(वरिष्ठ साहित्यकारश्री अरुण कुमार दुबे जी,उप पुलिस अधीक्षक पद से मध्य प्रदेश पुलिस विभाग से सेवा निवृत्त हुए हैं । संक्षिप्त परिचय ->> शिक्षा – एम. एस .सी. प्राणी शास्त्र। साहित्य – काव्य विधा गीत, ग़ज़ल, छंद लेखन में विशेष अभिरुचि। आज प्रस्तुत है, आपकी एक भाव प्रवण रचना “रब का वो आसरा नहीं पाता…“)
(संस्कारधानी जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर आचार्य भगवत दुबे जी को सादर चरण स्पर्श । वे आज भी हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते हैं। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया है।सीमित शब्दों में आपकी उपलब्धियों का उल्लेख अकल्पनीय है। आचार्य भगवत दुबे जी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व की विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 ☆ हिन्दी साहित्य – आलेख – ☆ आचार्य भगवत दुबे – व्यक्तित्व और कृतित्व ☆.आप निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणा स्त्रोत हैं। हमारे विशेष अनुरोध पर आपने अपना साहित्य हमारे प्रबुद्ध पाठकों से साझा करना सहर्ष स्वीकार किया है। अब आप आचार्य जी की रचनाएँ प्रत्येक मंगलवार को आत्मसात कर सकें गे।
आज प्रस्तुत हैं बुन्देली कविता – “सजनइ होन लगी गुड़ियों की“।)
(हमप्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के आभारी हैं जो साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक की पुस्तक चर्चा” शीर्षक के माध्यम से हमें अविराम पुस्तक चर्चा प्रकाशनार्थ साझा कर रहे हैं । श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी, जबलपुर ) पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। उनका दैनंदिन जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है। इस स्तम्भ के अंतर्गत हम उनके द्वारा की गई पुस्तक समीक्षाएं/पुस्तक चर्चा आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं।
आज प्रस्तुत है इंजीनियर अनिल कुमार अस्थाना जी द्वारा लिखित “स्मृतियों का वोल्टेज: मेरा जीवन : मेरा संघर्ष ” पर चर्चा।
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक की पुस्तक चर्चा# २०२ ☆
☆ “स्मृतियों का वोल्टेज: मेरा जीवन : मेरा संघर्ष” – लेखक : इंजीनियर अनिल कुमार अस्थाना ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆
पुस्तक : स्मृतियों का वोल्टेज: मेरा जीवन : मेरा संघर्ष
लेखक : इंजीनियर अनिल कुमार अस्थाना
चर्चा : विवेक रंजन श्रीवास्तव, भोपाल
☆ स्मृतियों का वोल्टेज: कर्मयोग और जीवंत अनुभवों की प्रेरक साहित्यिक यात्रा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆
कृति ‘स्मृतियों का वोल्टेज: मेरा जीवन, मेरा संघर्ष’, सफल इंजीनियर अनिल अस्थाना जी के करियर का लेखा-जोखा, सिद्धांतों की आंच पर तपे कर्मयोगी के अनुभवों का सार है।
यह आत्मकथा पाठक को उत्तर प्रदेश के एक छोटे से गाँव फुलेस की धूल भरी पगडंडियों से विद्युत मंडल के शीर्ष नीति-निर्धारक पदों तक की शब्द यात्रा पर ले जाती है। पूरी पुस्तक में लेखक ने अपनी स्मृतियों को एक ऐसे प्रवाह में पिरोया है कि पाठक स्वयं को उस कालखंड और उन परिस्थितियों का हिस्सा महसूस करने लगता है।
लेखक ने अपनी जड़ों और पारिवारिक पृष्ठभूमि का चित्रण बहुत ही आत्मीयता और यथार्थ भाव से किया है। उनके पिता द्वारा संघर्षों के बीच गढ़े गए स्वाभिमान और श्रम की गरिमा ने लेखक के व्यक्तित्व की आधारशिला रखी। पंतनगर विश्वविद्यालय में शिक्षा के दौरान ‘श्रम की गरिमा’ के जो पाठ उन्होंने सीखे, चाहे वह घास काटना हो या खेल के मैदान की चुनौतियां, वे उनके आगामी पेशेवर जीवन में मार्गदर्शक सिद्धांत बने।
बीएचयू से उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बाद विदिशा में उनकी पहली पोस्टिंग ने उन्हें यह अहसास कराया कि वास्तविक इंजीनियरिंग फाइलों के बजाय ग्रामीण भारत के उन अंधेरे कोनों में है, जहाँ बिजली की एक किरण जीवन बदल देती है।
लेखक के पेशेवर सफर में रायसेन के घने जंगलों की चुनौतियाँ हों या ग्वालियर की वर्कशॉप में किए गए नवाचार, हर अध्याय उनके ‘लीक से हटकर’ सोचने की क्षमता को दर्शाता है। विशेष रूप से रीवा में उनके कार्यकाल के दौरान भ्रष्टाचार और बिजली चोरों के खिलाफ की गई ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ उनके निर्भीक और स्पष्टवादी चरित्र को रेखांकित करती है।
यह पुस्तक व्यवस्था के भीतर रहकर मेहनत, समर्पण और ईमानदारी के साथ काम करने की जटिलताओं और उनसे उबरने की कला को सादगी से साझा करती है।
लेखक का दक्षिण कोरिया यात्रा का अनुभव और वहां से सीखे गए प्रबंधन के सूत्र भारतीय व्यवस्था को आधुनिक बनाने की उनकी दूरदृष्टि का परिचय देते हैं।
व्यक्तिगत और पेशेवर जीवन के संतुलन को लेखक ने अपनी पत्नी डॉ. नीलम अस्थाना के सहयोग और समर्पण के माध्यम से सुंदर ढंग से व्यक्त किया है। वे स्वीकार करते हैं कि एक सफल जीवन के पीछे पारिवारिक संबल और विश्वास की कितनी बड़ी भूमिका होती है। सेवानिवृत्ति के बाद की उनकी ‘दूसरी पारी’ का विवरण, जिसमें ब्लॉगिंग, अध्यात्म और देश-विदेश की यात्राएं शामिल हैं, यह संदेश देता है कि सक्रियता और रचनात्मकता किसी उम्र की मोहताज नहीं होती।
अंततः, ‘स्मृतियों का वोल्टेज’ एक ऐसी रचना है जो प्रवाही भाषा और रोचक संस्मरणों के माध्यम से पाठकों को प्रेरित करती है। यह केवल एक व्यक्ति की विजय गाथा मात्र नहीं, बल्कि उन सभी ईमानदार अधिकारियों के संघर्षों का प्रतिनिधित्व करती है जिन्होंने सार्वजनिक सेवा में नैतिकता के उच्चतम मानक स्थापित किए। यह कृति युवा पीढ़ी, विशेषकर, उभरते हुए युवा इंजीनियरों के लिए एक ‘प्रकाश-स्तंभ’ की तरह है, जो उन्हें विपरीत परिस्थितियों में भी अपने मूल्यों पर अडिग रहने का हौसला प्रदान करती है।
इस लेखन के लिए मै व्यक्ति गत रूप से मेरे वरिष्ठ आदरणीय अस्थाना जी का अभिनंदन करता हूं। उनसे अब अन्य विभिन्न विधाओं में और भी किताबों की प्रतीक्षा रहेगी, क्योंकि उन्हें सोशल मीडिया पर नियमित पढ़ने मिल रहा है।
संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं सजग अग्रज साहित्यकार श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” जी के साप्ताहिक स्तम्भ “मनोज साहित्य” में आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “कर्तव्य भाव का बोध”। आप प्रत्येक मंगलवार को आपकी भावप्रवण रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे।
मनोज साहित्य # २२० ☆
☆ कर्तव्य भाव का बोध ☆श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” ☆
(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है सामाजिक विमर्श पर आधारित विचारणीय लघुकथा “मापनी”।)
☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २६५ ☆
🌻लघुकथा🌻 मापनी 🌻
वैशाली एक साहित्य साधना में लीन महिला है। गृहणी के साथ ही साथ सभी की सेवा श्रद्धा भावना से करती है।
सृजन करते समय सभी तुकांत पदांत मापनी और विधा का ध्यान रखती है।
सदैव की भांति आज वह फिर अपनी ही खास सखी से छली गई क्योंकि उसे चाटुकारिता, चापलूसी की मापनी, विधा नही आती।
कब दीर्घ लघु बन जाता है और कब दो लघु दीर्घ बन जाते हैं। ये मापनी उसने दोस्ती, संबंधों में शायद नही सीख पाई थी।
(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” आज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)
☆ आलेख # १७७ ☆ देश-परदेश – लस्सी ☆ श्री राकेश कुमार ☆
वैसे तो अपने हर शहर की लस्सी प्रसिद्ध होती हैं। लेकिन गुलाबी शहर का ये लस्सीवाला तो द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति से पूर्व काल (1944) का है। ये भी कह सकते हैं, अंग्रेजों के जमाने का है।
दही की लस्सी को पंजाब वाले अपना आविष्कार मानते हैं। हरियाणा वाले भी हिसार की भैंसों के दूध की दही की लस्सी को विश्व की सर्वोत्तम लस्सी का खिताब देते हैं। आप इसको चंडीगढ़ जैसा मसला मान सकते हैं, या फिर रसगुल्ला के जन्म स्थान बंगाल और उड़ीसा के बीच के विवाद जैसा समझ सकते हैं।
पुराने जयपुर (walled city) और नए शहर के मध्य में मिर्जा इस्माइल रोड पर ये दुकान स्थित है। आस पास में परिवार के अन्य सदस्यों द्वारा भी लस्सीवाला के नाम से मिलते जुलते नाम रख कर लस्सी बेचकर चांदी काटे जा रहे हैं।
लस्सी का सेवन मिट्टी के छोटे और बड़े सिकोरे (ग्लास) में उपलब्ध रहता है। सुबह सात बजे से तीन बजे दोपहर तक या स्टॉक रहने पर ही इसकी सप्लाई चालू रहती है। लस्सी अपेक्षाकृत गाढ़ी रहती है और लकड़ी की चम्मच से खाई भी जाती है। हमारे जैसे तो एक बार मुंह में ग्लास लगाने के बाद पेंदा देखकर ही रुकते हैं। बचपन से ही परिवार में इसका चलन था। दादाजी का एक कांसे का ग्लास जिसकी क्षमता तीन पाव करीब सात सौ मिलीलीटर थी। हमारा भी प्रिय बर्तन हुआ करता था।
युवावस्था में हमारे बैंक की जबलपुर सिटी शाखा से जुड़ी हुई लस्सी की प्रसिद्ध दुकान हुआ करती थी। सन ’75 के आस पास सवा रुपे का एक ग्लास मिलता था। उन दिनों में रेजगारी की किल्लत हुआ करती थी, इसलिए अकेले ही अनेकों बार चार ग्लास गटक जाया करते थे, ताकि रेजगारी की झंझट ही ना हो।
वर्तमान समय में नींबू के भाव कम करने में लस्सी सबसे अचूक हो रहीं हैं। मन में विचार आया, इसकी चर्चा कर लेते हैं, क्योंकि मीठा का सेवन तो अब प्रतिबंधित हो चुका है। कम से कम चर्चा तो कर ही सकते हैं।
(संस्कारधानी जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर डॉ. राजकुमार “सुमित्र” जी को सादर चरण स्पर्श । वे सदैव हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते थे। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया। वे निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणास्रोत हैं। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता – मत समझ हमको पराया…।)
साप्ताहिक स्तम्भ – लेखनी सुमित्र की # २८४ – मत समझ हमको पराया…२
दोस्त! तू भोला भाला था
क्या नहीं तुझको पता था
यह जमाने का पुराना सिलसिला है
चाहने पर क्या मिला है?
मन जिसे चाहे जहाँ
वह वहाँ
मिलता नहीं है,
सड़क
में कीचड़ बहुत होता
पर कमल खिलता नहीं है।
भुला दे दुख दर्द अपना
छोड़ दे रोना कल्पना
एक शायर ने कहा है-
‘मोहब्बत के अलावा भी और गम है।
एक तेरी ही नहीं
दूसरी भी आँख नम हैं।
क्रमशः…
स्व डॉ. राजकुमार “सुमित्र”
साभार : डॉ भावना शुक्ल
112 सर्राफा वार्ड, सिटी कोतवाली के पीछे चुन्नीलाल का बाड़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश
≈ संस्थापकसंपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈
(प्रतिष्ठित कवि, रेखाचित्रकार, लेखक, सम्पादक श्रद्धेय श्री राघवेंद्र तिवारी जी हिन्दी, दूर शिक्षा, पत्रकारिता व जनसंचार, मानवाधिकार तथा बौद्धिक सम्पदा अधिकार एवं शोध जैसे विषयों में शिक्षित एवं दीक्षित। 1970 से सतत लेखन। आपके द्वारा सृजित ‘शिक्षा का नया विकल्प : दूर शिक्षा’ (1997), ‘भारत में जनसंचार और सम्प्रेषण के मूल सिद्धांत’ (2009), ‘स्थापित होता है शब्द हर बार’ (कविता संग्रह, 2011), ‘जहाँ दरक कर गिरा समय भी’ ( 2014) कृतियाँ प्रकाशित एवं चर्चित हो चुकी हैं। आपके द्वारा स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम के लिए ‘कविता की अनुभूतिपरक जटिलता’ शीर्षक से एक श्रव्य कैसेट भी तैयार कराया जा चुका है। आज प्रस्तुत है आपका एक अभिनव गीत “मकड़जाल में...”।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ # २८३ ☆।। अभिनव गीत ।। ☆
☆ “मकड़जाल में...” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी ☆
☆
सुनो चतुर्भुज !
जो मशाल थी –
सुबह जलायी
वही गई बुझ ॥
जो भी रण था
जीत गये तुम ।
फिर भी क्यों
टेढ़ी तेरी दुम ।
साज सँवार
और सामग्री –
राजकोट से जा
पहुँची भुज ॥
दिन का तार –
तम्य है ढीला ।
समझ चुका है
समय हठीला ।
कितने दस्तों*
में बाँधोगे ?
खुल न जायें सब
उनके जुज **॥
कहीं कहीं अस –
हज प्रवृत्ति सा ।
खड़ा हुआअव –
रोध भित्ति सा ।
फिर पहाड़ से
नीचे आकर ।
मकड़जाल में –
उलझा तन्तुज ॥
* एक निश्चित संख्या में इकट्ठे कागज
** पुस्तकाकार छापे जाने के लिये छोटे छोटे समूह में कागज