्यापाशीच असणाऱ्या भगवंताकडे दुर्लक्ष करून एखादा व्यर्थ वाद घालू लागला तर त्याचे जीवन वाया जाते. एखाद्याच्या हातात चिंतामणी आहे, परंतु तो त्याच्याकडे केवळ काचेच्या तुकड्यांची मागणी करू लागला तर अशा माणसाचे वागणे हास्यास्पद आणि मूर्खपणाचे ठरते.

(हरीबोध – परमेश्वराचे ज्ञान, वेवाद – व्यर्थ /निष्फळ वाद, काचखंडे – काचेचे तुकडे)

विवेचन :: या आधीच्या श्लोकात समर्थांनी आपल्याला निजध्यास तुटला म्हणजे काय हे सांगितले. या श्लोकातही तोच मुद्दा पण वेगळ्या शब्दात ते आपल्याला समजावून सांगत आहेत. माणूस हा इतर प्राण्यांपेक्षा श्रेष्ठ आणि वेगळा ठरतो तो त्याला मिळालेल्या बुद्धीच्या वरदानामुळे. या बुद्धीचा वापर करून तो आत्मज्ञान करून घेऊ शकतो. नराचा नारायण होण्याची क्षमता त्याच्यामध्ये आहे. असे असताना कधी कधी तो अगदी हास्यास्पद वागतो. घरी कामधेनू आहे म्हणजे इच्छिलेले सर्व काही देणारी गोमाता आहे. पण याला त्याची जाणीवच नाही. हा दुसरीकडे ताक मागत फिरतो. इथे कामधेनू म्हणजे इच्छिलेले सर्व काही देणारा भगवंत. तो सदैव आपल्याजवळच असतो. पण याची जाणीव नसलेले अज्ञानी जीव मात्र त्याला शोधत इकडेतिकडे फिरतात. भोंदूबाबा, साधूंच्या नादी लागतात. भगवंत आपल्याजवळ आहे. त्याला शोधायला खरं तर कुठेच जायची गरज नाही. ‘ मंदिरात अंतरात तोच नांदताहे… ‘ पण ही गोष्ट आमच्या लक्षातच येत नाही. आम्हाला परमेश्वरासंबंधी जे काही ज्ञान झाले आहे, ते सोडून देऊन आम्ही व्यर्थ, कोरडे आणि निष्फळ वादविवाद करत बसतो.

समर्थ जसे कामधेनूचे उदाहरण देतात, तसेच ते चिंतामणी रत्नाचेही देतात. चिंतामणी हे एक दिव्य रत्न असून त्यामुळे जे हवे ते प्राप्त होते. परंतु काही मूर्ख माणसे मात्र अशा या दिव्य चिंतामणीच्या संपर्कात आले असताना देखील त्याच्याकडे काचेच्या तुकड्याची मागणी करतात. कामधेनू किंवा चिंतामणी ही रूपके समर्थांनी वापरली आहेत. परमेश्वर म्हणजे प्रत्यक्ष कामधेनू किंवा चिंतामणी! इच्छिलेले देणारा. पण आम्हाला त्याचे महत्वाच कळत नाही. एकदा परमेश्वराची कृपा झाली की काही मिळवायचे बाकी राहत नाही. पण आम्ही मात्र जवळ कस्तुरी असूनही कस्तुरीच्या शोधात फिरणाऱ्या कस्तुरीमृगासारखे रानोमाळ भटकत राहतो. ‘ तुझे आहे तुजपाशी परी तू जागा चुकलासी ‘ अशी आमची अवस्था होते.

हरीबोधाइतकी मौल्यवान कोणतीही गोष्ट नाही. आम्हाला हे समजते पण उमजत नाही. आमची श्रद्धा डळमळीत होऊ लागते. हरीबोध किंवा परमेश्वराची प्राप्ती ही इतक्या सहजासहजी होणारी गोष्ट नसते. त्यासाठी विवेक आणि श्रद्धा आवश्यक असतात. संयमाने उपासना सुरु ठेवावी लागते. पण एकदा का श्रद्धा डळमळीत झाली की नाना प्रकारच्या शंका मनात घर करू लागतात. या आधीच्या श्लोकात समर्थांनी निजध्यास सुटला म्हणजे काय घडते ते सांगितले होते. तेच अशा वेळी घडते. मग परमेश्वर आहे का? तो मला प्राप्त होईल का? मी एवढा वेळ कशाला वाया घालवायचा? त्याऐवजी माझ्या हातात जे आनंदाचे क्षण आहेत, ते मी का गमवावे? असा मनुष्य संतांशी देखील व्यर्थ वादविवाद करीत बसतो. ज्ञानेश्वरी, दासबोध, गीता वाचणारे त्यातील सांगितलेल्या गोष्टींवर श्रद्धा ठेवून त्याचे अनुकरण करण्यापेक्षा मला किती कळते हे दाखवण्याचा प्रयत्न करीत बसतात. ‘ ज्ञानेश्वरीच्या बाबतीत एक तरी ओवी अनुभवावी ‘ असे म्हटले जाते. पण आम्ही तिची अनुभूती घेण्यापेक्षा व्यर्थ, कोरडे वादविवाद करत बसतो. खरे ज्ञान तेच की हृदयापर्यंत पोहोचते.

गोंदवलेकर महाराज म्हणतात, ” मला विद्वानांबद्दल आदर आहे पण प्रेम नाही. “त्याचे कारण हेच आहे. विद्वान माणसे आपल्या पांडित्याचे प्रदर्शन करण्यात धन्यता मानतात. पण भगवंत प्राप्तीसाठी जी तळमळ, श्रद्धा आणि प्रेम लागते, तिचा अभाव त्यांच्यामध्ये असतो. भगवंत उदंड देणारा दाता आहे. त्याच्याकडे काय मागायचे हे आपल्याला कळले पाहिजे. भगवंताच्या रूपाने आपल्याकडे सर्वस्व असते. तोच असतो कामधेनू आणि चिंतामणी. तेव्हा त्याच्याकडे क्षुद्र गोष्टी कशासाठी आणि का मागायच्या? पैसा, संसार, मुलेबाळे, सत्ता, प्रसिद्धी, कीर्ती हे तर सारेच मागतात. पण मला भगवंत हवा आहे हे मला तीव्रतेने वाटले पाहिजे. त्यासाठीच समर्थांची ही तळमळ!

स्वसंवाद :: 

१) माझ्याकडे आधीपासून असलेल्या गोष्टींची (श्रद्धा, ज्ञान, साधना) मला खरी जाणीव आहे का?

२) मी बाहेर बाहेर शोधण्यात जास्त वेळ घालवतो का, की अंतर्मुख होण्याचा प्रयत्न करतो?

३) मी आध्यात्मिक ज्ञान फक्त “समजून” घेतो, की खरोखर “जगतो”?

४) मी वाचन, चर्चा, वाद यांत अडकतो का, की प्रत्यक्ष साधना करतो?

५) माझ्या मनात शंका जास्त आहेत का, की श्रद्धा दृढ आहे?

६) मी “चिंतामणी” हातात असूनही “काचखंडे” मागत तर नाही ना याचा कधी विचार केला आहे का?

– – – – 

श्लोक क्र. ६४ – – 

अती मूढ त्या दृढ बुद्धी असेना ।

अती काम त्या राम चित्ती वसेना ।

अती लोभ त्या क्षोभ होईल जाणा ।

अती विषयी सर्वदा दैन्यवाणा ।६४।

अर्थ :: मूढ म्हणजे मूर्ख मनुष्य. अशा व्यक्तीला आपले हित कशात आहे हे कळत नाही. त्याच्याजवळ साहजिकच दृढ बुद्धी म्हणजे निश्चयाचा अभाव असतो. ज्याच्या मनामध्ये विषयवासना मोठ्या प्रमाणात घर करून असतात, त्याच्या मनात साहजिकच भगवंताला स्थान मिळणे शक्य नसते. अती लोभी माणसाला शेवटी क्षोभाला म्हणजे क्रोधाला सामोरे जावे लागते. विषय विकारांच्या अती अधीन झालेला माणूस लाचार आणि दीनवाणा असतो.

विवेचन :: ‘अति सर्वत्र वर्जयेत ‘असे संस्कृत वचन आहे. कोणत्याही गोष्टीचा अतिरेक झाला की तो सर्वनाशाला कारणीभूत होतो. एखादी गोष्ट आरोग्याला हितकारक जरी असली तरी तिचा अतिरेक झाला तर तो घातक ठरतो. उत्तम प्रकृतीसाठी शरीराला व्यायाम आवश्यक असतो. पण त्याचा अतिरेक झाला तर अंतिमतः हानीच होते. त्याप्रमाणे सर्वच गोष्टींचे आहे. अती खाणे, अती बोलणे, अती निद्रा, अती उर्मटपणा अशी कोणतीही गोष्ट अती झाली की नुकसानच होते. ‘अती तिथे माती ‘ असे आपण म्हणतो ते यामुळेच.

कामवासना किंवा विषय सेवन आपल्या आयुष्यात जेवढे आवश्यक असते, तेवढे करण्याची परवानगी आपल्याला आपली संस्कृती देते. त्यासाठी एक विशिष्ट चौकट आपल्या संस्कृतीने आखून दिलेली आहे. त्यासाठी विवाह संस्कार आहे. तात्पर्य एका मर्यादेत विषय सेवन शास्त्रास मान्य आहे. परंतु विषय सुखाच्या अधीन होऊन त्यापलीकडे दुसरे काहीच न दिसणे हे तामसी वृत्तीचे लक्षण आहे. पशुसुद्धा आवश्यक तेवढाच कामवासनेचा आधार घेतात. प्रजोत्पादन हे त्यांचे उद्दिष्ट असते. परंतु माणूस मात्र कोणतीही मर्यादा पाळत नाही. कामातुराणां न भयं न लज्जा असे एक संस्कृत वचन आहे. सध्या विविध माध्यमांमुळे माणसांच्या वासना भडकवल्या जातात. त्यांचा अतिरेक झाला तर काय होते याचे प्रत्यंतर आपल्याला रोजच्या बातम्या पाहिल्या तरी येते.

अती विषयी माणूस हा मूढ बुद्धी असतो. मूढ बुद्धी म्हणजे आपल्या हिताचे न कळणारा. त्याला कोणी कितीही समजावून सांगितले तरी ते पटत नाही. पटले तरी ऐकण्याची तयारी नसते. रावण हा स्त्रीलंपट होता. विषयलोभी होता. त्यातूनच त्याने सीतेसारख्या पतिव्रतेला उचलून आणण्याचे पातक केले. बिभीषण, मंदोदरी आदींनी त्याला वेळोवेळी समजावून सांगितले पण त्याची बुद्धी भ्रष्ट झालेली असल्याने त्याला आपल्या हिताचा सल्ला देखील रुचला नाही.

ज्यांच्या मनात सदैव विषयवासनेनेच ठाण मांडलेले असते, त्यांच्या चित्तात राम म्हणजे भगवंत राहीलच कसा? परमेश्वर प्राप्तीसाठी शुद्ध आणि निर्मळ चित्त हवे. बऱ्याच वेळा अशी काही माणसे भगवंताचे नाम घेताना दिसतात. पण ते लोकांची दिशाभूल करीत असतात. त्यांचा अंतर्गत हेतू वेगळाच असतो. मुहमें राम बगलमे छुरी अशी स्थिती असते. अशा माणसांपासून सावध राहिलेले बरे.

जशी अवस्था अती कामी माणसाची होते, तशीच अवस्था अती लोभी माणसाची होते. अग्नीत जेवढे तूप टाकले तेवढा तो अधिक प्रज्वलित होतो. काम आणि लोभ यांचे देखील असेच आहे. कुठे थांबायचे हे कळत नाही. गरज आणि लोभ यात अंतर आहे. गरजा मर्यादित असतात. लोभ किंवा हाव यांना कोणतीही मर्यादा नसते. लोभापोटी माणसाच्या हातून अनेक अपराध आणि नको त्या गोष्टी घडतात. आपल्या प्रपंचासाठी जेवढे आवश्यक तेवढे मिळवणे हे प्रापंचिक माणसाचे कर्तव्यच आहे. ते देखील योग्य मार्गाने! पण लोभी माणसाचा विवेक हरवलेला असतो. त्यामुळे माझे ते माझे पण तुझे तेही माझेच अशी त्याची वृत्ती होते. येनकेन मार्गाने तो ती गोष्ट मिळवण्याचा प्रयत्न करतो. सत्ता, संपत्ती, प्रसिद्धी या गोष्टींची हाव माणसाला कोणत्याही थराला घेऊन जाते आणि त्याचे अध :पतन घडवून आणते.

आपल्याला हवी ती गोष्ट नाही मिळाली की मग अशा माणसांचा संताप होतो. म्हणूनच समर्थ म्हणतात, ‘ अति लोभ त्या क्षोभ होईल जाणा. ‘ दुर्योधनाला राज्य आणि सत्तेची एवढी हाव होती की त्याने पांडवांच्या हिश्याचे राज्य तर सोडाच परंतु त्यांना पाच गावेही देण्यास नकार दिला. दुष्ट शकुनीच्या बदसल्ल्याला तो बळी पडली. त्याच्या हिताचे सांगणाऱ्या भीष्म, विदुर, श्रीकृष्ण आदींच्या सल्ल्याकडे त्याने दुर्लक्ष केले. या सगळ्यांचा परिणाम म्हणजे त्याला मनःशांती नव्हती. त्याचे चित्त क्षोभाने व्यापलेले होते. शेवटी सत्ता आणि संपत्ती यांच्या अतिलोभाने त्याचा घातच केला.

म्हणूनच दासबोधात समर्थ सांगतात की ‘ अती सर्वत्र वर्जावे, प्रसंग पाहुनि वर्तावे. ‘ धर्माने घालून दिलेल्या मर्यादेत सर्व गोष्टींचा उपभोग घ्यावा. आधीच्या श्लोकात समर्थांनी सांगितल्याप्रमाणे ‘ सदाचार हा थोर सांडू नये तो, जगी तोचि तो मानवी धन्य होतो. ‘ असेच वागणे आपल्या हिताचे आहे. जे अती विषयी माणसे असतात त्यांची अवस्था व्यवहारात अत्यंत दीनवाणी होते. त्यांना किंमत राहत नाही असे समर्थ म्हणतात. दैनंदिन जीवनातही अशी अनेक उदाहरणे आपण पाहतो. त्यांच्या लोभ किंवा कामवासनेच्या अतिरेकामुळे लोकांमध्ये त्यांची छी थू होते. माणूस जेव्हा विषयांच्या अधीन होतो, तेव्हा तो त्याचा मालक न राहता गुलाम होतो. मग ही गुलामगिरी त्याला वाटेल तसे वागण्यास भाग पाडते. त्यात आपण लाचार किंवा दैन्यवाणे होत जात आहोत हेही त्याच्या लक्षात येत नाही.

स्वसंवाद :: 

१. माझ्या आयुष्यात कोणत्या गोष्टीचा ‘अतिरेक’ होतोय का? (उदा. सोशल मीडिया, खाणे, राग किंवा कामाचा अट्टाहास) 

२. माझी कोणतीही कृती ही ‘गरज’ आहे की ‘लोभ’, हे मी ओळखू शकतो का?

३. जेव्हा मला माझ्या आवडीची गोष्ट मिळत नाही, तेव्हा माझ्यात ‘क्षोभ’ (राग) निर्माण होतो का? तो शांत करण्यासाठी मी काय करतो?

४. माझे चित्त ‘निर्मळ’ ठेवण्यासाठी मी दिवसातला किती वेळ स्वतःला आणि परमेश्वर चिंतनाला देत

– क्रमशः श्लोक ६३ आणि ६४

© श्री विश्वास देशपांडे

चाळीसगाव

प्रतिक्रियेसाठी ९४०३७४९९३२

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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