(डॉ भावना शुक्ल जी (सह संपादक ‘प्राची‘) को जो कुछ साहित्यिक विरासत में मिला है उसे उन्होने मात्र सँजोया ही नहीं अपितु , उस विरासत को गति प्रदान किया है। हम ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि माँ सरस्वती का वरद हस्त उन पर ऐसा ही बना रहे। आज प्रस्तुत हैं – बप्पा की बिदाई।)
(आदरणीय श्री संतोष नेमा जी कवितायें, व्यंग्य, गजल, दोहे, मुक्तक आदि विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं. धार्मिक एवं सामाजिक संस्कार आपको विरासत में मिले हैं. आपके पिताजी स्वर्गीय देवी चरण नेमा जी ने कई भजन और आरतियाँ लिखीं थीं, जिनका प्रकाशन भी हुआ है. आप डाक विभाग से सेवानिवृत्त हैं. आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होती रहती हैं। आप कई सम्मानों / पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत हैं.“साप्ताहिक स्तम्भ – इंद्रधनुष” की अगली कड़ी में आज प्रस्तुत है आपकी एक कविता – हे लम्बोदर गजवदन… । आप श्री संतोष नेमा जी की रचनाएँ प्रत्येक शुक्रवार आत्मसात कर सकते हैं।)
(संस्कारधानी जबलपुर की सुप्रसिद्ध साहित्यकार सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ ‘जी सेवा निवृत्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश, डिविजनल विजिलेंस कमेटी जबलपुर की पूर्व चेअर पर्सन हैं। आपकी प्रकाशित पुस्तकों में पंचतंत्र में नारी, पंख पसारे पंछी, निहिरा (गीत संग्रह) एहसास के मोती, ख़याल -ए-मीना (ग़ज़ल संग्रह), मीना के सवैया (सवैया संग्रह) नैनिका (कुण्डलिया संग्रह) हैं। आप कई साहित्यिक संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत एवं सम्मानित हैं। आप प्रत्येक शुक्रवार सुश्री मीना भट्ट सिद्धार्थ जी की अप्रतिम रचनाओं को उनके साप्ताहिक स्तम्भ – रचना संसार के अंतर्गत आत्मसात कर सकेंगे। आज इस कड़ी में प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम गीत – टूटती आशा…।
(बड़ोदा से सुश्री मंजिरी “निधि” जी की गद्य एवं छंद विधा में विशेष अभिरुचि है और वे साथ ही एक सफल महिला उद्यमी भी हैं।
आज प्रस्तुत है आपका आलेख ‘परशुराम जी – २‘।)
☆ मंजिरी साहित्य # २६ ☆
आलेख – परशुराम जी – २ ☆ सुश्री मंजिरी “निधि”
हमारे 18 पुराण हैंl इन सभी पुराणों में जीव, जगत, जगदीश और मोक्ष को बहुत ही अच्छी तरह समझाया हैl
सनातन धर्म में सतयुग, द्वापर युग, त्रेता युग और कलियुग का ज्ञान अलौकिक हैl हमारे सनातन धर्म का विज्ञान इतना परिपूर्ण है कि सृष्टि की निर्मिति कैसे हुई? प्रकृति और पुरुष क्या है? इसका विस्तृत वर्णन हमें पढ़ने को मिलता हैl काल गणना भी बहुत ही उत्तम तरीके से दर्शाई गई हैl हमारे सभी पुराण तत्व चिंतन, तत्व ज्ञान, भक्ति सभी दृष्टि से अपूर्व हैl खासियत ये है कि ये सभी संवाद रूप में हैंl
वेदों को अपौरुषेय कहते हैं क्यूंकि इन्हें किसी मानव ने नहीं लिखेl ये ईश्वर के श्वास से प्रकट हुए हैंl
कहते हैं समय के प्रारम्भ में परब्रह्म के दो भाग हुएl l पहला- पुरुष और दूसरी- प्रकृतिl पुरुष ने अपने आप को तीन भागों में विभाजित कियाl पहला ब्रह्म – सृजनकर्ता, दूसरा विष्णु – वहनकर्ता और तीसरा शिव – विलीनकर्ताl इन तत्वों को शक्ति प्रदान करने हेतु प्रकृति ने स्वयं को भी तीन भागों में विभाजित कियाl पहली लक्ष्मी, दूसरी सरस्वती और तीसरी शिवाl
पुरुष अर्थात आत्माl ये नाशरहित, नित्य एवं अजन्मी हैl इसे शस्त्र नहीं काट सकताl आग नहीं जला सकती और पवन भी इसे सुखा नहीं सकतीl इस तरह ये अच्छेद, अदाह्य, अकलेद्य एवं अशोध्य हैl साथ ही नित्य सर्वव्यापी, अचल और स्थिर हैl यह अचिन्त्य हैl विकार रहित हैl
पुरुष चेतन हैl चैतन्य जगाता हैl ऊर्जावान करता हैl यह त्रिगुणातीत हैl यह ज्ञान स्वरूप हैl जगत से परे हैl बंधन से मुक्त हैl वहीं प्रकृति पूरा ब्रम्हाण्ड, पूरी सृष्टि हैl प्रकृति में सतोगुण, रजोगुण और तमोगुण साम्य अवस्था में थेl पर ईश्वर ने इसमें चेतना डाली और सृष्टि का निर्माण हुआl प्रकृति जड़ हैl नाशवान हैl यह भोग्य हैl यही बंधन का मूल कारण हैl अर्थात प्रकृति या सृष्टि कहें एवं पुरुष ये दोनों ही तत्व बुनियादी हैं, मौलिक हैं, चिरंतन हैं एवं नित्य हैंl दोनों एकदूसरे के अधीन हैं एक दूसरे पर आधारित हैंl
(श्रीमती शशि सुरेश सराफ जी सागर विश्वविद्यालय से हिंदी एवं दर्शन शास्त्र से स्नातक हैं. आपने लायंस क्लब और स्वर्णकार समाज की अध्यक्षा पद का भी निर्वहन किया. आपका “लेबल शशि” नाम से बुटीक है और कई फैशन शोज में पुरस्कार प्राप्त किये हैं. आपका साहित्य और दर्शन से अत्यधिक लगाव है. आप प्रत्येक शुक्रवार श्रीमती शशि सराफ जी की रचनाएँ आत्मसात कर सेंगे. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता ‘सर्वोच्च…‘।)
☆ शशि साहित्य # ४० ☆
कविता – सर्वोच्च… ☆ श्रीमती शशि सुरेश सराफ
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कतरा बनकर आंसू का, आंखों से ना बह जाओ।
यह सोचकर हमने, अब रोना छोड़ दिया।।
*
पढ़ ना ले कोई हमारी नजरों में तुमको।
सबके सामने पलकों को, गिराकर उठाना हमने छोड़ दिया।।
*
नींद आएगी, साथ तेरे ख्वाब भी लायेगी।
रात ने भोर का इंतजार छोड़ दिया।।
*
कुछ भाव ऐसे होते हैं, सिर्फ एहसासों में जीते हैं।
उनको शब्दों के बंधन में बांधना छोड़ दिया।।
*
जन्म मरण से ऊपर भी कुछ ऐसे रिश्ते होते है।,
कितने जन्म लिए हमने, यह गिनती करना छोड़ दिया।।
*
हर सांस में तू.. हर दुआ में शामिल है।
कितने दर पर शीश झुकाया हमने गिनना छोड़ दिया।।
*
एक विश्वास मिला,, सर्वोच्च मिला, अब तो कुछ बाकी नही।
(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जीद्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना “अनंत चौदस पर्व: विदाई कहाँ हुई…”। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)
गणेश जी का हमारे घर आना हर वर्ष किसी अपने के घर आने जैसा लगता है। गणेश चतुर्थी पर जब उन्हें सादगी से घर लाते हैं, तो स्वागत की तैयारी में बहुत कुछ नहीं चाहिए—दूर्वा, फूल, पान का पत्ता, धूप-दीप और घर के बने भोग से ही वातावरण में अपनापन उतर आता है। कुछ ही देर में लगता है, जैसे देवता के साथ घर का कोई अपना अतिथि आकर बैठ गया हो।
दस दिनों तक उनकी उपस्थिति घर की दिनचर्या में घुली रहती है। सुबह दर्शन, शाम की आरती और बीच-बीच में उनके सामने से गुजरते हुए अनायास ठहर जाना—सब सहज ही दिन का हिस्सा बन जाता है। आँगन की हरियाली भी जैसे इस संगत का हिस्सा बन जाती है। तुलसी, बेलें, गमलों में खिले फूल और पत्तियों के बीच से आती हवा—सब मिलकर उनके लिए अपना-सा परिवेश रच देते हैं।
फिर अनंत चौदस आती है।
विदाई की तैयारी करते हुए मन में एक अनकहा-सा खिंचाव होता है। जिनसे दस दिनों तक इतनी सहज निकटता रही, उन्हें अब विदा करना है। पर शायद यही जीवन का ढंग है—मिलना, साथ रहना और फिर अपने मूल की ओर लौट जाना।
हमारे यहाँ विसर्जन घर में ही होता है। स्वच्छ जल से भरे पात्र में गणेश जी को पूरे सम्मान के साथ धीरे-धीरे विदा करते हैं। पूजा की सामग्री में भी प्रकृति के जितना निकट रहा जा सके, उतना ही अच्छा लगता है। बाद में उस जल को घर के पेड़-पौधों में अर्पित कर देते हैं—कभी किसी पुराने पौधे की मिट्टी में, कभी किसी नए लगाए पौधे की जड़ों में। इस वर्ष विसर्जन के साथ कुछ नए पौधे लगाने का भी मन है। शायद यह संयोग नहीं कि गणपति की विदाई और किसी नए जीवन की शुरुआत एक ही दिन हो।
गणेश जी को विदा करने का यह ढंग किसी नियम से अधिक एक घरेलू अनुभूति है। जो हमारे घर आए, उसे प्रेम से स्थान दिया; जो लौटना है, उसे सहजता से लौटने दिया और जाते-जाते उसकी स्मृति को मिट्टी, जल और हरियाली में रहने दिया।
इसलिए अनंत चौदस के दिन जब गणेश जी जल में विलीन होते हैं, तो घर अचानक खाली नहीं लगता। पास ही कोई पत्ता हिल रहा होता है, कोई कली खिलने को होती है, किसी पौधे की मिट्टी में वही जल उतर रहा होता है।
(प्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक साहित्य ” में हम श्री विवेक जी की चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं। श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी , जबलपुर ) से सेवानिवृत्त हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। आपको वैचारिक व सामाजिक लेखन हेतु अनेक पुरस्कारो से सम्मानित किया जा चुका है।आज प्रस्तुत है एक ज्ञानवर्धक आलेख – “एआई के क्या उपयोग हों ?” ।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ४३२ ☆
आलेख – एआई के क्या उपयोग हों ? श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆
विश्व आर्थिक मंच की Future of Jobs Report 2025 पढ़ते हुए एक बात विशेष रूप से ध्यान खींचती है। तकनीकी बदलाव तेजी से हो रहे हैं। एआई और बिग डेटा से जुड़े कौशलों की मांग बढ़ रही है। साथ ही रचनात्मक सोच, जिज्ञासा और सीखते रहने की क्षमता को भी भविष्य के लिए महत्वपूर्ण माना गया है। यानी मशीनें जितनी सक्षम होती जा रही हैं, मानवीय क्षमता की भूमिका भी उतनी ही महत्वपूर्ण बनी हुई है।
यहीं से एआई के बेहतर प्रयोग पर बात शुरू होती है। एआई हमारे लिए क्या-क्या कर सकता है, इसकी सूची लगातार लंबी हो रही है। लेकिन इससे भी जरूरी सवाल है, जो कुछ एआई कर सकता है, क्या वह सब कुछ उसे करने देना चाहिए?
पिछले दिनों सोशल मीडिया पर पढ़ी एक पोस्ट इसी सवाल को बड़े रोचक व्यंग्यात्मक ढंग से सामने रखती है—“I want AI to do my laundry and dishes so that I can do my art and writing, not for AI to do my art and writing so that I can do my laundry and dishes.” अर्थात्, मैं चाहता हूं कि एआई मेरे कपड़े धोए और बर्तन साफ करे, ताकि मैं अपनी कला और लेखन के लिए समय निकाल सकूं। यह नहीं कि एआई मेरी कला और लेखन कर दे और मैं कपड़े धोने-बर्तन साफ करने में लगा रहूं।
बात मजाकिया है, किन्तु संदेश गंभीर है। आज कपड़े धोने की मशीन है। बर्तन साफ करने की मशीन है। खाना बनाने वाले स्वचालित उपकरण हैं। घर की सफाई करने वाले रोबोट हैं। इन उपकरणों को सेंसर, सॉफ्टवेयर और एआई से जोड़ना अब कोई दूर की कल्पना नहीं है। इसके लिए ए आई एजेंट बन चुके हैं।लेकिन यहीं एक महत्वपूर्ण प्रश्न सामने आता है, हमें मशीनों से केवल अपने बौद्धिक काम करवाना नहीं है, काम का सही बंटवारा करना है।
यही एआई के बेहतर प्रयोग की पहली शर्त है। जो काम दोहराव वाले हैं, थकाऊ हैं, समय खाते हैं और जिनमें मानवीय विवेक की बहुत कम जरूरत है, उन्हें एआई को सौंपना समझदारी है। सूचनाएं छांटना, लंबे दस्तावेजों का सार निकालना, डेटा व्यवस्थित करना, नियमित रिपोर्ट तैयार करना, भाषा की त्रुटियां पकड़ना, अनुवाद में सहायता करना, बैठकों के नोट्स बनाना, यात्रा की योजना तैयार करना या सामान्य प्रश्नों के उत्तर देना, ऐसे अनेक काम हैं जिनमें एआई हमारा समय बचा सकता है।
और समय बचना मामूली उपलब्धि नहीं है। आज अधिकांश लोग समय की कमी से परेशान हैं। काम बढ़ते जाते हैं। सूचनाएं बढ़ती जाती हैं। संदेश बढ़ते जाते हैं। लेकिन दिन वही चौबीस घंटे का है। यदि एआई इस दबाव को कम कर सके तो उसका सबसे बड़ा लाभ यही होगा कि वह हमें अधिक रुचि के काम करने के लिए नहीं, बेहतर काम करने के लिए समय दे सकता है।
तकनीक का उपयोग करके यदि हम एक घंटे में वही दस काम करने लगें, जो पहले दो घंटे में करते थे, और फिर बचे हुए घंटे में दस नए काम जोड़ लें, तो हमने जिंदगी आसान नहीं की। हमने केवल अपनी व्यस्तता की गति बढ़ाई है। एआई का बेहतर प्रयोग इससे अलग होना चाहिए। वह हमें दक्ष बनाए, लेकिन लगातार व्यस्त नहीं। वह हमारी उत्पादकता बढ़ाए, लेकिन हमारी बेचैनी नहीं। वह हमारी स्मृति और गणना का बोझ कम करे, ताकि हमारी सोच अधिक गहरी हो सके।
रचनात्मकता के क्षेत्र में भी यही संतुलन जरूरी है। लेखक के लिए एआई विचारों को व्यवस्थित कर सकता है, शोध सामग्री खोजने में सहायता कर सकता है और भाषा सुधार सकता है, लेकिन लेखक की अपनी मौलिक आवाज बनी रहनी चाहिए। कलाकार के लिए एआई नए विकल्प दिखा सकता है और प्रयोगों को आसान बना सकता है, लेकिन कलाकृति की दृष्टि और अंतिम चयन कलाकार का ही होना चाहिए। शिक्षक के लिए एआई पाठ तैयार कर सकता है और विद्यार्थियों के स्तर के अनुसार अभ्यास बना सकता है, लेकिन विद्यार्थी की जिज्ञासा और उसकी व्यक्तिगत परिस्थिति को समझने वाला शिक्षक ही होगा।
यानी एआई को उत्तर देने वाली मशीन से आगे बढ़ाकर सोचने में मदद करने वाला साथी बनाना होगा। मशीन गति दे, मनुष्य दिशा दे। मशीन विकल्प दे, मनुष्य चयन करे। मशीन सूचना दे, मनुष्य उसका अर्थ समझे। मशीन दोहराव वाले काम संभाले, मनुष्य नया सृजन करे।
अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन के 2025 के विश्लेषण में भी संकेत मिलता है कि जनरेटिव एआई का प्रभाव अनेक नौकरियों को पूरी तरह समाप्त करने के बजाय उनके भीतर किए जाने वाले कार्यों को बदलने के रूप में अधिक दिखाई दे सकता है। इसलिए चुनौती केवल यह नहीं है कि मशीन क्या करेगी। चुनौती यह भी है कि मनुष्य की भूमिका किस दिशा में बदलेगी।
इस बदलाव को दिशा देना हमारे हाथ में है। यदि एआई से मिला अतिरिक्त समय हम और अधिक ईमेल, और अधिक मीटिंग और और अधिक काम में लगा देंगे, तो हमने मिला समय और अवसर गंवा दिया। लेकिन यदि वही समय हम सीखने, सोचने, लिखने, परिवार, मित्रों, कला, प्रकृति और अपने भीतर के संसार को दे सकें, तो एआई का उपयोग कहीं बड़ा हो सकता है।
तब एआई केवल उत्पादकता का औजार नहीं रहता। वह समय को सार्थक बनाने का साधन बन जाता है।
भविष्य में एआई के मूल्यांकन का सबसे सार्थक प्रश्न शायद यही होगा ,उसने हमसे कितना काम करवाया, यह नहीं! उसने हमें कितना बेहतर काम और बेहतर जीवन जीने का अवसर दिया।
कपड़े धुल जाएं। बर्तन साफ हो जाएं। खाना बन जाए। कागज व्यवस्थित हो जाएं। आंकड़े समझ में आ जाएं। लेकिन कविता हम लिखें। चित्र हम बनाएं। सपने हम देखें। निर्णय हम लें। जीवन हम जिएं।
क्योंकि एआई का सर्वोत्तम उपयोग मनुष्य की जगह लेना नहीं है। मनुष्य को उसकी बेहतर संभावनाओं तक पहुंचाना है।
ए आई का हौआ वे ही खड़ा कर रहे दिखते हैं, जो उसे समझते नहीं है, ए आई को दोस्त बनाना समय की जरुरत है।
(हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी की अब तक लगभग तेरह दर्जन से अधिक मौलिक पुस्तकें ( बाल साहित्य व प्रौढ़ साहित्य ) तथा लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन।लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन। कई कृतियां पंजाबी, उड़िया, तेलुगु, अंग्रेजी आदि भाषाओँ में अनूदित । कई सम्मान/पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत। भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय द्वारा बाल साहित्य के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य श्री सम्मान’ और उत्तर प्रदेश सरकार के हिंदी संस्थान द्वारा बाल साहित्य की दीर्घकालीन सेवाओं के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य भारती’ सम्मान, अमृत लाल नागर सम्मान, बाबू श्याम सुंदर दास सम्मान तथा उत्तर प्रदेश राज्य कर्मचारी संस्थान के सर्वोच्च सम्मान सुमित्रानंदन पंत, उत्तर प्रदेश रत्न सम्मान सहित बारह दर्जन से अधिक राजकीय प्रतिष्ठित साहित्यिक एवं गैर साहित्यिक संस्थाओं से सम्मानित एवं पुरुस्कृत।
☆ महावस्त्राचे पदर – भाग ११ – ‘पती-पत्नी’ (संसार रथाची दोन चाके) ☆ श्री विश्वास देशपांडे ☆
‘संसार हैं इक नदिया, दुख-सुख दो किनारे हैं, ना जाने कहाँ जाएं हम बहते धारे हैं… ‘ जीवनाचं तत्त्वज्ञान सांगणारं हे एक अतिशय सुंदर गाणं! मला नेहमी असं वाटतं की या गाण्यातील दोन किनारे म्हणजे पती आणि पत्नी; जणू संसाररूपी नदीचे दोन भक्कम काठ. संसार नावाची जीवनदायिनी नदी या दोघांमधून वाहत असते. सुख-दुःखाचे एकमेकांचे सोबती असलेले हे किनारे एकमेकांना सदैव सांभाळून घेत असतात. कोणीतरी खूप छान म्हटलं आहे, “संसार दोघांचा असतो, दोघांनी आवरायचा असतो; एकजण चुकला तर दुसऱ्याने सावरायचा असतो! ” काही काही वाक्ये सहजपणे संपूर्ण जीवनाचं सार सांगून जातात. पण हे तत्त्वज्ञान जोपर्यंत आपल्या अंतरंगात पोहोचत नाही, तोपर्यंत या सुंदर अशा सहजीवनाला प्रेमाचा खरा गोडवा प्राप्त होत नाही.
‘नात्यांच्या महावस्त्रा’तील हा असा एक मूलभूत पदर आहे, ज्यामुळे या महावस्त्राला एक देखणी चौकट प्राप्त होते; आणि त्यातूनच महावस्त्रातील पुढची सर्व नाती जोडली जातात. लग्न ठरवून केलेले असो की प्रेमविवाह, लग्नानंतर दोन वेगवेगळ्या घरांत, वातावरणात आणि संस्कारांत वाढलेले दोन स्वतंत्र जीव एकत्र येतात. ते प्रेमाच्या रेशमी धाग्याने असे काही घट्ट बांधले जातात की, नंतर त्यांना एकमेकांशिवाय एक क्षणही करमत नाही! जेव्हा पत्नी चार दिवस माहेरी जाते, तेव्हा पतीच्या मनातील व्याकुळता या शब्दात व्यक्त होते –
“नसतेस घरी तू जेव्हा, जीव तुटका तुटका होतो,
जगण्याचे विरती धागे, संसार फाटका होतो… “
लग्नानंतर थोड्याच दिवसांत सुरुवातीचे रम्य आणि मोहक वातावरण ओसरून संसारातील वारा, ऊन आणि पावसाचे वास्तव समोर दिसायला लागते. मग जीवनात असे कितीतरी प्रसंग येतात, ज्यावर केवळ एकमेकांच्या भक्कम साथीनेच मात करता येते. मुलांच्या शाळा, त्यांची दुखणी-खुपणी, संसाराची ओढाताण आणि नातेवाईकांकडील सुख-दुःखाचे प्रसंग या सगळ्यांना ते दोघे एकत्र सामोरे जातात. घरात मूल आजारी असेल, तर दोघेही त्याच्या उशाशी रात्र-रात्र जागून काढतात. अशा वेळी पत्नीचे जागरण झाले असेल, तर पती मायेने म्हणतो, “तू थोडं खाऊन घे आणि विश्रांती घे; मी बसतो त्याच्याजवळ. ” कधी एखाद्या संकटात तिच्या दुःखाचा बांध फुटतो, तेव्हा तो विश्वासाने पाठीवर हात ठेवून म्हणतो, “अगं, मी आहे ना… काळजी कशाला करतेस? ” आणि त्याच्या एका आश्वासक मिठीत ती स्वतःचे सगळे दुःख विसरून जाते. अशा वेळी पती जर कुटुंबाचा भक्कम आधारवड असेल, तर पत्नी त्या घराला ‘घरपण’ देणारी मंगलमय नंदादीप असते!
या नात्यात प्रेम जितके महत्त्वाचे, तितकाच आदर आणि एकमेकांच्या स्वातंत्र्याची जपणूकही मोलाची असते. ‘मी’ पणाचा त्याग करून जेव्हा दोघे ‘आम्ही’ होतात, तेव्हा संसाराचा हा रथ अतिशय सुरळीत चालतो. लहान-सहान भांडणे, रुसवे-फुगवे आणि पुन्हा एका मिश्कील संवादाने सर्व विसरून एकत्र येणे, हीच या नात्याची खरी गोडी असते.
‘नटसम्राट’ नाटकात मुले जेव्हा आई-वडिलांना घराबाहेर काढतात, तेव्हा अप्पा बेलवलकर आपल्या पत्नीची समजूत घालतात. तिला ते प्रेमाने ‘सरकार’ म्हणतात. त्या नाटकात दोघांनी शेवटच्या श्वासापर्यंत एकमेकांना दिलेली साथ पाहिली की पती-पत्नीच्या नात्याची अलौकिक ताकद लक्षात येते.
संसार तर सगळेच करतात; पण स्वातंत्र्यवीर सावरकर आणि त्यांच्या पत्नी माई यांनी पती-पत्नीच्या या नात्याला केवढ्या तरी उत्तुंग उंचीवर नेऊन ठेवले! नुकतेच लग्न झालेले असताना, माईंच्या डोळ्यांत सुखी संसाराची स्वप्ने तरळत असताना सावरकरांनी स्वतःला मातृभूमीच्या स्वातंत्र्यसंग्रामात झोकून दिले. सावरकरांना अंदमानच्या काळ्या पाण्याची जन्मठेप झाल्यानंतर माई जेव्हा त्यांना तुरुंगात भेटायला जातात, तेव्हा पतीला बेड्या घातलेल्या अवस्थेत पाहून त्यांचे डोळे पाणावतात. त्यावेळी त्यांची समजूत घालताना सावरकर म्हणतात—
“माई, काटक्या एकत्र करायच्या आणि घरटं बांधायचं, त्या घरट्यात पोराबाळांची वीण वाढवायची ह्यालाच जर संसार म्हणायचा असेल, तर असा संसार कावळे आणि चिमण्या देखील करतात! पण जर अवघ्या देशाचा संसार सुखी करण्यासाठी, आपल्या सुखी संसाराची होळी करून स्वतःला यज्ञकुंडात आहुती म्हणून द्यावं लागत असेल, तर तो खरा संसार आहे! “
पतीच्या या राष्ट्रयज्ञात स्वतःच्या संसाराची समिधा करणाऱ्या माई आणि सावरकरांचे हे नाते त्यागाचे सर्वोच्च शिखर आहे.
लग्न झाल्यानंतर मुलाबाळांचे करता करता संसाराची अनेक वर्षे निघून जातात आणि आयुष्याचा पैलतीर दिसायला लागतो. उतारवयात कधी पती आजारी पडतो, तर कधी पत्नी. मुले जवळ असली तर चांगलेच; पण त्यांच्या भरवशावर न राहता दोघे एकमेकांना मायेने सांभाळून घेतात.
माझ्या डोळ्यांसमोर माझ्या काका-काकूंचे उदाहरण नेहमी येते. दोघेही सेवानिवृत्त झालेले होते. पुढे काकूंना अर्धांगवायूचा (पॅरालिसिस) झटका आला आणि त्यांचा कमरेखालचा भाग लुळा पडला. त्यांना चालता येत नव्हते, घरातील कामे करणे तर दूरच राहिले. अशा वेळी काकांनी त्यांची अपार सेवा केली. बाहेरगावी जायचा प्रसंग आला, तरी काका त्यांना व्हीलचेअरवर बसवून गाडीतून सोबत न्यायचे. काकूंना त्यांनी कधीही एकटे सोडले नाही; आमच्या डोळ्यांसमोर त्यांचा हा आदर्श कायम राहिला.
माझे वडीलही आपल्या आयुष्यातील शेवटच्या एक-दीड वर्षात अंथरुणाला खिळलेले होते. त्यांच्याकडून काही होत नसे; अशा बिकट वेळी माझ्या आईने त्यांची दिवसरात्र केलेली सेवा मी पाहिली आहे. एखाद्या लहान मुलाची काळजी घ्यावी, तशी त्यांची काळजी तिने घेतली. हेच खरे पती-पत्नीचे निस्सीम प्रेम!
जेव्हा आयुष्यभर साथ देणारा जीवनसाथी अचानक हे जग सोडून निघून जातो, तेव्हा मात्र पती असो की पत्नी, त्यांच्या आयुष्यात एक प्रचंड पोकळी निर्माण होते. मग उर्वरित आयुष्य ते केवळ ‘काढतात’; जोडीदाराशिवाय ‘जगणं’ त्यांच्यासाठी एक मूक अग्निदिव्य बनून जातं.
मला इथे पूर्वी वाचलेली एक सत्यकथा आठवते. एकदा एक वयोवृद्ध गृहस्थ हाताची जखम शिवून घेण्यासाठी डॉक्टरांकडे जातात आणि म्हणतात, “डॉक्टर, मला जरा घाई आहे, कृपया पटकन टाके काढा. ” डॉक्टरांनी विचारले, “का हो, कुठे जायची घाई आहे? ” ते म्हणाले, “मला माझ्या आजारी पत्नीला भेटायला जायचे आहे. ” डॉक्टरांनी सहज विचारले, “त्या कुठे आहेत? ” त्यावर ते गृहस्थ म्हणाले, “त्यांना ‘अल्झायमर’चा आजार आहे. त्या एका शुश्रूषागृहात उपचार घेत आहेत. मी रोज सकाळी त्यांच्यासोबत बसून नाश्ता करतो, आज मला थोडा उशीर झालाय. ” डॉक्टरांनी विचारले, “पण त्या तुम्हाला ओळखतात का? ” ते शांतपणे म्हणाले, “नाही, ती मला ओळखत नाहीत. ” डॉक्टरांना आश्चर्य वाटले, ते म्हणाले, “तरीही तुम्ही रोज न चुकता त्यांच्यासोबत नाश्ता करायला जाता? ” त्यावर त्या गृहस्थांनी दिलेले उत्तर काळजाला भिडणारे होते—”होय, ती मला ओळखत नसल्या म्हणून काय झाले? मी तर तिला ओळखतो ना! ” डॉक्टर नंतर म्हणाले की, हा रुग्ण मला आयुष्यातील प्रेमाचा आणि समर्पणाचा सर्वात मोठा धडा देऊन गेला.
आपल्या भारतीय संस्कृतीत या नात्याला ‘अर्धनारीश्वर’ संकल्पनेचे उदात्त अधिष्ठान लाभले आहे. शिव आणि शक्ती जसे एकमेकांशिवाय अपूर्ण आहेत, तसेच पती आणि पत्नी एकमेकांशिवाय अपूर्ण असतात. श्रीराम-सीता, विठ्ठल-रखुमाई यांच्यापासून ते इतिहासातील महर्षी कर्वे आणि बाया कर्वे, महात्मा गांधी आणि कस्तुरबा, सावित्रीबाई आणि जोतीराव फुले, बाबा आमटे आणि साधनाताई आमटे यांच्यापर्यंत… एकमेकांच्या खांद्याला खांदा लावून समाज घडवणाऱ्या दांपत्यांची अनेक प्रेरक उदाहरणे आपल्यासमोर आहेत.
आजच्या धकाधकीच्या आणि विभक्त कुटुंब पद्धतीत पती-पत्नीचे नाते अधिक संवेदनशील झाले आहे. आज दोघेही नोकरी आणि संसाराची तारेवरची कसरत करत असताना एकमेकांना दिलेला वेळ, संयम आणि विश्वास हीच या नात्याची खरी ताकद ठरते. उतारवयात जेव्हा मुले आपापल्या विश्वात रमतात, तेव्हा हातात हात घालून एकमेकांची काठी बनणारे आणि आठवणींत रमणारे हेच पती-पत्नीचे नाते अखेरपर्यंत सोबत राहते.
कविवर्य बा. भ. बोरकर आपल्या एका कवितेत जोडीदाराच्या विरहाचे दुःख मांडताना म्हणतात—
“तू गेल्यावर, घरात देखील पाऊल माझे अडखळते,
आणि आटुनी हवा भवतीची, श्वासास्तव मन तडफडते.
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तू गेल्यावर, या वाटेने चिमणी देखील नच फिरके,
कसे अचानक झाले न कळे, सगळे जग परके परके… “
पती-पत्नीच्या नात्याचा हा पवित्र आदर्श भारतीय संस्कृतीने शतकानुशतके जपला आहे. नात्यांच्या या भरजरी ‘महावस्त्रा’चा हा ‘पती-पत्नी’ नावाचा पदर विश्वासाचा, समर्पणाचा आणि अथांग प्रेमाचा सुगंध असाच सदैव दरवळत ठेवो!
(संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं अग्रज साहित्यकार श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव जी के गीत, नवगीत एवं अनुगीत अपनी मौलिकता के लिए सुप्रसिद्ध हैं। आप प्रत्येक बुधवार को साप्ताहिक स्तम्भ “जय प्रकाश के नवगीत ” के अंतर्गत नवगीत आत्मसात कर सकते हैं। आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण एवं विचारणीय नवगीत “नहा आया हूँ गंगा में” ।)
जय प्रकाश के नवगीत # १६१ ☆
☆ नहा आया हूँ गंगा में☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव ☆