हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # १२७ – सबसे खास: हमारे बॉस – भाग – १ ☆ श्री अरुण श्रीवास्तव ☆

श्री अरुण श्रीवास्तव

(श्री अरुण श्रीवास्तव जी भारतीय स्टेट बैंक से वरिष्ठ सेवानिवृत्त अधिकारी हैं। बैंक की सेवाओं में अक्सर हमें सार्वजनिक एवं कार्यालयीन जीवन में कई लोगों से मिलना   जुलना होता है। ऐसे में कोई संवेदनशील साहित्यकार ही उन चरित्रों को लेखनी से साकार कर सकता है। श्री अरुण श्रीवास्तव जी ने संभवतः अपने जीवन में ऐसे कई चरित्रों में से कुछ पात्र अपनी साहित्यिक रचनाओं में चुने होंगे। उन्होंने ऐसे ही कुछ पात्रों के इर्द गिर्द अपनी कथाओं का ताना बाना बुना है। प्रस्तुत है एक अप्रतिम श्रृंखला सबसे खास: हमारे बॉस” 

☆ कथा-कहानी # १२७ – सबसे खास: हमारे बॉस – भाग – १ 🥇 श्री अरुण श्रीवास्तव ☆

बहुत दिनों के बाद डरते डरते इस कथा को पेश करने का साहस जुटाया है, हालांकि डरने का न तो कारण नज़र आता है न ही वजह। क्षमा कीजिए, कारण और वजह का अर्थ तो एक ही होता है, एक हिंदी का शब्द है और एक उर्दू का पर ये बतलाने वाले या फिर टोकने वाले बॉस जीवन के साठ साल के बाद उपलब्ध नहीं होते हैं, और जो बॉस जैसी फीलिंग देते हैं, उन्हें अर्धांगिनी कहा जाता है, अंग्रेजी में बेटर हॉफ ज्यादा सटीक लगता है पर व्यवहारिक रूप से तो रिटायरमेंट के बाद वाला ये बॉस न्यूटन के गति के नियमानुसार “निरंतर श्रम और गृह प्रबंधन के कारण शासन के योग्य होता है, भारी होता है, हावी होता है”। और फिर हर सेवानिवृत्त सीनियर सिटीजन उनके सामने जूनियर/परिवीक्षाधीन बन जाता है जो बिना कुछ काम करते हुये या रिस्क उठाते हुए पेंशन तो पा जाता है पर घरवाली के सम्मान से महरूम हो जाता है। ये महोदया आपके बैंक में गाड़े गये झंडों से हमेशा अप्रभावित ही होती आई हैं पर अब तो ये कहने का अवसर भी खो चुकी होती हैं कि हमारे “ये”तो देश के सबसे बड़े बैंक के बहुत प्रभावशाली और महत्वपूर्ण स्टाफ रहे हैं और इनके बिना बैंक की शाखा या ऑफिस चलाना बहुत कठिन हो जाता है, तभी तो इनके बॉस इनके न जाने पर फोन लगा ही लेते हैं। वैसे तो ये ही बतलाते हैं कि बहुत कड़क बॉस हैं पर काम करने वालों को पसंद करते हैं, उनकी कदर करते हैं और निठल्लों को इनसे सीखने की शिक्षा देते हैं।पर अब :ये प्रश्न आउट ऑफ सिलेबस है, सोचने की अनुमति नहीं है, पूछने की तो सोचिए भी मत।

श्रृंखला जारी रखने का विचार सॉरी साहस तो बन रहा है, साथ ही किसी पर व्यक्तिगत आक्षेप करने का कोई भी इरादा नहीं है। जिस तरह हर सास भी कभी बहू होती है, उसी तरह हर बॉस का भी कोई बॉस तो होता ही है। अतः आप सभी से नम्र निवेदन है कि श्रंखला का पूरा पूरा मज़ा लेने के लिये खुद को बॉस फील करने के बजाय अपने बॉस को याद कीजिए, you will enjoy this series certainly.

Arun Shrivastava (I am not a Boss)😎😎😎

जारी रहेगा… 

© अरुण श्रीवास्तव

संपर्क – 301,अमृत अपार्टमेंट, नर्मदा रोड जबलपुर 

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक साहित्य # ३६९ ☆ आलेख – “सितंबर बटरफ्लाई मंथ विशेष – रंगों की किताब है तितलियां” ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ३६९ ☆

?  आलेख – सितंबर बटरफ्लाई मंथ विशेष – रंगों की किताब है तितलियां ? श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

प्रकृति की अद्भुत रंग कृति तितलियों के प्रति ध्यानाकर्षण हेतु ,सितम्बर का महीना बिग बटरफ्लाई मंथ के रूप में मनाया जाता है। प्रकृति की गोद में बसी तितलियां यूं तो पूरे साल नजर आती हैं, पर इस महीने वे जैसे किसी उत्सव में शामिल होने निकल पड़ती हैं। नमी भरे मौसम में फूलों पर मंडराती ये रंगीन परियां हमें याद दिलाती हैं कि दुनिया में सुंदरता और संतुलन का रहस्य इन्हीं छोटे जीवों में छिपा है। तितलियां सिर्फ आंखों को भाने वाली नैसर्गिक सजावट नहीं हैं, वे पारिस्थितिकी तंत्र की रीढ़ हैं। उनके बिना खेत सूने हो जाएंगे, पेड़ बंजर रह जाएंगे और प्रकृति का परागण चक्र अधूरा रह जाएगा।

तितली फूल से फूल तक उड़ती है और परागण करती है। इस प्रक्रिया से पेड़ पौधों का जीवन चक्र आगे बढ़ता है और हमारी थाली में अनाज और फल-सब्जियां सज पाती हैं। दरअसल, तितली का पंख फड़फड़ाना प्राकृतिक फल चक्र से जुड़ा हुआ है। यही नहीं, किसी क्षेत्र में कितनी तितलियां हैं और कितनी प्रजातियां मौजूद हैं, इससे उस क्षेत्र के पर्यावरण की गुणवत्ता का अंदाजा लगाया जाता है। तितलियां वहां के स्वास्थ्यमान की रिपोर्ट कार्ड होती हैं। पक्षी, छिपकली और कई छोटे जीव इन्हें भोजन बनाते हैं, ऐसे में खाद्य श्रृंखला चक्र में भी इनकी भूमिका महत्वपूर्ण है। अगर तितलियां कम हो जाएं तो जंगल का पूरा गणित गड़बड़ा जाएगा।

तितलियां कला और साहित्य की प्रेरणा भी हैं। कलाकार उनके रंगों से प्रेरित होकर चित्रकारी करते हैं, डिजाइनर उनके पंखों की नकल पर फैशन बनाते हैं और कवि उनकी उड़ान में सपनों की उड़ान खोजते हैं। बचपन में हाथ से पकड़ने की कोशिश हर किसी ने की होगी, पर तितली हमेशा फिसल कर उड़ जाती है। शायद यही उसका संदेश है कि सुंदरता को थामने की कोशिश मत करो, बस निहारो और सुरक्षित रखो।

लेकिन आज तितलियों पर खतरे मंडरा रहे हैं। जंगल उजड़ रहे हैं, शहर फैल रहे हैं, खेतों में कीटनाशक बिखर रहे हैं और प्रदूषण ने आसमान का रंग बदल दिया है। जलवायु परिवर्तन की मार से मौसम का संतुलन बिगड़ रहा है। इन सबका असर तितलियों के जीवन पर पड़ रहा है। तितली का जीवन चक्र चार चरणों में पूरा होता है । अंडा, लार्वा (इल्ली), प्यूपा और वयस्क तितली। मादा तितली पौधों की पत्तियों पर अंडे देती है, जो बाद में लार्वा में बदलते हैं और फिर प्यूपा अवस्था में रूपांतरित होकर एक पूर्ण तितली बन जाते हैं। हरियाली नष्ट होने से तितलियों का घर छिन रहा है, उनका भोजन घट रहा है और उनका प्रवास कठिन होता जा रहा है। तितलियों की कई दुर्लभ प्रजातियां विलुप्त होने की कगार पर आ गई हैं।

जरूरी है कि हम सब मिलकर तितलियों को बचाने के प्रयास करें। अपने घर के आंगन और बगीचों में ऐसे पौधे लगाएं जिन पर तितलियां आना पसंद करती हैं। कीटनाशकों का उपयोग कम करें, उसकी जगह जैविक उपाय अपनाएं। शहरों में हरियाली के छोटे-छोटे कॉरिडोर बचाए रखें, ताकि तितलियां वहां शरण पा सकें। बच्चों को इनके महत्व के बारे में बताना भी जरूरी है, ताकि नई पीढ़ी इन्हें सिर्फ चित्रों में न देखे बल्कि वास्तविक रूप में इनके बीच जी सके। सितंबर का यह महीना एक अवसर है जब हम सब मिलकर तितलियों का लेखा जोखा तैयार कर सकते हैं। तस्वीरें खींचकर साझा करने से वैज्ञानिकों को भी डेटा मिलता है और हमें भी अपने आसपास की तितलियों की पहचान करने का मौका मिलता है ।

तितली दरअसल प्रकृति का वह अध्याय है जो सजीव रंगों से लिखा गया है। उनके बिना यह धरती फीकी पड़ जाएगी। हमें यह समझना होगा कि तितली का संरक्षण केवल फूलों के साथ उसका खेल बचाने भर का काम नहीं है, बल्कि यह हमारे पर्यावरणीय संतुलन, खाद्य सुरक्षा और जीवन की निरंतरता से जुड़ा हुआ है। इस सितंबर का संकल्प यही होना चाहिए कि तितलियों को बचाना है, उनकी दुनिया को सुरक्षित रखना है। आखिर अगर तितलियां रहेंगी तो ही हमारे बगीचे महकेंगे, खेत लहलहाएंगे और धरती की मुस्कान कायम रहेगी।

क्या आपने अपने क्षेत्र में कोई खास तितली देखी है, जो आपको बार-बार लौटकर आती नजर आई हो? उसे पहचान कर, उसकी उपस्थिति का जश्न मनाना ही तितलियों की इस अद्भुत दुनिया का हिस्सा बनना है।

© श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

म प्र साहित्य अकादमी से सम्मानित वरिष्ठ व्यंग्यकार

संपर्क – ए 233, ओल्ड मिनाल रेजीडेंसी भोपाल 462023

मोब 7000375798, ईमेल apniabhivyakti@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य- आलेख – ☆ दिव्यांग आरक्षण पर डाका : फर्जी प्रमाण पत्रों की चुनौती ☆ श्री गोपाल सिंह सिसोदिया ‘निसार’☆

श्री गोपाल सिंह सिसोदिया ‘निसार’

(श्री गोपाल सिंह सिसोदिया  ‘निसार ‘ जी एक प्रसिद्ध कवि, कहानीकार तथा अनेक पुस्तकों के रचियता हैं। इसके अतिरिक्त आपकी विशेष उपलब्धि ‘प्रणेता संस्थान’ है जिसके आप संस्थापक हैं। आज प्रस्तुत है दिव्यांग आरक्षण पर एक विचारणीय आलेख – दिव्यांग आरक्षण पर डाका : फर्जी प्रमाण पत्रों की चुनौती।)

दिव्यांग आरक्षण पर डाका : फर्जी प्रमाण पत्रों की चुनौती ☆  श्री गोपाल सिंह सिसोदिया ‘निसार’ ☆ 

भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति उसका सामाजिक न्याय का वचन है। यह वचन केवल संविधान की धाराओं में नहीं, बल्कि उन संवेदनाओं में जीवित है जो समाज के सबसे वंचित तबके तक अवसर पहुँचाने की कोशिश करती हैं। दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 इसी संवेदनशीलता की परिणति है, जिसने शिक्षा और सरकारी नौकरियों में चार प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान सुनिश्चित किया। यह मात्र “कोटा” नहीं था, बल्कि यह मान्यता थी कि दिव्यांगजन अपने अधिकारों और सामर्थ्य के साथ समाज और राष्ट्र निर्माण में बराबरी से भाग ले सकते हैं। विडम्बना यह है कि जिस व्यवस्था को न्याय का सेतु बनना था, वही धीरे-धीरे फर्जीवाड़े का अड्डा बनती जा रही है। हाल ही में राजस्थान में जो खुलासा हुआ, उसने दिखा दिया कि किस तरह नकली दिव्यांग प्रमाण पत्रों के सहारे नियुक्तियों का खेल खेला जा रहा है। यह कोई साधारण चूक नहीं, बल्कि जनता के विश्वास और संविधान की आत्मा पर सीधा प्रहार है। यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या इतनी जटिल चयन और नियुक्ति प्रक्रिया के भीतर यह सब बिना किसी अंदरूनी मिलीभगत के संभव है?

राजस्थान की घटना कोई अकेला उदाहरण नहीं है। उत्तर प्रदेश में शिक्षक भर्ती घोटाले से लेकर दिल्ली में मेडिकल और विश्वविद्यालय प्रवेश तक, महाराष्ट्र में रेलवे और पुलिस भर्ती से लेकर तमिलनाडु के मेडिकल एडमिशन तक, लगभग हर जगह नकली प्रमाण पत्रों का नेटवर्क पकड़ में आया। बिहार और केरल जैसे राज्यों में भी बार-बार इसी तरह की घटनाएँ सामने आती रही हैं। यह तस्वीर साफ़ करती है कि यह समस्या किसी एक प्रदेश की नहीं, बल्कि पूरे राष्ट्र की है।

इन सबके बीच पूजा खेड़कर का मामला विशेष रूप से ध्यान आकर्षित करता है। उन्होंने मानसिक रोग श्रेणी का प्रमाण पत्र प्रस्तुत कर सिविल सेवा में प्रवेश पाया और प्रशिक्षण तक पहुँच गईं। बाद की जाँच में यह प्रमाण पत्र फर्जी पाया गया और उनका छल सबके सामने आया। यह मामला यह साबित करता है कि यह केवल एक व्यक्ति का अपराध नहीं, बल्कि पूरे आरक्षण तंत्र की साख पर गहरी चोट है। यह प्रश्न केवल कानून का नहीं, संवेदना का भी है। जब कोई व्यक्ति नकली दिव्यांग प्रमाण पत्र के सहारे नौकरी हासिल करता है तो वह न केवल राज्य और संविधान से धोखा करता है, बल्कि उस संघर्षशील युवक या युवती का भी अधिकार छीन लेता है जिसने वास्तविक चुनौतियों के बीच शिक्षा और प्रतियोगिता की तैयारी की। यही कारण है कि इसे दुगुना अन्याय कहा जाना चाहिए।

भारतीय न्याय संहिता, 2023 के अंतर्गत ऐसे अपराधों पर धारा 318 में धोखाधड़ी, धारा 336 में कूटरचना और धारा 338 में कूटरचित दस्तावेज़ के प्रयोग का प्रावधान है। इसके अतिरिक्त दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 की धारा 89 भी इन कृत्यों को दंडनीय मानती है। कई मामलों में दोषियों को सेवा से बर्खास्त किया गया, वेतन की वसूली की गई और भविष्य की भर्तियों से प्रतिबंधित किया गया। लेकिन केवल दंड देना ही पर्याप्त नहीं है, क्योंकि समस्या जड़ों में कहीं अधिक गहरी है।

समाधान के लिए यह अनिवार्य है कि प्रमाण पत्र जारी करने की प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी और डिजिटल हो। बायोमेट्रिक आधारित राष्ट्रीय डेटाबेस बनाया जाए जिसमें सभी प्रमाण पत्रों का तत्काल सत्यापन संभव हो। कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (DoPT) को चाहिए कि इस दिशा में ठोस कदम उठाए और सर्वोच्च न्यायालय स्वतः संज्ञान लेकर राज्यों को यह निर्देश दे कि नियुक्तियों की निष्पक्ष जाँच समयबद्ध ढंग से पूरी की जाए। केवल दोषियों को दंडित करने से बात पूरी नहीं होगी, बल्कि यह भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि असली हकदार अभ्यर्थियों को न्यायपूर्ण अवसर और पदोन्नति समय पर मिले।

आज हमारे सामने सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि क्या हम उन अधिकारों की रक्षा कर पाएँगे जिन्हें समाज ने सहानुभूति से नहीं, बल्कि समानता की भावना से दिया है। विद्यानिवास मिश्र ने लिखा है कि व्यवस्था पर विश्वास तभी टिकेगा जब उसकी जड़ों में सच्चाई और संवेदना की नमी बनी रहे। यदि यह नमी सूख गई, तो लोकतंत्र का यह पौधा केवल कानून की किताबों में जीवित रहेगा, जनता के जीवन में नहीं।

संदर्भ सूची

  • भारत सरकार. भारतीय न्याय संहिता, 2023. विधि एवं न्याय मंत्रालय, 25 अगस्त 2023. https://egazette.nic.in.
  • भारत सरकार. दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016. विधि एवं न्याय मंत्रालय, 28 दिसम्बर 2016. https://disabilityaffairs.gov.in.
  • “राजस्थान में फर्जी दिव्यांग प्रमाण पत्र से सरकारी नौकरी का खुलासा.” द टाइम्स ऑफ इंडिया, 28 फ़रवरी 2025, https://timesofindia.indiatimes.com/city/jaipur/24-govt-staff-fake-disabilities-to-get-jobs-reveals-sog-probe/articleshow/123150436.cms.
  • यूपी में शिक्षक भर्ती में फर्जी प्रमाण पत्र का इस्तेमाल.” द टाइम्स ऑफ इंडिया, 16 दिसम्बर 2017, https://timesofindia.indiatimes.com/city/agra/2k-up-govt-teachers-used-fake-disability-docus-to-secure-jobs-scrutiny-on/articleshow/62099286.cms.
  • दिल्ली में नकली दिव्यांग प्रमाण पत्र गिरोह का पर्दाफाश.” द इंडियन एक्सप्रेस, 12 नवम्बर 2016, https://indianexpress.com/article/cities/delhi/fake-certificates-gang-busted-delhi-police-4398200/.
  • महाराष्ट्र पुलिस व रेलवे भर्ती में फर्जी दिव्यांग प्रमाण पत्र.” हिंदुस्तान टाइम्स, 4 मार्च 2019, https://www.hindustantimes.com/india-news/maharashtra-police-railway-fake-disability-certificate-case-101551234657893.html.
  • तमिलनाडु मेडिकल प्रवेश में फर्जी श्रवण-दृष्टि बाधा प्रमाण पत्र.” द न्यू इंडियन एक्सप्रेस, 10 सितम्बर 2020, https://www.newindianexpress.com/states/tamil-nadu/2020/sep/10/students-use-fake-disability-certificates-for-medical-admission-2194561.html.
  • पूजा खेड़कर मामला: पुणे अस्पताल की रिपोर्ट.” हिंदुस्तान टाइम्स, 30 जुलाई 2024, https://www.hindustantimes.com/india-news/puja-khedkar-case-pune-hospital-finds-no-foul-play-in-disability-certificate-101721865366403.html.
  • सुप्रीम कोर्ट ने दी ज़मानत: पूजा खेड़कर.” द टाइम्स ऑफ इंडिया, 6 मई 2025, https://timesofindia.indiatimes.com/india/has-she-killed-someone-asks-supreme-court-grants-bail-to-puja-khedkar/articleshow/121324285.cms.

© श्री गोपाल सिंह सिसोदिया  ‘निसार’ 

दिल्ली

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ७७९ ⇒ प्यार का पहला खत ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “प्यार का पहला खत।)

?अभी अभी # ७७९ ⇒ आलेख – प्यार का पहला खत ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

प्यार का पहला ख़त, लिखने में, वक्त तो लगता है ! अरे भाई ! लेकिन कितना वक़्त लगता है ? क्या सत्तर वर्ष की उम्र में पहला ख़त लिखा जाता है। और वह भी खुला खत। खत न हुआ, मानो खुला खाता हो गया।

ख़त प्यार करने पर लिखा जाता है, या प्यार हो जाने पर, इसकी मुझे विशेष जानकारी नहीं है। जिस तरह सड़क पर खुले आम सूचना दी जाती है, ” सावधान ! निर्माण कार्य प्रगति पर “, क्या प्यार में भी ऐसी कोई पूर्व सूचना दी जाती है कि, ” सावधान ! प्यार परवान चढ़ रहा है ! ” यहाँ हमने तो सिर्फ़ पानी को मोटर से ऊपर चढ़ते देखा है और पड़ोस वाली मोटी आंटी को लिफ्ट से तीसरी मंजिल चढ़ते।।

इसके पहले भी मैंने कई खत लिखे हैं, मित्र को पत्र लिखा है, बहन को चिट्ठी लिखी है, पत्नी जब मायके में बीमार थी, तब भी उसे दो शब्द तसल्ली के लिखे हैं, लेकिन ढाई आखर वाला खत, जिसे प्यार का खत कहते हैं, वह आज ही लिख रहा हूँ। अगर पत्नी वाला खत, जो पोस्टकार्ड पर लिखा था, और जिसे पोस्ट करने के पूर्व बहन ने माँ को पढ़कर सुनाया था, और जिस पर पाने वाले का पता मार्फ़त लड़की के पितां लिखा था, अगर पहले खत में शुमार किया जाए, तो मुझे यह कबूल करने में कोई संकोच नहीं कि यह वाला प्यार का खत, पहला खत नहीं।

प्यार के बारे में कहा जाता है कि यह किया नहीं जाता, हो जाता है। शायद गीता में इसे ही निष्काम कर्म कहा गया हो। शायर लोग प्यार के फल की बात नहीं करते, अंज़ाम का जिक्र करते हैं। दिल दिया दर्द दिया के इस गीत की तरह ;

गुजरे हैं आज इश्क़ के,

हम उस मुकाम से।

नफ़रत सी हो गई है,

मोहब्बत के नाम से।।

हमारे साथ ऐसा कुछ हुआ ही नहीं ! कहीं दिल लगा ही नहीं, तो दिल टूटा ही नहीं। एक दिल में छेद हो तो वैद, हकीम, डॉक्टर को बुला लिया जाता है और जब इस दिल के हज़ार टुकड़े होते हैं, तो कोई यहाँ गिरता है, और कोई वहाँ ! हद होती है भाई फेंकने की, कसम से।।

पहले पहल का प्यार का इज़हार ही प्यार का पहला खत होता होगा, यह मानकर मैं भी एतदद्वारा घोषणा करता हूँ कि यह मेरा प्यार का पहला खत है। मुझे इस उम्र में प्यार हो गया है और वह भी फेसबुक से।

एक समय था, जब मुझे किताबों से प्यार हुआ था। लेकिन तब न तो मैंने प्यार का इज़हार किया, न ही कोई प्यार का खत लिखा। वह ज़माना था, जब खत किताबों में रखकर दिया जाता था। कभी किसी सहेली के हाथ लगता था, तो कभी किसी के भाई के हाथ ! और ख़त तमाशा बन जाता था ;

हमको तुम्हारे इश्क ने क्या क्या बना दिया।

जब कुछ न बन सके तो तमाशा बना दिया।।

जब से किताबों का स्थान फेसबुक ने ले लिया है, वह अक्सर मेरे साथ ही रहती है। मैं सोता रहता हूँ, फेसबुक जागती रहती है। उससे नज़र मिलते ही, मेरी नींद उड़ जाती है। मेरा प्यार सार्वजनिक है, खुल्लमखुल्ला है। प्यार का ये खत पहला है और सभी फेसबुक-प्रेमियों को संदेस बस इतना है, प्यार बाँटते चलो।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # १४६ – देश-परदेश – ग से गधा ☆ श्री राकेश कुमार ☆

श्री राकेश कुमार

(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ  की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” ज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)

☆ आलेख # १४६ ☆ देश-परदेश – ग से गधा ☆ श्री राकेश कुमार ☆

जीवन में सबसे अपमानित किए जाने वाली संज्ञा “गधा” सुन सुन कर ही पूरा जीवन निकल गया हैं। बचपन से घर पर मिल रहा ये सम्मान बाद में महाविद्यालय तक साथ चला। नौकरी में भी इसी नाम से वरिष्ठ जनों द्वारा संबोधित किया जाता था।

मुहावरों तक में इनकी मेहनत और निष्ठा का कोई स्थान नहीं मिला है। गधे को बाप बनाना, गधे पर किताबें लादना, गधे से हल चलवाना जैसे कटाक्ष भरी जली कटी बातें मानव जाति करता रहता है।

शहरों की पतली/संकरी गलियों में इनके बिना सप्लाई लाइन तक पूरी नहीं होती है।

बहुत कम उच्चाइयों वाली खदानों के अंदर में कोयले से  अपनी पीठ पर ढोना हो या कुम्हार के बड़े बड़े मटको को बाज़ार तक पहुंचाना हो, ये गधे ही है, जो कुशलता पूर्वक कर पाते हैं।

दुनिया भर में आपको डॉग, बर्ड, कैट लवर्स आदि मिल जाएंगे। कोई भी संस्था गधों के अत्याचारों के लिए लड़ने को तैयार नहीं हैं। कोई भी एन जी ओ इनके सम्मान से जीने की वकालत नहीं करता है।

साठ के दशक की एक फिल्म मेहरबान में अवश्य एक गीत गधों पर आधारित हैं, “मेरा गधा, गधों का लीडर”। सूखी घास खाकर जीने वाले प्राणी के लिए कह दिया जाता है” गधे पंजीरी खा रहे हैं”, जबकि बेचारा गधा कभी पान का हरा पत्ता तक नहीं खाता है।

गधा कभी कुछ अच्छा करता है, तो उसको ये कह कर हतोत्साहित कर दिया जाता है, “गधे हो गधे ही रहो घोड़ा बनने की जरूरत नहीं हैं।”

अब तो उच्चतम न्यायालय से ही उम्मीद है, वो स्वतः संज्ञान लेते हुए, कोई बड़ा निर्णय गधों के पक्ष में ले कर, सदियों से दर्द और बेज़्जती भरे जीवन में कुत्तों जैसी बाहर आएगी।

© श्री राकेश कुमार

संपर्क – B 508 शिवज्ञान एनक्लेव, निर्माण नगर AB ब्लॉक, जयपुर-302 019 (राजस्थान)

मोबाईल 9920832096

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ७७८ ⇒ माड़ साब ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “माड़ साब ।)

?अभी अभी # ७७८⇒ आलेख – माड़ साब ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

जिस तरह सरकारी दफ्तरों में एक किस्म बड़े बाबू की होती है, ठीक उसी तरह सरकारी स्कूलों में शिक्षक की एक किस्म होती है, जिसे माड़ साब कहते हैं। बड़े बाबू, नौकरशाही का एक सौ टका शुद्ध, टंच रूप है, जिसमें रत्ती भर भी मिलावट नहीं, जब कि शिक्षा विभाग में माड़ साब जैसा कोई शब्द ही नहीं, कोई पद ही नहीं।

माड़ साब, एक शासकीय प्राथमिक अथवा माध्यमिक विद्यालय के अध्यापक यानी शिक्षक महोदय, जिन्हें कभी मास्टर साहब भी कहा जाता था, का अपभ्रंश यानी, बिगड़ा स्वरूप है।।

हमें आज भी याद है, हमारी प्राथमिक स्कूल की नर्सरी राइम, ए, बी, सी, डी, ई, एफ, जी, क्लास में बैठे पंडित जी ….( रिक्त स्थानों की पूर्ति आप ही कर लीजिए ) होती थी। यह तब की बात है, जब छम छम छड़ी की मार से, विद्या धम धम आती थी। बेचारे पंडित जी, कब मास्टर जी हो गए, और जब अधेड़ होते होते, माड़ साब हो गए, उन्हें ही पता नहीं चला।

इस प्राणी में यह खूबी है, कि यह केवल सरकारी स्कूलों में ही नजर आता है। हायर सेकंडरी के कुछ वरिष्ठ शिक्षक लेक्चरर अथवा व्याख्याता कहलाना अधिक पसंद करते हैं। आजकल प्राइवेट स्कूल, पब्लिक स्कूल कहलाए जाने लगे हैं, वहां सर अथवा टीचर किस्म के शिक्षक उपलब्ध होते हैं, जिनकी तनख्वाह माड़ साहब जितनी तो नहीं होती, लेकिन जिम्मेदारी धड़ी भर होती है।।

वैसे यहां सरकारी स्कूलों में शिक्षिका भी होती हैं, जिन्हें कभी सम्मान से बहन जी कहा जाता था। लेकिन जब बहन जी भी घिस घिस कर भैन जी कहलाने लगी, तो उन्हें सम्मान से मैडम अथवा टीचर जी कहकर संबोधित किया जाने लगा।

मैडम शब्द के बारे में भी हमारे कार्यालयों में बड़ी भ्रांति है। शिक्षा के क्षेत्र से प्रचलित यह शब्द किसी विवाहित महिला के लिए प्रयुक्त किया जाना चाहिए, लेकिन माड़ साब की तरह और मिस्टर की तरह मैडम शब्द हर कामकाजी महिला, और एक आम शिक्षिका के लिए प्रयुक्त होने लग गया।।

एक बार स्थिति बड़ी विचित्र पैदा हो गई, जब किसी बैंक में एक रिटायर्ड फौजी पेंशनर ने किसी महिला कर्मचारी से पूछ लिया, are you married ? उस बेचारी कुछ दिन पहले ही लगी लड़की ने कह दिया, no Sir, I am still a bachelor ! इस पर उस पेंशनर ने आश्चर्य व्यक्त किया, why then, these people call you Madam, I dont understand. आपके साथी आपको मैडम क्यों कहते हैं, मुझे समझ में नहीं आता।

वैसे मास्टर शब्द को हल्के में नहीं लिया जाना चाहिए ! जो किसी भी विधा में, अपने इल्म में दक्ष हो, उसे मास्टर कहा जाता है। मास्टर्स की डिग्री वैसे भी बैचलर्स की डिग्री से बड़ी होती है।।

संगीत और नृत्य में मास्टर जी, किसी उस्ताद अथवा गुरु से उन्नीस नहीं होते।

अध्यात्म के क्षेत्र में जो अदृश्य शक्तियां अमृत काल में, साधकों की सहायता करती हैं, उन्हें भी मास्टर ही कहते हैं। महावतार बाबा, युक्तेश्वर गिरी और लाहिड़ी महाशय की गिनती ऐसे ही मास्टर्स में होती है।

माड़ साब के साथ ऐसा कोई धर्मसंकट नहीं। उन्हें माड़ साब सुनने की वैसे ही आदत है, जैसे एक बड़े बाबू आजीवन घर और बाहर बड़े बाबू ही कहलाते चले आ रहे हैं। मेरे कई पारिवारिक और घनिष्ठ मित्रों को मुझे भी मजबूरन माड़ साब ही कहना पड़ता है। अगर कभी गलती से उनका नाम लेने में भी आ गया, तो सामने वाला सुधार कर देता है, अच्छा वही माड़ साब ना।।

रिश्तों पर आजकल घनघोर संकट चल रहा है। प्रेम के संबंध और रिश्ते गायब होते जा रहे हैं, रिटायर्ड अकाउंटेंट और शिक्षाकर्मी और शिक्षाविद् जैसे भारी भरकम शब्द अधिक प्रचलन में है। कल ही मैने अपने एक प्रिय माड़ साब को खोया है, ईश्वर इन रिश्तों की रक्षा करे ..!!

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संजय उवाच # ३०५ – अगले बरस तू जल्दी आ… ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆ —

श्री संजय भारद्वाज

(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के  लेखक  श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है। साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ  हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको  पाठकों का  आशातीत  प्रतिसाद मिला है।”

हम  प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है  इस शृंखला की अगली कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों  के माध्यम से  हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)

☆  संजय उवाच # ३०५ ☆ अगले बरस तू जल्दी आ… ?

कल अनंत चतुर्दशी थी। गणेश चतुर्थी के दिन गणेश जी के विग्रह की प्रतिष्ठा से आरम्भ गणेशोत्सव विसर्जन के साथ ही कल समाप्त हो गया। यूँ देखें तो सृजन, प्रतिष्ठा और विसर्जन के माध्यम से जीवन की सम्पूर्ण यात्रा हमारे अनेक त्योहारों में अंतर्निहित है। आगमन से गमन तक का पर्व है, गणेशोत्सव।

घर में अतिथि का आगमन एक सामान्य घटना है। अतिथि के आने का दूसरा पहलू है कि वह लौट जाएगा। भूलोक भी प्रकृति का घर है। हम सब अतिथि हैं। मर्त्यलोक में देह धारण करके जो आया, उसका लौटना अवश्यंभावी है। कीर्ति तो अक्षुण्ण रह सकती है, अमर हो सकती है पर देह का नष्ट होना  अनिवार्य है।

नश्वर जगत में प्रदत्त समय का सदुपयोग करना, अपनी भूमिका का समुचित निर्वहन करना मनुष्य से अपेक्षित है। समय बीतने के बाद पश्चाताप के अलावा कुछ शेष नहीं रह जाता।

किसी राज्य में राजा द्वारा आयोजित संगीतोत्सव में भाग लेने के लिए एक युवा सितारवादक को आमंत्रित किया गया। सितारवादक के लिए अपनी प्रतिभा के प्रदर्शन का यह स्वर्णिम अवसर था। उसने विचार किया कि वह ऐसा सितार बजाएगा जिससे श्रोता मंत्रमुग्ध हो जाएँगे और राजा उससे प्रसन्न होकर बहुत सारा धन देगा।

संगीतोत्सव आरम्भ हुआ। हर कलाकार की प्रस्तुति के लिए समय निर्धारित था। समय पूरा होने पर पर्दा गिर जाता और फिर नया कलाकार आता। सितारवादक की प्रस्तुति का समय आया। वह मंच पर पहुँचा। वादन आरम्भ करने से पहले सितार की ट्यूनिंग के लिए उसकी खूँटियाँ मरोड़ कर सुर मिलाने लगा। इस प्रक्रिया में ऐसा खोया कि उसे प्रदत्त समय समाप्त हो गया और पर्दा गिरा दिया गया। सितारवादक को वादन के बिना ही लौटना पड़ा। अवसर तो मिला था पर प्रस्तुति नहीं दे पाया, तैयारी में ही रह गया। डॉ. हरिवंशराय बच्चन के शब्दों में लिखूँ तो ‘जीवन सब बीत गया, जीने की तैयारी में।’

समय रहते वह सितार बजा लेता तो संभव था कि उसकी सितार के सुर वर्षों तक याद किए जाते और देहातीत होकर भी अपनी प्रतिभा के बल पर वह चिरंजीवी हो जाता।

अष्ट चिरंजीवी व्यक्तित्वों में से एक हैं महर्षि वेदव्यास। उन्हें ज्ञान का मूर्तिमान स्वरूप माना गया है। मान्यता है कि महर्षि ने भगवान गणेश को दस दिन तक निरंतर महाभारत की कथा सुनाई और श्री गणेश उसे लिपिबद्ध करते गए। तत्पश्चात महर्षि ने पाया कि श्री गणेश के शरीर का तापमान बहुत अधिक बढ़ गया है। महर्षि ने गणेश जी को समीप के एक सरोवर में स्नान कराया ताकि उनके शरीर का तापमान सामान्य हो सके। यह काल गणेशोत्सव के रूप में मनाया जाता है और उत्कर्ष के रूप में विग्रह का जल में विसर्जन होता है।

श्री गणेश बुद्धि के देवता हैं। स्वाभाविक है कि उनके लिए मनाया जानेवाला उत्सव ज्ञान की प्रतीति कराने वाला हो। महर्षि वेदव्यास इसी शाश्वत ज्ञान के अविनाशी प्रसारक हैं। ज्ञान के प्रचार-प्रसार में लगे साधकों में महर्षि का यही जाग्रत अंश देखने को मिलता है।

सृजन, प्रतिष्ठा और विसर्जन के माध्यम से गणेशोत्सव, जीवनचक्र की प्रतिकृति बनकर सामने आता है। स्मरण रहे, ‘अगले बरस तू जल्दी आ’ आगमन से गमन की सतत और अखंड यात्रा का घोष है। काया धारण करने वाला हर जीव इसी अटल यात्रा का पथिक है। ..इति।

© संजय भारद्वाज 

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️  श्री गणेश साधना संपन्न हुई. अगली साधना की सूचना आपको शीघ्र ही दी जावेगी। 🕉️💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं।

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ शिक्षक दिवस विशेष… नमस्ते के नंबर… ☆ श्री अजीत सिंह ☆

श्री अजीत सिंह

(हमारे आग्रह पर श्री अजीत सिंह जी (पूर्व समाचार निदेशक, दूरदर्शन) हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए विचारणीय आलेख, वार्ताएं, संस्मरण साझा करते रहते हैं।  इसके लिए हम उनके हृदय से आभारी हैं। आज प्रस्तुत है आपका शिक्षक दिवस पर एक संस्मरणीय आलेख नमस्ते के नंबर।)

☆ आलेख – नमस्ते के नंबर…  ☆ श्री अजीत सिंह ☆

जम्मू यूनिवर्सिटी में एम कॉम की पढ़ाई कर रहा मेरा बेटा एक दिन अपने एक सेमेस्टर की परीक्षा का रिपोर्ट कार्ड लेकर आया। मैंने कार्ड देखा और पूछा कि एक सब्जेक्ट में उसके मार्क्स कम क्यूं थे। उसने कहा कि वह प्रो वर्मा का सब्जेक्ट था जो ढंग से नहीं पढ़ाते और अक्सर कंप्यूटर पर शेयर मार्केट में बिजी रहते थे। वह पहले भी प्रो वर्मा के बारे में शिकायत करता रहता था।

फिर मैने पूछा कि एक दूसरे सब्जेक्ट में उसके काफ़ी अच्छे नंबर हैं तो उसने कहा, डैडी ये तो नमस्ते के नंबर हैं।

मैने कहा कि वह प्रो वर्मा को नमस्ते कर अच्छे नंबर क्यूं नहीं प्राप्त कर लेता।

बेटा बोला कि उनसे तो सभी विद्यार्थी कन्नी काटते हैं। उनके पास कोई नहीं जाता, बस कहीं यूं ही मिल जाएं तो गुड मॉर्निंग वगैरा कह कर निकल जाते हैं।

मैने समझाने की कोशिश करते हुए कहा कि आदरपूर्ण नमस्ते या गुडमॉर्निंग कहने का अर्थ है कि आप उस प्रोफेसर का सम्मान करते हैं और इसका सीधा प्रभाव आपके अंकों पर पड़ता है। आप टीचर का सम्मान करेंगे तो उसके विषय का सम्मान भी हो जाएगा।

इसका सीधा सा अर्थ यह है कि पढ़ाई में अच्छे स्कोर के लिए अध्यापक का सम्मान पहली शर्त है। सम्मान के अभाव में आपका स्कोर भी अच्छा नहीं होगा।

यह मामला सिर्फ स्कोर तक सीमित नहीं रहा। जब एम कॉम फाइनल एग्जाम का वाइवा हुआ तो इसे लेने गुरु नानकदेव यूनिवर्सिटी के एक प्रोफेसर जम्मू यूनिवर्सिटी आए थे। उन्होंने आते ही प्रो शर्मा से कहा कि कुछ दिन पहले उनके यहां इंडियन एक्सप्रेस चंडीगढ़ की टीम आई थी और उसने उनके एम बी ए के पांच विद्यार्थियों को मार्केटिंग एग्जीक्यूटिव की पोस्ट के लिए चुना था। उन में से चार ने जॉब ज्वाइन कर ली और एक ने नहीं की। उन्होंने प्रो शर्मा से कहा कि क्या वे उन्हें अपने किसी एक विद्यार्थी का नाम बता सकते हैं जिसका वे गहन इंटरव्यू करने के बाद उसका नाम चंडीगढ़ इंडियन एक्सप्रेस को भेज देंगे।

प्रो शर्मा ने नमस्ते करने वाले मेरे बेटे का नाम सुझाया। अमृतसर से आए प्रोफेसर ने गहन परीक्षा ली और उसे योग्य पाए जाने के बाद आखिर में पूछा कि क्या वो नौकरी करना चाहता है। बेटे ने फट से हां कह दी। प्रोफेसर साहिब ने परीक्षा के बाद उसे एक चिट्ठी इंडियन एक्सप्रेस के एच आर हेड के नाम दे दी और इस तरह मेरे बेटे को उसकी पहली नौकरी मिल गई ।

कहानी का निष्कर्ष यह है कि अध्यापक का सम्मान आपको न केवल पढ़ाई में अच्छे मार्क्स दिला सकता है बल्कि आपके रोज़गार का रास्ता भी साफ कर सकता है। हर विद्यार्थी को अपने अध्यापक का सम्मान करना चाहिए। माता पिता को भी अपने बच्चों के अध्यापकों का सम्मान करना चाहिए और बच्चों में ऐसे संस्कार पैदा करने चाहिएं कि वे अध्यापकों का सम्मान करें।

सभी को अध्यापक दिवस की बधाई।

☆ ☆ ☆ 

 © श्री अजीत सिंह

05.09.25

पूर्व समाचार निदेशक, दूरदर्शन हिसार।

मो : 9466647037

26.07.2025

(लेखक श्री अजीत सिंह हिसार से स्वतंत्र पत्रकार हैं । वे 2006 में दूरदर्शन केंद्र हिसार के समाचार निदेशक के पद से सेवानिवृत्त हुए।)

ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ७७७ ⇒ विचारक और प्रचारक ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “विचारक और प्रचारक।)

?अभी अभी # ७७७ ⇒ आलेख – विचारक और प्रचारक ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

विचारक और प्रचारक का रिश्ता भी कुछ कुछ लेखक और पाठक जैसा ही होता है, बस अंतर यह है कि हर पाठक लेखक का प्रशंसक नहीं होता, जब कि हर प्रचारक, विचारक का प्रशंसक भी होता है।

पहले विचार आया, फिर विचार का प्रचार आया। आप चाहें तो विचारक को चिंतक भी कह सकते हैं, लेकिन चिंतक इतना अंतर्मुखी होता है कि उसे अपने विचार से ही फुर्सत नहीं मिलती। हमारी श्रुति, स्मृति और पुराण उसी विचार, गूढ़ चिंतन मनन का प्रकटीकरण ही तो है। जिस तरह वायु, गंध और महक को अपने साथ साथ ले जाकर वातावरण को सुगंधित करती है, ज्ञान का भी प्रचार प्रसार विभिन्न माध्यमों से होता चला आया है।।

चिंतन सामाजिक मूल्यों का भी हो सकता है और मानवीय मूल्यों का भी। विचारक जहां सामाजिक व्यवस्था से जुड़ा होता है, एक दार्शनिक जीवन के मानवीय और भावनात्मक पहलुओं पर अपनी निगाह रखता है। विचार और दर्शन हमेशा साथ साथ चले हैं। विचार ने ही क्रांतियां की हैं, और विचारों के प्रदूषण ने ही इस दुनिया को नर्क बनाया है। ऐसा क्या है बुद्ध, महावीर, राम और कृष्ण में कि वे आज भी किसी के आदर्श हैं, पथ प्रदर्शक हैं, कोई उन्हें पूजता है तो कोई उन्हें अवतार समझता है। मार्क्स, लेनिन आज क्यों दुनिया की आंख में खटक रहे हैं। विचार ही हमें देव बना रहा है, और विचार ही हमें असुर। देवासुर संग्राम अभी थमा नहीं।

एक अनार सौ बीमार तो ठीक, पर एक विचारक और इतने प्रचारक ! अगर सुविचार हुआ तो सबका कल्याण और अगर मति भ्रष्ट हुई तो दुनिया तबाह। देश, दुनिया, सभ्यता, संस्कृति विचारों से ही बनती, बिगड़ती चली आ रही है। मेरा विचार, मेरी सभ्यता, मेरी संस्कृति सर्वश्रेष्ठ, हमारा नेता कैसा हो, इसके आगे हम कभी बढ़ ही नहीं पाए। जो विचार भारी, जनता उसकी आभारी।।

आज सबके अपने अपने फॉलोअर हैं, प्रशंसक हैं, आदर्श हैं। सोशल मीडिया और प्रचार तंत्र जन मानस पर इतना हावी है कि आम आदमी की विचारों की मौलिकता को ग्रहण लग गया है। एक भेड़ चाल है, जिससे अलग वह चाहकर भी नहीं चल सकता।

हमारी विचारों की बैलगाड़ी दो बैलों की जोड़ी से शुरू हुई और गाय बछड़े पर आकर रुक गई। विकास ट्रैक्टर पर चढ़कर आया और कीचड़ में कमल खिल गया। हमने बछड़े को हटा दिया, गाय को माता बनाकर गौशाला में भेज दिया। अब यह गऊ माता ही हमें इस भव सागर से पार लगाएगी। आज हमारे पास अच्छे विचारक भले ही नहीं हों, अच्छे प्रचारक जरूर हैं।।

आज का युग विचार का नहीं, प्रचार का युग है। अच्छाई एक ब्रांड है, जो बिना अच्छे पैकिंग, विज्ञापन और ब्रांड एंबेसेडर के नहीं बेची जा सकती। धर्म, राजनीति, आदर्श, नैतिकता और समाज सेवा बिना प्रचार और प्रचारक के संभव ही नहीं। कोई सेवक है, कोई स्वयंसेवक, कोई गुरु है कोई चेला, कोई स्वामी है कोई शिष्य, कोई भगवान बना बैठा है तो कोई शैतान। सबकी दुकान खुली हुई है, मंडी में बोलियां लगवा रही हैं समाजवाद, पूंजीवाद, वंशवाद और राष्ट्रवाद की। सबके आदर्श, सबके अपने अपने विचारक, प्रचारक और डंडे झंडे। मंडे टू संडे। जिसका ज्यादा गल्ला, उसका बहुमत। लोकतंत्र जिंदाबाद।।

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ७७६ ⇒ फुटपाथ ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “फुटपाथ।)

?अभी अभी # ७७६ ⇒ आलेख – फुटपाथ ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

पैदल चलने वालों के लिए सड़क के दोनों ओर जो रास्ता बनाया जाता है, उसे फुटपाथ कहते हैं। गांवों में लोगों के पांवों के निशानों से ही पगडंडियां बनती जाती थी। कच्ची पक्की सड़कें तो बहुत बाद में बनती थी।

हमारे देश में पहली फुटपाथ (फिल्म) १९५३ में बनी और आखरी फुटपाथ(फिल्म) सन् २००३ में। आजकल सड़कें तो बनती हैं, लेकिन फुटपाथ के लिए जगह नहीं होती।

फुटपाथ मूलतः पैदल चलने वालों के लिए सड़क के दोनों ओर, वहीं बनाया जाता है, जहां बाजार होता है, दुकानें होती हैं, लोगों की आवाजाही होती है। इस तरह अनौपचारिक रूप से फुटपाथ पर दुकानदारों का कब्जा हो जाता है। पहले थोड़ा, फिर अति, इस तरह धीरे धीरे फुटपाथ पर दुकानदारों का अतिक्रमण हो जाता है और राहगीर सड़क पर आ जाता है। ।

एक समय था, जब शहर की आबादी कम थी, लोग सुबह शाम पैदल घूमने निकलते थे। सड़कों पर भी अधिकतर साइकिल और इक्के दुक्के ही वाहन देखे जा सकते थे। आदमी निश्चिंत होकर फुटपाथ पर चल सकता था। हर दुकान को निहारता हुआ, जरूरत की दुकान पर रुकता, सुस्ताता, कुछ खरीदता हुआ, अपनी राह पर चलता रहता था।

जहां फुटपाथ खत्म होता था, वहां कोई मोची बैठा मिलता था, तो कहीं हर शनिवार को कोई महिला सुबह से ही शनि महाराज को विराजमान कर देती थी।

शनिवार ही वह दिन होता था, जब सड़कों और फुटपाथों की नगर निगम द्वारा पानी से धुलाई होती थी। ऐसा प्रतीत होता था, मानो शहर सज रहा हो। ।

बढ़ते यातायात और बढ़ते वाहनों के कारण रास्ते एकांगी होते चले गए और इंसान व्यस्त। दुकानों की साज सज्जा बढ़ती गई, साख घटती गई। पुराने व्यवसाय खत्म से हो गए, हर मार्केट नावेल्टी मार्केट में तब्दील हो गया। रेडियो, टीवी, और फ्रिज की दुकानें कम होती गई, हर तरफ मोबाइल ही मोबाइल। बाबूजी तुम कौन सा खरीदोगे, सैमसंग, appo या vivo ?

आज का आदमी न सड़क का रहा न फुटपाथ का, वह बस भीड़ बनकर रह गया है। शहर में विकास भी हो रहा है और सौंदर्यीकरण भी। अतिक्रमण भी हट रहे हैं और स्मार्ट सिटी की अवधारणा मूर्त रूप ले रही है। और इधर आदमी है जो आदमी नहीं मशीन बनता चला जा रहा है। उसे अब फुटपाथ पर चलना नहीं, मेट्रो में दौड़ना है।

वैसे भी सड़क पर पैदल चलना तो अब घट गया है और दुर्घटनाएं बढ़ती जा रही हैं। सुरक्षित रहने के लिए ऑनलाइन शॉपिंग हो रही है, Zomato पहले महाकाल की थाली भिजवाता है, फिर माफी मांगता है। अब हमारे पांव नहीं चलते, सिर्फ रास्ता चलता है। ।

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

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≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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