(लेखन-प्रकाशन – गत 2022 से छंद लेखन, एकल प्रकाशन– कलम के नवांकुर, अनुग्रह नवप्रस्तारित छंद पर लेखन (मैजिक बुक ऑफ रिकॉर्ड), साझा संकलन – तकरीबन 10, द्वादश ज्योतिर्लिंग (लंदन बुक आफ रिकार्ड), अनेकता में एकता (एशिया बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड), छंदावली – (मैजिक बुक ऑफ रिकॉर्ड), महाकाल साहित्य सम्मान से सम्मानित। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता !!माँ भवानी !!)
(श्री सुरेश पटवा जी भारतीय स्टेट बैंक से सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों स्त्री-पुरुष “, गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व प्रतिसाद मिला है। अब आप प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकते हैं यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर।)
यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – समुंदर की बीच क़िला – सिद्दी जज़ीरामुरूद – भाग- ५१ ☆ श्री सुरेश पटवा
समुंदर की बीच क़िला – सिद्दी जज़ीरामुरूद
ये तो आप मानते ही होंगे की भारत में प्राचीन रहस्यमयी जगहों की कोई कमी नहीं है क्योंकि हमारा इतिहास ही इतना वैविध्यपूर्ण और रहस्यमयी रहा है की जितना जानों उतना कम है। समुंद्र के बीचोबीच रहस्मयी मुरुद-जंजीरा किला 400 सालों से अजेय इतिहास का गवाह है। हम आपको ऐसे ही एक रहस्यमयी जगह ले चलते हैं। एक ऐसा क़िला जिसने कई लड़ाईयां देखी पर फिर भी ये अजेय रहा है।
महाराष्ट्र के रायगढ़ जिले के मुरुद गांव में स्थित मुरुद-जंजीरा फोर्ट है जो अपनी बनावट के लिए जाना जाता है। चारों तरफ से पानी से घिरे होने की वजह से इसे आईलैंड फोर्ट भी कह सकते है। ये आइलैंड फोर्ट भारत में ही नहीं बल्कि दुनिया में अपनी बनावट के लिए मशहूर है। यह भारत के पश्चिमी तट का एक मात्र किला हैं, जो कभी भी जीता नहीं जा सका था। स्थानीय लोग इसे फ़तह किला कहते हैं, जिसका शाब्दिक अर्थ अजेय होता है। माना जाता है कि यह किला पंच पीर पंजातन शाह बाबा की रूह के संरक्षण में है। शाह बाबा का मकबरा इसी किले में है। यह किला समुद्र तल से 90 फीट ऊंचा है। इसकी नींव समुद्र में 20 फीट गहरी है। इस किले का निर्माण 22 वर्षों में हुआ था। यह किला 22 एकड़ में फैला हुआ है। इसमें 22 सुरक्षा चौकियां है। ब्रिटिश, पुर्तगाली, शिवाजी, कान्होजी आंग्रे, चिम्माजी अप्पा तथा शंभाजी ने इस किले को जीतने का काफी प्रयास किया, लेकिन कोई सफल नहीं हो सका। इस किले में सिद्दि शासकों की कई तोपें अभी भी रखी हुई हैं। जंजीरा किला समुद्र के बीच बना चारों ओर से खारे पानी से घिरा है।
हमें क़िला देखने जाना था परंतु कोई बताने वाला नहीं मिलता था कि ज़ंजीरा कैसे जाएँ। जितने लोग उतनी बातें। कुछ उड़ती-उड़ती बात पता चली। यदि आप जाना चाहते हैं तो गेट वे आफ इंडिया पहुँचें, वहाँ से मंडवा के लिए फ़ेरी टिकट 75 रुपयों में ख़रीदें। फ़ेरी आपको मंडवा उतार देगी। वहाँ से फ़ेरी वालों की बस आपको उसी किराए में अलीबाग़ तक ले जाएगी। अलीबाग़ से 65 किलोमीटर की दूरी पर मरुद गाँव है। अलीबाग़ से मुरुद सरकारी बस से जाया जा सकता है या आप टैक्सी या ऑटो से भी 2000-2500 में जाना-आना कर सकते हैं। आपको यदि रुकना है तो रास्ते में काशिद समुद्री बीच पर होटेल गेस्ट हाउस मिल जाते हैं। अलीबाग़ से स्कूटर या बाइक भी 600 रुपए प्रतिदिन किराए पर मिल जाती हैं। आपके पास ड्राइविंग लाइसेंस होना चाहिए। काशिद के आगे ख़ोराबंदर गाँव हैं वहाँ से ज़ंजीरा क़िला तक जाने-आने का फेरि शुल्क 40 रुपयों का है। ख़ोराबंदर गाँव पहुँचना होगा।
पता चला कि 40 फीट ऊंची दीवारों से घिरा ये किला अरब सागर में एक आइलैंड पर है। इसका निर्माण अहमदनगर सल्तनत के मलिक अंबर की देखरेख में 15 वीं सदी में हुआ था। 15 वीं सदी में राजापुरी (मुरुद-जंजीरा किले से 4 किमी दूर) के मछुआरों ने खुद को समुद्री लुटेरों से बचाने के लिए एक बड़ी चट्टान पर मेधेकोट नाम का लकड़ी का किला बनाया। इस किले को बनाने के लिए मछुआरों के मुखिया राम पाटिल ने अहमदनगर सल्तनत के निज़ाम शाह से इजाज़त मांगी थी।
बाद में अहमदनगर सल्तनत के थानेदार ने इस किले को खाली करने कहा तो मछुआरों ने विरोध किया। फिर अहमदनगर के सेनापति पीरम खान एक व्यापारी बनकर सैनिकों से भरे तीन जहाज लेकर पहुंचे और किले पर कब्ज़ा कर लिया। पीरम खान के बाद अहमदनगर सल्तनत के नए सेनापति बुरहान खान ने लकड़ी से बने मेधेकोट किले को तुड़वाकर उसकी जगह पत्थरों से किला बनवाया।
इसके नाम में ही इसकी खासियत छिपी है दरअसल जंजीरा अरबी भाषा के ‘जजीरा’ शब्द से बना जिसका अर्थ होता है टापू। यमन और इथियोपिया से अफ़्रीकन हब्सी लोगों ने समुद्री लुटेरों से व्यापारिक जहाज़ों को सुरक्षा देने के लिए एक समुद्री सेना तैयार की थी वे हिंदुस्तान से अरब तुर्की होते हुए यूरोप की समुद्री यात्राओं को शुल्क लेकर सुरक्षा देते थे। उन्होंने मछुआरों से इसे हथिया लिया।
यह रहस्मयी किला जंजीरा के सिद्धियों की राजधानी हुआ करता था, अंग्रजों और मराठा शासकों ने इस किले को जीतने का काफी प्रयास किया, लेकिन वह अपने इस मकसद में कामयाब नहीं हो पाए। इसकी अजेयता का कारण ये भी है की पुराने समय में पानी के रास्ते इस किले तक पहुंचना बेहद मुश्किल काम था और जब कोई सेना इसकी तरफ बढती थी तब किले में मौजूद सेना आराम से दुश्मनों को हरा देती थी। इस किले पर 20 सिद्दीकी शासकों ने राज किया। अंतिम शासक सिद्दीकी मुहम्मद खान था, जिसका शासन खत्म होने के 330 वर्ष बाद 3 अप्रैल 1948 को यह किला भारतीय सीमा में शामिल कर लिया गया।
जब से मराठों का इतिहास पढ़ा था तबसे मुरूड़ का सिद्दी ज़ंजीरा क़िला देखने की बड़ी इच्छा थी। जिसे शिवाजी, बाज़ीराव और अंग्रेज़ नहीं जीत सके थे उसमें कोई ख़ासियत तो होगी। यह क़िला मुंबई से लगभग 200 किलोमीटर की दूरी पर अरब सागर के तट पर स्थित है। दादर से या बांद्रा से पनवेल जाएँ फिर पनवेल से 110 किलोमीटर बस से अलीबाग़ पहुँचें। अलीबाग़ से बाद, टैक्सी या ऑटो द्वारा मुरुड़ और आख़िर में ख़ोराबंदर से कश्ती द्वारा ज़ंजीरा क़िला पहुँचा जा सकता है। यह रास्ता लम्बा और समय खपाउ है अतः हमने गेट वे आफ इंडिया से फ़ेरी द्वारा मंडवा होते हुए मुरुड़ जाने का रास्ता चुना।
बताया जाता है कि मुरुद-जंजीरा किले का दरवाजा दीवारों की आड़ में बनाया गया है। जो किले से कुछ मीटर नज़दीक पहुँचने पर दीवारों के कारण दिखाई देना बंद हो जाता है। यही वजह रही है कि दुश्मन किले के पास आने के बावजूद चकमा खा जाते हैं और किले में घुस नहीं पाते हैं। अनेक वर्ष बीत जाने के बाद भी तथा चारों ओर खारा अरब सागर होने के बाद भी यह मजबूती से खड़ा है।
जंजीरा किले का परकोटा बहुत ही मजबूत है, जिसमें कुल तीन दरवाजे हैं। दो मुख्य दरवाजे और एक चोर दरवाजा। मुख्य दरवाजों में एक पूर्व में राजापुरी गांव की दिशा में खुलता है, तो दूसरा ठीक विपरीत समुद्र की ओर खुलता है। चारों ओर कुल 19 बुर्ज हैं। प्रत्येक बुर्ज के बीच 90 फुट से अधिक का अंतर है। किले के चारों ओर 500 तोपें रखे जाने का उल्लेख भी कहीं-कहीं मिलता है। इन तोपों में कलाल बांगड़ी, लांडाकासम और चावरी तोपें आज भी देखने को मिलती हैं।
हम मलाड में रुके थे। वहाँ से लोकल ट्रेन द्वारा चर्चगेट पहुँचना है। टिकट ख़रीद कर चर्चगेट तरफ़ जाने वाली ट्रेन के प्लेटफ़ॉर्म पर इंतज़ार करने लगे। दो-तीन लोकल दनदनाते निकल गईं। तब एक लोकल आकर रुकी। भीड़ में चढ़ने की कोशिश की लेकिन जहां खड़े थे, वहीं खड़े रह गए। अगली ट्रेन के इंतज़ार में वहीं खड़े रहे कि अब तो सबसे पहले चढ़ लेंगे। जब अगली ट्रेन आई तो उतरने वाली भीड़ के रेले में हम पीछे खिसक गए और ट्रेन रवाना हो गई। इसके बाद टेकनिक समझ आई कि गेट के सामने न खड़े होकर कोने में रहो और ट्रेन आते ही हैंडल पकड़ कर घुस जाओ। यह तरीक़ा कामयाब रहा। ट्रेन में घुस गए परंतु चारों तरफ़ से लोग आलिंगन बद्ध खड़े हुए थे। बड़ा अजीब लगा। नज़र घुमा कर चारों तरफ़ देखा तो दूर कोने में एक सीट ख़ाली दिखी, जिसे एक सवारी ने अभी-अभी छोड़ा था। जब तक वहाँ पहुँचते, वह भर गई। वहाँ खड़े होकर सवारियों के उनींदा और थके चेहरे देखते रहे। अगली स्टेशन आने पर दो सीट ख़ाली हुईं। तब बैठने का सुख नसीब हुआ। हमारे बाजू की सीट पर एक महिला थी। कौतूहल वश उनसे पूछा- कहाँ तक जाएँगी?
उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया।
हमने पूछा- चर्चगेट जाएँगी। वे बोलीं- हओ.. तो।
वहाँ काम करती हैं, क्या?
न बाबा, पानी पीने को जाती।
हमें मारे गर्मी के पसीना निकल रहा थे। हमने पानी की बोतल निकाल गटागट पी लिया और अन्य सवारियों की तरह ऊँघने लगे। चर्चगेट का इतिहास याद आने लगा।
पुर्तगाल ने 1661 में ब्रागांजा की रानी कैथरीन के दहेज के हिस्से के रूप में बॉम्बे को ब्रिटिश क्राउन को उपहार में दिया था। 1818 तक बॉम्बे से लगा थाने मराठों के क़ब्ज़े में था। जिसे तीसरे आंग्ल-मराठा युद्ध में अंग्रेजों ने जीत लिया। तब उन्होंने बॉम्बे में एक क़िला बनाया। अंग्रेजों द्वारा निर्मित किले के क्षेत्र में तीन मुख्य द्वार थे। इनमें से एक द्वार सीधे सेंट थॉमस कैथेड्रल चर्च की ओर जाता था, इसलिए इसका नाम “चर्च गेट” रखा गया। इस गेट को 1860 में ध्वस्त कर दिया गया था। बाद में चर्चगेट रेलवे स्टेशन को 1870 में ध्वस्त गेट की स्थिति के करीब बनाया गया था। चर्चगेट स्टेशन मुंबई उपनगरीय रेलवे की पश्चिमी रेलवे लाइन का एक टर्मिनस है। यह शहर का सबसे दक्षिणी स्टेशन है, पहले कोलाबा सबसे दक्षिणी स्टेशन था, रेल लाइन को चर्चगेट तक बढ़ा दिया गया था, जिससे चर्चगेट सबसे दक्षिणी स्टेशन बन गया।
बंबई, बड़ौदा और मध्य भारत रेलवे (वर्तमान पश्चिम रेलवे) का उद्घाटन 1855 में अंकलेश्वर और उतरन (29 मील की दूरी) के बीच रेल लाइन (बीजी) के निर्माण के साथ हुआ था। 1859 में इस लाइन को पश्चिमी तट पर बम्बई तक बढ़ा दिया गया था। 1867 तक, मरीन लाइन्स के पास “बॉम्बे बैकबे” नामक स्टेशन तक, ग्रांट रोड स्टेशन से आगे, फोरशोर के साथ एक ट्रैक का निर्माण किया गया था। 12 अप्रैल 1867 को पहली उपनगरीय ट्रेन विरार से बॉम्बे बैक बे तक एक-एक ट्रेन के साथ शुरू की गई थी। स्टेशनों का नाम तब रखा गया था, “विरौर, नीला, बेसिन, पंजे, बोरेवाला, पहाड़ी, अंडारू, सांताक्रूज, बंडोरा, माहिम, दादूर, ग्रांट रोड और बॉम्बे बैकबे”।
वर्ष 1870 में, चर्चगेट का पहली बार स्टेशन के रूप में उल्लेख किया गया था। लाइन आगे 1872 में कोलाबा की ओर बढ़ी और वहां माल शेड बनाया गया। वर्ष 1896 में, यात्री और उपनगरीय दोनों लाइनों के लिए टर्मिनस के रूप में काम करने के लिए कोलाबा में एक नया स्टेशन स्थापित किया गया था। बॉम्बे सरकार ने रेलवे को चर्चगेट और कोलाबा के बीच रेल लाइन के सेक्शन को सौंपने का आदेश जारी किया। इसलिए, बॉम्बे सेंट्रल (मुंबई सेंट्रल), बेलासिस ब्रिज के पास एक नया स्टेशन बनाया गया था, जिसे 18 दिसंबर 1930 को खोला गया था। 31 दिसंबर की मध्यरात्रि से, कोलाबा एक टर्मिनस नहीं रहा। सोचते-सोचते चर्चगेट स्टेशन आ गया। पूरी ट्रेन ख़ाली हो गई। हम भी उतर कर बाहर आए। एक टैक्सी से गेट वे आफ इंडिया पहुँचे। एक नाव तुरंत छूट रही थी। टिकट लेकर सवार हो गये।
मई का महीना मुंबई में बेचैनी पैदा करने वाली ऊमस का होता है। सूर्य पूरी तैयारी के साथ सुबह आठ बजे से मानसूनी बादल बनाने के लिए अरब सागर के अथाह जल पर अपनी सीधी किरणें बिखेर कर भाप बनाने में व्यस्त था। जितना पानी आप पीते हैं उससे अधिक पसीने के रूप में निकलता जाता है। हम अस्सी रुपयों की फ़ेरी टिकट के साथ चार-चार बोतल पानी के ख़रीद कर पिट्ठु बेग में लेकर आठ बजे के आसपास नाव पर सवार हो गए। नाव पूरी भर चुकी थी, बिलकुल आगे की कुर्सी ख़ाली दिखीं जिन पर धूप पड़ रही थी शायद इसीलिए ख़ाली रह गईं थीं। उन पर जाकर बैठ गये।
गले में पानी गटकने और पसीना बहाने का दौर शुरू हुआ जो रुकने का नाम नहीं ले रहा था। पसीने से गमछा निथर गया तो उसे निचोड़ कर फिर काम पर लगा दिया। फ़ेरी की शीटी बजी और नाव चल पड़ी, हमने भी पराँठे सब्ज़ी निकाली, हमारे मुँह चल पड़े। नाव उत्तर-पूर्व की दिशा में जा रही थी, सूर्य सीधा सामने था। पानी ख़त्म होने लगा तो हमने संतरे की गोलियाँ चूसना शुरू कर दिया। चारों तरफ़ पानी में सामान ढोने वाले जहाज़ों के बीच से हिचकोले खाती हमारी कश्ती मंज़िल की ओर बढ़ी जा रही थी। साढ़े नौ बजे मंडवा पहुँचे। अग्निसाक्षी फ़िल्म इसी मंडवा की पृष्ठभूमि पर फ़िल्माई गई थी। घनी हरियाली में नारियल, केले, आम और दीगर पेड़ पेड़ों से ठंडी हवा और ख़ुश्बू से नाव की गर्मी और पसीना रफ़ूचक्कर हो गए।
मंडवा में कश्ती वालों की बस खड़ी थी, उसमें सवार हुए। बस के चलने से ठंडी हवा में सुहाना सफ़र शुरू हुआ। दाहिनी तरफ़ अरब सागर की लहरें और बाईं तरफ़ फल फूल से लदे बग़ीचे। पानी की कोई कमी ना होने से भरपूर फ़सल खड़ी थी, बाज़ारों में हर चीज़ किफ़ायती दामों पर मिल रही थी। साढ़े दस बजे के आसपास रायगढ़ जिले की तहसील अलीबाग़ पहुँचे। अलीबाग़ तहसील में समुद्री किनारों पर अनेकों बीच हैं। हर घर में गेस्ट हाउस के बोर्ड लगे हुए हैं।
अलीबाग़ से ज़ंजीरा क़िला जाने-आने के बारे में पूछा तो पता चला कि सरकारी बस सुबह, दोपहर, शाम को जाती है। स्कूटर 600 प्रतिदिन की दर से किराए पर मिलते हैं। अलीबाग़ से ज़ंजीरा साठ किलोमीटर है, याने एक सौ बीस किलोमीटर की यात्रा, वो भी चिलचिलाती धूप में, मुश्किल थी। विचार त्याग दिया। एक टैक्सी ड्राइवर से किराया पूछा वह बोला ज़ंजीरा जाने-आने के 2500/- रुपए लगेंगे। आख़िर में एक टेम्पो वाले से बात की तो वह 1700/- में तैयार हो गया।
टेम्पो में सवार हुए, चिकनी सड़क पर सरसराते चल पड़ा। कठल, आम, केले और नारियल के घने पेड़ों के बीच छोटे-छोटे मकान, कुछ नए और कुछ सदियों पुराने स्वागत हेतु फलों से लदे होने से झुककर अभिवादन करते लग रहे थे। सड़क किनारे ताज़ी मछली, सूखी मछली और समुद्री झींगों का अम्बर लगा था। चिकनी चिपटी ट्रम्पेट मछली तीस से पचास रुपए किलो। यह रास्ता समुद्री मरीन प्रोडक्ट का स्वर्ग है। रास्ते में कहीं न रुके, सीधे मुरुड़ के अरब सागर किनारे स्थित खाराबंदर पहुँचे, वहाँ से स्याह ज़ंजीरा क़िला सामने दिख रहा था।
सुमिता बिटिया को कहा कि तुम टिकट काउंटर से टिकट लो हम नाव में जगह बनाते हैं। उसके लाइन में लगते ही बाक़ी तीन लोग झटके से नाव में जगह लेकर जम गए, नाव चलने को तैयार हो गई और चल भी दी लेकिन सुमिता टिकट लेकर नहीं आई तो हमने नाव चालक को रोका। वह बोला कि आपके पास टिकट है या नहीं, हमने सिर हिलाकर ना का इशारा किया तो उसने तुरंत वापिस नाव पलटा कर हमें किनारे उतार कर बताया कि पहले टिकट लीजिए और जिस नाव में जाएँगे उसी में वापस आएँगे। क़िला घूमने के किए चालीस मिनट मिलेंगे। आप अगली नाव का इंतज़ार करिए।
हम सब वापस फ़ेरीवालों की भीड़ में पहुँचे। शिकंजी, गन्ना रस के बाद बर्फ़ का गोला वग़ैरह चखते रहे। आपके लिए आज जो बाज़ार में सबसे सस्ता स्थानीय मौसमी फल बिक रहा है, वही सबसे स्वास्थ्यपरक है। क्या ज़रूरत है कि आप ढाई सौ रूपये के किसी विदेशी एनर्जी ड्रिंक के प्रति लालायित हों ? दूर देश से ला कर बेचा जा रहा फल केवल फल नहीं है, वह ट्रांसपोर्ट का भाड़ा और पैकेजिंग का सामान भी बन चुका है। यक़ीनन महँगा बिकेगा, निश्चित ही व्यापारी एग्ज़ॉटिक के नाम पर उसकी मुँहमाँगी क़ीमत वसूलेंगे।
स्थानीयता और ऋतु-अनुकूलन भोजन में जितना रख सकें, रखिए। चिन्तन से बौद्धिक बनिए, जागरूकता से भी, फ़्रांसीसी क्रान्ति को समझना एक बात है, फ़्रांस का मेकअप रोज़ लगाकर पर्यावरण को हानि पहुँचाना दूसरी। अमेरिका के आज़ादी आंदोलन से लेने को जो कुछ है, उसे विचारात्मक रखिए। भोगात्मक चीज़ें यथासम्भव देशी ही स्वास्थ्यसम्मत हैं। हम उनसे कह सकते हैं कि हम तुमसे आइंस्टाइन ले लेंगे, पर तुम्हारा मैकडॉनल्ड तुम्हें मुबारक़।
तक़रीबन एक बजे नाव में सवार हुए, पंद्रह मिनट में क़िले के नज़दीक पहुँच कर नाव थम गई। बड़ी नाव क़िले से थोड़ी दूर छोड़नी पड़ी। क्योंकि क़िले के गेट पर दूसरी नाव एक डोंगी में सवारियों को बिठा रही थी। नाव के नाविकों ने इस समय का उपयोग गाइड सेवा के बहाने चार लोगों पर चार सौ रुपए वसूलना शुरू किया जबकि क़िले पर गाइड जैसी सेवा की कोई ज़रूरत नहीं थी, बहुत थोड़ा सा इतिहास था जो कि हमें पता था। जब पहले वाली नाव चली गई तब हमारी नाव के पास एक डोंगी आई जिसमें बीस-बीस लोग बैठकर क़िले की दीवारों से टकरा कर मचलती लहरों के बीच क़िले की सीढ़ी पर उत्तर कर अंदर घुसे। हुसैन शाह का मक़बरा देखा, तोपें, महल, मीठे पानी की झील, मस्जिद और तहख़ाने के साथ मकानों के खंडहर देखकर वापस गेट पर पहुँचे। पहले डोंगी फिर नाव में बैठकर किनारे आ लगे।
आठ सौ सालों से यह क़िला अरब सागर की लहरों तूफ़ानी सैलाबों को सहता हुआ अपराजेय अचल खड़ा है क्योंकि सामान्य परिस्थितियों में वहाँ पहुँचना कठिन है तो फिर तोपों के गोलों और बंदूक़ों की गोलियों की बौछारों के बीच कोई वहाँ कैसे पहुँच सकता है। इसके अपराजेय रहने का एक और कारण है कि इसके तटीय इलाक़े में अच्छी जलवायु से भरपूर खेती होती है, उस इलाक़े पर क़ब्ज़ा करने के बाद क़िले के सैनिकों को किनारे पर न आने देने की नीति से क़िले को जीतने की ज़रूरत नहीं रह जाती थी। लेकिन मुख्य भूमि से अलग थलग होने के कारण थोड़े दिनों के बाद विजेता इलाक़े को छोड़कर चले जाते थे।
वापसी में यातायात का क्रम पलट गया। टेम्पो से अलीबाग़, बस से मंडवा, नाव से गेट वे आफ इंडिया और लोकल से मालाड। नाव से गेट वे आफ इंडिया जाते समय समुंदर में ज्वार उठना शुरू हो चुका था। बड़े पल्लर नाव को बूटी तरह हिला रहे थे। कुछ लोग सी सिकनेस के शिकार होकर उल्टियाँ करने लगे। यात्रियों का सामान एक जगह से दूसरी जगह तेज़ी से खिसकने लगा। सीट को कसकर पकड़ बैठे रहे। किनारे पहुँचते-पहुँचते आठ बज चुके थे। बम्बई रोशनी में नहा रही थी। चर्चगेट स्टेशन पर ख़ाली खड़ी लोकल में सवार होकर नींद आने लगी। एक झपकी में दादर पहुँच गए और दूसरी में मलाड पहुँच गए।
☆ मनाचे श्लोक – एक सार्वकालिक ‘मनोपनिषद’… – श्लोक ११९ आणि १२० ☆ श्री विश्वास देशपांडे ☆
श्लोक क्र. ११९ – – –
अजामेळ पापी तया अंत आला ।
कृपाळूपणे तो जनीं मुक्त केला ।
अनाथासि आधार हा चक्रपाणी ।
नुपेक्षी कदा देव भक्ताभिमानी ।।११९।।
अर्थ : अजामेळ या पापी व्यक्तीचा अंत जवळ आला तेव्हा अत्यंत कृपाळूपणाने भगवंताने त्याला मुक्त केले. भगवंत अनाथ व्यक्तींचा नाथ असून तो त्यांचे रक्षण करतो. आपल्या भक्तांचा देव अभिमानी असून त्यांची कधीही उपेक्षा होऊ देत नाही.
(चक्रपाणी – हातात चक्र धारण केलेला /भगवंत)
विवेचन : आधीच्या ९५ व्या श्लोकात देखील अजामेळाचा उल्लेख आला आहे. नामस्मरणाचा महिमा स्पष्ट करताना समर्थ पुन्हा अजामेळाचे उदाहरण देतात. अजामेळ हा चरित्रहीन, पापी माणूस होता. विवाहबाह्य संबंधातून त्याला अनौरस संतती झाली होती. त्यातील त्याच्या धाकट्या मुलाचे नाव नारायण होते. हा नारायण त्याचा विशेष लाडका होता. अजामेळाने आयुष्यभर भगवंताचे नाम घेतले नाही. आता त्याचा अंत जवळ आला होता. अशा प्रसंगी त्याचा लाडका पुत्र नारायण जवळ नव्हता. त्याची आठवण येऊन त्याने ‘ नारायण, नारायण ‘ हाका मारायला सुरुवात केली. त्याचा मृत्यू समीप आल्याने त्याचे प्राण हरण करण्यासाठी यमदूत आले. परंतु त्याचवेळी तो नारायणाचे नाव घेत असल्याने विष्णुदूत देखील त्या ठिकाणी आले.
विष्णुदूत आल्याचे पाहून यमदूत परत गेले. आपण केवळ योगायोगाने का होईना पण भगवंताचे नाम घेतले. परंतु त्या नामाचा एवढा महिमा पाहून अजामेळाला आपल्या आतापर्यंतच्या वागण्याचा पश्चात्ताप झाला. भगवंताच्या नामाशिवाय आपण व्यर्थ जीवन घालवले असा बोध त्याला या प्रसंगावरून झाला. तो तेव्हापासून भगवंताची भक्ती करू लागला. आणि आपल्या अंतकाळी भगवन्नामाने उद्धरून गेला.
भगवंत हा अनाथांचा नाथ आहे. जे असहाय आहेत, ज्यांना कोणी नाही अशांचा तो आधार आहे. तो त्यांचे रक्षण करतो. तो आपल्या भक्तांचा कैवारी आहे.
या श्लोकातून नामस्मरणाचा महिमा सांगतानाच समर्थांनी हे स्पष्ट केले आहे की केवळ अंतकाळी नाम घेतल्याने कोणी उद्धरून जात नाही. दुसरी गोष्ट म्हणजे ज्याने आयुष्यात कधीच भगवंताचे नाम घेतले नाही, त्याच्या मुखात अंतकाळी भगवंताचे नाम येण्याची सुतराम शक्यता नाही. तेव्हा आपण आपल्या अंतकाळी भगवंताचे नाम घेऊ आणि उद्धरून जाऊ असे जर कोणाला वाटत असेल तर त्यात काही अर्थ नाही. पेरलेच नाही तर उगवणार कसे?
जशी सज्जनांना आणि भगवंताच्या भक्तांना त्याची कृपा प्राप्त होते, तसाच त्याच्या कृपेचा अधिकार दुर्जनांना देखील असतो. परंतु हे केवळ तेव्हाच घडते जेव्हा त्या व्यक्तीला आपल्या वागण्याचा पश्चात्ताप होतो. आणि जेव्हा ती व्यक्ती आर्ततेने भगवंताचे नाम घेऊ लागते तेव्हाच भगवंत येऊन अशा व्यक्तींचा उद्धार करतो.
स्वसंवाद :
१. मी केवळ संकटाच्या वेळी किंवा आयुष्याच्या शेवटी भगवंताचे नाम घेण्याची वाट पाहत आहे, की आजपासूनच जाणीवपूर्वक नामस्मरण करत आहे?
२. अजामेळाप्रमाणे माझ्या हातून काही चुका झाल्या असतील, तर ‘पश्चात्ताप’ होऊन स्वतःला सुधारण्याची आणि भक्तीमार्गावर चालण्याची तयारी मी ठेवली आहे का?
३. “देव अनाथांचा नाथ आहे आणि भक्ताभिमानी आहे” यावर विश्वास ठेवून, मी संसारात स्वतःला एकटे किंवा असहाय्य समजून निराश होणे सोडले आहे का?
४. माझे देवाचे नाम घेणे केवळ यांत्रिक आहे, की त्यात अजामेळाला शेवटी जी जाणवली ती ‘आर्तता’ आणि भगवंतप्राप्तीची ओढ आहे?
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श्लोक क्र. १२० – – –
विधीकारणे जाहला मछ वेगीं ।
धरी कूर्मरूपे धरा पृष्ठभागी ।
जना रक्षणाकारणे नीच योनी ।
नुपेक्षी कदा देव भक्ताभिमानी ।।१२०।।
अर्थ : ब्रह्मदेवासाठी भगवंताने तत्परतेने मत्स्यरूप धारण केले. कूर्मावतारात पृथ्वी पाठीवर घेऊन तिचे रक्षण केले. जनांचे कल्याण व्हावे म्हणून त्याने नीच योनीत जन्म घेणे देखील स्वीकारले. आपल्या भक्तांचा अभिमानी असलेला भगवंत त्यांची कधीही उपेक्षा करीत नाही.
विवेचन : या एकाच श्लोकात परमेश्वराच्या तीन अवतारांचा उल्लेख आला आहे. मत्स्यावतार, कूर्मावतार आणि वराह अवतार. त्यामुळे या श्लोकाचा अर्थ लक्षात येण्यासाठी या पौराणिक कथा थोडक्यात जाणून घेऊ या. ब्रह्मदेव वेदांच्या साहाय्याने सृष्टीची पुनर्निर्मिती करतात. म्हणून वेद हे सृष्टीचे निर्माते आहेत. २५ व्या कल्पाच्या वेळी ब्रह्मदेव निद्राधीन असताना हयग्रीव नावाच्या राक्षसाने वेद पळवले. ते घेऊन तो प्रलयसागरात लपून बसला. ब्रह्मदेवांना हे कळल्यानंतर त्यांनी भगवान विष्णूंना वेदांचे रक्षण करण्याची प्रार्थना केली. त्यावेळी भगवंताने तत्परतेने मत्स्यावतार धारण केला. हयग्रीव दैत्याशी युद्ध करून त्याचा वध केला आणि त्याच्या ताब्यात असलेले वेद सोडवून आणले.
दुसरी कथा भगवंताच्या कूर्मावताराची आहे. समुद्रमंथनाच्या वेळी देव आणि दानवांनी मंदार पर्वताचा रवी म्हणून घुसळण्यासाठी वापर केला. परंतु हा मंदार पर्वत आपल्या भारामुळे समुद्रात बुडू लागला. तेव्हा भगवंताने कूर्मावतार धारण करून मंदार पर्वताचा भार आपल्या पाठीवर घेतला. त्यानंतरच समुद्रमंथन शक्य झाले. परंतु येथे ही कथा समर्थांना अभिप्रेत नसावी. भगवंतानेच निर्माण केलेली ही धरा म्हणजे पृथ्वी आपल्याच वजनामुळे समुद्रात बुडू लागली. त्यावेळी सगळेच जीवन नष्ट होण्याचा धोका होता. अशा वेळी भगवंताने कासवाचे रूप धारण केले आणि पृथ्वीला आपल्या पाठीवर तोलून धरले असेही स्पष्टीकरण काही ग्रंथांमध्ये आढळते. काही विद्वानांनी या कथेला मान्यता दिली आहे. हीच कथा या ठिकाणी समर्थांना अपेक्षित असावी. हाच भगवंताचा कूर्मावतार. त्यामुळे पृथ्वी बुडण्यापासून वाचली.
भगवंताचा तिसरा अवतार वराह रूपातील आहे. हिरण्याक्ष नावाचा महाबलवान दैत्य होता. त्याने पृथ्वी पाताळामध्ये पळवून नेली. तेव्हा पृथ्वीचे त्याच्यापासून रक्षण करण्यासाठी विष्णूने वराह अवतार धारण केला. पाताळात जाऊन हिरण्याक्षाचा वध केला. आपल्या सुळ्यांच्या साहाय्याने पृथ्वी पाताळाबाहेर आणून ठेवली. वराह योनी हा पशूंमधील देखील नीच जन्म मानला जातो. परंतु लोकांच्या कल्याणासाठी विष्णूला वराह रूप देखील धारण करावे लागले.
आपल्या भक्तांच्या रक्षणासाठी किंवा जगाच्या कल्याणासाठी भगवंत किती तत्पर असतो हेच या पौराणिक कथा दाखवतात. ज्या भगवंताने अत्यंत बलवान अशा दैत्यांचा विनाश केला, प्रचंड असा पृथ्वीचा भार आपल्या पाठीवर किंवा सुळ्यांवर तोलून धरला. त्याला आपल्या भक्तांचे रक्षण करणे किंवा उद्धार करणे कठीण नाही. देव भक्ताभिमानी आहे, भक्तांचा कैवारी आहे. तो त्यांची कधीही उपेक्षा करीत नाही हेच समर्थ या श्लोकातून आपल्याला सांगतात.
स्वसंवाद :
१. वेदांच्या रक्षणासाठी मत्स्यरूप धारण करणारा परमेश्वर संकटाच्या वेळी मला देखील सावरण्यासाठी कोणत्याही रूपात माझ्या मदतीला धावून येईल, असा अढळ विश्वास माझ्या मनात आहे का?
२. कूर्मावतारात पृथ्वी बुडू लागताच तिचा भार भगवंताने आपल्या पाठीवर घेतला. त्याप्रमाणे संसारसागरात मी बुडत असताना भगवंत मला आधार देईल याची खात्री मला वाटते का?
३. भगवंताने जनांच्या कल्याणासाठी ‘वराह’ (नीच योनी) जन्म घेण्यासही संकोच केला नाही, तर मी समाजहिताच्या कामात माझा खोटा अहंकार बाजूला ठेवून नम्रतेने काम करतो का?
४. ‘देव भक्ताभिमानी आहे’, हे जाणून मी माझ्या रोजच्या जीवनातील व्यर्थ चिंता सोडून देऊन स्वतःला ईश्वराच्या भक्तीवर पूर्णपणे सोपवून दिले आहे का?
(डा. मुक्ता जीहरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य” के माध्यम से हम आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी की मानवीय जीवन पर आधारित एक विचारणीय आलेख ज़बर्दस्ती नहीं ज़बर्दस्त। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की लेखनी को इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें।)
(डॉ मुक्ता जी द्वारा रचित एक भजन – मैं तो गुरुवर के गुण गाऊं / स्वर- वंदना शर्मा, सौजन्य – रुखसार चैनल)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य # ३४१ ☆
☆ ज़बर्दस्ती नहीं ज़बर्दस्त… ☆ डॉ. मुक्ता ☆
जीवन एक यात्रा है, इसे ज़बर्दस्ती नहीं ज़बर्दस्त तरीके से तय करें। जीवन अनमोल है, जो मानव को चौरासी लाख योनियों के पश्चात् प्राप्त होता है। यह प्रभु की नियामत है; इसका सम्मान करें तथा जो परमात्मा ने आपको दिया है, उसमें संतोष रखें व प्रसन्न रहें। संतोष जीवन की सबसे बड़ी पूंजी है और आशाओं का दामन बहुत विस्तृत है; जिनका पेट कभी नहीं भरता है। सो! मानव को इनके हाथों का खिलौना नहीं बनना चाहिए। सो! सार्थक जीवन जीने के लिए हमें अपनी इच्छाओं पर अंकुश लगाना आवश्यक है। मन चंचल है। यह पल-भर में तीन लोकों की यात्रा कर लौट आता है और हमें आजीवन उलझाए रखता है। अक्सर इंसान अपने दु:ख से दु:खी नहीं होता; दूसरों के सुखों को देखकर हैरान-परेशान रहता है। इसलिए ऐसे इंसान का दु:ख असीम होता है, जो कभी समाप्त नहीं हो सकता। जब तक हमारे अंतर्मन में संतोष नहीं होगा; हमारी भटकन का अंत नहीं होगा और हम उस चक्रव्यूह से बाहर नहीं आ पाएंगे।
जीवन सुख-दु:ख का मेला है/ जिसमें हर इंसान अकेला है। सुख-दु:ख मेहमान हैं; आते-जाते रहते हैं। सुख में वे हमारे जीवन का हिस्सा होते हैं, परंतु वे मेहमान की भांति थोड़ा समय विश्राम कर अपनी डगर पर चल पड़ते हैं। सुख में फूलना व दु:ख में अपना आपा खो बैठना हमारी उन्नति में बाधक है। इसलिए हमें हर स्थिति में सम रहना चाहिए। संसार मिथ्या है और मानव जीवन नश्वर। यहां स्थायी कुछ भी नहीं। समय परिवर्तनशील है। मौसम बदलते रहते हैं और इनके अनुसार मन:स्थिति में भी परिवर्तन होता रहता है। सामाजिक प्राणी होने के नाते मानव के लिए एक जैसी स्थिति व एकांत में रहना सज़ा बन जाता है। इसलिए वह अनेक लोगों से संबंध स्थापित करता है। वैसे ईश्वर भी हमारे लिए माता-पिता, परिजन व दोस्तों के रूप में चंद लोगों को भेजता है; जिनसे चाहे-अनचाहे निबाह करना मानव की विवशता होती है। परंतु आजकल कोई भी रिश्ता विश्वास क़ाबिल नहीं रहा। सब संबंध स्वार्थ पर आधारित हैं और रिश्तों पर तो ग्रहण लग गया है, यहां तक कि खून के रिश्तों की गरिमा भी नहीं रही। अपने, अपने बनकर अपनों को छल रहे हैं। माता-पिता, गुरुजन व दोस्त आदि सब शतरंज की बिसात बिछाए बैठे रहते हैं। उनके लिए दो महीने की बालिका और नब्बे वर्ष की वृद्धा में कोई अंतर नहीं है। वे पल-भर की वासना-तृप्ति के लिए सब सीमाओं को लांघ जाते हैं और मासूमों की अस्मिता से खिलवाड़ करना सामान्य-सी बात हो गई है। आजकल तो दुष्कर्म करने के पश्चात् सबूत मिटाने का प्रचलन चल निकला है। ऐसी स्थिति में मानव मन मसोस कर रह जाता है, क्योंकि वह उन दुष्टों का सामना करने में स्वयं को असमर्थ पाता है।
जिस घाव से खून नहीं निकलता, समझ लेना कि वे किसी अपने के दिए गये ज़ख्म हैं; जो आजीवन रिसते हैं, लाइलाज होते हैं और इंसान उनके व्यूह से आजीवन मुक्त नहीं हो पाता। ‘पहाड़ियों की तरह ख़ामोश हैं/ आज के संबंध व रिश्ते/ जब तक हम न पुकारें/ आवाज़ ही नहीं आती।’ आजकल संबंध-सरोकारों की अहमियत रही नहीं। हर रिश्ता ख़ामोश व बेमानी है और मानव आत्मकेंद्रित होकर रह गया है। सब अपने-अपने द्वीप में कैद हैं और चहुंओर विचित्र-सा सन्नाटा पसरा रहता है। वास्तव में अतिव्यस्तता के कारण पति-पत्नी एक-दूसरे को कोंचते व कचोटते रहते हैं। आरोप-प्रत्यारोपण उनकी ज़िन्दगी का हिस्सा बन जाते हैं। धीरे-धीरे उनमें संवादहीनता की स्थिति पनप जाती है, जो सभी रोगों की जड़ है। अजनबीपन का एहसास उन्हें जीने नहीं देता और वे अलगाव की स्थिति में पहुंच जाते हैं। बच्चे व वृद्ध एकांत की त्रासदी झेलने को विवश होते हैं। अक्सर बच्चे नशे की गिरफ़्त में आ जाते हैं और जब तक मानव इस तथ्य से अवगत होता है; बहुत देर हो चुकी होती है और उनके पास प्रायश्चित करने के अतिरिक्त अन्य विकल्प नहीं शेष नहीं बचता।
अहंकार दिखाकर रिश्ते तोड़ने से अच्छा है; क्षमा मांगकर रिश्तों को बचा लेना। अहं रिश्तों में अविश्वास ही नहीं, खटास उत्पन्न करता है। उस स्थिति में अहंकार के कारण परिवार टूटने के कग़ार पर आ जाता है, यहां तक कि सल्तनतें भी बदल जाती हैं। वास्तव में जो अपनों के बिना बीती ‘उम्र’/ जो अपनों के संग बीती ‘ज़िंदगी’। सो! अपनों के अंग-संग रहिए, क्योंकि अपने ही अपनों को उन्नति करते देखकर प्रसन्न ही नहीं होते; उत्साह-वर्द्धन भी करते हैं। जो ऐसा नहीं करते; वे आजीवन दु:खों के भंवर से मुक्त नहीं हो सकते। जीवन में दो प्रकार के लोग ही असफल होते हैं–’जो सोचते हैं और करते नहीं और जो करते हैं सोचते नहीं।’ यह दोनों स्थितियां भयावह हैं। सो! केवल हवाई महल बना लेना कारग़र नहीं, क्योंकि मात्र योजनाएं बनाने वाले लोग बीच अधर लटके रहते हैं। दूसरे लोग उसे अंजाम देने से पहले परिणाम के बारे में सोचते नहीं। इसलिए उनका जीवन कठिनाइयों से भरा रहता है। वे परिवार व समाज के दुश्मन कहलाते हैं। वे अपने साथ, अपने परिवारजनों को भी भंवर अथवा मुश्किल में फंसा देते हैं; जिससे उबर पाना उनके वश में नहीं होता।
जो लोग असफल होने के बाद भी उत्साह व साहस नहीं खोते; जीवन में सफलता प्राप्त करते हैं। असफलता अथवा अनुभव हमारे पथ में बाधक नहीं; मील का पत्थर साबित होते हैं। एडिसन को बल्ब का आविष्कार करते समय अनेक बार असफलता का मुंह देखना पड़ा और उसके दोस्तों ने उसे वह कार्य छोड़ देने की सलाह भी दी। परंतु उसने उत्तर दिया कि अब मुझे उस दिशा विशेष में काम नहीं करना पड़ेगा। इसलिए यह असफलता मेरे लिए मार्गदर्शक है। सो! अंत में उन्हें सफलता प्राप्त हुई।
संदेह मुसीबत के पहाड़ों का निर्माण करता है और विश्वास पहाड़ों से भी रास्तों का निर्माण कर लेता है। जीवन में संदेह, शक़ व संशय को जीवन में कभी दस्तक ना देने दें, क्योंकि वह फ़ासलों को इतना बढ़ा देता है कि उन्हें पाटना असंभव हो जाता है। परंतु यदि आत्मविश्वास सुदृढ़ है, तो वह पर्वतों के बीच रास्तों का निर्माण कर सकता है। दाना मांझी का उदाहरण हम सबके समक्ष है, जिसने बारह किलोमीटर की यात्रा अपनी पत्नी के शव को कांधे पर लादकर की और तत्पश्चात् अकेले उस रास्ते पर सड़क का निर्माण किया, क्योंकि उसका निश्चय दृढ़ था। वह नहीं चाहता था कि सड़क के अभाव में किसी को अपनों के प्राण गंवाने पड़ें।
‘तलाश ना कर मुझे/ ज़मीन और आसमान की ग़र्दिशों में/ अगर तेरे दिल में नहीं/ तो कहीं भी नहीं’ अर्थात् परमात्मा मानव के मन में निवास करता है। उसे बाहर ढूंढने की आवश्यकता नहीं। शुभकामनाएं तभी फलीभूत होती हैं, जब वे तह़ेदिल से निकलें। आपका स्वभाव ही आपका भविष्य है। ‘जाने वो कैसे मुक़द्दर की किताब लिख देता है/ सांसं गिनती की और ख़्वाहिशें बेहिसाब लिख देता है।’ इसलिए मानव को शब्दों को चखकर अथवा प्रेम से बोलना चाहिए, ताकि लोग आपसे बात करना पसंद करें। जिसने दूसरों की ख़ुशी में ख़ुद की ख़ुशी ढूंढने का हुनर सीख लिया है; वह इंसान कभी दु:खी नहीं हो सकता। रिश्ते बरक़रार रखने के लिए कमियां नहीं, अच्छाइयां देखें। अब्दुल कलाम के शब्दों में आप अपना भविष्य नहीं, आदतें बदल सकते हैं; जिनके बदलने से आपका भविष्य बदल सकता है। कटु यथार्थ को बदलने में सकारात्मकता है और झूठी आशाओं के भ्रम में जीने में नकारात्मकता निहित है। इसलिए जीवन में कभी निराश ना हों। यह भी गुज़र जाएगा– आश्वस्त रहें, क्योंकि समय निरंतर परिवर्तनशील है; कभी ठहरता नहीं। इसलिए जीवन को ज़बर्दस्ती नहीं, ज़बर्दस्त तरीके से जीएं। निरंतर संघर्ष करें तथा निराशा का दामन कभी मत थामें। सफलता आपके कदम चूमेंगी। परेशानी व अनुभव से जो सीख मिलती है; वह किसी स्कूल में नहीं मिल सकती। जीवन में सबसे बड़ा थप्पड़ भरोसा मारता है। इसलिए भरोसा व उम्मीद ख़ुद से रखें। ख़ुद से जीतने की ज़िद्द करें; यही जीवन जीने की सर्वोत्तम कला व सर्वश्रेष्ठ अंदाज़ है।
(संस्कारधानी जबलपुर की सुप्रसिद्ध साहित्यकार सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ ‘जी सेवा निवृत्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश, डिविजनल विजिलेंस कमेटी जबलपुर की पूर्व चेअर पर्सन हैं। आपकी प्रकाशित पुस्तकों में पंचतंत्र में नारी, पंख पसारे पंछी, निहिरा (गीत संग्रह) एहसास के मोती, ख़याल -ए-मीना (ग़ज़ल संग्रह), मीना के सवैया (सवैया संग्रह) नैनिका (कुण्डलिया संग्रह) हैं। आप कई साहित्यिक संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत एवं सम्मानित हैं। आप प्रत्येक शुक्रवार सुश्री मीना भट्ट सिद्धार्थ जी की अप्रतिम रचनाओं को उनके साप्ताहिक स्तम्भ – रचना संसार के अंतर्गत आत्मसात कर सकेंगे। आज इस कड़ी में प्रस्तुत है आपका एक अप्रतिम गीत – सृष्टि का आधार नारी…।
रचना संसार # ११४
☆ गीत – सृष्टि का आधार नारी… ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ☆
(डॉ भावना शुक्ल जी (सह संपादक ‘प्राची‘) को जो कुछ साहित्यिक विरासत में मिला है उसे उन्होने मात्र सँजोया ही नहीं अपितु , उस विरासत को गति प्रदान किया है। हम ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि माँ सरस्वती का वरद हस्त उन पर ऐसा ही बना रहे। आज प्रस्तुत हैं – भजन – नवरात्रि।)
(आदरणीय श्री संतोष नेमा जी कवितायें, व्यंग्य, गजल, दोहे, मुक्तक आदि विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं. धार्मिक एवं सामाजिक संस्कार आपको विरासत में मिले हैं. आपके पिताजी स्वर्गीय देवी चरण नेमा जी ने कई भजन और आरतियाँ लिखीं थीं, जिनका प्रकाशन भी हुआ है. आप डाक विभाग से सेवानिवृत्त हैं. आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होती रहती हैं। आप कई सम्मानों / पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत हैं.“साप्ताहिक स्तम्भ – इंद्रधनुष” की अगली कड़ी में आज प्रस्तुत है आपकी समसामयिक विषय पर एक कविता – नवरात्रि पर दोहे… । आप श्री संतोष नेमा जी की रचनाएँ प्रत्येक शुक्रवार आत्मसात कर सकते हैं।)
☆ साहित्यिक स्तम्भ – इंद्रधनुष # ३२२ ☆
☆ नवरात्रि विशेष ☆ नवरात्रि पर दोहे…☆ श्री संतोष नेमा ☆
(बड़ोदा से सुश्री मंजिरी “निधि” जी की गद्य एवं छंद विधा में विशेष अभिरुचि है और वे साथ ही एक सफल महिला उद्यमी भी हैं।
आज प्रस्तुत है आपका आलेख ‘परशुराम जी – ३‘।)
☆ मंजिरी साहित्य # २८ ☆
आलेख – परशुराम जी – ४ ☆ सुश्री मंजिरी “निधि”
सनातन का अध्यात्म: सनातन का अध्यात्म हमें स्व से मिलाने की यात्रा हैl आत्मा का ज्ञान प्राप्त करने की यात्रा हैl उस सत्य से, उस परब्रम्ह से मिलने की यात्रा हैl हमें हमारे वास्तविक स्वरूप से मिलने की यात्रा हैl सनातन हमें इस यात्रा में आगे बढ़ने हेतु हमारी मदद करता हैl सनातन सदा भूतकाल, वर्तमानकाल और भविष्यकाल इन तीनों में अपरिवर्तत होता हैl मनसा, वाचा और कर्मणा से किसी को भी हानि नहीं पहुंचानी चाहिए ये सीख देता हैl सनातन सदैव सत्य बोलने की प्रेरणा देता हैl सनातन, सनक, सनंदन और सनत कुमार नाम के ब्रम्हाजी के चार मानस पुत्र थेl इनमे से सनत और सनातन दोनों का अर्थ हमेशा रहने वाला, चिरकाल तक रहने वाला होता हैl
सनातन हमें आत्मज्ञान, कर्म और पुनर्जन्म, साधना के मार्ग, आंतरिक शांति, प्रकृति से जुड़ाव के साथ जीवन का सच्चा अर्थ क्या है ये समझाता हैl
1- सनातन का आत्मज्ञान : सनातन का आत्मज्ञान समझाता है कि मैं कौन हूँl यह शरीर नश्वर है परन्तु आत्मा अनश्वर हैl मैं यह शरीर नहीं हूँl मैं चैतन्य हूँ जो हमेशा प्रकाशवान चेतना है जो सदैव सुखी रहती हैl
यही कारण है कि हमारे उपनिषदों में बताया गया है कि मैं ही ब्रम्ह हूँl जो वो है मैं भी वही हूँl मैं ही परम सत्य हूँl मैं ही चेतना से परिपूर्ण हूँl मैं सदा ही निरलिप्त हूँl
2- कर्म और पुनर्जन्म : सनातन के अनुसार आत्मा अनश्वर है और यह शरीर नश्वरl हमारे कर्म चाहे वे अच्छे हों या बुरे उसका फल आत्मा अपने अंदर एकत्रित करती रहती है, जिसे हम भाग्य कहते हैंl आज हम जो भी कर्म करते हैं वह हमारे अगले जन्म का प्रारबद्ध तय करता हैl जब हमारी आत्मा इस शरीर को छोड़ नए शरीर में प्रवेश करती है तब आदमी का पुनर्जन्म होता हैl जब वह इस संसार की मोहमाया में लिप्त रहता है तब उसकी अधूरी इच्छाओं को पूरा करने उसे पुनः जन्म लेना होता हैl उसे कर्म करके उनके परिणामों को भुगतने पुनः पुनः जन्म लेना पड़ता हैl और यह चक्र चलता ही रहता हैl इस चक्र से बाहर निकलने सनातन हमें सिखाता है कि कर्म करते रहो और उसके परिणामों को ईश्वर पर छोड़ दो ताकि उसका फल आत्मा अपने अंदर एकत्रित ना कर सकेl इसके साथ सदा इस बात का एहसास दिलाना है कि मैं आत्मा हूँ मैं यह शरीर नहींl ये महसूस होते ही पुराने कर्म कटने लगते हैं और हम मोक्ष की तरफ बढ़ने लगते हैंl
3- साधना के मार्ग : इसे हम चतुर्विध योग भी कहते हैंl
क) – ज्ञान योग – ज्ञान योग में हमें समझाया जाता हैं कि सत्य क्या है और असत्य क्या है? ये हमें शास्त्रों को सुनकर, सुनी बातों पर मनन कर और निरंतन अभ्यास से हमारी प्रेक्टिस में आ जाता हैl
ख) – भक्ति योग – उस परम सत्ता को पूर्णतः स्वयं को समर्पित कर देनाl इसमें नव विधा भक्ति आती हैl
श्रवणं कीर्तनं विष्णोः स्मरणं पादसेवनम्।
अर्चनं वन्दनं दास्यं सख्यमात्मनिवेदनम् ॥
श्रवण, कीर्तन, नामस्मरण, पादसेवन, अर्चन, वंदन, दास्य, सख्य एवं आत्मनिवेदनl
श्रवण : भगवान के गुणगान, उनकी कथाए एवं उनकी लीलाओं का श्रद्धा पूर्वक श्रवण करनाl श्रवण भक्ति हमारे मन को शांति प्रदान करती हैl हमारे विचार सकारात्मक हो जाते हैंl हमारे जीवन के बुरे दिनो में हमारी सहन शीलता बढ़ जाती हैl
कीर्तन : भगवान के गुणगान, उनकी कथाए एवं उनकी लीलाओं को श्रद्धा पूर्वक गायन करनाl कीर्तनकार जब कीर्तन करते हैं तब सुनने वाले वही नाम को दोहराना शुरू करते हैंl साथ में ढ़ोल, मंजीरे, मृदंग, झाँझ, हारमोनियम और तालियों की गूंज के साथ अगरबत्ती, धूप, फूलों की खुशबू वातावरण में सामूहिक ऊर्जा उत्पन्न करती है जो सम्पूर्ण माहौल को धार्मिक और भक्तिमय बना देता हैl
नामस्मरण : ये सबसे सरल भक्ति का प्रकार हैl भगवान के नाम का सतत स्मरण करनाl सोते -जागते, उठते -बैठते, खाते -पीते, सुख में – दुःख में भगवान के नाम को सतत जपते रहनाl नाम स्मरण मन की चंचलता को कम करता हैl मन को स्थिर रखता है और हमारे मन से डर दूर होता हैl
पाद सेवन : वास्तविकता में प्रभु हमारे पास नहीं कि हम उनके चरणों की सेवा कर सकेंl इसीलिए हम मंदिर में जाकर उस परिसर को साफ करते हैंl प्रभु मूर्ति में चरणों को दबाकर उनका आशीर्वाद प्राप्त करते हैंl हम मानस पूजा के माध्यम से भी भगवान के श्री चरणों की सेवा करते हैंl
अर्चन भक्ति : सगुण प्रभु की प्रतिमा या फोटो की पूर्ण भाव भक्ति और पूर्ण पूजा सामग्री के साथ पूजा करते हैंl श्लोक या स्तोत्र गाते हुए पूजा करते हैंl या फिर मानस पूजा करते हैंl
वंदन भक्ति : अहंकार त्याग कर प्रभु के श्री चरणों में शीश नवाकर नमन करते हैंl ऐसा करने से हमारा घमंड चूर चूर हो जाता हैl और हम विनम्र होने लगते हैंl हमारा दूसरों को देखने का दृष्टिकोण ही बदल जाता हैl हम भक्ति के रंग में डूबने लगते हैंl हम सभी प्रभु के अंश हैं इस बात पर हमारा पक्का विश्वास बैठने लगता हैl
दास्य भक्ति : प्रभु हमारे स्वामी हैं और हम उनके दास हैंl हम उनकी सेवा हेतु तत्पर हैंl हम उनकी आज्ञा पालन हेतु तैयार हैंl ऐसा करने से हम बिना फल की चिंता किये हर कर्म को खुशी खुशी करने को राजी हो जाते हैंl
सख्य: अर्थात प्रभु को अपना मित्र मानिएl उससे अपने मन की सभी बातें कीजिएl जिससे मैं और वो एक ही हैं ये बात हमारे जीवन को सार्थक बना देती हैl
आत्मनिवेदन : आत्मिक रूप से प्रभु के सामने आत्मसमर्पण करनाl अर्थात अपने तन से मन से, वाचा से, कर्मो से अपने आपको भगवान को समर्पित करना होता हैl हमारे साथ जो हो रहा है फिर वो अच्छा हो या बुरा वो सब उस प्रभु की इच्छानुरूप हो रहा हैl जैसी प्रभु इच्छाl आत्म निवेदन करते करते भक्त उस महासत्ता में इतना तन्मय हो जाता है कि उसे अपना भान ही नहीं रहताl उसका अपना कोई वजूद ही नहीं बचताl
(श्रीमती शशि सुरेश सराफ जी सागर विश्वविद्यालय से हिंदी एवं दर्शन शास्त्र से स्नातक हैं. आपने लायंस क्लब और स्वर्णकार समाज की अध्यक्षा पद का भी निर्वहन किया. आपका “लेबल शशि” नाम से बुटीक है और कई फैशन शोज में पुरस्कार प्राप्त किये हैं. आपका साहित्य और दर्शन से अत्यधिक लगाव है. आप प्रत्येक शुक्रवार श्रीमती शशि सराफ जी की रचनाएँ आत्मसात कर सेंगे. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता ‘भ्रम / सत्य…‘।)