(संस्कारधानी जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर आचार्य भगवत दुबे जी को सादर चरण स्पर्श । वे आज भी हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते हैं। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया है।सीमित शब्दों में आपकी उपलब्धियों का उल्लेख अकल्पनीय है। आचार्य भगवत दुबे जी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व की विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 ☆ हिन्दी साहित्य – आलेख – ☆ आचार्य भगवत दुबे – व्यक्तित्व और कृतित्व ☆.आप निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणा स्त्रोत हैं। हमारे विशेष अनुरोध पर आपने अपना साहित्य हमारे प्रबुद्ध पाठकों से साझा करना सहर्ष स्वीकार किया है। अब आप आचार्य जी की रचनाएँ प्रत्येक मंगलवार को आत्मसात कर सकें गे।
आज प्रस्तुत हैं बुन्देली कविता – “खून-पसीना जब बोउत है“।)
साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ कादम्बरी # १६७ ☆
☆ बुन्देली कविता – “खून-पसीना जब बोउत है“☆ आचार्य भगवत दुबे
(प्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक साहित्य ” में हम श्री विवेक जी की चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं। श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी , जबलपुर ) से सेवानिवृत्त हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। आपको वैचारिक व सामाजिक लेखन हेतु अनेक पुरस्कारो से सम्मानित किया जा चुका है।आज प्रस्तुत है एक ज्ञानवर्धक आलेख – “रामधारी सिंह दिनकर की काव्य-चेतना”।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ४३५ ☆
आलेख – रामधारी सिंह दिनकर की काव्य-चेतना श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆
रामधारी सिंह ‘दिनकर’ का जन्म 23 सितंबर 1908 को बिहार के सिमरिया गाँव में हुआ और 24 अप्रैल 1974 को मद्रास में उनका निधन हुआ था। वे कवि होने के साथ निबंधकार, चिंतक, आलोचक, पत्रकार और सांस्कृतिक विचारक भी थे। स्वतंत्रता आंदोलन के उथल-पुथल भरे दौर में उनकी काव्य-चेतना विकसित हुई। औपनिवेशिक दमन, राष्ट्रीय मुक्ति की आकांक्षा, सामाजिक विषमता और भारतीय सांस्कृतिक अस्मिता उनके आरंभिक लेखन की पृष्ठभूमि बने। ‘रेणुका’ (1935), ‘हुंकार’ (1938), ‘कुरुक्षेत्र’ (1946), ‘रश्मिरथी’ (1952) और ‘उर्वशी’ (1961) उनकी काव्य-यात्रा के महत्वपूर्ण पड़ाव हैं।
गद्य में ‘मिट्टी की ओर’, ‘अर्धनारीश्वर’ और ‘संस्कृति के चार अध्याय’ जैसी अमर कृतियाँ उनकी व्यापक वैचारिक दृष्टि स्पष्ट करती हैं।
‘संस्कृति के चार अध्याय’ के लिए उन्हें साहित्य अकादेमी पुरस्कार और ‘उर्वशी’ के लिए ज्ञानपीठ सम्मान मिला था। इस प्रकार दिनकर का रचनाकाल केवल स्वतंत्रता-पूर्व संघर्ष का समय नहीं था । उसमें स्वतंत्रता के बाद के भारत की सामाजिक, सांस्कृतिक और नैतिक बेचैनियाँ भी निरंतर दिखाई देती रहीं।
दिनकर की काव्य-चेतना को समझने के लिए सबसे पहले उनकी राष्ट्रीय चेतना को समझना आवश्यक है। पराधीन भारत में पली उनकी संवेदना स्वाभाविक रूप से स्वतंत्रता और स्वाभिमान की आकांक्षा से जुड़ी हुई थी। लेकिन उनका राष्ट्रवाद केवल मातृभूमि के प्रति भावुक काव्य उद्गार नहीं है। उसमें जनता की शक्ति और उसके अधिकार का बोध भी निहित दिखता है।
‘जनतंत्र का जन्म’ में वे लिखते हैं, “सिंहासन खाली करो कि जनता आती है।” यह पंक्ति सत्ता के सामने जनता की उपस्थिति की घोषणा है। दिनकर के काव्य में राष्ट्र का अर्थ केवल राजसत्ता नहीं, बल्कि वह सामान्य मनुष्य है जिसके श्रम से देश बनता है। इसलिए उनकी राष्ट्रीय चेतना धीरे-धीरे जनचेतना में रूपांतरित हो जाती है।
यहीं से दिनकर की कविता का दूसरा महत्वपूर्ण स्वर, विद्रोह और प्रतिरोध, उभरता है। अन्याय के सामने चुप रहना उन्हें स्वीकार नहीं था। ‘समर शेष है’ में वे लिखते हैं, “समर शेष है, नहीं पाप का भागी केवल व्याध, / जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनके भी अपराध।”
दिनकर के लिए संघर्ष का अर्थ हिंसा का उत्सव नहीं है। उनका प्रश्न यह है कि जब अन्याय सामने हो, तब मनुष्य की नैतिक जिम्मेदारी क्या हो? तटस्थता कब निष्पक्षता नहीं, बल्कि अन्याय को मौन समर्थन देने जैसी हो जाती है? इसीलिए उनका विद्रोह केवल राजनीतिक नहीं, नैतिक विद्रोह भी है।
‘रश्मिरथी’ का कर्ण उनकी सबसे महत्वपूर्ण रचनाओ में है। महाभारत का कर्ण दिनकर के यहाँ जन्म और जाति से परिभाषित व्यक्ति नहीं, बल्कि प्रतिभा, पुरुषार्थ और आत्मसम्मान से अपना मूल्य सिद्ध करने वाला मनुष्य है। कर्ण की वाणी में दिनकर का सामाजिक प्रश्न मुखर हो उठता है, “पूछो मेरी जाति, शक्ति हो तो, मेरे भुजबल से।” कर्ण का यह कथन जन्माधारित पहचान के सामने कर्म और सामर्थ्य की प्रतिष्ठा है।
यही कारण है कि ‘रश्मिरथी’ केवल कर्ण की कथा नहीं रह जाती । वह सामाजिक भेदभाव से मुक्त मनुष्य की गरिमा का काव्य बन जाती है।
कर्ण के माध्यम से दिनकर ने उस प्रतिभा की पीड़ा को स्वर दिया , जिसे सामाजिक व्यवस्था पहचान देने से इनकार कर देती है। कर्ण दया नहीं माँगता। वह अपने पुरुषार्थ के आधार पर सम्मान चाहता है। यही दिनकर की सामाजिक दृष्टि की विशेषता है। वे वंचित मनुष्य को केवल करुणा का पात्र नहीं बनाते, बल्कि उसके भीतर प्रतिरोध और आत्मविश्वास की शक्ति देखते हैं। इसीलिए उनका मानवतावाद दीनता का महिमामंडन नहीं करता। वह मनुष्य को उसकी प्रतिभा की गरिमा के साथ देखता है।
वीरता दिनकर की कविता का एक अत्यंत प्रसिद्ध पक्ष है, लेकिन उनकी वर्णित वीरता को भी व्यापक अर्थ में देखना आवश्यक है।
‘रश्मिरथी’ की पंक्ति, “क्षमा शोभती उस भुजंग को, / जिसके पास गरल हो”, उनकी शक्ति-दृष्टि का सार है। उनके लिए क्षमा निर्बलता से पैदा हुई विवशता नहीं, सामर्थ्य से उत्पन्न उदारता है। जो अन्याय का प्रतिरोध कर सकता है, वही वास्तविक अर्थ में क्षमा का अधिकारी है। दिनकर की शक्ति इसलिए महत्वपूर्ण है कि वह आत्मसम्मान और न्याय की रक्षा करती है। इसीलिए उनकी वीरता केवल रणभूमि की वीरता नहीं रह जाती।
दिनकर का काव्य एक महत्वपूर्ण संतुलन स्थापित करता है। वे शक्ति के कवि हैं, किंतु युद्ध के अंध-समर्थक नहीं हैं। ‘कुरुक्षेत्र’ में महाभारत के युद्ध को आधार बनाकर वे हिंसा, विनाश, न्याय और शांति के प्रश्नों पर विचार करते हैं। यह कृति द्वितीय विश्वयुद्ध और उसके व्यापक मानवीय अनुभवों के बाद के वातावरण से भी संवाद करती है। महाभारत का युद्ध उनके लिए केवल अतीत की घटना नहीं , वह आधुनिक मनुष्य के सामने आज तक खड़ा नैतिक प्रश्न है।
‘कुरुक्षेत्र’ में दिनकर की वैचारिक दृष्टि यह स्वीकार करती है कि अन्यायपूर्ण शांति भी शांति नहीं है। केवल युद्ध से बच जाना पर्याप्त नहीं होता । न्यायपूर्ण व्यवस्था आवश्यक है। इसी कारण उनके यहाँ शक्ति और शांति परस्पर विरोधी नहीं हैं। शक्ति अन्याय रोकने के लिए आवश्यक हो सकती है और शांति मनुष्य की अंतिम आकांक्षा है। दिनकर का यह द्वंद्व उनके काव्य को सरल नारे से बचाकर विचार की गहराई देता है।
दिनकर की एक बड़ी विशेषता इतिहास और मिथक का आधुनिक पुनर्पाठ है। उन्होंने महाभारत के पात्रों को केवल पौराणिक चरित्र बनाकर नहीं रखा। वे उनके भीतर अपने समय के प्रश्न खोजते हैं। कर्ण सामाजिक न्याय का प्रश्न बनता है। कुरुक्षेत्र युद्ध और शांति का प्रश्न बनता है। कृष्ण का शांति-प्रयास सत्ता और न्याय के संबंध पर विचार करने का अवसर देता है। ‘रश्मिरथी’ में कृष्ण के सामने कर्ण का पक्ष और पाँच गाँव का प्रसंग इस बात को रेखांकित करता है कि संघर्ष से पहले न्यायपूर्ण समाधान का प्रयास आवश्यक है। इस प्रकार दिनकर के लिए मिथक अतीत में बंद कथाये नहीं, वर्तमान से संवाद करने वाली जीवित संवेदनाये है।
उनकी सांस्कृतिक चेतना भी इसी व्यापक दृष्टि का विस्तार है। दिनकर भारतीय संस्कृति को किसी संकीर्ण सीमा में नहीं देखते। ‘संस्कृति के चार अध्याय’ उनके गद्य का महत्त्वपूर्ण उदाहरण है, लेकिन उसकी मूल दृष्टि उनकी कविता में भी दिखाई देती है। वे भारत को केवल भूगोल के रूप में नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक धरोहर के रूप में देखते हैं। “भारत नहीं स्थान का वाचक, गुण विशेष नर का है।” आगे वे कहते हैं, “जहाँ कहीं एकता अखण्डित, जहाँ प्रेम का स्वर है, / देश-देश में वहाँ खड़ा भारत जीवित भास्वर है।” यहाँ भारतीयता किसी एक जाति, भाषा या क्षेत्र की संपत्ति नहीं रह जाती। वह एकता, प्रेम और मानवीय शील से निर्मित व्यापक सांस्कृतिक चेतना बन जाती है।
दिनकर की सांस्कृतिक दृष्टि का यह समन्वय उनके राष्ट्रवाद को भी व्यापक बनाता है। उनके लिए राष्ट्र की शक्ति उसकी विविधता में निहित है। संस्कृति कोई जड़ परंपरा नहीं, बल्कि निरंतर संवाद और आदान-प्रदान से विकसित होने वाली जीवंत प्रक्रिया है। वे अतीत से ऊर्जा लेते हैं, लेकिन वर्तमान के प्रश्नों से मुँह नहीं मोड़ते।
दिनकर की काव्य-यात्रा का एक और महत्वपूर्ण पड़ाव प्रेम और सौंदर्य की चेतना है, जो ‘उर्वशी’ में अपने पूर्ण विस्तार के साथ मुखर दिखती है। ‘हुंकार’ का ओजस्वी और ‘रश्मिरथी’ का संघर्षशील कवि ‘उर्वशी’ में प्रेम, देह, कामना और सौंदर्य की जटिल अनुभूतियों का कवि बन जाता है। इससे उनके कवि-व्यक्तित्व की व्यापकता प्रमाणित होती है। मनुष्य केवल सामाजिक और राजनीतिक प्राणी नहीं है। उसके भीतर प्रेम की आकांक्षा है, सौंदर्य का आकर्षण है, देह की अनुभूति है और आत्मा की बेचैनी भी है। ‘उर्वशी’ इन्हीं अनुभवों को दार्शनिक धरातल देती है। यह रचना 1961 में प्रकाशित हुई और इसी कृति के लिए दिनकर को ज्ञानपीठ सम्मान मिला।
इस दृष्टि से ‘उर्वशी’ को दिनकर की पूर्ववर्ती राष्ट्रीय और वीर काव्यधारा से अलग करके नहीं, बल्कि उसकी स्वाभाविक परिणति के रूप में भी पढ़ा जा सकता है। राष्ट्र और समाज के प्रश्नों से जूझने वाला कवि अंततः मनुष्य के भीतर उतरता है। वहाँ उसे प्रेम मिलता है, काम मिलता है, सौंदर्य मिलता है और अस्तित्व का प्रश्न मिलता है। दिनकर की काव्य-चेतना इसीलिए बाहरी संघर्ष से आंतरिक अनुभव तक की अनवरत यात्रा है।
उनकी भाषा और शिल्प उनकी चेतना के अनुरूप निरंतर बदलते हैं। राष्ट्रीयता और विद्रोह के प्रसंग में भाषा ओजस्वी और घोषपूर्ण हो जाती है। सामाजिक प्रश्नों में वह तर्क और चुनौती का स्वर ग्रहण करती है। ‘कुरुक्षेत्र’ में वही भाषा दार्शनिक और चिंतनशील हो जाती है, जबकि ‘उर्वशी’ में उसमें ललित सौंदर्य और संवेदनात्मक कोमलता आ जाती है। संस्कृतनिष्ठ शब्दावली के साथ लोकजीवन की सहजता, सूक्ति की संक्षिप्तता के साथ भाव की तीव्रता और मंचीय प्रभाव के साथ वैचारिक गहराई,इन सबका संयोजन दिनकर की भाषा को विशिष्ट दिनकर की भाषा बनाता है।
दिनकर की काव्य-चेतना को इसलिए किसी एक ‘वाद’ में पूरी तरह बाँधना कठिन है। उनमें राष्ट्रीयता है, प्रगतिशील सामाजिक दृष्टि है, परंपरा के प्रति आत्मीयता है, आधुनिक प्रश्नों के प्रति सजगता है और मनुष्य के निजी जीवन के प्रति गहरी संवेदना है। उनका रचनात्मक व्यक्तित्व अपने समय के अनेक वैचारिक प्रवाहों से संवाद करता है, किंतु अंततः अपनी स्वतंत्र पहचान बनाता है। यही कारण है कि उनकी कविता में एक ओर “सिंहासन खाली करो कि जनता आती है” का जनतांत्रिक उद्घोष है और दूसरी ओर ‘उर्वशी’ का सूक्ष्म प्रेमानुभव।
समग्रतः दिनकर की काव्य-चेतना, शक्ति, स्वाभिमान, न्याय, राष्ट्र, संस्कृति, प्रेम और मनुष्यता के समन्वय की चेतना है। उनकी राष्ट्रीयता जनचेतना से जुड़ती है, वीरता आत्मसम्मान से, विद्रोह न्याय से, इतिहास वर्तमान से और प्रेम मनुष्य की पूर्णता से। वे अतीत को इसलिए नहीं देखते कि उसमें लौट जाएँ, बल्कि इसलिए कि उससे वर्तमान को समझ सकें। वे मिथक इसलिए नहीं उठाते कि पुरानी कथा दोहरा सकें, बल्कि इसलिए कि उसके भीतर आज के मनुष्य के प्रश्न खोज सकें।
यही दिनकर की स्थायी प्रासंगिकता है। उनका कवि समय के साथ बदलते प्रश्नों के सामने खड़ा दिखाई देता है। उनकी कविता हमें केवल गौरव का अनुभव नहीं कराती, वह प्रश्न भी करती है , मनुष्य की गरिमा कहाँ है? न्याय किसके पक्ष में है? शक्ति का उद्देश्य क्या है? संस्कृति मनुष्य को कितना उदार बनाती है? और अंततः मनुष्य को मनुष्य से जोड़ने वाली वह कौन-सी शक्ति है जिसके बिना राष्ट्र भी अधूरा है और सभ्यता भी? दिनकर का उत्तर उनकी पूरी काव्य-यात्रा में बिखरा हुआ मिलता है । मनुष्य की गरिमा, न्याय की प्रतिष्ठा और जीवन के प्रति निर्भीक आस्था। यही उनकी काव्य-चेतना का सबसे मानवीय और सबसे स्थायी स्वर है।
संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं सजग अग्रज साहित्यकार श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” जी के साप्ताहिक स्तम्भ “मनोज साहित्य” में आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “माँ देवी का रूप है”। आप प्रत्येक मंगलवार को आपकी भावप्रवण रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे।
मनोज साहित्य # २३९ ☆
☆ माँ देवी का रूप है☆श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” ☆
(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)
जीवन के कुछ अनमोल क्षण
तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित।
मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी से भेंट करते हुए।
बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए।
आप डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपका विचारणीय व्यंग्य – दफ्तर की कुर्सियों का इतिहास और भूगोल।)
☆ चुभते तीर # १५१ – व्यंग्य – दफ्तर की कुर्सियों का इतिहास और भूगोल☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’☆
(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)
दफ्तर की इस पवित्र और वातानुकूलित मचान पर कुर्सियों का भूगोल बड़ा जटिल है। यह कुर्सियां केवल बैठने के उपकरण नहीं हैं, बल्कि यह कर्मचारी के औहदे और उसकी रीढ़ की हड्डी के लचीलेपन का जीवंत प्रमाण पत्र हैं। चपरासी की कुर्सी प्लास्टिक की होती है, जिस पर बैठते हीन भावना और कमर दर्द का ऐसा बेजोड़ मिश्रण पैदा होता है कि आदमी सीधे मालिक की तरफ देखता है। बाबू की कुर्सी थोड़ी गद्देदार होती है, जो दिनभर चाय की चुस्कियों और फाइलों के नीचे दबाई गई फाइलों के वजन से कराहती रहती है।
लेकिन असली तमाशा तब शुरू होता है जब साहब की कुर्सी का आगमन होता है। वह कुर्सी नहीं, सिंहासन है—एर्गोनॉमिक्स का चमत्कार और चमड़े का वह दानव है जो अपनी धुरी पर ऐसे घूमता है जैसे धरती सूरज के नहीं, उसी के इर्द-गिर्द चक्कर काट रही हो। इस कुर्सी पर बैठने वाला प्राणी भूल जाता है कि वह भी कभी आम आदमियों की तरह लोकल ट्रेन में धक्के खाता था। वह फाइलों पर लाल स्याही से ऐसे हस्ताक्षर करता है जैसे देश के संविधान की नई इबारत लिख रहा हो। शाम ढलते ही यही बाहुबली बाबू अपनी कूबड़ निकाली हुई पीठ के साथ जब घर लौटता है, तो उसकी औकात बस टीवी के रिमोट पर कब्जा करने तक सीमित रह जाती है।
(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)
(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है नवरात्र पर्व पर विशेष कविता “श्री राम बसे निर्मल मन में”।)
☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २८१ ☆
🌻कविता🌻 श्री राम बसे निर्मल मन में🚩☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ ☆
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श्री राम बसे निर्मल मन में, कितना पावन ये तन है।
रोम – रोम आनंदित पल – पल, नाच उठा सुंदर मन है।।
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मेरी दृष्टि निहारे अपलक, राम लला रघुनंदन है।
जीवन मैं करती न्योछावर, चरण – धूलि नित चंदन है।
मर्यादा पुरुषोत्तम राघव, भक्तों के अभिनंदन है।
श्री राम बसे निर्मल मन में, कितना पावन ये तन है।।
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संस्कारों के परम पुजारी , भार्या जनक दुलारी है।
कौशल्या दशरथ के नंदन, तुम पर दुनिया वारी है।
दीप जला मैं करूँ आराधन, सुबह शाम नित वंदन है।
श्री राम बसे निर्मल मन में, कितना पावन ये तन है।।
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जन्म – मरण के सारे बंधन, राम जपे कट जाते हैं।
तार अहिल्या बाली मारे , हनुमत जी के प्यारे हैं।
शबरी केवट अरु जटायु , भक्त जनों के कंचन हैं।
श्री राम बसे निर्मल मन में, कितना पावन ये तन है।।
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दास विभीषण के शुभचिंतक, रावण को संघारे हैं।
वैदेही की अग्नि परीक्षा, लेकर के प्रभु हारे हैं।
अंत दशानन कहते बातें, राम रतन जीवन धन हैं।
श्री राम बसे निर्मल मन में, कितना पावन ये तन है।।
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राम भजे हित दास तुम्हारा, राम ही प्राण प्यारे हैं।
(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” आज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)
☆ आलेख # १९७ ☆ देश-परदेश – Global Hand Washing Day:15 Oct. ☆ श्री राकेश कुमार ☆
अब हाथ धोने के लिए भी विश्व स्तर पर मुहिम चल रहीं है। बाल्यकाल से घर में प्रवेश के तुरंत बाद हाथ पैर धोने के पश्चात ही भोजन ग्रहण कर सकते थे। सफाई और हाइजिन हमारे समाज की परम्परा रही है। पूर्व में चूल्हे की राख या मिट्टी से ही हाथ धोए जाते थे। अब ना तो चूल्हा है, और पक्के घरों में तो मिट्टी भी नसीब नहीं होती है। नवाब लोग बिस्तर/ कुर्सी आदि पर बैठे हुए ही सेवक के द्वारा हाथ धुलाया जाता था। इस कार्य में संलग्न सेवक को भी हाथ धो कर ही ये कार्य करना पड़ता था।
आज के समय में साबुन, शैंपू और ना जाने कितने आइटम बाजार में हाथ धोने के लिए उपलब्ध हैं। आने वाले समय में दिन और रात में अलग अलग तरह के साबुन आदि सिर्फ हाथ धोने के लिए आ जायेंगे। अभी तक तो शरीर की स्किन के अनुसार ही इनकी उपलब्धता है, सुखी त्वचा हो या तैलीय त्वचा सबके अलग तरह के लिक्विड बाजार में आपकी जेब को हल्का कर देंगे। सर्दी, गर्मी और वर्षा ऋतु के अनुसार भी इनका वर्गीकरण होता है। बच्चों और बड़ों के लिए भी अलग प्रकार की वैराइटी अब आम बात है।
कोविड काल के समय तो इनका चलन इतना बढ़ गया था, कि सब्ज़ी भी कई बार धो कर उपयोग होती थी। उस समय घर, दुकानों प्राय सभी स्थानों पर “हैंड मोसराइजर” कंपलसरी था। जिन्होंने ऐसा नहीं किया, वो हाथ मलते रह गए।
लाइफबॉय, डेटॉल आदि तरल रूप में अपने आप को कीटाणुओं को 99% समाप्त करने की बात करते है, 1% यदि भूल चूक हो जाय उसका मार्जिन है।
हाथ धोने के बाद “हैंड टॉवल” का उपयोग वर्षों पुराना हो चुका है। विदेश में तो हाथ धोने के बाद कागज़ का उपयोग होता है। सार्वजनिक स्थानों पर “ड्रायर” की सुविधा रहती है। ग्रामीण क्षेत्र के लोग तो कांधे पर एक गमछा दिन भर लटकाए रखते हैं। दिन भर उसी से पसीना और हाथ पोछना चलता रहता है। गर्मी की लू या वर्षा के समय में भी काम आता हैं।
कोविद काल में अनेक लोगों ने सब कुछ गवां दिया था, या ये भी कह सकते हैं, कि बुरे काल में कुछ लोग “हाथ धो बैठे” थे।
हमने तो अभी तक ये ही सुना था, “हाथ धो के पीछे पड़ जाना” अब आप लोग कहेंगे कि आज हम भी हाथ धोकर, हाथ धोने के पीछे पड़ गए हैं। जब पूरा विश्व आज हाथ धो रहा है, तो हम क्यों ना धोए।
(संस्कारधानी जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर डॉ. राजकुमार “सुमित्र” जी को सादर चरण स्पर्श । वे सदैव हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते थे। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया। वे निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणास्रोत हैं। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता – सेतु की नियति दो…२।)
साप्ताहिक स्तम्भ – लेखनी सुमित्र की # ३०५ ☆
☆ – सेतु की नियति दो…२ ☆ स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र”
वैसे कुछ लोग
बखूबी निभा लेते है
शिष्टाचार
कहने वालों के मुँह कौन सिये
कहकर बौनों को वामन का अवतार।
वे हजार ढंग से कह सकते
हज़ार बात,
मगर हम जानते हैं अपनो की औकात।
अपनी औकात जानना कम नहीं है
हमें इस बारे में भ्रम नहीं है।
ये भी सही है, सचाई है पीढ़ी-पीढ़ी के दरम्यान खाई है।
पितृ पीढ़ी के
कतिपय ययातिधर्मियों की दृष्टि में
हमारा अस्तित्व बेकार है, व्यर्थ है, परशुप्रिय स्वात्र्योत्तरों के लेखे-
‘हम गुलामी के अवशेषों का क्या अर्थ है?’
दो पीढ़ियों द्वारा अनादरित अपमानित हमारी पीढ़ी अब क्या करे ?
यह एक जलता हुआ सवाल है ?
एक पीढ़ी अँधेरा आंज रही है दूसरी के हाथों में मशाल है।
कौन समझेगा
हमारी पीड़ा और संताप ?
जन्म लेना हो गया अभिशाप ! अरे ओ अँधेरा आंजने वालों !
तुम्हें क्या हो गया है ?
विवेक कहाँ सो गया है ?
क्या वो तुम नहीं थे जिसने हमें दुलराया था,
हमारी दूधिया आँखों मे
क्रमशः…
स्व डॉ. राजकुमार “सुमित्र”
साभार : डॉ भावना शुक्ल
112 सर्राफा वार्ड, सिटी कोतवाली के पीछे चुन्नीलाल का बाड़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश
≈ संस्थापकसंपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈
(प्रतिष्ठित कवि, रेखाचित्रकार, लेखक, सम्पादक श्रद्धेय श्री राघवेंद्र तिवारी जी हिन्दी, दूर शिक्षा, पत्रकारिता व जनसंचार, मानवाधिकार तथा बौद्धिक सम्पदा अधिकार एवं शोध जैसे विषयों में शिक्षित एवं दीक्षित। 1970 से सतत लेखन। आपके द्वारा सृजित ‘शिक्षा का नया विकल्प : दूर शिक्षा’ (1997), ‘भारत में जनसंचार और सम्प्रेषण के मूल सिद्धांत’ (2009), ‘स्थापित होता है शब्द हर बार’ (कविता संग्रह, 2011), ‘जहाँ दरक कर गिरा समय भी’ 2014) कृतियाँ प्रकाशित एवं चर्चित हो चुकी हैं। आपके द्वारा स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम के लिए ‘कविता की अनुभूतिपरक जटिलता’ शीर्षक से एक श्रव्य कैसेट भी तैयार कराया जा चुका है। आज प्रस्तुत है आपका एक अभिनव गीत “जीवन की सारी घटनायें...”।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ # ३०२ ☆।। अभिनव गीत ।। ☆
☆ “जीवन की सारी घटनायें...” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी ☆
(श्री श्याम खापर्डे जी भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी हैं। आप प्रत्येक सोमवार पढ़ सकते हैं साप्ताहिक स्तम्भ – क्या बात है श्याम जी । आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “भूख की आग…”।)
(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी जबलपुर से श्री राजेंद्र तिवारी जी का स्वागत। इंडियन एयरफोर्स में अपनी सेवाएं देने के पश्चात मध्य प्रदेश पुलिस में विभिन्न स्थानों पर थाना प्रभारी के पद पर रहते हुए समाज कल्याण तथा देशभक्ति जनसेवा के कार्य को चरितार्थ किया। कादम्बरी साहित्य सम्मान सहित कई विशेष सम्मान एवं विभिन्न संस्थाओं द्वारा सम्मानित, आकाशवाणी और दूरदर्शन द्वारा वार्ताएं प्रसारित। हॉकी में स्पेन के विरुद्ध भारत का प्रतिनिधित्व तथा कई सम्मानित टूर्नामेंट में भाग लिया। सांस्कृतिक और साहित्यिक क्षेत्र में भी लगातार सक्रिय रहा। हम आपकी रचनाएँ समय समय पर अपने पाठकों के साथ साझा करते रहेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण कविता ‘अब आगे बढ़ते जाना है…‘।)