हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ ≈ मॉरिशस से ≈ गद्य क्षणिका# ८६ – बेटे की माँ… – ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

श्री रामदेव धुरंधर

(ई-अभिव्यक्ति में मॉरीशस के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री रामदेव धुरंधर जी का हार्दिक स्वागत। आपकी रचनाओं में गिरमिटया बन कर गए भारतीय श्रमिकों की बदलती पीढ़ी और उनकी पीड़ा का जीवंत चित्रण होता हैं। आपकी कुछ चर्चित रचनाएँ – उपन्यास – चेहरों का आदमी, छोटी मछली बड़ी मछली, पूछो इस माटी से, बनते बिगड़ते रिश्ते, पथरीला सोना। कहानी संग्रह – विष-मंथन, जन्म की एक भूल, व्यंग्य संग्रह – कलजुगी धरम, चेहरों के झमेले, पापी स्वर्ग, बंदे आगे भी देख, लघुकथा संग्रह – चेहरे मेरे तुम्हारे, यात्रा साथ-साथ, एक धरती एक आकाश, आते-जाते लोग। आपको हिंदी सेवा के लिए सातवें विश्व हिंदी सम्मेलन सूरीनाम (2003) में सम्मानित किया गया। इसके अलावा आपको विश्व भाषा हिंदी सम्मान (विश्व हिंदी सचिवालय, 2013), साहित्य शिरोमणि सम्मान (मॉरिशस भारत अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी 2015), हिंदी विदेश प्रसार सम्मान (उ.प. हिंदी संस्थान लखनऊ, 2015), श्रीलाल शुक्ल इफको साहित्य सम्मान (जनवरी 2017) सहित कई सम्मान व पुरस्कार मिले हैं। हम श्री रामदेव  जी के चुनिन्दा साहित्य को ई अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों से समय समय पर साझा करने का प्रयास करेंगे।

आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय गद्य क्षणिका “– बेटे की माँ…” ।)

~ मॉरिशस से ~

☆ कथा कहानी  ☆ गद्य क्षणिका # ८५ — बेटे की माँ — ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

बिगड़ैल बेटा बारह साल बाद जेल की सज़ा काट कर लौटा। वह जर्जर हो गया था। झुकी टूटी माँ उसी के लिए जी रही थी। माँ ने बेटे के कैद जाने से पहले दिपाली नाम की दुल्हन पसंद की थी। दिपाली की तो कब के शादी हो गई। पर माँ तो उसी सपने में ठहर गई थी। विक्षिप्त सी माँ बड़ी मायूसी से अपने बेटे से बोली, “अब तुम्हारी शादी दिपाली से करवा दूँ। नाती नातिन मेरी गोद में खेलेंगे।”

 © श्री रामदेव धुरंधर

03 – 12 – 2025

संपर्क : रायल रोड, कारोलीन बेल एर, रिविएर सेचे, मोरिशस फोन : +230 5753 7057   ईमेल : rdhoorundhur@gmail.com

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा – “चाय पानी” ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

श्री कमलेश भारतीय 

(जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब)  शिक्षा-  एम ए हिंदी , बी एड , प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । यादों की धरोहर हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह -एक संवाददाता की डायरी को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से  कथा संग्रह-महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता)

☆ लघुकथा – “चाय पानी ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

– सर…

– कहो। क्या बात है?

– सर, वो अधिकारी हरिजन छात्रवृत्ति पास करने के प्रति छात्र पैसे मांग रहा है।

– कोई जरूरत नहीं इसकी।

– फिर बिल पास नहीं होगा, सर!

– न हो। बोलो जो आब्जेक्शन‌ लगाना हो लगा दो!

वह मेरा संदेश लेकर ऑफिस के अंदर‌ चला गया! कुछ पल बाद वापस आया।

– सर, वे कहते हैं कि चलो, प्रति छात्र न सही लेकिन एक अच्छी चाय पानी लायक पैसे तो दे दो!

– बोलो! जल्द प्रबंध करके बताते हैं!

वह संदेश दे आया, तब मैंने उसे अपनी बाइक के पीछे बिठाया और जान पहचान वाले मित्र अधिकारी के पास पहुंच गया!

अधिकारी ने स्वागत् किया और चाय पानी पूछा तो मैंने कहा कि चाय पानी तो पीयेंगे लेकिन पहले अपने राजस्व अधिकारी को भी बुला लीजिये।

– क्यों?

– क्योंकि उन्होंने मुझसे चाय पानी की फरमाइश की है। सोचा, जब आप, पिलायेंगे तब उन्हें भी पिला दूंगा! मेरे पास इतने पैसे कहां कि हरिजन छात्रों के पैसे काट कर अधिकारी को चाय पिला सकूं?

वे मित्र अधिकारी बहुत हंसे और सारा माजरा समझ गये। तुरंत उस राजस्व अधिकारी को फोन कर बुला लिया!

वह मुझे तो पहचानता नहीं था लेकिन क्लर्क को देखकर कुछ चौंका!

– हां भई, ये प्रिंसिपल महोदय चाय पानी पिलाने मेरे पास आ गये हैं! बोलो चाय मंगवा लूं?

राजस्व अधिकारी हाथ जोड़कर खड़ा हो गया- नहीं सर! बिना चाय के ही ठीक है!

– फिर इनको ऑफिस जाकर चाय पानी पिलाओ और इनके बिल पास कर दे दो।

उस अधिकारी को काटो तो खून नहीं! सिर झुकाये बाहर निकल गये!

© श्री कमलेश भारतीय

पूर्व उपाध्यक्ष हरियाणा ग्रंथ अकादमी

संपर्क :   1034-बी, अर्बन एस्टेट-।।, हिसार-125005 (हरियाणा) मो. 94160-47075

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा # ९३ – अदृश्य तमाचा… ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆

श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा –  गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी,  संस्मरण,  आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – अदृश्य तमाचा।)

☆ लघुकथा # ९३ – अदृश्य तमाचा श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

अमर ऑफिस जाने के लिए तैयार हुआ।

स्वाति तुम मेरे लिए पूरी सब्जी बनाई है नाश्ता क्या बना रही हो?

स्वाति ने कहा – पूरी सब्जी नाश्ते में कर लेना और वही टिफिन में लेते जाना क्योंकि आज मेरे दांत में बहुत दर्द है।

स्वाति तुम्हारे रोज-रोज के नाटक से मैं थक गया हूं।

स्वाति की आंखों से आंसू निकलते रहे और उसने नाश्ते में पोहा बनाया।

पति के ऑफिस जाते ही वह उदास होकर टीवी देखने लग गई, मन में यह सोचने लगी चलो थोड़ा मन बहल जाएगा, तभी अचानक 1:00 बजे के करीब दरवाजे पर आहट होती है, वह दरवाजा खोलती है और बोलती है – अरे! अमर आप इतनी जल्दी घर आ गए।

अमर ने कहा कि – घर आने के लिए भी तुम्हारी इजाज़त लेनी होगी।

स्वाति ने कहा- नहीं क्या हुआ?

अमर मेरे पेट में बहुत जोर से दर्द हो रहा है।

– गैस बन गई है, इंजेक्शन लगवा लिया, दवा ले लिया है थोड़ी देर आराम करूंगा तो ठीक हो जाएगा।

अचानक 4:00 बजे उसकी तबीयत ठीक लगती है और वह कहता है – स्वामी मुझे कुछ खाने को दे दो।

उसने कहा – मैंने अपने लिए खिचड़ी बनाई है आपको दूं क्या?

हां दे दो तुम बहुत अच्छी हो धन्यवाद अब तुम्हारे दांत का दर्द कैसा है चलो मैं डॉक्टर को दिखा देता हूं।

स्वाति की आंखों से आंसू निकलने लगते हैं।

और उसने कहा कि आपकी तबीयत ठीक नहीं थी इसलिए मैं रुक गई।

मैंने अपना बैक पैक कर लिया है अब मैं मम्मी के घर जा रही हूं। अपने घर रहकर फिर आऊंगी। आप अपना ध्यान रखना आपके उठने का इंतजार कर रही थी।

अमर उसे देखता रहता है उसे रोकने की कोशिश करता है पर वह एक बात नहीं सुनती और तुरंत चली जाती है। उसे ऐसा एहसास होता है जैसे उसे कोई अदृश्य तमाचा लगा हो ।

© श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

जबलपुर, मध्य प्रदेश मो. 7000072079

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २४७ – ममता का स्पर्श ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ ☆

श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है सामाजिक विमर्श पर आधारित विचारणीय लघुकथा “ममता का स्पर्श”।) 

☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २४७ ☆

🌻लघु कथा🌻 🔥ममता का स्पर्श 🔥

यौवन की दहलीज से बढते सौरभ को अब मम्मी पापा की बातें खटकने लगी थी। कुछ मत करो, मै सब संभाल लूँगा, आप टेन्शन मत लो—

आज के बे सिर पैर के रीति रिवाज वाले विवाह आयोजन, दोस्तों की मस्ती, नतीजा शारीरिक कष्ट, अत्यधिक थकान, – – दिमाग को शांत करने के लिए दवाईयाँ इनजेक्शन देकर डा सख्त आराम करने की सलाह देकर चला गया।

दिन भर बेचैनी, काँपते हाथों से मम्मी शाम को आरती वंदन करते विश्वास की पराकाष्ठा मंदिर से थोड़ी सी भभूती लेकर, नमक राई से बेटे की नजर उतारी।

सिर पर हाथ फेरते बोली, अब थोड़ा आराम कर ले। गहरी नींद का आगोश। हाथ पकडे ममता का स्पर्श।

पापा ने धीरे से कंधे पर हाथ रखते कहा – – चिंता न करो। सुबह तक चंगा हो जायेगा। बहुत दिनों से अपने मन की कर रहा था। आज मन से माँ की कर गया। बेटे के आँखों से अश्रु धीरे धीरे गिरने लगे।

© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ परिहार जी का साहित्यिक संसार # ३१३ ☆ कथा कहानी – ख़ुशहाली ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆

डॉ कुंदन सिंह परिहार

(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय  डॉ  कुन्दन सिंह परिहार जी  का साहित्य विशेषकर व्यंग्य  एवं  लघुकथाएं  ई-अभिव्यक्ति  के माध्यम से काफी  पढ़ी  एवं  सराही जाती रही हैं।   हम  प्रति रविवार  उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते  रहते हैं।  डॉ कुंदन सिंह परिहार जी  की रचनाओं के पात्र  हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं।  उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल  की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपका एक अप्रतिम कथा – ख़ुशहाली ‘। इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार  # ३१३ ☆

☆ कथा-कहानी ☆ ख़ुशहाली 

श्री और श्रीमती कौशल सवेरे उठे तो उन्होंने एक दूसरे को बड़े प्यार से चूमा। उस दिन उनकी शादी की पच्चीसवीं सालगिरह थी। श्रीमती कौशल की इच्छा के अनुसार पच्चीसवीं सालगिरह कुछ ख़ास इंतज़ाम के साथ मनायी जानी थी।

श्रीमती कौशल ने शाम की पार्टी में आमंत्रित किये जाने वाले सब लोगों के नाम कार्डों पर लिखे, फिर पति से पूछा, ‘कार्ड बांटने के लिए बंटी को भेज दें? कार लेकर चला जाएगा।’

श्री कौशल ने असहमति में सिर हिलाया, कहा, ‘अभी घंटे भर में धूप तेज़ हो जाएगी। बंटी वैसे ही नाज़ुक मिजाज़ है। बिशन को भेजो। स्कूटर से दो-तीन घंटे में बांट कर आ जाएगा।’

बिशन को बुलाकर कार्ड सौंप दिये गये। उसने पूरी हिफाज़त से कार्ड एक थैले में रखे और स्कूटर लेकर निकल गया। कार्ड बांटने वाले काम की चिन्ता खत्म हुई।

थोड़ी देर में बिजली वाले के दो आदमी आकर बंगले को बल्बों से सजाने लगे। दोनों नयी उम्र के थे। दोनों की पतलूनें मोहरी पर छिनी हुई और खस्ताहाल थीं। कुछ ऐसा ही हाल कमीज़ों का था। उन्होंने बंगले की दीवार पर सीढ़ी टिकायी और  बंगले को झालरों से सजाने के काम में मशगूल हो गये। धूप के बढ़ने के साथ उन्हें काम करने में दिक्कत हो रही थी, लेकिन उसके बावजूद वे काम तेज़ रफ़्तार से कर रहे थे।

थोड़ी ही देर में उनका मालिक स्कूटर पर वहां पहुंच गया। वह ठिंगना, तोंदियल आदमी था। उसने स्कूटर पर बैठे-बैठे ही छोकरों के काम पर निगाह डाली। फिर बोला, ‘ज़रा तेज हाथ चलाओ। टाइम से काम पूरा नहीं हुआ तो तुम्हें भी जूते पड़ेंगे और मुझे भी।’

फिर उसने स्कूटर छाया में खड़ा कर दिया और उसी पर बैठकर रूमाल से पसीना पोंछने लगा।

शाम होने से पहले बंगले के दो नौकरों ने सामने की ज़मीन को सींचना शुरू कर दिया। ज़मीन से सोंधी गंध उठने लगी और जल्दी ही आसपास ठंडक महसूस होने लगी। शाम होते ही बंगले पर सजाये लाल-हरे बल्ब जल उठेऔर बंगला बेहद खूबसूरत दिखने लगा। फिटिंग करने वाले दोनों लड़के एक तरफ बैठे बल्बों पर नज़र डाल रहे थे।

कुछ देर बाद गुबरैलों की तरह रेंगती हुई कारें आने लगीं। जल्दी ही बंगले का सामने वाला हिस्सा कारों से भर गया। मेहमानों के बैठने का इंतज़ाम लॉन में ही था। बहुत से लोग कुर्सियों पर बैठ गये और कुछ लोग इधर-उधर चहलकदमी करते रहे। कुछ लोग बंगले में लगे खूबसूरत फूलों को देखने लगे।

श्रीमती अस्थाना श्रीमती कौशल से बोलीं, ‘आपके फूल बहुत खूबसूरत हैं। खूब ‘टेस्ट’ है आपका।’

श्रीमती कौशल खुश होकर बोलीं, ‘थैंक्यू जी। दरअसल यह सब हमारे माली का काम है। हमें तो बगीचे की देखभाल की फुरसत ही कहां मिलती है? सवेरे शाम घूम लेते हैं यही बहुत है।’

माली का ज़िक्र करते समय उन्होंने एक मरियल चुटियाधारी आदमी की ओर इशारा किया जो धारीदार पायजामा पहने चुपचाप एक तरफ खड़ा था।

श्रीमती अस्थाना बोलीं, ‘फिर भी, आपको शौक है तभी तो माली करता है।’

श्रीमती कौशल ने कहा, ‘हां जी, थैंक्यू जी।’

लॉन पर ही ‘ड्रिंक्स’ पेश किये गये। जो शराब नहीं पीते थे उनके लिए ‘सॉफ्ट ड्रिंक्स’ थे। चार-पांच नौकर इस काम में मुस्तैदी से लगे रहे।

श्रीमती सिंह ने टिप्पणी की, ‘आपके नौकर बहुत ‘ट्रेन्ड’ हैं। बहुत कायदे से पेश आते हैं।’

श्रीमती कौशल गद्गद होकर बोलीं, ‘थैंक्यू जी।’

थोड़ी देर बाद श्रीमती कौशल ने सबसे डिनर के लिए अन्दर चलने का अनुरोध किया। सब लोग भोजन से लदी मेज़ो के इर्द-गिर्द इकट्ठे हो गये।

तभी श्रीमती कौशल की छः वर्षीय पुत्री सीढ़ियों से उतरी और ‘ममी! ममी!’ पुकारती हुई उनसे लिपट गयी। श्रीमती कौशल परेशान हो गयीं। बोलीं, ‘ओ डियर! तुम नीचे क्यों आ गयीं? तुम्हारी तबियत अभी ठीक नहीं है।’

फिर उन्होंने आवाज़ दी, ‘जानकी! जानकी!’ सीढ़ियों पर से एक अधेड़ औरत, सफेद साड़ी पहने, नंगे पांव तेज़ी से आयी। श्रीमती कौशल उसे झिड़ककर बोलीं, ‘बेबी को रूम में रखो। उसकी तबियत ठीक नहीं है।’

जानकी बच्ची को लेकर चली गयी।

मेहमान भोजन की तारीफ कर रहे थे। श्रीमती कौशल ने सफाई दी, ‘इसके लिए मेरे कुक को थैंक्स देना चाहिए। मेरा कुक बहुत होशियार है।’

श्रीमती सक्सेना बोलीं, ‘ओह, मिसेज़ कौशल, आप बहुत ‘मॉडेस्ट’ हैं। आप सब चीजों का ‘क्रेडिट’ अपने नौकरों को दे देती हैं। असली ‘क्रेडिट’ तो घर की मालकिन का ही होता है।’

श्रीमती कौशल बोलीं, ‘थैंक्यू जी।’

भोजन के बाद सब लोग फिर लॉन में आ गये और गपशप होने लगी। तभी मुखर्जी साहब ने अपनी कुर्सी के पास उल्टी कर दी। सब की नाकें सिकुड़ गयीं। महिलाओं ने नाक पर रूमाल रख लिये।

श्रीमती मुखर्जी का चेहरा उतर गया। बोलीं, ‘मैं इन्हें इतना समझाती हूं कि ‘लिमिट’ के भीतर ‘ड्रिंक’ करो, लेकिन मानते ही नहीं।’

श्रीमती कौशल ने अपने चेहरे पर आया चिड़चिड़ाहट का भाव दबा लिया। हंसकर बोलीं, ‘कोई बात नहीं जी। हो जाता है।’

फिर उन्होंने आवाज़ लगायी, ‘बिशन!’

बिशन के आने पर उन्होंने कहा, ‘यहां जल्दी से सफाई करके अच्छी तरह धो दो।’

रात के दस बज गये थे। मेहमान विदा लेने लगे। कारें अपनी अपनी बत्तियां जलाकर सरकने लगीं।

श्री वर्मा की कार बार-बार कोशिश करने के बाद भी स्टार्ट नहीं हो रही थी। थोड़ी देर बाद वे कार से बाहर निकल कर पसीना पोंछने लगे। श्रीमती कौशल बोलीं, ‘रुकिए, मैं अपने ड्राइवर को बुलाती हूं।’

उन्होंने आवाज़ दी, ‘अब्दुल!’ तुरन्त खाकी कमीज़-पैंट पहने एक सांवला आदमी उनके सामने हाज़िर हो गया। अब्दुल ने दस पन्द्रह मिनट के परिश्रम से कार स्टार्ट करके श्री वर्मा को सौंप दी।

श्री और श्रीमती सूर्यवंशी कुछ परेशान से श्रीमती कौशल के पास आये। श्रीमती सूर्यवंशी बोलीं, ‘यहां टैक्सी मिल जाएगी? हम टैक्सी से आये थे। हमारी कार गैरेज में है।’

श्रीमती कौशल बोलीं, ‘कैसी बातें करती हैं आप? हम आपको अपनी कार से भिजवा देते हैं।’

उन्होंने फिर अब्दुल को बुलाया, कहा, ‘अब्दुल! साहब को शास्त्री रोड पर छोड़कर आओ।’ और अब्दुल कार में सूर्यवंशी दंपति को लेकर निकल गया।

धीरे-धीरे सब मेहमान विदा हो गये। श्रीमती कौशल थक गयी थीं— कुछ मेहमाननवाज़ी के कारण और कुछ औपचारिकता का मुखौटा पहने पहने। वे पति के साथ अन्दर गयीं और ड्राइंग रूम में ही एक आराम कुर्सी पर फैल कर ऊंघने लगीं। श्री कौशल दूसरी आराम कुर्सी में लेट गये।

आराम कुर्सियों में श्री और श्रीमती कौशल ऊंघ रहे थे। उधर बिशन खाने की मेज़ों की सफाई कर रहा था। ऊपर कमरे में जानकी श्रीमती कौशल की सोयी हुई बच्ची की बगल में बैठी थी। नींद से कई बार उसका सिर लटक जाता था, लेकिन वह फिर आंखें खोल कर देखने लगती थी। रसोईघर में रसोइया और बंगले के दूसरे नौकर उकड़ूं बैठे खाना खा रहे थे। बिजली वाले के दोनों नौकर बाहर अपनी झालरें समेट रहे थे। उधर अब्दुल सूर्यवंशी दंपति को छोड़कर सड़क की छाती पर गाड़ी दौड़ाता हुआ वापस लौट रहा था।

© डॉ कुंदन सिंह परिहार

जबलपुर, मध्य प्रदेश

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ ≈ मॉरिशस से ≈ गद्य क्षणिका# ८५ – जीवन के रास्ते… – ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

श्री रामदेव धुरंधर

(ई-अभिव्यक्ति में मॉरीशस के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री रामदेव धुरंधर जी का हार्दिक स्वागत। आपकी रचनाओं में गिरमिटया बन कर गए भारतीय श्रमिकों की बदलती पीढ़ी और उनकी पीड़ा का जीवंत चित्रण होता हैं। आपकी कुछ चर्चित रचनाएँ – उपन्यास – चेहरों का आदमी, छोटी मछली बड़ी मछली, पूछो इस माटी से, बनते बिगड़ते रिश्ते, पथरीला सोना। कहानी संग्रह – विष-मंथन, जन्म की एक भूल, व्यंग्य संग्रह – कलजुगी धरम, चेहरों के झमेले, पापी स्वर्ग, बंदे आगे भी देख, लघुकथा संग्रह – चेहरे मेरे तुम्हारे, यात्रा साथ-साथ, एक धरती एक आकाश, आते-जाते लोग। आपको हिंदी सेवा के लिए सातवें विश्व हिंदी सम्मेलन सूरीनाम (2003) में सम्मानित किया गया। इसके अलावा आपको विश्व भाषा हिंदी सम्मान (विश्व हिंदी सचिवालय, 2013), साहित्य शिरोमणि सम्मान (मॉरिशस भारत अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी 2015), हिंदी विदेश प्रसार सम्मान (उ.प. हिंदी संस्थान लखनऊ, 2015), श्रीलाल शुक्ल इफको साहित्य सम्मान (जनवरी 2017) सहित कई सम्मान व पुरस्कार मिले हैं। हम श्री रामदेव  जी के चुनिन्दा साहित्य को ई अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों से समय समय पर साझा करने का प्रयास करेंगे।

आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय गद्य क्षणिका “– जीवन के रास्ते…” ।

~ मॉरिशस से ~

☆ कथा कहानी  ☆ गद्य क्षणिका # ८५ —जीवन के रास्ते — ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

मुसाफिर बहुत ही विकरालता से भटका हुआ था। उसके सामने ऊँचा पर्वत था और पीछे भयानक सी चौड़ी नदी थी। उसकी समझ में अब तो आए वह पर्वत और नदी के बीच कैसे आया? वह आकंठ कंपित हो पड़ता कि सहसा उसकी नींद टूटी। सुबह हो चुकी थी। उसने देखा सामने का पर्वत झुक गया था। पर्वत ने उसे अपनी दिनचर्या में समर्पित होने के लिए आगे रास्ता दिया था। पीछे चाहे मौतनुमा नदी थी, लेकिन उसका लक्ष्य तो आगे था।

© श्री रामदेव धुरंधर
26 / 11 / 2025

संपर्क : रायल रोड, कारोलीन बेल एर, रिविएर सेचे, मोरिशस फोन : +230 5753 7057   ईमेल : rdhoorundhur@gmail.com

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रेयस साहित्य # ३३ – लघुकथा – निक्षय मित्र एवं क्षय मुक्त ग्राम पंचायत (क्षय मुक्त भारत की संकल्पना) ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆

श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्रेयस साहित्य # ३३ ☆

☆ लघुकथा ☆ ~ निक्षय मित्र एवं क्षय मुक्त ग्राम पंचायत (क्षय मुक्त भारत की संकल्पना) ~ ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆ 

आज सुबह-सुबह सेतु पटमंगरा के ग्राम प्रधान श्री दिनेश लाल के घर पहुंच गया था।

कहो सेतु कैसे आना हुआ ?

अरे प्रधान जी.. आपसे एक बात करनी थी। … सेतु ने कहा।

क्या है, ? बताओ क्या कहना चाहते हैं ? प्रधान जी ने पूछा।

प्रधान जी… आप तो जानत हैं कि टीबी एक संक्रामक बीमारी है। इससे मुक्ति का बड़ा अभियान चला है।

अरे सेतु..हमने तो सुना है कि यह दवाई से बिल्कुल ठीक हो जाती है… इसके अलावा भी कोई दुसरा उपाय है क्या, ? दिनेश लाल प्रधान ने पूछा।

प्रधान जी… यह बीमारी ठीक तो होगी इलाज से ही लेकिन एक बात आप पहले बताइये कि ये बीमारी किसको पहले होती है? सेतु ने पूछा।

प्रधान जी ने अपना दिमाग दिमाग दूर तक दौडाया। उन्हें अपने गांव के टीबी रोगी मंगरु, बसंती, ननकू की याद आई।

सेतु अभी भी प्रधान जी के घर पर ही बैठा था।

किस सोच में डूब गये प्रधान जी ?

सेतु..बाबू तू ऐसा सवाल हमारे सामने रख दिए हो कि हमारे दिमाग़ में बहुत बड़ा टेंशन पैदा हो गया है।

हम सोचत है किये टीबी की बीमारी, कुलेश्वर भैया, रघुनंदन काका, और दूधनाथ मास्टर के घर के लोगो को क्यों नहीं होता है। आखिर ये बीमारी मंगरु, बसंती, ननकू जैसे लोगो के घर में क्यों आता है?

सेतु ने प्रधान जी के मन की बात समझ ली थी। अब सही वक्त आ गया था जब सेतु को हथौड़े की चोट गरम लोहे पर करना था।

क्षय मुक्त भारत अभियान से भी वह जुड़ चुका था। टीबी के विषय में एक-एक जानकारी उसके दिमाग में रटी पड़ी थी।

क्षय उन्मूलक अभियान के हर -एक हिस्से का वह साथी बन चुका था।

अब सेतु ने जो बात दिनेश लाल प्रधान से कहीं वह बात प्रधान के दिमाग में जम गई।

प्रधान जी.. पहली बात की है बीमारी किसी को भी हो सकती है। चाहे वह किसी भी तरह का व्यक्ति हो अमीर हो या गरीब हो। बीमारी ऐसी है कि जहां भी खान-पान में कमी होती है, जहां पौष्टिक आहार नहीं मिलता है, ऐसे लोगों में रोग से लड़ने की क्षमता कम हो जाती है और उसे टीबी की बीमारी पकड़ने का भय पहले होता है।

अरे सेतु.. सही बताएं हो, यही कारण है कि पश्चिम टोला के मंगरु बसंती ननकू को टीबी की बीमारी पकड़ी है।

इन तीनों जने की आर्थिक स्थिति थोड़ी ठीक नही है।

काम धाम की कमी, ऊपर से बीमारी। और बीमारी में कोई काम धाम कैसे कर सकता है। इन सारी समस्यायों के जड़ में खान पान की कमी भी एक है। ऐसे बहुत सारे ऐसे लोग हैं, जिनको कई अन्य जटिल बीमारियां है, जैसे शुगर, बीपी, कैंसर, एच आई वी आदि उनके भीतर भी रोग लड़ने की क्षमता कम हो जाती है। उनके भी भीतर भी रोग से लड़ने की क्षमता कम हो जाती है, और टीबी की बीमारी हो जाती है।

सेतु यह बताते बताते रुक गया। और दुबारा कुछ बात ऐसा बोला कि वहां बैठे कई लोग उसे घूर के देखने लगे।

सेतु ने कहा प्रधान जी, जो लोग नसे का सेवन करते है, बीड़ी, गांजा, शराब आदि नसे की चीज खाते पीते हैं ऐसे लोगों में भी टीबी की बीमारी होने की सम्भावना बढ़ जाती है।

अरे प्रधान जी… आप गांव के मुखिया हौ। आपका एक नई बात बताना चाहता हूँ.. सुनिए .सेतु ने कहा।

अब सेतु ने दिनेश लाल प्रधान से विस्तार में बताना शुरू किया।

सरकार ने एक अभियान छेड़ रखा है। जिसको क्षय मुक्त भारत अभियान कहते हैं। इसमें जांच इलाज के अलावा हर एक क्षय रोगी को इलाज के दौरान ₹1000 की सहायता राशि मिलती है।

अरे सेतु यह तो ₹500 मिलता था कब से यह ₹1000 हो गया। … दिनेश लाल प्रधान ने पूछा।

आप का जान पाएंगे …प्रधान जी ! नन्हकऊ से पूछिएगा न। सेतु ने बड़े ही दम के साथ कहा।

अच्छा तो सरकार ने 500 से ₹1000 कर दिया। बहुत बड़ी बात है भाई..यह तो बहुत बड़ी बात है। दिनेश लाल प्रधान के चेहरे पर आत्मसंतुष्टि और सरकार के प्रति कृतज्ञता का भाव झलक रहा था।

सेतु अपनी बात को यहीं समाप्त करने वाला नहीं था। उसे तो अभी बहुत कुछ और बताना था।

प्रधान जी.. इतनी ही बात नहीं है। जिसके घर में टीबी के मरीज है उनके संपर्क में रहने वालों को एक्स रे जांच के बाद टीपीटी भी दवाई दी जा रही है, ताकि टीबी की बीमारी उनके घर वालों में न जाए।

अब आपको, आपके काम की बात बताना चाहता हूँ..प्रधान जी ! सेतु ने कहा। ।

जो लोग टीबी के रोगियों को गोद लेंगे और उनको इलाज तक खाने के लिए पौष्टिक आहार की टोकरी देंगे। उनको सरकार सम्मानित करेंगी।

प्रधान भैया !! जिसके पास पैसा रूपया है। धन दौलत भरा पड़ा है। साथ ही साथ गरीब मजबूर लोगों को कुछ करने की इच्छा रखते है। ऐसे लोगों को आगे बढ़कर हमारे गरीब टीबी रोगियों को गोद लेना चाहिए

गोद लेने का का मतलब हुआ.. सेतु?… प्रधान जी ने पूछा

अरे प्रधान जी ! दुनिया भर को आप बताते हैं और आप ये बात पूछ रहे हैं?

गोद लेने का मतलब हुआ कि उस मरीज को प्रति माह पौष्टिक आहार की किट ( टोकरी ) देना और तब तक देना जब तक की उसका इलाज पूरा न हो जाए।

जानते हैं प्रधान जी जब टीबी रोगी को पौष्टिक आहर की किट मिलेगी तो, रोग से लड़ने की क्षमता बढ़ जायेगी और उसका रोग जल्दी से भागेगा।

सेतु ने एक नई बात बात प्रधान जी को बता दी।

अरे सेतु..तो हमारे गांव के जो तीन रोगी मगरु, नन्हकउ और बसंती रहे, उनको भी किसी ने पौष्टिक किट दिया था क्या, ?

सेतु जोर से हंस पड़ा…

अरे प्रधान जी.. आप को पता नहीं है क्या . इन लोगों को भी किट दिया गया है।

देवनाथ सिंह मास्टर साहब, .. जो मिडिल स्कूल के हेडमास्टर जी है, उन्होंने इन तीनों को गोद लिया था। पूरे इलाज तक वे बसंती और मंगरु को पौष्टिक पोषण किट देते रहे हैं अब तक भी ननकू को देरहे थे।

दिनेश लाल प्रधान, कुछ देर के लिए मन ही मन सोचते रहे …

भाई.. ई सेतु भी गजब का इंसान है ..

खुद का खुद टीबी से बीमार रहा। इसकी बहुरिया सुघरी टीबी के मरीज थी, फिर भी उससे शादी किया।

ठीक होने के बाद लगा पड़ा है, टीबी रोगी की सेवा में। यह हमरे गांव के मणि है। किसी देवदूत से कम नही है। जो काम हम लोगो को करना चाहिए, यह वह सब कर रहा है।

हम इसके लिए जरूर कुछ ना कुछ जरूर करेंगे … दिनेश लाल प्रधान ने मन ही मन ठान लिया।

उन्होंने अपने गांव के ही नहीं, बल्कि अपने आस पास के गांव के भी गरीब मरीज को गोद लेने का मन बना लिया। सेतु के कहने पर उन्होंने दूसरे गांव के करीब 35 क्षय रोगियों को गोद ले लिया था।

समय बीतते देर नहीं लगी। गांव के तीनों रोगी ठीक हो चुके थे। मंगरु और बसंती तो पहले ही ठीक हो गए।

नन्हकू की रिपोर्ट लेकर आज सेतु आया था। रिपोर्ट के साथ ही प्रधान जी के घर पहुंचा था। प्रधान जी के दरवाजे पहुंचते ही बोला… प्रधान जी ! आज आपको मिठाई खिलाना पड़ेगा।

किस बात की मिठाई.. सेतु ? प्रधान जी ने पूछा।

अरेे आपका नन्हकू की भी रिपोर्ट आ गई है। वह भी ठीक हो गया है।

अब क्या..एक जश्न जैसा माहौल प्रधान जी के दरवाजे पर बन गया।

प्रधान जी के दरवाजे पर बैठे लोगों के बीच खुशी की लहर दौड़ गयी।

घर के आगे दुवारे तीन चार खटिया, दो लकड़ी का बेंच, दो चौकी – तखत पड़ी थी

प्रधान जी कोई अलग नही बैठे थे। वे भी एक चारपाई के गोड़ तारी की ओर बैठे थे।

कवलेसर ने कहा .. अरे प्रधान जी, गांव के मुखिया है, सिरहाने बैठिये, ..सिरहाने।

दिनेश बोले.. अरे कौलेसर भईया, .. प्रधान होने से क्या हुआ। हम अपनी मर्यादा भूल के बड़कउ के सिरहाने बैठेंगे क्या। हमारा यह संस्कार नही है।

सामने चारपाई पर बैठे जितने भी लोग थे, वे सभी प्रधान जी की मानहि मन भूरी भूरी प्रशंसा कर रहे थे।

अचानक दूर से एक सरकारी गाडी आती हुई दिखाई दी

गाड़ी रुकी तो उसमें ड्राइवर के अलावा दो लोग उतरे।

अरे प्रधान जी… भावेश भैया आ गये.. सेतु ने कहा

देखो आज कौन नई खबर लेकर आए हैं? भावेश क्षय उन्मूलन कार्यकर्ता था। उससे दिनेश लाल प्रधान और सेतु दोनों परिचित थे। लेकिन दूसरे व्यक्ति को दिनेश लाल प्रधान नही पहचाते थे

सेतु ने उनका परिचय कराते हुए कहा ..

प्रधान जी ये श्री आनन्द कृष्ण जी है, स्टेट से हमारे जनपद में विजिट पर आये थे। ये आपके लिए कोई खास खबर लेकर आए हैं।

श्री आनन्द कृष्ण जी के बैठने के लिए प्रधान जी खुद कुर्सी लेकर आए।

आईये बैठिये..साहब। हमारा सौभाग्य है आप हमारे दरवाजे पर आए है।

प्रधान जी ने बबलू से चाय पानी बनाने के लिए बोला, तो बबलू चाय पानी लाने घर में चला गया।

और बताइए सर, क्या नई बात है… दिनेश लाल जी ने श्री आनन्द कृष्ण जी से पूछा

जी प्रधान जी….आपको भावेश ही पूरी बात बताएंगे।

अरे प्रधान जी आपको क्या बताना है आप तो इस इलाके के प्रतिष्ठित लोगों में है।

हमें आपको दो नई खबरें देनी है शायद आप इन दोनों खबरों के विषय में आप नहीं जान रहे होंगे।

दिनेश लाल प्रधान, हक्का-बक्का थे, आखिर कौन सी दो खास खबरें है जो उन्हें पता नहीं था।

लेकिन भावेश ने सिर्फ एक एक बात बतायी, वह यह कि जो हमारे जो तीन क्षय रोगी थे, वे अब सभी तीनों ठीक हो गये है। दो की तो रिपोर्ट पहले ही आ गई थी। आज सेतु नन्हकू की भी रिपोर्ट लेकर आए हैं। वह भी ठीक हो गए हैं।

अब अपने गांव में कोई भी टीबी का रोगी नहीं है

अब इस खुशी में आप सबका मुंह मीठा कराइये।

इसी बीच स्टेट से आए हुए श्री आनन्द कृष्ण जी बोल पड़े। इतने से काम नहीं चलेगा..प्रधान जी सब लोग आपसे बड़ी पार्टी लेंगे। अब आप दूसरी खुशी की बात तो सुनिए।

सब लोग श्री आनन्द कृष्ण जी की बात को ध्यान से सुन रहे थे

प्रधान जी आपने दूसरे गांव के 35 मरीजों को गोद लिया है.. याद है ना.., इनमे से भी 10-12 मरीज ठीक हो गये हैं। आपने इतने सारे मरीजों को गोद लिया है, इस संदर्भ में आपको इसी महीने 24 मार्च को लखनऊ आना है। विश्व क्षय रोग दिवस के अवसर पर माननीय मुख्यमंत्री जी आप सहित कुल पच्चास निक्षय मित्रों को सम्मान्नित करेंगे।

इस खबर को सुनकर प्रधान जी की आंखें भर आयीं। आठ बरस के अपने प्रधानी के कार्यकाल में प्रधान जी को ऐसी खुशखबरी इसके पहले सुनने को नही मिलीं थी। दिनेश लाल प्रधान स्वयं को भाग्यशाली महसूस कर रहे थे कि उन्हें माननीय मुख्यमंत्री जी के हाथो से सम्मान मिलना है।

खुशी से उनकी आंखें गीली हुई तो सेतु ने गमछे से उनकी आँखे पोछ दी। दिनेश लाल… स्वयं को आदर्श गांव पटमंगरा के प्रधान के रूप में गौरवान्वित पा रहे थे।

झउआ भर तुरई की सब्जी, और नारी के भाजी लेकर नन्हकू घर सुबह-सुबह प्रधान जी के घर पहुंचे थे। जबसे उन्होंने अपनी रिपोर्ट निगेटिव आने की खबर सुनी तो उनका मन खुशी से भर गया। ये खबर उनको सेतु से मिली थी। उनको उनकी मेंहरिया ने कहा था कि इस खुशी के मौक़े पर प्रधान जी के घर कुछ साग भाजी पहुंचा आओ।

ननकू भी प्रधान जी के दरवाजे पर मौजूद थे सभी लोग नन्हकू की तरफ ध्यान से देखने लगे।

नन्हकू ने कहा कि भावेस भईया, टीबी अस्पताल वाले डॉक्टर साहब और अपने प्रधान जी इन तीनों का एहसान हम नहीं चुकता सकते। इस खुशी में हम प्रधान जी के लिए थोड़ी बहुत साग भाजी लाए हैं।

इस अद्भुत उपहार को परिभाषित करने के लिए अब कोई शब्द नहीं बचा था।

इधर कई महीनों से स्वास्थ्य विभाग की टीम पटमंगरा गाँव में लगातार आ रही थी। संभावित लक्षण वाले लोगों के सैंपल लिए जा रहे थे। लेकिन आगे क्या होने वाला है यह कोई नहीं जान नही पा रहा था।

भावेश, सेतु और श्री आनन्द कृष्ण जी सभी लोग दरवाजे पर पड़ी बेंत से बुनी लकड़ी की कुर्सियों पर बैठे हुए थे।

श्री आनन्द कृष्ण जी ने जब एक और बात की घोषणा की कि –

भाई लोग एक खुशखबरी और सुनिए –

माननीय प्रधानमंत्री जी ने भारत को क्षय मुक्त करने का संकल्प लिया है।

भीड़ में ही बैठे एक नौजवान ने बीच में टोकते हुए कहा कि –

हमें पता है, जब हमारे गांव क्षय मुक्त होंगे तो जिले क्षय मुक्त होंगे और जब जिले क्षय मुक्त होंगे तो प्रदेश क्षय मुक्त होगा और प्रदेश क्षय मुक्त होगा तो हमारा देश क्षय मुक्त हो जाएगा।

अपने गाँव के नौजवानो के भीतर का यह ज्ञान प्रधान जी सहित पूरी भीड़ को उत्साहित कर रहा था।

आखिरकार श्री आनन्द कृष्ण जी ने दूसरे राज को भी खोलते हुए कहा –

भाई लोग..आप लोगों को जानकर ख़ुशी होंगी कि आप का गांव पटमंगरा क्षय मुक्त गांव घोषित हो चुका है।

 प्रधान जी के द्वार पर बैठे लोंगो में खुशी की लहर दौड़ गई सब ने तालियां बजायीं।

सबकी बधाई ग्राम पंचायत पटमंगरा के प्रधान श्री दिनेश लाल जी के लिए थी।

आगे श्री आनन्द कृष्ण जी जी ने बताया कि अगले 2 अक्टूबर को आपके गांव के प्रधान जी को माननीय जिलाधिकारी महोदय के हाथों गांधी जी की कास्य प्रतिमा देखकर सम्मानित किया जाएगा तालिया के गड़गड़ाहट से पूरा माहौल दुबारा खुशियों से भर उठा।

पटमंगरा क्षय मुक्त गांव घोषित हो चुका था। प्रधान जी अपने स्थान पर खड़े हुए। घर के भीतर से उन्होंने एक उनी शॉल मंगवायी। सब मिलकर सेतु का सम्मान कर रहे थे। सेतु को प्रधान जी ने जब गले लगाया तो इस दृश्य को देखकर सुघरी की आंखें खुली की खुली रह गयी। जिस सेतु को वह भला बुरा कह रही थी, आज उसे अपने सेतु पर गर्व हो रहा था।

♥♥♥♥

© श्री राजेश कुमार सिंह “श्रेयस”

लखनऊ, उप्र, (भारत )

दिनांक 22-02-2025

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कथा-कहानी # १२ – लघुकथा – नवजात… ☆ प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर ☆

डॉ.राजेश ठाकुर

( प्रो डॉ राजेश ठाकुर जी का  मंतव्य उनके ही शब्दों में –पाखण्ड, अंध विश्वास, कुरीति, विद्रूपता, विसंगति, विडंबना, अराजकता, भ्रष्टाचार के खिलाफ़ जन-समुदाय को जागृत करना ही मेरी लेखनी का मूल प्रयोजन है…l” अब आप प्रत्येक शनिवार डॉ राजेश ठाकुर जी की रचनाएँ आत्मसात कर सकते हैं. आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा “नवजात“.)  

? साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कथा कहानी # १२ ?

? लघुकथा – नवजात… ☆ प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर  ? ?

?

कन्या नवजात को कूड़े के ढेर पर या सड़क किनारे की झाड़ियों में फेक देने या छोड़ देने की बढ़ती घटना से द्रवित हो, एक अनाथालय-प्रबंधन ने एक नव प्रयोग कियाl

अनाथ आश्रम के मुख्य द्वार पर एक झूला बाँध दिया गया, वहाँ एक सूचना लगा दी गई कि, “यदि किसी ने बच्चा त्यागने का अमानवीय निर्णय लिया ले ही लिया है, तो उस त्याज्य नवजात को इस झूले पर डाल जाए l”

 ****

एक अत्यंत ग़रीब व्यक्ति, जिसकी पहले से ही दो बेटियाँ थीं, अब उसके घर तीसरी बच्ची ने जन्म लियाl इस तृतीय बच्ची के जन्मते ही घर में मातम-सा छा गयाl सास-श्वसुर के तानों और कड़वी बोली से बहू तंग आ चुकी थी —

“कलमुँही! वंश डुबाने आई यहाँ! जब से तुझे ब्याहकर लाये हैं, तब से किस्मत में अपशगुन ही देखना-सुनना बदा है! “

अब तो मानो कोई आसमानी आफ़त टूट पड़ी..l इस कोहराम ने तमिया को अंदर से झिझोड़ कर रख दियाl

वह अपने पति फग्गू से बोली –“ज़िंदगी की मार ने हमें कहीं का नहीं छोड़ा…! भगवान हमें दौड़ा-दौड़ाकर मार रहा! “

फग्गू फूट पड़ा –“अब तीन-तीन बच्ची को पालना मेरे वश में नहीं, तम्मी! “

बहुत सोच-विचार के बाद दम्पति ने नवजात को तज देने का कठोर निर्णय लियाl पत्नी की सहमति से फग्गू ने नवजात को गोद में लिया और बड़ी तथा मँझली बेटी को बे-मन से साथ ले, आँसू बहाता हुआ अनाथालय की ओर चल पड़ा।

साथ चलती बड़ी बेटी, रास्ते में बार-बार पूछ रही थी — “बाबजी, हम कहाँ जा रहे हैं?”

पिता का हाथ थामे साथ-साथ चल रही मँझली बिटिया की बाल जिज्ञासा चिहुँक उठी — ” बाबजी! अपन नई गुड़िया के लिये खिलौने लेने जा रहे हैं?”

पिता ने नज़रें चुरा लीं। जवाब देना मुश्किल था।

अनाथालय के फाटक तक पहुँचकर उसने धीरे से नवजात बच्ची को गोद से उतारकर वहाँ के झूले में डालना चाहाl इस हेतु उसने अपनी मँझली बेटी का हाथ छोड़ दियाl

मँझली बेटी सहमकर बोली —

“बाबजी! … मैंने ऐसा क्या किया, जो मेरा हाथ छोड़ दिया?”

उस प्रश्न ने उसके भीतर की दीवारें तोड़ दीं।

उसे लगा, जैसे वह आवाज़ मँझली बेटी की नहीं, अपितु उस नवजात के होंठों से निकली हो —

“बाबजी! मैंने ऐसा क्या किया…?” ….. उसका अन्तः करण दहल गयाl मानो पलभर को समय ठहर गया। उसकी आँखें डबडबा आईं, हाथ काँपने लगे।

उसने बच्ची को फिर से गोद में उठाया, दोनों बेटियों को बाँहों में समेटा रूँधे गले से कहा, “चलो-चलोl घर चलो मम्मी के पासl ”

मन-ही-मन वह फ़िर बुदबुदाया —“बेटा-बेटी में फर्क करने वाला मैं होता कौन हूँ?…मेरा घर तो इनसे ही घर है।”

वह वापस लौट पड़ा।

अनाथालय के फाटक के बाहर ज़िंदगी पहली बार उसके साथ चल रही थी, तीन छोटी हथेलियों का हाथ थामे हुए…. l

© प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर

शासकीय कॉलेज़ केवलारी

संपर्क — ग्राम -धतूरा, पोस्ट – जामगाँव, तहसील -नैनपुर, जिला -मण्डला (म.प्र.) मोबा. 9424316071

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # २२९ – लघुकथा- नियति – ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ ☆

श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

(सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” जी का  हिन्दी बाल -साहित्य  एवं  हिन्दी साहित्य  की अन्य विधाओं में विशिष्ट योगदान हैं। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में रचना सहित 145 बालकहानियाँ 8 भाषाओं में 1160 अंकों में प्रकाशित। प्रकाशित पुस्तकेँ-1- रोचक विज्ञान कथाएँ, 2-संयम की जीत, 3- कुएं को बुखार, 4- कसक, 5- हाइकु संयुक्ता, 6- चाबी वाला भूत, 7- बच्चों! सुनो कहानी, इन्द्रधनुष (बालकहानी माला-7) सहित 4 मराठी पुस्तकें प्रकाशित। मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी का श्री हरिकृष्ण देवसरे बाल साहित्य पुरस्कार-2018 51000 सहित अनेक संस्थाओं द्वारा सम्मानित व पुरस्कृत। साप्ताहिक स्तम्भ “श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य”  के अंतर्गत साहित्य आप प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकते हैं। आज प्रस्तुत है एक विचारणीय लघुकथा  – “नियति।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # २२९

☆ लघुकथा- नियति ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ 

“सुन बेटा! आम मत लाना। मगर, मेरे घुटने दर्द कर रहे हैं, उसकी दवा तो लेते आना,”  बुजुर्ग ने घुटने पकड़ते हुए कहा।

“हुँ! ” बेटे ने बेरुखी से जवाब दिया, “दिन भर बिस्तर पर पड़े रहते हो। घुटने दर्द नहीं करेंगे तो क्या करेंगे?  यूं नहीं कि थोड़ा घूम लिया करें। हाथपैर सही हो जाए।”

बुजुर्ग चुप हो गए मगर पास बैठे हुए दीनदयाल ने कहा, ” सुनो बेटा। यह आपके पिताजी हैं। बचपन में…. . “

“हां हां, जानता हूं अंकल,”  कहते हुए बेटे ने अपने पुत्र का हाथ पकड़ा और बोला, “चल बेटा! तुझे बाजार घुमा लाता हूं।”

यह देखसुन कर दीनदयाल से रहा नहीं गया और अपने बुजुर्ग दोस्त से बोला, “क्या यार! क्या जमाना आ गया? ऐसे नालायक बेटों से उनका पुत्र क्या सीखेगा?”

“वही जो मैंने अपने बाप के साथ किया था और आज मेरा बेटा मेरे साथ कर रहा है। कल उसका बेटा वही करेगा,”  कह कर बिस्तर पर लेटे हुए बुजुर्ग दोस्त अपने हाथों से अपनी आंखों को पौंछ कर अपने घुटने की मालिश करने लगा।

© श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

16-07-2024

संपर्क – 14/198, नई आबादी, गार्डन के सामने, सामुदायिक भवन के पीछे, रतनगढ़, जिला- नीमच (मध्य प्रदेश) पिनकोड-458226

ईमेल  – opkshatriya@gmail.com मोबाइल – 9424079675 /8827985775

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा # ९२ – स्वर्ण चंपा… ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆

श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा –  गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी,  संस्मरण,  आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – स्वर्ण चंपा।)

☆ लघुकथा # ९२ – स्वर्ण चंपा श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

“यह कैसी पूजा बताया है आपने? यह पुष्प मुझे कहाँ मिलेगा?”

“ऐसा करिए आप फोन करके गौरी को ही बता दीजिए, गौरी जरूर ला देगी। ठीक है मैं बता देता हूं और पूजा की विधि शुरू करते हैं।”

“यह पुष्प देवी को चढ़ाने से सारी व्यथाएं दूर हो जाती हैं”, पंडित जी ने कहा।

गौरी की माता कमला जी ने कहा- “अरे! पंडित जी आप दुर्गा सप्तशती का पाठ करने के लिए आए हैं?”

“आपने तो हमारी मुश्किल बढ़ा दी। अब मैं यह कहाँ से लाऊंगी? साधारण चंपा के पुष्प तो लाकर रख हैं, गुड़हल का पुष्प हम देवी को चढाते हैं।”

“आप हमेशा नई-नई विधियां बता कर मुझे हैरान करते हो।”

गौरी को पंडित जी ने फोन लगाकर पुष्प के बारे में बताया और लाने के लिए कहा।

गौरी ने कहा- “ठीक है पंडित जी चिंता मत करिए। ऑनलाइन बहुत सारे ऐप है ऑर्डर कर दिया है आप पूजा करते रहिए। मैं समय से पुष्प लेकर घर पहुंच जाऊंगी।”

सफेद गोरा रंग गौरी का था और उसने पीली साड़ी पहन रखी थी एकदम साक्षात वह स्वयं स्वर्ण चंपा लग रही थी।पुष्प की सुगंध और गौरी को देखकर संपूर्ण मंदिर ऊर्जा मान हो रहा था।

जय माँ अंबे गौरी की आरती गूंज रही थी मंदिर में।

माताजी भी प्रसन्न थी उनकी बिटिया रानी हर मुश्किल में मां का साथ देती है। स्वर्ण चंपा पुष्प आज देखकर वह प्रसन्न थी और मंदिर में सभी श्रद्धालु ने भी पहली बार इस पुष्प के दर्शन किए थे।

पंडित जी ने ढेर सारा आशीर्वाद दिया और कहा तुम्हारे घर में ही साक्षात लक्ष्मी के रूप में गौरी बिटिया है।

© श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

जबलपुर, मध्य प्रदेश मो. 7000072079

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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