(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जीद्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना “हर मन माली बनकर जीने लगे…”। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – आलेख # २९३ ☆
☆हर मन माली बनकर जीने लगे… ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ ☆
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चाहत मन की ज्योति, बढ़ेगी देखो कैसे।
उम्मीदों से प्रीत,जीतते हरदम जैसे।।
हरियाली की बात, करेगा जब सब कोई।
सूखे को दें मात, देख धरती खुश होई।।
धरती को हरा-भरा बनाने का स्वप्न केवल वृक्षारोपण अभियानों से पूरा नहीं होगा; उसके लिए आवश्यक है कि प्रत्येक मन माली बनकर जीना सीखे। माली होना केवल पौधों को पानी देना नहीं, बल्कि उनके साथ आत्मीय संबंध स्थापित करना है।
आज घरों में पौधे सजावट का हिस्सा बन गए हैं। वे ड्रॉइंग रूम, बालकनी और उद्यान की शोभा तो बढ़ाते हैं, पर अनेक बार हमारा संबंध उनसे वहीं तक सीमित रह जाता है। हम उन्हें वस्तु की तरह रखते हैं, परिवार के सदस्य की तरह नहीं। परिणामस्वरूप हरियाली का विस्तार नहीं, केवल प्रदर्शन बढ़ता है।
भारतीय संस्कृति ने वृक्षों और पौधों को सदैव जीवन का सहचर माना है। तुलसी, पीपल, वट, नीम और बेल जैसे वृक्ष केवल वनस्पति नहीं रहे, बल्कि श्रद्धा, संरक्षण और सहअस्तित्व के प्रतीक बने। यह परंपरा हमें बताती है कि प्रकृति से जुड़ाव केवल पर्यावरण की रक्षा नहीं करता, बल्कि मनुष्य के भीतर संवेदना, धैर्य और करुणा का भी विकास करता है।
समय आ गया है कि हम पौधों को केवल सजावटी वस्तु नहीं, अपने जीवन का अभिन्न अंग मानें। जब किसी नए पत्ते के निकलने पर हमें उतनी ही प्रसन्नता होगी जितनी किसी अपने की मुस्कान पर होती है, तब हर घर सचमुच एक छोटा-सा उपवन बन जाएगा। यदि प्रत्येक व्यक्ति अपने भीतर के माली को जागृत कर ले, तो हरियाली केवल बगीचों में नहीं, हमारे विचारों और व्यवहार में भी दिखाई देगी। यही हरित चेतना आने वाली पीढ़ियों के लिए सबसे सुंदर विरासत सिद्ध होगी।
(प्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक साहित्य ” में हम श्री विवेक जी की चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं। श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी , जबलपुर ) से सेवानिवृत्त हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। आपको वैचारिक व सामाजिक लेखन हेतु अनेक पुरस्कारो से सम्मानित किया जा चुका है।आज प्रस्तुत है एक ज्ञानवर्धक आलेख – “बब्बर शेर ब्रिटिश साम्राज्य के राजचिन्ह का रूपक” ।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ४२१ ☆
व्यंग्य – भंडारा श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆
दीनू दान उड़ा रहा है। चंदू चंदा डकार रहा है। ठेकेदार मुनाफा बटोर रहा है। नेता बजट का श्रेय और बजट का हिस्सा दोनों ले रहा है। अधिकारी कमीशन को प्रशासनिक संस्कार मानकर आत्मसात कर रहा है। जमीन पर कब्जा हो रहा है। जनता मुफ्त प्रसाद की प्रतीक्षा में खड़ी है।
देश में भंडारों की बड़ी परंपरा है। पहले लोग पुण्य कमाने के लिए भंडारे करते थे। अब प्रभाव, प्रभुत्व और प्रायोजन कमाने के लिए करते हैं। पहले कड़ाही में दलिया और खिचड़ी पकती थी, अब कागजों में योजनाएं पकती हैं। पहले पूड़ी सब्जी बंटती थी, अब घोषणाएं, विज्ञापन और सपने बांटे जाते हैं।
भंडारे की शुरुआत हमेशा श्रद्धा से होती है और समापन हिसाब से। श्रद्धालु धन देता है, आयोजक धन्यवाद देता है और बीच का रास्ता धन के चरित्र को बदल देता है। चंदा जब तक दानदाता की जेब में रहता है, धर्म के लिए संकल्प कहलाता है। दान खाते में पहुंचते ही अवसर बन जाता है।
चंदू इसी अवसरवाद का पुरोहित है। वह चंदे को इस कौशल से पचाता है कि आयकर विभाग भी उसके पाचन तंत्र पर शोध करना चाहे। वह पारदर्शिता का इतना बड़ा समर्थक है कि हर सवाल पूछने वाले को आरपार देख लेता है, लेकिन अपने खाते किसी को नहीं दिखाता। उसके अनुसार समाजसेवा में हिसाब मांगना आस्था पर हमला है। वह उदाहरण देता है, प्रतिप्रश्न करता है कि अमुक धर्म या खास ट्रस्ट पर कोई सवाल क्यों नहीं उठा रहे, केवल हमारी आस्था ही क्यों सवाल की परिधि में है।
दीनू सेवा का ब्रांड एंबेसडर है। वह हर फोटो में गरीब के कंधे पर हाथ रखता है और हर सौदे में अपना दूसरा हाथ जेब के भीतर रखता है। उसके चेहरे पर करुणा टपकती है और व्यवहार में गणित। उसे मालूम है कि पांच लाख का दान पचास लाख की प्रतिष्ठा और पांच करोड़ का प्रभाव पैदा कर सकता है। इसलिए वह परोपकार को निवेश की तरह करता है।
नेता जी मंच पर विराजमान हैं। वे जनता को अपना परिवार बताते हैं। यह वही परिवार है जिससे वे चुनाव के बाद उतनी ही दूरी बना लेते हैं जितनी दूरी सुरक्षा घेरा जनता से बनाए रखता है। वे बताते हैं कि विकास गांव गांव पहुंच चुका है। गांव वाले सहमति में सिर हिलाते हैं क्योंकि विकास उनसे मिलने नहीं आया, लेकिन उसका विज्ञापन रोज उनके मोबाइल पर पहुंच जाता है।
अब विकास का अर्थ भी बदल गया है। सड़क टूट जाए तो मरम्मत का बजट विकास है। मरम्मत टूट जाए तो नया टेंडर विकास है। टेंडर रद्द हो जाए तो पुनः स्वीकृति विकास है। काम हो जाए तो वह चमत्कार की श्रेणी में आता है।
ठेकेदार लोकतंत्र का अनसुना जन कवि है। वह सीमेंट में दर्शन और बजरी में संभावना मिलाकर निर्माण करता है। उसकी बनाई सड़कें बरसात आते ही आत्मनिर्भर होकर मिट्टी में विलीन हो जाती हैं। पुल उद्घाटन के समय मजबूत और जांच के समय भावुक पाए जाते हैं। मगर चिंता की कोई बात नहीं। हर दुर्घटना के बाद संवेदना का नया भंडारा शुरू हो जाता है।
अधिकारी व्यवस्था के योगी हैं। वे फाइलों के पद्मासन पर बैठकर निर्णय की साधना करते हैं। उनकी कलम तब तक मौन व्रत में रहती है जब तक उसे समुचित ऊर्जा प्राप्त न हो जाए। इस ऊर्जा के कई नाम हैं, पर जनता इसे सुविधा शुल्क के नाम से पहचानती है।
भंडारे का एक स्वादिष्ट व्यंजन जमीन भी है। जिस भूमि पर स्कूल बनना था, वहां कॉम्प्लेक्स उग आता है। जहां तालाब था, वहां टावर खड़ा हो जाता है। जहां पार्क प्रस्तावित था, वहां प्लॉट बिक जाते हैं। नक्शे बदलते हैं, सीमाएं बदलती हैं, मालिक बदलते हैं, केवल सरकारी रिकॉर्ड अपनी नींद में खर्राटे भरता रहता है।
इस पूरे आयोजन में जनता की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण और सबसे नगण्य है। उसी के नाम पर चंदा आता है, उसी के नाम पर बजट आता है, उसी के नाम पर योजनाएं बनती हैं और उसी के नाम पर भाषण दिए जाते हैं। दरअसल पूरा भंडारा ही जनता के नाम पर आयोजित होता है, जनता का , जनता के लिए , जनता के धन से , बस वही जनता भंडारे के स्वादिष्ट भोजन की लाभार्थियों वाली लाइन में कहीं पीछे छूट जाती है।
भंडारा समाप्त होने पर पत्तलें उठ जाती हैं, बैनर उतर जाते हैं, नारे बदल जाते हैं। लेकिन दीनू बना रहता है, चंदू बना रहता है, ठेकेदार बना रहता है, कमीशन बना रहता है। और बने रहते हैं, नेता जी , जो अवसर के अनुसार नई पार्टी में नजर आ सकते हैं। केवल जनता हर बार नए विश्वास के साथ फिर अगले भंडारे की पंक्ति में लग जाती है।
लोकतंत्र की यही सबसे अद्भुत व्यवस्था है। यहां भंडारा जनता के नाम पर होता है, खर्च खजाने से होता है, लाभ प्रभावशालियों को मिलता है और धन्यवाद जनता देती है। फिर अगला भंडारा घोषित होता है। फिर वही श्रद्धा, वही शोर, वही भाषण, वही बजट, वही बंटवारा।
(सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” जीका हिन्दी बाल -साहित्य एवं हिन्दी साहित्य की अन्य विधाओं में विशिष्ट योगदान हैं। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में रचना सहित 145 बालकहानियाँ 8 भाषाओं में 1160 अंकों में प्रकाशित। प्रकाशित पुस्तकेँ-1- रोचक विज्ञान कथाएँ, 2-संयम की जीत, 3- कुएं को बुखार, 4- कसक, 5- हाइकु संयुक्ता, 6- चाबी वाला भूत, 7- बच्चों! सुनो कहानी, इन्द्रधनुष (बालकहानी माला-7) सहित 4 मराठी पुस्तकें प्रकाशित। मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी का श्री हरिकृष्ण देवसरे बाल साहित्य पुरस्कार-2018 ₹51000 सहित अनेक संस्थाओं द्वारा सम्मानित व पुरस्कृत। साप्ताहिक स्तम्भ “श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य” के अंतर्गत साहित्य आप प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकते हैं। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारानी लघुकथा “मैं ऐसा नहीं” की समीक्षा।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # २४९☆
☆ लघुकथा – मैं ऐसा नहीं☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ ☆
वह फिर गिड़गिड़ाया, “साहब ! मेरी अर्जी मंजूर कर दीजिए. मेरा इकलौता पुत्र मर जाएगा.”
मगर, नरेश बाबु पर कोई असर नहीं हुआ, “साहब नहीं है. कल आना.”
“साहब, कल बहुत देर हो जाएगी. मेरा पुत्र बिना आपरेशन के मर जाएगा.आज ही उस के आपरेशन की फीस भरना है. मदद कर दीजिए साहब. आप का भला होगा,” वह असहाय दृष्टि से नरेश की ओर देख रहा था.
“ कह दिया ना, चले जाइए, यहां से,” नरेश बाबु ने नीची निगाहें किए हुए जोर से चिल्लाते हुए कहा.
तभी उस का दूसरा साथी महेश उसे पकड़ कर एक ओर ले गया.
“क्या बात है नरेश! आज तुम बहुत विचलित दिख रहे हो.” महेश बाबु ने पूछा, “वैसे तो तुम सभी की मदद किया करते हो ? मगर, इस व्यक्ति को देख कर तुम्हें क्या हो गया?” वह नरेश का अजीब व्यवहार समझ नहीं पाया था.
नरेश कुछ नहीं बोला. मगर, जब महेश बाबु ने बहुत कुरैदा तो नरेश बाबु ने कहा, “क्या बताऊ महेश ! यह वही बाबु है, जिस ने मेरी अर्जी रिश्वत के पैसे नहीं मिलने की वजह से खारिज कर दी थी और मेरे पिता बिना इलाज के मर गए थे.”
“क्या !’’ महेश चौंका.
“हां, ये वहीं व्यक्ति है.”
“तब तू क्या करेगा?” महेश ने धीरे धीरे से कहा, “जैसे को तैसा?”
“नहीं यार, मैं ऐसा नहीं हूं,” नरेश ने कहा, “मैंने इस व्यक्ति की अर्जी कब की मंजूर कर दी है और इलाज का चैक अस्पताल पहुंचा दिया है. यह बात इसे नहीं मालुम है.’’ कहते हुए नरेश खामोश हो गया.
महेश यह सुन कर कभी नरेश को देख रहा था कभी उस व्यक्ति को. जब कि वह व्यक्ति माथे पर हाथ रख कर वहीं ऑफिस में बैठा था.
(हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी की अब तक लगभग तेरह दर्जन से अधिक मौलिक पुस्तकें ( बाल साहित्य व प्रौढ़ साहित्य ) तथा लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन।लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन। कई कृतियां पंजाबी, उड़िया, तेलुगु, अंग्रेजी आदि भाषाओँ में अनूदित । कई सम्मान/पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत। भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय द्वारा बाल साहित्य के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य श्री सम्मान’ और उत्तर प्रदेश सरकार के हिंदी संस्थान द्वारा बाल साहित्य की दीर्घकालीन सेवाओं के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य भारती’ सम्मान, अमृत लाल नागर सम्मान, बाबू श्याम सुंदर दास सम्मान तथा उत्तर प्रदेश राज्य कर्मचारी संस्थान के सर्वोच्च सम्मान सुमित्रानंदन पंत, उत्तर प्रदेश रत्न सम्मान सहित बारह दर्जन से अधिक राजकीय प्रतिष्ठित साहित्यिक एवं गैर साहित्यिक संस्थाओं से सम्मानित एवं पुरुस्कृत।
☆ महावस्त्राचे पदर – भाग २ – ‘आई’ (मायेची पैठणी) ☆ श्री विश्वास देशपांडे ☆
नात्यांचं महावस्त्र – ‘आई’ (मायेची पैठणी)
ज्याच्याशिवाय नात्यांचं हे महावस्त्र जन्मालाच येऊ शकत नाही, असा या वस्त्रातील एक अनोखा आणि सर्वात मौल्यवान पदर म्हणजे ‘आई’. नात्यांच्या या वस्त्रातील ती खरी सुवर्णमयी ‘पैठणी’ असते. विधात्याने अत्यंत कुशलतेने आणि निगुतीने घडवलेली! ज्यामुळे आपण या जगात येतो आणि आपल्याला आपली ओळख मिळते असे एक नाते म्हणजे आई. प्रत्यक्ष परमेश्वराने सुद्धा जेव्हा पृथ्वीवर अवतार घेतला, तेव्हा त्यालाही आईमुळेच सर्वश्रेष्ठ ओळख मिळाली. राम झाला कौसल्यानंदन, कृष्ण झाला देवकीनंदन. अंजनेय(हनुमंत)आणि राधेय(कर्ण) हे देखील आपल्या आईच्या नावामुळेच ओळखले गेले. ‘ आईची महती ‘ एवढी थोर की जगातल्या अनेक थोर साहित्यिकांनी तिच्यावर भरभरून लिहिले.
’आई’ हा शब्द जरी उच्चारला, तरी डोळ्यांसमोर प्रेमाची अशी एक मूर्ती उभी राहते जी वैश्विक आहे. माणूस असो वा प्राणी, भारत असो की जगाच्या पाठीवरचा कुठलाही देश; आईचे प्रेम सर्वत्र सारखेच असते. म्हणूनच मी आईला प्रेमाची वैश्विक मूर्ती म्हणतो. इतरांचं प्रेम भलेही ‘माया’ असेल, पण तिचं प्रेम म्हणजे ‘आभाळमाया’! आपल्या मुलांवर असलेली तिच्या प्रेमाची शाल केवळ ऊब देत नाही, तर एक अभेद्य कवच बनून आयुष्यभर त्यांचे रक्षण करते. “घार हिंडते आकाशी, चित्त तिचे पिलापाशी… ” तशी आई शरीराने कुठेही असली, तरी तिचे चित्त मात्र सदैव आपल्या लेकरापाशीच असते.
परमेश्वराने तिला पृथ्वीवर पाठवतानाच तिच्या काळजात ‘अखंड माया’ भरून पाठवली आहे. आई म्हणजे परमेश्वराचे दुसरे रूप. कोणीतरी खूप छान म्हटलं आहे की, परमेश्वराला सगळीकडे उपस्थित राहणे शक्य नाही म्हणून त्याने आईला पाठवले आहे. ती स्वतः उपाशी राहील, पण लेकराचं पोट भरल्याशिवाय तिचं पोट भरत नाही. तिची स्वतःची झोप होवो न होवो, आपल्या तान्हुल्याची झोप नीट व्हावी म्हणून तिची धडपड असते. “निजल्या तान्ह्यावरी माउली दृष्टी सारखी धरी” अशी तिची अवस्था असते. जी स्त्री जन्माला येते, अशी प्रत्येक स्त्री ‘बाई’ होते; पण तिचे बाईपण ‘आई’ झाल्याशिवाय पूर्ण होत नाही. आणि त्यासाठी तिने मुलाला जन्म दिलाच पाहिजे अशी काही अट नसते, तिला फक्त ‘आई’ होता आलं पाहिजे, मायेचं पांघरूण घालता आलं पाहिजे. किंबहुना, आई होण्यासाठी स्त्री असण्याचीही अट नाही; ज्याच्या हृदयात सगळ्यांबद्दल प्रेम आणि कळवळा काठोकाठ भरला आहे, अशी कोणतीही व्यक्ती आई होऊ शकते.
पंढरपूरला विटेवर उभा असलेला पांडुरंग सर्व भाविकांचे, वारकऱ्यांचे दैवत. हा सावळा विठ्ठल काही करत नाही, काही बोलत नाही, काही देत नाही आणि घेतही काही नाही. पण तो ‘विठू माउली’ झाला. का बरं? कारण तो सगळ्यांचं दुःख ऐकून घेतो, सगळ्यांना उराशी धरतो. त्याच्याजवळ कोणताच भेदभाव नाही. तो जरी बोलत नसला, तरी सगळ्यांना खात्री असते की “भिऊ नकोस मी तुझ्या पाठीशी आहे” असा आशीर्वाद प्रत्येकाला तो नक्कीच देतो.
”ऐशी कळवळ्याची जाती, करी लाभावीण प्रीती. “
जिच्यामुळे हे विश्व निर्माण झाले अशी माता पार्वती जगज्जननी झाली. आमचे संत देखील ‘माउली’ झाले. समाजाने ज्यांचा अपार छळ केला, तरीही ज्यांच्या मुखातून विश्वाच्या कल्याणासाठी ‘पसायदान’ नावाचे अमृत बाहेर पडले, ते संत ज्ञानेश्वर म्हणूनच ‘ज्ञानेश्वर माउली’ झाले. अहिल्याबाई होळकर लोकांसाठी समाजसेवेची अनेक कामे करून ‘लोकमाता’ झाल्या. अनाथ, निराधार मुलांवर मायेचे छत्र धरणाऱ्या सिंधूताई सपकाळ याच व्यापक मातृत्वाचे रूप झाल्या. ज्या आदीवासी, अशिक्षित स्त्रियांनी वृक्षांचे संवर्धन करण्यासाठी प्रसंगी आपल्या प्राणांचे बलिदान देऊन वृक्षांचे संरक्षण केले, त्या वृक्षमाता झाल्या. अशी मातेची अनेक रूपे.
आपल्या मुलांवर प्रेम करते ती ‘आई’; सर्वांबद्दल प्रेमभाव जिच्या मनात असतो ती ‘माता’; आणि अखिल विश्वाला कवेत घेणारी अपार माया जिच्या काळजात असते, ती ‘माउली’!
”न मातु: पर दैवतम” असे आपल्याकडे म्हटले जाते; म्हणजेच आईसारखे दुसरे दैवत नाही. इतर देवतांना प्रसन्न करण्यासाठी कठोर तपश्चर्या करावी लागते, नवस बोलावे लागतात. पण हे मातृत्व नावाचे दैवत असे आहे की, त्याला प्रसन्न करण्यासाठी कोणतीही उपासना करावी लागत नाही. तिच्या पोटी केवळ जन्म घेतला, की ही देवता प्रसन्न होते आणि आयुष्यभर त्या बाळाची काळजी वाहते. प्रसूती वेदना काय असतात, ते फक्त माताच जाणे! पण जेव्हा ते नवजात अपत्य ती पहिल्यांदा आपल्या जवळ घेते, तेव्हा तिच्या त्या प्रसववेदनांचे शीतल चांदणे होऊन तिच्या मुखावर एक अद्भूत हास्य विलसते. तिच्या उरातील माया अमृत होऊन तिच्या स्तनातून बाळासाठी पाझरू लागते. तिच्या कुशीत जेव्हा तिचं बाळ असतं, तेव्हा ती जगातली सर्वात समृद्ध स्त्री असते. आयुष्याच्या विद्यापीठातली ‘आई’ नावाची सर्वोच्च पदवी निसर्गाने तिला बहाल केलेली असते.
बाळ अजाणतं असतं, असहाय असतं, त्याला काहीच करता येत नाही तेव्हापासून आई त्याला सावरते. जेव्हा त्याच्या चिमुकल्या ओठांतून ‘आई’ हा पहिला शब्द उमटतो, तेव्हा तिच्या काळजाचा झालेला आनंद गगनात मावत नाही. याच एका शब्दासाठी ती नऊ महिने नऊ दिवस आसुसलेली असते. मग ती हळूहळू त्या सानुल्याला बोलायला शिकवते, पाऊल पाऊल टाकत चालायला शिकवते आणि त्याला स्वतःच्या पायावर उभे करते. तीच त्याची पहिली शाळा आणि पहिला गुरू असते. या शाळेत कुठलीही फी नसते, उलट काळजी आणि प्रेम मात्र अपार असते.
बाळ जसजसं मोठं होतं, तसतसं तिचं काळीज आनंदाने फुलत जातं. बाळाच्या पंखात ताकद येते आणि ते स्वतःचे आभाळ शोधायला उडू लागतं. पण कधी कधी, आकाशात उंच भरारी घेणाऱ्या या पाखराचे लक्ष जमिनीवर एकटीच बसलेल्या आपल्या वृद्ध आईकडे जात नाही. अशा वेळी ती केवळ दोन शब्दांच्या प्रेमासाठी आसुसलेली असते. आता तिच्या पंखातले बळ कमी झालेले असते. आता वेळ असते त्या मुलाची—परतफेड करण्याची. खरं तर, आईच्या ऋणातून मुक्त होणे किंवा त्याची परतफेड करणे जन्मांतरातही शक्य नाही, पण कृतज्ञतेने त्या ऋणातून उतराई होण्याचा प्रामाणिक प्रयत्न मात्र नक्कीच करता येतो.
आई नावाच्या नात्याचा परिसस्पर्श ज्यांच्या आयुष्याला झाला, त्या आयुष्याचं सोनं झालं! कौसल्येने रामाला घडवलं, यशोदेने कृष्णाला, जिजाऊ मातेने छत्रपती शिवरायांना, भुवनेश्वरी देवींनी स्वामी विवेकानंदांना, आणि ‘श्यामच्या आई’ने साने गुरुजींना घडवले. असा हा मातृमहिमा अपार आहे.
सखोल आणि योग्य मार्गदर्शन आणि अचूक निर्णयक्षमता यासारख्या गोष्टी म्हणजे आईच्या सल्ल्याचे वैशिष्ट्य! आईनं ज्यांना मार्गदर्शन केलं आणि आईचा सल्ला ज्यांनी शिरोधार्य मानला, त्यांनी जीवनामध्ये फार मोठे कार्य करून दाखवले आणि ते यशस्वी झाले. पांडवांनी आपल्या माता कुंतीचा सल्ला प्रत्येक वेळी शिरोधार्य मानला; त्याच वेळी त्यांचे बंधू असलेल्या कौरवांनी मात्र आपल्या आईचा (गांधारीचा) सल्ला नेहमीच धुडकावून लावला. या दोन्ही गोष्टींचे परिणाम काय झाले, याची साक्ष महाभारतात आपल्याला मिळते. पांडवांना सर्वत्र विजय मिळाला आणि कौरवांचा मात्र पराभव झाला. छत्रपती शिवाजी महाराजांनी देखील माता जिजाऊंचा सल्ला प्रत्येक प्रसंगी शिरोधार्य मानला, म्हणूनच ते हिंदवी स्वराज्याची स्थापना करू शकले.
आई या नात्याचे अनेक पदर आहेत. गुरूची पत्नी जेव्हा ‘गुरुमाता’ होते, तेव्हा ती आश्रमातील सर्व बटूंना स्वतःच्या मुलासारखे सांभाळते. वशिष्ठांच्या आश्रमात जेव्हा राम, लक्ष्मण, भरत आणि शत्रुघ्न यांचे शिक्षण पूर्ण झाले, तेव्हा निघताना प्रभू रामचंद्रांनी गुरुमातेचे पाय धरून म्हटले, “तुम्ही आईच्या मायेने आम्हाला सांभाळले, कशाचीच उणीव भासू दिली नाही. आमच्या वागण्यात काही चुकले असेल, तर आईच्या मायेने आम्हाला क्षमा करा. ” खरोखरच धन्य ती गुरुमाता आणि धन्य ते संस्कारी भावंडे! रामायणाने अशी नाती कशी जपावीत याचा आदर्श आपल्यासमोर ठेवला आहे. रामाला वनवासात पाठवले म्हणून जग कैकयीला दोष देत असताना, राम लक्ष्मणाला समजावतो, “आई कोणीही असो, ती सदैव आदरणीयच असते. मला वनात पाठवण्यामागे तिचा नक्कीच काहीतरी चांगला उद्देश असेल. माझ्या शिक्षणात काही उणीव राहिली असेल, ती पूर्ण करण्यासाठीच ही वनाची योजना असावी. ” ही उदात्तता आजच्या पिढीने शिकायला हवी.
ज्याच्या डोक्यावर मातृछत्र छाया धरून असतं, त्याच्या भाग्याची थोरवी काय वर्णावी? प्रत्यक्ष परमेश्वराला देखील हे भाग्य लाभत नाही म्हणून तो सुद्धा मानवी अवतार धारण करून पृथ्वीवर येतो. ‘दिवार’ या चित्रपटातील एक संवाद मला आजही आठवतो. त्या चित्रपटात इन्स्पेक्टर असलेला शशी कपूर आणि चोराची भूमिका करणारा अमिताभ यांच्यातील संवाद फार लोकप्रिय झाला होता. अमिताभ शशी कपूरला म्हणतो, “मेरे पास गाडी है, बंगला है, नोकर चाकर, पैसा है… तुम्हारे पास क्या है? ” तेव्हा शशी कपूरने दिलेलं उत्तर फार सुंदर आहे. तो म्हणतो, “मेरे पास माँ है! ” आईची बरोबरी कशानेच होऊ शकणार नाही, कुबेराची संपत्ती देखील तिच्या तुलनेत फिकी आहे.
पण आज आम्हाला केवळ या महापुरुषांची आणि त्यांच्या मातांची थोरवी सांगून भागणार नाही. असे सुपुत्र आजच्याही काळात घडावेत आणि त्यांना जन्म देणाऱ्या माता धन्य व्हाव्यात, ही भारतभूमी धन्य व्हावी, ही काळाची गरज आहे. लहान मूल म्हणजे मातीचा गोळा; जसा आकार द्यावा तशी मूर्ती घडते. ही सुसंस्कारी मूर्ती घडवण्याची पहिली आणि मुख्य जबाबदारी आईची असते. खाण तशी माती असे आपण म्हणतो. आई जर सुसंस्कारित आणि सुशिक्षित असेल तर तिची मुले सुद्धा तशीच होतील. अशा आया घरोघरी असतील तर सुसंस्कारित समाज निर्माण होईल.
वर्तमानकाळातील मातांपुढे आजच्या युगाने खूप मोठी आव्हाने उभी केली आहेत. पूर्वीची आई मुख्यतः ‘गृहिणी’ होती, त्यामुळे मुलांवर संस्कार करण्यासाठी, त्यांच्याशी गप्पा मारण्यासाठी तिच्याकडे पुरेसा वेळ असायचा. आजच्या आईला मात्र नोकरी, करिअर आणि घर अशी दोन्ही आघाड्यांवर दुहेरी कसरत करावी लागते. कधी कधी यामुळे तिच्या मनात एक अनामिक ‘अपराधित्व’ (Guilt) डोकावते की, मी माझ्या मुलाला वेळ देऊ शकत नाही. पण अशाही परिस्थितीत ती आपला पदर खोचून खंबीरपणे उभी आहे. ती केवळ मुलांचे संगोपन करत नाही, तर आपल्या कर्तृत्वाने मुलांसमोर स्वावलंबनाचा एक नवा आदर्श ठेवत आहे.
तथापि, बदलत्या काळाच्या पार्श्वभूमीवर आजच्या आईला काही जाणीवपूर्वक निर्णय घ्यावे लागतील. पूर्वी एकत्र कुटुंब पद्धतीमध्ये आजी-आजोबा, काका-काकू असायचे, मुलांवर सहज संस्कार व्हायचे. आज बहुतेक घरात एकच मूल असते आणि ते एकलकोंडे होते. आजी-आजोबांच्या गोष्टींचे माध्यम आता बऱ्याच घरांतून नाहीसे झाले आहे. मुले पाळणाघर किंवा प्ले-ग्रुपमध्ये वाढतात, पण तिथे आवश्यक कौटुंबिक संस्कार मिळतीलच असे नाही; ही पोकळी आईलाच भरून काढावी लागेल.
आजची मुले ‘डिजिटल’ युगातली आहेत. ती नुसते सांगून किंवा उपदेश ऐकून शिकत नाहीत; त्यांच्यासमोर स्वतःचा आदर्श ठेवावा लागतो. “सारखा मोबाईल पाहू नकोस, पुस्तक वाच, अभ्यास कर” असे ओरडून मुले ऐकणार नाहीत. आई-बाबांनी कामावरून आल्यावर स्वतः मोबाईल आणि टीव्ही बाजूला ठेवून हातात एखादे चांगले पुस्तक धरले, तर मुलेही त्याचे अनुकरण करतील. आईचा पदर आणि तिची अंगाई यातून जी भावनिक ऊब मुलाला मिळते, ती ‘यूट्यूब’वरील बालगीतांमधून कधीच मिळू शकत नाही, हे आजच्या मातेला समजून घ्यावे लागेल. सुट्टीच्या दिवशी पालकांनी मुलांसाठी वेळ द्यायला हवा, घरातील छोटी-मोठी कामे करताना त्यांना सोबत घेतले, तर श्रमाची आणि जबाबदारीची सवय त्यांना आपोआप लागेल.
नात्यांच्या या भरजरी ‘महावस्त्रा’चा हा मातृत्वाचा पदर जर संस्कारांनी आणि ओलाव्याने संपन्न राहिला, तरच पुढची पिढी निकोप आणि सुदृढ होईल. आई नावाच्या या पैठणीची जरतारी चमक कधीच फिकी पडू न देणे, ही आजच्या प्रत्येक मुला-मुलीची आणि समाजाची नैतिक जबाबदारी आहे.
(संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं अग्रज साहित्यकार श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव जी के गीत, नवगीत एवं अनुगीत अपनी मौलिकता के लिए सुप्रसिद्ध हैं। आप प्रत्येक बुधवार को साप्ताहिक स्तम्भ “जय प्रकाश के नवगीत ” के अंतर्गत नवगीत आत्मसात कर सकते हैं। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण एवं विचारणीय “गीतिका” ।)
(वरिष्ठ साहित्यकारश्री अरुण कुमार दुबे जी,उप पुलिस अधीक्षक पद से मध्य प्रदेश पुलिस विभाग से सेवा निवृत्त हुए हैं । संक्षिप्त परिचय ->> शिक्षा – एम. एस .सी. प्राणी शास्त्र। साहित्य – काव्य विधा गीत, ग़ज़ल, छंद लेखन में विशेष अभिरुचि। आज प्रस्तुत है, आपकी एक भाव प्रवण रचना “ख़्वाहिशें बेहिश हुई है…“)
श्री हेमन्त तारे जी भारतीय स्टेट बैंक से वर्ष 2014 में सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृत्ति उपरान्त अपने उर्दू भाषा से प्रेम को जी रहे हैं। विगत 10 वर्षों से उर्दू अदब की ख़िदमत आपका प्रिय शग़ल है। यदा- कदा हिन्दी भाषा की अतुकांत कविता के माध्यम से भी अपनी संवेदनाएँ व्यक्त किया करते हैं। “जो सीखा अब तक, चंद कविताएं चंद अशआर” शीर्षक से आपका एक काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुका है। आज प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम रचना – मकीं तो मुंतज़िर हैं…।)
(वरिष्ठ साहित्यकारडॉ सत्येंद्र सिंह जी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत। मध्य रेलवे के राजभाषा विभाग में 40 वर्ष राजभाषा हिंदी के शिक्षण, अनुवाद व भारत सरकार की राजभाषा नीति का कार्यान्वयन करते हुए झांसी, जबलपुर, मुंबई, कोल्हापुर सोलापुर घूमते हुए पुणे में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी के पद से 2009 में सेवानिवृत्त। 10 विभागीय पत्रिकाओं का संपादन, एक साझा कहानी संग्रह, दो साझा लघुकथा संग्रह तथा 3 कविता संग्रह प्रकाशित, आकाशवाणी झांसी, जबलपुर, छतरपुर, सांगली व पुणे महाराष्ट्र से रचनाओं का प्रसारण। जबलपुर में वे प्रोफेसर ज्ञानरंजन के साथ प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े रहे और झाँसी में जनवादी लेखक संघ से जुड़े रहे। पुणे में भी कई साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। वे मानवता के प्रति समर्पित चिंतक व लेखक हैं। अप प्रत्येक बुधवार उनके साहित्य को आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है एक विचारणीय लघुकथा – “अमोघ… “।)
☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ७० ☆
लघुकथा – अमोघ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆
घर बन रहा था। इंजीनियर बार बार बुलाया करते कि घर का निर्माण कार्य देख लीजिए। मैं कहता कि आप इंजीनियर हैं, निर्माण कार्य की जिम्मेदारी आपकी है और तकनीकी रूप से मैं तो कुछ जानता नहीं। उनके बार बार अनुरोध करने पर गया। बनते हुए घर को देख रहा था। कमरे छोटे लग रहे थे। लिविंग रूम और किचन के बीच दीवार बनी खड़ी थी। दीवार गीली थी। मैंने उस पर हाथ रखा तो लगा कि वह बहुत कमजोर है। मैं धक रह गया क्योंकि इतनी कमजोर दीवार रहेगी तो घर मजबूत कैसे रहेगा। अंदर ही अंदर मुझे क्रोध आ रहा था।
मैंने बिल्डर से बात की और अपना क्रोध दबाते हुए कमजोर घर की चिंता जताई तो बिल्डर थोड़ा हँस पड़े। बोले कि दीवार बनते समय कमजोर रहती है पर सूखने पर मजबूत हो जाती है और उसके ऊपर प्लास्टर होने पर एकदम मजबूत हो जाती है। ऐसी ही दीवारों से बना घर अच्छा और मजबूत बनता है। बिल्डर की बात मैंने सुनी और ठीक है साहब कहकर वहां से चला आया। बिल्डर और इंजीनियर अनुभवी थे और मुझे निर्माण कार्य का कोई अनुभव नहीं। चिंता थी और क्षोभ भी।
घर बन गया और बिल्डर ने चाभी दे दी परन्तु मैं नये घर में जो नहीं रहा था। किराए पर रहता था परन्तु मकान मालिक अब खाली करने को कह रहे थे। उन्हें पता चल गया था कि मेरा घर बन गया है। परिणामस्वरूप मुझे अपने घर में जाना पड़ा। नया घर सबको अच्छा लग रहा था। अच्छा तो मुझे भी लग रहा था पर मन में वह बनने वाली दीवार कोंध जाती। आज घर में रहते हुए दस वर्ष हो गए। कभी एक बूँद पानी नहीं आया। इंजीनियर बिल्डर पर बसा झूठा अविश्वास मजबूत विश्वास में बदलता गया। और विश्वास मेरे लिए अमोघ विश्वास बनता गया।
(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा – गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी, संस्मरण, आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – रसेदार सब्ज़ी)
शाम के पाँच बज चुके थे। सरकारी दफ़्तर में हिसाब-किताब देखते-देखते रामप्रसाद बाबू की आँख लग गई थी।
नींद में वह मुस्कुरा रहे थे—”आज घर जाऊँगा तो रसेदार सब्ज़ी बनी होगी। सुबह दाल बनाने को भी कह दिया था। दाँत अब पहले जैसे नहीं रहे, पर रसेदार सब्ज़ी के साथ रोटी आराम से खा लेता हूँ।”
तभी चपरासी ने आवाज़ दी, “बाबूजी! पाँच बज गए। घर नहीं जाना क्या?”
वह चौंककर उठे, झोला उठाया और रास्ते में आलू-टमाटर खरीद लिए। एक दुकान पर नज़र पड़ी तो पत्नी के लिए एक छोटा-सा पर्स भी ले लिया। मन ही मन सोचने लगे, “बहुत खुश होगी।”
घर पहुँचे। ताला खोला। भीतर सन्नाटा था।
उन्होंने सब्ज़ियाँ मेज़ पर रखीं और नया पर्स निकालकर दीवार पर टँगी पत्नी की तस्वीर के सामने रख दिया।
काँपती आवाज़ में बोले, “देखो… तुम्हारे लिए पर्स लाया हूँ।”
फिर रसोई में जाकर डिब्बे से सूखी रोटियाँ निकालीं, पानी में भिगोकर खाने लगे।
आँखों से आँसू लगातार गिरते रहे।
पत्नी को गुज़रे तीन वर्ष हो चुके थे, पर प्रेम ने आज तक यह स्वीकार नहीं किया था कि वह अब लौटकर नहीं आएगी।
उधर उसी समय उनका बेटा और बहू एक महंगे भोजनालय में परिवार के साथ भोजन कर रहे थे। तस्वीर खिंची और सामाजिक माध्यम पर लिखा गया—
“माता-पिता का आशीर्वाद ही सबसे बड़ी दौलत है।”
कुछ ही देर में सैकड़ों प्रशंसाएँ मिल गईं।
इधर रामप्रसाद बाबू की थाली में आज भी सूखी रोटी थी… और उधर बेटे की तस्वीर में संस्कार।
विडंबना यह नहीं कि पिता अकेला था, विडंबना यह थी कि उसका बेटा कभी अकेला दिखाई नहीं देता था।