संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं सजग अग्रज साहित्यकार श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” जी के साप्ताहिक स्तम्भ “मनोज साहित्य” में आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “बुन्देली गीत – सच्चई-मुच्चई लड़वे ठाँढे़…”। आप प्रत्येक मंगलवार को आपकी भावप्रवण रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे।
मनोज साहित्य # २३२ ☆
☆ बुन्देली गीत – सच्चई-मुच्चई लड़वे ठाँढे़…☆श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” ☆
(प्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक साहित्य ” में हम श्री विवेक जी की चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं। श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी , जबलपुर ) से सेवानिवृत्त हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। आपको वैचारिक व सामाजिक लेखन हेतु अनेक पुरस्कारो से सम्मानित किया जा चुका है।आज प्रस्तुत है यात्रा संस्मरण – – “लंदन डायरी – लंदन के घरों की छत पर उल्लू और दरवाजे पर सिंह” ।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ४२७ ☆
यात्रा संस्मरण – लंदन डायरी – लंदन के घरों की छत पर उल्लू और दरवाजे पर सिंह श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆
लंदन में चलते हुए मेरी एक आदत बन गई है। सड़क पर चलते हुए अब मैं केवल सामने नहीं देखता, कभी ऊपर भी देखने लगता हूं। यह आदत इस शहर ने ही डाली है।
किसी पुराने भवन की खिड़की के ऊपर अचानक कोई पत्थर का चेहरा दिखाई दे जाता है। किसी दरवाजे के दोनों ओर दो छोटे सिंह बैठे मिल जाते हैं। कहीं छत के किनारे कोई पक्षी पंख समेटे बैठा है और कहीं भवन की दीवार पर कोई विचित्र सा जीव मानो सदियों से आने जाने वालों को देख रहा हो।
पहले मुझे लगता था कि यह सब वास्तुशिल्प की सजावट भर है। लेकिन थोड़ा खोजने पर पता चला कि लंदन के इन पत्थर और धातु के जीवों की भी अपनी एक भाषा है।
मिसाल के लिए सिंह।
लंदन में सिंह केवल चिड़ियाघर में नहीं मिलते। वे भवनों की रखवाली भी करते हैं। Bank of England की वास्तुकला में सिंहों की उपस्थिति को शक्ति का प्रतीक माना गया है और उन्हें बुरे इरादों से रक्षा करने वाली छवि से भी जोड़ा गया है। वहां सिंह दरवाजों, दीवारों और भवन के भीतर तक दिखाई देते हैं। उसी भवन में उल्लू भी हैं, जिन्हें ज्ञान और विवेक का प्रतीक माना गया है।
यहां एक तथ्य खास तौर पर ध्यान खींचता है। सिंह लंदन या ब्रिटेन के जंगलों का स्वाभाविक प्राणी नहीं है। ब्रिटेन में सिंह कभी जंगली पशु के रूप में नहीं रहे। फिर भी ब्रिटिश प्रतीक संसार में सिंह की उपस्थिति इतनी गहरी है कि वह राजसत्ता, शक्ति, साहस और संरक्षण का मानो स्वाभाविक प्रतीक बन गया है। शायद इसी कारण लंदन की इमारतों पर पत्थर के सिंह इतने सहज दिखाई देते हैं, जैसे वे इस शहर के पुराने निवासी हों। Bank of England स्वयं सिंह को शक्ति का प्रतीक और बुरे इरादों से रक्षा करने वाली स्थापत्य छवि के रूप में बताता है।
अर्थात भवन भी शायद कह रहा होता है, बाहर से मजबूत दिखो पर भीतर से समझदार रहो।
लंदन में सिंहों की कहानी इससे भी पुरानी और रोचक है। Trafalgar Square में Nelson’s Column के नीचे बैठे चार विशाल कांस्य सिंहों को Sir Edwin Landseer ने बनाया था और 1867 में उन्हें वहां स्थापित किया गया। उनकी भूमिका केवल सौंदर्य बढ़ाने की नहीं, बल्कि Nelson की स्मृति की रक्षा करने वाले प्रहरी जैसी कल्पित की गई।
Oxford Street के पास Stratford Place के प्रवेश द्वार पर सिंह की मूर्ति लगी है। अठारहवीं शताब्दी में बने इस परिसर के प्रवेश पर सिंहों की मौजूदगी मानो आने वाले को बता रही थी कि भीतर कोई साधारण जगह नहीं, एक विशिष्ट आवासीय संसार है।
और फिर है South Bank Lion,
कभी यह सिंह Lambeth की Lion Brewery की छत के ऊपर बैठकर Thames की ओर देखता था। 1837 में William Frederick Woodington ने इसे Coade Stone में बनाया था। Brewery खत्म हुई, भवन भी चला गया, लेकिन सिंह बचा रहा। वह लंदन में इधर से उधर घूमता हुआ अंततः Westminster Bridge के पास पहुंच गया। आज वह Grade II* listed ऐतिहासिक मूर्ति है।
एक सिंह ने मानो नौकरी बदल ली, लेकिन शहर नहीं छोड़ा।
उल्लुओं की कहानी कुछ और दिलचस्प है।
Southwark में एक पुराने मकान की ऊपरी मंजिल की दीवार पर एक उल्लू और एक बिल्ली की छोटी मूर्तियां लगी हैं। स्थानीय तौर पर यह जगह “Owl and the Pussy-Cat” house के नाम से जानी जाती है। इन मूर्तियों का वास्तविक कारण आज भी निश्चित रूप से ज्ञात नहीं है। अनुमान लगाया जाता है कि शायद इनका संबंध Edward Lear की प्रसिद्ध कविता से हो, लेकिन यह भी केवल संभावना है।
मुझे लंदन की यही बात अच्छी लगती है। यहां हर चीज का अर्थ जरूरी नहीं कि एक ही हो।
कभी मूर्ति वास्तुशिल्प है, कभी प्रतीक, कभी इतिहास की बची हुई निशानी और कभी किसी व्यक्ति की निजी शरारत।
सबसे बड़ी बात आम लोग भी अपने घरों में ये प्रतीक मूर्तियाँ लगवाये हुए हैं।
हमारे यहां भी घरों के बाहर हाथी, सिंह, घोड़े, हंस और देवी देवताओं की प्रतिमाएं दिखाई देती हैं। उनके पीछे अक्सर धार्मिक विश्वास, वास्तु संबंधी धारणाएं या शुभता की कामना होती है। लंदन में भी प्रतीक हैं, लेकिन उनका अर्थ अधिक बार इतिहास, शक्ति, पेशे, कला, स्मृति या निजी रुचि से जुड़ता दिखाई देता है।
और शायद इसीलिए यहां चलते हुए ऊपर देखना भी एक तरह का इतिहास पढ़ना है।
नीचे फुटपाथ पर आज का लंदन चल रहा है। लोग मोबाइल पर बातें कर रहे हैं, बसें आ जा रही हैं, साइकिलें निकल रही हैं, कोई टु गो कप कॉफी लेकर जल्दी में है।
और ठीक उनके ऊपर, किसी पुराने भवन की छत पर बैठा एक पत्थर का उल्लू चुपचाप सब देख रहा है।
वह न मोबाइल देखता है, न घड़ी।
सिंह भी वहीं है, अपनी जगह अडिग।
सदियों से शायद उसका काम ही यही है, शहर को मूक रहकर देखते रहना।
मैं सोचता हूं, लंदन के भवन केवल ईंट, पत्थर और शीशे से नहीं बने हैं। उनके चेहरे भी हैं, कान भी हैं, आंखें भी हैं और कभी कभी छत पर बैठे हुए उल्लू भी।
बस फर्क इतना है कि लंदन की इन मूर्तियों से दोस्ती करने के लिए आपको ऊपर देखना पड़ता है।इस शहर में इतिहास अक्सर संग्रहालय में बंद नहीं मिलता।कभी वह आपके सिर के ऊपर छत पर बैठा होता है।
(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है सामाजिक विमर्श पर आधारित विचारणीय लघुकथा “अनाथ”।)
☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २७५ ☆
☔ लघुकथा ☔ अनाथ ☔
पारंपरिक रूप से त्योहार मनाना, उसे उत्साह उमंग उल्लास के साथ मिलबाँट कर सहेजना प्रेम, प्यार, सौहार्द की भावना को बढ़ते देखना सभी को अच्छा लगता है।
आज मानसी के ह्दय में उथल- पुथल मची थी कि रक्षाबंधन तो आया पर क्या? राखी का प्यार विश्वास भैया निभा पाया या वह स्वयं निभा सकी।
आसपास की बातें सुनने और घर में सिर्फ औपचारिकता से राखी बंधवाने का मतलब, अब उसे लगने लगा कि रक्षाबंधन अब एक मानसिक बंधन होने लगा है। भौहें-चढ़ाना, आँखे ततेरना, हर बात पर छींटाकशी और सिर्फ मै मेरा!! तू तेरा।
वह उठी पूजा की थाल लिए घर के मंदिर में दीपक जला, भारी मन से प्रार्थना करने लगी – – – प्रभु मुझे अगले जनम अनाथ बना देना। कम से कम सामाजिक दानदाताओं और चेरिटी वाले कृतज्ञता कातर दृष्टि से ही सही एक दिन का तो परिवार मिल जाता है।
पीछे से भाई की आवाज आई रहने दो—मै अभी जा रहा हूँ!! बाद में आऊंगा तो देखते है।
मानसी राखी की डोरी लिए माँ की तरफ देखने लगी। बंधन ही तो है – – – – तू कान्हा जी को बाँध ले! बिटिया माँ ने रुंधे गले से आवाज लगाई।
(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” आज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)
☆ आलेख # १८९ ☆ देश-परदेश – नाम में क्या रखा है? ☆ श्री राकेश कुमार ☆
हमारे यहां लोग अपने इष्ट देव का पर्यायवाची आदि से नाम रखना पसंद करते थे, ताकि उनका बच्चा भी उन्हीं के सामान गुणकारी बने। इसीलिये रावण, कंस, शूर्पनखा आदि नाम किसी बच्चे का नहीं सुना हैं। इंसान अपने कर्मो से ही पहचान बना लेता है, नाम महत्वपूर्ण नहीं होता हैं।
इन दिनों चर्चित नाम है, तुकाराम मुंडे जोकि वर्तमान में महाराष्ट्र के फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेटर विभाग में कमिश्नर श्री तुकाराम मुंडे इन दिनों बहुत अधिक चर्चा में चल रहे हैं। मई 2026 में इस पद पर विराजमान होते ही उन्होंने अपने तेवर दिखाने आरंभ कर दिए हैं।
कुछ सप्ताह पूर्व करीब चालीस करोड़ के गुटका मसाले जप्त करने के बाद, उन्होंने मुम्बई के बड़े होटल, खाद्य जिंसों के वितरण आदि संस्थाओं के यहां भी छापा मार कर खाद्य उद्योग में खलबली मचा दी हैं। मुम्बई में अमीर और गरीब सब के प्रिय वड़ा पाव बेचने वाले तक को नहीं छोड़ा हैं। अभी तक सस्ता वडा पाव अखबार के पन्ने को टुकड़े में परोसा जाता हैं। अखबार की स्याही हानिकारक होती है, इस लिए इसको अब प्रतिबंधित कर दिया गया हैं।
मुंबई के रद्दी/भंगार आदि व्यवसाय से जुड़े लोगों को आर्थिक हानि हो गई हैं। पुराने अखबार के स्टॉक रखने वाले सकते में आ गए हैं। एक मित्र से मुंबई में बात हुई, तो उसने बताया रद्दी क्रेताओं ने भी अब बहुत कम रेट कर दिए हैं।
विगत दिन ये अफवाह उड़ी थी, कि तुकाराम को राजस्थान स्थानांतरित कर दिया गया हैं। उनके दो दशक के कार्यकाल में दो दर्जन ट्रांसफर हो चुकी हैं। उपरोक्त चित्र हमारे जयपुर के बहुत सारे परिवारों की रसोई का हैं। अब जयपुर की महिलाएं इंतजार में कब तुकाराम मुंडे उनकी किचेन की गंदगी देखकर, उनके रसोई घर बंद करवा देगा और उनको भी इस बोरिंग सी दिनचर्या के काम से मुक्ति मिलेगी।
तुकाराम नाम में कुछ तो है, 26/11 के हमले में पाकिस्तानी आतंकवादी दरिंदे कसाब को भी तो मुंबई पुलिस के कांस्टेबल स्वर्गीय तुकाराम अंबाले ने ही जान की बाजी लगा कर जिंदा पकड़ा था। हम तो इस बात को नकारते है, कि नाम में क्या रखा हैं।
(संस्कारधानी जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर डॉ. राजकुमार “सुमित्र” जी को सादर चरण स्पर्श । वे सदैव हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते थे। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया। वे निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणास्रोत हैं। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता – प्रायमरी का मास्टर…३।)
साप्ताहिक स्तम्भ – लेखनी सुमित्र की # २९९ ☆
☆ – प्रायमरी का मास्टर…४ ☆ स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र”
आप जानते हैं
समाज के रजिस्टर में
प्राथमिक शिक्षक
सबसे निचली श्रेणी में दर्ज है?
किसी ने कहा था-
इसमें क्या हर्ज है,
वो तो छोटे बच्चों को पढ़ाता है
इसलिये छोटी रकम पाता है,
बेवकूफ है,
क्यों चिल्लाता है।
मैं नहीं जानता कि
ऐसी बेतुकी बात कौन कहता
या कि लिखता होगा,
ये बात तय है कि
ऐसा कहने वाला
स्कूल के दिनों में
खूब पिटता होगा।
खैर !
उस कमबख्त से क्या लेना है
मुझको या आपको
चलने दें वार्तालाप को।
ये सही है कि
वो ‘ग‘ गधे का पढ़ाता है।
पर ये गलत नहीं है कि
वो गधे को आदमी बनाता है,
उसे दिल्ली, भोपाल या विदेशों में,
पहुँचाता है
कभी गौर किया है कि
वो बदले में क्या पाता है।
जी,
वो लहू के घूँट पीता है।
क्रमशः…
स्व डॉ. राजकुमार “सुमित्र”
साभार : डॉ भावना शुक्ल
112 सर्राफा वार्ड, सिटी कोतवाली के पीछे चुन्नीलाल का बाड़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश
≈ संस्थापकसंपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈
(प्रतिष्ठित कवि, रेखाचित्रकार, लेखक, सम्पादक श्रद्धेय श्री राघवेंद्र तिवारी जी हिन्दी, दूर शिक्षा, पत्रकारिता व जनसंचार, मानवाधिकार तथा बौद्धिक सम्पदा अधिकार एवं शोध जैसे विषयों में शिक्षित एवं दीक्षित। 1970 से सतत लेखन। आपके द्वारा सृजित ‘शिक्षा का नया विकल्प : दूर शिक्षा’ (1997), ‘भारत में जनसंचार और सम्प्रेषण के मूल सिद्धांत’ (2009), ‘स्थापित होता है शब्द हर बार’ (कविता संग्रह, 2011), ‘जहाँ दरक कर गिरा समय भी’ ( 2014) कृतियाँ प्रकाशित एवं चर्चित हो चुकी हैं। आपके द्वारा स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम के लिए ‘कविता की अनुभूतिपरक जटिलता’ शीर्षक से एक श्रव्य कैसेट भी तैयार कराया जा चुका है। आज प्रस्तुत है आपका एक अभिनव गीत “इस कुटुम्ब के सम्बर्धन के...”।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ # २९६ ☆।। अभिनव गीत ।। ☆
☆ “इस कुटुम्ब के सम्बर्धन के...” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी ☆
(श्री श्याम खापर्डे जी भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी हैं। आप प्रत्येक सोमवार पढ़ सकते हैं साप्ताहिक स्तम्भ – क्या बात है श्याम जी । आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “पवित्र बंधन…”।)
(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी जबलपुर से श्री राजेंद्र तिवारी जी का स्वागत। इंडियन एयरफोर्स में अपनी सेवाएं देने के पश्चात मध्य प्रदेश पुलिस में विभिन्न स्थानों पर थाना प्रभारी के पद पर रहते हुए समाज कल्याण तथा देशभक्ति जनसेवा के कार्य को चरितार्थ किया। कादम्बरी साहित्य सम्मान सहित कई विशेष सम्मान एवं विभिन्न संस्थाओं द्वारा सम्मानित, आकाशवाणी और दूरदर्शन द्वारा वार्ताएं प्रसारित। हॉकी में स्पेन के विरुद्ध भारत का प्रतिनिधित्व तथा कई सम्मानित टूर्नामेंट में भाग लिया। सांस्कृतिक और साहित्यिक क्षेत्र में भी लगातार सक्रिय रहा। हम आपकी रचनाएँ समय समय पर अपने पाठकों के साथ साझा करते रहेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण कविता ‘भारत मां का ये प्रहरी…‘।)
☆ अभिव्यक्ति # १२२ ☆
☆ भारत मां का ये प्रहरी… ☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆
(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय डॉ कुन्दन सिंह परिहार जी का साहित्य विशेषकर व्यंग्य एवं लघुकथाएं ई-अभिव्यक्ति के माध्यम से काफी पढ़ी एवं सराही जाती रही हैं। हम प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहते हैं। डॉ कुंदन सिंह परिहार जी की रचनाओं के पात्र हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं। उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम एवं विचारणीय आलेख – ‘खाप और खूंटा (वैचारिकी)‘। इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार # ३४६ ☆
☆ आलेख ☆ खाप और खूंटा (वैचारिकी) ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆
हाल ही में हरयाणा की एक खाप पंचायत का ब्यौरा टीवी पर देखा। पंचायत में अन्य निर्णयों के अलावा लड़कियों के आचरण के बारे में कुछ निर्णय लिये गये— कि लड़कियां दुपहिया वाहन पर पीछे बैठते वक्त एक ही तरफ पैर रखें, दोनों तरफ नहीं, छोटे कपड़े न पहनें, मोबाइल का इस्तेमाल न करें, भाग कर शादी न करें, शादी में माता-पिता की सहमति लें, ‘लिव इन’ में न रहें। मर्जी की शादी करने वाले और ‘लिव इन’ में रहने वाले जोड़ों के लिए सामाजिक बहिष्कार की सज़ा निर्धारित की गयी।
ज़हिर है कि पितृसत्तात्मक समाज युवाओं, ख़ास तौर से लड़कियों पर अपनी गिरफ्त ढीली नहीं करना चाहता। हमारा संविधान नागरिकों को जो भी अधिकार दे, ये जाति- पंचायतें और ग्राम-पंचायतें समाज को पुरानी, प्रासंगिकता खो चुकी मान्यताओं में ही जकड़ कर रखना चाहती हैं। दिल्ली उच्च न्यायालय के एक ताज़ा निर्णय के अनुसार लिव-इन रिश्ता शादी जैसा है। माता-पिता इसमें दख़ल नहीं दे सकते।
आज की लड़कियों को देखकर यह समझना मुश्किल है कि वे कितने संघर्ष और कितनी बाधाओं को लांघ कर वर्तमान स्थिति तक पहुंच पायी हैं। कन्या भ्रूण हत्या, बाल विवाह, सती प्रथा, कन्या शिक्षा निषेध, विधवा विवाह निषेध, देवदासी प्रथा जैसे जाने कितने सड़े-गले नियम ख़त्म किये गये। इसमें उच्च अंग्रेज़ अधिकारियों और देशी समाज-सुधारकों की बड़ी भूमिका रही, जिन्होंने रूढ़िवादियो के कट्टर विरोध के बाद भी अपने प्रयासों में ढील नहीं आने दी। कहीं पढ़ा कि प्राचीन बंगाल में पति की मृत्यु के बाद विधवा की दुर्गति हो जाती थी। बहुत दिनों तक मांगलिक कार्यों में विधवाओं को शामिल नहीं किया जाता था। विधवा के द्वारा रंगीन वस्त्र पहनना या आभूषण धारण करना भी अनुचित माना जाता था। उससे जीवन भर सफेद सादा वस्त्र धारण करने की अपेक्षा की जाती थी।
कई साल पहले एक अखबार में सती प्रथा पर एक बड़े धर्मगुरु का वक्तव्य पढ़ा था। वे राजस्थान में सती-प्रथा पर प्रतिबंध लगने से दुखी थे। उनका कथन था— ‘जो स्वेच्छयता से सती होना चाहती है उसे रोकना नहीं चाहिए और जो सती नहीं होना चाहती उसे इस कार्य के लिए बाध्य भी नहीं किया जाना चाहिए।— हमारे यहां आत्महत्या करने से पाप होता है, लेकिन सती को ऐसा कोई पाप नहीं लगता और सती होकर वह पति को भी पापों से मुक्त कर देती है।— सच्ची सती वह है जो पतिव्रता धर्म का पालन करे। ऐसा करने वाली स्त्री वस्तुत: पति के जीवन काल में ही सती हो जाती है।’
हमारे समाज में अगर सड़क पर लड़के लड़कियों के साथ गुंडई करें तो उसके लिए अक्सर लड़कियों के आचरण और उनके छोटे कपड़ों को ही दोषी माना जाता है। हमारे यहां लड़के-लड़की की दोस्ती को अस्वाभाविक माना जाता है। इसीलिए लड़की तभी सुरक्षित महसूस करती है जब वह लड़कें को अपना ‘भाई’ बना लेती है या उसकी कलाई पर राखी बांध देती है। लड़के- लड़की की ‘दोस्ती’ को हमेशा सन्देह की नज़र से देखा जाता है।
लड़कियों के ‘शऊर’ और उनकी ‘पवित्रता’ को लेकर इतनी ज़्यादा चौकन्नी और चिन्तित खापों को यह याद दिलाना ज़रूरी लगता है कि हरयाणा में ही एक सन्त विराजते हैं जो दो शिष्याओं पर कृपा बरसाने के जुर्म में 2017 से सज़ा काट रहे हैं और अब तक आठ साल में सत्रह बार पैरोल या फ़र्लो पर जेल से बाहर आ चुके हैं। जब भी जेल से बाहर आते हैं कारों के काफिले में निकलते हैं और बाहर आकर ऑनलाइन प्रवचन और भक्तों को आशीर्वाद देते हैं। हरयाणा की खापों की लड़कियों के आचरण पर बारीक नज़र रहती है, लेकिन ऐसे सन्तों के बारे में उनकी ज़बान बन्द रहती है। हरयाणा के एक मंत्री जी भी इन सन्त जी के सामने सिर नवाने के साथ चढ़ावा चढ़ा चुके हैं। कारण यह है कि सन्त जी के करोड़ों शिष्य हैं और उनके इशारे पर करोड़ों वोट पार्टी की झोली में गिर सकते हैं।
हमारे देश में धर्मगुरुओं के प्रति शिष्यों की आस्था इतनी ज़बरदस्त रहती है कि गंभीर आरोपों के बाद भी गुरूजी के प्रति शिष्यों की भक्ति में ‘डेंट’ नहीं लगता। दरअसल ज़्यादातर लोगों के लिए ज़िन्दगी में कोई न कोई खूंटा पकड़े रहना ज़रूरी होता है। बिना खूंटे के अपने बूते ज़िन्दगी काटने वाले विरले होते हैं।
(ई-अभिव्यक्ति में मॉरीशस के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री रामदेव धुरंधर जी का हार्दिक स्वागत। आपकी रचनाओं में गिरमिटया बन कर गए भारतीय श्रमिकों की बदलती पीढ़ी और उनकी पीड़ा का जीवंत चित्रण होता हैं। आपकी कुछ चर्चित रचनाएँ – उपन्यास – चेहरों का आदमी, छोटी मछली बड़ी मछली, पूछो इस माटी से, बनते बिगड़ते रिश्ते, पथरीला सोना। कहानी संग्रह – विष-मंथन, जन्म की एक भूल, व्यंग्य संग्रह – कलजुगी धरम, चेहरों के झमेले, पापी स्वर्ग, बंदे आगे भी देख, लघुकथा संग्रह – चेहरे मेरे तुम्हारे, यात्रा साथ-साथ, एक धरती एक आकाश, आते-जाते लोग। आपको हिंदी सेवा के लिए सातवें विश्व हिंदी सम्मेलन सूरीनाम (2003) में सम्मानित किया गया। इसके अलावा आपको विश्व भाषा हिंदी सम्मान (विश्व हिंदी सचिवालय, 2013), साहित्य शिरोमणि सम्मान (मॉरिशस भारत अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी 2015), हिंदी विदेश प्रसार सम्मान (उ.प. हिंदी संस्थान लखनऊ, 2015), श्रीलाल शुक्ल इफको साहित्य सम्मान (जनवरी 2017) सहित कई सम्मान व पुरस्कार मिले हैं। हम श्री रामदेव जी के चुनिन्दा साहित्य को ई अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों से समय समय पर साझा करने का प्रयास करेंगे।
आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय गद्य क्षणिका “– नागरिक…” ।)
~ मॉरिशस से ~
☆ कथा कहानी ☆ गद्य क्षणिका # ११७ — नागरिक —☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆
चार जवान मोटर में जा रहे थे कि सब्जी के एक खेत के पास रुके। खेतिहर बोरे पर बहुत सारी सब्जियाँ रख कर बेच रहा था। लड़कों ने खेतिहर को डरा कर उससे पैसा मांगा। खेतिहर की सोच हुई सुन्दर मोटर, चार जवान। देश कहाँ जा रहा है? खेतिहर हाथ में छुरी ले कर उनके सामने डट गया। वे डर से पीछे सरके और मोटर में भाग चले। खेतिहर की अब सोच हुई वह देश का एक ताकतवर नागरिक है।