हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ९४३ ⇒ न व नी त ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “न व नी त …“।)

?अभी अभी # ९४३ ⇒ आलेख – न व नी त ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

*AMUL BUTTER*

भारत कभी सोने की चिड़िया था, और यहां घी दूध की नदियां बहती थी, यह सत्य सनातन है।

द्वापर में सबै भूमि गोपाल की थी, जिन्होंने बृज की गोपियों के साथ रास रचाया था, धेनु चराई थी, बांसुरी की धुन सुनाई थी और गोपियों के घर से माखन चुराया था। खुद ने ही नहीं खाया था, ग्वाल बालों को भी खिलाया था और दाऊ ने बरबस मुख लिपटाया था।

बचपन में मुझे नवनीत बहुत पसंद था। हमारे घर में कभी घी दूध की नदियां नहीं बहीं, हां असली, पंखों वाली चिड़ियां जरूर छायादार वृक्षों पर आकर बैठ जाती थी। रोज सुबह समय निकालकर सावरकर वाचनालय निकल जाता था, जहां सरिता, मुक्ता जैसी अन्य पत्रिकाओं के साथ, नवनीत डाइजेस्ट भी मेरी प्रिय पसंद थी।।

नवनीत मक्खन को भी कहते हैं। तब हमने अमूल बटर का नाम भी नहीं सुन रखा था। तिलक पथ पर भावे की डेरी थी, जहां दूध, दही, घी, मक्खन और पनीर मिलता था। मक्खन की टिकिया मिलती थी, पन्नी में लिपटी हुई, नमक वाली और बिना नमक वाली। तब पॉलीथिन शब्द हमारे मुंह नहीं लगा था। कभी घर में दूध में मलाई जमने ही नहीं दी तो मक्खन कहां से निकलता। हम माखन चोर भले ही नहीं रहे, लेकिन मलाई हमने बहुत मारी। अपनी चोरी छुपाने के लिए हमने एक बिल्ली पाल रखी थी। मलाई हम खाते थे, और मार बिल्ली खाती थी। आज भी हम चाय मलाई मार के ही पीते हैं।

जिस तरह हाथी के दांत खाने के अलग, और दिखाने के अलग होते हैं, मक्खन भी दो तरह का होता है, खाने का, और लगाने का। कभी पोल्सन नाम का मक्खन भी आता था, जिसका हमने सिर्फ नाम ही सुना। ना कभी खाया और ना ही लगाया।।

वैसे मक्खन जैसी चिकनी चुपड़ी बातें भले ही हमसे करवा लो, हम किसी को मक्खन लगाने के सख्त खिलाफ हैं। हम संस्कारी लोग हैं। हमारे यहां हर काम रीति, रस्म और रिवाज से होता है। हल्दी जैसी गुणकारी वस्तु भी अगर हम खाते हैं तो लगाते भी हैं। बाकायदा हल्दी की रस्म होती है। गाजे बाजे के साथ, डंके की चोट हल्दी लगाई जाती है। हल्दी लगवाई है, कोई चोरी नहीं की।

होती है हमारे यहां तेल मालिश भी, मसाज भी, लेकिन तेल से, मक्खन से नहीं। तेल सरसों का भी चलेगा, खोपरे का भी चलेगा, अगर आप संपन्न हैं तो बादाम का तेल लगाओ, लेकिन कम से कम मक्खन को तो ब्रेड से अलग मत करो। जूते की पॉलिश भले ही क्रीम से होती हो, मक्खन से तो पॉलिश भी नहीं होती।।

जो लोग अधिक घी खाना चाहते हैं, उन्हें अधिक धन कमाना पड़ता है। पैसा सिर्फ मेहनत, भाग्य, पुरुषार्थ अथवा बेईमानी से ही नहीं कमाया जाता, चिकनी चुपड़ी, मीठी मीठी बातों से भी लक्ष्मी प्रसन्न होती है।

मिश्री सी जबान ही मक्खन का काम भी कर देती है। प्रेम के दो शब्द से तो पत्थर भी पिघल जाता है, फिर इंसान क्या। आप भी बस मीठा बोलिए, वही असली मक्खन है।

अमूल मक्खन स्वदेशी भी और नमकीन भी ! दाल मखनी हो या फिर पाव भाजी, मक्खन तो उसमें तैरना ही चाहिए। आज की पीढ़ी पिज़्ज़ा और आइसक्रीम के नाम पर ढेरों चीज़ (cheeze) और क्रीम का सेवन कर रही है, जो स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। मक्खन स्वादिष्ट है और पौष्टिक भी। निर्मल बाबा का कहा मानें। खुद भी खाएं और चार लोगों को भी खिलाएं, लेकिन किसी को लगाएं नहीं।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य #३१३ ☆ संवाद : संबंधों की जीवन-रेखा… ☆ डॉ. मुक्ता ☆

डॉ. मुक्ता

(डा. मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य” के माध्यम से  हम  आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी की मानवीय जीवन पर आधारित एक विचारणीय आलेख संवाद : संबंधों की जीवन-रेखा। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की  लेखनी को  इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें।) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य  # ३१३ ☆

☆ संवाद : संबंधों की जीवन-रेखा… ☆

‘संवाद संबंधों की जीवन-रेखा है। परंतु जब आप संवाद अर्थात् वार्तालाप करना बंद कर देते हैं, तो आप अपने अनमोल संबंध खो देते हैं।’ यह वाक्य गहन-गूढ़ अर्थ को परिलक्षित करता है। जैसे संवाद अथवा कथोपथन कहानी या नाटक को गति प्रदान करते हैं; वैसे ही संवाद हमारे जीवन को ऊर्जा व जीवंतता प्रदान करते हैं… हमारे अंतर्मन में जीने की उमंग जाग्रत करते हैं। जैसाकि सर्वविदित है– मानव एक सामाजिक प्राणी है और वह अकेला रहने में स्वयं को असमर्थ पाता है। इसलिए ही वह जन्म- जात संबंधों के रहते भी अन्य संबंध स्थापित करता है, क्योंकि वह अपने सुख-दु:ख की अभिव्यक्ति किए बिना ज़िंदा नहीं रह सकता। वह अपने हृदय के भावों को अभिव्यक्ति प्रदान कर सुक़ून पाता है तथा स्वयं को अकेला, असहाय व विवश अनुभव नहीं करता।

यदि आप वार्तालाप/ संवाद करना बंद कर देते हैं, तो अनमोल संबंधों को खो देते हैं। संवादहीनता मान-दशा तक तो  वाज़िब है, परंतु उसके बाद यह सज़ा बनकर रह जाती है और एक अंतराल के पश्चात् मानव स्वयं को  नितांत अकेला अनुभव करता है। प्रश्न उठता है– क्या संबंध बनाए रखने के लिए मानव को दूसरों को प्रसन्न रखने के लिए अपने आत्म-सम्मान को दाँव पर लगा देना चाहिए? नहीं…यह तो चाटुकारिता कहलायेगी। यदि लंबे समय तक यह स्थिति बनी रहती है, तो मानव तनाव, चिंता व अवसाद से घिर जाता है और अंततः उस व्यूह को भेदना मानव के वश से बाहर हो जाता है। तनाव संबंधों की ताज़गी व पारस्परिक स्नेह-सौहार्द को लील जाता है और ऐसे व्यक्ति के साथ रहने से दूसरे पक्ष के लोग भी गुरेज़ करना प्रारंभ कर देते हैं। सो! उसे जीवन में अकेले विषम परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है।

लंबे समय तक तनाव की यह स्थिति मानव को चिंता के अथाह सागर में धकेल देती है। चिंता चिता समान है, जो दीमक की भांति मानव के उत्साह, साहस, धैर्य आदि को लील कर, शरीर रूपी इमारत की चूलों को हिला कर खोखला कर देती है। चिंताग्रस्त मानव सदैव ख़ुद से बेखबर स्वनिर्मित लोक में विचरण करता रहता है। वह बेसिर-पैर की कल्पनाओं में खोया, अनगिनत शंकाओं में घिरा स्वयं को अपाहिज-सा अनुभव करता है। यदि ऐसा-वैसा हो गया, तो उसका क्या होगा? उसके परिवार की क्या दशा होगी? उन विषम परिस्थितियों से वे कैसे निज़ात पा सकेगे? चिंताग्रस्त मानव को चारों ओर अंधकार ही अंधकार नज़र आता है। जीवन में उसे आशा की कोई किरण दिखाई नहीं पड़ती और न ही कोई उम्मीद की झलक दिखाई पड़ती है…उसे जीवन मरु-सम भासता है। उसकी दशा रेगिस्तान के उस हिरण-सी हो जाती है, जो प्यास से आकुल-व्याकुल सूर्य की किरणों को जल समझ उनके पीछे दौड़ा चला जाता है और अंत में अपने प्राणों से हाथ धो बैठता है। यही होती है अवसाद-ग्रस्त मानव की मन:स्थिति… जिसके जीवन में न कोई उमंग रहती है; न ही कोई तरंग; न प्रसन्नता; न ही उल्लास…वह तो नितांत अकेला, तन्हा-सा अपना जीवन बसर करता है अर्थात् ढोता है।

संवादहीनता मानव को उस कग़ार पर लाकर खड़ा कर देती है, जहां वह हरदम तन्हाई के दंश झेलता है; जो नासूर बन उसे आजीवन सालते हैं। संवादहीनता आजकल सभी रिश्ते-नातों में सेंध लगाकर जीवन के सुक़ून व सुखों पर डाका डाल रही है। सुक़ून मन की वह निर्विकार अवस्था है, जहां मानव राग-द्वेष व स्व-पर की निकृष्टतम वृत्तियों से ऊपर उठ जाता है और अंतर्मन रूपी सागर के शांत जल में निरंतर अवगाहन करता रहता है और वहां पहुचने के पश्चात् सभी इच्छाओं का शमन हो जाता है। परंतु उस स्थिति तक पहुंचने में मानव को वर्षों तक साधना-तपस्या करनी पड़ती है।

आइए! हम संबंध-निर्वाह के विषय पर चर्चा कर लें। संबंध विश्वास के आधार पर स्थापित तो हो जाते हैं, परंतु उनका निबाह करने के लिए आवश्यकता होती है बर्दाश्त करने की…यदि हममें सहनशीलता का मादा है, तो संबंध स्थायी व स्थिर रह सकते हैं, अन्यथा वे पानी के बुलबुले की भांति पल-भर में विलीन हो जाते हैं। संबंध कभी भी दूसरों से जीतकर नहीं निभाए जा सकते; उन्हें बनाए रखने के लिए तो जीतकर भी हारना पड़ता है। उनकी भावनाओं को महत्व देते हुए, प्रियजनों की प्रसन्नता के लिए पराजय को स्वीकारना पड़ता है। इसके विपरीत यदि आप वार्तालाप बंद कर देते हैं, तो संबंध टूट जाते हैं;  समाप्त हो जाते हैं और उन विषम परिस्थितियों में आप अकेले रह जाते हैं और कोई पल-भर के लिए भी आपके साथ समय व्यतीत करना पसंद नहीं करता।

यदि हम संबंधों को चिरस्थाई व शाश्वत् रूप प्रदान करना चाहते हैं, तो हमारे लिए यथासमय झुकना व दूसरों को सहन करना कारग़र होगा। दूसरे शब्दों में हमें परिस्थितियों के अनुसार समझौता करना होगा। झुकना, सहना व समझौता करने की एक ही मांग होती है…अहं का विसर्जन। यह ही एक ऐसा उपादान है; जिसके द्वारा आप दूसरों का हृदय परिवर्तित कर सकते हैं…अपने प्रति दूसरों के मन में विश्वास जाग्रत कर सकते हैं। वैसे भी जीवन केवल संघर्ष ही नहीं; समझौता है। संघर्ष की स्थिति हमारे अंतर्मन की आंतरिक शक्तियों को जाग्रत करती है; प्रेरित करती है; हमें अपने लक्ष्य तक पहुंचाती है। दूसरे शब्दों में समझौता हमारे अंतर्मन की दुष्प्रवृत्तियों का शमन कर, संबंधों को शाश्वत रूप प्रदान कर हमें सुक़ून देता है; जीने की प्रेरणा देता है। सो! संबंधों को सार्थकता प्रदान करने हेतु जहां संवादों की दरक़ार है; वहीं समझौता भी वह संजीवनी है, जिसमें प्राणदायिनी शक्ति निहित है।

अंतत: हम कह सकते हैं कि जीवन में कभी संवादहीनता की स्थिति न पनपने दें, क्योंकि यह वह सुनामी है; जो संबंधों को लील जाता है और जीवन को शून्यता से भर देता है। यह स्थिति मानव के लिए अत्यंत घातक है, विस्फोटक है। सो! हम सबको अपने दायित्व का वहन करना चाहिए और समाज में स्नेह, सौहार्द, समन्वय, सामंजस्यता व समरसता की स्थिति बनाए रखने के लिए अपने अहम् का विसर्जन कर, संबंधों को सार्थक बनाने का भरसक प्रयास करना चाहिए …यही समय की मांग है और मानव-मात्र से अपेक्षित है।

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© डा. मुक्ता

माननीय राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत, पूर्व निदेशक, हरियाणा साहित्य अकादमी

संपर्क – #239,सेक्टर-45, गुरुग्राम-122003 ईमेल: drmukta51@gmail.com, मो• न•…8588801878

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ९४२ ⇒ रेसिडेंसी एरिया ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “रेसिडेंसी एरिया…“।)

?अभी अभी # ९४२ ⇒ आलेख – रेसिडेंसी एरिया ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

हमारे लिए हमारा निवास ही रेसिडेंस है लेकिन हमारे शहर में एक रेसिडेंसी एरिया भी है जहां कभी अंग्रेज अफसर रहते थे। जो भारतीय विदेशों में रहते हैं, वे नान – रेसिडेंट कहलाते हैं। भारत में तब अंग्रेजों का ही शासन था, इसलिए वे रेसिडेंट कहलाए।

हम अपनी पहचान, परिवेश इतनी आसानी से नहीं बदलते। आज भी रेसिडेंसी एरिया अपनी जगह है, वहां अफसरों के निवास हैं, कलेक्टर, कमिश्नर के बंगले हैं, रेसीडेंसी कोठी है, रेसिडेंसी क्लब है। देश में हर जगह गेस्ट हाउस है, सर्किट हाउस है। अंग्रेज चले गए, ठाट बाट छोड़ गए।।

आज भी आप शहर के इस शांत क्षेत्र में चले जाएं, साफ सुथरी सड़कें, हरियाली, बड़े बड़े बंगले, साथ में खुले अहाते, बड़े बड़े मैदान। बगीचा, टेनिस कोर्ट और शुद्ध हवा। आसपास कोई बहु – मंजिला इमारत नहीं, कोई शॉपिंग मॉल अथवा ट्रेडिंग सेंटर नहीं। आपका पड़ोसी कोई अफसर ही हो सकता है, या फिर कोई कॉलेज का प्रोफेसर।

इसी क्षेत्र में जेल भी है और आकाशवाणी का प्रसारण केंद्र भी। आकाशवाणी के क्वार्टर भी हैं और उनके कर्मचारियों द्वारा बसाई गई रेडियो कॉलोनी। बस, इतनी ही कहानी है रेसीडेंसी एरिया की। इसके बाद एक तरफ अगर चिड़िया घर है तो दूसरी तरफ आजाद नगर।।

देश को आजाद हुए सात से अधिक दशक बीत गए, अंग्रेजी राज चला गया, जन सेवक आ गए, राजाओं के महल खाली हो गए, जनता झोपड़ी में और मंत्री बंगलों में आ गए। सन् ७४ में प्रदेश की राजधानी भोपाल प्रवास के दौरान टी टी नगर से लगे हुए ७४ बंगलों के दर्शन प्रात: कालीन भ्रमण के दौरान किए थे। अफसरों और मंत्रियों की नेम प्लेट और आलीशान बंगले। तब और अब मैं सुविधाएं बढ़ी ही हैं, कम नहीं हुई। उसी अनुसार महंगाई भी बढ़ी ही है, कम नहीं हुई।

सामंती सोच, अंग्रेजियत और कांग्रेसी संस्कृति को छोड़ हम एक नई संस्कृति में प्रवेश कर चुके हैं जिसे आप शुद्ध भारतीय संस्कृति कह सकते हैं। हमारे आचार विचार में सादगी और आदर्श का प्रवेश अगर आज भी नहीं होता, तो यह तय है कि हम एक दोहरी जिंदगी जी रहे हैं, जिसमें सिर्फ पाखंड और दिखावा है। आज कोई लाल बहादुर शास्त्री नहीं जो देश पर संकट के समय एक वक्त का भोजन छोड़ने का संकल्प ले और बिना सरकारी विज्ञापन बाजी और कार्यकर्ताओं के शोर के, देशवासी प्रेरित हो, एक समय का भोजन त्यागने का संकल्प ले लें।।

अफसर, गाड़ी बंगले नहीं छोड़ सकता, मंत्री कारों के काफिले और विमान यात्रा नहीं छोड़ सकता। जिस देश में सादगी दिखावा और पाखंड का प्रतीक बन जाए, वहां शान शौकत और भव्यता ही एकमात्र विकल्प बच रहता है। अंग्रेजों ने भारत नहीं, इंडिया छोड़ा। हमने उनका रेसीडेंसी एरिया अपना लिया। आज से उनके सारे बंगले हमारे बंगले हो गए। अर्दली जो थे, चपरासी हो गए।

कुछ भी हो, आई लव माय इंडिया ! इसीलिए मेक इन इंडिया, डिजिटल इंडिया, स्टार्ट अप इंडिया, शाइनिंग इंडिया।

नमस्ते इंडिया, सावधान इंडिया।।

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # २८१ ☆ शांत दिनों की साधना : शीतलाष्टमी से नवरात्रि तक… ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ ☆

श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की  प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं  में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना “शांत दिनों की साधना : शीतलाष्टमी से नवरात्रि तक…”। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  – आलेख # २८१ ☆ शांत दिनों की साधना : शीतलाष्टमी से नवरात्रि तक… ☆

भारतीय जीवन में उत्सव केवल तिथियों का क्रम नहीं हैं, वे मन की तैयारी और सांस्कृतिक चेतना की एक निरंतर यात्रा हैं। कोई भी पर्व अचानक नहीं उतरता; वह धीरे-धीरे ऋतुओं की चाल के साथ हमारे भीतर स्थान बनाता है।

फाल्गुन की चहल-पहल और रंगों की स्मृतियों के बाद जब चैत की आहट सुनाई देती है, तब कृष्ण पक्ष के ये शांत दिन मानो जीवन की गति को थोड़ा थाम लेने का अवसर देते हैं। यह समय बाहरी उत्सवों की चकाचौंध से अधिक भीतर की सजगता का समय होता है—एक ऐसी साधना, जिसमें मन स्वयं को आगामी पर्वों के लिए तैयार करता है।

इन्हीं दिनों में आती है शीतला अष्टमी। लोकजीवन में यह बसोरा के रूप में भी जानी जाती है। इस दिन रसोई की अग्नि को विश्राम दिया जाता है और एक दिन पूर्व बनाया गया बासा भोजन श्रद्धापूर्वक ग्रहण किया जाता है। पहली दृष्टि में यह एक साधारण परंपरा प्रतीत होती है, किंतु इसके भीतर लोकबुद्धि का गहरा संतुलन छिपा है—स्वास्थ्य, स्वच्छता और संयम का संतुलन।

शीतला माता की पूजा करते हुए घरों में एक अलग प्रकार की शांति उतर आती है। चूल्हा भले ही न जले, पर श्रद्धा की एक उजली लौ पूरे घर में फैल जाती है। यह विराम हमें स्मरण कराता है कि जीवन में निरंतर गति जितनी आवश्यक है, उतना ही आवश्यक है ठहरना भी।

यही ठहराव आगे आने वाले नवरात्रि की भूमिका भी रचता है। शक्ति की आराधना का यह महान पर्व केवल नौ दिनों की उपासना भर नहीं, बल्कि उससे पहले की यह मानसिक तैयारी भी उसका एक महत्वपूर्ण आधार है। कृष्ण पक्ष के ये दिन हमें संकेत देते हैं कि अब अपने भीतर की अनावश्यक व्यग्रताओं को धीरे-धीरे कम किया जाए, घर-आँगन को सहेजा जाए और मन में श्रद्धा के लिए एक निर्मल स्थान बनाया जाए।

भारतीय संस्कृति की यही विशेषता है कि यहाँ हर बड़े उत्सव से पहले एक शांत प्रस्तावना होती है—जैसे संगीत से पहले की धुन, या भोर से पहले का वह सन्नाटा जिसमें प्रकाश जन्म लेता है।

इस दृष्टि से देखें तो शीतलाष्टमी केवल एक लोकपर्व नहीं, बल्कि उस सांस्कृतिक क्रम का एक महत्वपूर्ण पड़ाव है, जो हमें आने वाली नवरात्रि की ऊर्जा के लिए भीतर से तैयार करता है।

कृष्ण पक्ष के ये पंद्रह दिन इसलिए रिक्त नहीं हैं।

वे मन को संयत करने की एक साधना है

ताकि जब शुक्ल पक्ष का चंद्रमा बढ़े,

तो उसके साथ हमारी आस्था और बलवती हो सके।

शायद इसी कारण भारतीय संस्कृति ने उत्सवों के बीच ऐसे शांत पड़ाव रचे हैं, जहाँ मन स्वयं से संवाद कर सके। शीतलाष्टमी का यह सहज विराम और नवरात्रि की आने वाली ऊर्जा—दोनों मिलकर हमें यह स्मरण कराते हैं कि शक्ति की उपासना केवल बाहरी अनुष्ठानों से नहीं, बल्कि भीतर की निर्मलता और संतुलन से पूर्ण होती है।

कृष्ण पक्ष के ये शांत दिन हमें ठहरकर देखने का अवसर देते हैं—अपने भीतर, अपने परिवेश में और अपनी परंपराओं में। जब मन का आकाश निर्मल हो जाता है, तभी आस्था का चंद्रमा पूर्णता की ओर बढ़ता है,इसीलिए हमारे उत्सव केवल मनाए नहीं जाते—

वे पहले भीतर जागते हैं,

फिर जीवन में उजाला भर देते हैं।

**

©  श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

माँ नर्मदे नगर, म.न. -12, फेज- 1, बिलहरी, जबलपुर ( म. प्र.) 482020

मो. 7024285788, chhayasaxena2508@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक साहित्य # ४०३ ☆ आलेख – “भारतीय अस्मिता के शब्दशिल्पी: पंडित विद्यानिवास मिश्र” ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ४०३ ☆

?  आलेख – भारतीय अस्मिता के शब्दशिल्पी: पंडित विद्यानिवास मिश्र ? श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

हिंदी ललित निबंध के संसार में पंडित विद्यानिवास मिश्र एक ऐसे देदीप्यमान नक्षत्र हैं, जिन्होंने अपनी लेखनी से मिट्टी की सोंधी गंध और वेदों की ऋचाओं को एक साथ पिरोया है। आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने जिस ललित निबंध की आधारशिला रखी थी, मिश्र जी ने उसे अपने अद्भुत पांडित्य और लोक-अनुभवो को शब्दों से एक विशाल प्रासाद में परिवर्तित कर दिया। उनका लेखन केवल शब्दों का विन्यास नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति की उस अविरल धारा का प्रवाह है, जो गाँवों की पगडंडियों से होती हुई दर्शन के शिखर तक पहुँचती है।

उनके निबंध अनुभूति और शिल्प का संगम हैं।

मिश्र जी के निबंधों का ‘ललित’ पक्ष उनके आत्मपरक दृष्टिकोण में निहित है। उनके निबंधों में ‘मैं’ का अहंकार नहीं, बल्कि ‘मैं’ की आत्मीयता घुली होती है। जब वे ‘कदम की फूली डाल’ या ‘आम्र-मंजरी’ की बात करते हैं, तो वे केवल प्रकृति का वर्णन नहीं कर रहे होते, बल्कि वे पाठक को अपने साथ उस संवेदन-धरातल पर ले जाते हैं जहाँ तर्क पीछे छूट जाता है और केवल प्रवाही रसात्मकता शेष रहती है।

उनकी असाधारण स्मृतयो का रोचक वर्णन लालित्य की बहुत बड़ी विशेषता है। वे वर्तमान की किसी छोटी-सी घटना जैसे बारिश की बूंदों का गिरना , को भी निबंध में इतिहास और पुराणों की महान परंपराओं से जोड़ देते हैं। उनके लेखन में शब्द ‘अर्थ’ ही नहीं देते, बल्कि ‘ध्वनि’ और ‘दृश्य’ भी पैदा करते हैं। उनके निबंधों में एक प्रकार की ‘तरलता’ है, जो पाठक के मन में किसी पुराने राग की तरह गूंजती रहती है।

लोक और शास्त्र का अनूठा अद्वैत

विद्यानिवास मिश्र के लेखन की  विशिष्टता है ।उनके निबंधों में लोक और शास्त्र का समन्वय है। जहाँ एक ओर वे संस्कृत के प्रकांड विद्वान थे और पाणिनी के व्याकरण की सूक्ष्मताओं से परिचित थे, वहीं दूसरी ओर उनके हृदय में लोक-गीतों और ग्रामीण अंचल की स्मृतियाँ रची-बसी थीं। उनके निबंधों में उपनिषदों के सूत्र और कबीर की साखियाँ एक ही धरातल पर आकर संवाद करती हैं। वे अक्सर कहते थे कि भारत की आत्मा महलों में नहीं, बल्कि उन लोरियो में सुरक्षित है जो एक माँ अपने बच्चे को सुलाते समय गाती है।

मिश्र जी की कृतियाँ कालजयी हैं। उनमें तथ्यात्मक वैचारिक विस्तार है। ये निबंध भारतीय जीवन-दर्शन के कोश बन गए हैं। उनका निबंध संग्रह ‘तुम चंदन हम पानी’ भक्ति और समर्पण की उस पराकाष्ठा को दर्शाता है जहाँ भक्त और भगवान के बीच का द्वैत समाप्त हो जाता है। इसी प्रकार ‘आँगन का पंछी और बनजारा मन’ में उन्होंने मनुष्य की उस छटपटाहट को स्वर दिया है जो एक ओर अपनी जड़ों , आँगन से बँधना चाहता है और दूसरी ओर अनंत ज्ञान की खोज में ‘बनजारा’ बनकर भटकना चाहता है।

उनका सबसे चर्चित निबंध ‘मेरे राम का मुकुट भीग रहा है’ आधुनिक हिंदी साहित्य की एक अमूल्य धरोहर है। एक संगीत कार्यक्रम से देर रात घर लौटते अपने पुत्र और अतिथि कन्या की प्रतीक्षा में बैठी एक माँ की ममतामयी चिंता को उन्होंने जिस प्रकार कौशल्या की राम के प्रति चिंता से जोड़ा, वह अद्भुत है। यह निबंध प्रतीकात्मक रूप से बताता है कि जब तक इस देश में ‘मुकुट के भीगने’ अर्थात, संस्कृति और मर्यादा के संकट की चिंता जीवित है, तब तक हमारी संवेदनाएँ मृत नहीं हो सकती ।

कुशल संपादक और पत्रकारिता के प्रतिमान

पंडित जी का संपादन कर्म उनके लेखन जितना ही प्रभावशाली था। उन्होंने ‘नवभारत टाइम्स’ जैसे प्रतिष्ठित समाचार पत्र के संपादक के रूप में हिंदी पत्रकारिता को एक नई गरिमा और वैचारिक गहराई प्रदान की। उनके संपादन में भाषा की शुद्धता और वैचारिक प्रखरता का विशेष ध्यान रखा जाता था। उन्होंने ‘साहित्य अमृत’ पत्रिका के माध्यम से नए रचनाकारों को एक मंच दिया और साहित्यिक पत्रकारिता के उच्च मानक स्थापित किए। वे मानते थे कि समाचार केवल सूचना नहीं होते  बल्कि उनकी प्रस्तुति ऐसी हो जिससे वो समाज के मानस को संस्कारित करने का माध्यम बने।

 पंडित विद्यानिवास मिश्र का अवदान यह है कि उन्होंने हिंदी निबंध को रूखेपन और कोरे बौद्धिक विलाप से बाहर निकाला। उन्होंने सिद्ध किया कि परंपरा जड़ नहीं होती, बल्कि वह एक बहती हुई नदी है जो नए युग के साथ मिलकर अपना मार्ग बनाती है। आज के वैश्वीकरण के दौर में, जब व्यक्ति अपनी पहचान खो रहा है, मिश्र जी का साहित्य हमें पुनः अपनी मिट्टी की सुगंध और अपने संस्कारों के उजियारे की ओर ले जाता है। वे आजीवन एक ऐसे ‘सांस्कृतिक यात्री’ बने रहे, जिनकी यात्रा का गंतव्य भारत की शाश्वत मेधा की खोज था।

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© श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

म प्र साहित्य अकादमी से सम्मानित वरिष्ठ व्यंग्यकार

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ९४१ ⇒ गुणगान ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “गुणगान…“।)

?अभी अभी # ९४१ ⇒ आलेख – गुणगान ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

भक्ति और देशभक्ति का अर्थ ही मेरे देश की धरती और मेरे आराध्य इष्ट, मातृ शक्ति, सदगुरु एवं परम पिता परमेश्वर का गुणगान है। तेरा तुझको अर्पण, क्या लागे मेरा।

सबसे निराली महिमा है भाई, दो अक्षर के राम की, जय बोलो सियावर राम की। राम का गुणगान करिये। राम प्रभु की भद्रता का, सभ्यता का ध्यान धरिये। नमन करना, वंदना करना, नाम लेना, मंत्र का जाप करना, अथवा प्रार्थना करना, सभी उसी ईश्वरीय शक्ति का गुणगान ही तो है।।

जो गुणवान है, सर्व शक्तिमान है, ज्ञान दाता और मोक्ष दाता है, उससे हमारा एक जन्म का नहीं, कई जन्मों का नाता है। उसका रूप भी हो सकता है, कोई आकार भी हो सकता है, और वह निर्गुण निराकार भी हो सकता है। रिश्ते में वह आपकी मां भी हो सकती है, और आपका बाप भी हो सकता है।

गुण के गाहक सहस नर !

हमारे दैनिक उपयोग के उत्पादों का विज्ञापन क्या उनका गुणगान नहीं है। हमारे नेताओं की, अमर शहीदों की, और धार्मिक उत्सवों और जुलूसों में जो जय जयकार होती है, क्या वह गुणगान नहीं है। स्तुति का अर्थ भी गुणगान ही होता है। हमारे वेदों की ऋचाओं और संस्कृत के सुभाषितों में जहां जहां नमः का प्रयोग हुआ है, वह भी गुणगान ही है।।

निंदा स्तुति मनुष्य का स्वभाव है। अपने हित और आत्म कल्याण की भावना अगर उसे किसी के गुणगान की ओर प्रवृत्त करती है तो लालच, खुदगर्जी और स्वार्थ उसे किसी की निंदा के लिए मजबूर करता है। कहीं किसी की सात्विक प्रवृत्ति है तो किसी की तामसिक। हमारे अंदर ही देवासुर संग्राम चल रहा है और हमें उसका पता ही नहीं है।

किसी की तारीफ करना, प्रशंसा करना अथवा बढ़ाई करना हमें बचपन से ही घुट्टी की तरह पिलाया जाता है। बड़ों का आदर, सदा सच बोलना, चोरी नहीं करना, किसी की निंदा नहीं करना और सदा ईश्वर का ध्यान करना। यानी सदाचार का तावीज आपको पहना दिया जाता है।।

जहां प्रेम है, वहां प्रशंसा है। गोरी तेरा गांव बड़ा प्यारा, मैं तो गया मारा, आके यहां रे ! आप इसे फिल्मी गीत कहें अथवा कविता, आखिर यह भी तो गुणगान ही है। गीत, संगीत, भजन, कव्वाली, आरती, सत्संग और प्रवचन, कहां नहीं गुणगान।

फूलों का खिलना, पक्षियों का कलरव, बच्चों का खिलखिलाना, नदी का कलकल बहना और झरनों का गिरना क्या हमें यह सोचने और गुणगान करने पर मजबूर नहीं करता, ये कौन चित्रकार है। सिर पर लाखों तारों वाला नीला आसमान छतरी की तरह तना हुआ है, पृथ्वी घूम रही है, फिर भी हम कभी स्थिर और स्थितप्रज्ञ हैं, तो कभी चंचल और चलायमान। तो क्यों न करें, सिर्फ उस सर्वशक्तिमान का गुणगान।।

आप स्वतंत्र हैं गुणगान के लिए, जिसका चाहे करें।

अपने माता पिता, बंधु सखा अथवा गुरुजन का। इस वसुंधरा का करें, मातृभूमि का करें, अपने सदगुरु का करें, अथवा अपने प्रिय नेता का। आपका विवेक सदा आपका साथ दे। बस निंदा किसी की ना करें।

बड़ा आसान है किसी का गुणगान करना, लेकिन उससे भी मुश्किल है किसी की निंदा नहीं करना। जहां निंदा का अभाव है, वहां गुणगान ही गुणगान है। आप स्वयं गुणों की खान हैं।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ९४० ⇒ गया और बोधगया ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “गया और बोधगया…“।)

?अभी अभी # ९४० ⇒ आलेख – गया और बोधगया ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

मैं कभी गया नहीं गया, बोधगया नहीं गया। सुना है दोनों जगह ऐसी हैं, जहां मुक्ति मिलती है।

जो चला गया, उसे भी और जिसे जीवन का बोध हो गया, उसे भी। जिसे बोध हो गया, वह बुद्ध हो गया। इसी स्थान पर बुद्ध को बुद्धत्व की प्राप्ति हुई थी, वह बोधिवृक्ष यहीं है।

आखिर यह कैसा बोध है जो बोधगया में ही होता है। आप चाहें तो इसे आत्मबोध कहें, आत्म साक्षात्कार कहें, सेल्फ रियलाइजेशन कहें, यह होता तो हमारे अंदर ही है। यह बोधिवृक्ष भी हमारे अंदर ही है। अंदर की खोज के लिए बाहर का आलंबन तो लेना ही पड़ता है। चारों धाम की यात्रा अंतर्यात्रा के बिना कभी पूरी नहीं होती।।

मैं इतना अभागा, कभी प्रयागराज भी नहीं गया। गया हो या बोधगया, बद्रीनाथ धाम हो या हर की पेढ़ी, मुक्ति का द्वार तो गंगा ही है और गंगा, जमना और सरस्वती, तीनों नदियों का संगम भी प्रयागराज ही में है। हो गया न महाकुंभ। ज्ञान, भक्ति और वैराग्य की प्रतीक ही तो हैं ये तीनों नदियां। जिसमें सरस्वती यानी वैराग्य तो लुप्त है। बिना वैराग्य के कहां मुक्ति। बुद्ध का वैराग्य ही बोधगया है।

हां मैं कन्याकुमारी स्थित विवेकानंद रॉक मेमोरियल जरूर गया हूं, कुछ समय के लिए ध्यानमग्न हो विवेकानंद भी बना, फिर वापस चला आया। काश विक्रमादित्य के सिंहासन की तरह बोधिवृक्ष के नीचे बैठने से ही बुद्धत्व की प्राप्ति हो जाए तो जीवन कितना आसान हो जाए। लेकिन यहां गुडविल नहीं, स्ट्रांग विल काम आती है। वैराग्य कोई जागीर नहीं, कि वसीयतनामे के जरिए चाहे जिसके नाम कर दी जाए।।

कबीर अक्सर ताने बाने की बात करते हैं, इड़ा, पिंगला और सुषुम्ना की बात करते हैं। इड़ा, पिंगला को आप चाहें तो सूर्य चंद्र नाड़ी समझें अथवा प्रतीक रूप में ज्ञान और भक्ति रूपा गंगा जमना, लेकिन सुषुम्ना तो अदृश्य वही सुप्त नाड़ी है, जो वैराग्य रूपी सरस्वती नदी की प्रतीक है। तीनों का संगम ही महाकुंभ है जो इसी शरीर में सहस्रार है। जिसे अमृत कहा जाता है, वह वह मुक्ति है जो हमें जन्म मरण के बंधन से मुक्त करती है। देव असुर दोनों मूर्ख थे, जो मुक्त होने की अपेक्षा, स्वर्ग प्राप्ति के लिए, और अमर होने के लिए, अमृतपान करना चाहते थे।

कबीर को भी इसका बोध था और बुद्ध को भी। जीते जी जिसे इसका बोध हो गया, वह बुद्ध हो गया, अमर हो गया वर्ना लगाते रहो डुबकी ज्ञान और भक्ति की गंगा में, बिना वैराग्य भाव के, करते रहो अमृत पान। जब छूटेंगे प्रान, यहीं गया में ही होगा पिंड दान।।

काश मुक्ति इतनी आसान होती ! काशी मरणोन्मुक्ति। काशी में तो केवल प्राण त्यागने से ही मुक्ति मिल जाती है। मैं मति का मारा तो कभी काशी भी नहीं गया। सोचता हूं, जीते जी ही एक बार काशी हो आऊं, प्रयागराज के संगम में स्नान करके बोधगया भी हो आऊं। मन में यह मलाल तो नहीं रहेगा, जीते जी मैं कहीं भी नहीं गया ; न गया, न बोधगया..!!

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

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हिंदी साहित्य – आलेख ☆ जब नई पीढ़ी आगे बढ़ती है, तो दिल मुस्कुरा उठता है ☆ श्री जगत सिंह बिष्ट ☆

श्री जगत सिंह बिष्ट

(Master Teacher: Happiness & Well-Being, Laughter Yoga Master Trainer, Author, Blogger, Educator, and Speaker.)

🌱जब नई पीढ़ी आगे बढ़ती है, तो दिल मुस्कुरा उठता है 🥰

जीवन में एक समय ऐसा भी आता है जब हमारी अपनी उपलब्धियाँ धीरे-धीरे स्मृतियों में धुंधली पड़ने लगती हैं। जिन सफलताओं पर कभी हमें गर्व हुआ करता था, वे अब यादों की अलमारी में सलीके से रखी रहती हैं।

परन्तु जीवन की यही तो सुंदरता है कि उस खाली जगह को हमारे अपने बच्चों और युवाओं की उपलब्धियाँ भर देती हैं। सच कहें तो उनकी सफलता हमें अपनी सफलता से भी अधिक आनंद और गर्व का अनुभव कराती है। ऐसा लगता है मानो हमारी अधूरी आशाएँ और सपने उन्हीं के माध्यम से आगे बढ़ रहे हों।

🌱हमारे परिवार का एक गौरवपूर्ण क्षण🌷

आज मैं आप सबके साथ हमारे परिवार का एक अत्यंत हर्ष और गर्व का क्षण साझा करना चाहता हूँ। मेरे भतीजे विशाल को 2026 के गणतंत्र दिवस समारोह में नई दिल्ली के भव्य कर्तव्य पथ पर सीनियर डिवीजन आर्मी का सर्वश्रेष्ठ कैडेट चुना गया।

वह क्षण मेरे लिए अत्यंत भावुक कर देने वाला था। जब मंच से घोषणा हुई:

“सीनियर अंडर ऑफिसर विशाल सिंह, सर्वश्रेष्ठ कैडेट, सीनियर डिवीजन आर्मी, मध्य प्रदेश एवं छत्तीसगढ़ निदेशालय”

तो मेरी आँखों में खुशी के आँसू आ गए। देश के माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा विशाल को पदक से अलंकृत किया गया और उन्हें ट्रॉफी, बैटन तथा चेक प्रदान किया गया।

हमारे पूरे परिवार के लिए यह क्षण अविस्मरणीय बन गया—गर्व और आनंद से भरा हुआ।

🌱भोपाल में सम्मान🌷

इस उपलब्धि के उपलक्ष्य में भोपाल में मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव द्वारा एक सम्मान समारोह भी आयोजित किया गया।

नई दिल्ली में आयोजित एक महीने के प्रशिक्षण शिविर के अपने अनुभव साझा करते हुए विशाल ने बहुत सुंदर बात कही। उसके शब्द थे—

“एनसीसी केवल वर्दी तक सीमित नहीं है। यह अनुशासन, धैर्य और देश के सम्मान के प्रति समर्पण की जीवनशैली है। दिल्ली का यह शिविर एक बहुत बड़ा सीखने का अवसर था, जहाँ देश के विभिन्न भागों से आए कैडेटों के साथ मिलकर वास्तविकता को समझने का मौका मिला।”

उसकी यह बात सुनकर लगा कि वह केवल पुरस्कार ही नहीं जीतकर आया, बल्कि जीवन के मूल्य भी सीखकर लौटा है।

🌱उज्ज्वल भविष्य की कामना🌷

परिवार के एक बुज़ुर्ग के रूप में मुझे यह देखकर अत्यंत संतोष और गर्व होता है कि हमारे घर का एक युवा अनुशासन, समर्पण और राष्ट्रसेवा के मार्ग पर आगे बढ़ रहा है।

ईश्वर से मेरी यही प्रार्थना है कि विशाल का भविष्य उज्ज्वल हो और वह देश की सेवा करते हुए निरंतर आगे बढ़ता रहे।

हम जैसे लोगों के लिए ऐसे क्षण यह एहसास दिलाते हैं कि समय भले ही हमें धीरे-धीरे मंच से पीछे ले आए, पर उत्कृष्टता की मशाल अब सक्षम और समर्पित हाथों में सुरक्षित है।

विशाल को मेरी हार्दिक शुभकामनाएँ और आशीर्वाद – उसका जीवन देश की सेवा में गौरवपूर्ण और प्रेरणादायी बने।

 

© श्री जगत सिंह बिष्ट

साधक

LifeSkills

A Pathway to Authentic Happiness, Well-Being & A Fulfilling Life! We teach skills to lead a healthy, happy and meaningful life.

The Science of Happiness (Positive Psychology), Meditation, Yoga, Spirituality and Laughter Yoga. We conduct talks, seminars, workshops, retreats and training.

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≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ९३९ ⇒ चाय, चखना – चबैना ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “चाय, चखना – चबैना…“।)

?अभी अभी # ९३९ ⇒ आलेख – चाय, चखना – चबैना ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

चखना और चबैना में वही अंतर है, जो सिर्फ चाय और चाय पानी में है। हम जब सिर्फ चाय की बात करते हैं, तो साथ में पानी मुफ्त होता है। लेकिन बात जब चाय पानी की होती है तो उसका मतलब सिर्फ चाय और पानी नहीं होता।

प्यास लगने पर जब किसी से एक ग्लास ठंडा पानी मांगा जाता है, तो केवल जल ही पेश किया जाता है, गुलाब जल नहीं, लेकिन जब किसी मेहमान को एक कप चाय की प्याली पेश की जाती है, तो एक ग्लास पानी सहज रूप से साथ चला आता है।।

लेकिन चाय पानी की तो बात ही निराली है। बेटा, बहुत दिनों बाद अंकल आए हैं, कुछ चाय पानी का इंतजाम करो। अब मामला सिर्फ चाय और पानी का नहीं, कुछ और का भी है बिस्किट, नमकीन, गर्मागर्म पकौड़े अथवा फल फ्रूट, सभी चाय पानी में परिभाषित हो जाते हैं। यानी अच्छा भला चाय नाश्ता हो जाता है।

यह तो हुआ चाय पानी का शाब्दिक और सात्विक अर्थ ! कलयुग में चाय पानी का एक अर्थ और होता है, जहां सेवा मुफ्त उपलब्ध नहीं होती, वहां चाय पानी का अर्थ साधारण नहीं रह जाता।

वहां चाय पानी का अर्थ मुट्ठी गर्म करना भी हो सकता है। हप्पू सिंह की भाषा में आप इसे न्यौछावर भी कह सकते हैं। कहते हैं ज्ञानी, दुनिया है फानी। यहां सभी काम हो सकता है, बशर्ते, हो जाए चाय पानी।।

लेकिन बात तो चखना और चबैना की हो रही थी चाय और चाय पानी की नहीं ! हम भी अजीब हैं।

आप अंगूर चखकर खरीद सकते हो, लेकिन चना तो चखकर नहीं लिया जा सकता। चखने से भी कहीं पेट भरा है। भूख लगने पर तो चना चबैना भी छप्पन भोग का ही काम करता है।

चखने का काम अमीरों का है, शौकीनों का है। एक बेचारा गरीब मेहनतकश इंसान क्या खाएगा और क्या चखेगा। वह तो रूखी सूखी खाकर, ठंडा पानी पीकर संतुष्ट हो जाता है लेकिन अमीर तो खरीदने के पहले हर चीज चखेंगे, नाक भौं सिकोड़ेंगे,

बहुत मीठा है, no no, it’s too oily and spicy.केवल चखने से ही उनकी हेल्थ और हाइजीन पर असर पड़ता है, खाने की तो बात ही छोड़िए।।

हम चबैने का और अन्न, रोटी का तो ख़ैर, सम्मान करते हैं, लेकिन चखने के तौर तरीकों के बारे में जरूर दो चार बातें करना पसंद करेंगे, क्योंकि दो शब्द चखने के लिए काफी नहीं होते।

जो मजा चखने में है, उससे अधिक मजा किसी को मज़ा चखाने में है। दुनिया में ऐसी कई चीजें हैं, जिन्हें अगर सिर्फ मुंह लगाओ, तो गले ही पड़ जाती हैं, फिर चाहे वह गुटखा ही क्यों न हो।।

खुशी के मौके पर किसी का मुंह मीठा कराना हमारी संस्कृति है, परंपरा है ! क्या किसी का स्वागत मुंह कड़वा करके किया जा सकता है। लेकिन गालिब ने जिसे शराब कहा है, वह तो कड़वी है, और देखो तो किस किसके मुंह लगी है।

यह एक ऐसी कड़वी दवा है जिसके पीने के बाद, मुंह का स्वाद ठीक करने के लिए कुछ चखना पड़ता है। नमकीन मूंगफली से काजू बादाम तक यह चखने की रेंज होती है।

पहले पीने का मज़ा और बाद में चखने का मज़ा। लिपटन और ब्रुक बॉन्ड चाय को टाटा और चाय पानी की नानी, पहले पीना और फिर चखना, कल की किंगफिशर, तेरी यही कहानी।।

कोशिश करें, चाय पानी और चबैने से ही काम चलाएं, क्यों कुछ कड़वी चखने के चक्कर में, लोहे के चने चबाएं। अगर कुछ चखना ही हो, पूरे परिवार और बाल बच्चों को सराफा या छप्पन ले जाएं। क्यों न कुछ मीठा चखें, कुछ नमकीन खाएं। हमें भी साथ ले जाएं, जब कभी इंदौर आएं ..!!

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© श्री प्रदीप शर्मा

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # १६९ – देश-परदेश – दुःखी के घर से अपना चूल्हा जलाना ☆ श्री राकेश कुमार ☆

श्री राकेश कुमार

(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ  की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” आज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)

☆ आलेख # १६९ ☆ देश-परदेश – दुःखी के घर से अपना चूल्हा जलाना ☆ श्री राकेश कुमार ☆

हमारे समाज में उपरोक्त किंवदंती को बहुत बुरा माना जाता हैं। आज का समय इसके बिल्कुल विपरीत हो गया हैं। अपना उल्लू सीधा करने में कोई भी पीछे नहीं रहता हैं।

पूरा विश्व युद्ध की आग से तप रहा है। हमारा मीडिया इस मौके को खूब भांजने में रात दिन एक कर रहा हैं। जब कभी युद्ध आदि का समय आता है, मीडिया वाले भी भूतपूर्व रक्षा अधिकारियों को अपने पैनल में लेकर दिन भर चर्चा कर अपनी टी आर पी दिन दोगुनी और रात चौगुनी वृद्धि कर लेते हैं।

 स्टूडियो को “वार रूम” का टाइटल मिल जाता हैं। मोहोल को युद्धमय बनाने के लिए समय समय पर सायरन बजा दिया जाता हैं। शरीफ सा दर्शक इनकी फरेबी बातों में बंधा रहकर मूर्ख बनता रहता हैं।

 हमारे एक परिचित मुंबई स्थित बहुत बड़ी विज्ञापन कंपनी में कार्यरत हैं। उन्होंने बातचीत में बताया आज कल फिल्मी सितारों और क्रिकेट के खिलाड़ियों का क्रेज़ कम हो रहा हैं। विज्ञापनों में बहुत शीघ्र इन रक्षा विशेषज्ञों को देखा जा सकेगा। भूतपूर्व योद्धा यदि मान जाएं तो बोर्नविटा, डाबर और मसाले बनाने वाली कंपनियां मुंह मांगी कीमत दे सकती हैं। टीवी पर अपनी सेवाएं देने वाले चेहरे को जनता विज्ञापनों में देखकर ही उत्पाद खरीदने का मानस बनाती हैं।

 हमें तो लगता है, आने वाले समय में टीवी एंकर भी विज्ञापनों में भी छा जाएंगे, बशर्ते उनके चैनल इसकी अनुमति दे देवें

© श्री राकेश कुमार

संपर्क – B 508 शिवज्ञान एनक्लेव, निर्माण नगर AB ब्लॉक, जयपुर-302 019 (राजस्थान)

मोबाईल 9920832096

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