हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # १९४ – देश-परदेश – कहीं खुशी कहीं ग़म ☆ श्री राकेश कुमार ☆

श्री राकेश कुमार

(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ  की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” आज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)

☆ आलेख # १९४ ☆ देश-परदेश – कहीं खुशी कहीं ग़म ☆ श्री राकेश कुमार ☆

यू पी आई उपयोग पर प्रथम बार टैक्स की घोषणा हुई हैं, इसके दूरगामी परिणाम भी होंगे। कुछ लोग इसका विरोध भी कर रहें है, कुछ खुशियों मना रहें हैं। खुशी और गम सिक्के के दो पहलू होते हैं। जीवन में भी खुशियां और गम साथ साथ ही चलते हैं।

उपरोक्त ए आई द्वारा निर्मित फोटो भी गृहणी की खुशी को लेकर हैं। अखिल भारतीय महिला समाज की प्रवक्ता ने भी इस बात को लेकर हर्ष व्यक्त किया हैं। घर के पुरुष अब अपनी जेबों में कुछ ना कुछ धन राशि छोड़ देंगे, जिसे घर की महिला अपनी पूंजी बना लेगी। भारतीय महिलाओं के नोट बंदी के समय दिए गए सहयोग से सभी परिवार लाभान्वित हुए थे।

फुटकर दुकानदार भी प्रसन्न है, खुले पैसे की कमी से वो जबरन टॉफी इत्यादि की बिक्री कर अतिरिक्त लाभ कमा लेंगे। हमारे मोहल्ले के कुछ दुकानदारों ने तो चिल्लर के बदले अपने कागज के कूपन भी छपवा लिए हैं, ताकि ग्राहक से झगड़ा/ बहस नहीं हो।

यातायात पुलिस कर्मी खुशी के मारे फूले नहीं समा रहें हैं। रिश्वत की राशि अब आसानी से नगद में मिल जाएगी। रेलवे या अन्य सरकारी विभाग जैसे बिजली, पानी के बिल जमा करने के स्थान पर कार्यरत लोग अब रोज़ दिवाली मनाएंगे। उनके पास छूटे पैसे क्या पांच और दस के नोट भी वापिस करने के लिए नहीं होते हैं। चिल्लर की कालाबाजारी करने वाले, आने वाले दिनों की मांग को देखते हुए सक्रिय होने लगे हैं।

निजी क्षेत्र के बड़े शोरूम आदि में अतिरिक्त कैशियर की भर्ती के विज्ञापन पेपर में  छपने लग गए हैं। छोटे रबर बैंड बनाने वाले यूनिट्स ने नगद राशि के आदान प्रदान में अप्रत्याशित वृद्धि को देखते हुए, रबर बैंड की मांग वृद्धि की पूर्ति के लिए कमर कस ली हैं।

दूसरी तरफ अर्थशास्त्र के जानकारों का मानना है, कि आगामी त्योहारों को देखते हुए टैक्स लागू करने की तारीख़ एक माह बढ़ाई भी जा सकती हैं।

स्विगी, जोमेटो, जेप्टो आदि जैसे “घर पहुंच सेवा” में कार्यरत यूनिट्स के शेयर में गिरावट होनी भी शुरू हो गई हैं। पेटीएम ने अपने अधिकतर स्टाफ को एक माह का नोटिस दे दिया हैं। उनका ऑफिस भी अब कम/ छोटे स्थान पर जाने की तैयारी में हैं।

आगे आगे देखें होता है, क्या ?

© श्री राकेश कुमार

संपर्क – B 508 शिवज्ञान एनक्लेव, निर्माण नगर AB ब्लॉक, जयपुर-302 019 (राजस्थान)

मोबाईल 9920832096

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ श्री अशोक भांबुरे जी यांची कविता अभिव्यक्ती #३४२ ☆ देशभक्तिचे वेड… ☆ श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे ☆

श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे

? अशोक भांबुरे जी यांची कविता अभिव्यक्ती # ३४२ ?

☆ देशभक्तिचे वेड… ☆ श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे ☆

☆

देशभक्तिचे वेड लागले पुजतो आहे

रणांगणावर देशासाठी लढतो आहे

*

युद्ध खेळणे केवळ नाही काम एवढे

कुठल्याही कामाचे नसते इथे वावडे

पूर वादळा सोबतसुद्धा झटतो आहे

रणांगणावर देशासाठी लढतो आहे

*

पालन नियमांचे करण्याची सक्ती आहे

देशावरती नितांत कायम भक्ती आहे

म्हणून आम्ही धारातीर्थी पडतो आहे

रणांगणावर देशासाठी लढतो आहे

*

डोंगर सोडा हिमालयावर चढतो आम्ही

कण वाळूचे तप्त जाळती जळतो आम्ही

देशासाठी आनंदाने भिजतो आहे

रणांगणावर देशासाठी लढतो आहे

*

या पायांना हिरवळ सांगा कोठे दिसते

ढग युद्धाचे नसतानाही पळपळ असते

ओझे असते पाठीवरती पळतो आहे

रणांगणावर देशासाठी लढतो आहे

*

विझण्यासाठी आम्ही पेटुन उठतो येथे

देशासाठी बाधा ठरती काही नेते

विचार त्यांचा मनास अमुच्या छळतो आहे

रणांगणावर देशासाठी लढतो आहे

☆

 © अशोक श्रीपाद भांबुरे

धनकवडी, पुणे ४११ ०४३.

ashokbhambure123@gmail.com

मो. ८१८००४२५०६, ९८२२८८२०२८

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ लेखनी सुमित्र की # ३०२ – ठंडे ये ज्वालामुखी करो…२ ☆ स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र” ☆

स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र”

(संस्कारधानी  जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर डॉ. राजकुमार “सुमित्र” जी  को सादर चरण स्पर्श । वे सदैव हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते थे। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया।  वे निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणास्रोत हैं। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता – ठंडे ये ज्वालामुखी करो…२।)

✍ साप्ताहिक स्तम्भ – लेखनी सुमित्र की # ३०२ ☆

☆ –  ठंडे ये ज्वालामुखी करो…२ ☆ स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र” ✍

बहुत दूर

दिख रही है फसल

धरा उर्वरा श्यामल ।

कोई देता है आश्वासन-

‘तुम्हें कल मिलेगा जल

और परसों काट लेना

सारी की सारी फसल ‘

कोई यक्ष आकर कहता है

हकीकत भरे ख्वाब में

पहले मेरे प्रश्नों के उत्तर दो-

तब पानी पीना तालाब में-

हाय !

सारा ज्ञान हो गया व्यर्थ

हम कितने असमर्थ

समझ नहीं पाये प्रश्नों के अर्थ ।

हे यक्ष महाराज

न हों नाराज

एक सवाल मैं भी पूछूं

यदि बुरा न लगे आपको

सौ वर्ष में पूरी होने वाली

योजना से

क्या लाभ होगा मुझको

या मेरे बाप को?

माना कि आप

लाभ पहुँचाएगें

हमारे नाती के परनाती को

लेकिन हम तो तरस रहे हैं

चने को, चपाती को ।

आखिर हम कब तक

उकसाते रहेंगे

बिना तेल वाले दिये की जोत को

मंहगाई के महाभारत में

क्रमशः…

स्व डॉ. राजकुमार “सुमित्र” 

साभार : डॉ भावना शुक्ल 

112 सर्राफा वार्ड, सिटी कोतवाली के पीछे चुन्नीलाल का बाड़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ अभिनव गीत # २९९ – “भाग रहा है भाग्य हमारे…” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी ☆

श्री राघवेंद्र तिवारी

(प्रतिष्ठित कवि, रेखाचित्रकार, लेखक, सम्पादक श्रद्धेय श्री राघवेंद्र तिवारी जी  हिन्दी, दूर शिक्षा, पत्रकारिता व जनसंचार,  मानवाधिकार तथा बौद्धिक सम्पदा अधिकार एवं शोध जैसे विषयों में शिक्षित एवं दीक्षित। 1970 से सतत लेखन। आपके द्वारा सृजित ‘शिक्षा का नया विकल्प : दूर शिक्षा’ (1997), ‘भारत में जनसंचार और सम्प्रेषण के मूल सिद्धांत’ (2009), ‘स्थापित होता है शब्द हर बार’ (कविता संग्रह, 2011), ‘​जहाँ दरक कर गिरा समय भी​’​  2014​)​ कृतियाँ प्रकाशित एवं चर्चित हो चुकी हैं। ​आपके द्वारा स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम के लिए ‘कविता की अनुभूतिपरक जटिलता’ शीर्षक से एक श्रव्य कैसेट भी तैयार कराया जा चुका है। आज प्रस्तुत है आपका एक अभिनव गीत “भाग रहा है भाग्य हमारे...”।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ # २९९  ☆।। अभिनव गीत ।। ☆

☆ “भाग रहा है भाग्य हमारे...” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी ☆

☆

डूबे सारे खेत, कर्ज में

डूब गई थाती ।

डूबे, घर को रोशन करते

दिया और बाती ॥

 

ऐसी डूब समाया जिसमें

सम्पूरन रकबा ।

डूब गया जिसमें सारा का

सारा ही कुनबा ।

 

बेटी के विवाह को जोड़ा

सब दहेज डूबा ।

फिर कैसी बारात और

कैसे क्या बाराती ॥

 

भाग रहा है भाग्य हमारे

आगे ही आगे ।

जुड़ जाते है हाथ स्वतः ही

सब जन के आगे ।

 

जो जुड़ने थे हाथ सिर्फ

यों समधी के आगे ।

वही  हाथ,  सहलाते लगते

हमें आत्मघाती ॥

 

दुर्दिन कैसे घर आते हैं

हमने अब जाना ।

तभी विधाता करने बैठा

है कुछ अनजाना ।

 

एक टीस कर्जे की साला

करती है हर दिन |

फटी जा रही वही आज क्यों

चौड़ी सी  छाती ॥

 ☆

©  श्री राघवेन्द्र तिवारी

11-08-2026

संपर्क​ ​: ई.एम. – 33, इंडस टाउन, राष्ट्रीय राजमार्ग-12, भोपाल- 462047​, ​मोब : 09424482812​

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – पुस्तक चर्चा ☆ पितृ भक्ति पर मंथन श्री की संग्रहणीय और पठनीय कृति – पितृ नमन – संपादक – श्री संतोष नेमा ‘संतोष’ ☆ समीक्षक – श्री यशोवर्धन पाठक ☆

श्री यशोवर्धन पाठक

☆ पुस्तक चर्चा ☆

☆ पितृ भक्ति पर मंथन श्री की संग्रहणीय और पठनीय कृति – पितृ नमन – संपादक – श्री संतोष नेमा ‘संतोष’ ☆ समीक्षक – श्री यशोवर्धन पाठक ☆

☆

मेरे पूज्य पिता स्व. पं.भगवती प्रसाद जी पाठक की 25 सितंबर को 127 वीं जयंती है और यह मेरे लिए सौभाग्य और सुखद संयोग की बात है कि संस्था मंथन श्री के द्वारा भी अभी 20 सितंबर को पिता को समर्पित काव्य रचनाओं का एक संग्रह पितृ नमन भी प्रकाशित किया गया। इस कृति में अपने पूज्य पिता पर आधारित एक कविता मेरी भी शामिल की गई जिसके लिए मैं मंथन श्री परिवार के प्रति आत्मीय रुप से आभार व्यक्त करता हूं।

अगर देखा जाए तो पिता कीअपेक्षा मातृ भक्ति को लेकर कवियों द्वारा अधिक काव्य रचनाओं का सृजन किया गया।काफी दिनों से वास्तव में पितृ भक्ति को लेकर भी एक ऐसे ही काव्य संग्रह की आवश्यकता महसूस भी की जा रही थी जिसमें पिता को समर्पित ऐसी कविताएं शामिल हों जो कि पाठकों के लिए पठनीय साबित हो सके।

श्री संतोष नेमा ‘संतोष’

मंथन श्री द्वारा इसी पावन उद्देश्य को लेकर जबलपुर के कला वीथिका में प्रतिष्ठित कवियों की पिता को समर्पित श्रेष्ठ कविताओं के संग्रह पितृ नमन का लोकार्पण कार्यक्रम पिछले दिनों आयोजित किया गया।पितृ नमन को साहित्यिक क्षेत्र का एक ऐसा ऐतिहासिक दस्तावेज कहा जा सकता है जो कि पिता को समर्पित काव्य रचनाओं के सशक्त सृजन हेतु सहायक सिद्ध होगा। मंथन श्री के संस्थापक और प्रसिद्ध साहित्य साधक श्री संतोष नेमा संतोष जी की परिकल्पना, संयोजना एवं सफल संपादन में प्रकाशित इस कृति के प्रकाशन में श्री राजेश पाठक प्रवीण, श्री विजय नेमा अनुज‌ एवं सिद्धेश्वरी सराफ शीलू का संपादन सहयोग भी काफी सराहनीय रहा

प्रज्ञा पीठाधीश्वर श्री मां साध्वी विभानंद गिरी, महाकवि आचार्य भगवत दुबे जी, महामहोपाध्याय आचार्य डा. हरिशंकर जी दुबे, श्री शरद अग्रवाल जी, कविवर श्री हरिशंकर भटनागर जी, सुप्रसिद्ध व्यंग्यकार श्री प्रतुल श्रीवास्तव जी, श्री विजय नेमा अनुज जी, श्री राजेश पाठक प्रवीण जी, की मंगल भाव सहित प्रभावी प्रतिक्रियाओं ने पुस्तक कृति को सार्थकता प्रदान की है।पितृ नमन में श्री संतोष नेमा संतोष जी की कृतज्ञता भाव के रुप में अभिव्यक्ति उल्लेखनीय है। वे लिखते हैं कि यह संग्रह एक ही भाव के अनेक रंग हैं। किसी ने पिता को बरगद कहा, किसी ने हिमालय, , किसी ने पुरानी साईकिल की घंटी, किसी ने फटी हुई कमीज़ के पीछे छिपा गौरव। छंद, ग़ज़ल, गीत, मुक्तक और नयी कविता के माध्यम से रचनाकारों ने अपने अपने पिता को जिया है। यह विविधता ही इस संग्रह की की सबसे बड़ी शक्ति है।मंथन श्री द्वारा संयोजित इस पितृ नमन कृति को भाई श्री संतोष नेमा संतोष ने अपने पूज्य पिता स्व. श्री देवीचरण जी नेमा को समर्पित की है। पाथेय प्रकाशन की इस कृति में 208 कवियों की अपने पिता को समर्पित काव्य रचनाएं शामिल हैं।

इस पुस्तक के प्रारंभ में पिता पर आधारित ये‌ काव्य पंक्तियां पाठकों को प्रभावित और आकर्षित करने में सहायक सिद्ध हो सकती हैं:

०

पिता तप की ज्योति हैं,

त्यागों का विस्तार हैं।

मौन रहकर भी सदा,

जीवन के आधार हैं।

मंथन श्री ने शब्दों में,

पितृ महिमा को स्वर दिया।

संकलन में पितृ ऋण के,

श्रद्धा और संस्कार हैं।

०

पितृ भक्ति पर आधारित मंथन श्री की यह काव्य कृति साहित्यिक क्षेत्र के पाठकों के लिए इस वर्ष की एक संग्रहणीय, पठनीय और प्रशंसनीय कृति सिद्ध होगी, इसमें कोई संदेह नहीं।

🌹

© श्री यशोवर्धन पाठक

पूर्व प्राचार्य, राज्य सहकारी प्रशिक्षण संस्थान, जबलपुर

संपर्क – डा. मिली गुहा अस्पताल के पीछे, गुप्तेश्वर, जबलपुर, मोबाइल 9407059752

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ प्रतुल साहित्य # ३७ – हास्य-व्यंग्य – “चोरी मेरा काम यारो, चोरी मेरा काम” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆

श्री प्रतुल श्रीवास्तव 

वरिष्ठ पत्रकार, लेखक श्री प्रतुल श्रीवास्तव, भाषा विज्ञान एवं बुन्देली लोक साहित्य के मूर्धन्य विद्वान, शिक्षाविद् स्व.डॉ.पूरनचंद श्रीवास्तव के यशस्वी पुत्र हैं। हिंदी साहित्य एवं पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रतुल श्रीवास्तव का नाम जाना पहचाना है। इन्होंने दैनिक हितवाद, ज्ञानयुग प्रभात, नवभारत, देशबंधु, स्वतंत्रमत, हरिभूमि एवं पीपुल्स समाचार पत्रों के संपादकीय विभाग में महत्वपूर्ण दायित्वों का निर्वहन किया। साहित्यिक पत्रिका “अनुमेहा” के प्रधान संपादक के रूप में इन्होंने उसे हिंदी साहित्य जगत में विशिष्ट पहचान दी। आपके सैकड़ों लेख एवं व्यंग्य देश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। आपके द्वारा रचित अनेक देवी स्तुतियाँ एवं प्रेम गीत भी चर्चित हैं। नागपुर, भोपाल एवं जबलपुर आकाशवाणी ने विभिन्न विषयों पर आपकी दर्जनों वार्ताओं का प्रसारण किया। प्रतुल जी ने भगवान रजनीश ‘ओशो’ एवं महर्षि महेश योगी सहित अनेक विभूतियों एवं समस्याओं पर डाक्यूमेंट्री फिल्मों का निर्माण भी किया। आपकी सहज-सरल चुटीली शैली पाठकों को उनकी रचनाएं एक ही बैठक में पढ़ने के लिए बाध्य करती हैं।

प्रकाशित पुस्तकें –ο यादों का मायाजाल ο अलसेट (हास्य-व्यंग्य) ο आखिरी कोना (हास्य-व्यंग्य) ο तिरछी नज़र (हास्य-व्यंग्य) ο मौन

आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय व्यंग्य  “चोरी मेरा काम यारो, चोरी मेरा काम”।) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ प्रतुल साहित्य # ३७ ☆

☆ व्यंग्य ☆ “चोरी मेरा काम यारो, चोरी मेरा काम” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆☆

जो स्वयं राम जैसे नहीं होते वे भी लक्ष्मण और भरत जैसे भाई चाहते हैं। इसी तरह जो लक्ष्मण और भरत जैसे नहीं होते वे भी राम जैसा भाई चाहते हैं। भाइयों की महिमा अपरम्पार है। हम सभी के तरह-तरह के भाई होते हैं। सगे भाई, सौतेले भाई, चचेरे भाई, ममेरे भाई, फुफेरे भाई, मौसेरे भाई और साडू भाई आदि। इन भाइयों के अलावा भी एक भाई होता है वह भाई जरूर कहलाता है, लेकिन उसका असल काम लोगों को डरा धमका कर वसूली करने का होता है। फिल्म अभिनेता संजय दत्त अनेक फिल्मों में इसी तरह के भाई बने हैं। खैर, जितने भी तरह के भाई होते हैं, उनमें मौसेरे भाइयों का विशेष महत्व है। लोग सदियों से कहते आ रहे हैं “चोर – चोर मौसेरे भाई”। समझ में नहीं आता कि लोगों ने क्या देखकर, क्या सोच कर चोरों को मौसेरा भाई बना दिया। कोई भी कहावत अथवा जनश्रुति यों ही नहीं बन जाती, उसके पीछे अनेक पीढ़ियों का चिंतन – मनन, अनुभव होता है। यदि हमारे पूर्वजों ने चोरों को मौसेरा भाई कहा है तो निश्चय ही इसके पीछे कुछ न कुछ बात अवश्य होगी जो शोध का विषय है। अपने पूर्वजों की बात पर भरोसा कर आज भी लोग चोरों को मौसेरा भाई ही मानते हैं।

अब जब प्रश्न उठता है कि चोर कौन है? तो उत्तर देना आसान नहीं रह जाता। लगता है कि पूरी दुनिया ही चोरों से भरी है। कोई छल – कपट, भ्रष्टाचार से धन चुरा रहा है, कोई मन चुरा रहा है, कोई नींद चुरा रहा है तो कोई लोगों को मीठी – मीठी बातों और वादों में फंसा कर उनका विश्वास हरण कर रहा है अर्थात चुरा रहा है। अब तो सरकार पर वोट की चोरी, सरकार की चोरी तक के आरोप लग रहे हैं। चोरी करना कोई आसान काम नहीं है। इंटेलीजेंट अर्थात चतुर – चालक और हिम्मतवाला व्यक्ति ही चोरी कर सकता है। चोरी करना दिलेरी का काम है, यह बुज़दिलों के बस की बात नहीं है। पीड़ितों को चोरी का पता हमेशा बाद में ही चलता है। निःसंदेह अगर लोगों को चोरी की आशंका पहले से ही हो जाए तो चोर चोरी नहीं कर पाएगा। अतः पक्का चोर वही है जिसकी चोरी का पता लोगों को चोरी होने के बाद चले। ऊंट की चोरी की बात अलग है। कहा गया है कि “ऊंट की चोरी निहुंरे – निहुंरे नहीं होती”, लेकिन चुराने वाले तो आँखों से काजल तक चुरा लेते हैं फिर ऊंट क्या चीज है?

कुछ वर्षों पहले फिल्म “चोरी मेरा काम” आई थी। उसके हीरो शशि कपूर एक दिलेर चोर थे वे सड़कों पर शान से गाते हुए घूमते थे –

चोरी मेरा काम, यारो चोरी मेरा काम।

वो करते हैं चोरी – चोरी,

करूँ मैं खुल्लेआम।

चोरी मेरा काम, यारो चोरी मेरा काम।

इस गाने का उल्लेख मैंने इसलिए किया कि आज लोग साधु, पंडित, गुरु, रिश्तेदार, पड़ोसी, डॉक्टर, अफसर, पुलिस, चौकीदार, नेता के विविध वेशों में ईमान, धर्म, नियम कायदे कानून की, इज्जत और विश्वास की न सिर्फ खुलेआम चोरी कर रहे हैं वरन सीनाज़ोरी भी कर रहे हैं। हमने सुना था कि एक चोर कभी भी दूसरे चोर की पोल नहीं खोलता, किंतु समय बदल गया है। आज जिसे देखो वह दूसरे को चोर कह रहा है। सभी राजनीतिक दलों के नेता एक दूसरे के पार्टी नेताओं पर तरह – तरह के आरोप लगा कर उन्हें चोर कह रहे हैं। वे एक दूसरे पर चोरी के आरोप इतनी ताकत और विश्वास से लगा रहे हैं कि अब नेताओं के वादों और आश्वासनों से छली जनता की नजरों में सभी नेताओं की छवि चोरों की बन गई है। इससे उन चंद ईमानदार नेताओं की छवि भी धूमिल हो गई है जो चोर नहीं हैं। जनता की समझ में आ गया है कि पार्टी कोई भी हो, नेता अथवा नेत्रियां कोई भी हों सब मौसेरे भाई बहिन हैं। जैसे – जैसे चुनाव पास आएगा, हमें अपने नेताओं की तरह – तरह की नई – चोरियों की जानकारियां मिलेंगी। चुनाव के वक्त अनेक अलीबाबा अपने- अपने चालीस साथियों के साथ चुनाव – मैदान में चोरी का लाइसेंस लेने ताल ठोंकते दिखेंगे। भाइयो, हमें इन्हीं “मौसेरे भाइयों” में से अपने नेताओं का चुनाव करके अपना और अपने देश का भविष्य उनके हवाले करना पड़ेगा!

© श्री प्रतुल श्रीवास्तव 

संपर्क – 473, टीचर्स कालोनी, दीक्षितपुरा, जबलपुर – पिन – 482002 मो. 9425153629

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २८१ ☆ # “मायाजाल…” # ☆ श्री श्याम खापर्डे ☆

श्री श्याम खापर्डे

(श्री श्याम खापर्डे जी भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी हैं। आप प्रत्येक सोमवार पढ़ सकते हैं साप्ताहिक स्तम्भ – क्या बात है श्याम जी । आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “मायाजाल…”।) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २८१ ☆

☆ # “मायाजाल…” # ☆ श्री श्याम खापर्डे ☆

☆

रिश्तों का मायाजाल

 हर तरफ फैला है

उजले उजले चेहरें है

पर मन मैला है

 

वह साथ-साथ है

पास पास है

हर कदम पर

हमारे लिए खास है

वह सांसों में बसता है

हथेलियां पर

रंगो सा रचता है

उसे अपने खून पसीने से सींचा है

दुःख दर्द में अपने सीने से भींचा है

ओस की बूंदों की तरह पाला है

पेट काटकर उसे खिलाया निवाला है

बुलंदियों पर पहुंचाने हर कष्ट झेला है

आज उसके जीवन में खुशियों का मेला है

रुतबा है मान है सम्मान है

समाज में प्रतिष्ठित इंसान है

 

और

उसे यहां तक पहुंचाने वाला

हर पल संभालने वाला

जीवन के आखिरी पड़ाव पर

जीर्ण हो चुकी नाव पर

बैठा अकेला है

निरर्थक यह रिश्तों का मेला है

उसे चिंताओं ने घेरा है

उसके आगे अंधेरा ही अंधेरा है

जब रिश्तें टूटते हैं

तो आंख भर आती है

हृदय को भावविह्वल कर जाती है

 

रिश्ते भी कितने अजीब है

जिनका सहारा है

वह खुशनसीब है

 

जीवन भर आदमी

 अपने कंधों पर

रिश्तों को ढोता है

आखिरी पड़ाव पर

टूटते रिश्तें देखकर

चुपचाप रोते रोते

दुनिया से विदा होता है /

☆

© श्याम खापर्डे 

फ्लेट न – 402, मैत्री अपार्टमेंट, फेज – बी, रिसाली, दुर्ग ( छत्तीसगढ़) मो  9425592588

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ अभिव्यक्ति # -१२५ – … बुरा न मान जाए ☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

श्री राजेन्द्र तिवारी

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी जबलपुर से श्री राजेंद्र तिवारी जी का स्वागत। इंडियन एयरफोर्स में अपनी सेवाएं देने के पश्चात मध्य प्रदेश पुलिस में विभिन्न स्थानों पर थाना प्रभारी के पद पर रहते हुए समाज कल्याण तथा देशभक्ति जनसेवा के कार्य को चरितार्थ किया। कादम्बरी साहित्य सम्मान सहित कई विशेष सम्मान एवं विभिन्न संस्थाओं द्वारा सम्मानित, आकाशवाणी और दूरदर्शन द्वारा वार्ताएं प्रसारित। हॉकी में स्पेन के विरुद्ध भारत का प्रतिनिधित्व तथा कई सम्मानित टूर्नामेंट में भाग लिया। सांस्कृतिक और साहित्यिक क्षेत्र में भी लगातार सक्रिय रहा। हम आपकी रचनाएँ समय समय पर अपने पाठकों के साथ साझा करते रहेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण कविता ‘बुरा न मान जाए…‘।)

☆ अभिव्यक्ति # १२५ ☆

☆ बुरा न मान जाए… ☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

☆

वो उसे कुछ लिखना चाहता है,

लिखता है, पर पसंद नहीं आता,

लिख कर, फिर मिटा देता है,

कई विचार आते हैं, लिखता है,

पसंद नहीं आता, मिटा देता है,

सोचता क्या लिखे, नाराज न हो,

पढ़कर बुरा न मान जाए।

*

शब्दों का संयोजन, संतुलित हो,

उसकी बात समझे, नाराज न हो,

मन में बहुत कुछ है लिखने को,

कागज पर शब्द उभर नहीं पाते,

मन में विचार तो बहुत आते हैं,

मन से बाहर, निखर नहीं पाते,

अपने मन का हो, या उसके मन का,

मन का भाव, समझ तो पाए,

सोचता क्या लिखे, नाराज न हो,

पढ़कर बुरा न मान जाए।

☆

© श्री राजेन्द्र तिवारी  

संपर्क – 70, रामेश्वरम कॉलोनी, विजय नगर, जबलपुर

मो  9425391435

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ परिहार जी का साहित्यिक संसार # ३४९ ☆ कैसा नाता रे  (वैचारिकी) ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆

डॉ कुंदन सिंह परिहार

(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय  डॉ  कुन्दन सिंह परिहार जी  का साहित्य विशेषकर व्यंग्य  एवं  लघुकथाएं  ई-अभिव्यक्ति  के माध्यम से काफी  पढ़ी  एवं  सराही जाती रही हैं।   हम  प्रति रविवार  उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते  रहते हैं।  डॉ कुंदन सिंह परिहार जी  की रचनाओं के पात्र  हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं।  उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल  की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम एवं विचारणीय आलेख – ‘कैसा नाता रे  (वैचारिकी)‘। इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार  # ३४९ ☆

☆ आलेख ☆ कैसा नाता रे  (वैचारिकी) ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆

सन्त कहते हैं कि संसार के सारे नाते झूठे हैं, आदमी को मोक्ष के मार्ग से भटकाने का साधन हैं। यहां संसार को त्यागने वाले को सांसारिक ज़िम्मेदारियां निभाने वाले की तुलना में ज़्यादा  इज़्ज़त और ज़्यादा महत्व मिलता है। जो सन्यासी होने की घोषणा करके संसार में ही जमे हैं और भक्तों की भीड़ जुटा रहे हैं उनके दरबार में बड़े-बड़े मंत्री, बड़े-बड़े अधिकारी माथा टेक रहे हैं। प्रश्न यह है कि जिसने संसार को छोड़ दिया वह सारी सांसारिक सुविधाएं क्यों ले रहा है? अपने को सन्यासी कहने वाले बहुत से बाबाओं की जीवन- शैली अमीरों वाली हो गयी है। कई बाबा धन के ढेर पर बैठे हैं। सन्यासी की जो छवि हमारे मन में बसी थी वह ध्वस्त हो रही है। हमारे मन में तो रामकृष्ण परमहंस, विवेकानन्द, रैदास की छवि बैठी है। आज के सन्यासियों से इनका कोई मेल नहीं बैठता।

हमारे धर्म में सन्यास को जीवन का चौथा आश्रम मानते हैं जो ब्रह्मचर्य, गृहस्थ और वानप्रस्थ आश्रमों के बाद अन्त में आता है, लेकिन कई लोग युवावस्था में ही सन्यास ग्रहण कर रहे हैं। अब तो दस बारह साल के लड़के-लड़कियां भी सन्यास का मार्ग पकड़ रहे हैं। हमारे कानून के अनुसार अवयस्क ख़ुदमुख्त़ार नहीं होता, उसे अपने जीवन के बारे में किसी निर्णय के लिए ज़िम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता, लेकिन कई बालक-बालिकाएं समारोहपूर्वक सन्यास ग्रहण कर रहे हैं।

मुझे एक सन्यासी मिले थे जिन्होंने छात्र जीवन में ही मेडिकल कोर्स छोड़कर सन्यास ले लिया था। घर छोड़ने के बाद वे एक बार भी लौट कर नहीं गये थे, न माता-पिता, भाई बहनों की सुध ली थी। प्रमाणित होता है कि सन्यासी का दिल बहुत मज़बूत होता है।

निश्चय ही कोई व्यक्ति जब उससे स्नेह करने वाले, उसे जन्म देने वाले, उसका दीर्घकाल तक लालन-पालन करने वाले, उसे शिक्षा देने वाले लोगों से संबंध विच्छेद करता है तो उसकी दृष्टि किसी बड़े लक्ष्य पर रहती होगी। लेकिन प्रश्न यह है कि क्या अपने आत्मीय लोगों को आघात  दिये बिना उस लक्ष्य की प्राप्ति नहीं हो सकती? वह ऊंचा लक्ष्य किस सीमा तक प्राप्त होता है, यह सन्यासी ही बता सकता है, लेकिन उसके समाज- विमुख होने के परिणाम साफ दिखायी पड़ते हैं।

इसी तरह एक ब्रह्मचारी को गृहस्थ से अधिक महत्व मिलता है। इसे समझना भी कठिन है क्योंकि प्रकृति ने पुरुष और स्त्री को ऐसे अंगों से संपन्न किया है कि वे मिलकर सृष्टि को नया जीवन देते रहें। मानव शरीर की रचना अद्भुत है, वह  तिलिस्म से कम नहीं। सृष्टि को बढ़ाने की क्रिया में शामिल होने या न होने के लिए व्यक्ति स्वतंत्र है, लेकिन यह समझना कठिन है कि इस क्रिया से विरक्त रहने वाले को अधिक सम्मान कैसे मिल सकता है? एक शब्द ‘बाल ब्रह्मचारी’ भी अक्सर सुनने को मिलता है। इसे भी बूझना कठिन है क्योंकि बालक तो अपनी आयु के कारण ब्रह्मचारी होता ही है।

सन्यासी सामाजिक रिश्तों को कितना भी नकारें लेकिन वास्तविकता यह है कि किसी भी व्यक्ति का जीवन समाज के बिना चल नहीं सकता। जीवन के बड़े भाग तक व्यक्ति समाज पर निर्भर रहता है और इसमें सन्यासी भी अपवाद नहीं हैं। मुझे एक ऐसे सन्यासी भी मिले थे जो पैसे का स्पर्श नहीं करते थे, लेकिन जब उन्हें मोतियाबिंद हुआ तो उन्हें एक शिष्य की मदद लेनी पड़ी। बीमार पड़ने पर सन्यासी को भी अस्पताल जाना पड़ता है। शहरों में बैठे भगवाधारी बड़े व्यवसाय चला रहे हैं और दिन भर उसका विज्ञापन भी कर रहे हैं। आज के सन्यासी करोड़ों की कार में घूम रहे हैं और करोड़ों का सोना पहन रहे हैं। इन सन्यासियों का तर्क है कि उनके विलासितापूर्ण जीवन से कोई हर्ज़ नहीं है क्योंकि उनका पैसा समाज-सेवा में लग रहा है।

सन्यास के लिए अपनों से नाता तोड़ने वालों की बात करते हुए मुझे अपने गांव की एक स्त्री की याद आती है जो गांव में घूम-घूम कर चूड़ी बेचती थी। उसके जवान बेटे ने सन्यास ले लिया था और वह आसपास के गांवों में भटकता रहता था। दुखी मां रोज़ उसके लिए भोजन बनाकर उसे गांव गांव ढूंढ़ती रहती थी। विख्यात नर्मदा यात्री अमृतलाल वेगड़ की एक पुस्तक में एक मां-बेटे का प्रसंग आता है जो नर्मदा परिक्रमा पर निकले थे। एक मन्दिर में पहुंचकर अचानक पुत्र ने घोषणा कर दी कि वह सन्यास ले रहा है और लौटकर गांव नहीं जाएगा। परिणामत: मां वहीं फंस गयी। न वह पुत्र को छोड़ पा रही थी, न गांव की अपनी गृहस्थी को।

जो लोग रिश्तों की उपेक्षा करते हैं या उन्हें व्यर्थ समझते हैं उन्हें रिश्तों की अहमियत को समझने के लिए मनुष्य से अधिक पशुओं के जीवन को देखना चाहिए। मैंने टीवी पर एक दृश्य देखा जिसमें एक हिरनी और उसका शावक नदी पार कर रहे हैं। अचानक एक मगरमच्छ शावक की तरफ लपकता है और तभी वह मां दोनों के बीच में आ जाती है ताकि मगरमच्छ शावक के बजाय उसे ही अपना भोजन बना ले। एक और दृश्य में एक हिरनी  के आगे उसका शावक चल रहा है कि दो बाघ आकर दोनों तरफ से हिरनी को पकड़ लेते हैं। हिरनी भागने के बजाय वहीं रुक जाती है ताकि उसका शावक दूर निकल जाए। रिश्तों का ताना-बाना ऐसा ही होता है।

कवि रहीम ने समझदारी की बात कही— ‘रहिमन धागा प्रेम का मत तोड़ो चटकाय’, लेकिन बहुत से लोग अपना जन्म सुधारने के लिए ऐसे ही प्रेम के धागों को तोड़ते हैं। विचार करना ज़रूरी है कि क्या सही है और क्या ग़लत।

© डॉ कुंदन सिंह परिहार

जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ ≈ मॉरिशस से ≈ गद्य क्षणिका# १२० – शिल्पी… – ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

श्री रामदेव धुरंधर

(ई-अभिव्यक्ति में मॉरीशस के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री रामदेव धुरंधर जी का हार्दिक स्वागत। आपकी रचनाओं में गिरमिटया बन कर गए भारतीय श्रमिकों की बदलती पीढ़ी और उनकी पीड़ा का जीवंत चित्रण होता हैं। आपकी कुछ चर्चित रचनाएँ – उपन्यास – चेहरों का आदमी, छोटी मछली बड़ी मछली, पूछो इस माटी से, बनते बिगड़ते रिश्ते, पथरीला सोना। कहानी संग्रह – विष-मंथन, जन्म की एक भूल, व्यंग्य संग्रह – कलजुगी धरम, चेहरों के झमेले, पापी स्वर्ग, बंदे आगे भी देख, लघुकथा संग्रह – चेहरे मेरे तुम्हारे, यात्रा साथ-साथ, एक धरती एक आकाश, आते-जाते लोग। आपको हिंदी सेवा के लिए सातवें विश्व हिंदी सम्मेलन सूरीनाम (2003) में सम्मानित किया गया। इसके अलावा आपको विश्व भाषा हिंदी सम्मान (विश्व हिंदी सचिवालय, 2013), साहित्य शिरोमणि सम्मान (मॉरिशस भारत अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी 2015), हिंदी विदेश प्रसार सम्मान (उ.प. हिंदी संस्थान लखनऊ, 2015), श्रीलाल शुक्ल इफको साहित्य सम्मान (जनवरी 2017) सहित कई सम्मान व पुरस्कार मिले हैं। हम श्री रामदेव  जी के चुनिन्दा साहित्य को ई अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों से समय समय पर साझा करने का प्रयास करेंगे।

आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय गद्य क्षणिका “– शिल्पी…” ।) 

~ मॉरिशस से ~

☆ कथा कहानी  ☆ गद्य क्षणिका # १२० — शिल्पी — ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

कोई पत्थर चिंतन में खोया होगा कि सहसा आकाश से दो मोटी बूँदें टपक कर उसके ललाट पर स्थायी रह गयी हों। राह चलते एक आदमी ने देखने पर सोचा होगा दो आँखों वाला पत्थर है। संयोग से वह एक शिल्पी होगा। पत्थर की आँखें हुईं तो शरीर क्यों न हो? शिल्पी ने पत्थर को शरीर में तराश दिया होगा। इस तरह पत्थर से भगवान का अस्तित्व बन गया होगा। उसके आँसू प्रतीक हुए, वह ईश्वर की करुणा थी।

 © श्री रामदेव धुरंधर

20 – 09 – 2026

संपर्क : रायल रोड, कारोलीन बेल एर, रिविएर सेचे, मोरिशस फोन : +230 5753 7057   ईमेल : rdhoorundhur@gmail.com

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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