हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य #215 – बाल कहानी  – “मगर और मछली” – ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ ☆

श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

(सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” जी का  हिन्दी बाल -साहित्य  एवं  हिन्दी साहित्य  की अन्य विधाओं में विशिष्ट योगदान हैं। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में रचना सहित 145 बालकहानियाँ 8 भाषाओं में 1160 अंकों में प्रकाशित। प्रकाशित पुस्तकेँ-1- रोचक विज्ञान कथाएँ, 2-संयम की जीत, 3- कुएं को बुखार, 4- कसक, 5- हाइकु संयुक्ता, 6- चाबी वाला भूत, 7- बच्चों! सुनो कहानी, इन्द्रधनुष (बालकहानी माला-7) सहित 4 मराठी पुस्तकें प्रकाशित। मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी का श्री हरिकृष्ण देवसरे बाल साहित्य पुरस्कार-2018 51000 सहित अनेक संस्थाओं द्वारा सम्मानित व पुरस्कृत। साप्ताहिक स्तम्भ “श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य”  के अंतर्गत साहित्य आप प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकते हैं। आज प्रस्तुत है बाल कहानी  – मगर और मछली।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # 215 ☆

☆ बाल कहानी – मगर और मछली ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ 

होशियार पुर गांव के पास एक नदी थी. उस में एक मछली रहती थी. उस का नाम मीना था. वह बहुत होशियार व चंचल थी. उस नदी में एक मगर आ गया. वह मछलियों को मार कर खाने लगा.

यह देख कर मीना की मां ने कहा, ” मीना ! तुम मगर से होशियार रहना. वह बहुत दुष्ट है.”

” ठीक है मां, ” मीना ने कहा और वह नदी की लहरें से खेलने चली गई.

दुष्ट मगर वही बैठा था. उस मीना बहुत अच्छी लगी. उस ने सोचा,’ यह बहुत प्यारी मछली है. यदि इसे मार कर खा लिया जाए तो यह बहुत स्वादिष्ट लगेगी.’ यह सोच कर दुष्ट मगर उस के पीछे पड़ गया.

मीना सतर्क थी. जब उस ने मगर को अपने पीछे आता देखा तो भागी. वह घबरा गई थी. फिर उस ने सोचा कि घबराने से काम नहीं चलेगा. उसे हिम्मत से काम लेना होगा. यह सोच कर उस ने अपने दिमाग को शांत किया.

तब उसे याद आया कि वही पास में नदी में एक चट्टान के नीचे गुफा है. उसी की तरफ दौड़ लगाई जाए. वह तेजी से उस ओर भागी. मगर, उस के पीछे हो लिया.

अब आगेआगे मीना तैर रही थी, पीछेपीछे मगर. मगर, मीना छोटी थी. वह तेजी से तैर नहीं पा रही थी. मगर, उस के पास तेजी से आ गया.

तभी मीना पलटी. वह दो चट्टानों के पास से गुजरी.

गुफा पास ही थी. उसे शरारत सूझी. उस ने मगर को छेड़ा, ” क्यों मामा ! तैरना नहीं आता है. या मुझे मार कर खाने की इच्छा नहीं है.”

मगर, यह सुन कर चौंका. मछली की इतनी हिम्मत. वह मगर को चुनौती दे. इसलिए वह उस के पीछे तेजी से भागा. अब मीना बहुत पास थी. वह चिल्लाई, ” पकड़ो मामा !”

मगर, ने अपना मुंह बढ़ाया. मगर, यह क्या ? वह दो चट्टानों के बीच फंस गया था.

” डर गए मामाजी !” मीना ने मगर को चिढ़ाया, ” क्या सारी ताकत खत्म हो गई है ?”

मगर को गुस्सा आ गया. वह तेजी से हाथपैर से जोर लगा कर आगे बढ़ा. वह जितना आगे बढ़ता गया, उतना चट्टानों के बीच फंसता चला गया. जब वह निकल नहीं पाया तब उस के समझ में आया कि एक छोटीसी समझदार मछली ने उसे चट्टानों  के बीच फंसा दिया था.

वह उस चट्टानों के बीच फंसा हुआ भूख से मर गया.

इस तरह समझदार मीना ने दुष्ट मगर से छुटकारा पा लिया.

© श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

06/03/2017

संपर्क – 14/198, नई आबादी, गार्डन के सामने, सामुदायिक भवन के पीछे, रतनगढ़, जिला- नीमच (मध्य प्रदेश) पिनकोड-458226

ईमेल  – opkshatriya@gmail.com मोबाइल – 9424079675 /8827985775

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कथा-कहानी # 125 – स्वर्ण पदक – अंतिम भाग (क्लाइमेक्स) – 6 ☆ श्री अरुण श्रीवास्तव ☆

श्री अरुण श्रीवास्तव

(श्री अरुण श्रीवास्तव जी भारतीय स्टेट बैंक से वरिष्ठ सेवानिवृत्त अधिकारी हैं। बैंक की सेवाओं में अक्सर हमें सार्वजनिक एवं कार्यालयीन जीवन में कई लोगों से मिलना   जुलना होता है। ऐसे में कोई संवेदनशील साहित्यकार ही उन चरित्रों को लेखनी से साकार कर सकता है। श्री अरुण श्रीवास्तव जी ने संभवतः अपने जीवन में ऐसे कई चरित्रों में से कुछ पात्र अपनी साहित्यिक रचनाओं में चुने होंगे। उन्होंने ऐसे ही कुछ पात्रों के इर्द गिर्द अपनी कथाओं का ताना बाना बुना है। प्रस्तुत है एक विचारणीय संस्मरणात्मक कथा  स्वर्ण पदक

☆ कथा-कहानी # 125 – 🥇 स्वर्ण पदक – अंतिम भाग (क्लाइमेक्स) – 6 🥇 श्री अरुण श्रीवास्तव ☆

स्टार हाकी प्लेयर रजत और विशालनगर ब्रांच के स्टाफ के बीच स्वागत सत्कार की औपचारिकता के बाद प्रश्न उत्तर का सेशन हुआ जो सभी के लिये सांकेतिक रुप से बहुत कुछ कह गया , सभी समझे भी पर किसको कितना अपनाना है यह भी तो समझदारी है.प्रतिभा, सामाजिक और पारिवारिक परिवेश व्यक्तित्व का निर्माण करते हैं और व्यक्तित्व निर्माण की यह प्रक्रिया जीवन भर चलती है.इस जीवन यात्रा में उलझाव भी आते हैं, सुपीरियर होने का भ्रम, इन्फीरियर होने की कुंठा एक ही सिक्के के दो पहलू कहे जा सकते हैं, क्योंकि दोनों ही स्थिति में व्यक्ति खुद को वह मान लेता है जो वह होता नहीं है.व्यक्ति के अंदर की यह शून्यता न केवल उसे नुकसान पहुंचाती है बल्कि संपर्क में आये व्यक्तियों को भी प्रभावित करती है.सम्मान और स्नेह दोनों ही क्षत-विक्षत हो जाते हैं.संबंधों में आई ये दरार दिखती तो नहीं है पर महसूस ज़रूर की जाती है.शायद यही कहानी का मर्म भी है.अब आपको सवालों जवाबों की ओर ले चलते हैं.प्रश्नकर्ता के रूप में नाम काल्पनिक हैं , उत्तर अधिकतर रजतकांत ने ही दिये हैं.

अनुराग:आप फाइनल जीतने का श्रेय किसे देंगे

रजत : ये मेरी टीम की जीत है

अशोक: पर फील्ड गोल तो आपने किये,सारी नजरें आप पर थीं, रजत रजत का शोर ही मैदान में गूंज रहा था, रेल्वे का नाम हमारे दिमाग में बिलकुल नहीं आया.

रजत: आपका प्रश्न बहुत अच्छा है पर गोल करना और गोल बचाना तो पूरी टीम का लक्ष्य था, अकेला चना कुछ फोड़ नहीं सकता, ये कहावत मुझे पूरी याद नहीं है पर पिताजी अक्सर कहा करते थे,भैया क्या आपको याद है?

स्वर्ण कांत ने याद नहीं होने का वास्ता दिया हालांकि भावार्थ सब समझ गये पर अशोक ने फिर प्रश्न दागा: माना कि जीत पर हक पूरी टीम का होता है पर स्टार खिलाड़ी, कैरियर, लाइमलाइट,पैसा सबमें बाजी मारी लेते हैं और बाक़ी लोग लाइमलाइट की जगह बैकग्राउंड में रहते हैं.

इस प्रश्न पर टीम के खिलाड़ी रजत की ओर मुस्कुराहट के साथ देख रहे थे, बैंक के स्टाफ के लिए भी इस प्रश्न का उत्तर पाना उत्सुकता पूर्ण था.

रजत: देखिए कुछ गेम में सोलो परफार्मेंस ही रिजल्ट ओरियंटेड बन जाती है पर हाकी, फुटबॉल, वालीबाल, बास्केटबॉल, तो पूरी टीम का खेल है कोई गोल बचाता है, कोई अफेंडर को रोकता है, कोई गोल के लिए मूव बनाता है, पास देता है, अंत में किसी एक खिलाड़ी के शाट से ही बाल गोलपोस्ट में प्रवेश करती है कभी कभी गोलकीपर से वापस की हुई बाल को भी कोई खिलाड़ी वापस गोलपोस्ट में डाल देता है.यह सब टीम वर्क से ही हो पाता है. हम लोग भी उसी टीम वर्क से खेलते हैं जिस तरह आप लोग ये बैंक चलाते हैं.

अभिषेक: जिस तरह क्रिकेट में मेन आफ दी मैच, मेन आफ सीरीज, टाप टेन बेट्समेन, टाप टेन बालर्स होता है, हाकी में क्यों नहीं होता, हमारे यहां भी बेस्ट ब्रांच मैनेजर, बेस्ट रीजनल मैनेजर अवार्ड दिए जाते हैं.

रजत: मेरा सोचना है कि जहां खेल के साथ व्यापार भी जुड़ा रहता है वहां पर कमर्शियल स्पांसर्स ये सब बनाते हैं. बाद में फिर यही प्लेयर्स उनके प्रोडक्ट की मार्केटिंग में लगाये जाते हैं.लोग क्वालिटी की जगह चेहरे पर आकर्षित होकर मार्केटिंग के मायाजाल में फंसते हैं. अधिकांश खेलों में टीम ही सफलता का फैसला करती है. ध्यानचंद हाकी के ब्रेडमेन थे, गावस्कर और तेंदुलकर से कई गुना प्रतिभा के धनी रहे होंगे पर उनके पीछे कमर्शियल स्पांसर्स नहीं थे, पहले भी नहीं और आज भी नहीं. बैंक के बारे में आप लोग मुझसे बेहतर जानते होंगे.

अश्विन: पर फिर भी टीम इंडिया में तो सिलेक्शन का बेनिफिट आपको ही मिलने की संभावना बन रही है.

रजत : अगर ऐसा हुआ भी तो वहां भी टीम में ही खेलना है. हर खिलाड़ी का कैरियर होता है, सफलता दूसरों को भी वैसा करने की प्रेरणा देती है पर अगर किसी खिलाड़ी को ये लगने लगे कि सब उसके कारण होता है तो उसका डाउनफॉल वहीं से शुरू हो जाता है.

बात हाकी के संबंध में चल रही थी पर हर सुनने वाले के दिल तक पहुंच रही थी. सभी परिपक्व और समझदार थे, कही गई हर बात क्रिस्टल क्लियर थी, तो अब और कुछ कहने की जरूरत ही नहीं थी.

विदा लेते समय जब रजतकांत ने अपने बड़े भाई से विदा ली तो उन्होंने कई अरसे बाद रजत को गले लगा लिया पर उन्हें न जाने ऐसा क्यों लगा कि वो अपने छोटे भाई से नहीं बल्कि अपने अनुभवी भाई से गले मिल रहे हैं.

अंततः समाप्त… 

© अरुण श्रीवास्तव

संपर्क – 301,अमृत अपार्टमेंट, नर्मदा रोड जबलपुर 

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा # 74 – बदलाव… ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆

श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा –  गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी,  संस्मरण,  आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – बदलाव।)

☆ लघुकथा # 74 – बदलाव श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

गौरी इस साल गर्मी की छुट्टी में चलो हम लोग  बाबूजी के गाँव चलते हैं।

माँ के गुजर जाने के बाद बाबूजी चाचा चाची के साथ वहीं पर ही रहते हैं। कभी कल हमारे पास आते हैं उन्हें वही अच्छा लगता है।

इस बार बच्चे छुट्टियों में घर आए हैं। बच्चों से पूछते हैं। माँ शालिनी ने गंभीर स्वर में कहा।

बोलो विवेक और चारु क्या तुम छुट्टियों में घर चलोगे?

जब देखो तब पापा आप गाँव चलने को बोलते रहते हैं हम लोग नहीं जाएंगे वहां बहुत गर्मी है।

चलो दो-चार दिन रहकर आएंगे पिकनिक हो जाएगी। शुद्ध हवा और खाना पीना सब कुछ अच्छा रहेगा। गाँव जंगल और पहाड़ी के किनारे है, इसी तरह तुम लोगों को प्रकृति की गोद में रहने का मौका मिलेगा और जो तुम लोग बहुत ऑर्गेनिक करते हो वह भी तुम्हें सही मायने में पता चलेगा।

तो सामान पैक कर लो हम अभी निकलते हैं 3 घंटे में पहुंच जाएंगे।

ठीक है, सभी लोग तैयार होकर जाते हैं और गाँव पहुंचते हैं। गाँव पहुंचकर उन्हें बहुत अच्छा लगता है। बड़ा सा बगीचा और बगीचे में सारे फलदार पेड़ लगे थे। आम, जामुन, नींबू कटहल, बेलपत्र का उसमें बेल भी बहुत लगे हुए थे। बाबूजी ने एक बड़े से बर्तन में बेल का शरबत बनाकर रखा था। सभी को उन्होंने पीने के लिए दिया और शाम को वह अपने बगीचों को पानी डालने के लिए चले गए उनके साथ विवेक और चारु भी गए।

उन लोगों ने खूब सारे फल तोड़े और सब्जियां भी टोडी और माँ लाकर दिया। माँ हम लोग समझ गए दादाजी वहां क्यों नहीं आते सच में यहां हमें बहुत अच्छा लग रहा है। दादाजी लेकिन आपके लिए हम लोग एक एसी लगवा देते हैं।

नहीं बच्चों तुम लोग यह सब अपने शहर के घर में ही करना चाहे जो करना। इसे ऐसा ही रहने दो। तुम लोग मायाजाल जैसा छोटे से डिब्बे के समान फ्लेट में रहते हो। मैं टोकरी में फल रखवा देता हूं।

इतने में बाबूजी के लिए चाची जी रात का खाना लेकर आती है। सभी लोगों को देख कर कहती हैं – अरे तुम लोग भी आई हो चलो घर चलकर खाना खाओ।

नहीं रहने दो यह लोगों का जो मन करेगा ये लोग बना कर खा लेंगे मेरे लिए तो तुम लोग ही सहारा हो। नए जमाने के बच्चे हैं।

जैसे मैं वहां नहीं रहता शायद वैसे ही तुम लोग यहां नहीं रहते जैसे मैंने बदलाव को समझ लिया है तुम लोग भी मुझे थोड़ा समझो।

© श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

जबलपुर, मध्य प्रदेश मो. 7000072079

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – कथा-कहानी ☆ सेवकराम की लघुकथाएं – ब्रेकिंग न्यूज़ और आपदा में अवसर ☆ हेमन्त बावनकर ☆

हेमन्त बावनकर

☆  लघुकथा ☆ सेवकराम की लघुकथाएं ☆

☆ ब्रेकिंग न्यूज़ और आपदा में अवसर ☆

(मेरी लघुकथाओं के पात्र ‘सेवकराम’ के इर्दगिर्द रची गई कुछ लघुकथाओं को आपसे साझा करने का प्रयास।)

हर दिन की तरह आज शाम को भी कॉम्प्लेक्स के सीनियर सिटीजन दोनों बेंचों पर जाकर बैठ आए गए जिन्हें नगर पार्षद ने मुहैया कराई थी।

हर दिन किसी न किसी मतलब-बेमतलब के टॉपिक पर बेमतलब की चर्चा छिड़ जाती। कुछ लोग सत्तापक्ष की विचारधारा से प्रेरित होकर बहस करते तो कुछ लोग विपक्ष की। सेवकराम जी जैसे कुछ सीनियर सिटिज़न तटस्थ या निष्पक्ष भाव से कभी कभार अपने विचार रखने का प्रयास करते।

वैसे तो टी वी पर आए दिन हर शाम विभिन्न पार्टी के प्रवक्ताओं की नूरा कुश्ती होती ही रहती थी और अक्सर कोई न कोई ब्रेकिंग न्यूज़ चलती रहती थी। ब्रेकिंग न्यूज़ का विषय तो कुछ भी हो सकता है। जैसे किसी नेता/बिजनेसमेन के घर ऑफिस में छापा पड़ना, राष्ट्रीय महत्व के नेता का शपथ ग्रहण, आतंकवादी घटना, सैनिकों का शहीद होना और बहुत कुछ।

आज के ब्रेकिंग न्यूज़ की बहस को नया मोड़ देते हुए हरीलाल जी बोले – “आप लोग बेमतलब परेशान हो रहे हो। कल को नई ब्रेकिंग न्यूज़ आएगी और आप लोगों के मन में जो संवेदनाएं हैं उस नई ब्रेकिंग न्यूज़ से जुड़ जाएंगी। फिर आज की ब्रेकिंग न्यूज़ पुरानी ब्रेकिंग न्यूज़ के ढेर में दब जाएंगी।”

कृष्णकांत जी बोले – “आप सही कह रहे हैं। संवेदनशील मुद्दों पर भी राजनीति होने लगती है। अब इंसानियत तो जैसे रही ही नहीं। ऐसी न जाने कितनी ब्रेकिंग न्यूज़ गुजर चुकी हैं जिनपर हम लोगों ने घंटों बहस की और आज हम उनका अंजाम तक नहीं जानते।”

रिटायर्ड प्रो. रामलाल मुस्कराते हुए बोले – “कुछ मुद्दों पर तो हम लोगों में से कुछ लोगों में मतभेद भी हुए और संबंध भी बिगड़ गए। सेवकराम जी, आप क्या कहते हैं?”

सेवकराम जी जरा कम ही बोलते हैं किन्तु जो भी बोलते हैं लोग बड़े ध्यान से सुनते हैं। सब लोगों का ध्यान सेवकराम जी की ओर चला गया।

सेवकराम जी थोड़ा मुस्कराए और बोले – “शायद आज तक किसी ने सोचा भी नहीं होगा कि हम लोगों ने अपने जीवन में जितनी भी ब्रेकिंग न्यूज़ देखी हैं उन घटनाओं का अंजाम क्या हुआ? बस नई ब्रेकिंग न्यूज़ देखी सुनी और पिछली ब्रेकिंग न्यूज़ को किताब के पन्नों की तरह पलट दिया। फिर उन्हें दुबारा पलट कर उनका अंजाम न तो दिखाया गया न ही देखने मिला। यह तो शोध का विषय होना चाहिए। शायद साहिर लुधियानवी ने सच ही कहा है कि –

वो अफ़्साना जिसे अंजाम तक लाना न हो मुमकिन

उसे इक ख़ूब-सूरत मोड़ दे कर छोड़ना अच्छा।

सेवकराम जी उठे हाथ जोड़ कर विदा ली और घर की ओर चल दिये।

समय के साथ वर्तमान ब्रेकिंग न्यूज़ की संवेदनशीलता रोज़मर्रा की जिंदगी में शनैः शनैः संवेदनहीनता में परिवर्तित होने लगी। टी वी चैनलों को अगली ब्रेकिंग न्यूज़ तक टी आर पी बढ़ाने का मुद्दा मिल गया था। राजनीति अपनी जगह चलती रही। कुछ समय के लिए ही सही लोगों का ध्यान अत्यावश्यक मुद्दों से भटक गया या भटका दिया गया।    

प्रो. रामलाल जी के मस्तिष्क में कुछ हलचल हुई। उनके विचारों को तो जैसे संजीवनी मिल गई। वे अपने परम शिष्य अनुराग के पी एच डी के लिए विषय ढूंढ रहे थे। भला ‘ब्रेकिंग न्यूज़’ से बेहतर विषय क्या हो सकता है?

 

©  हेमन्त बावनकर  

16 जून 2025, 11.30 रात्रि 

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # 231 – सिंदूर की महिमा ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ ☆

श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है स्त्री विमर्श पर आधारित विचारणीय लघुकथा सिंदूर की महिमा”।) 

☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # 231 ☆

🌻लघु कथा🌻सिंदूर की महिमा 🌻

कालेज का अंतिम वर्ष हॉस्टल में रेखा बहुत परेशान रहती थी।

रोज-रोज की चिंता, मनचले युवाओं की छींटाकसी से वह परेशान हो चुकी थी। इस बार घर जाऊगीं, तो लौटकर नहीं आऊंगी।

लेकिन रेखा जब आज लौटकर हॉस्टल आई तो सिंदूर भरी हुई मांग को देखकर, बाकी सब छात्राएं बोलने लगी – – – – क्या बात है बहुत छुपी हुई रुस्तम निकली, शादी कर ली बताया तक नहीं।

रेखा बहुत सुंदर शरमाते हुए मुस्कुरा कर बोली— गाँव में तो ऐसा ही होता है। माँ-बाप पसंद से शादी ब्याह करा देते हैं।

हॉस्टल से सभी बातें करते-करते कॉलेज चली जा रही थी। आज रेखा सबसे आगे बड़ी निडर होकर चल रही थी। न जाने कहाँ से उसके मन में यह भावना आ गई थी।

सभी छात्राएं कहने लगी– सच में शादी के बाद तो रेखा बहुत होशियार और निडर हो गई। अब तो हमें भी घर में मम्मी-पापा जो कहेंगे तैयार हो जाएंगे।

पलड़ा भारी होते देख, रेखा ने भगवान को दोनों हाथ उठाकर धन्यवाद दिया। जो लड़कियाँ सीधी बात नहीं समझ रही थी। दुनिया की चका-चौध में खिंची चली जा रही थी। उनको रास्ता दिखाने के लिए रेखा को यह सब नाटक करना पड़ा।

लड़कों के लिए यह चुनौती था। बेधड़क रेखा अब सभी को लेकर अपनी बात कह सकने में सक्षम हो चुकी थी। और आने-जाने में निडर हो चुकी थी।

गाँव से चुनिया काकी ने यह समझाया था – – – बिन माँ – बाप की बेटी हो होशियार बने रहना। सिंदूर को ही ईश्वर मानना और यह शस्त्र धारण कर लो।

बाकी समय आने पर सब ठीक होगा।

© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य #215 – लघुकथा – नियति – ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ ☆

श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

(सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” जी का  हिन्दी बाल -साहित्य  एवं  हिन्दी साहित्य  की अन्य विधाओं में विशिष्ट योगदान हैं। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में रचना सहित 145 बालकहानियाँ 8 भाषाओं में 1160 अंकों में प्रकाशित। प्रकाशित पुस्तकेँ-1- रोचक विज्ञान कथाएँ, 2-संयम की जीत, 3- कुएं को बुखार, 4- कसक, 5- हाइकु संयुक्ता, 6- चाबी वाला भूत, 7- बच्चों! सुनो कहानी, इन्द्रधनुष (बालकहानी माला-7) सहित 4 मराठी पुस्तकें प्रकाशित। मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी का श्री हरिकृष्ण देवसरे बाल साहित्य पुरस्कार-2018 51000 सहित अनेक संस्थाओं द्वारा सम्मानित व पुरस्कृत। साप्ताहिक स्तम्भ “श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य”  के अंतर्गत साहित्य आप प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकते हैं। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा नियति ।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # 215 ☆

☆ लघुकथा – नियति  ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ 

” सुन बेटा! आम मत लाना। मगर, मेरे घुटने दर्द कर रहे हैं, उसकी दवा तो लेते आना,”  बुजुर्ग ने घुटने पकड़ते हुए कहा।

” हुँ! ” बेटे ने बेरुखी से जवाब दिया, ” दिन भर बिस्तर पर पड़े रहते हो। घुटने दर्द नहीं करेंगे तो क्या करेंगे?  यूं नहीं कि थोड़ा घूम लिया करें। हाथ पैर सही हो जाए।”

बुजुर्ग चुप हो गए मगर पास बैठे हुए दीनदयाल ने कहा, ” सुनो बेटा। यह आपके पिताजी हैं। बचपन में… । “

“हां हां, जानता हूं अंकल,”  कहते हुए बेटे ने अपने पुत्र का हाथ पकड़ा और बोला,” चल बेटा!  तुझे बाजार घुमा लाता हूं।”

यह देखसुन कर दीनदयाल से रहा नहीं गया और अपने बुजुर्ग दोस्त से बोला, ” क्या यार! क्या जमाना आ गया? ऐसे नालायक बेटों से उनका पुत्र क्या सीखेगा?”

” वही जो मैंने अपने बाप के साथ किया था और आज मेरा बेटा मेरे साथ कर रहा है। कल उसका बेटा वही करेगा,”  कह कर बिस्तर पर लेटे हुए बुजुर्ग दोस्त अपने हाथों से अपनी आंखों को पौंछ कर अपने घुटने की मालिश करने लगा।

© श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

31-05-2021

संपर्क – 14/198, नई आबादी, गार्डन के सामने, सामुदायिक भवन के पीछे, रतनगढ़, जिला- नीमच (मध्य प्रदेश) पिनकोड-458226

ईमेल  – opkshatriya@gmail.com मोबाइल – 9424079675 /8827985775

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # 22 ☆ लघुकथा – पाखंड के आयाम… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

डॉ सत्येंद्र सिंह

(वरिष्ठ साहित्यकार डॉ सत्येंद्र सिंह जी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत। मध्य रेलवे के राजभाषा विभाग में 40 वर्ष राजभाषा हिंदी के शिक्षण, अनुवाद व भारत सरकार की राजभाषा नीति का कार्यान्वयन करते हुए झांसी, जबलपुर, मुंबई, कोल्हापुर सोलापुर घूमते हुए पुणे में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी के पद से 2009 में सेवानिवृत्त। 10 विभागीय पत्रिकाओं का संपादन, एक साझा कहानी संग्रह, दो साझा लघुकथा संग्रह तथा 3 कविता संग्रह प्रकाशित, आकाशवाणी झांसी, जबलपुर, छतरपुर, सांगली व पुणे महाराष्ट्र से रचनाओं का प्रसारण। जबलपुर में वे प्रोफेसर ज्ञानरंजन के साथ प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े रहे और झाँसी में जनवादी लेखक संघ से जुड़े रहे। पुणे में भी कई साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। वे मानवता के प्रति समर्पित चिंतक व लेखक हैं। अप प्रत्येक बुधवार उनके साहित्य को आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय आलेख  – “पाखंड के आयाम“।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # 22 ☆

✍ लघुकथा – पाखंड के आयाम… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

मैं समुद्र के पास रहता था इसलिए रोज समुद्र के किनारे घूमने जाता। सुबह छ: बजे से सात बजे तक। काफी लोग सैर करते हुए दिखाई देते। कुछ परिचित और की अपरिचितों से परिचय हो जाया करता। गप शप और सैर एक साथ। इधर उधर की जानकारी भी मिल जाती। सुबह किनारे सुबह की हवा बहुत आनंद देती है, प्राणवायु जो ठहरी।

रेती के किनारे बड़े बड़े काले पत्थर हैं वहां और उन पर बैठ कर सुस्ताने वाले भी दिखते। कुछ जोड़े में भी रहते। हंसते खिलखिलाते। बड़ा अच्छा लगता।

एक दिन एक काले पत्थर पर नजर टिक गई। लगा कि मेरे अच्छे परिचित हैं परंतु वे ऊपर से नीचे एकदम काले कपड़े धारण किए हुए थे और चेहरा नीचे किए हुए। मुझे संकोच हो रहा था कि नजदीक जाऊं या नहीं क्योंकि ऐसी वेषभूषा में कभी देखा नहीं था। कद काठी से वही परिचित से लग रहे थे। फिर भी संकोच वश मैं उनके नजदीक नहीं गया।

लेकिन सैर करते करते कब उनके नजदीक पहुंच गया इसका आभास ही नहीं हुआ। अपने पास किसी की उपस्थिति महसूस करके उन्होंने अपना चेहरा ऊपर उठाया और मैंने देखा वही थे पर उन्हें देखते ही आश्चर्यमिश्रित “आप” मेरे मुंह से निकला। मैंने उन्हें काले कपड़ों में देखने की कभी कल्पना भी नहीं की थी। हमेशा सामान्य वस्त्रों में ही देखा था। काले कपड़े और वे भी नीचे काली लुंगी और काला लंबा कुर्ता। मेरी आवाज़ सुनकर उनके चेहरे पर एक फीकी सी मुस्कान आई। कुछ बोले नहीं। मैं भी आगे कुछ नहीं बोला क्योंकि मुझे लगा कि किसी उद्देश्य से अघोर साधना तो नहीं कर रहे। उनके नेत्रों में लालामी और सपाटपन कुछ ऐसा ही संकेत दे रहे थे।

शहर के विद्वानों में उनकी गिनती होती थी। मुझे लगा कि अच्छी प्रतिभाएं भी पाखंड की शिकार हो जाते हैं, ?

© डॉ सत्येंद्र सिंह

सम्पर्क : सप्तगिरी सोसायटी, जांभुलवाडी रोड, आंबेगांव खुर्द, पुणे 411046

मोबाइल : 99229 93647

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कथा-कहानी # 124 – स्वर्ण पदक – भाग – 5 ☆ श्री अरुण श्रीवास्तव ☆

श्री अरुण श्रीवास्तव

(श्री अरुण श्रीवास्तव जी भारतीय स्टेट बैंक से वरिष्ठ सेवानिवृत्त अधिकारी हैं। बैंक की सेवाओं में अक्सर हमें सार्वजनिक एवं कार्यालयीन जीवन में कई लोगों से मिलना   जुलना होता है। ऐसे में कोई संवेदनशील साहित्यकार ही उन चरित्रों को लेखनी से साकार कर सकता है। श्री अरुण श्रीवास्तव जी ने संभवतः अपने जीवन में ऐसे कई चरित्रों में से कुछ पात्र अपनी साहित्यिक रचनाओं में चुने होंगे। उन्होंने ऐसे ही कुछ पात्रों के इर्द गिर्द अपनी कथाओं का ताना बाना बुना है। प्रस्तुत है एक विचारणीय संस्मरणात्मक कथा  स्वर्ण पदक

☆ कथा-कहानी # 124 – 🥇 स्वर्ण पदक – भाग – 5🥇 श्री अरुण श्रीवास्तव ☆

रजतकांत और उनके भाई स्वर्णकांत एक शहर में होने बावजूद प्रतियोगिता के अंतिम दिन याने फाईनल के दिन मिल पाये और वह भी खेल के मैदान पर. रजतकांत ने रेल्वे के VIP guest house में टीम के साथ रुकना ही पसंद किया, mandatory भी रहता है, कोई भी स्पांसर डेवियेशन अफोर्ड नहीं करना चाहता. तो फाईनल मुकाबले के पहले ही ये मुलाकात हुई जिसमें गर्मजोशी कम औपचारिकता ज्यादा थी. नहीं मिलने के दोनों के अपने अपने कारण थे, रजत के लिये फाईनल जीतना उसके लिये टीम इंडिया में वांछित पोजीशन दिला सकता था और स्वर्णकांत अपने छद्मनाम स्वयंकांत से छुटकारा पाना चाहते थे क्योंकि उनका कैरियर भी दांव पर लगा हुआ था. रविवार को इस प्रतिष्ठित मैच को देखने के लिये बैंक का बहुत सारा स्टॉफ भी दर्शक दीर्घा में मौजूद था.

हॉकी की चैम्पियनशिप रेल्वे की टीम ने हरियाणा को हराकर 3-2 से जीती, रेल्वे की तरफ से तीनों गोल फील्ड गोल थे जो रजतकांत की उत्कृष्ट ड्रिबलिंग का कमाल थे जिसमें बेहतरीन प्लेसिंग का बहुत कुशलता से उपयोग किया गया. पिछली चैम्पियन हरियाणा की टीम का पॉवरप्ले, रेल्वे की टीम की चपलता के आगे मात खा गया हालांकि उनके  पैनल्टी कार्नर विशेषज्ञ खिलाड़ी के दम पर पहले दो गोल हरियाणा ने ही पहले हॉफ टाईम में किये और हॉफ टाईम का स्कोर 2-0 था. पर सेकेंड हॉफ ने खेल का नक्शा बदल दिया. मैदान में रजतकांत का टीमवर्क और चपलता दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर गई. रजत हीरो बन चुके थे और जश्न के बाद दूसरे दिन विशाल सेंटर बैंक ब्रांच ने रेल्वे की टीम को शाम को बैंक में आमंत्रित किया. रजत व्यस्त होने के बावजूद मना नहीं कर पाये ,आखिर भाई के साथ वक्त गुजारने का मौका भी तो मिल रहा था. तो दूसरे दिन शाम को लगभग 6 बजे एक तरफ रेल्वे की हॉकी टीम के सदस्य अपने कैप्टन रजतकांत के साथ बैठे थे और दूसरी तरफ थी इंडस्ट्रियल रिलेशन की धीमी आंच को अपने अंदर समेटे बैंक की टीम जिसके कप्तान थे स्वर्णकांत. कुछ अवसर ऐसे होते हैं जब बैंक की छवि और बैंक का सम्मान सबके ऊपर वरीयता पाता है. वही आज भी हुआ पर इस कार्यक्रम के हीरो थे रजतकांत जिनके खेल का पूरा स्टॉफ दीवाना हो गया था और उपस्थित स्टाफ की नजर दोनों भाइयों के बीच उसी तरह दौड़ लगा रही थीं जैसे हॉकी के ग्राउंड में बॉल दौड़ती है कभी इस हॉफ में तो कभी उस हॉफ में.

अंतिम भाग अगले सप्ताह…  

© अरुण श्रीवास्तव

संपर्क – 301,अमृत अपार्टमेंट, नर्मदा रोड जबलपुर 

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # 230 – अमराई ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ ☆

श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है सामाजिक विमर्श पर आधारित विचारणीय लघुकथा अमराई ”।) 

☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # 230 ☆

🌻लघु कथा🌻 🌳 अमराई 🥭

सूरज की चढ़ती धूप, नौ तपा लगा, दिनों का लेखा-जोखा करते, आज ललन सिंह भरी दोपहरी अपने अमराई पर बैठे थे।

चारों तरफ आम के बगीचे। सोंधी खट्टी मीठी खुशबू से मन भर रहा था। पेड़ की छाँव में चुपचाप वह दिन याद कर रहे थे। जब कांता उससे मिलने आया करती थी। यही तो वह अमराई है, बाप दादा की मेहनत का रंग।

मन ग्लानि से भरा हुआ था कि वह कुछ नहीं कर पाए, न ही वृक्षारोपण किया और न ही देखभाल किए। सारी जिंदगी केवल बच्चों को पढ़ने लिखने में लगा दिए।

आँखों से बेबसी के आँसू गिरने लगे। आज समय है कि मेरे पास कोई नहीं है, न कोई पूछने वाला है कि आपका अमराई में क्या और कितने पेड़ों पर आम लगे हैं।

टप- टप  टपाक दो चार आम अध पीले गिरे। ललन ने बड़े प्यार से उसे गले में लटके गमछे में संभाल कर रख लिया।

घर में पोता- पोती आए हैं यह आम पाकर खुश हो जाएं।

जल्दी-जल्दी डग भरते घर पहुंचे आवाज़ लगाई – – – बेटे ने देखा पिताजी अपने गमछे से बंधा हुआ आम निकाल कर टेबिल में रख रहे हैं।

बच्चों ने खुशी से दौड़ लगाई। कड़कती आवाज आई – – – खबरदार जो यह आम खाए।

जमीन पर गिरा है न जाने कितनी बीमारियों का घर होगा। आप ही खाए पिता जी – – मैं तो ऑर्डर देकर बच्चों के लिए आम बुला लिए हैं। आता ही होगा।

ललन सिंह चश्मे से देखते रहे। वाह री!!! दुनिया कैसा बाजार!!!

आम धोकर स्वयं खाते संतुष्ट नजर आए। चेहरे पर मुस्कान और एक हल्की सी कटाक्ष – – अच्छा हुआ मैंने पहले ही अमराई को किसी अच्छे इंसान को दे दिया।

आज उन्हें अफसोस नहीं हो रहा था कि– वह अमराई की देखभाल नहीं कर पाए, और न ही और वृक्षारोपण कर पाए।

क्योंकि अब बेटा और पोता पोती विदेशी जो हो गये हैं। अमराई तो अब गुगल पर सर्च करेंगे।

© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # 21 ☆ लघुकथा – समझौता… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

डॉ सत्येंद्र सिंह

(वरिष्ठ साहित्यकार डॉ सत्येंद्र सिंह जी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत। मध्य रेलवे के राजभाषा विभाग में 40 वर्ष राजभाषा हिंदी के शिक्षण, अनुवाद व भारत सरकार की राजभाषा नीति का कार्यान्वयन करते हुए झांसी, जबलपुर, मुंबई, कोल्हापुर सोलापुर घूमते हुए पुणे में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी के पद से 2009 में सेवानिवृत्त। 10 विभागीय पत्रिकाओं का संपादन, एक साझा कहानी संग्रह, दो साझा लघुकथा संग्रह तथा 3 कविता संग्रह प्रकाशित, आकाशवाणी झांसी, जबलपुर, छतरपुर, सांगली व पुणे महाराष्ट्र से रचनाओं का प्रसारण। जबलपुर में वे प्रोफेसर ज्ञानरंजन के साथ प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े रहे और झाँसी में जनवादी लेखक संघ से जुड़े रहे। पुणे में भी कई साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। वे मानवता के प्रति समर्पित चिंतक व लेखक हैं। अप प्रत्येक बुधवार उनके साहित्य को आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय लघुकथा – “समझौता“।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # 21 ☆

✍ लघुकथा – समझौता… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

रास्ते चलने के लिए होते हैं यह सब जानते हैं और लोग चलते भी हैं। कोई काम से निकलता है तो कोई घूमने। यह रास्ता भी ऐसा ही है। इस पर खूब चौपहिए दुपहिए और पैदल चलते हैं। मदन लाल को इस रास्ते पर घूमना अच्छा लगता है। सुबह और शाम निकलते हैं, लोगों से राम राम करते, हालचाल पूछते जाते हैं। यह रास्ता अच्छी खासी सड़क है। एक ओर पानी निकलने के लिए बड़ी नाली बनी है। दोनों ओर बड़ी बड़ी बिल्डिंग और उनमें दुकानें हैं। मदन लाल जब भी रास्ते पर निकलते हैं और कुछ ऐसा वैसा देखते हैं तो उसे सुधारने के लिए लोगों से कहते रहते हैं।

 आज मदन लाल अपनी सोसायटी से निकले तो रास्ते पर पानी भरा हुआ पाते हैं। पता नहीं पानी के नीचे कितना गहरा गड्ढा है, इसलिए दुपहिए पानी के किनारे दुकानों के आगे के फुटपाथ से निकल रहे हैं। चौपहिए पानी में से निकलते हैं तो उनके पहियों के डूबने से पता चलता है कि पानी कितना गहरा है। मदन लाल सोचते हैं कि रोज अखबार में आ रहा है कि नगरपालिका ने प्री मानसून कार्य में सब रास्तों की समस्या दूर करदी है ताकि नागरिकों को परेशानी न हो। पर यहां पहली बारिश में ही परेशानी हो गई। भरे हुए पानी में दुर्गंध होने के कारण मदनलाल कौतूहलवश देखते हैं कि पानी कहां से आकर भर रहा है। वे देखते हैं कि सड़क के दोनों ओर की बिल्डिंगों की ड्रेनेज का पानी आ रहा है और सड़क पर भर इसलिए रहा है कि उसके निकलने का कोई मार्ग नहीं है। दो तीन दिन बाद सड़क पर ड्रेनेज डालने का काम शुरू होता है और जो पानी भर रहा था वह ड्रेनेज लाइन से निकलने लगा। मदन लाल संतोष की सांस लेते हैं।

 अगले दिन निकलते हैं तो फिर पानी भरा हुआ पाते हैं। वे सोचते हैं कि अब यह कहां से आ गया तो देखते हैं कि इस बड़ी सड़क पर खुलने वाले रास्तों से बारिश का पानी आ रहा है और उसी गड्ढे में भर रहा है। अब वहां से पानी का निकास नहीं है। लोग परेशान हो रहे हैं, झुंझला रहे हैं। मदनलाल स्थानीय नेताओं के पास समस्या बताते हैं। दूसरे दिन से सड़क के दूसरी ओर बारिश के पानी को निकालने के लिए पाइपलाइन डालना है इसलिए सड़क खोद दी जाती है। ड्रेनेज लाइन के लिए खोदी गई सड़क ज्यों की त्यों है और ऊपर से यह खुदाई। मदनलाल भी झु्झलाते हैं और अपने घर लौट आते हैं। सोचते हैं कि सभी लोग परेशान हो रहे हैं और सब सह रहे हैं तो मैं भी सह लूंगा। रास्ता थोड़े ही भाग जाएगा। मैं बिल्डिंग के चारों ओर घूम लूंगा। इस तरह वे मन ही मन खुद से समझौता कर लेते हैं।

© डॉ सत्येंद्र सिंह

सम्पर्क : सप्तगिरी सोसायटी, जांभुलवाडी रोड, आंबेगांव खुर्द, पुणे 411046

मोबाइल : 99229 93647

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares