(संस्कारधानी जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर आचार्य भगवत दुबे जी को सादर चरण स्पर्श । वे आज भी हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते हैं। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया है।सीमित शब्दों में आपकी उपलब्धियों का उल्लेख अकल्पनीय है। आचार्य भगवत दुबे जी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व की विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 ☆ हिन्दी साहित्य – आलेख – ☆ आचार्य भगवत दुबे – व्यक्तित्व और कृतित्व ☆.आप निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणा स्त्रोत हैं। हमारे विशेष अनुरोध पर आपने अपना साहित्य हमारे प्रबुद्ध पाठकों से साझा करना सहर्ष स्वीकार किया है। अब आप आचार्य जी की रचनाएँ प्रत्येक मंगलवार को आत्मसात कर सकें गे।
आज प्रस्तुत हैं बुन्देली कविता – “बे गुस्सा सें हेरत जा रय“।)
साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ कादम्बरी # १५५ ☆
☆ बुन्देली कविता – “तुम काऊ की खोट न देखौ“☆ आचार्य भगवत दुबे
संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं सजग अग्रज साहित्यकार श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” जी के साप्ताहिक स्तम्भ “मनोज साहित्य” में आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “हर मानव को खुद तपना है”। आप प्रत्येक मंगलवार को आपकी भावप्रवण रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे।
मनोज साहित्य # २२७ ☆
☆ हर मानव को खुद तपना है…☆श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” ☆
(प्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक साहित्य ” में हम श्री विवेक जी की चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं। श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी , जबलपुर ) से सेवानिवृत्त हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। आपको वैचारिक व सामाजिक लेखन हेतु अनेक पुरस्कारो से सम्मानित किया जा चुका है।आज प्रस्तुत है एक ज्ञानवर्धक आलेख – “प्रेम जन्य अपराध” ।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ४२० ☆
आलेख – प्रेम जन्य अपराध श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆
प्रेम मानव इतिहास की वह आदिम और शाश्वत ऊर्जा है, जो जीवन को अर्थ देती है, पर साथ ही वह अग्नि भी है जो मर्यादा की दीवारों को राख करने का साहस रखती है। समाज के ढाँचे को यदि एक स्थायित्व चाहिए, तो वह अक्सर परंपराओं, नियमों और दंड-विधानों के इर्द गिर्द बुना जाता है। इस व्यवस्था में ‘अपराध’ समाज का एक अवांछित अंग है, तो ‘प्रेम’ को समाज ने सदैव एक संदिग्ध, पर अनिवार्य अंग माना है।
प्रश्न यह है कि जो प्रेम जीवन का उत्सव होना चाहिए , वह हिंसा और छल की विभीषिका में क्यों बदल जाता है?
इंदौर की सोनम और पुणे की सिया द्वारा अपने प्रेमी की कुत्सित हत्या जैसी घटनाएँ इसी प्रश्न को एक भयावह समकालीन विमर्श में खड़ा करती हैं, जहाँ प्रेम की भाषा में अपराध की स्याही घुल गई है।
भारतीय मनीषा में प्रेम का स्वरूप कभी एक जैसा नहीं रहा। यदि हम ‘कामसूत्र’ के पन्नों को पलटें, तो वहाँ प्रेम को केवल शारीरिक आकर्षण नहीं, बल्कि एक परिष्कृत संस्कृति और परस्पर विश्वास के रूप में स्थापित किया गया है। वहाँ प्रेम के लिए एक स्वतंत्र स्थान की कल्पना थी। परंतु, इसके समानांतर मनुस्मृति और धर्मशास्त्रीय परंपराओं का कठोर अनुशासन भी चलता रहा। यह हमारे सामाजिक इतिहास का चिरंतन द्वंद्व है। एक ओर हमने प्रेम को काव्य माना, दूसरी ओर समय के प्रवाह में उसे कुल और जाति के कठोर अनुशासनों में कैद करने की कुचेष्टा की। जब प्रेम के नैसर्गिक प्रवाह को सामाजिक दीवारों के भीतर जबरन मोड़ने की कोशिश की जाती है, तो वह अपना प्राकृतिक स्वभाव खोने लगता है। और यह धीरे-धीरे छल, अपराध और घुटन के विषैले अंकुर भी पैदा करता है।
सोनम और सिया की घटनाएँ इस बात का प्रमाण हैं कि आज का प्रेम जब अनियंत्रित और निकास रहित हो जाता है, तो वह मानवीय संवेदनाओं को त्याग देता है। फिल्मों में भी हमने इस अंतर्विरोध को बार-बार देखा है। कभी ‘इश्किया’ जैसी फिल्में प्रेम में छिपी उस काली छाया को दिखाती हैं, जहाँ जुनून अपराध का मार्ग प्रशस्त करता है, तो कभी थ्रिलर फिल्में यह दिखाती हैं कि कैसे रिश्तों के झूठ को छिपाने के लिए हिंसा का सहारा लिया जाता है।
इंदौर और पुणे की ये समकालीन घटनाएँ मात्र दो व्यक्तियों का अपराध नहीं हैं। यह उस सामाजिक वातावरण की विफलता है जहाँ रिश्तों के टूटने को ‘अपमान’ से जोड़ दिया जाता है। माता पिता के अहम पर चोट माना जाता है। जब कोई व्यक्ति समाज के डर से अपना सच नहीं कह पाता, या जब वह अपने प्रेम को ‘स्वामित्व’ समझने लगता है, तब उसे लगने लगता है कि प्रेम को समाप्त करने का एकमात्र तरीका ‘सामने वाले को समाप्त करना’ है।
यह हिंसा उस भावनात्मक परिपक्वता का अभाव है, जिसे हमारा शिक्षा तंत्र और पारिवारिक ढांचा कभी सिखा ही नहीं पाया।
यहाँ यह समझना आवश्यक है कि प्रेम का भाव स्वयं में नैसर्गिक स्वरूप में कभी अपराधी नहीं होता। अपराध तब जन्म लेता है जब प्रेम ‘उत्तरदायित्व’ से मुक्त होकर ‘स्वार्थ’ और ‘स्वामित्व’ की बेड़ियों में जकड़ जाता है। जब समाज प्रेम को अनुमति और निषेध के बीच सीमित कर देता है, तो युवा मन संवाद की स्वस्थ भूमि खो देता है। परिणामस्वरूप, संबंध या तो पूरी तरह आदर्शीकृत हो जाते हैं, या फिर वे अपराधीकरण की ओर ढल जाते हैं।
इन घटनाओं में मीडिया की भूमिका भी कम गंभीर नहीं है, जो अपराध को एक सनसनीखेज कहानी की तरह परोसता है, जिससे समाज में डर तो फैलता है, लेकिन अपराध के पीछे के सामाजिक मनोविज्ञान पर चर्चा कम होती है।
कानून , जुनूनी प्रेम के सम्मुख निर्बल रह जाता है।
इस समस्या का समाधान दंड की कठोरता से परे, सामाजिक चेतना के विस्तार में निहित है। सबसे पहले, हमें परिवारों के भीतर संवाद का एक नया वातावरण बनाना होगा। बच्चों को केवल अकादमिक शिक्षा नहीं, बल्कि भावनात्मक साक्षरता देनी होगी ताकि उन्हें यह समझ हो कि रिश्ता टूटना जीवन का अंत नहीं है। विवाह को एक सामाजिक सौदे से ऊपर उठाकर मानवीय सहमति का क्षेत्र बनाना होगा, जहाँ व्यक्ति अपनी असहमति को बिना किसी डर के व्यक्त कर सके। कानूनों का पालन अपनी जगह अनिवार्य है, लेकिन समाज को भी यह समझना होगा कि किसी भी अपराध को ‘प्रेम का नाम’ देकर उसे रोमांटिसाइज करना बंद करना होगा।
अंततः, प्रेम और अपराध के इस दुष्चक्र को तोड़ने का एकमात्र उपाय प्रेम को अधिक मानवीय और अधिक ईमानदार बनाना है।
हमें समाज में ऐसी संस्कृति विकसित करनी होगी जहाँ व्यक्ति का सम्मान उसकी ‘मर्यादा’ से नहीं, बल्कि उसकी ‘संवेदनशीलता’ से आंका जाए। जब प्रेम में ईमानदारी होगी, तो उसे छिपाने की जरूरत नहीं पड़ेगी, और जब छिपाने की जरूरत नहीं होगी, तो अपराध अपनी छाया में स्वतः गुम होकर सिमट जाएगा।
प्रेम की असली गरिमा उसे अनारकली सा दीवारों में कैद करने में नहीं, बल्कि उसे उत्तरदायित्व और परिपक्वता के खुले आकाश में जीने देने में है।
(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है स्त्री विमर्श पर आधारित विचारणीय लघुकथा “बारिश”।)
☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २७० ☆
🌻 अति लघुकथा (अ ल क) 🌻 🌧️बारिश🌧️
आज बारिश की बूँदों ने श्रेया के मन में ही नही, तन को भी फफोले बना रही थी। तेज, तर्रार, तीखे नयन नक्श, चुल्हे के जैसी धधकी ज्वाला जिसे अनजाने में ही किसी ने सुलगती धुंआ- धुंआ कर डाला।
(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” आज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)
☆ आलेख # १८४ ☆ देश-परदेश – अमानत में ख़यानत ☆ श्री राकेश कुमार ☆
हमारे देश में तो “पड़ोसी” को भाई जैसे रिश्ते से भी अधिक महत्व दिया जाता है। दुःख की घड़ी में तो सबसे पहले पड़ोसी ही काम आता है।
आज उपरोक्त फोटो स्थानीय समाचार पत्र में देख मन बहुत आहत हुआ। जिस समाज में “पड़ोसी पहले” या पड़ोस प्रेम/ सौहार्द का उदाहरण दिया जाता है, वहां इस प्रकार की घटना होना, हमारे नैतिक पतन की पराकाष्ठा का पैमाना बन चुका है।
हम तो विगत छह दशकों से हमेशा अच्छे पड़ोसी से लाभान्वित होते आ रहे हैं। छोटे मोटे विवाद, विचारों में मतभेद एक आम बात हैं।
बचपन से आज तक सप्ताह में, कम से कम एक बार जब तक पड़ोसी से “बार्टर” पद्धति में प्राप्त व्यंजन का आनंद छूटा नहीं है। घर की सब्जी जब मन पसंद नहीं रहती थी, तब पड़ोस की चाची/ मासी के यहां से बिना मांगे स्वादिस्ट व्यंजन का खूब आनंद लेते आ रहें हैं। ये सब आप के साथ भी होता आ रहा है।
अब प्रश्न ये है, कि हमारी नैतिकता में इतनी गिरावट क्यों आ रही है? कहीं हम सब पारिवारिक मूल्यों से दूर पश्चिम की शरण में जाना तो नहीं है? धर्म से दूरी बढ़ती ही जा रही हैं। विषय विचार करने का है।
अब कलम को विश्राम देता हूं, द्वार पर लगी घंटी बजी है, अवश्य ही पड़ोसी की होगी, रविवार शाम के समय उनके यहां से इडली प्रति सप्ताह प्राप्त होती है।
(संस्कारधानी जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर डॉ. राजकुमार “सुमित्र” जी को सादर चरण स्पर्श । वे सदैव हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते थे। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया। वे निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणास्रोत हैं। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता – पद्मा का क्रन्दन और चुप हिमालय…१।)
साप्ताहिक स्तम्भ – लेखनी सुमित्र की # २९२ ☆
☆ – पद्मा का क्रन्दन और चुप हिमालय…१ ☆ स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र”
पद्मा का क्रंदन
दस्तकें दे रहा है,
हिमालय के कानों पर,
और बाँधकर वज्र
प्राणों पर
हिमालय ‘विन्ध्याचल‘ हो रहा है।
हम नहीं करेंगे
अगस्त्य की प्रतीक्षा,
नहीं फलने देंगे कोई छल,
हिमालय हिमालय ही रहेगा
नहीं होने देंगे उसे ‘विन्ध्याचल‘।
बात पर्वतों की कर रहा हूँ
मगर, पर्वत आदमी नहीं होता,
हाँ, आदमी चाहे तो
पर्वत बन सकता है,
मुसीबत के मानसूनों के आगे
उसका सीना तन सकता है।
तो आओ,
हम पहाड़ों का पहाड़ा पढ़ें,
इंसानियत की सीढ़ी-दर-सीढ़ी चढ़ें,
और देखें कि कहाँ क्या हो रहा है।
हाय !
दिलों पर लकीरें खींचकर
सौंपा जा रहा है
प्रतिबंधित रिवेश,
कैसी विडम्बना है-
क्रमशः…
स्व डॉ. राजकुमार “सुमित्र”
साभार : डॉ भावना शुक्ल
112 सर्राफा वार्ड, सिटी कोतवाली के पीछे चुन्नीलाल का बाड़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश
≈ संस्थापकसंपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈
(प्रतिष्ठित कवि, रेखाचित्रकार, लेखक, सम्पादक श्रद्धेय श्री राघवेंद्र तिवारी जी हिन्दी, दूर शिक्षा, पत्रकारिता व जनसंचार, मानवाधिकार तथा बौद्धिक सम्पदा अधिकार एवं शोध जैसे विषयों में शिक्षित एवं दीक्षित। 1970 से सतत लेखन। आपके द्वारा सृजित ‘शिक्षा का नया विकल्प : दूर शिक्षा’ (1997), ‘भारत में जनसंचार और सम्प्रेषण के मूल सिद्धांत’ (2009), ‘स्थापित होता है शब्द हर बार’ (कविता संग्रह, 2011), ‘जहाँ दरक कर गिरा समय भी’ ( 2014) कृतियाँ प्रकाशित एवं चर्चित हो चुकी हैं। आपके द्वारा स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम के लिए ‘कविता की अनुभूतिपरक जटिलता’ शीर्षक से एक श्रव्य कैसेट भी तैयार कराया जा चुका है। आज प्रस्तुत है आपका एक अभिनव गीत “अब लौटे रुदित पिता ...”।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ # २८९ ☆।। अभिनव गीत ।। ☆
☆ “अब लौटे रुदित पिता...” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी ☆
वरिष्ठ पत्रकार, लेखक श्री प्रतुल श्रीवास्तव, भाषा विज्ञान एवं बुन्देली लोक साहित्य के मूर्धन्य विद्वान, शिक्षाविद् स्व.डॉ.पूरनचंद श्रीवास्तव के यशस्वी पुत्र हैं। हिंदी साहित्य एवं पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रतुल श्रीवास्तव का नाम जाना पहचाना है। इन्होंने दैनिक हितवाद, ज्ञानयुग प्रभात, नवभारत, देशबंधु, स्वतंत्रमत, हरिभूमि एवं पीपुल्स समाचार पत्रों के संपादकीय विभाग में महत्वपूर्ण दायित्वों का निर्वहन किया। साहित्यिक पत्रिका “अनुमेहा” के प्रधान संपादक के रूप में इन्होंने उसे हिंदी साहित्य जगत में विशिष्ट पहचान दी। आपके सैकड़ों लेख एवं व्यंग्य देश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। आपके द्वारा रचित अनेक देवी स्तुतियाँ एवं प्रेम गीत भी चर्चित हैं। नागपुर, भोपाल एवं जबलपुर आकाशवाणी ने विभिन्न विषयों पर आपकी दर्जनों वार्ताओं का प्रसारण किया। प्रतुल जी ने भगवान रजनीश ‘ओशो’ एवं महर्षि महेश योगी सहित अनेक विभूतियों एवं समस्याओं पर डाक्यूमेंट्री फिल्मों का निर्माण भी किया। आपकी सहज-सरल चुटीली शैली पाठकों को उनकी रचनाएं एक ही बैठक में पढ़ने के लिए बाध्य करती हैं।
प्रकाशित पुस्तकें –ο यादों का मायाजाल ο अलसेट (हास्य-व्यंग्य) ο आखिरी कोना (हास्य-व्यंग्य) ο तिरछी नज़र (हास्य-व्यंग्य) ο मौन
आज प्रस्तुत है आपका समसामयिक विषय पर एक विचारणीय व्यंग्य “रामचंद्र कह गए सिया से…”।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ प्रतुल साहित्य # ३१ ☆
☆ व्यंग्य ☆ “रामचंद्र कह गए सिया से…” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆
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वर्षों पहले एक फिल्म आई थी गोपी जिसमें दिलीप कुमार पर फिल्माया गया एक गाना बहुत चर्चित हुआ था।
“रामचंद्र कह गए सिया से ऐसा कलयुग आएगा,
हँस चुनेगा दाना जुन का कौवा मोती खाएगा।”
अयोध्या के राम मंदिर में श्रद्धालुओं द्वारा दिये गए दान के पैसों और आभूषणों की चोरी ने इस वर्षों पुराने गीत को सही साबित कर दिया। गीत लंबा है और इसमें जितनी भी बातें कही गई हैं वे सभी सच साबित हो रहीं हैं। राम मंदिर में चोरी की चर्चा न सिर्फ भारत वरन पूरी दुनिया में हो रही है। दान की चोरी करने वालों को श्रद्धालु और तमाम ईमानदार लोग तो धिक्कार ही रहे हैं, ईश्वर पर आस्था रखने वाले सिद्धांतवादी चोर, डाकू, लुटेरे, रिश्वतखोर, जमाखोर भी मंदिर के दान और चढ़ोत्तरी पर हाथ साफ करने वालों की निंदा कर रहे हैं। लोग कह रहे हैं कि मंदिर में दान राशि – संग्रह के लिए बनाए गए नियमों का सख्ती से पालन नहीं हुआ। वैसे देखा गया है कि तमाम नियमों कानूनों के बाद भी देश में अरबों के घोटालों, चोरियों, धोखाधड़ी से लेकर प्रश्न पत्रों व अन्य महत्वपूर्ण दस्तावेजों की चोरी का लम्बे इतिहास के साथ – साथ वर्तमान भी है।
चोर, चौकीदार से शातिर होते हैं। वे लोगों की आंखों के काजल से लेकर दिल तक चुरा लेते हैं और पता चोरी होने के बाद ही चल पाचौड़ाता है। इसलिए तो कहा गया है कि डाल – डाल चलने वाले चौकीदारों की अपेक्षा पात – पात चलने वाले चोर हमेशा सफलता प्राप्त कर लेते हैं। यह ठीक है कि चोरी बुरी बात है पर चोर होना कोई मामूली बात नहीं। चोरी के लिए 56 इंच का सीना होना चाहिए ये तो मैं नहीं कहूंगा क्योंकि इस नाप का सीना निर्विवाद है, लेकिन विशाल सीना होना आवश्यक है। प्राचीन भारतीय ग्रंथों विशेषकर संस्कृत साहित्य जैसे “दशकुमारचरितम्” में चोरी को चतुषष्टिक कलाओं में से एक विशेष विद्या “चौर्य कला” के रूप में उल्लेखित किया गया है। अर्थात चोरी एक कला है इस आधार पर यह मानना पड़ता है कि राम मंदिर के चोर पहुंचे हुए साहसी कलाकार हैं।
एक लोक प्रिय कहावत भी है “राम जी की चिड़िया, राम जी का खेत; खाओ चिड़िया भर-भर पेट“। जो हमारी नजर में चोर हैं वे शायद चंदे को अपना ही समझ कर खा रहे थे। “अजगर करे न चाकरी, पंछी करे न काम। दास मलूका कह गए, सब के दाता राम॥” कहीं ये राम मंदिर में बैठे अजगर तो नहीं थे।
श्रीरामचरितमानस के रचनाकार संत गोस्वामी तुलसीदास जी ने भी रामचरितमानस में वर्षों पूर्व ही बालकाण्ड में लिख दिया था -“होइ है वही जो राम रचि राखा। को करि तर्क बढ़ावै साखा।।” अर्थात् संसार में वही होकर रहेगा जो भगवान श्रीराम ने पहले से तय कर रखा है। व्यर्थ के तर्क – वितर्क करके कौन इसे बढ़ाए। दान के करोड़ों रुपयों और जेवरों का गबन हुआ है। जांच जारी है, कई लोगों से सघन पूछताछ की जा रही है, अनेक लोग गिरफ्तार हुए हैं। संभवतः जांच से सब सामने आ जाए। दूध का दूध पानी का पानी हो जाए। शायद न भी हो क्योंकि “होइहि सोइ जो राम रचि राखा। को करि तर्क बढ़ावै साखा॥” हम तो सिर्फ परिणाम की प्रतीक्षा कर सकते हैं। वैसे यदि चोर राम मंदिर में चोरी करने की जगह कृष्ण मंदिर में चोरी करते तो सफाई में कुतर्क कर सकते थे कि हमने चोर (माखनचोर) के घर चोरी की है, किंतु मर्यादा पुरुषोत्तम के मंदिर में चोरी करके वे बुरी तरह फंस चुके हैं। यों आज के युग में लोग बेशर्मी से चिल्ला – चिल्ला कर चोरी कर रहे हैं, कई लोगों के जीवन यापन का साधन ही फिल्म “चोरी मेरा काम” के हीरो की तरह खुल कर चोरी करना है, ऐसे लोगों पर अब तक क्या प्रतिबंध लगे ? इस फिल्म के गाने के बोल ही देख लीजिये –
चोरी मेरा काम यारो, चोरी मेरा काम।
अरे वो करते हैं चोरी चोरी करून मैं खुले आम।
सुना था स्वतंत्रता पूर्व चोरों – डाकुओं को राजाओं – जमीदारों आदि का संरक्षण प्राप्त रहता था। संरक्षण प्राप्त चोर – डाकू दूसरे राज्यों – क्षेत्रों में चोरी – डकैती करते थे और लूट का धन अपने राज्य राजकोष में जमा करके कमीशन, सुरक्षा व सम्मान प्राप्त करते थे। कहां तक बात करें, दुनिया चोरों से भरी पड़ी है। बहरहाल राम मंदिर के चोरों को राम जी भले ही माफ कर दें लेकिन सरकार और राम भक्त जनता उन्हें कभी माफ नहीं करेगी।