(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “गं ज हा …“।)
अभी अभी # ८०३ ⇒ आलेख – गं ज हा श्री प्रदीप शर्मा
यह शब्द पहली बार मैंने राग दरबारी में पढ़ा। चूंकि राग दरबारी शिवपाल गंज की दास्तान है, गंजहा शब्द यकीनन गंज से ही बना है। गंज कहां नहीं। गांव, कस्बा तो ठीक, आपको नगर नगर में कितने ही गंज मिल जाएंगे। लेकिन गंजहों की बात निराली ही है।
कुछ शब्द किताबों से निकलकर बोलचाल में प्रवेश कर जाते हैं तो कुछ बोलचाल के शब्द किताबों में प्रवेश कर जाते हैं। शब्द, शब्दकोश में जन्म नहीं लेते, बोलचाल की भाषा से, शब्दकोश में प्रवेश कर जाते हैं। धांसू, टेपा, टपोरी, फीटम फाट, झकास, झन्नाट और बिंदास कुछ ऐसे ही शब्द हैं, जिन्होंने केवल लोकप्रियता के आधार पर शब्दकोश की बिनाका गीत माला में स्थान पाया है लेकिन खेद है, गंजहा शब्द अभी तक अपनी मंज़िल तक नहीं पहुंच पाया है।।
मेरे महानगर में, जो कभी होलकरों की स्टेट था, मल्हारगंज, तुकोगंज, उषागंज, सियागंज, मल्हारगंज, स्नेहलता गंज और गोकुलगंज भी मिल जाएंगे। गंजी, घास को भी कहते हैं, जानवरों के लिए उगाई घास को जहां रखा जाता था, उसे भी गंजी कंपाउंड कहते थे। घोड़े पालना सिर्फ अंग्रेजों का ही शौक नहीं था, हर राजा घोड़े पर सवारी करता था तथा ऐसी कोई फिल्म नहीं जिसमें राजकुमारी को किसी साधारण से नायक ने घुड़सवारी सिखाई न हो, अथवा उसके बिगड़ैल घोड़े से, बिगड़ैल राजकुमारी की जान बचाई न हो।
जो भाग्यशाली और मालदार होते हैं, उनके सर पर बालों के स्थान पर एक खाली मैदान होता है, जिसे गंजी कम्पाउन्ड भी कह सकते हैं। भगवान गंजे को वैसे ही नाखून नहीं देता और अगर देता भी है, तो बाबा रामदेव के कहने पर अलादीन के चिराग की तरह वह नाखून घिसा करता है, घिसा करता है लेकिन बंजर ज़मीन पर भी कभी खेती हुई है।।
केवल शिवपालगंज ही क्यों, हमारे देश में क्या कम गंज हैं। हमारे मध्यप्रदेश के भोपाल के आसपास ही बिलकिसगंज, बेगमगंज और नसरुल्लागंज हैं। उधर झारखंड में डाल्टनगंज भी है। पूरे यू पी बिहार में, गंज ही गंज भरे पड़े हैं कासगंज, गौरीगंज और महाराजगंज अगर उत्तर प्रदेश में है तो बिहार में गोपालगंज और किशनगंज दोनों हैं, लेकिन यहां कहीं भी गंजहों का नामोनिशान तक नहीं है।
एक प्रश्न बार बार मन में कौंधता है, कहीं श्रीलाल शुक्ल ने गंवार के लिए गंजहे शब्द का प्रयोग तो नहीं किया। क्या किसी गंजहे के व्यक्तित्व में गंजापन और गमछा भी शामिल है क्योंकि इन दोनों के बिना बद्री पहलवान का व्यक्तित्व निखर नहीं पाता।।
अगर रंगनाथ रिसर्च के नाम पर शिवपाल गंज में घास छील सकता है तो शिवपाल गंज के गंजहों पर भी रिसर्च की जा सकती है और हर गंज में गंजहों के अस्तित्व से भी इंकार नहीं किया जा सकता। हर शब्द अनमोल होता है। अगर वह प्रयोग से बाहर हो जाता है तो उसका अस्तित्व खतरे में पड़ जाता है। कहीं गंजहे शब्द की उपेक्षा से हम गंजहा संस्कृति से ही हाथ ना धो बैठें। शब्दों को बचाएं। गंजहा संस्कृति को बचाएं। जिन विद्वानों ने राग दरबारी पर शोध किया है, वे भी गंजहों पर तनिक प्रकाश डालें तो गंजहे धन्य हो जाएं ..!!!!
(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के लेखक श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही गंभीर लेखन। शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है। साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको पाठकों का आशातीत प्रतिसाद मिला है।”
हम प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है इस शृंखला की अगली कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों के माध्यम से हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)
☆ संजय उवाच # ३०७ ☆ को जागर्ति?…
इसी सप्ताह शरद पूर्णिमा सम्पन्न हुई। इसे कौमुदी पूर्णिमा अथवा कोजागरी के नाम से भी जाना जाता है।
अश्विन मास की पूर्णिमा, शरद पूर्णिमा कहलाती है। शरद पूर्णिमा अर्थात द्वापर में रासरचैया द्वारा राधारानी एवं गोपिकाओं सहित महारास की रात्रि, जिसे देखकर आनंद विभोर चांद ने धरती पर अमृतवर्षा की थी।
चंद्रमा की कला की तरह घटता-बढ़ता-बदलता रहता है मनुष्य का मन भी। यही कारण है कि कहा गया, ‘चंद्रमा मनसो जात:।‘
यह समुद्र मंथन से लक्ष्मी जी के प्रकट होने की रात्रि भी है। समुद्र को मथना कोई साधारण कार्य नहीं था। मदरांचल पर्वत की मथानी और नागराज वासुकि की रस्सी या नेती, कल्पनातीत है। सार यह कि लक्ष्मी के अर्जन के लिए कठोर परिश्रम के अलावा कोई विकल्प नहीं।
लोकमान्यता है कि कोजागरी की रात्रि लक्ष्मी जी धरती का विचरण करती हैं और पूछती हैं, ‘को जागर्ति?’.. कौन जग रहा है?..जगना याने ध्येयनिष्ठ और विवेकजनित कर्म।
श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान का उवाच है,
या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी।
यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुनेः॥
(2.69)
सब प्राणियोंके लिए जो रात्रि के समान है, उसमें स्थितप्रज्ञ संयमी जागता है और जिन विषयोंमें सब प्राणी जाग्रत होते हैं, वह मुनिके लिए रात्रि के समान है ।
सब प्राणियों के लिए रात क्या है? मद में चूर होकर अपने उद्गम को बिसराना,अपनी यात्रा के उद्देश्य को भूलना ही रात है। इस अंधेरी भूल-भुलैया में बिरले ही सजग होते हैं, जाग्रत होते हैं। वे निरंतर स्मरण रखते हैं कि जीवन क्षणभंगुर है, हर क्षण परमात्म तत्व को समर्पित करना ही लक्ष्य है। इन्हें ही स्थितप्रज्ञ कहा गया है।
साधारण प्राणियों का जागना क्या है? उनका जागना भोग और लोभ में लिप्त रहना है। मुनियों के लिए दैहिकता कर्तव्य है। वह पर कर्तव्यपरायण तो होता है पर अति से अर्थात भोग और लोभ से दूर रहता है। साधारण प्राणियों का दिन, मुनियों की रात है।
अब प्रश्न उठता है कि सर्वसाधारण मनुष्य क्या सब त्यागकर मुनि हो जाए? इसके लिए मुनि शब्द का अर्थ समझना आवश्यक है। मुनि अर्थात मनन करनेवाला, मननशील। मननशील कोई भी हो सकता है। साधु-संत से लेकर साधारण गृहस्थ तक।
मनन से ही विवेक उत्पन्न होता है। दिवस एवं रात्रि की अवस्था में भेद देख पाने का नाम है विवेक। विवेक से जीवन में चेतना का प्रादुर्भाव होता है। फिर चेतना तो साक्षात ईश्वर है। ..और यह किसी संजय का नहीं स्वयं योगेश्वर का उवाच है।
वेदानां सामवेदोऽस्मि देवानामस्मि वासवः।
इंद्रियाणां मनश्चास्मि भूतानामस्मि चेतना॥
(10.22)
श्रीमद्भगवद्गीता में ही भगवान कहते हैं कि मैं वेदों में सामवेद हूँ, देवों में इंद्र हूँ, इंद्रियों में मन हूँ और प्राणियों की चेतना हूँ।
जिसने भीतर की चेतना को जगा लिया, वह शाश्वत जागृति के पथ पर चल पड़ा। ‘को जागर्ति’ के सर्वेक्षण में ऐसे साधक सदैव दिव्य स्थितप्रज्ञों की सूची में रखे गए।
अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆
मोबाइल– 9890122603
संजयउवाच@डाटामेल.भारत
writersanjay@gmail.com
☆ आपदां अपहर्तारं ☆
नवरात्र साधना संपन्न हुई. अगली साधना की जानकारी आपको शीघ्र दी जावेगी.
अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं।
≈ संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “मेरी सूरत तेरी आँखें…“।)
अभी अभी # ८०२ ⇒ आलेख – मेरी सूरत तेरी आँखें श्री प्रदीप शर्मा
अज़ीब अंधेरगर्दी है! हमें अपनी आँखों से ही अपनी सूरत दिखाई नहीं देती। हमें या तो दूसरों की आँखों का सहारा लेना पड़ता है, या फिर किसी आईने का!
आईने के सामने घण्टों सजने-संवरने के बाद जब सजनी अपने साजन से पूछती है, मैं कैसी लग रही हूँ ? तो, किसी किताब में गड़ी आँखों को बिना उठाए, वह जवाब दे देते हैं, ठीक है! और वह पाँव पटकती हुई किचन में चली जाती है। थोड़ी ही देर में चाय का प्याला लेकर वापस आती है। मिस्टर साजन चाय की पहली चुस्की लेते हुए जवाब देते हैं, हाँ, अब ठीक लग रही हो।।
जिन आँखों से आप पूरी दुनिया देख चुके हो, उन आँखों से अपनी ही सूरत नहीं देख पाना तो उस कस्तूरी मृग जैसा ही हुआ, जो उस कस्तूरी की गंध की तलाश में है, जो उसकी देह में ही व्याप्त है। अगर आईना नहीं होता, तो कौन यक़ीन करता कि, मैं सुंदर हूँ।
इंसान से कई गुना सुंदर पशु-पक्षी इस प्रकृति पर मौजूद है, जिनके बदन पर कोई अलंकारिक वस्त्र-आभूषण मौजूद नहीं, लेकिन इसका उन्हें कोई भान-गुमान नहीं। उनके पास प्रकृति द्वारा प्रदत्त सुंदरता को निहारने का कोई आईना ही नहीं! जब किसी सुंदर पक्षी के सामने आईना रख दिया जाता है, तो वह उसे कोई अन्य पक्षी समझ आईने पर चोंच मारता है। उसे अपनी सुंदरता का कोई बोध ही नहीं। जब कि उसने कई बार अपनी परछाई पानी में अवश्य देखी होगी।।
अगर आईना नहीं होता, तो क्या सुंदरता नहीं होती! आईना सुंदर नहीं! आईने का अपना कोई अक्स नहीं। क्या आपने ऐसा कोई आइना देखा है, जिसमें कुछ भी नज़र नहीं आता ? जब भी आप ऐसा आईना देखने जाएँगे, अपने आप को उसमें पहले से ही मौजूद पाएँगे।
केवल शायर ही नहीं, ऐसे कई इंसान हैं जो किसी की आँखों में खो जाते हैं, उन आँखों पर मर-मिटने को तैयार हो जाते हैं। तेरी आँखों के सिवा, दुनिया में रखा क्या है। तीर आँखों के, जिगर से पार कर दो यार तुम। क्या करें! तेरे नैना हैं जादू भरे।
यही हाल किसी मासूम सी सूरत का है! हर सूरत कितनी मशहूर है। तेरी सूरत से नहीं मिलती, किसी की सूरत! हम जहां में तेरी तस्वीर लिये फिरते हैं। सूरत तो सूरत, तस्वीर तक को सीने से लगाकर रखने वाले कई आशिक मौजूद हैं, इस दुनिया में।।
अगर इस खूबसूरत से चेहरे पर आँखें ही न होती तो क्या होता! आँखें ही रौशनी हैं, आँखें ही नूर हैं। आँखों में परख है, इसीलिए तो हीरा कोहिनूर है। सूरत और आँखों को आप एक दूसरे से अलग नहीं कर सकते।
ऐसा नहीं! चेहरे बदसूरत भी होते हैं, आँखें कातिल ही नहीं डरावनी भी होती हैं। क्यों कोई हमें फूटी आँखों नहीं सुहाता, क्यों हम किसी की सूरत भी नहीं देखना चाहते ? अरे! कोई कारण होगा।
हमारी इन दो खूबसूरत आँखों के पीछे भी आँखें हैं, जो हमें इन आँखों से दिखाई नहीं देती, वे मन की आँखें हैं। वे मन की आँखें सूरत को नहीं सीरत को पहचानती हैं। मन की आँखों ही की तरह हर सूरत में एक सीरत छुपी रहती है। वही अच्छाई है, आप चाहें तो उसे ईश्वरीय गुण कहें या ख़ुदा का नूर।।
संसार ऐसी कई विभूतियों से भरा पड़ा है, जो जन्म से ही दृष्टि-विहीन थे। भक्त सूरदास से लगाकर रवींद्र जैन तक कई जाने-अनजाने नेत्रहीनों का सहारा रही हैं, ये मन की आँखें! इस दिव्य-दृष्टि के स्वामी को कोई अक्ल का अंधा ही अंधा कहेगा।
यारों, सूरत हमारी पे मत जाओ! मन की आँखों से हमें परखो। हम दिल के इतने बुरे भी नहीं।।
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “अंतिलंगोट और कंठ लंगोट…“।)
अभी अभी # ८०१ ⇒ आलेख – लंगोट और कंठ लंगोट श्री प्रदीप शर्मा
(Loin cloth & neck tie)
अंजनी के लाल रामभक्त हनुमान हों, अथवा चंदन चाचा के अखाड़े के पहलवान, केवल एक लंगोट ही उनका आभूषण भी होती है और परिधान भी। वैसे इसे आप पुरुषों का सनातन अंतर्वस्त्र भी कह सकते हैं। इसे धारण करने वाले लंगोट के पक्के कहलाते थे।
वैसे सनातन परिधान और आधुनिक फैशन में कोई खास फर्क नहीं है। आज के युवा मॉडल आपको लंगोट की जगह, और अधिक वीभत्स और अश्लील नजर आने वाली, अमेजन की कॉटन ब्रीफ्स पहने कैट वॉक करते नज़र आ जाएंगे।
आवश्यकता अगर आविष्कार की जननी है, तो अश्लीलता का अंधानुकरण आधुनिक फैशन का बाप। ।
हम जब छोटे थे, तो लंगोट पहनते थे। समय के साथ पहले पट्टे वाली बंबइया चड्डी और तदनंतर वीआईपी और लक्स अंडरवियर पर आ गए।
हां हमारे घर के नवजात शिशुओं के हमने भी पोतड़े बदले हैं। हर दस मिनिट में एक लंगोट गीली। आज की भाषा में इन्हें डायपर बदलना कहते हैं। शुक्र है, हगीज ने आजकल की माताओं को, फर्स्ट क्राय के सौजन्य से, इस परेशानी से निजात दिलवा दी है। हगीज हैं जहां, ममता भरा हग है वहां।
लंगोट की जब, बात निकलेगी, तो कंठ लंगोट तलक, जाएगी। आज का सभ्य पुरुष, भले ही लंगोट से करे इंकार, लेकिन वह कंठ लंगोट से करे प्यार।
हम भी, भले ही लंगोट से मुक्त हो गए हों, लेकिन शादी के समय, सबसे पहले, हमारे गले, कंठ लंगोट ही पड़ी। ।
झूठ क्यूं बोलें, हमें तो ठीक से टाई बांधते तक नहीं आती थी, लेकिन हमारे यार दोस्त, हमसे अधिक आधुनिक थे, उन्होंने विवाह के गठबंधन से पहले ही, गले में गांठ बांधना सिखला दिया। आप कह सकते हैं, पहले टाई हमारे गले पड़ी, और उसके बाद, सात जन्मों का अटूट बंधन।
ईश्वर जानता है, आज हम लंगोट और कंठ लंगोट, यानी loin cloth और neck tie से पूरी तरह मुक्त हो चुके हैं, लेकिन एक ऐसे नेक बंधन में बंध चुके हैं, जिससे छूटना हमारे लिए नामुमकिन और असंभव है। हम जानते हैं, कोई हमारे गले नहीं पड़ सकता, ना लंगोट और ना ही कंठ लंगोट, लेकिन हमारी धर्मपत्नी के गले में हमारे नाम का मंगलसूत्र है, जिसमें हमारा मंगल ही मंगल है।।
काश, आज हमारे गले में भी, धर्मपत्नी के मंगलसूत्र की तरह, कोई एक नेक टाई, अर्थात् पवित्र बंधन होता। वैसे देखा जाए तो लंगोट और कंठ लंगोट भी एक तरह की गांठ ही है।
लंगोट और टाई दोनों बांधी जाती हैं। जो हमारी गांठ है, वही टाई की क्नॉट है। जो बंधा है, वह अनुशासित और संयमित है। टाई को भद्र पुरुषों यानी gentlemen का आभूषण कहा गया है।
वकील, अफसर, प्रोफेसर तो ठीक, हिंदी साहित्य के मूर्धन्य आलोचक और विद्वान आचार्य रामचंद्र शुक्ल को भी, तस्वीरों में हमेशा आप, सूट बूट और टाई में ही देखेंगे।
हो सकता हो, लंगोट आपके लिए अंदर की बात हो, लेकिन एक पहलवान को सिर्फ लंगोट ही शोभा देती है। लेकिन टाई यूनिवर्सल है। मद्रास के विद्वान तो धोती पर भी कोट और टाई पहनते हैं।
हमने तो कई महंगी होटलों में वेटर्स को सूट और टाई में देखा है और ग्राहक को धोती कुर्ते में। अगर आज कबीर होते तो शायद यही कहते ;
(डा. मुक्ता जीहरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य” के माध्यम से हम आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी की मानवीय जीवन पर आधारित एक विचारणीय आलेख शिक्षा और संस्कार। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की लेखनी को इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य # २९५ ☆
☆ शिक्षा और संस्कार… ☆
गूगल पूरी दुनिया को रास्ता दिखा सकता है, परंतु मनुष्य बनने का रास्ता धर्म शिक्षा व संस्कार ही दिखा सकते हैं– शाश्वत सत्य है। आज की पूरी दुनिया बहुत छोटी हो गई है। हम तत्क्षण किसी से बात कर सकते हैं; अपने भाव में विचार पूरे विश्व में प्रेषित कर सकते हैं; वर्क फ्रॉम होम कर सकते हैं तथा पर्यावरण को प्रदूषित होने से बचा सकते हैं। विभिन्न संसाधनों की बचत करके उनमें इजाफा कर अपनी अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ कर सकते हैं। हम दूर-दराज़ में हो गई संगोष्ठियों में प्रतिभागिता कर सकते हैं। है ना यह कमाल! यदि इसे कोरोना का उपहार या वरदान कहें तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। इस रूप में हम इस वरदान कह सकते हैं। इतना ही नहीं एक लंबे अंतराल के पश्चात् बच्चों को पारिवारिक संस्था का महत्व समझ में आया और लोग अपनी संस्कृति की ओर लौटे। भले ही हमें इस समय बहुत सी आपदाओं ने चहुँओर से मानव पर निशाना साधा और बहुत से लोगों को अपने प्राणों से भी हाथ धोना पड़ा।
सो! गूगल दुनिया को रास्ता तो दिखा सकता है, पथ-विचलित होने से बचा सकता है, सही दिशा में चलने को प्रेरित कर सकता है। परंतु वह मनुष्य बनने की राह नहीं दर्शा सकता, क्योंकि धर्म, शिक्षा और संस्कार ही मानव बनने की राह दिखाते हैं। संस्कृति हमें सुसंस्कारों से पल्लवित करती है। अतीत में प्रचलित मान्यताओं, परंपराओं, रीति-रिवाज़ों व जीने की राह की ओर इंगित करती हैं व शुभ-अशुभ का भान कराती हैं। सत्यम शिवम सुंदरम का महत्व समझा कर उसे जीवन में अपनाने का आग्रह करती हैं। हमारे अंतर्मन में निहित सुप्त भावनाओं व संस्कारों को जाग्रत करती हैं, जिस पर चलकर मानव उस असीम शक्ति से साक्षात्कार कर सकता है।
प्रार्थना करते समय व्यक्ति का मंदिर में होना आवश्यक नहीं, किंतु व्यक्ति के मन में ईश्वर का वास होना अत्यंत आवश्यक है–निर्गुण भक्ति की ओर अंकित करता है। उसे किसी पूजा-स्थल में ढूंढने की आवश्यकता नहीं, परंतु उसके अंतर्मन में ईश्वर का विद्यमान रहना आवश्यक है। मानव को कस्तूरी रूपी ईश्वर को तलाशने के निमित्त वन-वन अर्थात् संसार में भटकने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि वह हमारे मन में रहता है तथा हम पल-भर में उसके दर्शन प्राप्त कर सकते हैं।
संत और वसंत में एक ही समानता है। जब वसंत आता है तो प्रकृति सुधर जाती है और जब संत आते हैं तो संस्कृति सुधर जाती है। जैसे वसंत के आगमन पर प्रकृति के विभिन्न उपादान फल-फूल जाते हैं, लहलहा उठते हैं, मलय वायु के झोंके मानव मन को आलोड़ित व आंदोलित करते हैं। उसी प्रकार संतजनों के अवतरण व मानव मात्र से संपर्क होने पर हमारे भीतर सुसंस्कार सृजित हो जाते हैं। संतजन हमें अपनी संस्कृति के दर्शन करते हैं। हमें कुमार्ग से सत्मार्गव की ओर प्रवृत्त करते हैं। उचित- अनुचित, ग्राह्य-त्याज्य व उपयोगी-अनुपयोगी का भेद समझाते हैं।
शिक्षा हमारे आचार-व्यवहार व सोच जीवन के दृष्टिकोण को प्रभावित करती है और मानवीय मूल्य हमें सत्य की राह दर्शाते हैं। शिक्षा हमें सुसंस्कारित करती है, बुराइयों से बचने का संदेश देती है। अधिकार व कर्त्तव्यों के अन्योन्याश्रित संबंध को दर्शाती है। अंतर्मन के भीतर निहित गुणों को विकसित करती है जो उसे सर्वांगीण मानव का दर्जा प्रदन करते हैं। यह हमारे व्यक्तित्व का विकास करती है।
धर्म का मानव जीवन को विकसित करने में अहम् योगदान है। धर्म हमें प्रेम, स्नेह, करुणा, दया, सहानुभूति, समर्पण, सहनशीलता आदि का संदेश प्रेषित करता है, जिस का अनुसरण कर हमारा जीवन सुचारु रूप से आगे बढ़ता है। धर्म हमें सहिष्णुता का मार्ग अपनाने का संदेश प्रेषित करता है। सभी धर्म समान हैं। इसलिए पारस्परिक द्वेष, हिंसा आदि को जीवन में पदार्पण नहीं करने देना चाहिए। इससे शत्रुता का भाग उपजता है तथा मतभेद मनभेद का रूप ग्रहण कर लेते हैं। दरारें मन-आंगन में दीवारों का आकार ग्रहण कर लेती हैं और दुनिया इस क़दर बढ़ जाती है, जिन्हें पाटना असंभव हो जाता है। परिवार, समाज व देश में अराजकता व्याप जाती है और मानव कुछ निजी स्वार्थों से बंधा ग़लत काम करने पर उतारू हो जाता है। उसके हृदय में प्रज्ज्वलित प्रतिशोध की ज्वाला विशालकाय रूप धारण कर लेती है और निर्दोष बच्चे, महिलाएं व बुज़ुर्ग उस हिंसा का शिकार हो जाते हैं। वह खून के रिश्तों को नकार उन पर निशाना साधने में भी गुरेज़ नहीं करता। इससे पूरे समाज में खलबली मत जाती है और अजनबीपन का एहसास पाँव पसार लेता है। जिसके परिणाम-स्वरूप समाज में विनाश ही विनाश दृष्टिगत होता है।
सो! संचार के साधनों ने भौगोलिक दुरियों को तो कम किया है और विश्व ग्लोबल विलेज बनकर रह गया है। परंतु मानव-मानव के बीच की दुरियाँ बहुत बढ़ गई हैं। सब अपने-अपने द्वीप में कैद होकर रह गए हैं। मोबाइल, इंस्टाग्राम, गूगल ने मानव को आत्म-केंद्रित कर दिया है। अब तो एक छत के नीचे निवास करने वाले लोग भी मोबाइल के मध्यम से अपने सुख-दु:ख सांझे करने लगे हैं तथा संवाद करने में व्यस्त रहते हैं। लोग दिन भर फेसबुक, टि्वटर आदि में व्यस्त रहते हैं। समान भी ऑनलाइन आ जाता है। सो! किसी से दुआ सलाम की कल्पना भी बेमानी हो गई है और इससे समाज में एकांगिता का भाव व्याप रहा है। इंसान अपने अहं में लीन रहता है।
इस तथ्य को समझना अत्यंत अवशयक है कि धर्म, शिक्षा जहाँ हमारा सर्वांगीण विकास करती है, वहीं संस्कृति हमें जीने की राह दर्शाती है। वास्तव में धर्म, शिक्षा वसंस्कार हमें पूर्ण मानव बनाते हैं और उन्हें जीवन में अपनाकर हम स्वस्थ व सहज जीवन जी सकते हैं और स्वस्थ समाज की संरचना कर सकते हैं।
(ई-अभिव्यक्ति- में ‘पूर्णिका’ जनक साहित्याचार्य एडवोकेट डॉ. सलपनाथ यादव ‘प्रेम’का स्वागत.)
संक्षिप्त परिचय
सम्प्रति : आयुध निर्माणी खमरिया से सेवा निवृत्ति के पश्चात मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय जबलपुर में अधिवक्ता के रूप में कार्यरत।
कृतियाँ: अनुराग (कहानी संग्रह) फरवरी 2009, धरती की धरोहर (कहानी संग्रह) नवंबर २०११। किलकारी (बाल काव्य-संग्रह) जनवरी 2014 विचार (काव्य-संग्रह) 2017. बुंदेली भोजपुरी गीत समागम 2020. गांव की बेटी (उपन्यास) जनवरी 2021, आह (पूर्णिका संग्रह) 2021, घर संसार (गीत संग्रह) 2023, सुखानुभूति (पूर्णिका संग्रह). का मओ…बिन्ना (बुन्देली पूर्णिका संग्रह) 2025, पूर्णिका विद्या पर विमर्श के साथ ही ‘बधाई हो बघाई’ (पूर्णिका संकलन) आपके जन्म दिवस को समर्पित 93 पूर्णिका-कारों ने केवल एक विद्या विशेष ‘पूर्णिका’ पर अपनी पूर्णिकाएं समर्पित की, इसके साथ ही नगर, प्रदेश, देश से प्रकाशित होने वाले करीब 130 संकलनों में आपकी रचनाएँ यथा प्रकाशित हुई हैं। अभी आप कई पत्र पत्रिकाओं के साथ साहित्य परिवार पत्रिका नदियाद गुजरात के सह संपादक, काव्यामृत पत्रिका पीलीभीत के क्षेत्रीय संपादक भी है। ‘माई’ उपन्यास प्रकाशाधीन है आप आकाशवाणी जबलपुर से निरंतर कहानी पाठ करते हैं।
सहभागिता : आपने विभिन्न विभागीय और अविभागीय अनेक प्रतियोगिताओं में भाग लेकर तथा त्वरित – भाषण, निबंध-लेखन, कविता-लेखन, बाद-विवाद और कविता पाठ में विजय श्री प्राप्त की है।
सम्बध्दता : आप विभिन्न सामाजिक, साहित्यक, सांस्कृतिक एवं राजनैतिक संगठनों से जुड़े हैं। जैसे पूर्व नगर महासचिव स.पा. अध्यक्ष विधिक साक्षरता समिति पंजीकृत जबलपुर हैं।
संयोजक / संस्थापक: अंतर्राष्ट्रीय पूर्णिका मंच, आमा साहित्य संघ जबलपुर मप्र, उपाध्यक्ष यादव महासभा, उपाध्यक्ष त्रिपुर वरिष्ठ नागरिक महासंघ जबलपुर मप्र, इंटरनेशनल ह्यूमन राइट्स आर्गनाइजेशन – विधिक सलाहकार मप्र … आदि।
सम्मान : अनेक प्रांतीय एवं राष्ट्रीय साहित्यिक, सामजिक, सांस्कृतिक संस्थाओं द्वारा सम्मानित एवं मानद उपाधियों से अलंकृत / विभूषित।
विशेष :विक्रम शिला हिन्दी विद्यापीठ (विश्वविद्यालय) भागलपुर बिहार से पूर्णिका- जनक की उपाधि से सम्मानित (2022)
☆ आत्मकथ्य – सफल हुआ अभियान (पूर्णिका संग्रह)… ☆ डॉ. सलपनाथ यादव ‘प्रेम’ ☆
(डॉ. सलपनाथ यादव ‘प्रेम’ जी को हिंदी साहित्य की विधा पूर्णिका का जनक होने का श्रेय है. आपकी पुस्तक सफल हुआ अभियान (पूर्णिका संग्रह) के आत्मकथ्य के माध्यम से आपने पूर्णिका के इतिहास पर प्रकाश डाला है जिसे हम अपने प्रबुद्ध पाठकों के लिए प्रस्तुत कर रहे हैं. इसके पूर्व हमने इसी प्रकार गद्य क्षणिका के जनक श्री रामदेव धुरंधर जी, मारीशस के आलेख को भी प्रकाशित किया था जिसे आप निम्न लिंक पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं. – संपादक (ई-अभिव्यक्ति))
“सफल हुआ अभियान” पूर्णिका संग्रह को पुस्तक रूप तक लाने में मुझे भी बहुत कुछ नये नये अनुभव प्राप्त हुए है। जब से हमने सन् 2017 से पूर्णिका पर काम करना प्रारम्भ किया है।
अनुभव यह हुआ कि यदि कोई भी चीज या चलन सदियों से चल रहा है तब भी उसे हमें बिना सोचे समझे आँख बंद करके नहीं मान लेना चाहिये हमें ईश्वर ज्ञान बुध्दि प्रदान किये हैं उसका धनात्मक, ऋणात्मक समझ बूझकर नुकसान फायदा सोच कर स्वीकार करना चाहिये मानना चाहिये और यदि हमें लगता है कि यह तो गलत है हमारे या जन हित में नहीं है तो उसे स्वीकार करने की जगह अस्वीकार करना चाहिये।
लेकिन हाँ यदि आप ने ऐसा किया तो उस प्रथा चलन को आँख बंद करके मानने वाले आप के विरोध में खड़े हो जाते हैं यह मेरे साथ पूर्णिका को लेकर ही नहीं बड़े बड़े वैज्ञानिको के साथ भी हुआ लेकिन वो अपने उद्देश्य से विरोध के पश्चात भी भटके नहीं तभी आज विश्व विज्ञान में इतनी प्रगति कर चुका है कि आज वर्तमान में चाँद पर बस्ती बनाने की चर्चा जोरों पर है। यदि आज भी लोग चाँद को चन्दा मामा जानते रहते हमें बताते रहते और हम वही मानते रहते तो आज भी विकास से दूर होते।
एक महान होमियोपैथी चिकित्सा पद्यति की खोज करने वाले जब डॉ. हैनीमन साहब ने कहा कि रोग जिस तत्व की कमी से हो जाये तब उसे ही पूरा कर दो रोग ठीक हो जायेगा।
लेकिन उनकी इस बात का उस समय पुरजोर विरोध हुआ फिर भी वो अपने काम में विरोध को दर किनारे कर के लगे रहे और आज होमियो पैथी चिकित्सा पद्यति से रोगियों का इलाज कर उन्हें खुशहाल किया जा रहा है रोग मुक्त किया जा रहा है।
यदि आज सारे के सारे लोग दुनियाँ की उन्हीं पुरानी विचार धाराओं प्रथाओं को मान कर चल रहे होते तो ऐसा विकास जो हम देख रहे हैं किसी भी क्षेत्र में न हुआ होता वह चाहे दूर संचार, सुरक्षा अथवा किसी भी क्षेत्र में अकल्पनीय, विकास न हो पाया होता।
हाँ किसी खोज का विरोध यदि तर्क संगत हो तो होना भी चाहिये किन्तु तर्क हीन नई खोज का विरोध तो नहीं होना चाहिये किन्तु कुछ लोग तर्क संगत खोज का तर्क हीन विरोध करते हैं।
कुछ लोग उस तर्क हीन विरोध करने वाले व्यक्ति को अपने पाले में करने के लिये उस व्यक्ति जिसने तर्क हीन विरोध उस नई खोज का किया बिना उसकी योग्यता का उचित अध्ययन मूल्यांकन किये पावर या क्षमता न होते हुए भी किसी उपाधि विशेष से अलंकृत कर देते हैं जो न तो अलंकृत होने वाले को और न ही अलंकृत करने वाले को कोई लाभ पहुँचा पाती है बस इतना ही होता है अपने मुँह मियां मिट्ठू बने रहिये खुश होते रहिये।
हम लोग यह भी जान लें कि जब कोई व्यक्ति, वैज्ञानिक, साहित्यकार नई बात उठाता है तब भी जो लोग स्थापित नहीं होते हैं वो विरोध इसलिये करते हैं कि हमने तो इतने बड़े बड़े काम किये हैं लेकिन नया कुछ भी नहीं कर पाये है जो सदियों से चल रहा है वही किये हैं लेकिन यह व्यक्ति नया कुछ कर के अपना नाम इतिहास में दर्ज करा लिया है हम ऐसे ही रह गये।
लेकिन आगे चलकर जो विरोध होता है वह यह साबित करता है कि अब वह व्यक्ति अपने उद्देश्य में सफल हो रहा तभी यह विरोध हो रहा है। यही हाल पूर्णिका जनक और पूर्णिका के साथ भी है।
साहित्य हो विज्ञान हो या अविष्कार का कोई नया क्षेत्र हो। विरोधियों के अलावा एक समय ऐसा आता है कि उस व्यक्ति (जो नया काम कर रहा है) के साथ उसकी विचार धारा से सहमत हो कर अनेकानेक लोग, अनुयायी साहित्यकार वैज्ञानिक उस व्यक्ति के साथ कंधे से कंधा मिला कर खड़े हो जाते हैं
जिससे वह खोज दुनिया स्वीकार कर लेती है और विरोधियों कि जुबान बंद हो जाती है उन्हें विवश हो कर उस व्यक्ति के साथ खड़ा होना पड़ता है या मुँह छुपाना पड़ता है।
यही हाल पूर्णिका और पूर्णिका जनक के साथ हुआ आज पूर्णिका हिन्दी साहित्य की जानी मानी एक सशक्त विधा है जिसे हिन्दी साहित्य में एक सम्मान जनक स्थान प्राप्त हो जिसके लिखने पढ़ने वाले पूर्णिकाकारों की एक लंबी सूची बन गई है जिसमें सर्व प्रथम डॉ. प्रो. खेदू भारती ‘सत्येश’ जी धमतरी छत्तीसगढ़ का नाम आता है जिनकी पूर्णिका की पचास पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं जो छत्तीसगढ़ी बोली और हिन्दी में हैं।
जबलपुर के पूर्णिका पुरोधा कदम जबलपुरी जी नों सौ दिन से निरंतर पूर्णिका लिख रहे हैं इनकी तीन पूर्णिका की पुस्तकें भी प्रकाशित हो चुकी हैं। शिव अलग जी जिनकी तीन पूर्णिका संग्रह के साथ पूर्णिका में एक महाकाव्य प्रकाशित हो रहा है जो लगभग तीन हजार पृष्ठों का होगा। मारीशस से भाई गोवर्धन सिंह फौदार सच्चिदानंद जी निरंतर पूर्णिका लिख रहे हैं डॉ. कृष्ण कुमार नेमा ‘निर्झर’ जी जिन्होंने बुन्देली बोली में पूर्णिका की पुस्तक प्रकाशित करा दी है। रजनी कटारे जी जिनकी तीन पूर्णिका की पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। दीन दयाल यादव जी जिनकी पूर्णिका की पुस्तक प्रकाशित हो चुकी। भाई श्री ओम प्रकाश खरे और रमेश सेठ तथा चन्द्रभान चन्द्र और डॉ ललित कुमार सिंह ‘ललित’ अलीगढ़ उत्तरप्रदेश के साथ ही देश के अनेकानेक पूर्णिका कारों की पूर्णिका की पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं जिसमें कुंज बिहारी यादव नरसिंहपुर मप्र, नीलम यादव एहसास प्रयाग राज उप्र, किरत सिंह यादव भिण्ड मप्र, गायत्री सिंह ठाकुर ‘सक्षम’ नरसिंहपुर मप्र, सतीश तिवारी भी शामिल हैं। और अभी दिसम्बर 2024 में एक साथ पैतालिस पूर्णिका की पुस्तकों का विमोचन हुआ जो ऐतिहासिक है। अभी तक ऐसा कभी नहीं हुआ कि एक समय में एक मंच से किसी एक विधा विशेष की इतनी पुस्तकों का विमोचन हुआ हो।
और यह बात सिध्द करती है कि “सफल हुआ अभियान” सत्य और सही है कि अभी पूर्णिका जनक के 3 फरवरी 2024 को जन्मदिन पर चार हिन्दी साहित्य अकादमी भारत सरकार उच्च शिक्षा विभाग की पत्रिका, दो विश्वविद्यालय के प्रतिनिधि ने और मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी ने पूर्णिका को अपनी मान्यता प्रदान कर इस बात पर और चाँद लगा दिये कि “सफल हुआ अभियान” पूर्णिका संग्रह अद्वितीय पुस्तक है।
अंत में मै अपने समस्त पूर्णिकार मित्रों को नमन करता हूँ कि यह केवल और केवल पूर्णिका के प्रति आप के लगाव और अभियान” समर्पण के कारण हो पाया है। कि “सफल हुआ अभियान’ (पूर्णिका संग्रह) अब आप और समस्त पूर्णिका कारों और पूर्णिका पाठको के हाथों में यह पुस्तक “सफल हुआ अभियान’ पूर्णिका पहुँच पा रही है।
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “रवि, कवि और सीसी टीवी…“।)
अभी अभी # ८०० ⇒ आलेख – रवि, कवि और सीसी टीवी श्री प्रदीप शर्मा
रवि और कवि की होड़ कोई नयी नहीं। जब रवि अस्त होता है, तब कवि मस्त होता है, चांद पर कविता लिखता है, रात में ही कवि सम्मेलन जवां होता है और संगीतकार रवि ही फिर उसकी धुन बनाते हैं, चौदहवीं का चांद हो, या आफताब हो। रविशंकर का सितार हो या श्रीश्री रविशंकर की सुदर्शन क्रिया, चित्त और मन को आलोकित करती है, कानों में मिश्री घोलती है।
विज्ञान मंगल तक पहुंच जाए, चांद पर चहलकदमी कर आए, लेकिन सूरज पर पांव नहीं धर सकता। इसीलिए कवि भी रवि से पंगा नहीं लेता, सूरज पर नहीं चांद पर ही कविता लिखता है। कवि प्रदीप भी सूरज के बारे में इतना ही कह पाए ;
जगत भर की रोशनी के लिए
करोड़ों की ज़िंदगी के लिए
सूरज रे जलते रहना …
सूरज की रोशनी में, दिनदहाड़े अगर कोई अपराध हो, तो भी सूरज गवाही के लिए नहीं आ सकता। कानून आंख वाला गवाह मांगता है जिसे अंग्रेजी में eye witness कहते हैं। एक कवि जहां उस पर केवल कविता लिखकर दाद बटोर सकता है केवल एक कैमरे की आंख ही उसकी गवाही बन सकती है अगर किसी ने उस घटना को अपने कैमरे में उतार लिया हो।
साइबर क्राइम के चलते तस्वीरें भी आजकल सुरक्षित नहीं रही। तस्वीरों के साथ छेड़छाड़ के चलते अदालत इन्हें पुख्ता साक्ष्य के रूप में स्वीकार नहीं कर सकती। ऐसे में जहां आज तक न कवि पहुंच पाया न रवि, वहां सीसी टीवी ज़रूर पहुंच गया है। हर चौराहे, बगीचे, मकान, बैंक दफ्तर और दुकान में आजकल सीसी टीवी कैमरे लगे है। बेचारे चोरों और अपराधियों की शामत आ गई है।।
पहले लोग कहते थे, भगवान से डरो ! अब भगवान का डर खत्म हो गया। भगवान के सामने अपराध होता है, और वह चुपचाप देखा करता है। वैसे अगर भगवान गवाही देने आ भी जाए तो बिना आधार कार्ड के उसकी नागरिकता तो गई दीये का घी लेने, अदालत कहीं उसे कोई एलियन ही ना समझ बैठे। ऐसी परिस्थिति में केवल सीसी टीवी फुटेज ही एकमात्र गवाही होती है, जो अदालत में मान्य होती है। और अदालत उस फुटेज को बिना गीता की शपथ दिलाए सच मान लेती है।
कवि और रवि की अपनी विवशताएं हैं, मजबूरियां हैं।
कवि कोई समाज सुधारक नहीं। वह सिर्फ तुकबंदी कर सकता है नोटबंदी नहीं। सूरज बेचारा सुबह समय पर आता है, दिन भर ड्यूटी बजाता है, शाम को अस्ताचल में चला जाता है। वह एक ऐसा गवाह है, जिसकी आंखों के सामने, अच्छा बुरा, सब कुछ घटता रहता है, और वह मजबूर, अपनी ही आग में जलता रहता है। वह जगत के कल्याण के लिए प्रकाशित होता है, सबको जीवन देता है, लेकिन उसकी ही रोशनी में जब कु – कृत्य होते हैं, तो वह गुस्से से जल भुन जाता है। ऐसे में केवल सीसी टीवी फुटेज एक आशा की किरण बनकर आता है। लेकिन जब मान्यताएं ही ध्वस्त हो जाएं, तो क्या प्रत्यक्ष और क्या प्रमाण ! कानून की आंख है, कोई संजय की दिव्य दृष्टि नहीं। क्या पता किसको दण्डित कर दे, किसको बरी कर दे।।
(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जीद्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना “अधर्म पर धर्म की विजय: सोन पत्ते का उपहार…”। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – आलेख # २६० ☆अधर्म पर धर्म की विजय: सोन पत्ते का उपहार… ☆
वृक्ष को प्रत्यक्ष देव मानते हुए भारतीय संस्कृति, सनातन धर्म, प्रकृति से जोड़कर अपने सभी पर्व मनाता है। चाहे, होली, नवरात्रि, दशहरा, सावन, कजरी आदि।
नदियों, पहाड़ों, पौधों सभी को जीवंत स्वरूप मानते हुए उन्हें पूजा जाता है। भाव -भक्ति, आस्था, विश्वास हमें पर्यावरण से जोड़ता है।
दशहरे में सोनपत्ता – (कचनार के पत्ते को)
दशहरे (विजयादशमी) पर सोन पत्ते का आदान-प्रदान, सोना बांटने का प्रतीक, यह सुख, वैभव, धन, सौभाग्य और मित्रता को दृढ़ करता है। मान्यता है कि ये पत्ते अक्षय धन और समृद्धि का आशीर्वाद देते हैं।
पर्यावरण की चेतना- इससे प्रकृति और पर्यावरण के मध्य समन्वय बनता है। इस दिन नीलकंठ के दर्शन, शिव पूजा जिसमें शमी के पत्ते को भगवान भोलेनाथ को चढ़ाते हैं। यह पेड़ रेगिस्तानी क्षेत्रों में भी हरा-भरा रहता है और मिट्टी की उर्वरता बढ़ाता है। इसे दशहरे पर पूजा कर संरक्षण की परंपरा है, जिससे लोग पेड़ों को बचाते हैं।
सोना के रूप में पत्तों का आदान-प्रदान प्राकृतिक संसाधनों की महत्ता को दर्शाता है। असली धन प्रकृति ही है। प्रकृति संग उत्सव मनाने से जीवन में उमंग आती है। दशहरा बुराई पर अच्छाई का प्रतीक है। रावण दहन करके हर बार यही संदेश दिया जाता है कि बुराई को मिलकर इसी तरह दहन करना चाहिए। साथ ही हमें ये जनचेतना फैलाना चाहिए कि प्रदूषण, अंधाधुंध वृक्षों को काटना रोकना होगा।
आइए हम संकल्प लें कि दशहरे को पूरे धूमधाम के साथ प्रकृति संरक्षण की ओर अग्रसर होंगे।
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “पैसे का पेड़…“।)
अभी अभी # ७९९ ⇒ आलेख – पैसे का पेड़ श्री प्रदीप शर्मा
|•MONEY PLANT•|
क्या पैसा भी उगाया जा सकता है, इस प्रश्न पर जब पुरुषार्थ और भाग्य में बहस होने लगी तो एक मनी प्लांट बीच बचाव और समझौते के लिए आ गया। पुरुषार्थ का कहना था कि पैसे पेड़ पर नहीं उगते और भाग्य का तर्क था कि घर में अगर मनी प्लांट की एक बेल लगा ली जाए तो घर में पैसा ही पैसा आने लगता है।
मैं पुरुषार्थ में विश्वास रखता हूं, भाग्य में नहीं। मैने अपने 2BHK फ्लैट में आजादी के अमृत महोत्सव एवं अपने ७५ वर्षों के पुरुषार्थ स्वरूप गमलों में कुछ पौधे लगाए, जिनमें एक मनी प्लांट भी शामिल था। अच्छी मिट्टी, हवा पानी के बावजूद बाकी पौधे तो पनप नहीं पाए लेकिन मनी प्लांट तो अमर बेल की तरह फलता फैलता पूरी तरह गैलरी में छा गया। मिलने जुलने वाले मेरी शिकायत पर ध्यान नहीं देते और ना ही बेचारे अन्य मुरझाए पौधे उनका ध्यान अपनी ओर आकर्षित कर पाते। वे तो बस एक ही बात कहते हैं। आपके यहां मनी प्लांट अच्छा फैल रहा है। सुना है, पैसा ही पैसा आता है, जिनके घर मनी प्लांट होता है। ।
और मेरा ध्यान अचानक अखबार की खबरों की उन सुर्खियों पर चला जाता है, जहां कुछ विशिष्ट लोगों के घर से नोटों की फसल बरामद की जाती है। मनी, प्लांट मेरे यहां हो, और पैसा उनके यहां से बरामद हो। बताइए, किसका पुरुषार्थ और किसका भाग्य।
किशोर कुमार का पुरानी फिल्म मुसाफिर(1957) का एक बड़ा प्यारा गीत है, मुन्ना बड़ा प्यारा, जिसके अंतरे के बोल कुछ इस तरह हैं ;
क्यों न रोटियों का
पेड़ हम लगा लें !
आम तोड़ें, रोटी तोड़ें,
रोटी आम खा लें .. ;
बच्चा तो खैर अबोध होता है, फिर भी उसकी ख्वाहिश रोटी से आगे नहीं बढ़ पाती। बड़ा होकर वह भी समझ जाता है रोटियों के पेड़ नहीं लगा करते और हम पढ़े लिखे घरों में मनी प्लांट लगाकर खुश हैं जिनमें न कोई फूल है ना फल और ना ही खुशबू और ना ही कभी हमारे यहां छापा पड़ा और ना ही अखबार में हमारे मनी प्लांट की तस्वीर छपी। आखिर इंसान ऐसा कौन सा मनी घर में प्लांट करता है कि छापे में दो हजार की चिप वाली नोटों की गड्डियों का पहाड़ निकल आता है।
सुना है जिन आलीशान बंगलों के लंबे चौड़े बगीचे में कैप्टस गार्डन लगाया जाता है, वहीं उनकी अलमारियों, तिजोरियों और शयन कक्षों में पाप की कमाई के बीज पनप रहे होते हैं। असली मनी तो वहां प्लांट किया गया होता है। इससे तो अच्छा होता वहां रोटियां रखी होती। कम से कम छापे में बरामद रोटियां गरीबों में तो बांट दी जाती।।
इन छापों से जो कथित काली कमाई बरामद होती है, वह कोई खैरात नहीं और ना ही बेचारे गरीबों की मेहनत के पसीने की खरी कमाई, जो मुफ्त में ही बांट दी जाए। उसकी भी कानूनी प्रक्रिया होती है, जो बड़ी पेचीदा होती है। कोर्ट में केस सालों चला करते हैं। जनता सब भूल जाती है।
मेरे आज तक के पुरुषार्थ का फल बस यही हरा भरा मनी प्लांट है जिसकी ओर किसी का ध्यान नहीं। मनी प्लांट में वह खुशबू कहां, जो इनकम टैक्स और ED वालों को अपनी ओर आकर्षित करे। मेहनत के पसीने से सींचा गया मनी प्लांट भले ही पैसा ना उगाए, दो वक्त की रोटी और चैन की नींद तो मयस्सर करा ही देता है।
मनी प्लांट पैसा नहीं उगाता, लेकिन सबसे बड़ा धन, संतोष धन, तो वह देता ही है और शायद इसीलिए उसे मनी प्लांट कहा जाता है।।
आज तक किसी अखबार में नहीं पढ़ा कि किसी वरिष्ठ नागरिक के घर से डेढ़ सौ मनी प्लांट बरामद हुए, जो नोटों से लदे हुए थे। पैसे पेड़ पर नहीं उगते और ना ही आम की तरह रोटियां किसी पेड़ की डालियों पर नज़र आती ..!!
(प्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक साहित्य ” में हम श्री विवेक जी की चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं। श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी , जबलपुर ) से सेवानिवृत्त हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। आपको वैचारिक व सामाजिक लेखन हेतु अनेक पुरस्कारो से सम्मानित किया जा चुका है।आज प्रस्तुत है एक विचारणीय आलेख – “बुजुर्गों के प्रति सम्मान, सहयोग और सामाजिक जिम्मेदारी का दिवस” ।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ३७५ ☆
आलेख – बुजुर्गों के प्रति सम्मान, सहयोग और सामाजिक जिम्मेदारी का दिवस श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆
(1 अक्टूबर वरिष्ठ नागरिक दिवस पर विशेष)
पहली अक्टूबर का दिन पूरे विश्व में अंतर्राष्ट्रीय वृद्धजन दिवस के रूप में मनाया जाता है। यह दिन समाज की उस अनमोल धरोहर को समर्पित है, जिनके अनुभव और मार्गदर्शन के बिना हमारा वर्तमान और भविष्य अधूरा है अर्थात हमारे वरिष्ठ नागरिक। संयुक्त राष्ट्र द्वारा सन् 1991 में इस दिवस की शुरुआत का प्रमुख उद्देश्य बुजुर्गों के प्रति होने वाले दुर्व्यवहार, उपेक्षा और उनकी चुनौतियों के प्रति वैश्विक जागरूकता फैलाना था। प्रतिवर्ष एक विशेष थीम के साथ मनाया जाने वाला यह दिवस हमें याद दिलाता है कि वृद्धावस्था में गरिमामय जीवन हर व्यक्ति का मौलिक अधिकार है।
इस वर्ष के थीम का भाव है.. निर्णय में बुजुर्गों का समावेश
आज हमारे वरिष्ठजन अनेक जटिल चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं, जैसे कि जोड़ों का दर्द, मधुमेह, उच्च रक्तचाप और इनके उपचार का भारी खर्च, चिंता का विषय है। सेवानिवृत्ति के बाद आर्थिक असुरक्षा की भावना और बढ़ती महंगाई उनके जीवन को और कठिन बना देती है। इन सबसे बढ़कर, आधुनिक जीवनशैली में बच्चों का दूसरे शहरों या देशों में पलायन और जीवनसाथी के निधन के बाद का अकेलापन सबसे गहरी पीड़ा का कारण बन गया है। इसके अलावा, डिजिटल युग में तेजी से बढ़ रही तकनीकी खाई भी उनके लिए दैनिक कार्यों को चुनौतीपूर्ण बना देती है।
इन चुनौतियों से निपटने के लिए व्यक्तिगत, पारिवारिक और सामुदायिक स्तर पर एक सामूहिक प्रयास की आवश्यकता है।
परिवार के सदस्यों का बुजुर्गों के साथ गुणवत्तापूर्ण समय बिताना, उनकी बातों को धैर्यपूर्वक सुनना और उनके अनुभवों का सम्मान करना, उन्हें भावनात्मक सुरक्षा प्रदान करता है।
वरिष्ठ नागरिक क्लब, सामुदायिक केंद्र, योग शिविर, और हॉबी कक्षाएं ऐसे मंच हैं जहां वे अपने साथियों के साथ जुड़ सकते हैं। यह सामाजिक अलगाव को तोड़ने में अत्यंत कारगर सिद्ध हो सकता है।
प्रधानमंत्री वय वंदना योजना, अटल पेंशन योजना और राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना जैसी कल्याणकारी योजनाओं के बारे में जागरूकता बढ़ाना और उनका लाभ उठाना बुजुर्गों की आर्थिक एवं स्वास्थ्य संबंधी चिंताओं को कम करेगा।
एक रोचक पहलू बाजार की मानसिकता में आया बदलाव है। आजकल, चाय, दूध, बिस्कुट, दवाओं जैसे उत्पादों के विज्ञापनों में बुजुर्गों की छवि का बढ़ता उपयोग देखा जा सकता है। यह परिवर्तन इस ओर इशारा करता है कि विपणन जगत अब बुजुर्गों को विश्वसनीयता, पारंपरिक मूल्यों और ईमानदारी का प्रतीक मानने लगा है। उदाहरण के लिए, ‘फैमिलिंक’ जैसे उत्पाद, जो एक डिजिटल फोटो फ्रेम है, विशेष रूप से वरिष्ठ नागरिकों को ध्यान में रखकर बनाया गया है ताकि वे आसानी से अपने परिवार की तस्वीरें देख सकें। यह दर्शाता है कि अब उत्पाद डिजाइनिंग में भी बुजुर्गों की विशिष्ट आवश्यकताओं पर विचार किया जाने लगा है।
अंतर्राष्ट्रीय वृद्धजन दिवस केवल एक प्रतीकात्मक उत्सव नहीं, बल्कि हमारी सामूहिक जिम्मेदारी का स्मरण कराने वाला दिन है। यह दिन हमें यह विचार करने का अवसर देता है कि क्या हम अपने समाज के बुजुर्ग सदस्यों को वह सम्मान, सुरक्षा और स्नेह दे पा रहे हैं जिसके वह हकदार हैं। एक जिम्मेदार नागरिक और समाज के तौर पर हमारा कर्तव्य है कि हम उनके जीवन के अंतिम पड़ाव को समृद्ध, सुरक्षित और खुशहाल बनाने के लिए हर संभव प्रयास करें। आखिरकार, उन्होंने ही वह नींव रखी है, जिस पर हमारा वर्तमान और भविष्य टिका है।